All posts by subhash gatade

भारतीय फ़ासीवाद और प्रतिरोध की संभावना : आशुतोष कुमार

Leading Critic Ashutosh Kumar, Editor ‘Aalochana’ , who teaches at Department of Hindi, Delhi University will be delivering the sixth lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series’ ( in Hindi) on Saturday,13 th August,  2022, at 6 PM (IST).

He will be speaking on ‘ भारतीय फ़ासीवाद और प्रतिरोध की संभावना’ ( Indian Fascism and Possibility of Resistance) 

This online lecture would be held on zoom and will also be shared on facebook as well : :facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Join Zoom Meeting https://us02web.zoom.us/j/89995508417?pwd=QWdlMVVjNElaUXEyQURZd2dFVTNrUT09

Meeting ID: 899 9550 8417
Passcode: 336956

Organised by :NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh 

संधान व्याख्यानमाला : छठा वक्तव्य 

विषय : भारतीय फ़ासीवाद : प्रतिरोध की संभावना 

वक्ता : अग्रणी लेखक एवं संपादक ‘आलोचना’

आशुतोष कुमार 

हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय 

शनिवार, 13 अगस्त, शाम 6 बजे 

सारांश :

भारतीय फ़ासीवादऔर प्रतिरोध की संभावना 

कुछ  प्रश्न:
क्या भारत की वर्तमान परिस्थिति को फासीवाद के रूप में चिन्हित किया जा सकता है? अथवा क्या इसे केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण , धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवाद की राजनीति के रूप में देखा जाना चाहिए? यह सवाल महत्वपूर्ण इसलिए है किस के जवाब पर इस परिस्थिति से मुकाबला करने की रणनीति निर्भर करती है।

अगर यह फासीवाद है तो इसके उद्भव और वर्तमान शक्ति-सम्पन्नता के आधारभूत कारण क्या हैं? क्या यह केवल वैश्विक वित्तीय पूंजीवाद के संकट की अभिव्यक्ति है, जैसा कि प्रभात पटनायक जैसे अर्थशास्त्री समझते हैं?

 क्या भारतीय फ़ासीवाद जैसी किसी अवधारणा के बारे में सोचा जा सकता है? या यह सिर्फ एक वैश्विक प्रवृत्ति है ?

अगर यह फ़ासीवाद नहीं है तो क्या यह पश्चिम और पश्चिमपरस्त राजनेताओं और बौद्धिकों द्वारा अन्यायपूर्ण ढंग से दबाए गए हिन्दू राष्ट्रवाद का उभार है, जैसा कि के भट्टाचार्जी जैसे सावरकरी टिप्पणीकार दावा करते हैं?

क्या यह संघ के बढ़ते लोकतंत्रीकरण के चलते उसके नेतृत्व में वंचित- उत्पीड़ित जन समुदाय द्वारा किया गया सत्ता परिवर्तन है, जिसने कुलीन वर्गों की कीमत पर अकुलीनों को शक्तिशाली बनाया है? जैसा कि अभय कुमार दुबे और बद्री नारायण जैसे सामाजिक लेखक संकेत करते हैं?

 क्या वर्तमान सत्ता संतुलन को बदला जा सकता है? इसे कौन कर सकता है और कैसे?

कुछ बातें

फ़ासीवाद का सबसे बड़ा लक्षण कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका के एक गठबंधन के रूप में काम करने की प्रवृत्ति है। लोकतंत्र में इन तीनों के अलगाव और इनकी स्वायत्तता पर इसलिए जोर दिया जाता है कि कोई एक समूह राजसत्ता का दुरुपयोग न कर सके। तीनों निकाय एक दूसरे पर नजर रखने और एक दूसरे को नियंत्रित करने का कार्य करें। इस व्यवस्था के बिना एक व्यक्ति और एक गुट की निरंकुश तानाशाही से बचना नामुमकिन है।

अयोध्या-विवाद से लेकर गुलबर्ग सोसाइटी जनसंहार  और छतीसगढ़ जनसंहार तक के मामलों में हमने सुप्रीम कोर्ट को संविधान-प्रदत्त नागरिक अधिकारों और न्याय की अवधारणा के विरूद्ध राज्य के बहुमतवादी फ़ैसलों के पक्ष में खड़े होते देखा है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने धन-शोधन निवारण अधिनियम के अन्यायपूर्ण प्रावधानों के खिलाफ दी गई याचिका पर राज्य के पक्ष में फैसला दिया है. सीएए और धारा 370 के निर्मूलीकरण जैसे मामलों में चुप्पी साधकर भी उसने नागरिक अधिकारों के विरुद्ध राजकीय निरंकुशता का समर्थन किया है.

नाज़ी जर्मनी में ग्लाइसेशतुंग या समेकन के नाजी कानूनों के जरिए इसी तरह राज्य के सभी निकायों को सकेन्द्रित और एकात्म बनाया था.  हिटलर की तरह मुसोलिनी ने भी ‘राष्ट्र-राज्य सर्वोपरि’ के सिद्धांत के तहत न्यायपालिका को पालतू बनाने का काम किया था. भारत में भी हमने गृह मंत्री अमित शाह को सबरीमाला  मामले में  सुप्रीम कोर्ट को चेतावनी देते देखा है.

भारत में फ़ासीवाद के सभी जाने पहचाने लक्षण प्रबल रूप से दिखाई दे रहे हैं। एक व्यक्ति की तानाशाही और व्यक्ति पूजा का व्यापक प्रचार। मुख्य धार्मिक अल्पसंख्यक समूह के विरुद्ध नफरत, हिंसा और अपमान का अटूट सिलसिला। अल्पसंख्यकों के खिलाफ अधिकतम हिंसा के पक्ष में जनता के व्यापक हिस्सों का जुनून। विपक्ष की बढ़ती हुई असहायता। स्वतंत्र आवाजों का क्रूर दमन। दमन के कानूनी और ग़ैरकानूनी रूपों का विस्तार। मजदूरों और किसानों के अधिकारों में जबरदस्त कटौती। आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के सम्मान के संघर्षों का पीछे ढकेला जाना। शिक्षा पर भगवा नियंत्रण। छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का विलोपन। फ़ासीवादी प्रचार के लिए साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला, सिनेमा और दीगर कला-विधाओं के नियंत्रण और विरूपण को राज्य की ओर से दिया जा रहा संरक्षण और प्रोत्साहन।

अभी भी कुछ लोग भारत में फासीवादी निज़ाम से सिर्फ इसलिए इंकार करते हैं कि इस देश में गैस चैंबर  स्थापित नहीं किए गए हैं। उन्हें समझना चाहिए कि भारतीय फ़ासीवाद ने फ़ासीवाद अतीत से बहुत कुछ सीखा है। उसने समझ लिया है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण  देश में  भौतिक गैस चैंबर से कहीं अधिक असरदार और स्थायी  व्यवस्था है देश के भीतर सामाजिक और  मनोवैज्ञानिक गैस चैम्बरों का विस्तार।

लगभग समूचे देश को एक ऐसे सांस्कृतिक गैस चेंबर में बदल दिया गया है, जिसमें एक व्यक्ति और एक विचारधारा की गुलामी से इनकार करने वाले स्वतंत्रचेता जन अपने जीवित होने का कोई मतलब ही ना निकाल सकें।

यूरोप की लोकतांत्रिक परम्पराओं के कारण फ़ासीवादी राज्य की स्थापना के लिए कानूनी बदलावों की जरूरत थी. भारत में ‘भक्ति-परम्परा‘ की जड़ें बहुत गहरी हैं. शर्तहीन-समर्पण का संस्कार प्रबल रहा है. क्या यह भी एक कारण है कि भारत में यूएपीए और अफ्स्पा जैसे कुछ विशेष कानूनों के अलावा व्यापक कानूनी बदलावों की जरूरत नहीं पड़ी है?

फ़ासीवाद की मुख्य जीवनी शक्ति नफ़रत की भावना है। हमारे देश में वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा के कारण अपने ही जैसे दूसरे मनुष्यों से तीव्र नफरत का संस्कार हजारों वर्षों से फलता फूलता रहा है। वोट तंत्र ने इस नफरत को उसकी चरम सीमा तक पहुंचा दिया है। क्या भारतीय फ़ासीवाद नफरत के इस चारों ओर फैले खौलते हुए समंदर से उपजे घन-घमंड के रूप में ख़ुद को जनमानस में स्थापित कर चुका है?

इस बातचीत में मैं ऐसे ही कुछ सवालों के जरिए यह देखने की कोशिश करूंगा कि क्या हम ‘भारतीय फासीवाद’ की कोई व्यवस्थित  सैद्धांतिकी निर्मित करने के करीब पहुँच गए हैं. ऐसी किसी संभावित सैद्धांतिकी की रूपरेखा  क्या होगी और इस उद्यम से हम अपने किन सवालों के जवाब हासिल करने की उम्मीद कर सकते हैं. 

 The Role of Individuals in resisting the Majoritarian State – Aakar Patel

Eminent author and rights activist Aakar Patel will be delivering the 17 th lecture in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative, at 6 PM (IST), Sunday, 3 rd July, 2022.

He will speak on ‘The role of individuals in resisting the majoritarian state’. You can also watch it live at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

About the Speaker :

Aakar Patel is a syndicated columnist, author and rights activist and is Chair, Amnesty International India

He has edited English and Gujarati newspapers. His translation of Saadat Hasan Manto’s Why I Write was published in 2014 ( Tranquebar). His study of majoritarianism in India ‘ Our Hindu Rashtra : What It Is. How We Got There came out in 2020 ( Westland) and his next book which seeks to explain data and facts on India’s performance under Narendra Modi, titled ‘Price of ‘The Modi Years‘ was published in 2021 ( Westland). His forthcoming book is on protest and participation by citizens

Abstract :

The role of individuals in resisting the majoritarian state.

India is going through a transformational period when many feel constitutional values have been undermined, an oligopoly has been handed control over large parts of the economy and the secular and pluralist basis of the nation are being eroded. 

What can the individual do in these circumstances? A talk on the ways of meaningful resistance

Why Google News Does Not Want To Talk Caste ?

The Google episode shows the right-wing vision of unity is exclusionary. But this vision is increasingly being challenged in the United States and beyond.

On 9 May 1916, a young BR Ambedkar presented a paper at Colombia University in the United States titled Castes in India: Their Mechanism, Genesis and Development. He referred to caste as a “local problem, but one capable of much wider mischief”. He wrote, “…if Hindus migrate to other regions on earth, Indian caste would become a world problem.”

More than a century later, as one of the biggest corporations, Google, battles allegations of caste discrimination in the United States, the predictive value of Ambedkar’s words is evident. Recently, Google News cancelled a scheduled talk by Thenmozhi Soundararajan, the founder and executive director of Equality Labs, after many Google employees (of Indian origin or Indians) opposed it. The discussion was supposed to mark Dalit Equality Month, celebrated every April to mark the month Ambedkar, the first law minister of independent India and its leading anti-caste activist, was born. Equality Labs is a leading non-profit group in the United States that advocates Dalit rights. According to its 2016 survey, a third of Hindu students in the United States reported experiencing caste discrimination.

Thenmozhi was subjected to an organised campaign led by a section of Google employees, who called her “Hindu-phobic” and “anti-Hindu”. The name-calling went on in emails her opponents sent to company bosses and documents they posted on a mailing list that thousands of Indian employees access.

( Read the full article here)

No End to ‘Tamas’ ( Darkness) Around ?

One can imagine that if the plan to provoke riots before Eid in Ayodhya would have been successful, how it could have easily spilled over to the other parts of the country.

Image for representational purpose. Credit: Hindustan Times

It was the early 1970s when Bhisham Sahni, the legendary Hindi writer had penned the novel Tamas. It looks at the Hindu-Muslim riots in India in the backdrop of the Partition. Its central character is Nathu, who is Dalit and does the work of removing hides from dead animals. A local politician persuades Nathu to kill a pig; the act is later used to foment a riot in the city.

It has been more than 40 years since the novel was written, but it still resonates with today’s India as it throws light on the ‘fault lines’ of Indian society and shows the ease with which they can be weaponised.

A fortnight back, a similar attempt to provoke a riot was made in Ayodhya using a similar technique; however, prompt action by the district police averted a riot there.

( Read the full article here)

Politics of Cultural Nationalism, People’s Opinion and Hindi Intellectual : Virendra Yadav

Leading Writer and Critic Virendra Yadav will be delivering the fifth lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series’ ( in Hindi) on Saturday,14 th May,  2022, at 6 PM (IST).

He will be speaking on ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति , जनमानस और हिंदी बुद्धिजीवी’ ( Politics of Cultural Nationalism, People’s Opinion and Hindi Intellectual)

This online lecture would be held on zoom and will also be shared on facebook as well : :facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/84131408337?pwd=ZUp6eWg5WGdYVVY1ZkdzQ3ZzRnhoQT09

Meeting ID: 841 3140 8337
Passcode: 692956

Organised by :

NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh

——–

संधान व्याख्यानमाला – पांचवा वक्तव्य

विषय : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति , जनमानस और हिंदी बुद्धिजीवी 

वक्ता : अग्रणी लेखक एवं आलोचक वीरेंद्र यादव 

शनिवार, 14 मई , शाम 6 बजे 

सारांश :

1- ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ मात्र एक राजनीतिक व्यूहरचना न होकर एक ऐसी अवधारणा है जिसकी गहरी जड़े पारम्परिक रूप से  हिंदू जनमानस में  मौजूद हैं।
2- 1857 से लेकर 1947 तक विस्तृत ‘स्वाधीनता’ विमर्श में इस हिन्दू मन की शिनाख्त की जा सकती है।
3- स्वाधीनता आंदोलन इस हिन्दू मन से मुठभेड़ की नीति न अपनाकर मौन सहकार की व्यावहारिकता की राह पर ही चला।
4- हिंदी क्षेत्र में तर्क, ज्ञान  व  वैज्ञानिक चिंतन की धारा भारतीय समाज की वास्तविकताओं में कम अवस्थित थीं, उनकी प्रेरणा के मूल में पश्चिमी आधुनिकता व वैश्विक प्रेरणा अधिक थी।
5- हिंदी क्षेत्र व समाज में ज़मीनी स्तर व हाशिये के समाज के बीच से जो तार्किक, अंधविश्वास विरोधी व विज्ञान सम्मत सुधारवादी प्रयास हुए उन्हें मुख्यधारा के चिंतन-विचार में शामिल नहीं किया गया।
6- ध्यान देने की बात है कथित ‘हिंदी नवजागरण’ विभेदकारी वर्ण-जातिगत सामाजिक संरचना की अनदेखी कर प्रभुत्ववादी मुहावरे में ही विमर्शकारी रहा।
7- संविधान सम्मत धर्मनिरपेक्ष आधुनिक भारत की परियोजना में    भारतीय समाज की धर्म व जाति की दरारों के जड़मूल से उच्छेदन को प्रभावी ढंग से शामिल नहीं किया जा सका।
8-सारी आधुनिकता के बावजूद हिंदी बुद्धिजीवियों का वृहत्तर संवर्ग वर्ण और वर्ग से मुक्त होकर   जनबुद्धिजीवी की भूमिका न अपना सका।
9- सामाजिक न्याय की अवधारणा का मन में स्वीकार भाव न होना, हिंदी बुद्धिजीवी की एक बड़ी बाधा है।
10- ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रतिविमर्श रचने के हिंदी बुद्धिजीवी के उपकरण वही रहे जो हिंदू बुद्धिजीवियों के।
11- हिंदी बुद्धिजीवी के सवर्णवादी अवचेतन से उपजा दुचित्तापन ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रतिविमर्श रचने में एक बड़ी बाधा है।

आयोजक : न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव NSI  ( हिंदी प्रदेश)

‘पृथ्वी के असंख्य घाव’  गिनता अकेला आदमी

Image courtesy -https://www.inc.com/


…..यह हमारी सोच की एक अनपहचानी सीमा है
नहीं समझते हम
कि अकेला आदमी जब सचमुच अकेला होता है
तो वह गिन रहा होता है
पृथ्वी के असंख्य घाव
और उनके विरेचन के लिए
कोई अभूतपूर्व लेप तैयार कर रहा होता है।
(अकेला आदमी – विमलेश त्रिपाठी)

कालजयी रचनाएं समय स्थान की सीमाओं को लांघ कर किस तरह आप को अपनी लगने लगती हैं, इसको बयां करना मुश्किल है।

हान्स क्रिश्चन एंडरसन (2 अप्रैल 1805- 4 अगस्त 1875) महान डैनिश लेखक – जिन्होंने नाटकों, यात्रा वृत्तांतों , उपन्यासों और कविताओं के रूप में प्रचुर लेखन किया – अपनी परिकथाओं के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। उनकी परिकथाएं नौ खंडों में प्रकाशित हुई हैं और दुनिया की 125 जुबां में अनूदित भी हुई हैं।

उनकी एक ऐसी अदभुत रचना है ‘राजा के नए कपड़े’ – जिसे हम ‘निर्वस्त्र राजा’ के तौर पर अधिक जानते हैं।

जब जब किसी मुल्क में अधिनायकवाद की हवाएं चलने लगती हैं, और लोगों पर अधिनायक की अजेयता का जादू सर चढ़ कर बोलने लगता है और उसके खिलाफ बोलना भी कुफ्र में शुमार किया जाने लगता है, यह कहानी नए सिरेसे मौजूं हो जाती है।

विशाल जुलूस में निर्वस्त्र निकल पड़ा राजा, जो कथित तौर पर जादूई वस्त्र पहना है – जिन्हें देख कर अधिकतर लोग खूप गुणगान किए जा रहे हैं – और उसकी सच्चाई को बतानेवाले उस नन्हे बच्चे का रूपक आज भी मन को मोहित करता रहता है।

एक संवेदनशील, न्यायप्रिय व्यक्ति को अन्दर ही अन्दर ताकत देता रहता है।

ऐसी ही एक अन्य रचना है ‘Enemy of the People ’ (जनता का दुश्मन,1882 ) जिस नाटक की रचना नॉर्वे के महान नाटककार हेनरिक इब्सेन (20 मार्च 1928 –  23 मई 1906 )ने की थी। बताया जाता है कि शेक्सपीयर के बाद दुनिया भर में इन्हीं के नाटक आज भी खेले जाते हैं। नाटक का प्रमुख सन्देश यही है कि एक व्यक्ति, जो अकेला खड़ा रहता है, वह जनता की भीड़ से अधिक ‘‘सही’’ होता है। अपने दौर की उस धारणा को कि समुदाय/समाज बहुत महान संस्था है और जिस पर भरोसा किया जाना चाहिए उसी को वह चुनौती देता है।

(Read the complete article here)

How Did UP Decide : Identities, Interests and Politics – Prof Zoya Hasan

Prof Zoya Hasan, Professor Emerita, Jawaharlal Nehru University and Distinguished Faculty, Council for Social Development, New Delhi, will be delivering a Special lecture  in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative, at 6 PM, (IST) Sunday, 24 th April, 2022.

She will be speaking on ‘‘How did UP Decide: Identities, Interests and Politics”

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/81240964790?pwd=OEd1OU00ejA5d1ZxYWlMRzFaOGNkdz09

Meeting ID: 812 4096 4790
Passcode: 975399

Facebook Live on – http://fb.com/newsocialistinitiative.nsi

Abstract

How did UP Decide: Identities, Interests and Politics

Uttar Pradesh has just seen an intensely contested assembly election which resulted in a second straight victory for the Bharatiya Janata Party in this politically crucial state. This momentous outcome is the subject of intense debate among analysts and indeed the public at large. There was a premise this time, particularly in UP, that communal polarisation wasn’t working because of acute economic discontent which could trigger electoral change. However, the large-scale discontent over many economic issues, including jobs, did not translate into a decision to vote out the government. Many analysts have attributed BJP’s reelection to welfare measures and free rations to the poor during the lockdown. This cannot explain BJP’s persistent success which extends beyond this election. The welfarist argument ignores the compelling logic of long term communalism and the systematic construction of the Hindu vote in UP politics since the time of the Ramjanmabhoomi movement centered in UP and the communal campaigns in the last five years, its impact is reflected in the election results.This construction of the Hindu vote also trumped the caste-based politics of the regional Samajwadi Party and Bahujan Samaj Party through a mobilization of upper caste and  non-dominant backward and lower caste communities. Communal polarization and identity politics is the keystone of their strategy and the decisive factor driving electoral choices. 

Silence of the Powerful

Why the Corporate Czars are Silent over increasing attacks on Social Fabric and rising Communalism 

Celebrity actors and players share an interesting commonality in this part of South Asia.

Their moral compass normally veers towards the ‘righteousness’ of the rich, powerful and the influential.

Lynching of innocent people on the streets for their faith, social and governmental hounding of lovers belonging to different communities, call for genocide of religious minorities from public forums and similar hate filled acts, nothing normally impinges on their conscience.

Corporate elites are qualitatively no different.

Occasionally, there are feeble voices of disagreements also.

What Kiran Mazumdar Shaw – founder of India’s largest biopharmaceutical company Biocon – did was exactly this only. She expressed her indignation about growing religious divide in the country and underlined how it would be detrimental to India’s global leadership in ITBT ( Information Technology and Bio Technology)

Definitely her statement which was couched in ‘economic terms’ was very mild, but it did not stop attacks by right-wing trolls.

( Read the full article here)

Challenges to India’s Democracy : Prof Zoya Hasan

Prof Zoya Hasan, Professor Emerita, Jawaharlal Nehru University and Distinguished Faculty, Council for Social Development, New Delhi, will be delivering the 16 th lecture  in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative, at 6 PM, (IST) Sunday, 27 th March, 2022.

She will be speaking on ‘Challenges to India’s Democracy

Prof Zoya Hasan has written and edited many books on state, political parties, ethnicity, gender and minorities in India and society in north India and has been a visiting Professor to the Universities of Zurich, Edinburgh and Maison des Sciences de L’Homme, Paris.

Her most recent publications include Forging Identities : Gender, Communities And The State In India ( edited) ,  Agitation to Legislation – Negotiating Equity and Justice in India ,   Congress after Indira: Policy, Power and Political Change (1984–2009), Politics of Inclusion: Castes, Minorities and Affirmative Action, (2009) and a collection of essays titled Democracy and the Crisis of Inequality

Abstract

Challenges to India’s Democracy

The 75th anniversary of Indian Independence is a landmark event in the history of our democracy. It is for this reason a significant moment to assess the state of India’s democracy. As the largest democracy in the non-western world, India is a success story. Its success, however, has primarily been recognized as an electoral democracy, with regular free and fair elections registering high voter participation, and also peaceful transfer of power. Elections certainly are a climactic moment of the democratic process but by no means the only important one. Politics between elections is central for understanding the challenges facing Indian democracy, and it is important, therefore, to contextualize democracy.

Three years since the Bhartiya Janata Party government was re-elected has seen the consolidation of the process begun in 2014 – the establishment of a Hindu state. This process has been facilitated by the combination of majoritarianism and authoritarianism which has resulted in democracy becoming thinner, not accidentally, but deliberately. This does raise certain questions about the relationship between Hindu nationalism and democracy which seems to weaken the idea of democracy moderated by institutions. 

This paper tries to make sense of these shifts through a thematic exploration of the trajectory of Indian democracy since 2014 focusing on three overlapping developments -the consolidation of a majoritarian brand of politics, the decline of independent institutions and the shrinking space for political dissent and protests -which has undermined democracy. Each of these issues distinct and significant in its own right when taken together constitutes a major risk to Indian democracy. However, public protests in the last few years have emerged as a major bulwark against authoritarian rule and the erosion of democratic dissent. For the Opposition it’s a moment of reckoning but there are signs of churning among the Opposition as well.

Axing Scholarships, Denying Opportunities

When Government itself Does Not Have Any Qualms in rationalising Drona Mindset

( Photo Courtesy : Feminism in India)

[H]istory has come to a stage when the moral man, the complete man, is more and more giving way, almost without knowing it, to make room for the . . .commercial man, the man of limited purpose. This process, aided by the wonderful progress in science, is assuming gigantic proportion and power, causing the upset of man’s moral balance, obscuring his human side under the shadow of soul-less organization.

—Rabindranath Tagore, Nationalism, 1917

( Quoted in ‘Not for Profit – Why Democracy Needs Humanities, Martha Nussbaum, Princeton University Press, 2010)

A single story is sometimes enough to tell how an institution functions and how it needs to be overhauled.

Aruna’s long struggle to get overseas scholarship is one such story.

Son of landless agricultural labourers from Orissa, this bright student, belonging to a socially oppressed community, had applied to get a overseas scholarship via the National Overseas Scholarship – which awards scholarships to students from SC, ST, Denotified tribes etc – and even had lost two years in bureaucratic wrangling despite the fact that he had already got admission into Essex University.

Thanks to the timely intervention of a group of Ambedkarite thinkers from Nagpur, who filed a petition in the Delhi Highcourt on his behalf , which ultimately ruled in the student’s favour.

It would be cliche to say that Aruna’s struggle is an exception.

Story of Vishal Kharat is qualitatively no different who is still trying to get a scholarship for the last two years and has discovered to his dismay that the scholarship portal itself does not work properly.

Instances galore how this ambitious scheme which was launched in the wee hours of India’s independence when Nehru was the Prime Minister and a great scholar and freedom fighter Maulana Abul Kalam Azad was a Cabinet Minister for education, has been left to go slowly into oblivion.

The latest decision by the Union ministry of social justice and empowerment, to not to fund scholarships for marginalised students keen to study India’s history, culture abroad, is just another indication of how it is being implemented.

We can recall that it was the year 2012 when UPA government led by Congress was in the saddle this scheme was extended to Humanities as well and every year 100 students from the socially deprived, oppressed communities started receiving it but with the change of power at the centre things started changing drastically

Like many of its earlier decisions, this decision to axe scholarship to study humanities abroad was taken without consulting the stakeholders involved in the process or without even giving a hint of how the government wants to proceed in this unique empowerment initiative. The fact that the final date to apply for this scheme is to expire on 31 st March and when there was hardly anytime left to young scholars who are keen to study abroad, to search for alternate path to fulfill their dreams.

The rationale being provided by the powers that be appears unconvincing.  

It talks of utilising rich availability of repositories, records as well as books available in Indian institutions and various experts on this subject of India’s culture, civilisation etc and divert the resources thus saved to study other subjects like Science, technology.

It is rather difficult to believe this claim but even if for the sake of discussion we concede, can it be said with certainty that the existing faculty and these institutions would be sensitive to the issue or the concerns of emerging talents from the oppressed, exploited sections of our society, and would be accommodating as well! Fact is that even Higher Educational Institutions are not free from exclusions, discrimination  on the basis of caste, gender, community and despite constitutional provisions for affirmative action existing since decades, the character of the academia in most of these institutions is very much exclusive mainly dominated by the so called upper castes.

Cases of discrimination faced by students from such Institutions keep piling up leading even to many unfortunate incidents – rightly called as ‘institutional murders’ of many such talents.

The stories of suicides of  the likes of of RohithVemula, ( HCU, Hyderabad) ; Payal Tadvi ( Medical College, Mumbai,) or Fathima Latheef ( IIT Madras) and many of their ilk cannot be seen as exceptions.

A related point is the status of academic freedom in India.

With the ascendance of right-wing politics world over the very idea of academic freedom has come under attack globally – including India

Thanks to the majoritarian turn in the Indian politics where religious minorities are being further marginalised and invisibilised – the ambience which exists here within the academia itself is a pale shadow of its earlier situation. It is becoming increasingly difficult nay impossible to have a critical, open minded discussion on themes, topics which are found not palatable to the ruling dispensation which is a prerequisite for any healthy educational institution.

We have before us cancellation of international seminars on innocuous themes even like Scientific Temper or teachers being hauled to courts after taking up discussions about ‘Kashmir within the class ‘ or for engaging in open ended discussion about nationalism inside class or students-teachers being charged with sedition for protesting about highhandedness of the government.

Secondly, with the rightwing holding reins of power with a brutal majority, has also led to radical changes in the content of humanity studies playing mythology over facts e.g. there are allegations how the draft history syllabus pushed by the UGC presents a theory of the origin of caste system which relates to the advent of the ‘Muslim rule’ here.

Can we ever accept that these bright students opting for scholarships abroad who have themselves experienced caste, community or class based deprivation, discrimination in their younger days, would be ever ready to easily gulp down such trash as intellectual discourse.

Definitely not.

This decision to axe funds to socially oppressed sections to study humanity abroad very much gels with the overt concerns of the people in power which are evident in the New Education Policy 2020 which envisions restoring the the role of India as a ‘Vishwa Guru’ and interestingly remains silent on caste and other discriminations and even does not talk about reservations. It clubs SC / ST, OBC and minority communities as an acronym SEDGs – Socially and Economically Disadvantaged Groups.

What needs to be underlined that this step by the Ministry has raised concerns among the members of the international academic community, and scholars of India spread all over the world as well  and in an open letter addressed to the Ministry of Social Justice and Empowerment they have demanded that the government withdraws this immediate changes in the policy.

It emphasises how ‘[t]he argument that one need not go abroad to study India is intellectually flawed and will only serve to isolate Indian scholarship from the rest of the world.’ and these amendments attest to a lack of understanding of how interdisciplinary research is conducted today, where natural sciences, law, history, sociology and the humanities work together beyond national boundaries.

Another important point which it make that how it will further negatively impact women recipients of this scholarship who are already ‘disproportionately under-represented in scientific and technological disciplines and tend to more easily find opportunities in the Social Sciences and Humanities’

Last but not the least it also displays the great hiatus between the outwardly, strong image of the ruling dispensation and how paranoid, insecure it is about deeper fault lines of the Indian society.

Perhaps it worries that with increasing interest of the academia of the west in what is happening to the largest democracy in the world, and the study of caste and its attendant asymmetries receiving special attention by them, and also dalit activists, scholars there pursuing it at various levels there, these exclusivist hierarchies have rapidly attracted attention. Not some time ago the California State University system added caste to its non-discrimination policy, prohibiting caste-based discrimination or bias across its 23 campuses.

The ruling dispensation knows very well that the more students from dalit, adivasi and other deprived sections of society go out to study abroad, it will have to be ready to face many such embarassing moments because whereas it itself is keen to invisibilise caste once for all, and even clubbed all these sections – the SC / ST, OBC and minority communities as an acronym SEDGs – Socially and Economically Disadvantaged Groups; the reality as it exists would continue to haunt it.

 Secularism, Communalism and Indian Politics Today : Professor Achin Vanaik

The 15 th lecture in the Democracy Dialogues Series will be delivered by Prof Achin Vanaik on Sunday, 27 th February at 6 PM (IST) 

He will be speaking on 

Secularism, Communalism and Indian Politics Today‘ 

Speaker 

Writer and Social Activist, Former Professor of Political Science at Delhi University Prof Achin Vanaik is a fellow of the Transnational Institute

He is author of numerous books including The Furies of Indian Communalism ( 1997) , The Painful Transition : Bourgeois Democracy in India ( 1990) , Hindutva Rising – Secular Claims, Communal Realities (2017), “Nationalist Dangers, Secular Failings:A Compass for an Indian Left”

Summary  : 

The presentation will start with a series of definitions of crucial concepts such as secular, secularization, secularism as well as distinguishing between religious fundamentalism, religious nationalism and communalism. This is important to get a handle on how the widespread Indian understanding of secularism as an ancient form of ‘tolerance’ is dangerously mistaken. Of course the rise of the political right and far-right is a global phenomenon in the last few decades giving rise to different forms of what can be called the ‘politics of cultural exclusivism’. So the first principle of explanation for this rise has also to be transnational. After this the question of the rise of the Sangh/BJP in the wider context of developments in India over time will be taken up. It is obvious that the Sangh/BJP is seeking to expand its existing power and influence i.e., to establish and expand its hegemony and this must be understood as well as what are the projects central to its efforts to establish a Hindu Rashtra or Nation. It should be obvious that its particular conception of how to secure a strong Indian nation/nationalism must be exposed and combated. The presentation will end with recognising that this is a long term struggle and how we must go about it.

New Socialist Initiative 

हिंदी साहित्य और स्त्रीवादी चिंतन का नया आलोक : प्रोफेसर  सविता सिंह

The third lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala’ series  – initiated by New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh) will be delivered by Prof Savita Singh, leading poetess, feminist scholar and writer on Saturday 19 th February 2022, at 6 PM (IST). She will be speaking on ‘Hindi Literature and New Light of Feminist Thought   (हिंदी साहित्य और स्त्रीवादी चिंतन का नया आलोक’ )

The focus of this lecture series – as you might be aware – is on the Hindi belt, especially, on literature, culture, society and politics of the Hindi region where we intend to invite writers, scholars with a forward looking, progressive viewpoint to share their concerns.

You are cordially invited to attend and participate in the ensuing discussion.

This online lecture would be held on zoom and will also be shared on facebook as well : :facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

 Zoom Link

https://us02web.zoom.us/j/89853669536?pwd=OTVkZUNKejhNem5hODE5ZEsveGZTQT09

Meeting ID : 898 5366 9536
Passcode  : 825447

 New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh)

संधान व्याख्यानमाला – तीसरा वक्तव्य

वक्ता: प्रोफ़ेसर सविता सिंह
प्रसिद्ध कवयित्री, नारीवादी सिद्धांतकार और लेखिका

विषय: ‘हिंदी साहित्य और स्त्रीवादी चिंतन का नया आलोक’

19 फरवरी शाम 6बजे

सारांश
स्त्रीवाद को लेकर हिंदी साहित्य में आजकल बहुत सारी बातें हो रही हैं। वे अपनी अंतर्वस्तु में नई भी हैं और पुरानी भी। यह भी कह सकते हैं की पितृसत्ता ने अपने भी स्त्रीवादी विमर्श तैयार किए हैं स्त्रियों के लिए। जब स्त्रियां इसे अपना लेती हैं, अपना कह कर इसे किसी वसन की तरह पहन लेती हैं  तो जरूरी हो जाता है इनपर गहनता और गहराई से बात करना। वह एक बात थी जब स्त्री लेखिकाओं ने अपने को स्त्रीवादी होने या कहे जाने से परहेज किया, और यह दूसरी जब स्त्रीवाद के अनेक रूप गढ़े गए। भारतीय परिवेश में स्त्री विमर्श के भीतर बहुलता और भिन्नता तो होनी ही थी। इसी विषय पर हम क्यों न इसपर बात करें। क्या हिंदी में स्त्रीवादी लेखन कोई नया समाज बनाने के संकल्प से लिखा जा रहा है या फिर अभी भी पितृसत्ता का सह उत्पादन ही हो रहा है, यह हमारे लिए चिंता और बहस का मुद्दा बनना ही चाहिए।

Electoral Politics and the Left

Guest Post by Dr Ravi Sinha

(Opening remarks in an ongoing discussion within New Socialist Initiative (NSI) on Left’s approach to Electoral Politics in Contemporary India)

The Speaker :

Ravi Sinha is an activist-scholar who has been associated with progressive movements for nearly four decades. Trained as a theoretical physicist, Dr. Ravi has a doctoral degree from MIT, Cambridge, USA. He worked as a physicist at University of Maryland, College Park, USA, at Physical Research Laboratory, Ahmedabad and at Gujarat University, Ahmedabad before resigning from the job to devote himself full time to organizing and theorizing. He is the principal author of the book, Globalization of Capital, published in 1997, co-founder of the Hindi journal, Sandhan, and one of the founders and a leading member of New Socialist Initiative.

Doctored History : From Ancient Times till Today – Prof Irfan Habib

The 14 th Lecture in the Democracy Dialogues Series  organised by New Socialist Initiative was delivered by Prof Irfan Habib, Famous Historian, Public Intellectual and Marxist Thinker, on Sunday  30 th January 2022 at 6 PM (IST).
Prof Habib spoke on ‘Doctored History : From Ancient Times till Today’


About the Speaker :

Prof Irfan Habib ( Professor of History at the Aligarh Muslim University, Retd) is a well-known historian and author of the The Agrarian System of Mughal India ( 1963), An Atlas of the Mughal Empire ( 1982), Essays in Indian History : Towards a Marxist Perception ( 1985) , The Economic History of Medieval India : A Survey ( 2001) ,  Medieval India : The Study of a Civilisation ( 2008), a multivolume study titled ‘People’s History of India’ etc and has edited many books

The lecture was live on facebook.com/newsocialistinitiative.nsi.

Please write to us at democracydialogues@gmail.com if you are interested in getting updates about coming lectures.

– New Socialist Initiative

p.s. Here is a playlist of  lectures in the series :

 : https://www.youtube.com/playlist?list=PLtXBfoS5KZ78UFI_aYzROjUss8ZzhUKxy.

Why Hindutva Loves to hate Ashoka the Great

Ashokan lions adorn Indian currency and the Dharmachakra features in the tricolour. Neither symbol has any sanctity for the ideologues of the ruling dispensation.

ashoka

Thousands of kings and emperors shone for a brief moment in history, then quickly disappeared. But in ‘The Outline of History: The Whole Story of Man’, H.G. Wells writes, “Ashoka shines and shines brightly like a bright star, even unto this day.” The famous British historian EH Carr also wrote, “What is history? It is a continuous process of interaction between the historian and his facts, an unending dialogue between the present and the past.”

Yet, history is a continuous ‘us versus them’ for some individuals and outfits in India. Their interaction with the past typically degenerates into a vicious monologue aimed to vitiate the present and control the future. Nowhere is their vandalism of history more visible than what the Hindutva brigade is doing to the last great Mauryan ruler, Ashoka (304-232 BCE). Often compared with a medieval Mughal ruler—whom the Hindutvadis detest and distort in equal measure—they are now transforming the Ashokan period beyond recognition into a symbol of cruelty and bigotry.

Ashoka is widely known to have filled with remorse after the tremendous bloodshed in the battle of Kalinga. After that, he is known to have devoted his life to “conquest by Dhamma or right/moral life”. It is less known that Ashoka was among the earliest rulers to launch public utilities such as hospitals, encouraged tree-plantation, dug public wells and ordered the construction of rest houses along roads. His commitment to public reason is considered phenomenal, as he, two hundred years before Christ, organised the earliest open general meetings in the world.

( Read the full article here)

हिंदी की मार्क्सवादी बहसें – ‘विचारधारा’ से विचारधारा तक :संजीव कुमार

The second lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala’ series  – initiated by New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh) will be delivered by Sanjeev Kumar, Well known Critic and Deputy General Secretary of Janwadi Lekhak Sangh  on Saturday 15 th January 2022 at 6 PM (IST). He will be speaking on हिंदी की मार्क्सवादी बहसें : ‘विचारधारा’ से विचारधारा तक ( Hindi ke Marxwadi Bahasein : ‘Vichardhara’ se Vichardhara tak)
The focus of this lecture series – as you might be aware – is on  the Hindi belt, especially, on literature, culture, society and politics of the Hindi region where we intend to invite writers, scholars with a forward looking, progressive viewpoint to share their concerns. The inaugural lecture in the series was delivered by poet and thinker Ashok Vajpayi, where he spoke on ‘Thought and Literature”

सन्धान व्याख्यानमाला
दूसरा वक्तव्य
हिंदी की मार्क्सवादी बहसें : ‘विचारधारा’ से विचारधारा तक
वक्ता : श्री संजीव कुमार
आलोचक संयुक्त महासचिव, जनवादी लेखक संघ
15 जनवरी , शनिवार शाम 6 बजे

सारांश

क्या वजह है कि हिंदी में पिछली सदी के 40 और 50 के दशक में प्रगतिशीलों के बीच जितने मुद्दों पर मतभेद उभरे, उनमें वही मत संख्याबल से विजयी रहा (और कमोबेश अभी तक है) जो हिंदी लोकवृत्त की स्थापित मान्यताओं के प्रति पूरी तरह से अनालोचनात्मक था? क्या यह एक परिवर्तनकामी वैचारिकी का परचम लहरानेवालों के भीतर वर्चस्व की प्रदत्त व्यवस्था का पोषण करनेवाली विचारधारा की सुप्त मौजूदगी थी जो भक्ति आंदोलन की विभिन्न धाराओं के रिश्ते, कथित हिंदी नवजागरण में भारतेन्दु और उनके मंडल के योगदान, हिंदी-उर्दू और उनके इलाक़े की सभी भाषाओं के आपसी संबंध, साहित्य में यौन-नैतिकता जैसे तमाम मसायल पर सभी असहज करनेवालों सवालों को हाशिये पर धकेल रही थी? क्या प्रगतिशील और मार्क्सवादी होने में अपने ‘संस्कारों’ के साथ एक तकलीफ़देह लड़ाई लड़ने और उपलब्ध सहूलियतों-रियायतों का त्याग करने की जो अपेक्षा निहित होती है, यह उससे पल्ला छुड़ाना था? या कि यह प्रगतिशील आंदोलन को वर्चस्वशाली बनाने के लिए सबको अपने साथ ले चलने की एक कार्यनीतिक पहल थी जो कि शायद सफल भी रही?

एक आत्मावलोकन से शुरुआत करनेवाला यह पर्चा इन प्रश्नों की दिशा में एक प्रस्थान है।  

आयोजक 
न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव ( हिंदी प्रदेश)

Jnanpith Award to Damodar Mauzo and Right-Wing Extremism

jananpith

The literary award must generate wider discussion in society on what plagues us. After all, the writer has always been outspoken against extremism.

This year’s Jnanpith Award for best literature has gone to Damodar Mauzo, the famous Konkani novelist and short story writer. The great Assamese poetic talent, Nilmani Phookan Jr, has also been awarded the Jnanpith for 2020. Hopefully, as we celebrate “their outstanding contribution towards literature,” our discussions will not remain confined to the literary domain.

In his acclaimed novel, ‘Karmelin’ (1980), Mauzo writes about the abuse of women who go to work as housemaids in the Middle East. This novel came long before everybody started talking about this issue. His story, ‘The Burger’, is about two school friends, Irene and Sharmila, and the guilt little Irene experiences over ‘polluting’ Sharmila with a beef burger. Another story describes how cow vigilantes intimidated a Dalit youth long before others talked about the phenomenon.

Maybe Mauzo could see beyond the immediate and obvious, which prompted his social and political actions on issues of concern to all of society. That social engagement allowed him to observe the dangers that lurked in our society in the form of the right-wing, and gave him courage to never shy away from boldly speaking out against them.

( Read the full story here)

Voices of Dissent in Pre-Modern and Present Times : Prof Romila Thapar

The13 th Lecture in the Democracy Dialogues Series  organised by New Socialist Initiative will be delivered by Prof Romila Thapar, Professor of Ancient History, Emerita, JNU, author of many books and a leading public intellectual on Sunday 19 th December 2021 at 6 PM (IST).
Prof Thapar would be speaking on  ‘Voices of Dissent in Pre-Modern and Present Times

About the Speaker :

Internationally renowned scholar of Ancient History, Prof Thapar was elected General President of the Indian History Congress in 1983 and a Fellow of the British Academy in 1999. In 2008, she was awarded the prestigious Kluge Prize of the US Library of Congress which complements the Nobel, in honouring lifetime achievement in disciplines not covered by the latter.  

Prof Thapar has been a visiting professor at Cornell University, the University of Pennysylvania, and the College de France  in Paris and holds honorary doctorates from the University of Chicago, the Institut National des Langues et Civilisations Orientales in Paris, the University of Oxford, the University of  Edinburgh (2004), the University of Calcutta and from the University of Hyderabad.


 Here is a select list of Prof Thapar’s publications


Ashoka and the Decline of the Mauryas, 1961 ( Oxford University Press) ; A History of India : Volume 1, 1966 ( Penguin) ; The Past and Prejudice, NBT ( 1975) ; Ancient Indian Social History : Some Interpretations, 1978 ( Orient Blackswan) ; From Lineages to State 1985 : Social Formations of the Mid-First Millenium B.C. in the Ganges Valley, 1985  ( Oxford University Press) ; Interpreting Early India, 1992 ( Oxford University Press) ; Sakuntala : Text, Reading, Historie, 2002 ( Anthem) . Somanatha : The Many Voices of History, Verso ( 2005)  ; The Aryan : Recasting Constructs, Three Essays ( 2008) ; The Past As Present: Forging Contemporary Identities Through History, 2014

The lecture will be live on facebook.com/newsocialistinitiative.nsi.

For security reasons the zoom invite will be shared individually. Please write to us at democracydialogues@gmail.com if you are interested in attending the lecture

p.s. Here is a playlist of  lectures in the series :

 : https://www.youtube.com/playlist?list=PLtXBfoS5KZ78UFI_aYzROjUss8ZzhUKxy.

वैष्णवजन की खोज में : अपूर्वानंद

न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव की तरफ से आयोजित ‘डेमोक्रेसी डायलॉग्स सीरीज ‘  का 12 वां व्याख्यान अग्रणी लेखक, स्तम्भकार, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग से सम्बद्ध  प्रोफेसर अपूर्वानंद 6 बजे शाम, रविवार, 28 नवम्बर 2021 को प्रस्तुत करेंगे। 

विषय : ‘वैष्णवजन की खोज में’ 


वैष्णवजन  की  कल्पना को राजनीतिक और सामाजिक पटल पर स्थापित करने का श्रेय गाँधी को है। इस बात पर  ध्यान जाना चाहिए  कि उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन में या राष्ट्र की स्वतंत्रता  के संघर्ष में गाँधी ने  वैष्णवजन को संभवतः इस आंदोलन के लिए  आदर्श आंदोलनकारी के रूप में पेश किया। वह कैसा जन है? पीर और पराई , इन दोनों से उसका रिश्ता क्या होगा? और क्यों  एक सच्चा जनतांत्रिक जन वैष्णवजन ही हो सकता है? हमारे संविधान की प्रस्तावना में हम भारत के लोग जिस यात्रा पर निकले हैं क्या वह इस  वैष्णवजनत्व की तलाश की यात्रा है?”

हिंदी तथा अंग्रेजी  अख़बारों तथा अन्य प्रकाशनों में  तथा  टीवी की चर्चाओं में अपनी निरंतर सशक्त उपस्थिति दर्ज करते रहने वाले प्रोफेसर अपूर्वानंद सार्वजनिक जीवन में न्याय, समता  और तार्किकता के पक्ष में अपने सक्रिय हस्तक्षेप के लिए जाने जाते हैं .

आप ने कई किताबें भी लिखी  हैं, जिनमें से कुछ के शीर्षक इस प्रकार हैं : ‘सुंदर का स्वप्न ‘ ( वाणी प्रकाशन, 2001 ) , ‘साहित्य का एकांत’ ( वाणी प्रकाशन , 2008 ), The Idea of University ( Context, 2018 ) , Education at the Crossroads ( Niyogi Books, 2018 )

व्याख्यान फेसबुक पर live होगा  : facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

अगर आप zoom पर जुड़ना चाहते हैं तो हमें democracydialogues@gmail.com पर लिखें 

साहित्य का विचार : अशोक वाजपेयी

May be an image of one or more people and text that says 'सुन्धान व्याख्यानमाला पहला वक्तव्य विषय: साहित्य का विचार वक्ता: श्री अशोक वाजपेयी वरिष्ठ कवि, अग्रणी विचारक 6 बजे शाम शनिवार 13 नवंबर 2021 ZOOM ID: 841 7299 8046 PASSCODE: 885810 फेसबुक लाइव: FACEBOOK.COM/NEWSOCIALISITIATIVE. NSI आयोजक न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (हिंदी प्रदेश)'

अभिवादन

हिन्दी इलाके को लेकर विचार-विमर्श के लिये “सन्धान व्याख्यानमाला” की शुरुआत इस शनिवार, 13 नवम्बर, को शाम 6 बजे प्रख्यात कवि और विचारक श्री अशोक वाजपेयी के व्याख्यान से हो रही है.

इस व्याख्यानमाला की शुरुआत के पीछे हमारी मंशा ये है कि हिन्दी में विचार, इतिहास, साहित्य, कला, संस्कृति और समाज-सिद्धान्त के गम्भीर विमर्श को बढ़ावा मिले. हिन्दी इलाक़े के सामाजिक-सांस्कृतिक विकास को लेकर हमारी चिन्ता पुरानी है. आज से बीस साल पहले हमारे कुछ अग्रज साथियों ने “सन्धान” नाम की पत्रिका की शुरुआत की थी जो अनेक कारणों से पाँच साल के बाद बन्द हो गयी थी. इधर हम हिंदी-विमर्श का यह सिलसिला फिर से शुरू कर रहे हैं. यह व्याख्यानमाला इस प्रयास का महत्वपूर्ण अंग होगी.

हममें से अधिकांश लोग “न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव” नाम के प्रयास से भी जुड़े हैं. यह प्रयास अपने आप को सामान्य और व्यापक प्रगतिशील परिवार का अंग समझता है, हालाँकि यह किसी पार्टी या संगठन से नहीं जुड़ा है. इसका मानना है कि भारतीय और वैश्विक दोनों ही स्तरों पर वामपन्थी आन्दोलन को युगीन मसलों पर नए सिरे से विचार करने की और उस रौशनी में अपने आप को पुनर्गठित करने की आवश्यकता है. यह आवश्यकता दो बड़ी बातों से पैदा होती है. पहली यह कि पिछली सदी में वामपन्थ की सफलता मुख्यतः पिछड़े समाजों में सामन्ती और औपनिवेशिक शक्तियों के विरुद्ध मिली थी. आधुनिक लोकतान्त्रिक प्रणाली के अधीन चलने वाले पूँजीवाद के विरुद्ध सफल संघर्ष के उदहारण अभी भविष्य के गर्भ में हैं. दूसरी यह कि बीसवीं सदी का समाजवाद, अपनी उपलब्धियों के बावजूद, भविष्य के ऐसे समाजवाद का मॉडल नहीं बन सकता जो समृद्धि, बराबरी, लोकतन्त्र और व्यक्ति की आज़ादी के पैमानों पर अपने को वांछनीय और श्रेष्ठ साबित कर सके.

“सन्धान व्याख्यानमाला” का प्रस्ताव यूँ है कि हिन्दी सभ्यता-संस्कृति-समाज को लेकर हिंदी भाषा में विचार की अलग से आवश्यकता है. हिन्दी में विचार अनिवार्यतः साहित्य से जुड़ा है और हिन्दी मनीषा के निर्माण में साहित्यिक मनीषियों की अग्रणी भूमिका है. हम हिन्दी साहित्य-जगत के प्रचलित विमर्शों-विवादों से थोड़ा अलग हटकर साहित्य के बुनियादी मसलों से शुरुआत करना चाहते हैं. प्रगतिशील बिरादरी का हिस्सा होते हुए भी हम यह नहीं मानते कि साहित्य की भूमिका क्रान्तियों, आन्दोलनों और ऐतिहासिक शक्तियों के चारण मात्र की है. हम यह नहीं मानते कि साहित्यकार की प्रतिबद्धता साहित्य की उत्कृष्टता का एकमात्र पैमाना हो सकता है. हम अधिक बुनियादी सवालों से शुरू करना चाहते हैं, भले ही वे पुराने सुनायी पड़ें. मसलन, साहित्य कहाँ से आता है – ऐसा क्यों है कि मानव सभ्यता के सभी ज्ञात उदाहरणों में साहित्य न केवल पाया जाता है बल्कि ख़ासकर सभ्यताओं के शैशव काल में, और अनिवार्यतः बाद में भी, उन सभ्यताओं के निर्माण और विकास में महती भूमिका निभाता है. साहित्य के लोकमानस में पैठने की प्रक्रियाएँ और कालावधियाँ कैसे निर्धारित होती हैं? क्या शेक्सपियर के इंग्लिश लोकमानस में पैठने की प्रक्रिया वही है जो तुलसीदास के हिन्दी लोकमानस में पैठने की? निराला या मुक्तिबोध के लोकमानस में संश्लेष के रास्ते में क्या बाधाएँ हैं और उसकी क्या कालावधि होगी? इत्यादि. हमारा मानना है कि “जनपक्षधर बनाम कलावादी” तथा अन्य ऐसी बहसें साहित्य के अंतस्तल पर और उसकी युगीन भूमिका पर सम्यक प्रकाश नहीं डाल पातीं हैं. बुनियादी और दार्शनिक प्रश्न संस्कृतियों और सभ्यताओं पर विचार के लिए अनिवार्य हैं.

इस व्याख्यानमाला में हम विचार-वर्णक्रम के विविध आधुनिक एवं प्रगतिशील प्रतिनिधियों को आमन्त्रित करेंगे. ज़रूरी नहीं है कि वक्ताओं के विचार हमारे अपने विचारों से मेल खाते हों. हमारी मंशा गम्भीर विमर्श और बहस-मुबाहिसे की है.

प्रख्यात कवि और विचारक श्री अशोक वाजपेयी इस शृंखला के पहले वक्ता होंगे जिनका मानना है कि साहित्य की अपनी “स्वतन्त्र वैचारिक सत्ता होती है; उस विचार का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता; वह विचार अन्य विचारों से संवाद-द्वन्द्व में रहता है पर साहित्य को किसी बाहर से आये विचार का उपनिवेश बनने का प्रतिरोध करता है; साहित्य का विचार विविक्त नहीं, रागसिक्त विचार होता है.”

आप सभी इस शृंखला में भागीदारी और वैचारिक हस्तक्षेप के लिये आमन्त्रित हैं.

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/84172998046?pwd=dHRzRDhsTFNSOURKQjA3R1o2Y0xsQT09

Meeting ID: 841 7299 8046
Passcode: 885810

facebook live : facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Will India Survive as a Democracy ? : Ashutosh

The 11 th lecture in the Democracy Dialogues Series organised by New Socialist Initiative was delivered by Ashutosh, TV anchor, columnist, author and co-founder of satyahindi.com at 6 PM ( IST), Sunday, 31 st October 2021.

Mr Ashutosh spoke on ‘Will India Survive as a Democracy ?’
A highly acclaimed journalist and TV News Anchor, a reputed Columnist, and a successful Author, Ashutosh was associated with AAP for a while but was soon disenchanted with this experiment and returned to journalism again with a new experiment in the form of satyahindi.com

He has many books to his credit,  Anna – 13 days that awakened India, (2012) ; The Crown prince, The Gladiator & The Hope — Battle for Change ; Mukhaute ka Rajdharm ( 2015). In his latest book Hindu Rashtra published in 2019, he  takes a hard look at the political reality of India and what its future may hold.

The lecture was live on facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Please write to us at democracydialogues@gmail.com if you are interested in attending the coming lectures.