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क्या राम मंदिर की आड़ में अपनी विफलताएं छिपा रही है मोदी सरकार

यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि राम मंदिर के भूमि पूजन के लिए चुना गया यह समय एक छोटी रेखा के बगल में बड़ी रेखा खींचने की क़वायद है, ताकि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की बढ़ती असफलताएं जैसे- कोविड कुप्रबंधन, बदहाल होती अर्थव्यवस्था और गलवान घाटी प्रसंग- इस परदे के पीछे चले जाएं.

Ayodhya: A hoarding of PM Narendra Modi and other leaders put up beside a statue of Lord Hanuman, ahead of the foundation laying ceremony of Ram Temple, in Ayodhya, Thursday, July 30, 2020. (PTI Photo)(PTI30-07-2020 000044B)

अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन से पहले लगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं का एक होर्डिंग. (फोटो: पीटीआई)

बीते दिनों जनाब उद्धव ठाकरे द्वारा अयोध्या में राम मंदिर के प्रस्तावित भूमि पूजन को लेकर जो सुझाव दिया गया है, वह गौरतलब है.

मालूम हो कि आयोजकों की तरफ से जिन लोगों को इसके लिए न्योता दिया गया है, उसमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का नाम भी शामिल है, उसी संदर्भ में उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि ‘ई-भूमि पूजन किया जा सकता है और भूमि पूजन समारोह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये भी अंजाम दिया जा सकता है.’

उनका कहना है कि इस कार्यक्रम में लाखों लोग शामिल होना चाहेंगे और क्या उन्हें वहां पहुंचने से रोका जा सकता है? कोरोना महामारी को लेकर देश-दुनिया भर में जो संघर्ष अभी जारी है और जहां धार्मिक सम्मेलनों पर पाबंदी बनी हुई है, ऐसे में उनकी बात गौरतलब है.

गौर करें कि ऐसा आयोजन जिसका लाइव टेलीकास्ट भी किया जाएगा, कोई चाहे न चाहे देश में जगह जगह जनता के अच्छे-खासे हिस्से को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित करेगा.

और अगर दक्षिणपंथी जमातें इस बारे में अतिसक्रियता दिखा दें तो फिर जगह जगह भीड़ बेकाबू भी हो सकती है और केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय द्वारा जारी गाइडलाइंस की भी धज्जियां उड़ सकती हैं.

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आज़ाद जनतंत्र में सत्तर साल बाद भी वेल्लोर से विरमगाम तक श्मशान भूमि से वंचित हैं दलित

क्या कोई जानता है 21वीं सदी की शुरुआत में चकवारा के दलितों के एक अहम संघर्ष को? जयपुर से बमुश्किल पचास किलोमीटर दूर चकवारा के दलितों ने गांव के सार्वजनिक तालाब पर समान हक पाने के लिए इस संघर्ष को आगे बढ़ाया था। अठारह साल का वक्फा गुजर गया जब दलितों ने इस संघर्ष में जीत हासिल की थी, जिसमें तमाम मानवाधिकार संगठनों एवं प्रगतिशील लोगों ने भी उनका साथ दिया था। (सितम्बर 2002)

विश्लेषकों को याद होगा कि इस संघर्ष में तमाम लोगों को डॉ. अम्बेडकर द्वारा शुरू किए गए ऐतिहासिक महाड़ सत्याग्रह की झलक दिखायी दी थी जब मार्च 1927 में हजारों दलित एवं अन्य मानवाधिकारप्रेमी महाड़ के चवदार तालाब पर जुलूस की शक्ल में गए थे और वहां उन्होंने पानी पीया था। जानवरों को वहां पानी पीने से कोई मना नहीं करता था, मगर दलितों को रोका जाता था। (ज्‍यादा जानकारी के लिए देखें: Mahad – The Making of the First Dalit Revolt – Dr Anand Teltumbde, Navayana)

चकवारा में बाद में क्या हुआ इसके बारे में तो अधिकतर लोग नहीं जानते होंगे।

जब दलितों ने सार्वजनिक तालाब से पानी का उपयोग शुरू किया, ऊंची जाति के लोगों ने रफ्ता-रफ्ता इसके प्रयोग को बन्द किया क्योंकि उनका कहना था कि अब पानी अशुद्ध हो गया है। मामला वहीं तक नहीं रुका। दलितों द्वारा अपने अधिकारों पर की इस दावेदारी से क्षुब्ध और उन्हें और अपमानित करने के लिए सवर्णों ने एक सुनियोजित ढंग से इस तालाब को गांव के सीवर में तब्दील कर दिया। कुछ लोगों ने तो बाकायदा अपने घरों से गंदे पानी की निकासी के लिए नालियां बनवायीं और उनका मुंह तालाब की दिशा में मोड़ दिया।

इसे एक विचित्र संयोग कहा जा सकता है कि एक गांव के तालाब के सीवर में रूपांतरण – जिसे कभी ऊंची जाति के लिए पवित्र कहते थे – की इस घटना की खास किस्म की प्रतिध्वनि लगभग 800 किलोमीटर दूर विरमगाम, जो अहमदाबाद से बमुश्किल 50 किलोमीटर दूर स्थित है, सुनायी दी।

Dalit Adhikar Manch convener Kirit Rathod (second from right) with Viramgam civic body officials at Mukti Dham. Credits: Mahesh Trivedi

 

यहां गांव का एक श्‍मशान – जो दलितों के विशेष इस्तेमाल के लिए बना था, जहां वह मृतकों को गाड़ते थे और जो उनके लिए एक किस्म की पवित्र जगह थी, जहां वह आकर प्रार्थना करते थे – एक बड़े सीवर नाले में तब्दील कर दिया गया। इसे अंजाम देने वाले गांव वाले नहीं थे बल्कि अगल-बगल की नयी-नयी बनी हाउसिंग सोसायटीज़ के अपार्टमेण्ट के निवासी थे, जिनमें से अधिकतर शिक्षित मध्यमवर्गीय परिवारों से सम्बद्ध थे। छह माह का अरसा गुजर गया जबसे वनकर, चमार, रोहित, दंगासिया, शेतवा आदि सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित जातियों के आत्मीयों की मुक्तिधाम में बनी कब्रें/समाधियां गंदे पानी में डूबी हैं। स्थितियां इतनी ख़राब हैं कि जब पिछले दिनों एक दलित बुजुर्ग की मौत हुई, तब उसके रिश्तेदारों को उसकी लाश पांच किलोमीटर दूर बने किसी अन्य श्‍मशान में ले जानी पड़ी।

यह अधिक विचलित करने वाली बात है कि दलितों द्वारा बार-बार की गयी शिकायतों के बावजूद जिला प्रशासन ने इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। शायद उनके लिए मृत्यु के बाद गरिमा का प्रश्न – खासकर वंचित तबकों के लिए – उठता ही नहीं है।

एक मीडियाकर्मी से बात करते हुए दलित आन्दोलन के एक कार्यकर्ता ने बेहद उद्विग्न मन से कहा, ‘उन्हें तब अपमानित किया गया जब वह जिन्दा थे। अब जब वे मर गए हैं तब ऊंची जाति के लोग सचेतन तौर पर हमारे श्‍मशान में गंदे, ठोस एवं तरल पदार्थ डाल रहे हैं।’’ (वही)

अब जबकि मामला सुर्खियों में आया है यह देखना समीचीन होगा कि क्या विजय रूपानी सरकार इस मामले में उचित कार्रवाई करेगी और इस योजना के अमलकर्ताओं के खिलाफ अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 (संशोधित) के प्रावधानों के तहत कार्रवाई करेगी।

इसके पहले कि हम इस गलतफहमी का शिकार हो जाएं, इस बात पर जोर डालना मौजूं होगा कि विरमगाम की घटना कोई अपवाद नहीं है।

गुजरात खुद एक क्लासिकीय केस प्रस्तुत करता है।

वर्ष 2001 की बात है जब नरेश सोलंकी के ढाई साल के भतीजे की मौत हुई। बनासकांठा जिले के पालनपुर ब्लॉक के हुडा ग्राम के पीड़ित परिवार ने उसे समुदाय के श्‍मशान में जाकर दफना दिया। जब तक वह घर पहुंचते, ख़बर आयी कि गांव के पटेल समुदाय के लोगों ने ट्रैक्टर से बाकायदा उस लाश को कब्र से बाहर निकाला है। दरअसल, दबंग पटेल जिन्होंने श्‍मशान के एक हिस्से पर कब्जा किया था वे इस बात से क्षुब्ध थे कि वहां दलितों ने अपनी लाश दफनायी है।

इस घटना के डेढ दशक बाद तक- जब तक इस मामले की रिपोर्ट मिली थी- हुडा गांव के दलित आज भी कलेक्टर तथा गांव पंचायत की तरफ से जमीन के एक टुकड़े के आवंटन के इन्तज़ार में है, जहां वह अपने मृतकों को दफना सकें।

आज से एक दशक से अधिक समय पहले मेल टुडे अख़बार ने फरवरी के पहले सप्ताह में (2009) इस मुददे पर विस्‍तृत स्टोरी की थी। रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया था कि किस तरह दलितों को श्‍मशान की साझा जमीनों को इस्तेमाल करने नहीं दिया जाता और अक्सर उन्हें गांव के पास की किसी गंदी जमीन में अपने मृतकों का अंतिम संस्कार करना पड़ता है। अक्सर ऐसा होता है कि दलित जब इस टुकड़े का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं तो वर्चस्वशाली जातियां इन जमीनों पर कब्जा करती हैं।

गुजरात राज्य ग्राम पंचायत सामाजिक न्याय समिति मंच द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया था कि ‘‘गुजरात के 657 गांवों में से 397 गांवों में दलितों के अंतिम संस्कार के लिए कोई अलग जमीन नहीं है। जिन 260 गांवों में ऐसी जमीन आवंटित की गयी है, 94 गांवों की जमीनों पर वर्चस्वशाली जातियों ने कब्जा किया है और 26 गांवों में वह जमीन नि‍चली सतह पर है इसलिए अक्सर वहां पानी भर जाता है।’’

एक क्षेपक के तौर पर यहां इस बात को जोड़ा जा सकता है कि जब मृतकों को दफनाने का प्रश्न उठता है तब दलितों एवं मुसलमानों के बीच एक विचित्र साझापन दिखता है। वर्चस्वशाली तबकों द्वारा जब उनकी कब्रगाहों पर कब्जा जमाया जाता है तो मुसलमानों एवं दलितों का अनुभव एक जैसा ही होता है। कुछ साल पहले गुजरात उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा था और राज्य सरकार को यह निर्देश देना पड़ा था कि वह पाटन जिले में जहां मुसलमानों के कब्रगाह पर दबंग तबकों द्वारा कब्जा जमाया जा रहा है, वहां पुलिस तैनात करे।

अभी पिछले अगस्त की बात है जब तमिलनाडु के वेल्लोर जिले का वनियामबादी तालुक राष्ट्रीय सुर्खियों में आया जब एक वीडियो वायरल हुआ जहां एक मृतक की लाश को लोग रस्सी से बांधे हुए एक पुल के नीचे पहुंचाते दिख रहे थे। दरअसल 46 वर्ष के दलित व्यक्ति एन. कुप्पम की अंतिम यात्रा को ऊंची जातियों ने रोक दिया था कि वह उनके इलाकों से नहीं जाएगी, जिस वजह से उन्हें उस लाश को पुल से नीचे रस्सी बांध कर पहुंचाना पड़ रहा था।

बमुश्किल तीन माह बाद उसी किस्म की ख़बर कोयम्‍बटूर जिले के विधि गांव से सुनायी दी।

यहां भी एक वीडियो वायरल हुआ जहां दिखाया गया था कि श्‍मशान तक मृतक व्यक्ति को ले जा रहे दलित समुदाय के लोग सीवर के रास्ते या कूडादान के रास्ते आगे बढ़ रहे हैं। पता चला कि उनकी बस्ती से श्‍मशान तक जाता रास्ता ऊंची जातिबहुल इलाकों से गुजरता था और इसी वजह से उन्होंने रास्ता रोक दिया था। गौरतलब है कि इस दिक्कत के बारे में गांव के 1,500 दलित परिवारों ने जिला प्रशासन को बार-बार लिखा है मगर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। महज चार माह पहले सबरंग इंडिया ने इस परिघटना की अखिल भारतीय मौजूदगी पर नज़र डाली थी। रिपोर्ट का शीर्षक था ‘दलित्‍स, ओबीसीज़ फोर्स्‍ड टु बरी देयर डिसीज्ड बाई द रोडसाइड’ अर्थात सड़क किनारे अंतिम संस्कार के लिए मजबूर दलित, ओबीसी।

इसमें रेखांकित किया गया था कि किस तरह ‘जाति आधारित भेदभाव और कार्पोरेट द्वारा जमीनों पर कब्जा करने के चलते ऊंची जाति के लोग समुदाय के मृतकों की गरिमा तक छीन रहे हैं।

प्रस्तुत रिपोर्ट में उद्धृत दो अलग-अलग राज्यों के दो उदाहरणों से हम देख सकते हैं कि किस तरह आज़ादी के सत्तर से अधिक साल बीत जाने के बावजूद, जाति और उससे सम्बद्ध भेदभाव अब भी समूचे उपमहाद्वीप में मिलते हैं।

इस रिपोर्ट में वर्ष 2011 की डीएनए की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि महाराष्ट्र के सामाजिक न्याय मंत्रालय ने खुद बताया था कि ‘दलित श्‍मशानों पर 43,722 गांवों में से 72.13 फीसदी गांवों में कब्जा हो चुका है।’ इसमें इस बात का भी उल्लेख था कि दलितों की एक अंतिम संस्कार यात्रा पर पुरोहित की अगुआई में ऊंची जातियों द्वारा हमला किया गया था और ‘अंततः दलितों को मृतक की लाश को तयशुदा श्‍मशान में दफनाने के बजाय रोड के किनारे दफनाना पड़ा था।’

इस रिपोर्ट में उद्धृत एक और उदाहरण पंजाब से जुड़ा था। इसमें इस बात को रेखांकित किया गया था कि ‘दलित जो राज्य की आबादी का लगभग 30 फीसदी हिस्सा हैं उन्हें राज्य के पश्चिमी हिस्से में झुग्गियों में रहने के लिए मजबूर किया जाता है ताकि उनकी बस्ती से आने वाली हवाएं ऊंची जातियों का छुआछूत न करे। इतना ही नहीं, कि दलितों को मुख्य श्‍मशान में दफनाने से मना करने के साथ ही उन्हें इस बात के लिए भी मजबूर किया जाता है कि उनका अलग गुरुद्वारा बने।’ (वही)

महाराष्ट्र की तरह- जहां 19वीं सदी के मध्य से समाज सुधार आन्दोलन चले हैं- केरल में भी नारायण गुरु, अय्यनकली जैसों की अगुआई में आन्दोलन चले हैं; अलबत्ता विडम्बना यह है कि जब दलितों का सवाल आता है तो आज भी चीजें गुणात्मक तौर पर अलग नहीं हैं।

‘द न्यूजमिनट’ के मुताबिक सानु कुम्मिल नाम के एक पत्रकार ने इस विषय पर एक डाक्युमेण्टरी तैयार की है जिसका नाम है ‘सिक्स फीट अंडर’। सानु ने बताया कि सार्वजनिक श्‍मशानों में स्थान की कमी के चलते लोग अपनी ही जमीनों पर अपने मृतकों को दफनाने के लिए मजबूर हो रहे हैं और जिनके पास अपनी कोई जमीन नहीं है, वे अपने घरों को तोड़ने तथा वहीं अपने आत्मीयों को दफनाने को विवश हैं।

विरमगाम, गुजरात, वनियामबाडी तालुक, कोयम्‍बटूर जिले का विधि‍ गांव, सूबा महाराष्ट्र, पंजाब, केरल … हम इस फेहरिस्त को बढ़ा सकते हैं ताकि यह जाना जाए कि शुद्धता एवं प्रदूषण के तर्क पर टिका समाज किस तरह आज भी विभिन्न तरीकों से उन तबकों को अपमानित करने में मुब्तिला रहता है जिन्हें वह ‘अन्य’ मानता है। यह इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि भारत के गणतंत्र बनने के सत्तर साल बाद तथा जाति, लिंग, नस्ल आदि आधारों पर भेदभाव की समाप्ति के ऐलान के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आया है।

शायद इस मामले में डॉ. अम्बेडकर को पूर्वानुमान था जिन्होंने भारत की जनता के नाम संविधान अर्पित करते हुए कहा था ‘‘हम राजनीतिक जनतंत्र के युग में पहुंच गए हैं – ऐसा युग जहां एक व्यक्ति को एक मत/वोट हासिल है, लेकिन सामाजिक जनतंत्र के दौर में – एक व्यक्ति एक मूल्य – अभी पहुंच नहीं सके हैं।’ इसीलिए शायद उन्होंने एक ऐसे जनतंत्र की कल्पना की थी ‘जो महज सरकार का रूप नहीं होगा। उनके लिए इसके मायने थे मुख्यतः सहजीवन का रूप; मुख्यतः एक सामुदायिक अनुभव का साझापन। सारतः यह अपने ही लोगों के प्रति सम्मान की भावना से जुड़ा होगा।

( First published here)

No End to Humiliation of Dalits Even After Death

The attitude of respect and reverence towards fellow men is yet to develop in India.

No End to Humiliation of Dalits

Does anybody still remember the Dalits of Chakwara, a village around 50km from Jaipur in Rajasthan, who had launched a struggle to gain access to the pond in their village? It is more than 18 years since the Dalits, supported by human rights organisations, won that fight for water. Their undertaking had echoes with the historic struggle launched by Dr BR Ambedkar in March 1927 at Chavdar tank at Mahad to assert the equal rights of Dalits to water. It is well known to most people that while animals were allowed to use the water of this tank in present-day Raigad district of the state, the Dalits were not. Anand Teltumbde has described the events of this satyagraha in his book, Mahad: The Making of the First Dalit Revolt, published by Navayana in 2016.

But what happened at Chakwara after the Dalits started using the village pond is hardly known: the upper castes slowly stopped using the water from the pond once the Dalits gained access to it, saying it had become “impure”. Enraged by the assertion of the Dalits and keen to humiliate them for it, they dug up the village sewer and directed the waste water to their own village pond. There is no change in the status quo there.

Around 700km away, in Viramgam near Ahmedabad in Gujarat, a village cemetery used by Dalits was recently flooded with sewer water, a stark reminder that the gap of two decades has not changed the caste scenario in the country. The executioners of this sinister plan in Viramgam were the residents of two housing societies in which the well-off and educated middle classes live. For more than the last six months, the graves of the socially-disadvantaged Vankar, Chamar, Rohit, Dangasia, Shetwa and other communities have been surrounded by dirty water. The district administration did not intervene on behalf of the Dalits despite their repeated complaints. The fact that dignity after death is being denied to marginalised communities did not seem to rouse the administration.

( Read the full text here)

Rest In Power John Lewis

John Lewis ( 21 February 1940 – 17 July 2020)

Legendary Civil Rights leader John Lewis died on 17 th July 2020.

An analyst wrote ”Lewis, a titan of the civil rights movement, died on Friday at the age of 80, severing a vital link with the generation that rose in the 60s to resist the US’s version of racial apartheid. The news was met with a depth of grief normally reserved for former presidents. Lewis transcended party politics and was truly admired and beloved.”

A state trooper beats John Lewis with a club

A state trooper beats John Lewis (kneeling, right) with a club in Selma, Alabama, in 1965. Lewis sustained a fractured skull in the assault. Photograph: unknown/AP

A CNN documentary entitled John Lewis: Good Trouble, quotes him: “I tried to do what was right, fair and just. When I was growing up in rural Alabama, my mother always said, ‘Boy, don’t get in trouble … but I saw those signs that said ‘white’, ‘colored’, and I would say, ‘Why?’

“And she would say again, ‘Don’t get in trouble. You will be beaten. You will go to jail. You may not live. But … the words of Dr King and the actions of Rosa Parks inspired me to get in trouble. And I’ve been getting in trouble ever since. Good trouble. Necessary trouble.”

 

 

Imagining India for Contemporary Politics- What Should the Left Do? : Ravi Sinha

 

(Webinar – Sunday, July 19, 5 pm)

Shakespeare said, what is past is prologue. A simple-minded rationalist may be contented to assume that past is fixed as it has already gone into the making of the present. Nothing can be done to change it. The truth however is that past is being ‘remade’ every day. Imaginations of ancient glories or of humiliating defeats in the distant past are being deployed in contemporary politics all across the world. This phenomenon has been a key element behind the resurgence of rightwing in many countries. Contemporary India is a calamitous example where a perverse variant of mass-democratic politics has been fashioned through the political ideology of Hindutva resulting in serious damage to democracy and to people’s welfare.

Contemporary politics is driven more pressingly to such ideological re-imaginings in the conditions of vigorously competitive electoral democracies. The phenomenon is far more pronounced in countries with a significant minority (religious, racial, linguistic-cultural etc.) that can be portrayed as a historical villain. The majority can, then, be mobilized through the political process of polarisation in which some historical-civilizational-social tectonic plate is deployed in the service of electoral-political objectives. India is a pre-eminent example of this tragic phenomenon.

Invariably, left and progressive forces find themselves handicapped in these circumstances. Attempts to prove that such polarising strategies based on re-imagining the past are malignant turn out to be politically ineffective. A typical response from such forces has been to counter the emotive with the economic and to challenge cultural nationalism with anti-colonial, anti-imperialist nationalism. These strategies have failed miserably. Other social and resistance movements too have attempted partial re-imagining of India’s past from the standpoint of traditionally oppressed communities (Dalit, feminist, native-ist, etc.). While offering some resources to the respective movements, these efforts have failed equally miserably in challenging the Hindutva’s cultural nationalism. The efforts of some of the liberal bourgeois forces, on the other hand, to gain ground by partly imitating the Hindutva forces (variants of soft hindutva) have been no more than a laughing stock. Continue reading Imagining India for Contemporary Politics- What Should the Left Do? : Ravi Sinha

Trajectory of India’s Democracy and Contemporary Challenges : Prof Suhas Palshikar

[Inaugural Lecture of ‘Democracy Dialogues’ Series ( Webinar)
Organised by New Socialist Initiative, 12 th July 2020]

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( Prof Suhas Palshikar, Chief Editor, Studies in Indian Politics and Co-director, Lokniti at the Centre for the Study of Developing Societies, delivered the inaugural lecture in the ‘Democracy Dialogues’ Series initiated by New Socialist Initiative.

In this lecture he attempted to trace the roots of the current moment of India’s democracy in the overall global journey of democracy, the extra-ordinarily ambitious and yet problematic foundational moment of Indian democracy and the many diversions India’s democracy has taken over time. He argued that unimaginative handling of the extra-ordinary ambition and Statist understanding of the ‘power-democracy’ dialectic formed the basis for easy distortions of democratic practice and that while populism and majoritarianism are the current challenges, they are by no means only special to the present and therefore, even as critique and course-correction of present political crisis is urgently required, a more long-term view of the trajectory of Indian democracy is necessary.

Here follows a detailed summary of his presentation prepared by Dr Sanjay Kumar)

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Cisco Case Shows Indians Still Take Caste Where they Go

How discrimination is integrated into the daily lives of the Indian diaspora still needs to be understood.

Cisco Case Shows Indians

What happens to caste when Indians migrate to Western countries? Do their feelings of being born superior or inferior, their belief in the purity-pollution ethic, just melt away? The “model minority” has tried to avoid a conversation on this issue but it returns to haunt them time and again. Now the American state of California is at the centre of yet another caste controversy.

The last serious discussion around Indian-Americans and caste took place in 2015, when the California State Board of Education initiated a regular ten-year public review of the school curriculum framework. The conservative Hindu American Foundation (HAF) and the South Asian Histories for All Coalition (an interfaith, multi-racial, inter-caste coalition) clashed over HAF’s proposed interventions, which essentially sought to erase caste from the syllabus. The Coalition took the position that evidence and record of the injustices of caste and religious intolerance in South Asian must not be erased.

( Read the full article here)

वरवर राव को रिहा करो!

भीमा कोरेगाँव मामले तथा अन्य सभी मामलों में विचाराधीन लेखकों-मानवाधिकारकर्मियों को रिहा करो !

(न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, जन संस्कृति मंच, दलित लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन नाट्य मंच, इप्टा, प्रतिरोध का सिनेमा और संगवारी की ओर से जारी साझा  बयान )

State trying to kill Varavara Rao in jail, he needs immediate ...

( Photo Courtesy : New Indian Express)

‘…कब डरता है दुश्मन कवि से ?

जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हैं

वह कै़द कर लेता है कवि को ।

फाँसी पर चढ़ाता है

फाँसी के तख़्ते के एक ओर होती है सरकार

दूसरी ओर अमरता

कवि जीता है अपने गीतों में

और गीत जीता है जनता के हृदयों में।’

–वरवर राव, बेंजामिन मोलेस की याद में, 1985

देश और दुनिया भर में उठी आवाज़ों के बाद अन्ततः 80 वर्षीय कवि वरवर राव को मुंबई के जे जे अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया है। राज्य की असंवेदनशीलता और निर्दयता का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि जिस काम को क़ैदियों के अधिकारों का सम्मान करते हुए राज्य द्वारा खुद ही अंजाम दिया जाना था, उसके लिए लोगों, समूहों को आवाज़ उठानी पड़ी। Continue reading वरवर राव को रिहा करो!

तुर्की – गैर धर्मनिरपेक्ष रास्ते पर : मुशर्रफ अली

Guest Post by Musharraf AliThe Hagia Sophia Court Judgment — What Lies Beneath?  

क़ुव्वत ऐ फ़िकरो अमल पहले फ़ना होता है
फिर किसी क़ौम की शौकत पे ज़वाल आता है

 

(किसी क़ौम के दबदबे या रौब में तब गिरावट आती है, जब उसकी सोचने-विचारने की ताक़त खत्म हो जाती है)

8 जुलाई 2020 को तुर्की के राष्ट्रपति तय्यप इरदुगान ने चर्च से मस्जिद फिर मस्जिद से म्यूजियम बना दी गयी ऐतिहासिक इमारत हय्या सोफ़िया को फिर से मस्जिद बनाने की घोषणा की इसके बाद 10 जुलाई को वहां के सुप्रीम कोर्ट ने इरदुगान के फैसले के पक्ष में फैसला दिया। इस घटना के बाद दुनिया भर के मुसलमानों में खुशी की लहर दौड़ गयी और पस्ती में डूबी हुई क़ौम को एक विजय का अहसास हुआ। इस घटना के बाद मैं इंटरनेट पर मुसलमानों की प्रतिक्रिया का अध्ययन करता रहा था। मैं इस तलाश में था कि इस घटना के विरोध में इसकी मज़्ज़मत में मुस्लिमो की तरफ़ से कोई तो आवाज़ सुनाई देगी लेकिन जहां तक इंटरनेट पर मैं ढूंढ पाया एक भी आवाज़ विरोध की नही मिल पायी जबकि समर्थन करती और खुशियां मनाती पोस्टें भरी पड़ी थी। मेरी नज़र में यह घटना वैसी ही है जैसी बाबरी मस्जिद ढहने की है और वहां के सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी वैसा ही है जैसा नवम्बर 2019 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद के संबंध में सुनाया। तुर्की में हय्या सोफिया को ढहाया नही गया लेकिन सांकेतिक रूप से माने तो यह ढहाने जैसा ही क़दम है। बाबरी मस्जिद, मंदिर तोड़कर बनाई गई अभी यह बात विवादित बनी हुई है लेकिन हय्या सोफिया 1453 से पहले चर्च था यह ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है। जब मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने मस्जिद बना दिये गए चर्च को म्यूजियम में 1934 में बदला तब विवाद को समाप्त करने का उनका बहुत ही समझदारी भरा क़दम था मगर तुर्की राष्ट्रपति तय्यप इरदुगान ने कमाल अतातुर्क के सारे किये कराए पर अपने निजी स्वार्थ में पानी फेर दिया और दुनिया भर में मुसलमानों की जो खराब छवि बना दी गयी है उसको और खराब कर दिया। उनके इस काम से मुसलमानों की जो बुनियादी समस्याये हैं वो हल होने की जगह और बढ़ गईं। Continue reading तुर्की – गैर धर्मनिरपेक्ष रास्ते पर : मुशर्रफ अली

जातिगत भेदभाव को लेकर कब ख़त्म होगा भारतीयों का दोहरापन

भारतीयों के मन में व्याप्त दोहरापन यही है कि वह ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर होने वाली ज़्यादतियों से उद्वेलित दिखते हैं, पर अपने यहां के संस्थानों में आए दिन दलित-आदिवासी या अल्पसंख्यक छात्रों के साथ होने वाली ज़्यादतियों को सहजबोध का हिस्सा मानकर चलते हैं.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

‘जाति समस्या- सैद्धांतिक और व्यावहारिक तौर पर एक विकराल मामला है. व्यावहारिक तौर पर देखें तो वह एक ऐसी संस्था है जो प्रचंड परिणामों का संकेत देती है. वह एक स्थानीय समस्या है, लेकिन एक ऐसी समस्या जो बड़ी क्षति को जन्म दे सकती है. जब तक भारत में जाति अस्तित्व में है, हिंदुओं के लिए यह संभव नहीं होगा कि वह अंतरजातीय विवाह करें या बाहरी लोगों के साथ सामाजिक अंतर्क्रिया बढ़ाएं. और अगर हिंदू पृथ्वी के दूसरे हिस्सों में पहुंचते हैं, तो फिर भारतीय जाति विश्व समस्या बनेगी.’

– डॉ. बीआर आंबेडकर (1916)

वर्ष 1916 के मई महीने में कोलंबिया विश्वविद्यालय में मानव वंशशास्त्र विभाग में सेमिनार में डॉ. आंबेडकर ने ‘भारत में जाति- उनकी प्रणाली, उनका उद्गम और विकास’ (Castes In India- Their Mechanism, Genesis and Development) पर अपना पेपर पढ़ा था.

पेपर पढ़ते हुए उन्होंने इस बात की भविष्यवाणी की थी कि किस तरह एक दिन जाति विश्व समस्या भी बनेगी, उनके बोल थे, ‘अगर हिंदू दुनिया के दूसरे हिस्सों में पहुंचते हैं, तो फिर भारतीय जाति विश्व समस्या बनेगी.’

उनके इस वक्तव्य के 104 साल बाद उसी अमेरिका के कैलिफोर्निया से आई यह खबर इसी बात की ताईद करती है.

ध्यान रहे कैलीफोर्निया राज्य सरकार की तरफ से वहां की एक अग्रणी बहुदेशीय कंपनी सिस्को सिस्टम्स के खिलाफ दायर एक मुकदमे के बहाने यही बात नए सिरे से उजागर हुई है, जिसका फोकस वहां कार्यरत एक दलित इंजीनियर के साथ वहां तैनात दो कथित ऊंची जाति के इंजीनियर द्वारा जातिगत भेदभाव की घटना से है. Continue reading जातिगत भेदभाव को लेकर कब ख़त्म होगा भारतीयों का दोहरापन

बिहार चुनाव आते ही प्रतिबंधित रणवीर सेना को एक बार फिर कौन हवा दे रहा है?

रणवीर सेना, जिस पर बहुत पहले पाबंदी लगायी जा चुकी है, नए सिरे से सुर्खियों में है।

पिछले दिनों उसने अपने सोशल मीडिया पेज पर भीम आर्मी के बिहार प्रमुख गौरव सिराज और एक अन्य कार्यकर्ता वेद प्रकाश को खुलेआम धमकाया है। उसने अपने ‘सैनिकों’ को आदेश दिया है कि उन्हें ‘जिन्दा या मुर्दा’ गिरफ्तार करें। बताया जाता है कि इस युवा अम्बेडकरवादी ने ब्रह्मेश्वर मुखिया- जो रणवीर सेना के प्रमुख थे और 2012 में किसी हत्यारे गिरोह के हाथों मारे गए थे- के बारे में जो टिप्पणी की, वह रणवीर सेना के लोगों को नागवार गुजरी है।

प्रश्न उठता है कि इस तरह खुलेआम धमकाने के लिए, मारने पीटने की बात करने के लिए क्या ‘सेना’ पर कार्रवाई होगी? अगर इतिहास को गवाह मान लिया जाए तो इसकी संभावना बहुत कम दिखती है। Continue reading बिहार चुनाव आते ही प्रतिबंधित रणवीर सेना को एक बार फिर कौन हवा दे रहा है?

Shadow of Laxmanpur Bathe on Bihar Election

An unpredictable element has found a new lease of life thanks to the coming Assembly election.

Laxmanpur Bathe on Bihar Election

The outlawed Ranvir Sena—the private army of upper caste landlords of Bihar—is in the news again. It recently threatened the Bihar chief of the Bhim Army, Gaurav Siraj, and one of its activists, Ved Prakash, through a Facebook post. The so-called army has “ordered” its “sainiks” to “arrest” him dead or alive. The sena is apparently peeved over how the young dynamic leader of the Ambedkarite organisation has described Brahmeshwar Singh, their slain “Mukhiya” who was killed in 2012.

Will there be any action against those who have threatened the young leader? If history is any guide then there is little possibility of this.

Merely two years ago, Nawal Kishor Kumar, Editor Hindi, Forward Press was targeted by this “sena”. The aggrieved journalist had lodged a police complaint but there has been no progress in the investigation.

It is not that there is no law to punish such miscreants. Social media posts of the threatening kind relate to various offences under the Indian Penal Code, from criminal intimidation punishable under section 503 to section 505 related to creating mischief in public, to section 506 which awards punishment for criminal intimidation and section 153A which relates to penalties for promoting enmity between different groups and so on. In fact, based on its activities, the Ranvir Sena is also liable to be prosecuted under section 3 of the Bihar Control of Crimes Act, section 3 of the Arms Act and section 3 of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989.”

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कोविड-19 संकट के दौरान मिसाल बनकर उभरा क्यूबा

मार्च महीने में इटली के मिलान में मालपेंसा एयरपोर्ट पर क्यूबाई डॉक्टर्स का दल. (फोटो: रॉयटर्स)

मार्च महीने में इटली के मिलान में मालपेंसा एयरपोर्ट पर क्यूबाई डॉक्टर्स और स्वास्थ्यकर्मियों का दल. (फोटो: रॉयटर्स)

हेनरी रीव, इस नाम से कितने लोग परिचित हैं?

यह अलग बात है कि इस युवा की याद में बनी एक मेडिकल ब्रिगेड की दुनिया भर की सक्रियताओं से तो सभी परिचित हैं, जिसने कोविड महामारी के दिनों में भी अपने चिकित्सा के कामों में- जो अंतरराष्ट्रीयतावाद की भावना को मजबूती देते हुए आगे बढ़ी है, कहीं आंच नहीं आने दी है, जिसका निर्माण क्यूबा ने किया है.

मालूम हो कि हेनरी रीव के बारे में इतना ही हम जानते हैं कि 19 साल का यह अमेरिकी नौजवान था, जो न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन स्थित अपने घर को छोड़ते हुए 19वीं सदी के अंतिम दौर में स्पेनिश हुक्मरानों के खिलाफ क्यूबाई संघर्ष से जुड़ गया था.

और क्यूबा ने अपने इस अनूठे स्वतंत्राता सेनानी की याद में मेडिकल ब्रिगेड का गठन किया है जो आज की तारीख में 22 मुल्कों में सक्रिय है.

आप को याद होगा वह दृश्य, जो कैमरे में कैद होते वक्त ही कालजयी बने रहने का संकेत दे रहा था. जब मिलान, जो इटली के संपन्न उत्तरी हिस्से का मशहूर शहर है, वहां अपने डॉक्टरी यूनिफॉर्म पहने एक टीम मालपेंसा एयरपोर्ट पर उतर रही थी और उस प्रसिद्ध एयरपोर्ट पर तमाम लोग खड़े होकर उनका अभिवादन कर रहे थे. (18 मार्च 2020)

यह सभी डॉक्टर तथा स्वास्थ्य पेशेवर हेनरी रीव ब्रिगेड के सदस्य थे, जो इटली सरकार के निमंत्रण पर वहां पहुंचे थे. एयरपोर्ट पर खड़े लोगों में चंद ऐसे भी थे, जिन्होंने तब अपने सीने पर क्रॉस बनाया, अपने भगवान को याद किया क्योंकि उनके हिसाब से क्यूबा के यह डॉक्टर किसी ‘फरिश्ते’ से कम नहीं थे. Continue reading कोविड-19 संकट के दौरान मिसाल बनकर उभरा क्यूबा

साझी शहादत-साझी विरासत: वसंत राव और रजब अली को याद करना क्यों जरूरी है ?

वसंतराव और रजब अली। साभार-इंडियन एक्सप्रेस

अहमदाबाद के जमालपुर के पास स्थित वसन्त-रजब चौक कितने लोगों ने देखा है? देखा तो कइयों ने होगा, और आज की तारीख में उससे रोज गुजरते भी होंगे, मगर अंगुली पर गिनने लायक लोग मिलेंगे जिन्होंने चौराहे के इस नामकरण का इतिहास जानने की कोशिश की होगी। मुमकिन है गुजरने वाले अधिकतर ने आज के इस इकहरे वक्त़ में- जबकि मनुष्य होने के बजाय उसकी खास सामुदायिक पहचान अहम बनायी जा रही है- इस ‘विचित्र’ नामकरण को लेकर नाक भौं भी सिकोड़े होंगे।

वह जून 1946 का वक़्त था जब आज़ादी करीब थी, मगर साम्प्रदायिक ताकतों की सक्रियता में भी अचानक तेज़ी आ गयी थी और उन्हीं दिनों यह दो युवा साम्प्रदायिक ताकतों से जूझते हुए मारे गए थे। वसंत राव हेगिश्ते का जन्म 1906 में अहमदाबाद के एक मराठी परिवार में हुआ था तो रजब अली लाखानी एक खोजा मुस्लिम परिवार में कराची में पैदा हुए थे (27 जुलाई 1919) और बाद में उनका परिवार अहमदाबाद में बस गया था। हमेशा की तरह उस साल रथयात्रा निकली थी और उसी बहाने समूचे शहर का माहौल तनावपूर्ण हो चला था।

कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता रहे इन जिगरी दोस्तों ने अपने ऊपर यह जिम्मा लिया कि वह अपने-अपने समुदायों को समझाएंगे कि वह उन्मादी न बनें, इसी काम में वह जी जान से जुटे थे, छोटी बैठकें कर रहे थे, लोगों को समझा रहे थे। 1 जुलाई को एक खांड नी शेरी के पास एक उग्र भीड़ ने – जो जुनूनी बन चुकी थी – उन्हें उनके रास्ते से हटने को कहा और उनके इन्कार करने पर उन दोनों को वहीं ढेर कर दिया। Continue reading साझी शहादत-साझी विरासत: वसंत राव और रजब अली को याद करना क्यों जरूरी है ?

महिला आन्दोलनकारियों की गिरफ्तारियां और भारत सरकार की पितृसत्ता : अमन अभिषेक

Guest Post by Aman Abhishek

Big Brother's Patriarchal Authoritarianism

गुलफीशा फ़ातिमा, सफुरा जरगर, देवांगना कलिता और नताशा नरवाल

दुनिया के जाने-माने प्रोफ़ेसर और पत्रकार डॉक्टर लेता होन्ग फ़िंचर अपनी किताब “बिट्रेइंग बिग ब्रदर: दी फेमनिस्ट अवेकनिंग इन चाइना” में लिखती हैं कि किस तरह चीनी सरकार के द्वारा मार्च 2015 में पांच कार्यकर्तायों की गिरफ्तारी ने चीनी नारीवादी आन्दोलन को एक नया मोड़ दे दिया | जिन पांच महिलाओं को गिरफ्तार किया गया था वे विश्वमहिला दिवस के मौके पर यौन उत्पीडन के खिलाफ बसों और ट्रेनों में पर्चे बाँट रही थी | परन्तु चीनी सरकार ने झगड़े उसकाने के आरोप लगाकर गिरफ्तारी कर ली | इसका परिणाम यह हुआ कि ये पांच महिलाएं “फेमस फाइव” यानी “पांच प्रसिद्ध” के नाम से जानी गई | इन गिरफ्तारियों ने चीनी नारीवादी आदोंलन को कमजोर करने के बजाए एक नयी उर्जा प्रदान की और गिरफ्तारियों के विरोध में बड़े पैमाने पर आन्दोलन शुरू हो गए|

अब भारत में हाल की परिस्थितियों पर गौर करें | दिसम्बर 2019 से मार्च 2020 तक देश के सैकड़ों सार्वजनिक स्थानों पर हजारों आन्दोलनकारियों ने, महिलाओं के नेतृत्व में, सीएए के विरोध में सशक्त और शांतिपूर्ण आन्दोलन किया और लगातार धरना चला | शाहीनबाग जैसे जगहों पर रात दिन धरने चले | देश भर के आन्दोलनकारी उसी सीएए का विरोध कर रहे थे जिसे संयुक्त्त राष्ट्र संघ और और अनेकों मानवाधिकार संगठनों ने मुस्लिम विरोधी और घोर पक्षपातपूर्ण करार दिया है| महिलाओं के नेतृत्व और भागीदारी की वजह से सीएए विरोधी आन्दोलन केवल नागरिकता के सवालों तक सीमित न रहकर भारतीय नारीवादी आन्दोलन के इतिहास में एक अहम कड़ी बन गया |

अप्रैल से भारत सरकार ने सीएए विरोधी आन्दोलन के महिला नेतृत्व की गिरफ्तारियां शुरू कर दी | इन महिलाओं की गिरफ्तारियों की वजह हिंसा भड़काने से लेकर आतंकवाद तक बताई गई | गिरफ्तार लोगों में शामिल गुलफीशा फ़ातिमा मुस्लिम समुदाय की नेता हैं, सफुरा जरगर जामिया मिलिया की छात्रा हैं तथा गिरफ्तारी के वक्त तीन माह से गर्भवती थी | देवांगना कलिता और नताशा नरवाल , पिंजड़ा तोड़ आन्दोलन की संस्थापक हैं (पिंजड़ा तोड़ समूह के कार्यकर्ताओं ने शैक्षणिक संस्थाओं में लैंगिक भेद-भाव और पितृसत्ता के खिलाफ आन्दोलन किया है) | यह गिरफ्तारियां एक वैश्विक महामारी के दौरान की गई है, जो इस महिलाओं की जिन्दगी के लिए घातक साबित हो सकता है | Continue reading महिला आन्दोलनकारियों की गिरफ्तारियां और भारत सरकार की पितृसत्ता : अमन अभिषेक

मनु को इतिहास तक सीमित करने का सवाल बनाम मनुस्मृति को ‘सैनिटाइज़’ करने के षडयंत्र

कितने लोगों ने डॉ. अम्बेडकर की अगुवाई में छेड़े गए पहले ‘दलित विद्रोह’ अर्थात महाड़ सत्याग्रह (1927) के बारे में पढ़ा होगा और यह जाना होगा कि किस तरह उसके पहले चरण में (19-20 मार्च) को महाड़ नामक जगह पर स्थित चवदार तालाब पर हजारों की तादाद में लोग पहुंचे थे और उन्होंने वहां पानी पीया था। जानवरों को भी जिस तालाब पर पानी पीने से रोका नहीं जाता था, उस तालाब पर दलितों को मनाही थी और इसी मनाही के खिलाफ इस सत्याग्रह ने बग़ावत का बिगुल फूंका था।

सत्याग्रह के दूसरे चरण में (25 दिसम्बर 1927) में उसी महाड में डॉ. अम्बेडकर ने मनुस्म्रति का दहन किया था और उनकी इस कार्रवाई की तुलना फ्रेंच इन्कलाब (1789) से की थी। इस दहन के पहले जिस प्रस्ताव को गंगाधर सहस्त्रबुद्धे नामक डॉ. अम्बेडकर के सहयोगी ने पढ़ा था- जो खुद पुरोहित जाति से सम्बद्ध थे, उसके शब्द इस प्रकार थे: “यह सम्मेलन इस मत का मजबूत हिमायती है कि मनुस्‍मृति, अगर हम उसके उन तमाम श्लोकों को देखें जिन्होंने शूद्र जाति को कम करके आंका है, उनकी प्रगति को अवरुद्ध किया है, और उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक गुलामी को स्थायी बनाया है… ऐसी किताब नहीं है जो एक धार्मिक या पवित्र किताब समझी जाए। और इस राय को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए, यह सम्मेलन ऐसी धार्मिक किताब के दहन की कार्रवाई को अंजाम दे रहा है जो लोगों का विभाजन करती है और इन्सानियत को तबाह करने वाली है।“ ( Page 351, Mahad The Making of the First Dalit Revolt, Anand Teltumbde, Navayana, 2017) Continue reading मनु को इतिहास तक सीमित करने का सवाल बनाम मनुस्मृति को ‘सैनिटाइज़’ करने के षडयंत्र

Treacherous Road to Make Manu History

Even today the attempt is to whitewash Manusmriti, not shun it. But all is not lost as the ripples of Black Lives Matter have reached Indian shores.

manusmiriti ambedkar hindutva

It was 1927, the second phase of the historic Mahad Satyagrah was on, and Dr. Bhimrao Ambedkar led thousands of people in burning the Manusmriti, an act he compared with the French Revolution of 1789. Time and again, in speeches and writings, he categorically opposed the world-view of Manu, the legendary figure to whom are attributed the tenets of the Manusmriti, said to be dated to around 100 CE.

In the book written by scholar and activist Anand Teltumbde, Mahad: The Making of the First Dalit Revolt, published by Navayana in 2017, is recorded the resolution which was proposed by the social activist Gangadhar Sahasrabuddhe, and then read out at the Mahad Satyagrah. It states that the firm opinion of this conference is that the Manusmriti, “taking into consideration its verses which undermined the Shudra caste, thwarted their progress, and made their social, political and economic slavery permanent…is not worthy of becoming a religious or a sacred book. And in order to give expression to this opinion, this conference is performing the cremation rites of such a religious book which has been divisive of people and destroyer of humanity.”

Twenty three years later, Dr Ambedkar marked the promulgation of the Constitution of India as the “end of the rule by Manu”. And yet, 70 years thereafter, a significant section of Indians are still fascinated by Manu and have no qualms in venerating him. Even the Black Lives Matter protests in the United States and large parts of Europe, in which statues of slave-owners and colonialists are being knocked down or disfigured, the Indian followers of Manu have no regrets about deifying him.

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How Many Times Will India Deny Apartheid?

Darren Sammy has revealed he faced racism in India at a time when the world is battling racism. India needs to join this fight.

Darren Sammy has revealed he faced racism

Darren Sammy, the famous all-rounder from West Indies, is a legend. He has led his country team and is the only captain to have won two T20 World Cups, in 2012 and 2016. His achievements in the arena of cricket are not limited to his country. He played a singular role in reviving Pakistan’s cricket team and preparing it for international matches, which earned him an honorary citizenship.

And thus the revelation that he was subjected to racial taunts by his own teammates, during his tour to India in 2013 and 2014, while he played IPL matches, was a bolt from the blue. His admirers were naturally aghast when Sammy disclosed that his teammates at SunRisers Hyderabad used to address him with a pejorative term and collectively sneer at him.

On some occasions, Sammy said, he too would smile back at his gleeful teammates, for he had innocently believed that it was light-hearted banter, even though directed at him. Sammy was completely oblivious to the fact that they were targeting him with a racist invective and enjoying “jokes” that he could not comprehend at his expense.

No doubt many of those who subjected him to humiliation were big names in Indian cricket. Yet it did not cause any uproar in India when Sammy made the truth known to the world via an Instagram post. The 24/7 news channels, which are forever searching for sensational news, and the cricketing fraternity, were quiet. None came forward to denounce the humiliation of Sammy, nor was there a public apology from the offenders. Only Swara Bhaskar, the actress, who espouses social causes rather fearlessly, demanded an apology from his teammates.

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कोविड संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए मलप्पुरम ने नई ज़मीन तोड़ी है

आज जब पूरे देश में धार्मिक स्थलों को खोला जा रहा है, तब बीते दिनों ‘सांप्रदायिक’ होने का इल्ज़ाम झेलने वाले केरल के मलप्पुरम ज़िले ने अपनी अलग राह चुनी है. कोरोना के बढ़ते मामलों के मद्देनज़र वहां की पांच हज़ार मस्जिदों को अनिश्चितकाल तक बंद रखने समेत कई धार्मिक स्थलों को न खोलने का फ़ैसला लिया गया है.

Minara masjid wears a deserted look on the first day of the holy fasting month of Ramzan, amid unprecedented circumstances due to the coronavirus pandemic and a nationwide lockdown, in Mumbai. PTI

लॉकडाउन के दौरान बंद एक मस्जिद. (फाइल फोटो: पीटीआई)

मलप्पुरम, केरल के एकमात्र मुस्लिम बहुल जिले, जहां उनकी आबादी 75 फीसदी है, ने एक इतिहास रचा. तय किया गया है कि जिले की 5,000 मस्जिदें अनिश्चितकाल के लिए बंद रहेंगी.

इस निर्णय के पीछे का तर्क समझने लायक है. क्योंकि राज्य में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बढ़ते दिख रहे हैं, इसलिए यह तय करना मुनासिब समझा गया कि उसके दरवाजे श्रद्धालुओं के लिए बंद ही रहें.

जाने-माने इस्लामिक विद्वान पनक्कड सययद सादिक अली शिहाब थंगल, जो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के जिला अध्यक्ष हैं, उन्होंने इस खबर को मीडिया के एक हिस्से में साझा किया.

इस तरह जबकि बाकी मुल्क में प्रार्थनास्थल, धार्मिक स्थलों को खोला जा रहा है, मलप्पुरम ने अपनी अलग राह चुनी है.

इस बात पर जोर देना जरूरी है कि आठ मुस्लिम संप्रदायों (denomination) की उस बैठक में, जहां 9 जून के बाद प्रार्थनास्थलों को खोलने के सरकारी निर्णय पर विचार करना था, यह फैसला एकमत से लिया गया.

सभी इस बात पर सहमत थे कि उन्हें इस छूट का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. एक ऐसे वक्त में जबकि कोविड-19 के मामले सूबे में बढ़ रहे हों, मस्जिद कमेटियों और धार्मिक नेताओं ने यह जरूरत महसूस की कि उन्हें सतर्कता बरतनी चाहिए.

खबरें यह भी आ रही हैं कि न केवल मस्जिदें बल्कि इलाके के कई मंदिरों और चर्च ने भी उन्हें तत्काल खोलना नहीं तय किया है.

मिसाल के तौर पर, श्री कदमपुजा भगवती मंदिर जो मलप्पुरम में है तथा श्री तिरूनेल्ली मंदिर जो वायनाड में है, वह बंद रहेंगे.

नायर सर्विस सोसायटी से संबंधित मंदिर भी 30 जून तक नहीं खुलेंगे. एर्नाकुलम-अंगमाली आर्चडाओसिस ऑफ सिरो मलबार चर्च ने भी तय किया है कि उसके मातहत चर्च 30 जून तक बंद रहेंगे.

निस्संदेह इस बात को लेकर इलाके के लोगों में गहरा एहसास दिख रहा है कि राज्य ने जिन भी सावधानियों को बरतने की बात की हो, स्पेशल ऑपरेटिंग प्रोसिजर्स का ऐलान किया है, हकीकत में उन पर अमल करना नामुमकिन होगा लिहाजा कोविड-19 के समुदाय आधारित संक्रमण की संभावना बनी रहेगी.

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Can Rest of India ‘Do’ a Mallapuram ?

Ruins of an ancient Jain temple in Arimbra

Ruins of old Jain Style Temple at Arimbra 

Mallapuram, Kerala’s lone Muslim-majority district, made history recently.

The 5,000 mosques in the district would remain closed indefinitely.

Logic behind this decision is simple.

As the state is witnessing spike in Coronavirus infection recently, it was found more prudent to keep the doors closed for devotees. Panakkad Sayyed Sadiq Ali Shihab Thangal, a leading Islamic Scholar and Malappuram district president of the Indian Union Muslim League, shared this news with a section of the media.

Thus while the rest of the country is witnessing opening of places of worship under Unlock 1, Mallapuram has decided otherwise. Continue reading Can Rest of India ‘Do’ a Mallapuram ?

Truth Behind India’s Hierarchies of Pain

Perhaps celebrities know that talking about the plight of an animal—who died in a state not ruled by the ruling dispensation at the Centre—is a safe bet

Migrants

Migrants wait for a means of transport to travel to their native places during the fourth phase of the ongoing COVID-19 nationwide lockdown, at Kundali Industrial Area in Sonipat. (Photo: PTI)

The killing of a pregnant elephant has caused national outrage. The elephant had strayed into a village in Palakkad, Kerala, and is said to have been fed a fruit stuffed with firecrackers, which exploded in its mouth. It is impossible to comprehend the tremendous suffering of the elephant, who died a painful death. It is also learnt that people in the region have in the past used incendiary materials to protect their crop from animals, particularly wild boar.

One person was arrested after the matter came to light and few others have been identified. Kerala Chief Minister Pinarayi Vijayan has promised “justice will prevail”, but one does not know if that includes legal action against the hatemongers—including a former cabinet minister who gave the incident a communal colour by claiming, incorrectly, that the incident occurred in Muslim-majority Malappuram. A sitting cabinet minister also retweeted this fake news, which further vitiated the atmosphere.

In a complaint to the Malappuram Police, a lawyer has urged the police chief to file an FIR against the former minister and others for a “derogatory” campaign against the district.

Now, many Indian celebrities, for example Indian cricket team captain Virat Kohli, have said that they are “appalled” by the incident. The chairman of India’s biggest corporate giant, Ratan Tata, has compared the “criminal act” with “meditated murder”. The celebrities, the anchors of 24/7 news channels and many other prominent figures are undeniably upset by the plight of the elephant. But do they also feel the same kind of outrage and disquiet over the communal overtones being imparted to it?

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