दलाल स्ट्रीट और जे. एन. यू. : अपूर्वानंद

क्या जे.एन. यू.( जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय ) दरिद्रता या दरिद्र्तावाद की दलाल स्ट्रीट है? अगर एक प्रभावशाली संपादक और एक लोकप्रिय दलित चिन्तक की मानें तो यही उसका डी.एन.ए. है. वह लोगों के आत्म- निर्भर होने के खयाल के खिलाफ है. आत्मनिर्भरता का अर्थ क्या है? क्यों सारे दलित बराबरी के लिए पूंजीवाद नामक रामबाण को नहीं अपना लेते और क्यों वे बराबरी को जितना आर्थिक, उतना ही राजनीतिक और सांस्कृतिक मसला समझते हैं, इस पर बात कभी और की जा सकती है. इस पर भी कि क्यों ऐसा मानना खराब अर्थों में मार्क्सवादी होना है. भारत के मार्क्सवादी ही नहीं अनेक उदार लोकतांत्रिक विचारों वाले लोगों को पूंजी की शक्ति पर जो भरोसा था, उससे उबारने के लिए उन्हें दया पवार , नामदेव ढसाल, कुमुद पावड़े, शरण कुमार लिम्बाले, ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे लेखकों को अपनी कहानी सुनानी पड़ी. वह कहानी कितनी लंबी है, यह रोज़ ऐसे लेखकों की आमद से पता चलता है जो खुद को लेखक नहीं, दलित लेखक ही कहलाना चाहते हैं. अलग-अलग भाषाओं में कही जा रही यह कहानी पाठकों को ‘एक-सी’ लगती है. इन्हें पढ़ते हुए वे ‘दुहराव’ और ‘ऊब’ की शिकायत भी करते हैं. इन आख्यानों में ‘सर्जनात्मकता और कल्पनाशीलता की कमी’ मालूम पड़ती है. लेखक के अपने विशिष्ट व्यक्तित्व के दर्शन उन्हें नहीं हो पाते.

मार्क्स की शिकायत भी पूंजीवाद से यही थी, कि वह व्यक्ति को उसके अपने ख़ास व्यक्तित्व की सर्जनात्मक सम्भावना से ही वंचित कर देता है, कि वह उसे उसके आर्थिक व्यापारों में ही शेष कर देता है. मनुष्यता का बहुलांश सांस्कृतिकता उपलब्ध ही नहीं कर पाता. मार्क्सवाद मानवता को अपनी इस इस भीषण ट्रेजेडी को समझने और फिर एक सुखांत की कल्पना करने का आह्वान करता है. इस पर बहस आगे. क्यों उस सुखांत के संधान के लिए कम्युनिस्ट पार्टियां ही काफी न थीं, इस पर भी बात होनी चाहिए. अभी तो सिर्फ इतना ही समझने की कोशिश करनी है कि जे. एन. यू. पर ऐसा हमला क्यों! क्या जे.एन. यू. उस चिर-क्षुधित और चिर-असंतुष्ट पूंजीवाद की राह में पड़ा कोई रोड़ा है जो बांधों को ऊँचा-और ऊँचा करते, नदियों को पाटते, पर्वतों को चूर-चूर करते, जंगलों को निगलते, समुन्दर और जमीन को खोदते जाने कहाँ एक अदृष्ट की ओर भागा चला जा रहा है? वह पूंजीवाद वह गुलीवर है जिसे बाँधने की कोशिश करते सारे लोग लिलिपुटियों की तरह हास्यास्पद जान पड़ते हैं? क्या जे.एन.यू. ऐसे ही लिलिपुटियों को तैयार करने का कारखाना है?

जे. एन. यू. दरिद्रता के पैरोकारों की ही जगह नहीं, यह साबित करने के लिए दीपंकर गुप्ता और इला पटनायक के नाम काफी होने चाहिए. ये नाम इसलिए कि मीडिया इन्हें जल्दी पहचान लेगा. 1050 शब्दों और आधे मिनट की बाईट की आदत जिन्हें पड़ चुकी है उन्हें गंगा ढाबा के पत्थरों की किसी समाधान पर पहुंचे बिना अगली रात के लिए मुल्तवी हो जाने वाली शहरजाद की हजार रातों से भी लंबी बहसों को सुनने की न तो फुरसत है, न शौक ही. ये बहसें बेकार का शगल हैं जो कुछ उपयोगी पैदा नहीं करतीं. और मार्क्स भी दरअसल तलबगार है शौक का जो ज़रूरतों के बंधन से इंसान को आज़ाद करने का एक पागल सा सपना देखता है.

सारी ज़रूरतों के ऊपर एक ज़रूरत होती है संग-साथ की. नौजवान मार्क्स जे.एन.यू. के तालिबे-इल्मों के लिए लिखता मालूम पड़ता है, “ जब कम्युनिस्ट कामगार आपस में मिलते हैं, तो उनका फौरी मकसद होता है, प्रशिक्षण, प्रचार, वगैरह. लेकिन उसी पल वे एक नई ज़रुरत की भी ईजाद करते है, समाज की ज़रुरत की, और जो साधन मालूम पड़ता है, वह लक्ष्य में तब्दील हो जाता है. यह व्यावहारिक परिवर्तन सबसे ज़्यादा उजागर है फ्रांसीसी समाजवादी कामगारों के जमावड़ों में. तंबाकू,खाना और पीना,आदि अब लोगों के बीच रिश्ते बनाने का जरिया नहीं रह जाते हैं. संग-साथ, गप-शप, जिनकी मंजिल समाजियत है, उनके लिए अपने आप में काफी हैं. भाईचारा कोई नारा नहीं है, एक सचाई है, और इंसान की उदात्तता की चमक( रौशनी) उनके श्रम-जर्जर शरीरों से फूटती है.”जे.एन. यू. की रूह क्लासरूमों में नहीं बसती. वह जीवनानंद दास की चील की तरह खुले आसमानों में परवाज भरती है और अरावली की चट्टानों पर दम लेने को उतरती है. इंसान के तसव्वुर से जाने कितना पहले से पृथ्वी के पृथ्वी की शक्ल लेने की गवाह ये चट्टानें क्या निर्विकार रह पाती होंगी जब इन इंसानी सूरतों को कुछ फानी मसलों पर यों बहस करते सुनती होंगीं,मानो उन्हीं में सारी कायनात की मुश्किलों का हल छिपा है ? इन पाषाण-खंडों की तरह ही ये बहसें भी चिरंतन जान पड़ती हैं और उतनी ही बेकार.

छात्र संघ का चुनाव है और दो छात्र दल चुनावी तालमेल की बात करते हैं.दोनों ही वामपंथी हैं और मार्क्स को अपना आदि गुरु मानते हैं. तालमेल के लिए कुछ मुद्दों पर सहमति आवश्यक है. जे. एन. यू. की परिपाटी के मुताबिक़ रात को मीटिंग तय पाई जाती है. जब दोनों मिलते हैं तो एक का नेता दूसरे से पूछता है, “ तो पहले इसकी सफाई हो जाए कि आपकी नज़र में भारतीय राज्य का चरित्र क्या है?” बहस रात भर चलती है और पौ फटने तक बेनतीजा रहती है. समझौता नहीं हो पाता और दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं.

भारतीय राज्य के चरित्र से एक विश्वविद्यालय के छात्र संघ के चुनाव का रिश्ता? या इराक पर अमरीकी हमले या चीन के थ्येन आन मन चौक काण्ड के बारे में किसी की राय का छात्र संघ का अध्यक्ष या सचिव बनने या न बनने पर असर क्यों पड़ना चाहिए? यह सवाल जे. एन. यू. के ही शहर के दूसरे बड़े और कहीं पुराने विश्वविद्यालय में अचरज से पूछा जाता है और इस पर फिर हंसा भी जाता है. क्योंकि यहाँ और बाकी विश्विद्यालयों में छात्र संघ चुनाव वैसे लड़े जाते हैं जैसे उन्हें लड़ा जाना चाहिए. यह किसी ने नहीं पूछा, न लिंगदोह समिति ने और न जे.एन. यू. के छात्र संघ का चुनाव सालों तक रोक देने वाले उच्चतम न्यायालय ने, कि उनके पहले ऐसा हो सका था कि छात्र संघ का चुनाव सिर्फ हाथ लिखे पोस्टरों और छात्रों की सभाओं के बल पर साल-दर साल होता रहा, कि छात्रों के चुनाव-अधिकारी होते हुए भी बिना किसी खून-खराबे और पक्षपात के चुनाव होते रहे? चूँकि उन्होंने यह नहीं पूछा , उन्होंने जे.एन.यू. पर भी अपना सार्वभौम मॉडल थोपा,उससे सीखने की बात तो दूर रही!

यह जे. एन. यू. है जहां त्रात्स्कीवादी छात्र को सुनने भी सैकड़ों की तादाद में लोग इकट्ठा हो सकते थे. और इस भीड़ में छात्र ही नहीं अध्यापक भी हो सकते थे. यहाँ छात्र नेताओं को दास कैपिटल के हवाले देते सुना जा सकता था. और अगली सुबह दास कैपिटल से उद्धरण निकाल कर पोस्टरों पर यह भी साबित किया जाता था कि गई रात भाषण में मार्क्स को गलत पेश किया गया था.

जे. एन. यू. ने बनने के साथ ही दाखिले के लिए जो प्रक्रिया अपनाई उसने मुमकिन किया कि समाज के सबसे पिछड़े तबकों , सबसे पिछड़े इलाकों के नौजवान उच्च शिक्षा के ‘अभिजात’ अनुभव में साझेदारी करने आएँ. और इसलिए जब इस प्रक्रिया से छेड़छाड़ की कोशिश हुई तो जे. एन. यू. के छात्र लड़े. यह भी जे. एन. यू. में ही हो सकता था, और शुरू में ही कि लड़के और लडकियों के हॉस्टल मिले हुए हों और वे अजूबों की तरह एक दूसरे से न मिलें. ध्यान रहे कि इन छात्रों में ज़्यादातर वे थे जो ‘पिछड़े’ राज्यों से आए थे, जहां सामाजिक मेल जोल में यौन-संकोच अधिक है. फिर भी जे. एन. यू. में लड़कियों के साथ बदतमीजी की खबर शायद ही सुनी गई. एक छात्र ने ध्यान दिलाया , ये घटनाएं तब होना शुरू हुईं, जब छात्र संघ ठप्प पड़ गया था क्योंकि चुनाव रोक दिए गए थे.

स्वागत, यारबाशी जे. एन. यू. के डी. एन. ए. में हैं. जब बिहार से उदास होकर चंद्रशेखर दिल्ली आया तो जे. एन. यू. के पूर्वांचल और महानदी के कमरों ने उसका स्वागत किया. न सिर्फ उसके किशोर भैया ने, जयंत, नीरज लाभ ने भी. और बाद में न जाने कितने छात्रों ने उसे,जो जे.एन.यू.का छात्र नहीं था,इत्मीनान दिया. यह तो बाद की बात थी कि वह जे. एन. यू. का सबसे लाड़ला छात्र संघ अध्यक्ष बना.

जे. एन. यू. सिर्फ जे. एन. यू. में नहीं है. वह उनकी कोई न थी, जिसके साथ दिल्ली की सडकों पर दिसम्बर की एक रात बलात्कार किया गया, फिर भी जे. एन. यू. के छात्र निकल पड़े और राष्ट्रपति भवन का द्वार उन्होंने झकझोर डाला. दिल्ली इन नौजवानों के क्रोध से जगी और पहचानना मुश्किल हो गया कि इनमें कौन जे. एन. यू. है और कौन शहर. रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक ऐसे विश्वविद्यालय की कल्पना की थी जो चहारदीवारी में घिरा न हो. उसका सबसे सुंदर उदाहरण दिसंबर के वे दिन और रातें थीं जब जे. एन. यू. शहर के बीचोंबीच आ गया. तभी यह भी हुआ कि जे. एन. यू . के नौजवानों ने पुकारा और शहर उसके पास गया, मुनीरका की गलियों में युवा कदमों से कदम मिलाने की कोशिश करता हुआ, मुक्तिबोध के शब्दों में पश्चातपद. शहर को इसका इत्मीनान है कि वह जब पुकारेगा, कोई सुने न सुने, जे. एन. यू. उसे सुनेगा. इस भरोसे के आगे किसी विश्वविद्यालय को क्या चाहिए?

5 thoughts on “दलाल स्ट्रीट और जे. एन. यू. : अपूर्वानंद”

  1. प्रोफेसर अपूर्वानंद का जेएनयू रुपक

    अपूर्वानंद ने आज( 16 जून 2013 जनसत्ता के अपने स्तंभ “अप्रासंगिक” में एक प्रभावशाली संपादक और एक लोकप्रिय चिंतक( हम जैसे लोग व्यक्तिवाचक संज्ञा की लत के शिकार रहे हैं तो जरुर चाहेंगे कि वो सर्वनाम को अपदस्थ करके इसी नाम से प्रयोग किए जाते,खैर) के संदर्भ को शामिल करते हुए जेएनयू के संदर्भ में जो कुछ भी लिखा है, वो अपने ढंग का सच है. नामांकन फार्म भरने के पहले ऐसे लेखों की सख्त जरुरत होती है, देशभर के छात्र ऐसे लेखों को खोज-खोजकर पढ़ते हैं.

    हम जेएनयू को आत्मीय लगाव और फैंटेसी की निगाह से देखें तो ऐसे हजारों तत्व सामने आएंगे जो इसे “अनूठा परिसर” साबित करने में रत्तीभर भी कसर नहीं रहने देंगे. निस्संदेह ये प्रतिभाशाली के लिए कई बार अंतिम शरणस्थली बनकर सामने आता है. देखने का ये तरीका बिहार-उत्तर प्रदेश के लगभग उपेक्षित और हाशिए पर जा चुके किसी भी विश्वविद्यालय या कॉलेज पर भी लागू होने से इस तरह के नतीजे तक पहुंचे जा सकते हैं..हां ये जरुर है कि इन विश्लेवविद्यालयों को इस निष्कर्ष तक पहुंचाने में हम 16 दिसंबर से बहुत पीछे जाना होगा. मसलन पटना यूनिविर्सिटी के लिए तो इमरजेंसी तक. लेकिन ऐसे नतीजों को वस्तुनिष्ठ शक्ल देने के पहले ये बहुत जरुरी है कि इन निष्कर्षों को डिकन्सट्रक्ट करके भी देखा जाए.

    अपूर्वानंद अपने पूरे लेख में जिस जेएनयू को एक रुपक के रुप में देख रहे हैं, क्या ये रुपक भर है या फिर जिस परिवेश में हम उस जेएनयू को जी रहे हैं, उस रुपक को एक ब्रांड की शक्ल और मार्केटिंग के सिरे से भी समझने की जरुरत है? साहित्य में जो रुपक है, मार्केटिंग में वो ब्रांड के नाम से जाना जाता है.दोनों में समानता इस स्तर पर होती है कि अगर आपने रुपक के तहत आपने किसी चीज का विश्लेषण कर दिया तो फिर वो सवालों के घेरे से बाहर आ जाता है( चांद का मुंह टेढ़ा है जैसे अपवाद फिर भी हैं) और बाजार में जो ब्रांड है वो पहली ही रणनीति में ग्राहकों को सवालों के घेरे से अलग कर देता है. मसलन, नाईकी के जूते आपको ये पूछने की इजाजत नहीं देता- पैर काटेंगे तो नहीं, टिकाउ तो है न, पानी में खराब तो नहीं हो जाएंगे ? बहरहाल

    आखिर ऐसा क्या है कि वहां के मेस में होनेवाली रात की बहसों जब कि टेबल कई बार चावल-दाल से सने होते हैं, वो वक्ता भी सहज रुप से तैयार हो जाता है जो कि बाकी जगहों पर जाने के लिए दुनियाभर के तामझाम करता है. बुद्धिजीवियों की तो लंबी फेहरिस्त है लेकिन इरफान खान से लेकर मनोज वाजपेयी खुले टीले में अपनी बात करने के लिए न केवल तैयार बल्कि लालायित रहते हैं. इस संदर्भ में मैंने पहले भी पोस्ट लिखी थी. अगर हम इन सवालों पर थोड़ी मेहनत करें तो हम जेएनयू की उस टैबू को बेहतर समझ सकेंगे जिसके तले न केवल वहां के छात्र बल्कि बाहर के लोग भी एन्डोर्स होते हैं. ये “अपूर्वानंद के जेएनयू रुपक” से बिल्कुल अलग “जेएनयू की ब्रांड इमेज” का मसला ज्यादा है जिस पर अलग से बात होनी चाहिए. मैंने एक नहीं कई बार देखा है, राह चलते वहां के दो-चार छात्रों से बात कर ली गई और फिर स्क्रीन पर फ्लैश होने लग गया- जेएनयू स्कॉलर ने किया इसका विरोध, जेएनयू फलां के खिलाफ. आज अगर अपूर्वानंद 16 दिसंबर की घटना को जिस अंदाज और संदर्भ में याद कर रहे हैं तो उसमें सिर्फ उस वक्त का वर्तमान शामिल नहीं है, उसमें वह इतिहास भी शामिल है जो कि पटना, लखनउ और इलाहाबाद जैसे किसी भी दूसरे विश्वविद्यालय के हिस्से में मौजूद है लेकिन चूंकि उसमे वर्तमान की घटनाओं के साथ छौंक नहीं लगायी जा सकती इसलिए उनसे कोई सुने न सुने, ये सुनेंगे की उम्मीद नहीं लगायी जा सकती. इस “ब्रांड जेएनयू” के कोई न सुनने पर इसके सुनने के अंदाज पर भी गौर करें.

    पहले इसी 16 दिसंबर की घटना से. जाहिर है जेएनयू के पोस्टर्स बनाने में जितना दक्ष,अभ्यस्त और तत्पर है, बाकी के संस्थान बहुत ही पिछड़े..ये भी जाहिर है कि कौन उसके आंदोलनों और हांक से प्रेरित होकर जंतर-मंतर, इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन जाता है, ये भी पता करना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन सवाल ये है कि अपूर्वानंद जैसे स्तंभकार जो अपनी बातों को हम जैसे हड़बड़िया ब्लॉगरों के मुकाबले ठहरकर,बारीकी से अपनी बात रखने में यकीन करते हैं, जेएनयू को एक संस्थान के बजाय एक रुपक, एक अवधारणा, एक विचार और परिवेश बताने से पहले इस सिरे से भी सोचने की जरुरत पैदा तो करते ही हैं कि बाकी लोगों की सक्रियता को इस व्यक्तिवाचक संज्ञा के आगे तिरोहित कर देने या फिर “रेस्ट ऑफ जेएनयू” जैसी शक्ल देने के क्या मायने निकलकर आते हैं ? 16 दिसंबर की घटना में जेएनयू-डीयू तो छोड़ दीजिए, हजारों ऐसे लोग गए थे जिनका कि इस परिसर से न तो कोई लेना-देना है और न ही सीधे-सीधे पढ़ाई-लिखाई( पाठ्यक्रम संबंधित)..क्या ऐसे सारे लोग “जेएनयूमय” होकर वहां पहुंचे थे. अपूर्वानंद का आशय अगर संख्याबल से है तो जेएनयू को हमेशा सिलेब्रेट करना चाहिए कि वो हमेशा आगे रहेगा. लेकिन इसी 16 दिसंबर की एक घटना को शामिल करें तो एक दूसरे संदर्भ भी उतने ही जरुरी हो जाते हैं.

    पूरा मीडिया, दर्जनों चैनल कॉन्सटेबल की मौत को प्रदर्शनकारियों के हमले से हुई मौत के रुप में दिखा-बता रहा था. जाहिर है, ऐसे में जेएनयू के लोग क्रांतिकारी नहीं प्रशासन की ओर से हुडदंगिए करार दिए गए. मामला चलता रहा, प्रशासन कठोर होती रही. इसी बीच डीयू के एक छात्र योगेन्द्र सिंह ने बयान दिया कि वो अचेत हो जाने के समय कॉन्सेटबल के न केवल पास था बल्कि उसने ही लोगों को बताया और हॉस्पीटल तक साथ गया..उसे वहीं बाहर रोक लिया गया. योगेन्द्र की इस कोशिश को मीडिया ने पहले तो बहुत अधिक महत्व नहीं दिया लेकिन पहली बार जब एनडीटीवी इंडिया ने इसे दिखाया, योगेन्द्र की पूरी बातचीत को प्रसारित किया तो बाकी चैनलों पर दो दिन तक यही खबर चलती रही.

    नतीजा जो प्रशासन जेएनयू और तथाकथित उससे प्रेरित होकर आनेवाले लोगों को हुडदंगिए मान रही थी, थोड़ी नरम क्या कहिए हारा हुआ नजर आने लगी. दुर्भाग्य से दिल्ली पुलिस और प्रशासन के इस चेहरे पर वर्तिका नंदा जैसी मीडिया आलोचक ने इसे “दिल्ली पुलिस के चेहरे पर ममता” का झलकना व्याख्यायित किया.

    इस संदर्भ को शामिल करने का ये आशय बिल्कुल नहीं है कि अपूर्वानंद से सवाल किए जाएं कि क्या आपको योगेन्द्र की इस पूरी पहल पर कुछ नहीं लिखना चाहिए था या फिर जब आप “अनूठा कैंपस” जैसा लेख लिख रहे हैं तो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा और बाकी लोगों को उस व्यक्तिवाचक संज्ञा के भीतर जातिवाचक संज्ञा में तब्दील देने के पहले नहीं सोचना चाहिए था ? हर लेखक का अपना चुनाव और प्राथमिकता होती है, जाहिर है वो वैसा ही लिखेगा. जब पूरा फेसबुक प्रदेश मोदी-आडवाणी विवाद में लिथड़ा होता है, तब मैं अपने रेडियो के मरम्मत हो जाने औऱ चश्मे का पावर घट जाने की खुशखबरी साझा करता हूं. लेकिन जब ठहरकर गंभीरता से कोई बात करने का मूड किसी का बने तो जरुरी है कि उस मूड में भी एक व्यापकता हो.

    एक और घटना. डीयू में पढ़नेवाले हममे से कई लोग जानते हैं कि हिन्दी विभाग से एम.फिल् कर रही कनकलता के साथ उसके मकान-मालिक ने जाति जान लेने पर क्या किया और घटना की जानकारी होने पर वर्चुअल स्पेस की सक्रियता की बदौलत ये मामला कैसे मीडिया तक पहुंचा. घटना के 13-14 दिन बाद ही सही सक्रियता खुलकर सामने आयी और न केवल उन्होंने कनकलता सहित उनके साथ के लोगों को भावनात्मक रुप से साथ दिया बल्कि आइटीओ पर सबके साथ विरोध प्रदर्शन किया. मीडिया में आने से तब मामला बढ़ चुका था.लिहाजा जेएनयू छात्र संगठन भी बैनर सहित पहुंचे. हम सब अपने-अपने तरीके से इस मामले को आगे ले जाने और इस पर बात करने के लिए संपर्क करने में लगे थे. जो भी और जितनी खबर मीडिया में आ सकती थी,आयी लेकिन जेएनयू की तरफ से, यहां तक कि मीडिया की तरफ से वो जेएनयू छात्र संगठन की पहल हो गई थी. हम डीयू के उन छात्रों का चेहरा याद कर रहे थे जो एक एसएमएस,फोन कॉल पर अपना सारा काम छोड़कर आए थे.

    इतनी बात तो अपूर्वानंद भी जानते हैं कि वो जिस माहौल में जेएनयू को अनूठा कैंपस करार दे रहे हैं, उसकी वायनरी डीयू का बनना तय है. इस माहौल में बिना इसकी बायनरी के इस लेख को नहीं देखा जा सकता..और जिसका नतीजा होगा कि हम जैसे सतही लोग इस रुपक के भीतर की व्यापकता को समझे बिना दो ब्रांड़ों की आपाधापी के बीच से ही अर्थ खींचने की कोशिश करेंगे. ये तो अच्छा है कि एक डीयू का प्रोफेसर जेएनयू को ऐसे ताज से नवाज रहे हैं, ये अधिक ऑफ बीट मार्केटिंग किन्तु ज्यादा अपीलिंग पैटर्न है. लेकिन उस जमीन पर भी तो बात करनी होगी जहां इस ब्रांड के अपने मायने बनते-बदलते हैं.

    जेएनयू के छात्र संस्थान से, अधिकारी से सीधे चुनौती लेते दिखाई देते हैं. जाति और लिंग के खिलाफ खुलकर सामने आते और विरोध करते दिखाई देते हैं. ये अलग बात है कि आरक्षण के समर्थन में यूथ फॉर एक्यूअलिटी के ब्रिगेड न केवल गाड़ी भर-भरकर एम्स के आगे नारे लगाने जाते रहे, प्रोफेसर से सेंत-मेत करते रहे बल्कि खुलकर चुनाव भी लड़ा. उसी जेएनयू में जाति आधारित लोकतंत्र बनने की प्रक्रिया भी चरम पर पहुंची. हम जिनके साथ सालों से भक्तिकाल, मनोहरश्याम जोशी, भारतीय अर्थव्यवस्था के जानकार की हैसियत से घूम रहे थे, उस वक्त हमारा ज्ञान इजाफा किया गया कि अरे ये तो कुर्मी है, कहार है, कायस्त या धोबी है. इतना अनूठा कैंपस कहां मिलेगा आपको ? उस वक्त अगर मैं आरक्षण के विरोध में धरना देनेवाले और यूथ फॉर एक्वलिटी को ही जेएनयू की असल आवाज करार देनेवालों की संख्या गिन पाता तो आपको इसी तरह के एक नए निष्कर्ष की तरफ ले जाता- मार्क्स की स्थली इतनी जातिवादी क्यों है ?

    आखिरी बात, अपूर्वानंद सहित जेएनयू को रुपक की तरह देखनेवाले साथियों को यहां क्रांति,प्रतिरोध और बदलाव की जो फसल पैदा होती दिखती है, एक बार उस पैदावार और तैयार फसल पर भी निगरानी डालने की जरुरत है. हमने ऐसे दर्जनों साथियों को एम ए,एमफिल् के दिनों में डाउन-डाउन करते देखा, आज डीयू के टीचर इन्चार्ज के आगे जितनी उपर उंगलियां और हाथ डाउन-डाउन करते देखे थे, उससे कई गुना सिर नीचे झुकाते, तलहथी रगड़ते देखता हूं. अपने भीतर को मरते देखता हूं..आप इसे प्रैक्टिकल होना कह सकते हैं और शायद जरुरी भी है. लेकिन ये कलाकारी तो जेएनयू के ही लोग कर सकते हैं न कि कैंपस में प्रतिरोध का पाठ क्योंकि वो इतना जरुर जानते हैं कि अकादमिक दुनिया में इसके लिए स्पेस नहीं है( शुरु होने जा रहे हैं बहुत सारे बीए स्तर के पाठ्यक्रम, उसके बाद जेएनयू के अंदाज और चरित्र पर अलग से विश्लेषण दिलचस्प होगा) तो ये सब करना जोखिम नहीं बल्कि ब्रांडिंग और अवसर उगाही की प्रक्रिया है. सवाल बकवास लगे फिर भी, पिछले पांच सालों मे जेएनयू के लोगों का डीयू में तदर्थ औऱ अतिथि प्रवक्ता बनकर पढ़ाना बढ़ा है, यहां के चार साला पाठ्यक्रम से लेकर दुनियाभर की बातों को लेकर हंगामा मचा हुआ है, वो डाउन-डाउन करनेवाले हाथ कहां चले गए ? लेकिन नहीं, इस सवाल पर सोचेंगे कि जूते उसी डीयू से पढ़े लोगों पर पड़ेगी कि सब धीरे-धीरे सिस्टम के कल-पुर्जे बन गए.

    प्रतिरोध की जो वैलिडिटी पीरियड होती है, उस आलोक में अपूर्वानंद के इस रुपक और वहां से निकलनेवाले छात्रों पर एक तुलनात्मक अध्ययन तो बनता है. उन कारणों पर भी अध्ययन जरुरी है कि आखिर क्यों जो काम, कम संख्या में ही सही योगेन्द्र जैसे लोग करते हैं, वो कोर्स खत्म होने पर भी धक्के खाते रह जाते हैं और क्यों जेएनयू के छात्र यूथ फॉर एक्टविटी में सक्रिय रहते हुए भी मार्क्सिज्म को उतना ही अधिकारपूर्ण ढंग से एन्ज्वॉय करता है..आपको लगेगा- ये रामप्यारी और मुसद्दीलाल के चाय बेचे जाने के बीच का फर्क है. एक अपने को सबसे घटिया,सबसे रद्दी चाय बोलकर अपनी ब्रांडिंग करता है और दूसरा पी लो बाबूजी- एक कप मारोगे तो पूरी दास कैपिटल पढ़ने तक की उर्जा बनी रहेगी. हम इस ब्रांड के सवाल के साथ ये बिल्कुल नहीं पूछने जा रहे कि ऐसी जमीन तैयार करने में कौन किस तरह लगा है और इस ब्रांड फेनोमेना में कैसे असल में रद्दी होकर भी वो जेएनयू हो जाता है ? आखिरी क्यों अमेरिका,इटली,इंग्लैंड जैसे देश के शासकों के दिन-रात कोसे जाने के बावजूद अरमानी,बर्साचे,रैडो को भारत में ही अपना बाजार,मुनाफा और भविष्य दिखाई देता है ? जेएनयू के लिए डीयू और देशभर के विश्वविद्यालय कहीं वही भारत की तरह तो नहीं ?

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  2. Humare man mein bhi jnu ke prati kaafi izzat hai. par ek sawaal hai ki jnu ke chaatron ka badlaav ki rajneeti mein kya sakriya yogdaan hai. pichle 30 saalon mein sainkdo jagahon par log lad rahe hai, jnu chaatra to deekh nahin rahe kahin ?

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  3. Dear Kafila team, A suggestion\request. In a time when western returned english speaking academics have highjacked most discourses, apoorvanand is one of the few most politically relevant, call-a-spade-a-spade person in among intelligentsia writing in Hindi. So we love him. (He’s also very handsome! :))
    But, the Hindi font your blog uses is not the most legible font around and makes it difficult to read the posts and one spends more time on it than one would otherwise while reading things typed out in devnagri. Could you please consider this and see if something can be done? (Not to be a punctuation nazi, but poornviram, not full stop!!). Thanks.

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    1. Dear Kanu,
      We appreciate your concerns about the Hindi font (and about Apoorvanand being handsome too!). Unfortunately, we function on the wordpress platform and there are certain limitations, as you know, with unicode fonts in Hindi – all this makes our task a bit difficult. You can make your reading easy if you just hit ‘Ctrl +’ on your keyboard. We will keep trying on our part to resolve the issue as best as we can.

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