All posts by subhash gatade

Living with the Virus ?

Whether people of the world will have to learn to live with the virus?

As India and many parts of the world seem to be engulfed by the second or third wave of the Coronavirus epidemic – which looks more dangerous – this idea is being pushed from different quarters.  Newspaper articles or surveys or studies have appeared in different publications which seem to be pushing this narrative.

Sample conclusions of a study done jointly by Emory and Penn State University which say “One year after its emergence, severe acute respiratory syndrome coronavirus 2 (SARS-CoV-2) has become so widespread that there is little hope of elimination.” This appeared in an article in USA Today . A famous journal Nature also shared a survey which talked to Scientists and around 90 per cent of the Scientists polled talked of how Covid is likely to be endemic in pockets of the global population.(do)

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क्या हो बच्चे का धर्म ?

“Five minutes after your birth, they decide your name, nationality, religion, and sect, and you spend the rest of your life defending something you did not even choose.”

: Quote, unnamed

1.

आप कह सकते हैं कि पहली दफा मैं इस पहेली से तब रूबरू हुआ था या कह सकते हैं कि अधिक गंभीरता से सोचने लगा जब बंबई की इस ख़बर ने ध्यान खींचा था.

किस्सा थोड़ा पुराना लग सकता है अलबत्ता आज भी मौजूं.

मराठी परिवार में जनमी एक युवती और गुजराती परिवार में पले युवक ने- जिन्होंने अन्तरधर्मीय विवाह किया है और बम्बई में बसे थे- दरअसल यह तय किया कि वह अपनी नवजन्मी सन्तान के साथ किसी धर्म को चस्पां नहीं करेंगे. उनका मानना था कि बड़े होकर उनकी सन्तान जो चाहे वह फैसला कर ले, आस्तिकता का वरण कर ले, अज्ञेयवादी बन जाए या धर्म को मानने से इनकार कर दे, लेकिन उसकी अबोध उम्र में उस पर ऐसे किसी निर्णय को लादना गैरवाजिब होगा.

निश्चित ही अपने इस फैसले पर अमल करने में उनके सामने काफी बाधाएं आयीं. सन्तान का जन्म प्रमाणपत्र तैयार करने में अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े, एक अफसर ने तो युवती से पूछ लिया कि क्या तुम्हें अपने धर्म पर गर्व नहीं है ?  युवती ने तपाक से जवाब दिया कि भले ही वह धर्म को मानने वाले परिवार में जन्मी हो, लेकिन किसी भी रीति रिवाज को नहीं मानती और अहम बात यह है कि क्या एक जनतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश में मां बाप यह फैसला नहीं ले सकते कि वह अपनी संतान को किसी धर्म से नत्थी नहीं करेंगे.

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In Search of the Tukde-Tukde Gang!

WHATEVER HAPPENED TO THE BOMB-MAKING FACTORIES IN WEST BENGAL?

amit shah

Image Courtesy: PTI

Are the Ministry of Home Affairs (MHA) and its in-charge, Home Minister Amit Shah, at variance with each other? This question has acquired a new meaning as, within a year, there have been at least two occasions when the MHA has not supported Shah’s public claims on matters with a direct bearing on the internal security of the country.

Take the interview of Shah done by a news channel last October. He claimed in it that the law and order situation had “gone for a toss” in West Bengal. The state, he went to the extent of claiming, had “bomb-making factories” in “every district”. This explosive claim of the number two in the Union Cabinet was lapped by mainstream media and soon there were calls to impose President’s Rule in the state.

Four months later, it has become clear that the ministry Shah heads has not a clue about his claim. Continue reading In Search of the Tukde-Tukde Gang!

नरेंद्र मोदी स्टेडियम: आज़ादी के नायकों की जगह लेते ‘नए इंडिया’ के नेता

मोटेरा स्टेडियम का नाम बदलना दुनिया के इतिहास में- ख़ासकर उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष कर आज़ाद हुए मुल्कों में, ऐसा पहला उदाहरण है, जहां किसी स्वाधीनता सेनानी का नाम मिटाकर एक ऐसे सियासतदां का नाम लगाया गया हो, जिसका उसमें कोई भी योगदान नहीं रहा हो.

नरेंद्र मोदी स्टेडियम. फोटो: रॉयटर्स)

Courtesy – नरेंद्र मोदी स्टेडियम. फोटो: रॉयटर्स

क्रिकेट का खेल भारत का सबसे लोकप्रिय खेल है. पिछले दिनों यह खेल नहीं बल्कि इस खेल के लिए फिलवक्त मौजूद दुनिया का ‘सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम’ एक अलग वजह से सुर्खियों में आया.

मौका था अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम- जिसे सरदार वल्लभभाई पटेल स्टेडियम के तौर पर जाना जाता रहा है – के नए सिरे से उद्घाटन का, जो वर्ष 2015 में नवीनीकरण के लिए बंद किया गया था और अब नयी साजसज्जा एवं विस्तार के साथ खिलाड़ियों एवं दर्शकों के लिए तैयार था.

याद रहे कि पहले गुजरात स्टेडियम के तौर जाने जाते इस स्टेडियम का स्वाधीनता आंदोलन के महान नेता वल्लभभाई पटेल – जो आज़ादी के बाद देश के गृहमंत्री  भी थे- के तौर पर नामकरण किया गया था, जब तत्कालीन गुजरात सरकार ने स्टेडियम के लिए सौ एकड़ जमीन आवंटित की, जिसका निर्माण महज नौ महीनों में पूरा किया गया था. (1982)

दरअसल हुआ यह कि जिस दिन उसका उद्घाटन होना था, उस दिन अचानक लोगों को पता चला कि अब यह सरदार वल्लभभाई पटेल स्टेडियम नहीं बल्कि ‘नरेंद्र मोदी स्टेडियम’ के तौर पर जाना जाएगा.

सबसे विचित्र बात यह थी कि इस नामकरण को बिल्कुल गोपनीय ढंग से किया गया. गोपनीयता इस कदर थी कि खुद समाचार एजेंसियों प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया या एएनआई आदि तक को पता नहीं था कि उसका नामकरण किया जाने वाला है.

जाहिर था कि पीटीआई या एएनआई जैसी संस्थाओं की सुबह की प्रेस विज्ञप्ति भी उसे सरदार वल्लभभाई पटेल स्टेडियम के तौर पर संबोधित करती दिख रही थी. यह अलग बात है कि अगली प्रेस विज्ञप्ति में अचानक नरेंद्र मोदी स्टेडियम का जिक्र होने लगा.

अब जैसी कि उम्मीद की जा सकती है कि इस नामकरण- जो दरअसल नामांतरण था- पर तीखी प्रतिक्रिया हुई. न केवल इसे सरदार वल्लभभाई पटेल के अपमान के तौर पर देखा गया बल्कि यह भी कहा गया कि एक पदेन प्रधानमंत्री का नाम देकर प्रस्तुत सरकार ने एक तरह से दुनिया में अपनी हंसी उड़ाने का ही काम किया है.

विपक्ष ने साफ कहा कि यह एक तरह से मोदी के पर्सनालिटी कल्ट को अधिक वैधता प्रदान करने का काम है. मिसालें पेश की गईं कि समूची दुनिया में भी ऐसी मिसालें बहुत गिनी-चुनी ही मिलती हैं, जो अधिनायकवादी मुल्कों में दिखती हैं.

( Read the full text here : http://thewirehindi.com/160559/renaming-of-motera-stadium/)

If Comment is Free, Why are Dissenters Being Locked Up?

THE STATE LOOKS THE OTHER WAY ONLY WHEN RIGHT-WING FOOTSOLDIERS TARGET INNOCENT PEOPLE AND PROVOKE VIOLENCE.

If Comment is Free, Why are Dissenters Being Locked Up?

A foreigner, returning from a trip to the Third Reich,

When asked who ruled there, answered:

Fear…

The Regime, Bertolt Brecht.

Those occasions on which judicial verdicts bring cheer are getting rarer. As everyone who supports gender justice rejoices over the victory of senior journalist Priya Ramani in the defamation case filed against her by ex-minister MJ Akbar, it is also time to get excited over another judgement passed in another court.

In an ambience in which dissent is increasingly criminalised, this judgement by a Delhi court, which grants bail to two people accused of posting “fake” videos related to the ongoing farmer movement, is also a breath of fresh air.

The prosecution argued that these videos—which seemed to express discontent among police officers against the government—could create disaffection against the government. Instead of agreeing, the judge hearing the case handed out a tutorial to the government as to when the law on spreading disaffection is actually to be applied.

The law, the prosecution was told, can be invoked only when there is a “call to violence”. The judge underlined that the law to punish sedition is an important instrument to maintain peace and order, and it cannot be invoked to quieten disquiet while pretending to muzzle miscreants.

Any student of law knows that the judge’s declarations resonate with two historic judgements delivered by the highest court of the country, namely the Kedarnath Singh vs State of Bihar ruling from 1962 and the Balwant Singh and Bhupinder Singh vs State of Punjab government case from 1995, which specifically emphasise that the charge of sedition can be used only when violence is invoked or where there are attempts to create disorder.

( Read the full text here)

Mass Psychology of Neofascism – The rationale underlying political ‘irrationality’ : Dr Abhay Shukla

Dr Abhay Shukla, public health physician and health activist will be delivering  the 8 th lecture in the ‘Democracy Dialogues Lecture Series’  on ‘Mass Psychology of Neofascism : The rationale underlying political ‘irrationality’  organised by New Socialist Initiative on Sunday, 21 st February, 2021 at 6 PM (IST)

 

 

 

 

 

 

 

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हमको डिक्टेटर मांगता!

(अक्सर लोग बातचीत में यह कहते पाये जाते हैं कि इस देश में सैनिक शासन लागू कर देना चाहिए. ऐसा कहते समय वे यह भूल जाते हैं कि उनके पड़ोसी देशों में यह सब होता रहा है और इसने उन देशों का जहाँ पीछे किया है वहीं लोगों के जीवन को भी संकट में जब-तब डाल दिया है. जिस देश ने अपने इतिहास का सबसे महान और बड़ा संघर्ष अहिंसा, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता जैसे विराट मानवीय मूल्यों से जीता हो. वहां हिटलर की बढ़ती लोकप्रियता चिंतित करती है.

क्यों हम हिटलर को पसंद करने लग गयें हैं, क्यों हम किसी तानाशाह की प्रतीक्षा कर रहें हैं ? जबकि यह भारत और मानवजाति के लिए किसी विभीषिका से कम नहीं होगा.

प्रस्तुत आलेख इसी परिघटना की पड़ताल करता है .)

( मुंबई के एक रेस्तरां का दृश्य, फोटो आभार REUTERS)

 

“History teaches, but it has no pupils.”

Antonio Gramsci, (१)

क भारतीय प्रकाशक को इस मसले पर वर्ष 2018 में आलोचना का शिकार होना पड़ा जब बच्चों के लिए तैयार की गयी एक किताब जिसका फोकस विश्व के नेताओं पर था ‘जिन्होंने अपने मुल्क और अपनी जनता की बेहतरी के लिए जिंदगी दी’ उसमें हिटलर को भी उसने शामिल किया.

जानकार लोग बता सकते हैं कि ऐसी घटनाएँ- कम-से-कम यहां अपवाद नहीं हैं. अपनी मौत के लगभग 75 साल बाद हिटलर भारत में बार-बार ‘नमूदार’ होता रहता है.

एक स्पैनिश फिल्म निर्माता अल्फ्रेडो डे ब्रागान्जा- जो एक स्वतंत्र फिल्म निर्माता रहे हैं- और जिन्होंने कुछ साल पहले भारत में रह कर काम किया था, उन्होंने भारत में हिटलर की अलग किस्म की ‘मौजूदगी’ को लेकर एक फोटो निबंध तैयार किया था जिसमें बहुत कम लिखित सामग्री थी. वह हिटलर की उपस्थिति को लेकर इस कदर विचलित थे कि अपने इस निबंध की शुरूआत में उन्होंने पूछ ही डाला:

‘भारत हिटलर-प्रेम के गिरफ्त में है. हालांकि आबादी का बड़ा हिस्सा यह नहीं जानता कि आखिर ऐसा क्यों हैं, वे अपने निजी एवं पेशागत चिन्ताओं से परे सोचना भी नहीं चाहते कि क्यों भारत हिटलर से प्रेम करता है? क्या किसी लॉबी का हित इसके पीछे है.’ (2)

आज भारत में आलम यह है कि  यहूदी विरोधी हिटलर की चर्चित रचना ‘माईन काम्फ’ (मेरा संघर्ष) को आप किसी किताब की दुकान में ‘डायरी ऑफ़ एन फ्रांक- जो उस यहूदी लड़की की आत्मकथा है जो खुद हिटलर की यहूदी विरोध की नीतियों का शिकार हुई थी, के बगल में देख सकते हैं.

हिटलर ने भारतीयों के बारे में काफी अपमानजनक टिप्पणियां की थीं और उसने भारत की आज़ादी के संग्राम का कतई समर्थन नहीं किया था. ‘डिअर हिटलर’ इस फिल्म पर- जिसमें यह दावा किया गया था कि ‘हिटलर भारत का दोस्त रहा है’ अपनी प्रतिक्रिया देते हुए एक लेखक ने हिटलर के चित्रांकन पर आश्चर्य प्रकट करते हुए तथा निराशा जताते हुए लिखा था :

“हिटलर ने कभी भी भारतीय स्वशासन की हिमायत नहीं की. उसने ब्रिटिश राजनेताओं को सलाह दी कि गांधी और आज़ादी के आन्दोलन के सैकड़ों नेताओं को वह गोली से उड़ा दे. बार-बार उसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के प्रति अपना समर्थन दोहराया. वह यही सोचता था कि वह (ब्रिटिश शासन) उतना सख्त नहीं रहा है. ‘अगर हम भारत पर कब्जा जमा लेते हैं’ उसने कभी धमकाया था, तब भारतीय लोग ‘अंग्रेजी शासन के अच्छे दिनों को याद करते फिरेंगे.’ (3)

( Read the full article here : https://samalochan.blogspot.com/2021/02/blog-post_3.html)

When-an-Assassin-Fascinates-a People”

Behavioural psychologists say hatred and fear are two sides of the same coin. That explains the Hindu Right obsession with Gandhi and Godse.

Gandhi and Godse

Image Courtesy: India TV News

For now, the invidious project of the Hindu Mahasabha to set up a Nathuram Godse Gyan Shala in Gwalior has been shelved. Perhaps what terminated thill-conceived venture was the sheer anachronism: while the country would mark Gandhi’s 73rd death anniversary on 30 January, one section would be found singing paens to his assassin, Nathuram GodseIt would only have served to remind people of how an unarmed man was shot down on his way to prayer meeting.

This killing was Godse’s so-called contribution and, according to leaders of the Mahasabha, marked his patriotism. The same Hindu Mahasabha haalready launched “Godse workshop”, where the members exhort Indians to “strive to follow his path”. It was also instrumental in installing his statue in the city which had invited opprobrium.

The killing of Gandhi has been shown to be part of an elaborate conspiracy hatched by the higher-ups in the Hindutva supremacist forces. Remembrance of Godse would have been a reminder of the five attempts on Gandhi’s life since the mid-thirties that involved Hindutva forces. There was even a sixth attempt, according to Chunnibhai Vaidya, a Gandhian from Gujarat. Justice Jinvanlal Kapur, who was entrusted with examining the conspiracy to assassinate the Mahatma had concluded in 1969, “All these facts taken together were destructive of any theory other than the conspiracy to murder by Savarkar and his group.”

( Read the full article here)

From Neo-liberalism to Neo-fascism : Prof Prabhat Patnaik

Eminent political economist and public intellectual, Prof Prabhat Patnaik, delivered the 7th Democracy Dialogues Series lecture on ‘From Neo-Liberalism to Neo-Fascism’ organised by the New Socialist Initiative on January 24, 2021, 6 PM IST

Facebook : facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Abstract:

FROM NEO-LIBERALISM TO NEO-FASCISM

There has of late been a sudden and rapid growth of neo-fascism all over the world. The neo-fascists are not yet in a position to capture power in many countries; and even where they do, they are not yet in a position to make the transition to a fascist State. But they contribute everywhere towards a fascification of the society and the polity. This emergence of neo-fascism is the culmination of the global pursuit of the neo-liberal trajectory, which greatly widened income and wealth inequalities in every country and led even to an absolute immiserization of vast masses of the working people in third world countries like India. For a while the hope was entertained that the people would become better off in due course as rapid growth continued. But with the onset of the global economic crisis, itself a result of the widened economic inequalities, such hopes have been belied. The corporate-financial oligarchy therefore has to find a new prop for itself and forms an alliance with neo-fascist elements to shift the discourse away from conditions of material life towards vilifying the “other”, typically a hapless religious and ethnic minority.

Mohan Bhagwat’s Divisive Mantra on Automatic Patriotism

It is a mischievous denigration of constitutional principles and values which declare every human equal and bar discrimination.

Mohan Bhagwat

“A Hindu is an automatic patriot and can never be an anti-national.” Remember the line? It is of Mohan Bhagwat, the Sangh supremo, who was at his best last week, at the launch of the book, Making of a Hindu Patriot: Background of Gandhiji’s Hind Swaraj. The book on Gandhi’s journey from Porbandar in Gujarat to England and South Africa and back to India, by JK Bajaj and MD Srinivas, was released by the Centre for Policy Studies.

In this book is the controversial claim that during 1893-94, Gandhi was pressurised to change his religion by both his Muslim employer and Christian colleagues in South Africa, which he refused. And by 1905, the book says, he became a devout Hindu.

Sure, everybody has a right to express their views, the authors and Mohan Bhagwat included, but the veracity of their claim still needs to be tested. As for the alleged pressure on Gandhi, the claim seems to come from out of the blue, and I would take it with a pinch of salt.

(Read the full article here )

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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मौजूदा किसान आन्दोलन पर वक्तव्य : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha

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किसानों के इस आन्दोलन को उसके तात्कालिक उद्देश्यों और सम्भावनाओं मात्र के सन्दर्भ में देखें तो भी यह ऐतिहासिक है. अपनी अंतिम और सम्भावित सफलता से स्वतन्त्र इसकी उपलब्धियाँ अभी ही ऐतिहासिक महत्त्व की साबित हो चुकी हैं. लेकिन इस आन्दोलन के अर्थ और इसकी सम्भावनायें और भी बड़ी हैं. भारत की दुर्दशा के इस घोर अँधेरे में, जहाँ अधिनायकवादी फ़ासिस्ट शक्तियों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की सम्भावनााओं को एक के बाद एक कुचल दिया जाता रहा है, यह आन्दोलन एक मशाल बनकर सामने आया है. किसानों से शुरू होकर यह आन्दोलन सिर्फ़ किसानों का नहीं रह गया  है. पंजाब और हरियाणा के किसानों के द्वारा दिल्ली को घेरने से शुरू हुई यह मुहिम अब दिल्ली की सत्ता को घेरने वाली चौतरफ़ा मुहिम का रूप लेती जा रही है. हम किसानों के इस आन्दोलन को सर्वप्रथम इसलिए समर्थन देते हैं और उसमें इस लिये शामिल हैं कि उनकी माँगें जायज़ हैं और इस सरकार द्वारा ज़बरदस्ती लाये गये तीनों क़ानूनों को लेकर उनकी आशंकायें वास्तविक हैं. और हम इस आन्दोलन को इसलिये सलाम करते हैं और इससे प्रेरणा लेते हैं कि यह अँधेरे में रौशनी की मशाल बनकर सामने आया है.

 अगर हम आंदोलन की तात्कालिक माँगों और उद्देश्यों की विस्तृत चर्चा यहाँ नहीं करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि इनके जायज़ और ऐतिहासिक महत्त्व के होने में हमें कोई संदेह है. अब यह जगज़ाहिर है कि ये तीनों क़ानून उस शैतानी योजना का हिस्सा हैं जिसके तहत कृषि क्षेत्र को कारपोरेट पूँजी के प्रत्यक्ष आधिपत्य में ले जाने की तैयारी है. यह न केवल किसानों की रही-सही आर्थिक सुरक्षा को समाप्त करेगा, सरकार को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त करेगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा राज्य-संचालित मंडियों की व्यवस्था को तोड़ देगा, बल्कि यह पूरे देश की आम जनता की खाद्य-सुरक्षा – जितनी भी है और जैसी भी है – को ख़तरे में डाल देगा. साथ ही ये क़ानून भारत के संघीय ढाँचे के विरुद्ध भी हैं, और केन्द्र द्वारा राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण हैं. यह सब आप सभी को मालूम है और इन कारणों से ही इस आंदोलन का सूत्रपात हुआ है.

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Pandemic Lowers India’s Level of Democracy

THIS GOVERNMENT HAS STIGMATISED THE VERY IDEA OF PROTEST, YET IT IS STRUGGLING TO MANAGE THE MASS UPSURGE AGAINST THE FARM LAWS.

Parliament Closed

For nearly a month, lakhs of farmers have staged sit-ins on various points along the border shared by the national capital and neighbouring states. Their peaceful movement, which is drawing support from farmers across the country, is meant to persuade the government to repeal the farm-related laws that it pushed through Parliament in September.

The farmers have refused to accept the government’s claim that the new laws would benefit them. They insist that these laws would dismantle state procurement and open up agriculture to contract farming, which would only help big corporations. They have also been insisting that corporations will amass essential food commodities and manipulate stocks and prices, for the government has also revoked stocking limits.

The three laws were initially introduced as ordinances this summer while the Covid-19 pandemic was raging and the country was still segregated into red, green and amber zones. Thereafter, they were passed in Parliament without discussion or debate. The manner of their introduction—rather, imposition—threw all democratic norms to the winds and so farmers see no reason to trust the intention behind them either.

Farmers do not look forward to a time when large retail chains would dictate terms and impose conditions on them. They rightly say that these laws would usher in an attack on the right to food security of working people and escalate food prices, which would hurt all consumers.

The immediate response of the government to the concerns of farmers was to repress and distort their movement. Not a day has passed without fresh abuse hurled at them. Starting from “Khalistani” to “Urban Naxal” to “anti-national” to “fake farmers”, every trick in the book has been tried to stigmatise them. Nor have the authorities made serious efforts to stop those who are maligning this historic peaceful protest.

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Farm Laws, Farmer Protests and Agrarian Crisis : Dr Jaya mehta

 

Dr Jaya Mehta, economist and activist, has been associated with the Joshi-Adhikari Institute of Social Studies, author of many books who coordinated an all India study of the Agrarian Crisis delivered a special lecture on ‘Farm Laws, Farmer Protests and Agrarian Crisis’ on 27 th December 2020.
Abstract of talk :
The reforms in agricultural marketing contained in the three farm laws were first announced by the finance minister on 15th May 2020 as Prime Minister’s relief package for the people. When Covid and lock-down had created crisis in the entire economy, migrant workers were walking hundreds of kilometers to reach home and the majority of households desperately needed state support and protection, the Modi government chose to withdraw state intervention and deregulate market forces in agriculture to leave people in complete disarray. After the controversial monsoon session of parliament, the reforms to deregulate market became laws.

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Fascism, Democracy and the Left : Com Dipankar Bhattacharya

 

The 6th lecture in the Democracy Dialogues series organized by the New Socialist Initiative was delivered by Com Dipankar Bhattacharya, General Secretary of CPI (ML) Liberation on 20 th December 6 pm (IST) where he spoke on ‘Fascism, Democracy and the Left’

Abstract  : ‘Fascism, Democracy, and the Left’

With the rise of the Modi government, BJP has managed to establish a vicious grip on Indian polity. Parliamentary democracy and the constitutional vision of a secular democratic Indian republic have come under fierce attack. Instead of remaining busy with studying historical parallels we should treat the present phase as the rise of the Indian model of fascism and resist it with all our might. While we can locate the present Indian developments in the context of global economic and political trends in the post-Soviet world, there are strong roots in Indian history and society. One should revisit Ambedkar and the warnings he had issued right at the time of adoption of India’s Constitution.
The Left vision and role in politics has been historically identified with ideas and experiments of building socialism, but the challenge for socialism to offer a superior model of democracy has remained fatally neglected. In the face of a fascist offensive, the Left in India must emerge and assert as the most consistent and reliable champion of democracy.

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From the Electron to the Higgs- The Long Twentieth Century of Particle Physics – :Dr Ravi Sinha

Guest Post by Dr Ravi Sinha

 

 

 

 

 

 

 

 

 

The 9th lecture (in Hindi) in the Umang Library popular science series will happen this Sunday, December 13, at 5 PM IST. The series is aimed at creating awareness about science in the Hindi belt of India.

Abstract : From the Electron to the Higgs: The Long Twentieth Century of Particle Physics

In 1897 J J Thomson discovered the electron with a Cathode Ray Tube that could fit on a small table in his Cavendish Laboratory. In 2012 the Higgs particle was discovered at the Large Hadron Collider which is the largest scientific instrument ever built (it is a particle accelerator that sits in a tunnel 27 kilometres in circumference and required billions of dollars to build). If the 1897 discovery inaugurated particle physics, the 2012 one was the culmination of the chain of stunning discoveries of new particles spread across these 115 years. In this lecture we will tell the story of the major landmarks of this long century of particle physics which include discoveries of the proton, of anti-particles and of quarks. This is the epic story of the eternal quest of humankind for the most fundamental laws of Nature and the most fundamental constituents of matter. Like all the lectures in this series this lecture too will be accessible to high school students and to curious lay persons. Continue reading From the Electron to the Higgs- The Long Twentieth Century of Particle Physics – :Dr Ravi Sinha

किसान आंदोलन की माँगों और 8 तारीख के भारत बंद के समर्थन में जारी बयान

( न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिवदलित लेखक संघअखिल भारतीय दलित लेखिका मंचप्रगतिशील लेखक संघजन संस्कृति मंचइप्टासंगवारीप्रतिरोध का सिनेमा और जनवादी लेखक संघ द्वारा किसान आंदोलन की माँगों और  तारीख के भारत बंद के समर्थन में जारी बयान  )

Image : Courtesy Reuters

तीन जनद्रोही कृषि-क़ानूनों के खिलाफ़ किसानों के ऐतिहासिक आन्दोलन का साथ दें!

केन्द्र सरकार के कार्पोरेटपरस्त एजेण्डा के विरोध में अपनी आवाज़ बुलन्द करें!

दिसम्बर के भारत बंद को सफल बनाएं!

 भारत का किसान – जिसके संघर्षों और कुर्बानियों का एक लम्बा इतिहास रहा है – आज एक ऐतिहासिक मुक़ाम पर खड़ा है।

हज़ारों-लाखों की तादाद में उसके नुमाइन्दे राजधानी दिल्ली की विभिन्न सरहदों पर धरना दिए हुए हैं और उन तीन जनद्रोही क़ानूनों की वापसी की मांग कर रहे हैं जिनके ज़रिए इस हुकूमत ने एक तरह से उनकी तबाही और बरबादी के वॉरंट पर दस्तख़त किए हैं। अपनी आवाज़ को और बुलंद करने के लिए किसान संगठनों की तरफ़ से 8 दिसम्बर को भारत बंद का ऐलान किया गया है।

सरकार भले ही यह दावा करे कि ये तीनों क़ानून – जिन्हें महामारी के दिनों में पहले अध्यादेश के ज़रिए लागू किया गया था और फिर तमाम जनतांत्रिक परंपराओं को ताक़ पर रखते हुए संसद में पास किया गया – किसानों की भलाई के लिए हैं, लेकिन यह बात बहुत साफ़ हो चुकी है कि इनके ज़रिए राज्य द्वारा अनाज की खरीद की प्रणाली को समाप्त करने और इस तरह बड़े कॉर्पोरेट घरानों के लिए ठेका आधारित खेती करने तथा आवश्यक खाद्य सामग्री की बड़ी मात्रा में जमाखोरी करने की राह हमवार की जा रही है।

लोगों के सामने यह भी साफ़ है कि यह महज़ किसानों का सवाल नहीं बल्कि मेहनतकश अवाम के लिए अनाज की असुरक्षा का सवाल भी है। अकारण नहीं कि किसानों के इस अभूतपूर्व आन्दोलन के साथ खेतमज़दूरों, औद्योगिक मज़दूरों के संगठनों तथा नागरिक समाज के तमाम लोगों, संगठनों ने अपनी एकजुटता प्रदर्शित की है।

 जनतंत्र और संवाद हमेशा साथ चलते हैं। लेकिन आज यह दिख रहा है कि मौजूदा निज़ाम की ओर से जिस ‘न्यू इंडिया’ के आगमन की बात की जा रही है, उसके तहत जनतंत्र के नाम पर अधिनायकवाद की स्थापना का खुला खेल चल रहा है।

आज की तारीख में सरकार किसान संगठनों के साथ वार्ता करने के लिए मजबूर हुई है, मगर इसे असंभव करने की हर मुमकिन कोशिश सरकार की तरफ़ से अब तक की जाती रही है। उन पर लाठियां बरसायी गयीं, उनके रास्ते में तमाम बाधाएं खड़ी की गयी, यहां तक कि सड़कें भी काटी गयीं। यह किसानों का अपना साहस और अपनी जीजीविषा ही थी कि उन्होंने इन कोशिशों को नाकाम किया और अपने शांतिपूर्ण संघर्ष के काफ़िलों को लेकर राजधानी की सरहदों तक पहुंच गए।

किसानों के इस आन्दोलन के प्रति मुख्यधारा के मीडिया का रवैया कम विवादास्पद नहीं रहा। न केवल उसने आन्दोलन के वाजिब मुद्दों को लेकर चुप्पी साधे रखी बल्कि सरकार तथा उसकी सहमना दक्षिणपंथी ताक़तों द्वारा आन्दोलन को बदनाम करने की तमाम कोशिशों का भी जम कर साथ दिया। आंदोलन को विरोधी राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रायोजित बताया गया, किसानों को खालिस्तान समर्थक तक बताया गया।

दरअसल, विगत कुछ सालों यही सिलसिला आम हो चला है। हर वह आवाज़ जो सरकारी नीतियों का विरोध करती हो – भले ही वह नागरिकता क़ानून हो, सांप्रदायिक दंगे हों, नोटबंदी हो – उसे बदनाम करने और उसका विकृतिकरण करने की साज़िशें रची गयीं। किसानों का आंदोलन भी इससे अछूता नहीं है।

यह सकारात्मक है कि इन तमाम बाधाओं के बावजूद किसान शांतिपूर्ण संघर्ष की अपनी राह पर डटे हैं।

हम सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन किसानों के इस अभूतपूर्व आन्दोलन के प्रति अपनी एकजुटता प्रगट करते हैं। हम जनता तथा जनता के संगठनों, पार्टियों से अपील करते हैं कि वे इस आन्दोलन के साथ जुड़ें और 8 दिसम्बर के भारत बंद को सफल बनाकर केंद्र सरकार को एक स्पष्ट संदेश दें।

हम सरकार से यह मांग करते हैं कि वह अपना अड़ियल रवैया छोड़े और तीन जनद्रोही कृषि-क़ानूनों को रद्द करने का ऐलान करे।

 हम आंदोलनरत किसानों से भी अपील करते हैं कि वे शांति के अपने रास्ते पर अडिग रहें।

जीत न्याय की होगी ! जीत सत्य की होगी !! जीत हमारी होगी !!

न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिव   दलित लेखक संघ   अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच   प्रगतिशील लेखक संघ   जन संस्कृति मंच   इप्टा   संगवारी   प्रतिरोध का सिनेमा   जनवादी लेखक संघ

जेल और थानों में सीसीटीवी: क्या इससे पुलिस ज़्यादतियों पर अंकुश लग सकता है?

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य एवं जिला स्तरों पर ऐसी निगरानी कमेटियों का भी निर्माण किया जाए तथा ऐसे कैमरों को स्थापित करने की दिशा में तेजी लायी जाए।

सीसीटीवी

सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका के संदर्भ में पिछले दिनों एक अहम फैसला दिया। इसके तहत उसने तमाम राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वह हर थाने में क्लोजड सर्किट टीवी (सीसीटीवी), जिसमें आवाज़ रिकॉर्डिंग की भी सुविधा हो तथा रात में ‘देखने’ की व्यवस्था हो, जल्द से जल्द स्थापित करे। अदालत की इस त्रिसदस्यीय पीठ ने – जिसमें न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति के एम जोसेफ और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस भी शामिल थे – अपने आदेश में यह भी जोड़ा कि ऐसी सुविधा केन्द्रीय एजेंसियों के दफ्तरों में भी स्थापित की जानी चाहिए फिर चाहे सीबीआई हो, नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) हो या नारकोटिक्स कन्टोल ब्यूरो (एनसीबी) हो या एनफोर्समेण्ट डायरेक्टोरेट हो।

भारत जैसे मुल्क में पुलिस बलों या अन्य केन्द्रीय एजेंसियों के दस्तों द्वारा की जाने वाली प्रताड़ना एवं यातनाओं से अक्सर ही रूबरू होना पड़ता है। आप तमिलनाडु के थोडकुडी जिले में पिता पुत्रों- जयराज उम्र 62 वर्ष और बेंडक्स उम्र 32 साल – की हिरासत में मौत के प्रसंग को देखें, जब दोषी पुलिसकर्मियों की संलिप्तता को साबित करने के लिए जन आंदोलन करना पड़ा था। जून, 2020 या आप कुछ वक्त़ पहले राजधानी दिल्ली से ही आर्म्स एक्ट के तहत बंद विचाराधीन कैदी की पुलिस द्वारा निर्वस्त्र कर की गयी पिटाई का दृश्य चर्चित हुआ था जब किसी न कैमरे में उपरोक्त नज़ारा कैद कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया था।

त्रिसदस्यीय पीठ का मानना था कि चाहे मानवाधिकार आयोग हो या मुल्क की अदालतें हो, वह किसी विवाद की स्थिति में इस सीसीटीवी फुटेज का इस्तेमाल कर सकती हैं, जहां हिरासत में बंद लोगों के मानवाधिकारों के हनन की अक्सर शिकायतें आती रहती हैं और जनाक्रोश भी सड़कों पर उतरता रहता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य एवं जिला स्तरों पर ऐसी निगरानी कमेटियों का भी निर्माण किया जाए तथा ऐसे कैमरों को स्थापित करने की दिशा में तेजी लायी जाए।

गौरतलब है कि जहां तक थानो में सीसीटीवी लगाने का सवाल है, देश के अन्य न्यायालय भी इस किस्म का निर्देश पहले दे चुके हैं।

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The Spectre of Evil…The world Since 1989 : Kumar Ketkar

 

The fifth lecture in the ‘Democracy Dialogues Series’ organised by New Socialist Initiative was delivered by Kumar Ketkar, Member of Parliament, Rajya Sabha at 6 PM (IST) on Sunday, 6 th December

Theme : The Spectre of Evil…The world Since 1989

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How Can India Reinvigorate Phule’s Revolutionary Legacy ?

Remembering a colossus in the times of Hindutva.

Jyotirao phule.

Who will reinvigorate Phule’s legacy? This question stares us in the eye on 28 November, the 130th death anniversary of Jyotirao Phule, considered the “father of social revolution in India”. Phule largely remains relegated to the background—a result of selective amnesia and identity politics in modern India, where his path-breaking contributions, and those of his wife Savitribai and her fellow traveller Fatima Sheikh are rarely remembered.

They are credited with opening the first school for girls from the historically “untouchable” communities in Pune, which was once ruled by the Peshwas. This school created an upheaval in the Brahmin-dominated Maharashtra of yore, as a 14-year-old Muktabai, belonging to the formerly “untouchable” Mang caste, who studied in the school, wrote: “O learned Pandits, wind up the selfish prattle of your hollow wisdom and listen to what I say.” The student’s essay was published in 1855 in Dnyanodaya, a journal popular then. (From Women Writing in India, Edited by Susie Tharu and K Lalitha, Pandora.)

Jyotirao Phule was given the honorific of “Mahatma” a few years before he breathed his last in 1890, for a life spent engaging in tremendous innovation and creativity. He initiated his wife into writing and she later became an independent activist too—a rarity in those days. He opened the doors of his home for those considered the lowliest among the low. He came to the defence of scholar-activists, such as Pandita Rambai, when she embraced Christianity. So he fought against the conservative onslaught single-handedly. Many such instances in his life are worth emulating today.

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इस्लामिस्ट एवं हिन्दुत्ववादी: कब तक चलेगी यह जुगलबंदी!

आखिर इस्लामिस्ट क्यों खुश हैं नागरिकता संशोधन अधिनियम से

not in my name

प्रतीकात्मक तस्वीर। 

विजयादशमी के दिन सरसंघचालक की तकरीर आम तौर पर आने वाले समय का संकेत प्रदान करती है।

विश्लेषक उस व्याख्यान की पड़ताल करके इस बात का अंदाज़ा लगाते हैं कि दिल्ली में सत्तासीन संघ के आनुषंगिक संगठन भाजपा की आगामी योजना क्या होगी।

विगत माह विजयादशमी के दिन संघ सुप्रीमो के व्याख्यान का फोकस नागरिता संशोधन अधिनियम पर था, जिसमें उन्होंने यह दावा किया कि यह अधिनियम किसी भी ‘धार्मिक समुदाय’ के साथ भेदभाव नहीं करता है और मुसलमानों को एक छद्म प्रचार से गुमराह किया गया है। उनके मुताबिक संसद में यह कानून संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करके पारित हुआ है, एक तरह से सरहद पार के उन भाइयों एवं बहनों को सुरक्षा प्रदान करता है, जिन्हें वहां धार्मिक प्रताडना झेलनी पड़ती है।

मालूम हो कि उन दिनों चूंकि बिहार चुनावों की सरगर्मियां बनी हुई थीं, लिहाजा उनके वक्तव्यों से निकले संकेतों पर अधिक बात नहीं हो सकी।

गौरतलब है कि बंगाल के चुनावों के मद्देनज़र भाजपा के कुछ अग्रणी नेताओं ने भी इसी किस्म की बातें शुरू कर दी हैं। मालूम हो कई बार अपनी आम सभाओं में उनके कई अग्रणी, ‘दीमक’ की तरह ऐसे ‘अवांछितों’ को हटाने की बात पहले ही कर चुके हैं।

प्रश्न यह है कि क्या कोविड काल में इस सम्बन्ध में नियम बनाने का जो सिलसिला छोड़ दिया गया था क्या उसी मार्ग पर सरकार चलने वाली है और इसे लागू किया जाने वाला है या यह सिर्फ चुनावी सरगर्मी बनाए रखने का मामला है।

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Jawaharlal Nehru and the Current Challenge to the Idea of India : Prof aditya mukherjee

 

 

 

The fourth lecture in the Democracy Dialogues series organised by New Socialist Initiative was  delivered by eminent scholar Prof Aditya Mukherjee, Centre for Historical Studies, JNU who is also editor of the ‘Sage Series in Modern Indian History’

Theme :
Jawaharlal Nehru and the Current Challenge to the Idea of India
Sunday, November 15, 2020
Facebook.Com / newsocialistinitiative.nsi
Abstract :

In this talk I will look at how Jawaharlal Nehru tried to implement the vision of our national liberation struggle, which was reflected in our Constitution.  Critical elements of this vision were the creation  of a sovereign, secular, inclusive, democratic and pro-poor state. There was a consensus among the entire  Nationalist spectrum, from the Left to the Right on all these elements. While there was a consensus on the “pro-poor” aspect, from the early nationalists to Gandhiji to socialists and communists, there was no consensus on the idea of socialism, though a large and growing section was moving towards that objective. (The communalists and other loyalists who claimed to represent sectional interests, naturally did not share any aspect of this vision).

I will seek to outline how Nehru undertook the stupendous and in many respects historically unique task of creating a modern democratic nation state in a plural society, left deeply divided through the active collusion of the colonial state; of promoting modern industrialization within the parameters of democracy and sovereignty in a backward and colonially structured economy; of finding the balance between growth and equity in an impoverished, famine-ridden country; of empowering the people and yet expecting them to tighten their belt for the sake of the nation as a whole; of promoting the highest level of scientific education, a field left barren by colonialism; in short, of un-structuring colonialism and bringing in rapid economic development but doing it consensually, without the use of force, keeping what has been called the “Nehruvian consensus” intact in the critical formative years of the nation. I will also briefly discuss Nehru, who was deeply influenced by Marxism, tried to creatively move towards the socialist objective without compromising on the non-negotiable principle of democracy; though with limited success because of  a variety of reasons.

I shall end with reminding ourselves that, in these days of trying to erase Nehru’s memory altogether or to remember him in an unrecognisable demonised image created though false propaganda, much can be learnt from the legacy left behind by Nehru’s ideas and practice by those who wish to struggle to meet the current challenges to all the pillars of the Idea of India.
Sun, 15 Nov at 06:00 GMT+05:30
[https://www.youtube.com/playlist?list=PLtXBfoS5KZ78UFI_aYzROjUss8ZzhUKxy
This is the link of the playlist where you can find all the democracy dialogues video.]