All posts by subhash gatade

हिंदी प्रदेश : प्रगतिशीलता की विरासत – प्रोफेसर बजरंग तिवारी

संधान व्याख्यानमाला : नववां वक्तव्य 

विषय :  हिंदी प्रदेश : प्रगतिशीलता की विरासत

वक्ता : प्रोफेसर बजरंग तिवारी  ,प्रख्यात आलोचक, लेखक, प्रोफेसर ,हिंदी विभाग देशबंधु कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय 
रविवार , 12 फरवरी  , शाम 6 बजे   
आयोजक :न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव ( हिंदी प्रदेश )

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/89648895027?pwd=TEQ0TkpwN29WYXpEd0Y5SzN6azZ3Zz09

Meeting ID: 896 4889 5027
Passcode: 819453

फेसबुक लाइव : www.facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

आयोजक : न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव ( हिंदी प्रदेश ) 

विषय : हिंदी प्रदेश : प्रगतिशीलता की विरासत

इस व्याख्यान में निम्न पहलुओं को समेटने की कोशिश रहेगी –

अर्वाचीन बोध क्या है? हिंदी प्रदेश में इसकी बुनियाद को कैसे समझें ? छठी से ग्यारहवीं शताब्दी का दौर।

भक्ति आंदोलन के दौर में क्या बदलाव हुए ? कला और साहित्य में दरबारीपन को कैसे समझें ?

स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्य और साहित्यकारों की क्या भूमिका रही? अपने विगत से इस आंदोलन ने क्या ग्रहण किया ?

प्रगतिवाद ने हिंदी-उर्दू-संस्कृत साहित्य को कैसे प्रभावित किया ? प्रगतिवाद के आरंभिक चरण में क्या मुद्दे रहे ?

अस्मितामूलक साहित्य के उभार को कैसे समझें? दलित साहित्य की विकासयात्रा का हाल-मुकाम क्या है ?

Democracy’s Structural Slippages and the Indian Experiment – Prof Harbans Mukhia

Professor Harbans Mukhia, Professor ( Retd.) of Medieval History at the Centre for Historical Studies, JNU ; an eminent authority on  Medieval India ; author and editor of many books will be delivering the 22 nd Democracy Dialogues lecture on Sunday, 15 th January 2023 at 6 PM (IST). The focus of his lecture will be Democracy’s Structural Slippages and the Indian Experiment

Join Zoom Meeting

https://us02web.zoom.us/j/85949863412?pwd=SGpqUXRKTXRZVGVQeHdCSXhQTXJKQT09

Meeting ID: 859 4986 3412

Passcode: 938487

The lecture will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Continue reading Democracy’s Structural Slippages and the Indian Experiment – Prof Harbans Mukhia

भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना : गौहर रज़ा

The next lecture ( 8 th one) in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series initiated by New Socialist Initiative ( Hindi Pradesh) will be delivered by Gauhar Raza, Former Chief Scientist, Council of Scientific and Industrial Research, Documentary Filmmaker on Social Issues, Civil Rights Activist and a  Poet 

He will be speaking on ‘Indian Identity, Freedom Movement and Scientific Temper’ ( भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना) on Saturday, 10 th December, 2022  6 PM ( IST). 

Time: Dec 10, 2022 06:00 PM India

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/82717708928?pwd=SW1qMnRaVVpWbHVzZjdJb3lZK2dwUT09

Meeting ID: 827 1770 8928
Passcode: 101822

The lecture will also be live streamed on www.facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

——————–

संधान व्याख्यानमाला : आठवां वक्तव्य 

विषय :  भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना

वक्ता :  गौहर रज़ा , पूर्व मुख्य वैज्ञानिक , कौन्सिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च , डॉक्युमेंटरी  फिल्म निर्माता , सामाजिक कार्यकर्ता और कवि  

शनिवार , 10  दिसंबर , शाम 6 बजे   
आयोजक :न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव ( हिंदी प्रदेश )

आयोजक : न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव ( हिंदी प्रदेश ) 

विषय : ‘ भारतीयता, स्वाधीनता आंदोलन और वैज्ञानिक चेतना

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश के सामने दो बड़े सवाल रखे थे, पहला था ‘वैज्ञानिक चेतना’ का और दूसरा था ‘भारत माता कौन है’ यानी हमारी भारतीय पहचान का क्या अर्थ है.  इन दोनों सवालों पर आज फिर एक बार नज़र डालने की जरूरत है. आज एक तरफ़ तो  वैज्ञानिक चेतना पर बड़ा हमला है और दूसरी तरफ़ ‘सामूहिक भारतीय पहचान’ को बदलने की व्यापक कोशिश ने सामाजिक ढांचे को छिन्न भिन्न करने का ख़तरा खड़ा कर दिया है. 

ये व्याख्यान जंग-ए-आज़ादी के दौरान ब्रिटिश राज्य के दमन के ख़िलाफ़ गाढ़ी गयी ‘हिंदुस्तानी पहचान’ से जुड़े कुछ सवालों पर नज़र डालने की कोशिश करेगा. इस पहचान का गारा वैज्ञानिक चेतना से तैयार किया गया था, पर ये भी याद रखना चाहिए कि देश में वैज्ञानिक चेतना के खिलाफ़ शक्तियां हमेशा ही सक्रिय रही हैं, खास तौर से हिंदी पट्टी में. 2014 के बाद से इन शक्तियों की ताक़त बढ़ी है और साथ ही वैज्ञानिक चेतना और भारतीय पहचान पर हमले भी. 

बसु, रमण और सलाम की धरती पर वैज्ञानिक मिज़ाज की अनुपस्थिति पर कुछ बातें : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha

मैं वाशिंग्टन डी सी के इंडियन डाइस्पोरा’ को और रज़ी साहब का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा कि उन्होंने चंद बातें रखने का मौका दिया। यह मेरे लिए बेहद सम्मान की बात है कि मैं दो शख्सियतों के साथ – गौहर रज़ा और परवेज़ हुदभाॅय के साथ – आनलाइन ही सही – मंच साझा कर रहा हूं। मैं इस बात को लेकर चिंतित था कि रज़ी साहब वक्त़ के बेेहद पाबंद हैंइसलिए मैंने तय किया कि जो बातें मुझे कहनी हैंमैं लिख लेता हूँ। लेकिन इससे दिक्कत यह पैदा हुई कि इसे लिखते वक्त़ मुझे इस बात का एहसास नहीं था कि गौहर और परवेज़ क्या बात करेंगे। मुमकिन है कि मैं जो बातें रख रहा हूं वे इसके पहले कही गयी बातों के चलते अनावश्यक /व्यर्थ लगें या आयोजकों के या अन्य दो वक्ताओं के सरोकारों से महज छूती दिखाई दें। )



मेरे लिए यह बेहतर होगा कि मैं शुरूआत में ही कुछ प्रारंभिक क़िस्म की बातों पर अपनी राय ज़ाहिर कर दूँ। चर्चा के शीर्षक के तौर पर बसु, रमण और सलाम की धरती का हवाला दिया गया है, जिससे यह धारणा भी बन सकती है कि वैज्ञानिक के वैज्ञानिक मिज़ाज (Scientific Temper) से लैस होने की गारंटी है। साथ ही वह इतना प्रभावशाली भी होगा कि आम समाज पर भी अपनी छाप छोड़ सकेगा। एक आदर्श दुनिया में, शायद, यही होना चाहिए। लेकिन वैज्ञानिक भी आदर्श दुनिया में नहीं रहते।

आप सर आइज़क न्यूटन का उदाहरण देखें, जो आज भी विज्ञान के सबसे महान प्रतिमूर्ति (Icon) समझे जाते हैं, जिनकी प्रतिभा ने वैज्ञानिक क्रांति पर अपनी अंतिम और आधिकारिक मुहर लगा दी। कैम्ब्रिज में उन दिनों फैली प्लेग की महामारी से बचने के लिए भागकर अपने गाँव पहुँचे इस एकाकी युवा प्रतिभा ने अपने अकेले दम पर आधुनिक विज्ञान की नींव डाल दी। 1665-1666 के अपने चमत्कारी वर्षों के महज 18 महीनों में उन्होंने गति के नियमों को तथा गुरुत्वाकर्षण के नियमों को सूत्रबद्ध किया। इन्हीं महीनों में उन्होंने कैलकुलस (Calculus) की खोज की। लेकिन इसके बाद उन्होंने अपनी लंबी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा कीमियागरी में तथा बाईबिल के अर्थापन की  धर्मशास्त्राीय विवेचना में लगाया। उन्होंने ऐसे विचारों की भी भर्त्सना  की (जैसे कि त्रिदेववाद -Trinitarianism), जो उनके मुताबिक ईसाई मत के प्रदूषण के प्रतीक थे, और एरियनवाद (Arianism) के अत्यधिक रैडिकल शुद्धतावादी संस्करण को अपनाया, जो मानता था कि बाइबिल भविष्य की बिल्कुल सटीक भविष्यवाणी है। न्यूटन के अंदर कुछ भी सामान्य अनुपात का नहीं था – न ही उनकी वैज्ञानिक प्रतिभा न ही उनका सख्त जडसूत्रवाद और आत्मविश्वास से भरपूर अंधश्रद्धा।

अगर आप यह समझ रहे हों कि मैं न्यूटन के प्रति अन्याय कर रहा हूं – आखिर वह भी तो अपने वक्त़ की ही पैदाइश हो सकते थे – तो एक तरह से मैं जिस प्रस्थापना की ओर उन्मुख हूँ उसे आप अभी ही स्वीकार करने की दिशा में हैं। लेकिन इसके पहले कि मैं विज्ञान और वैज्ञानिक मिज़ाज के अंतर्सम्बन्ध की पड़ताल करूँ, हाल के समय के कुछ अन्य उदाहरणों पर ग़ौर करना चाहूंगा। पास्कुअल जॉर्डन (Pascual Jordan) जो क्वाण्टम यान्त्रिकी के जन्मदाताओं में से था, एक सक्रिय नात्सी था। युद्धोत्तर जर्मनी में अपने पुनर्वास के बाद भी अपने फासीवादी विचारों पर अडिग रहा। भौतिक विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता फिलिप लेनार्ड (Philipp Lenard)और योहान स्टार्क (Johannes Stark) भी सक्रिय नात्सी थे और खुले रूप में यहूदी-विरोधी (anti semite) थे। उनके कुछ समय पहले, बीसवीं सदी के दूसरे दशक में, महान गणितज्ञ एम्मी नोदर (Emmy Noether) को गाॅटिंगन ( Gottingen ) विश्वविद्यालय के गणित विभाग में प्राध्यापक की नौकरी से वंचित किया गया था, महज इसलिए कि वह एक स्त्री थी। इस मामले से क्षुब्ध डेविड हिलबर्ट ने कहा था, ‘‘ विश्वविद्यालय में शिक्षक के तौर पर उसकी नियुक्ति के खिलाफ आखिर उसका लिंग कैसे आड़े आ सकता है। आखिर हम एक विश्वविद्यालय हैं, कोई स्नानगृह तो नहीं।’’ और मेरे एक वैज्ञानिक दोस्त ने मुझे कुछ दिन पहले ही याद दिलाया है कि खुद अपने सर सी वी रमण भी, जिनका नाम भी इस कार्यक्रम के शीर्षक में शामिल है, एक महिला प्रत्याशी को पीएचडी छात्रा के तौर पर प्रवेश देने के ख़िलाफ़ थे, क्योंकि उनके हिसाब से महिलायें वैज्ञानिक बनने के योग्य नहीं होतीं।

मैं जानेमाने वैज्ञानिकों को वैज्ञानिक मिज़ाज से लैस होने के प्रमाणपत्र दिए जाने का विरोध करने के लिये यहाँ नहीं आया हूं। मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या वैज्ञानिक मिज़ाज का अभाव विज्ञान के बेहतर ढंग से करने के रास्ते में बाधा बनता है। लगभग तीन दशक पहले परवेज़ हुदभाॅय ने एक किताब लिखी थी। किताब का शीर्षक था ‘इस्लाम एण्ड साइंस’, और उसका उपशीर्षक था ‘रिलीजियस आर्थोडाॅक्सी एण्ड द बैटल फाॅर रैशनेलिटी’ ( धार्मिक रूढिवाद और तार्किकता का संघर्ष). इस किताब में वह एक दिलचस्प उदाहरण पेश करते हैं। स्टीवन वाईनबर्ग और अब्दुस सलाम – वही सलाम जिनका नाम भी इस कार्यक्रम के शीर्षक में है – दोनों ने बीसवीं सदी के सबसे मूलभूत और महत्वपूर्ण भौतिकी सिद्वांतों में से एक का आविष्कार किया, जिसे हम युनिफाईड क्वांटम थियरी आफ इलेक्टोमैगनेटिजम एंड वीक नुक्लिअर फ़ोर्स कहते हैं। उन्होंने एक दूसरे से स्वतंत्र इस सिद्धांत का आविष्कार किया और उसके लिए नोबेल पुरस्कार साझा किया।  वाईनबर्ग एक घोषित नास्तिक थे और सलाम ने खुद स्वीकारा था कि वह आस्तिक हैं। सलाम ने परवेज़ के किताब की भूमिका लिखी थी। भूमिका में वह लेखक के इस विचार से सहमत होते हैं कि इस सिद्धांत तक पहुंचने के लिए उनके आस्तिक होने से कोई फर्क नहीं पड़ा। यह बात आप खुद आविष्कारक के मुंह से ही सुन रहे हैं। फिर विज्ञान और वैज्ञानिक मिज़ाज के बीच का रिश्ता क्या है ?

एक वैज्ञानिक महज विज्ञान पर ज़िन्दा नहीं रहता। उसके मस्तिष्क पर केवल तर्क और विज्ञान का क़ब्ज़ा नहीं होता। मैं नहीं जानता कि मस्तिष्क की तरह क्या मन के भी दो अलग अलग लेकिन एक दूसरे से जुड़े गोलार्द्ध होते हैं। लेकिन मुझे, सरल भाषा में, मन के ऐसे विभाजन का एक रूपक की तरह इस्तेमाल करने दीजिए। वैज्ञानिक चिन्तन का ताल्लुक, जैसा कि मुझे लगता है, उस प्रक्रिया से है जिसमें मन का तार्किक ‘गोलार्द्ध’ उसके भावनात्मक ‘गोलार्द्ध’ को प्रभावित करने की कोशिश करता है। इसका परिणाम एक तार्किक और सुसंस्कृत व्यक्ति के उभार में भी हो सकता है, लेकिन इसका नतीज़ा बहुत ख़राब भी निकल सकता है। तार्किक पक्ष के भावनात्मक पक्ष में ज़रूरत से ज़्यादा दखलअंदाजी करने से एक बचकाने वयस्क का भी उदय हो सकता है। ज़्यादा ख़तरनाक नतीज़े भी निकल सकते हैं – हो सकता है कोई डॉ स्ट्रेंजलव (Strangelove) जैसा शख़्स पैदा हो जाय। ( डॉ स्ट्रेंजलव नाम से एक फिल्म आयी थी, जिसमें इसी नाम का एक अधिकारी केन्द्र में है जो नाभिकीय युद्ध की शुरूआत करने का हिमायती है – अनुवादक)

वैज्ञानिक चिन्तन एक मुश्किल चीज़ है। इसमें शामिल होता है तर्कबुद्धि और संस्कृति के बीच का एक जटिल अंतरसंघर्ष। तुर्रा ये कि न तो हम तर्कबुद्धि को अच्छी तरह समझते हैं न ही संस्कृति को। कुछ लोग समझते हैं कि तार्किकता पारदर्शी होती है जबकि संस्कृति में कई अँधेरे कोने होते हैं। विरोधी पक्ष कहता है कि यह एक ग़लत तस्वीर है। वह यह दिखाने की कोशिश करता है कि तर्क की जड़ें धुँधली हैं – वह पवित्र-निर्मूल ढंग से धारण नही हुई। और वह स्वयं जागरूक नहीं है – वह नहीं जानती कि वह सत्ता की संरचनाओं से गहरे में उलझी हुई है।

कौन सा पक्ष महत्वपूर्ण है ताकि एक सफल और साथ ही साथ सार्थक जीवन जिया जा सके ? किस पक्ष को फैसला देने का हक है ? यह एक ऐसी बहस है जिसका आसानी से समाधान संभव नहीं है। इसे लेकर मज़ेदार प्रसंग भी हैं। मिसाल के तौर पर, जहां वैज्ञानिक कविता पर अपना फ़ैसला सुनाते दिखते हैं। पाॅल डिराक ( Paul Dirac ), जिन्हें 20 वीं सदी के महानतम वैज्ञानिकों में शुमार किया जाता है, उन्होंने एक बार जे आर ओपनहाइमर, जो भी एक बड़े वैज्ञानिक थे और एक बहुज्ञ-बहुप्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे, से कहा, ‘‘मैं समझ नहीं पाता कि आप भौतिकी में काम करते हैं और साथ ही साथ कविताएं भी लिखते हैं। विज्ञान मे आप उस बात को कहना चाहते है, जो पहले से कोई जानता नहीं हो, लेकिन ऐसे शब्दों में  कहना चाहते हैं जिसे सभी  समझ सकें। जब कि  कविता में आप  वही  कहते हैं जो सब पहले से ही जानते है, लेकिन ऐसे शब्दों में जिन्हें कोई समझ न सके।’’ दूसरी तरफ़, विज्ञान पर कवियों का फ़ैसला आम तौर पर अधिक स्याह होता है – वह अक्सर विज्ञान की यांत्रिकता की आलोचना करती है, या उसका ऐसे मज़ाक उड़ाती है जैसे कोई किसी वयस्क के बचपने का मज़ाक उड़ाए।

इतनी पृष्ठभूमि के बाद, मैं अब आज के विषय पर आना चाहूंगा। मैं इस बात से सहमत हूं कि वैज्ञानिक मिज़ाज उन समाजों एवं संस्कृतियों  से लगभग गायब है, जो इस उपमहाद्वीप की एक अलग क़िस्म की सभ्यता का निर्माण करते हैं। लेकिन मैं इस बात को लेकर आश्चर्यचकित नहीं हूं कि वह बसु, रमण और सलाम जैसे वैज्ञानिकों के बावजूद अनुपस्थित है। मैं इस बात पर अधिक आश्चर्यचकित हूं कि वह जवाहरलाल नेहरू जैसी शख्सियत के बावजूद अनुपस्थित है। मेरे हिसाब से, वैज्ञानिक मिज़ाज की वांछनीयता के सबसे श्रेष्ठ और सबसे समझदार हिमायती नेहरू थे। मैं ‘भारत एक खोज’ से एक उद्धरण साझा करना चाहूँगा भले ही इसमें थोड़ा वक़्त ख़र्च हो जाय :

‘‘विज्ञान सकारात्मक ज्ञान के दायरे में  व्यवहार करता है लेकिन जिस मिज़ाज  को वह निर्मित करता है, वह उस दायरे का उल्लंघन करता हैै। मनुष्य का अंतिम लक्ष्य ज्ञान हासिल करना, सत्य को पाना, अच्छाई और सुंदरता का  रसग्रहण करना  हो सकता है। वस्तुनिष्ठ खोज की वैज्ञानिक पद्धति इन सभी पर लागू नहीं होती, और जीवन में बहुत  कुछ ऐसा भी महत्वपूर्ण है, जो इसके दायरे के बाहर दिखता है – फिर वह चाहे कला और कविता के प्रति संवेदनशीलता, वह भावना जो सौंदर्य से निर्मित होती है, अच्छाई का बेहद गहराई में स्वीकार। मुमकिन है कि एक वनस्पति वैज्ञानिक और एक प्राणी वैज्ञानिक प्रक्रति का सम्मोहन और उसकीसुंदरता  का कभी अनुभव भी न करे ; संभव है एक समाजविज्ञानी मानवता के प्रति प्रेम से बिल्कुल वंचित हो। लेकिन जब हम पहाड़ों की उंचाई पर जाते हैं, जहां दर्शन का निवास होता है और उच्च कोटि की भावनाए मन में समा जाती है , या हमारे सामने खड़े विराट को अपलक हम देखते जाते हैं, उस वक्त भी  वैज्ञानिक मिज़ाज वाली  पहुँच और भावना की ज़रूरत बनी रहती है ।’’ ( अनुवादक द्वारा मूल टिप्पणी का भाषांतर)

मैं इस बात को भी जोड़ना चाहूंगा कि भारत का संविधान दुनिया का एकमात्र संविधान है जिसमें  हर नागरिक के बुनियादी कर्तव्य के तौर पर ‘‘वैज्ञानिक चिन्तन, मानवता और अनुसंधान और सुधार की भावना’’ का स्पष्ट उल्लेख है।

यह सब कुछ अत्यधिक दार्शनिक और आदर्शवादी लग सकता है। आखिर कोई इस बात का क्या प्रमाण है कि किसी समाज या किसी सभ्यता के लिए वैज्ञानिक मिज़ाज की वाकई ज़रूरत है ? मुझे लगता है कि इतिहास ने हमारे सामने एक वास्तविक मिसाल पेश की है। मैं चंद बातें उस पर भी रखना चाहूंगा।

परवेज़ की जिस किताब का मैंने अभी ज़िक्र किया है उसकी शुरूआत एक कल्पित कथा से होती है, ‘‘मान लें कि मंगल ग्रह पर रहने वाले मानवशास्त्रियों की एक टीम ने 9 वीं और 13 वीं सदी के दरमियान पृथ्वी की यात्रा की’’। उन्होंने पाया कि ‘‘यहां पर सबसे अधिक संभावनाओं वाली इस्लामिक सभ्यता दिखती है, जहां बैत उल हिकमा (Bait-ul-Hikmah) जैसा पुस्तकालय है, खगोलीय वेधशालाएं है, अस्पताल हैं और स्कूल हैं।’’फिर वे बीसवीं सदी के अंत में फिर एक बार यहां आते हैं और पाते हैं ‘‘उनका पहले का अनुमान बिल्कुल गलत साबित हुआ। मानवता का वह हिस्सा जो कभी सबसे अधिक संभावनासंपन्न दिखता था वह अवरूद्ध मध्ययुगीनता की स्थिति में जकड़ा है, नए को बिल्कुल खारिज कर रहा है और अतीत से बुरी तरह चिपका हुआ है। इसके उलट, अतीत के पीछे छूटे हुए लोग (यूरोप से तात्पर्य है) विकास की सीढ़ी चढ़ चुके हैं और अब सितारों को लक्ष्य किए हुए हैं। क्या यह भूमिकाओं का प्रचंड उलटफेर, आगंतुक पूछते हैं, महज एक का दुर्भाग्य और दूसरे का सौभाग्य कहा जा सकता है ? क्या उसकी वजह आक्रमण और सैनिक पराजय है ? या क्या यह  नज़रियों और रूख में बुनियादी बदलाव की परिणति है ?’’

कुछ मामूली फ़र्क़ों के साथ यह दृष्टान्त भारतीय उपमहाद्वीप पर भी समान रूप से लागू हो सकता है। अगर मंगल ग्रह के लोग 17 वीं सदी के दरमियान यहाँ पहुँचते तो सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों को देख कर चकित रह जाते; इस बात से अचंभित रह जाते कि पूरी दुनिया के सकल उत्पाद का लगभग एक तिहाई अकेले इस महाद्वीप पर ही पैदा होता है। लेकिन जब वे आज के समय में फिर इस महाद्वीप पर वापिस आते तो यहाँ की दुर्दशा देखकर और यहाँ का पिछड़ापन देखकर इस सभ्यता के बारे में उतने ही निराश हुए होते जितना कि वे इस्लामी सभ्यता के बारे में हुए थे।

शायद यह पूछने की बजाय कि सभी पीछे क्यों छूट गये, असली सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि पश्चिम आगे कैसे निकल गया ? इस से सभी के पीछे छूट जाने के मसले पर भी ज़्यादा आसानी से रौशनी पड़ सकती है। हो सकता है जवाब साफ हो, लेकिन कमरे में मौजूद हाथी की तरह उसे नज़रअन्दाज़ करने की कोशिश की जाती रही हो। हो सकता है, इतिहास के लम्बे दौर में अन्तर्भूत गहरे कार्यकारण सम्बन्धों का सन्धान आज की बौद्धिक-अकादमिक दुनिया में फ़ैशन में न हो। आख़िरकार, यह महान आख्यानों के प्रति संदेहों का दौर है। हम जो इस दौड़ में पीछे छूट गए हैं, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए सुकून हासिल कर सकते हैं और उन्हें इन अपराधों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। हम इस बात पर भी खुश हो सकते है कि पश्चिमी अकादमिक जगत के बड़े बड़े विद्वतजन भी विज्ञान और आधुनिकता के खिलाफ बौद्धिक तूफान खड़ा कर रहे हैं, जो उनके हिसाब से कथित तौर पर, पूंजीवाद, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का नौकर और उपकरण मात्र रहे हैं। उत्तरऔपनिवेशिकता के सिद्धान्तकार उस उपनिवेशवाद के भयावह कारनामों को उजागर करने में व्यस्त रह सकते हैं जिसका युग बीत चुका है। लेकिन एक दिन तो हमें यह पूछना ही होगा –  उस अनुपस्थित उपनिवेशवाद की आलोचना से भारतीय उपमहाद्वीप पर रहने वाले हमलोगों को क्या हासिल होने वाला है ? पश्चिम के अकादमिक गढ़ों में बैठे उपनिवेशवाद के ये आलोचक और उत्तर-औपनिवेशिकता के ये सिद्धान्तकार निश्चित ही पश्चिमी समाजों को अधिक सभ्य, अधिक जनतांत्रिक और अधिक बहुसांस्कृतिक बनाने में योगदान कर रहे हैं। लेकिन पश्चिम के पास तो पहले से ही विज्ञान और आधुनिकता है, वह पहले ही आगे बढ़ चुका है। इस सब में हम पूरब वालों के लिए क्या है? गरीबी और अंधश्रद्धा के दलदल से हमें अपना रास्ता किस तरह निकालना है ? अपने लिए हमें किस तरह के भविष्य की कल्पना करनी है ? 

पश्चिम क्यों और किस तरह आगे निकल गया – यह एक विशद विषय है और इसपर तमाम पुस्तकालय भरे पड़े हैं। लेकिन कुछ मायनों में इसका जवाब इतना साफ़ है कि इसे दो शब्दों में कहा जा सकता है : विज्ञान और आधुनिकता की सहायता से  पश्चिम यह चमत्कार कर सकने में सफल रहा। यह सच है कि विज्ञान और आधुनिकता दोनों ही पूँजीवाद और उपनिवेशवाद के साथ पैदा हुए थे। लेकिन, जैसा कि मुहावरा है, हमें बच्चे को भी कठौते के गन्दे पानी के साथ फेंक नहीं देना चाहिए। यह बेहद आश्चर्यजनक है कि तमाम बड़े बड़े सिद्धांत मौजूद हैं जो कहते हैं कि सार्वभौमिक सत्य, वस्तुनिष्ठता और वैज्ञानिक पद्धति की विशिष्टता को लेकर विज्ञान की हैसियत कोई अलग नहीं है। सत्य और ज्ञान को लेकर सभी युगों में सभी संस्कृतियों के अपने-अपने दावे थे और उन सभी को विज्ञान तथा वैज्ञानिक पद्धति के दावों के बराबर का स्थान मिलना चाहिए। आज के भारत में ऐसी धारणा को पुष्ट करने के लिए एक आसान रास्ता निकाला गया है – हमें बस यही दावा करना है कि आधुनिक विज्ञान ने अब तक जो हासिल किया और आगे जो भी हासिल करेगा, वह सब वेदों में पहले से मौजूद है। 

बात जो भी हो, पश्चिम ने सबसे आगे निकल जाने ( Great Divergence )  का यह चमत्कार महज पूंजीवाद और औद्योगिक क्रांति के ज़रिए ही हासिल नहीं किया। प्रबोधन (Enlightenment) और आधुनिकता (Modernity) ने इसमें उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। हम लोगों ने विज्ञान और संस्कृति के बीच की जटिल अंतःक्रिया को पहले से ही संदर्भित किया है। 18 वीं सदी के पश्चिमी यूरोप में इसने इतिहास को और गतिमान बना दिया। आधुनिक विज्ञान के उभार के बाद लगभग दो सौ साल लगे जब वैज्ञानिक मिज़ाज पश्चिमी समाज और संस्कृति में नीचे तक पहुँचने लगा। सांस्कृतिक ज़मीन में वैज्ञानिक सोच और मिज़ाज के धीरे-धीरे रिसने की इस प्रक्रिया को ही प्रबोधन का नाम दिया जाता है। 

प्रबोधन और आधुनिकता को हम महज आयात नहीं कर सकते। इसे हासिल करने के लिए हम किसी का अन्धानुकरण नहीं कर सकते। इसकी वजह ये है कि विज्ञान भले एक ही हो, संस्कृतियाँ अनेक हैं। सभी संस्कृतियों को चाहिए कि वे विज्ञान को अपनाएँ और आधुनिकता को सक्रिय-सामाजिक रूप दें। लेकिन संस्कृतियों की अनेकता और विविधता के चलते सभी के रास्ते अलग-अलग होंगे। जो पीछे छूट गए, उनमें से कुछ ही ऐसे सफल उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने उन्नति, आधुनिकता और वैज्ञानिक मिज़ाज के मामले में अपने अलग ढंग से ही पश्चिम को पकड़ लिया और उस से बराबरी हासिल कर ली। पहले सोविएत संघ ऐसा उदाहरण था, लेकिन वह नष्ट हो गया। वैसे भी रूस यूरोपीय सभ्यता के इतना करीब था कि उसे बराबर में आ जाने के अलग सभ्यतात्मक उदाहरण के तौर पर देख पाना मुश्किल है। पूरब में, पहले जापान और अब चीन ऐसे उदाहरण के तौर पर सामने आते हैं। भारतीय महाद्वीप के ऐसा उदाहरण न बन पाने के पीछे कौन से कारण हैं?

यह भी एक बड़ा विषय है और बेहद जटिल मामला है। कहा जाता है कि समझदार जहाँ जाने में हिचकते हैं, अहमक वहाँ दौड़कर पहुँच जाते हैं। लेकिन अहमक होने का ख़तरा मुझे उठाने दीजिए। जिन सहस्राब्दिक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के द्वारा इस उपमहाद्वीप में एक विशिष्ट सभ्यता का निर्माण हुआ है उनमें एक ऐसी है जो विशिष्ट और अनूठी है। इसके तत्व अन्य मुल्कों और सभ्यताओं में पाए तो जा सकते हैं लेकिन इस उपमहाद्वीप में उसने जो भूमिका अदा की है, वह अन्य किसी इलाके में नहीं निभायी होगी। यही मेरे खयाल से वह अकेला सबसे बड़ा अवरोध है जिसने हमारी संस्कृति में वैज्ञानिक मिज़ाज को रिसने से रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभायी है। इसी पर ऊँगली उठाने की कोशिश करते हुए मैं अपनी बात समेटना चाहूँगा। 

मैं इस बात की तरफ संकेत करना चाहता हू कि इस उपमहाद्वीप में मौजूद लगभग सभी धर्मों ने, अलग अलग अंशों में, एक रहस्यवादी-भक्तिमार्गी रूप धारण किया। इसमें गुरुओं, पीरों, महात्माओं और अनेक प्रकार के गाॅडमेन की नेतृत्वकारी भूमिका बनी। ये सभी, पुरोहितों, पवित्र किताबों या अन्य बिचौलियों की मध्यस्थता के बग़ैर, ईश्वर तक सीधी पहुँच के लिये भक्ति का लोकमार्ग बनाने का दावा करते थे। हिन्दू पक्ष को देखें तो दक्षिण में उसका उदय पहली सहस्राब्दि के भक्ति आंदोलन के साथ हुआ और जो दूसरी सहस्राब्दि में उत्तर भारत में पहुचा। मुस्लिम पक्ष को देखें तो अनेक प्रकार के सूफ़ी पन्थ अफगानिस्तान के रास्ते भारत के उत्तर पश्चिम में पहुँचे और सूफियों, दरवेशों और पीरों के ज़रिए फैलते गये। इस परिघटना ने एक नए धर्म – सिख धर्म – को भी जन्म दिया। यही वह भक्ति, सूफी, सिख धर्म और संमिश्र रहस्यमयी-भक्तिमार्गी आंदोलनों की परिघटना है जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में एक अलग और विशिष्ट सभ्यता के निर्माण में महती भूमिका निभायी है। 

लगभग सभी ने इस परिघटना की बेहद अनुकूल ढंग से व्याख्या की है। धार्मिेकों से लेकर गैरधार्मिकों तक, परंपरावादियों से लेकर आधुनिकतावादियों तक, दक्षिणपंथियों से लेकर वामपंथियों तक सभी ने इसकी प्रशंसा की है। लगभग हर कोई रूढिवादिता (Orthodoxy) की तुलना में वैविध्य या बहुलवाद ( heterodoxy ) की हिमायत करता है। इस बात से इन्कार तो नहीं किया जा सकता कि भक्ति-सूफी-सिख-संत आन्दोलनों ने उपमहाद्वीप की संस्कृति और सभ्यता में सकारात्मक योगदान भी किया है। इसके बावजूद यह कहना ज़रूरी है कि इसका एक बड़ा नकारात्मक परिणाम भी रहा है जिसे नज़रअंदाज़ किया गया है।

यह परिघटना ऐसी प्रक्रियाओ को आगे बढ़ाती दिखती है जो वैज्ञानिक चिन्तन और आधुनिकता की प्रगति को बाधित करते हैं। यह विस्मय और जिज्ञासा की जगह अंधी आस्था को प्रोत्साहित करती है; धार्मिकता को सही मायने में आध्यात्मिक, तत्वज्ञानशील और दार्शनिक बनने से रोकती है; दार्शनिक को तार्किक बनने से बाधित करती है; और तार्किकता को संस्कृति में रिसने से रोकती है। वह दुनिया के इस हिस्से में अतार्किकता, अंधी आस्था और अंधश्रद्धा का प्रधान वाहन बनती है। जार्ज आरवेल ने कभी कहा था  ‘‘संतों को हमेशा ही दोषी मान लेना चाहिए जब तक कि यह साबित न हो कि वह निरपराध हैं।’’ आज के भारत में आरवेल के इस कथन का एक विडम्बनापूर्ण अर्थ निकला है – अनेक साधुओं और महात्माओं के बलात्कारी और हत्यारे साबित होने के बावजूद और उनके जेल जाने के बावजूद उनके अनुयायियों की संख्या में कोई कमी आती नहीं दीखती।

नेहरू तक  भक्ति आंदोलन के सभ्यतात्मक परिणामों से जूझने में असफल रहे। वे अपने में अंतर्विरोधों को समाहित किये हुए थे। विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, गाँधी, भगत सिंह और आइन्स्टाइन – सभी की एक साथ और बराबर आदर से तारीफ़ करते थे। नेहरू एक महान व्यक्ति थे – वे दूरदर्शी थे, नेता थे, चिन्तक थे, राजनेता थे। विटमैन के तौर पर वह शायद कह सकते थे , ‘‘मैं विशाल हूँ, मुझमें बहुलता समाहित है।(I am large, I contain multitudes)” दरअसल वे असफल इसलिए हुए कि भारत के अतीत का बोझ उनके जैसे महान व्यक्ति के लिए भी बहुत भारी साबित हुआ। वे खरी खरी बात नहीं कह सकते थे क्योंकि उन्हें अपने लोगों को साथ लेकर चलना था।  इसीलिए कभी कभार आप को छोटे लोगों की बातें भी सुननी चाहिये। वे सच्ची बातें इसलिए कह सकते हैं क्योंकि नेहरू वाला बोझ उठाने की ज़िम्मेदारी उनकी नहीं है।

यहीं मैं अपनी बात खत्म करना चाहूंगा। 

नवम्बर 19, 2022

————————————–

( नोट : द इंडियन डाइस्पोरा वाॅशिंग्टन डीसी मेट्रो  संयुक्त राज्य अमेरिका की तरफ से ‘Absence of Scientific Temper in the Lands of Scientists Raman, Bose, Abdus Salaam  विषय पर, 19 दिसम्बर 2022 को आनलाइन पैनल डिस्कशन का कार्यक्रम हुआ।

अग्रणी भौतिकीविद, जनबुद्धिजीवी, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, लेखक और स्तंभकार प्रोफेसर परवेज हुदभाॅय, पाकिस्तान ; सैद्धांतिक भौतिकीविद, एक्टिविस्ट, प्रगतिशील आंदोलनों से जुडे़ बुद्धिजीवी एवं लेखक डा रवि सिन्हा ; पूर्व मुख्य वैज्ञानिक, कौन्सिल आफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्टियल रिसर्च, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, डाॅक्युमेंटरी फिल्म निर्माता गौहर रज़ा ने बातें रखीं। 

प्रो रजी रजीउददीन, वैज्ञानिक, इंडियन डाइस्पोरा के संस्थापक, ने स्वागत वक्तव्य दिए। 
कार्यक्रम में डा रवि सिन्हा द्वारा उपरोक्त लिखित वक्तव्य दिया गया।)

(डा रवि सिन्हा का मूल अंग्रेजी वक्तव्य यहां पढ़ सकते हैं : https://kafila.online/2022/11/23/a-few-remarks-on-the-absence-of-scientific-temper-in-the-land-of-bose-raman-and-salam/)

अनुवाद : सुभाष

A Few Remarks On The Absence of Scientific Temper in the Land of Bose, Raman, and Salam

Guest Post by Ravi Sinha

[I must begin with a “thank you” to the Indian Diaspora of Washington DC* and to Razi Saheb for letting me say a few words here. It is an honour for me to share the dais, even if virtually, with Gauhar Raza and Pervez Hoodbhoy. I was stressed about Razi Saheb being a stern time-keeper. So, I decided to jot down what I have to say. But the flip side is that I did not know at the time of preparing these notes what Gauhar and Pervez would say. Please bear with me if what I say turns out to be redundant in the light of what has already been said, or if it appears tangential to the concerns of the organizers or of the other two speakers.]

Let me first get some elementary considerations out of the way. The title refers to the land of Bose, Raman and Salam, which might betray an assumption that a scientist is guaranteed to possess scientific temper and he is influential enough to leave an imprint on the society. In an ideal world, perhaps, that ought to be the case. But even scientists do not live in an ideal world.

Take the example of Sir Isaac Newton, the greatest icon of science, whose genius did put its final and authoritative seal on the Scientific Revolution. Running away from plague in Cambridge to his native village, the young and solitary scholar single-handedly laid the foundation of modern science. He accomplished this during a mere 18 months of his anni mirabiles of 1665-66 when he formulated his laws of motion and his theory of gravitation. In addition, he also invented calculus during the same months. But, after that, he devoted a large part of his long life to the practice of alchemy and to the theological labours of interpreting the Bible. He denounced what he thought were corruptions of Christianity – such as trinitarianism – and adopted a radically puritanical version of Arianism that considered the Bible as an exact Revelation about the future. Nothing in Newton was of normal proportions – neither his scientific genius nor his rigid dogmatism and confident superstitions.

If you think I am being unfair to Newton – after all he could only be a product of his times – you are already conceding part of the point I am driving at. But let me cite a few examples from more recent times before I try to peep into the relationship between Science and Scientific Temper. Pascual Jordan, a pioneer of Quantum Mechanics, was an active Nazi who continued to hold his fascist views even after his rehabilitation in post-war Germany. Physics Nobel laureates Philipp Lenard and Johannes Stark too were active Nazis and confirmed anti-Semites. A little earlier, the great mathematician, Emmy Noether, had been prevented from becoming a faculty in the mathematics department of the University of Gottingen just because she was a woman. An exasperated David Hilbert famously said, “I do not see that the sex of the candidate is an argument against her admission as a privatdozent. After all, we are a university, not a bathhouse.” And a scientist friend of mine reminded me the other day that our own Sir C V Raman, one in the title of this program, was opposed to a woman being admitted as a Ph.D. student, because, in his views, women were unfit to do science.

I am not here to withhold the certificate of scientific temper from being awarded to eminent scientists. My purpose is to examine whether lack of scientific temper comes in the way of doing good science. Pervez Hoodbhoy wrote a book some thirty years ago. The book is called “Islam and Science”, and the subtitle is “Religious Orthodoxy and the Battle for Rationality”. In the book he cites a telling example. Steven Weinberg and Abdus Salam – the same Salam who too is in the title of this program – came up with one of the greatest physical theories of 20th century – the unified quantum theory of electromagnetism and the weak nuclear force. They invented this theory independently of each other and shared the Nobel Prize for it. Weinberg was an avowed atheist; Salam was self-confessedly a believer. Salam wrote the foreword to Pervez’s book in which he concurs with the author that being a believer made no difference, one way or the other, to his coming up with the theory. There you have it from the horse’s mouth. What, then, is the relationship between science and scientific temper?

The scientist does not live by science alone. Even a scientist’s mind is not entirely colonised by Scientific Reason. I do not know if, like the brain, the mind too has two separate but interconnected lobes. But allow me to use a simple-minded metaphor. Scientific temper, it seems to me, has something to do with the rational side of the mind trying to influence the emotional side. This may give rise to a reasonable and cultivated individual, but it can also result in disaster. With the rational side meddling too much with the emotional side, it may give rise to a rather childish adult, if not a veritable Dr Strangelove.

Scientific temper is a tricky business. It involves a very intricate game between Reason and Culture. Neither side of the game we understand very well. There are those who think that Reason is transparent, whereas Culture harbours dark corners. The opposing side points out that this is a false picture. It labours to show that Reason has murky origins – it did not result from an immaculate conception. And, it is not at all self-aware – it does not know that it is inextricably entangled in structures of power.

Which side is more important for a successful and at the same time a meaningful life? Which side should sit in judgement? It is a debate that is hard to settle. There are funny episodes, for example, of scientists sitting in judgment over poetry. Paul Dirac, one of the greatest scientific minds of the 20th century once told J R Oppenheimer, another great scientist and a polymath, “I don’t see how you can work on physics and write poetry at the same time. In science, you want to say something nobody knew before, in words everyone can understand. In poetry, you are bound to say something that everybody knows already, in words that nobody can understand.” The judgements of poets about science, on the other hand, are usually not so funny. They are often much darker – prone to denouncing the supposed soullessness of science or mocking it as one mocks the childishness of a grown-up.

With this much as a background, let me now come to the topic of the day. I do agree with the assertion that scientific temper is largely missing from the societies and cultures that form a distinct civilisation on the subcontinent. But, I am less surprised that it is missing despite scientists likes of Bose, Raman and Salam. I am more surprised that it is missing despite someone like Jawaharlal Nehru. To my mind, Nehru was the best and the wisest proponent of the desirability of scientific temper. Let me quote a passage from The Discovery of India even if it consumes a precious minute,

“Science deals with the domain of positive knowledge but the temper which it should produce goes beyond that domain. The ultimate purposes of man may be said to be to gain knowledge, to realize truth, to appreciate goodness and beauty. The scientific method of objective inquiry is not applicable to all these, and much that is vital in life seems to lie beyond its scope – the sensitiveness to art and poetry, the emotion that beauty produces, the inner recognition of goodness. The botanist and the zoologist may never experience the charm and beauty of nature; the sociologist may be wholly lacking in love for humanity. But even when we visit the mountain tops where philosophy dwells and high emotions fill us, or gaze at the immensity beyond, that approach and temper are still necessary.”

I might also add that the Indian Constitution is the only Constitution in the world which prescribes developing “scientific temper, humanism and the spirit of inquiry and reform” as a fundamental duty of every citizen.

All this, however, may sound too philosophical and too idealistic. How can one be sure that scientific temper really matters to a society or a civilisation? I think history has provided a very real example. Let me dwell on it for a minute.

Pervez’s book that I have already mentioned opens with a parable of “a team of Martian anthropologists visiting Earth sometime between the 9th and 13th centuries”. They find that “the civilization with greatest promise is the Islamic civilization with its Bait-ul-Hikmah, astronomical observatories, hospitals and schools”. Then they visit again towards the end of 20th century and find that “their earlier prediction had turned out to be wrong. The part of humanity which once seemed to offer the greatest promise now appears inescapably trapped in a state of frozen medievalism, rejecting the new and clinging desperately to the old. On the other hand, the former retrogrades have climbed the evolutionary ladder and are now aiming for the stars. Was this stunning reversal of roles, ask the visitors, the mere misfortune of one and the good fortune of the other? Was it due to invasions and military defeats? Or was it the result of a fundamental shift in outlook and attitudes?”

With minor variations the parable may apply equally well to the fate of the subcontinent. If the Martians were to visit here sometime during the 17th century, they would be dazzled by the Navratnas (nine jewels) in Akbar’s court and they would marvel at the fact that the subcontinent accounted for nearly one third of the total world production. However, on their second visit at the turn of the millennium, they would be equally disappointed with this civilisation.

Perhaps the real question to ask is: why and how did the West pull ahead? That may shed easy light on why everyone else got left behind. The answer is obvious, but, like the case of the elephant in the room, there have been reasons for ignoring the obvious. Looking for deeper causalities behind the long trajectories of history may no longer be the intellectual flavour of the day. After all, this is the era of suspicions about grand narratives. We who got left behind can derive satisfaction from the all-round denunciations of colonialism and imperialism and attribute all that we suffer from to their crimes. We may rejoice that those in the high chairs of western academia are raising an intellectual storm against science and modernity which, supposedly, have been nothing but handmaidens of capitalism, colonialism and imperialism. The postcolonial theorist may continue to uncover sinister doings of the long dead colonialism. But someday we will have to ask – what is in it for us on the subcontinent? These critics are definitely making the western societies better, more cultivated, more democratic and more multicultural. But they already had science and modernity; they had already pulled ahead. How should we find our path out of poverty and superstition? What kind of future should we visualize for ourselves?

Explanations about why and how did the West pull ahead fill entire libraries. But, in some ways, the answer is too obvious: West did it with the help of science and modernity. Of course, both were born along with capitalism and colonialism. But one should not throw the baby with the bathwater. It is truly astonishing that there exist high theories declaring that all claims of science about universal truths, objectivity and uniqueness of scientific method are false; that all cultures and communities in all ages had equally valid claims to knowledge and method. In India a simple way has been found to support such theories – all one has to do is to claim that everything that modern science has accomplished, and will ever accomplish, is already there in the Vedas.

In any case, West did not accomplish the miracle of Great Divergence only through capitalism and industrial revolution. Enlightenment and Modernity played an equally important role. I have already referred to the complex interaction between Science and Culture. In 18th century Western Europe this imparted an added acceleration to history. And it took nearly two centuries after the advent of modern science for scientific temper to seep into western culture. Enlightenment was the name given to this process of seeping in.

Enlightenment and Modernity cannot just be imported or imitated. This is because of the fact that science is one but cultures are many. All cultures must find their own ways to imbibe science and animate modernity. Among those who were left behind, there have been a few successful examples of catching up with the West. Soviet Union used to be one such example but it collapsed. Russia, in any case, was too close to the European civilisation to count as a distinctive example. In the East, Japan earlier and China now have been such examples. What has stopped the subcontinent from being another such example?

This too is an enormous subject and an extraordinarily complex one. It is said that fools rush in where angels fear to tread. But let me rush in nevertheless. Among many millennial historical processes that have gone into the making a distinct civilisation on the subcontinent, one is special and unique. Elements of it may be found in other lands but on the subcontinent it has played role like no other place on the planet. This, in my opinion, has been the single largest obstacle to scientific temper seeping into our culture. Let me conclude by pointing a finger at it.

I am alluding to the fact that nearly all religions on the subcontinent took, in varying degrees, a mystical-devotional form, comprising of numerous sects led by gurus, pirs, mahatmas and other god-men – all engaged in the task of paving a plebeian road for a direct access to God without the mediation of priests or books or other intermediaries. On the Hindu side it emerged in the South as the Bhakti Movement and spread to the North in the second millennium. On the Muslim side it made its way through Afghanistan to the north-west of India and spread through sufis, dervishes and pirs. The phenomenon also gave rise to a new religion – Sikhism. It is this phenomenon of Bhakti, Sufism, Sikhism and assorted mystical-devotional movements that is at the heart of a distinct civilisation on the subcontinent.

This phenomenon has been judged favourably by nearly everyone. It has won praises from the religious and the non-religious, from traditionalists and modernists, from the right-wing as well as the left-wing. Nearly everyone prefers heterodoxy to orthodoxy. There is no denying that in many ways it has contributed positively to the culture and civilization on the subcontinent. And yet, there is a very large negative fall-out that has been largely ignored.

This phenomenon triggers processes that obstruct the advance of scientific temper and modernity. It encourages blind faith at the cost of a genuine sense of wonder; prevents religiosity from turning genuinely spiritual and becoming philosophical; prevents the philosophical from becoming reasoned; prevents Reason from seeping into Culture. It has been the principal vehicle of unreason, blind faith and superstition in our part of the world. George Orwell once said, “Saints should always be judged guilty until proven innocent”. An ironical meaning has been added to Orwell by today’s India where god-men do not lose followers even after being convicted as rapists and murderers.

Even Nehru fails to grapple with the civilizational consequences of Bhakti Movement. He harbours contradictions. He admires Vivekanand, Rabindranath Tagore, Gandhi, Bhagat Singh and Einstein – all at the same time. He was a great man – a visionary, a leader, a thinker, a statesman. Like Whitman he could perhaps say, “I am large, I contain multitudes”. He failed because the weight of the past was too heavy. He could not speak bare truths because he had to carry his people along. That is why, sometimes, you need to listen to small men too. They can speak the bare truth as they are spared the onerous task of carrying Nehru’s burden.

This is where I will stop.

——————————————-

Dr Ravi Sinha, Theoretical Physicist, Activist, Scholar, associated with Progressive Movements and Writer

[* The Indian Diaspora Washington DC Metro, USA organised an online panel discussion on the theme ‘Absence of Scientific Temper in the Lands of Scientists Raman, Bose, Abdus Salaam on 19 th November 2022.

Professor Pervez Hoodbhoy, Eminent Physicist, Prominent Public Intellectual, Civil Rights Activist, Author, Columnist from Pakistan ; Dr Ravi Sinha, Theoretical Physicist, Activist, Scholar, associated with Progressive Movements and Writer ; Mr Gauhar Raza, Former Chief Scientist, Council of Scientific and Industrial Research, Civil Rights Activist, Poet, Documentary Filmmaker both from India shared their ideas at the programme which was followed by discussion.

Prof Razi Raziuddin, Scientist, Founder, Indian Diaspora, Washington DC Metro, USA shared welcoming remarks. ]

The Two-Nation Theory, Partition and the Consequences – Prof Ishtiaq Ahmed

 Prof Ishtiaq Ahmed, Professor Emeritus of Political Science, Stockholm University and a leading authority on the Politics of South Asia and an eminent author will deliver next lecture (21 st one) in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative

He will be speaking on ‘The Two-Nation Theory, Partition and the Consequences’ on Sunday, 27 th November 6 PM (IST) 

The lecture will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Topic : 

The Two-Nation Theory, Partition and the Consequences

1.    The Two-Nation Theory as an Idea and an Argument: The talk will contextualize the origins of the Two-Nation Theory in the background of pre-colonial and British colonial rule and analyse it in relation to competing ideas of a One-Nation Theory as well as the vaguer ideas of multiple nationalities deriving from language, ethnicity and religion. This section will also deal with British policy regarding such competing ideas of group identity and nation and nationalism. This will cover the period 1857 – 1932. However, most attention will be given to the 1928 Motilal Nehru Report (which a section of Muslims including one faction of the Muslim League was willing to accept) and Jinnah’s 14 points.

 2.      The Two-Nation Theory and the demand for Partition: The Government of India Act 1935, the election speeches and manifestos, election results and the Muslim League’s deployment of communalism as political strategy to demand partition on behalf of Muslims. The stands of the Indian National Congress, the Muslim League, the Communist Party of India, the Hindu Mahasabha, the Jamiat Ulema e Hind and other Islamist, regional and working-class parties of Muslims and the Sikhs of Punjab.

 3.      British policy on the future of India: from unwillingness to grant India freedom to retaining influence and control through defence treaty to finally deciding in favour of partition. The Cabinet Mission Plan, Wavell’s schemes to transfer power as an award, The British military’s transformation from opposition to support for partition; 3 June Partition Plan, the partitions of Bengal and Punjab, the 18 July 1947 Indian Independence Act.

 4.      The Partition as a flawed exercise in the transfer of power which claimed at least one million Hindu, Muslim and Sikh lives, caused the biggest migration in history (14 – 15 million) and bequeathed bitter disputes over the sharing of colonial assets, territory and claims to princely states. In this regard, the

 5.      The Partition as a referent for nation-building: while agreeing finally to the partition of India on a religious basis India held steadfastly to nation-building on a secular, liberal-democratic, inclusive and pluralist basis. The Indian constitution came to represent such a view of nation and nation-building. On the other hand, since Pakistan had been won in the name of Islam its nation-building was based on distinguishing Muslims from non-Muslims and generating different formulae of differential rights. More importantly, it brought to light the deep divisions among Muslims based on sect, sub-sect and ethno-linguistic criteria.

 6.      The Partition and settling of disputes between India and Pakistan: The two-nation theory continued to define and determine relations between India and Pakistan resulting in wars, terrorism and zero-sum games in international forums.

 7.      The Partition as a historical, political, ideological and intellectual phenomenon: An Evaluation

About the Speaker :

Prof Ishtiaq Ahmed

Professor Emeritus of Political Science, Stockholm University; Honorary Senior Fellow, Institute of South Asian Studies, National University of Singapore. Published several books with special focus on the politics of South Asia discussed in context of regional and international relations

Latest publications, Jinnah: His Successes, Failures and Role in History,  New Delhi: Penguin Viking, 2020 won the English Non-Fiction Book Award for 2021 at the Valley of Words Literary Festival, Dehradu, India; Jinnah: His Successes, Failures and Role in History, Vanguard Books, Lahore 2021;

Pakistan: The Garrison State, Origins, Evolution, Consequences (1947-2011), Karachi: Oxford University Press, 2013;

The Punjab Bloodied, Partitioned and Cleansed, Karachi: Oxford University Press, 2012- It won the Best Non-Fiction Book Prize at the 2013 Karachi Literature Festival and the 2013 UBL-Jang Groups Best Non-Fiction Book Prize at Lahore and the Best Book on Punjab Award from Punjabi Parchar at the Vaisakhi Mela in Lahore, 2016

He is working on a new book, The Partitions of India, Punjab and Bengal: Who What and Why

He is the Editor-in-Chief of the “Liberal Arts & Social Sciences International Journal (LASSIJ)” and also regularly writes columns in several Pakistani newspapers

Partition Split Us Up: Can We Live in Peace as Neighbors? –

– Dr Vinod Mubayi

Dr Vinod Mubayi, Public Intellectual, Scientist and Activist will be delivering the 20 th Lecture in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative on Sunday, 30 th October at 7 PM (IST)

He will be speaking on 

Partition Split Us Up: Can We Live in Peace as Neighbors?

Future Challenges and Reflections

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/82348327214?pwd=MUZvYVJyRnhUSXpHZkxPdG9NVmpadz09

Meeting ID: 823 4832 7214

Passcode: 825754

The programme will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi . 

Theme :

Partition Split Us Up: Can We Live in Peace as Neighbors?

Future Challenges and Reflections

75 years have passed since Partition and the prospects of peace between the two largest countries of the region, India and Pakistan, whose conflict impacts the entire South Asia region look dimmer than ever. The reasons and justifications offered by the protagonists for the separation, such as the two-nation theory, have been discussed at length in various forums and while the past is commonly understood to be prologue to the future it behooves us to imagine a future without all the baggage of the past.

This talk will refer at times to the past and the misdeeds of the present but focus mostly on possibilities for the future. A good amount of experience has shown that despite the most fraught and tense relations between governments, common people of south Asian countries, whether in the diaspora or while visiting each other’s countries, are able to establish bonds and friendships very quickly and easily. Perhaps 75 years cannot easily extinguish long standing cultural and linguistic bonds established over millennia. Dialectics also teaches us that opposing and contradictory views and ideas can co-exist within a society or group and which will prevail depends on the context in which the opposites interact.

Groups such as South Asia Peace Action Network (SAPAN), whose founding charter states that its minimum common agenda is reclaiming South Asia, have attracted members from all South Asian countries. SAPAN calls for soft borders and visa free travel between countries in the region in addition to demands for human rights, peace and justice. The talk will discuss possibilities of expanding the activities of people-to-people groups that can create civil society pressures for peace and prosperity as well as joint actions to counter existential threats like climate change.

About the Speaker :

Dr Vinod Mubayi is a reputed American Physicist of Indian origin.

PhD in Physics from Brandeis University, taught at Cornell University and was a research fellow at TIFR, Mumbai before joining Brookhaven National Laboratory, New York.

A member of the American Nuclear Society, the American Physical Society and the American Association for the Advancement of Science, he was also a Consultant to agencies of the United Nations on Energy Issues ( 1981-1985)

He joined INSAF bulletin as co-editor in 2004.  A keen observer of socio-political events in India, Mubayi has been close to progressive groups, espousing human rights issues and the cause of the downtrodden

His book ‘Where is India Headed ? – An Historical Critique ( 2021, Media House) which chronicles the contemporary Indian History during the last few decades has also been translated into Hindi

The Partition of India: Three Outstanding Questions – Professor Pervez Hoodbhoy

Professor Pervez Hoodbhoy, eminent physicist, author, public intellectual and a forceful voice for reason, science and democracy will be delivering the 19th Democracy Dialogues lecture on Sunday, October 9th, 2022 at 6 PM (IST)

The Partition of India: Three Outstanding Questions 

Seventy five years after the communal storm of 1947 countless important questions still remain. From among them I will concentrate upon three which are particularly important in understanding the past but which, in addition, continue to influence current trajectories.

  1. How, when, and why did the two-nation theory emerge? 
  1. Why is Pakistan a praetorian state but India is not? 
  2. Was Partition preventable and had it not happened what might have been the consequences? 

Speaker: 

Pervez Hoodbhoy is a nuclear physicist, a frequent commentator on Pakistani television channels, founder-director of The Black Hole in Islamabad, and an author. He received his undergraduate and graduate degrees from MIT and taught physics at Quaid-e-Azam University for 47 years.  

The lecture will be held on zoom and for security reasons the link will be shared individually only closer to the event. Please write to us at democracydialogues@gmail.com if you want to join the lecture online.

It will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

हिंदी में अंतर्राष्ट्रीयवाद – साहित्य और शीत युद्ध :प्रोफेसर फ़्रंचेस्का ओर्सीनी

Prof Fransesca Orisini, who has taught Hindi and Indian literature at SOAS, London, will be delivering the Seventh Lecture in the Sandhan Vyakhyanmala Series on Sunday, 18 th September, 6 PM ( IST).

She will be speaking on  हिंदी में अंतर्राष्ट्रीयवाद – साहित्य और शीत युद्ध ( Hindi Internationalism – Literature and Cold War

 Time: Sep 18, 2022 06:00 PM (IST) India

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/87009880306?pwd=VUdFTnFYVTJTd0lsbUFGQmsyL013Zz09

Meeting ID: 870 0988 0306
Passcode: 235401

Organised by :NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh 


संधान व्याख्यानमाला : सातवां वक्तव्य 
विषय : हिंदी में अंतर्राष्ट्रीयवाद – साहित्य और शीतयुद्ध  

आज़ादी के बाद के दो दशक पत्रकारिता के लिए स्वर्णिम युग माना जाता है – हिंदी  और दूसरी भाषाओं में । ये वे दशक भी थे जब उपनिवेशवाद को खतम करने वाली हवा ज़ोरों से चलने लगी थी, और साथ साथ शीत युद्ध का प्रभाव भी दुनिया के हर कोने में महसूस होने लगा। तब साहित्य को बड़ी गम्भीरता से लिया जाता था। एक ख़ास क़िस्म के साहित्य के प्रचार, प्रसार और अनुवाद में बड़े पैमाने के प्रोग्राम स्थापित करके बहुत बड़ी रक़म खर्च की गयी  । मोनिका पोपेस्कु की हाल की किताब का शीर्षक लिया जाए तो शीतयुद्ध और उपनिवेशवाद से आज़ादी पाने के संघर्ष कलम की नोक पर (At Penpoint, २०२०) चलाए गए। साहित्य पर शीतयुद्ध के प्रभाव को लेकर ज़्यादातर काम अमेरिका, सोवियत  रूस और साम्यवादी चीन के प्रचार-प्रसार योजनाओं पर हुआ है । मेरा ध्यान हिंदी पत्रकारिता पर रहेगा, और विशेष तौर पर हिंदी की कहानी पत्रकारिता, जिनका पाठक-वर्ग न केवल साहित्यिक बिरादरी थी बल्कि सामान्य पाठक भी उसमें शामिल थे । क्या १९५० और १९६० के दशकों की हिंदी पत्रिकाओं में कोई अंतर्राष्ट्रीय चेतना नज़र आती है? क्या कहानी और सारिका जैसी लोकप्रिय पत्रिकाएँ भी शीतयुद्ध में भाग लेते दिखाई देती हैं ? क्या उनमें शीतयुद्ध और उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने के संघर्षों की झलक मिलती है ? कहानी-पत्रिकाएँ पाठकों के मन में दुनिया की कल्पना कैसे गढ़ती हैं ? (एक ऐसी कल्पना, जो राजनीति से जुड़ी हो पर सिर्फ़ राजनीति से नहीं ।) और जो दुनिया पत्रिकाएँ–जो हर हफ़्ते या हर महीने सिलसिलेवार छपती तो हैं मगर जिनको पढ़ने के बाद रद्दी के हवाले किया जाता है—गढ़ती हैं, वह दुनिया पाठकों के मन में कहाँ तक अंकित रहती है? क्या पत्रिकाएँ भी अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को बनाने में सक्रिय होती हैं ? इन सवालों का जवाब देने की कोशिश करते हुए यह प्रस्तुति हिंदी के एक कम जाने माने पहलू पर रोशनी डालेगी।  


फ़्रंचेस्का ओर्सीनी SOAS, लंदन विश्वविद्यालय में हिंदी और भारतीय साहित्य की प्रोफ़ेसर रही है। उनकी लिखी हुई और सम्पादित किताबों में हिंदी का लोकवृत्त (The Hindi Public Sphere: Language and literature in the age of nationalism, 1920-1940, 2002), Love in South Asia (2006), Print and Pleasure (2009), Before the Divide (2010), After Timur Left (2014, with Samira Sheikh), Tellings and Texts (2015, with Katherine Schofield), Hinglish Live (2022, with Ravikant) और The Form of Ideology and the Ideology of Form: Cold War, Decolonisation, and Third World Print Cultures, with Neelam Srivastava and Laetitia Zecchini) शामिल हैं। 

Where Are We – 75 Years after Independence : Prof Aditya Mukherjee

 Eminent scholar of Modern Indian History Prof Aditya Mukherjee, ( Retd.) Centre for Historical Studies, JNU who is also editor of the ‘Sage Series in Modern Indian History’ will deliver the next (18 th) Lecture in the Democracy Dialogues series organised by New Socialist Initiative.

He will be speaking on ‘Where Are We : 75 Years After Independence.’ on Sunday, 28 th August 2022 at 6 PM (IST).

Join Zoom Meeting

https://us02web.zoom.us/j/81606280893?pwd=U3daWGVYSFV6MFIyMzROVDJ0Qm40Zz09

Meeting ID: 816 0628 0893
Passcode: 356973

The programme will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi . 

Theme :

Where Are We : 75 Years after Independence

“As we celebrate 75 Years of India’s independence, it is time to reflect on the extent to which the Indian nation-state has lived up to the vision of the Indian national movement and the spirit of the new Constitution. The core ideas behind this vision envisaged that Independent India would be sovereign, democratic, secular republic that will have a pro-poor orientation and would be based on reason rather than blind faith and obscurantism.

With the recent changes in the governmental power at the Centre and in many states where forces following precepts of the Right – forces which had remained outside the spectrum of the national movement – have become dominant resulting in a grave threat to the core components of the Idea of India. There is a reason why the world is no longer accepting India as a full democracy and is, instead, being variously describing it as a “partially free democracy”, a “flawed democracy” and even as an “electoral autocracy”.

In this lecture we will trace the course of developments that has led India to this predicament and will outline future prospects for overcoming the challenges.”

About the Speaker :

Prof Aditya Mukherjee has been associated with Centre for Historical Studies, JNU for the last more than four decades.
He has been Editor of the Series, ‘Sage Series in Modern Indian  History’ published by SAGE publications, and a member of Scientific Committee, International Review of Sociology, Rome, since 2011 and Regional Editor, International Journal of AsianStudies, Tokyo (Cambridge University Press)
He has been Visiting Professor at  Duke University, USA ; was a Visiting Fellow at Institute of Advanced Study, Lancaster University, UK ; Fellow at Institute of Advanced Study, Nantes, France ; Visiting Fellow , Institute of Advanced Study, Sao Paulo, Brazil ; Visiting Professor, La Sapienza, University of Rome at various periods during his long career.
He is author / co-author of many books : India’s Struggle for Independence, which has gone into 80 reprints ; India After Independence, 1947 – 2000 ; Imperialism, Nationalism and the Making of the Indian Capitalist Class 1927-1947 ; India Since Independence, Penguin, More than 35 reprints till 2016.7 ; RSS, School Texts and The Murder of Mahatma Gandhi: The Hindu Communal  Project , (co-author),

भारतीय फ़ासीवाद और प्रतिरोध की संभावना : आशुतोष कुमार

Leading Critic Ashutosh Kumar, Editor ‘Aalochana’ , who teaches at Department of Hindi, Delhi University will be delivering the sixth lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series’ ( in Hindi) on Saturday,13 th August,  2022, at 6 PM (IST).

He will be speaking on ‘ भारतीय फ़ासीवाद और प्रतिरोध की संभावना’ ( Indian Fascism and Possibility of Resistance) 

This online lecture would be held on zoom and will also be shared on facebook as well : :facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Join Zoom Meeting https://us02web.zoom.us/j/89995508417?pwd=QWdlMVVjNElaUXEyQURZd2dFVTNrUT09

Meeting ID: 899 9550 8417
Passcode: 336956

Organised by :NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh 

संधान व्याख्यानमाला : छठा वक्तव्य 

विषय : भारतीय फ़ासीवाद : प्रतिरोध की संभावना 

वक्ता : अग्रणी लेखक एवं संपादक ‘आलोचना’

आशुतोष कुमार 

हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय 

शनिवार, 13 अगस्त, शाम 6 बजे 

सारांश :

भारतीय फ़ासीवादऔर प्रतिरोध की संभावना 

कुछ  प्रश्न:
क्या भारत की वर्तमान परिस्थिति को फासीवाद के रूप में चिन्हित किया जा सकता है? अथवा क्या इसे केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण , धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवाद की राजनीति के रूप में देखा जाना चाहिए? यह सवाल महत्वपूर्ण इसलिए है किस के जवाब पर इस परिस्थिति से मुकाबला करने की रणनीति निर्भर करती है।

अगर यह फासीवाद है तो इसके उद्भव और वर्तमान शक्ति-सम्पन्नता के आधारभूत कारण क्या हैं? क्या यह केवल वैश्विक वित्तीय पूंजीवाद के संकट की अभिव्यक्ति है, जैसा कि प्रभात पटनायक जैसे अर्थशास्त्री समझते हैं?

 क्या भारतीय फ़ासीवाद जैसी किसी अवधारणा के बारे में सोचा जा सकता है? या यह सिर्फ एक वैश्विक प्रवृत्ति है ?

अगर यह फ़ासीवाद नहीं है तो क्या यह पश्चिम और पश्चिमपरस्त राजनेताओं और बौद्धिकों द्वारा अन्यायपूर्ण ढंग से दबाए गए हिन्दू राष्ट्रवाद का उभार है, जैसा कि के भट्टाचार्जी जैसे सावरकरी टिप्पणीकार दावा करते हैं?

क्या यह संघ के बढ़ते लोकतंत्रीकरण के चलते उसके नेतृत्व में वंचित- उत्पीड़ित जन समुदाय द्वारा किया गया सत्ता परिवर्तन है, जिसने कुलीन वर्गों की कीमत पर अकुलीनों को शक्तिशाली बनाया है? जैसा कि अभय कुमार दुबे और बद्री नारायण जैसे सामाजिक लेखक संकेत करते हैं?

 क्या वर्तमान सत्ता संतुलन को बदला जा सकता है? इसे कौन कर सकता है और कैसे?

कुछ बातें

फ़ासीवाद का सबसे बड़ा लक्षण कार्यपालिका,विधायिका और न्यायपालिका के एक गठबंधन के रूप में काम करने की प्रवृत्ति है। लोकतंत्र में इन तीनों के अलगाव और इनकी स्वायत्तता पर इसलिए जोर दिया जाता है कि कोई एक समूह राजसत्ता का दुरुपयोग न कर सके। तीनों निकाय एक दूसरे पर नजर रखने और एक दूसरे को नियंत्रित करने का कार्य करें। इस व्यवस्था के बिना एक व्यक्ति और एक गुट की निरंकुश तानाशाही से बचना नामुमकिन है।

अयोध्या-विवाद से लेकर गुलबर्ग सोसाइटी जनसंहार  और छतीसगढ़ जनसंहार तक के मामलों में हमने सुप्रीम कोर्ट को संविधान-प्रदत्त नागरिक अधिकारों और न्याय की अवधारणा के विरूद्ध राज्य के बहुमतवादी फ़ैसलों के पक्ष में खड़े होते देखा है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने धन-शोधन निवारण अधिनियम के अन्यायपूर्ण प्रावधानों के खिलाफ दी गई याचिका पर राज्य के पक्ष में फैसला दिया है. सीएए और धारा 370 के निर्मूलीकरण जैसे मामलों में चुप्पी साधकर भी उसने नागरिक अधिकारों के विरुद्ध राजकीय निरंकुशता का समर्थन किया है.

नाज़ी जर्मनी में ग्लाइसेशतुंग या समेकन के नाजी कानूनों के जरिए इसी तरह राज्य के सभी निकायों को सकेन्द्रित और एकात्म बनाया था.  हिटलर की तरह मुसोलिनी ने भी ‘राष्ट्र-राज्य सर्वोपरि’ के सिद्धांत के तहत न्यायपालिका को पालतू बनाने का काम किया था. भारत में भी हमने गृह मंत्री अमित शाह को सबरीमाला  मामले में  सुप्रीम कोर्ट को चेतावनी देते देखा है.

भारत में फ़ासीवाद के सभी जाने पहचाने लक्षण प्रबल रूप से दिखाई दे रहे हैं। एक व्यक्ति की तानाशाही और व्यक्ति पूजा का व्यापक प्रचार। मुख्य धार्मिक अल्पसंख्यक समूह के विरुद्ध नफरत, हिंसा और अपमान का अटूट सिलसिला। अल्पसंख्यकों के खिलाफ अधिकतम हिंसा के पक्ष में जनता के व्यापक हिस्सों का जुनून। विपक्ष की बढ़ती हुई असहायता। स्वतंत्र आवाजों का क्रूर दमन। दमन के कानूनी और ग़ैरकानूनी रूपों का विस्तार। मजदूरों और किसानों के अधिकारों में जबरदस्त कटौती। आदिवासियों, दलितों और स्त्रियों के सम्मान के संघर्षों का पीछे ढकेला जाना। शिक्षा पर भगवा नियंत्रण। छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों का विलोपन। फ़ासीवादी प्रचार के लिए साहित्य, चित्रकला, मूर्तिकला, सिनेमा और दीगर कला-विधाओं के नियंत्रण और विरूपण को राज्य की ओर से दिया जा रहा संरक्षण और प्रोत्साहन।

अभी भी कुछ लोग भारत में फासीवादी निज़ाम से सिर्फ इसलिए इंकार करते हैं कि इस देश में गैस चैंबर  स्थापित नहीं किए गए हैं। उन्हें समझना चाहिए कि भारतीय फ़ासीवाद ने फ़ासीवाद अतीत से बहुत कुछ सीखा है। उसने समझ लिया है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण  देश में  भौतिक गैस चैंबर से कहीं अधिक असरदार और स्थायी  व्यवस्था है देश के भीतर सामाजिक और  मनोवैज्ञानिक गैस चैम्बरों का विस्तार।

लगभग समूचे देश को एक ऐसे सांस्कृतिक गैस चेंबर में बदल दिया गया है, जिसमें एक व्यक्ति और एक विचारधारा की गुलामी से इनकार करने वाले स्वतंत्रचेता जन अपने जीवित होने का कोई मतलब ही ना निकाल सकें।

यूरोप की लोकतांत्रिक परम्पराओं के कारण फ़ासीवादी राज्य की स्थापना के लिए कानूनी बदलावों की जरूरत थी. भारत में ‘भक्ति-परम्परा‘ की जड़ें बहुत गहरी हैं. शर्तहीन-समर्पण का संस्कार प्रबल रहा है. क्या यह भी एक कारण है कि भारत में यूएपीए और अफ्स्पा जैसे कुछ विशेष कानूनों के अलावा व्यापक कानूनी बदलावों की जरूरत नहीं पड़ी है?

फ़ासीवाद की मुख्य जीवनी शक्ति नफ़रत की भावना है। हमारे देश में वर्ण व्यवस्था और जाति प्रथा के कारण अपने ही जैसे दूसरे मनुष्यों से तीव्र नफरत का संस्कार हजारों वर्षों से फलता फूलता रहा है। वोट तंत्र ने इस नफरत को उसकी चरम सीमा तक पहुंचा दिया है। क्या भारतीय फ़ासीवाद नफरत के इस चारों ओर फैले खौलते हुए समंदर से उपजे घन-घमंड के रूप में ख़ुद को जनमानस में स्थापित कर चुका है?

इस बातचीत में मैं ऐसे ही कुछ सवालों के जरिए यह देखने की कोशिश करूंगा कि क्या हम ‘भारतीय फासीवाद’ की कोई व्यवस्थित  सैद्धांतिकी निर्मित करने के करीब पहुँच गए हैं. ऐसी किसी संभावित सैद्धांतिकी की रूपरेखा  क्या होगी और इस उद्यम से हम अपने किन सवालों के जवाब हासिल करने की उम्मीद कर सकते हैं. 

 The Role of Individuals in resisting the Majoritarian State – Aakar Patel

Eminent author and rights activist Aakar Patel will be delivering the 17 th lecture in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative, at 6 PM (IST), Sunday, 3 rd July, 2022.

He will speak on ‘The role of individuals in resisting the majoritarian state’. You can also watch it live at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

About the Speaker :

Aakar Patel is a syndicated columnist, author and rights activist and is Chair, Amnesty International India

He has edited English and Gujarati newspapers. His translation of Saadat Hasan Manto’s Why I Write was published in 2014 ( Tranquebar). His study of majoritarianism in India ‘ Our Hindu Rashtra : What It Is. How We Got There came out in 2020 ( Westland) and his next book which seeks to explain data and facts on India’s performance under Narendra Modi, titled ‘Price of ‘The Modi Years‘ was published in 2021 ( Westland). His forthcoming book is on protest and participation by citizens

Abstract :

The role of individuals in resisting the majoritarian state.

India is going through a transformational period when many feel constitutional values have been undermined, an oligopoly has been handed control over large parts of the economy and the secular and pluralist basis of the nation are being eroded. 

What can the individual do in these circumstances? A talk on the ways of meaningful resistance

Why Google News Does Not Want To Talk Caste ?

The Google episode shows the right-wing vision of unity is exclusionary. But this vision is increasingly being challenged in the United States and beyond.

On 9 May 1916, a young BR Ambedkar presented a paper at Colombia University in the United States titled Castes in India: Their Mechanism, Genesis and Development. He referred to caste as a “local problem, but one capable of much wider mischief”. He wrote, “…if Hindus migrate to other regions on earth, Indian caste would become a world problem.”

More than a century later, as one of the biggest corporations, Google, battles allegations of caste discrimination in the United States, the predictive value of Ambedkar’s words is evident. Recently, Google News cancelled a scheduled talk by Thenmozhi Soundararajan, the founder and executive director of Equality Labs, after many Google employees (of Indian origin or Indians) opposed it. The discussion was supposed to mark Dalit Equality Month, celebrated every April to mark the month Ambedkar, the first law minister of independent India and its leading anti-caste activist, was born. Equality Labs is a leading non-profit group in the United States that advocates Dalit rights. According to its 2016 survey, a third of Hindu students in the United States reported experiencing caste discrimination.

Thenmozhi was subjected to an organised campaign led by a section of Google employees, who called her “Hindu-phobic” and “anti-Hindu”. The name-calling went on in emails her opponents sent to company bosses and documents they posted on a mailing list that thousands of Indian employees access.

( Read the full article here)

No End to ‘Tamas’ ( Darkness) Around ?

One can imagine that if the plan to provoke riots before Eid in Ayodhya would have been successful, how it could have easily spilled over to the other parts of the country.

Image for representational purpose. Credit: Hindustan Times

It was the early 1970s when Bhisham Sahni, the legendary Hindi writer had penned the novel Tamas. It looks at the Hindu-Muslim riots in India in the backdrop of the Partition. Its central character is Nathu, who is Dalit and does the work of removing hides from dead animals. A local politician persuades Nathu to kill a pig; the act is later used to foment a riot in the city.

It has been more than 40 years since the novel was written, but it still resonates with today’s India as it throws light on the ‘fault lines’ of Indian society and shows the ease with which they can be weaponised.

A fortnight back, a similar attempt to provoke a riot was made in Ayodhya using a similar technique; however, prompt action by the district police averted a riot there.

( Read the full article here)

Politics of Cultural Nationalism, People’s Opinion and Hindi Intellectual : Virendra Yadav

Leading Writer and Critic Virendra Yadav will be delivering the fifth lecture in the ‘Sandhan Vyakhyanmala Series’ ( in Hindi) on Saturday,14 th May,  2022, at 6 PM (IST).

He will be speaking on ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति , जनमानस और हिंदी बुद्धिजीवी’ ( Politics of Cultural Nationalism, People’s Opinion and Hindi Intellectual)

This online lecture would be held on zoom and will also be shared on facebook as well : :facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/84131408337?pwd=ZUp6eWg5WGdYVVY1ZkdzQ3ZzRnhoQT09

Meeting ID: 841 3140 8337
Passcode: 692956

Organised by :

NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh

——–

संधान व्याख्यानमाला – पांचवा वक्तव्य

विषय : सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीति , जनमानस और हिंदी बुद्धिजीवी 

वक्ता : अग्रणी लेखक एवं आलोचक वीरेंद्र यादव 

शनिवार, 14 मई , शाम 6 बजे 

सारांश :

1- ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ मात्र एक राजनीतिक व्यूहरचना न होकर एक ऐसी अवधारणा है जिसकी गहरी जड़े पारम्परिक रूप से  हिंदू जनमानस में  मौजूद हैं।
2- 1857 से लेकर 1947 तक विस्तृत ‘स्वाधीनता’ विमर्श में इस हिन्दू मन की शिनाख्त की जा सकती है।
3- स्वाधीनता आंदोलन इस हिन्दू मन से मुठभेड़ की नीति न अपनाकर मौन सहकार की व्यावहारिकता की राह पर ही चला।
4- हिंदी क्षेत्र में तर्क, ज्ञान  व  वैज्ञानिक चिंतन की धारा भारतीय समाज की वास्तविकताओं में कम अवस्थित थीं, उनकी प्रेरणा के मूल में पश्चिमी आधुनिकता व वैश्विक प्रेरणा अधिक थी।
5- हिंदी क्षेत्र व समाज में ज़मीनी स्तर व हाशिये के समाज के बीच से जो तार्किक, अंधविश्वास विरोधी व विज्ञान सम्मत सुधारवादी प्रयास हुए उन्हें मुख्यधारा के चिंतन-विचार में शामिल नहीं किया गया।
6- ध्यान देने की बात है कथित ‘हिंदी नवजागरण’ विभेदकारी वर्ण-जातिगत सामाजिक संरचना की अनदेखी कर प्रभुत्ववादी मुहावरे में ही विमर्शकारी रहा।
7- संविधान सम्मत धर्मनिरपेक्ष आधुनिक भारत की परियोजना में    भारतीय समाज की धर्म व जाति की दरारों के जड़मूल से उच्छेदन को प्रभावी ढंग से शामिल नहीं किया जा सका।
8-सारी आधुनिकता के बावजूद हिंदी बुद्धिजीवियों का वृहत्तर संवर्ग वर्ण और वर्ग से मुक्त होकर   जनबुद्धिजीवी की भूमिका न अपना सका।
9- सामाजिक न्याय की अवधारणा का मन में स्वीकार भाव न होना, हिंदी बुद्धिजीवी की एक बड़ी बाधा है।
10- ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रतिविमर्श रचने के हिंदी बुद्धिजीवी के उपकरण वही रहे जो हिंदू बुद्धिजीवियों के।
11- हिंदी बुद्धिजीवी के सवर्णवादी अवचेतन से उपजा दुचित्तापन ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का प्रतिविमर्श रचने में एक बड़ी बाधा है।

आयोजक : न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव NSI  ( हिंदी प्रदेश)

‘पृथ्वी के असंख्य घाव’  गिनता अकेला आदमी

Image courtesy -https://www.inc.com/


…..यह हमारी सोच की एक अनपहचानी सीमा है
नहीं समझते हम
कि अकेला आदमी जब सचमुच अकेला होता है
तो वह गिन रहा होता है
पृथ्वी के असंख्य घाव
और उनके विरेचन के लिए
कोई अभूतपूर्व लेप तैयार कर रहा होता है।
(अकेला आदमी – विमलेश त्रिपाठी)

कालजयी रचनाएं समय स्थान की सीमाओं को लांघ कर किस तरह आप को अपनी लगने लगती हैं, इसको बयां करना मुश्किल है।

हान्स क्रिश्चन एंडरसन (2 अप्रैल 1805- 4 अगस्त 1875) महान डैनिश लेखक – जिन्होंने नाटकों, यात्रा वृत्तांतों , उपन्यासों और कविताओं के रूप में प्रचुर लेखन किया – अपनी परिकथाओं के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। उनकी परिकथाएं नौ खंडों में प्रकाशित हुई हैं और दुनिया की 125 जुबां में अनूदित भी हुई हैं।

उनकी एक ऐसी अदभुत रचना है ‘राजा के नए कपड़े’ – जिसे हम ‘निर्वस्त्र राजा’ के तौर पर अधिक जानते हैं।

जब जब किसी मुल्क में अधिनायकवाद की हवाएं चलने लगती हैं, और लोगों पर अधिनायक की अजेयता का जादू सर चढ़ कर बोलने लगता है और उसके खिलाफ बोलना भी कुफ्र में शुमार किया जाने लगता है, यह कहानी नए सिरेसे मौजूं हो जाती है।

विशाल जुलूस में निर्वस्त्र निकल पड़ा राजा, जो कथित तौर पर जादूई वस्त्र पहना है – जिन्हें देख कर अधिकतर लोग खूप गुणगान किए जा रहे हैं – और उसकी सच्चाई को बतानेवाले उस नन्हे बच्चे का रूपक आज भी मन को मोहित करता रहता है।

एक संवेदनशील, न्यायप्रिय व्यक्ति को अन्दर ही अन्दर ताकत देता रहता है।

ऐसी ही एक अन्य रचना है ‘Enemy of the People ’ (जनता का दुश्मन,1882 ) जिस नाटक की रचना नॉर्वे के महान नाटककार हेनरिक इब्सेन (20 मार्च 1928 –  23 मई 1906 )ने की थी। बताया जाता है कि शेक्सपीयर के बाद दुनिया भर में इन्हीं के नाटक आज भी खेले जाते हैं। नाटक का प्रमुख सन्देश यही है कि एक व्यक्ति, जो अकेला खड़ा रहता है, वह जनता की भीड़ से अधिक ‘‘सही’’ होता है। अपने दौर की उस धारणा को कि समुदाय/समाज बहुत महान संस्था है और जिस पर भरोसा किया जाना चाहिए उसी को वह चुनौती देता है।

(Read the complete article here)

How Did UP Decide : Identities, Interests and Politics – Prof Zoya Hasan

Prof Zoya Hasan, Professor Emerita, Jawaharlal Nehru University and Distinguished Faculty, Council for Social Development, New Delhi, will be delivering a Special lecture  in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative, at 6 PM, (IST) Sunday, 24 th April, 2022.

She will be speaking on ‘‘How did UP Decide: Identities, Interests and Politics”

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/81240964790?pwd=OEd1OU00ejA5d1ZxYWlMRzFaOGNkdz09

Meeting ID: 812 4096 4790
Passcode: 975399

Facebook Live on – http://fb.com/newsocialistinitiative.nsi

Abstract

How did UP Decide: Identities, Interests and Politics

Uttar Pradesh has just seen an intensely contested assembly election which resulted in a second straight victory for the Bharatiya Janata Party in this politically crucial state. This momentous outcome is the subject of intense debate among analysts and indeed the public at large. There was a premise this time, particularly in UP, that communal polarisation wasn’t working because of acute economic discontent which could trigger electoral change. However, the large-scale discontent over many economic issues, including jobs, did not translate into a decision to vote out the government. Many analysts have attributed BJP’s reelection to welfare measures and free rations to the poor during the lockdown. This cannot explain BJP’s persistent success which extends beyond this election. The welfarist argument ignores the compelling logic of long term communalism and the systematic construction of the Hindu vote in UP politics since the time of the Ramjanmabhoomi movement centered in UP and the communal campaigns in the last five years, its impact is reflected in the election results.This construction of the Hindu vote also trumped the caste-based politics of the regional Samajwadi Party and Bahujan Samaj Party through a mobilization of upper caste and  non-dominant backward and lower caste communities. Communal polarization and identity politics is the keystone of their strategy and the decisive factor driving electoral choices. 

Silence of the Powerful

Why the Corporate Czars are Silent over increasing attacks on Social Fabric and rising Communalism 

Celebrity actors and players share an interesting commonality in this part of South Asia.

Their moral compass normally veers towards the ‘righteousness’ of the rich, powerful and the influential.

Lynching of innocent people on the streets for their faith, social and governmental hounding of lovers belonging to different communities, call for genocide of religious minorities from public forums and similar hate filled acts, nothing normally impinges on their conscience.

Corporate elites are qualitatively no different.

Occasionally, there are feeble voices of disagreements also.

What Kiran Mazumdar Shaw – founder of India’s largest biopharmaceutical company Biocon – did was exactly this only. She expressed her indignation about growing religious divide in the country and underlined how it would be detrimental to India’s global leadership in ITBT ( Information Technology and Bio Technology)

Definitely her statement which was couched in ‘economic terms’ was very mild, but it did not stop attacks by right-wing trolls.

( Read the full article here)

Challenges to India’s Democracy : Prof Zoya Hasan

Prof Zoya Hasan, Professor Emerita, Jawaharlal Nehru University and Distinguished Faculty, Council for Social Development, New Delhi, will be delivering the 16 th lecture  in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative, at 6 PM, (IST) Sunday, 27 th March, 2022.

She will be speaking on ‘Challenges to India’s Democracy

Prof Zoya Hasan has written and edited many books on state, political parties, ethnicity, gender and minorities in India and society in north India and has been a visiting Professor to the Universities of Zurich, Edinburgh and Maison des Sciences de L’Homme, Paris.

Her most recent publications include Forging Identities : Gender, Communities And The State In India ( edited) ,  Agitation to Legislation – Negotiating Equity and Justice in India ,   Congress after Indira: Policy, Power and Political Change (1984–2009), Politics of Inclusion: Castes, Minorities and Affirmative Action, (2009) and a collection of essays titled Democracy and the Crisis of Inequality

Abstract

Challenges to India’s Democracy

The 75th anniversary of Indian Independence is a landmark event in the history of our democracy. It is for this reason a significant moment to assess the state of India’s democracy. As the largest democracy in the non-western world, India is a success story. Its success, however, has primarily been recognized as an electoral democracy, with regular free and fair elections registering high voter participation, and also peaceful transfer of power. Elections certainly are a climactic moment of the democratic process but by no means the only important one. Politics between elections is central for understanding the challenges facing Indian democracy, and it is important, therefore, to contextualize democracy.

Three years since the Bhartiya Janata Party government was re-elected has seen the consolidation of the process begun in 2014 – the establishment of a Hindu state. This process has been facilitated by the combination of majoritarianism and authoritarianism which has resulted in democracy becoming thinner, not accidentally, but deliberately. This does raise certain questions about the relationship between Hindu nationalism and democracy which seems to weaken the idea of democracy moderated by institutions. 

This paper tries to make sense of these shifts through a thematic exploration of the trajectory of Indian democracy since 2014 focusing on three overlapping developments -the consolidation of a majoritarian brand of politics, the decline of independent institutions and the shrinking space for political dissent and protests -which has undermined democracy. Each of these issues distinct and significant in its own right when taken together constitutes a major risk to Indian democracy. However, public protests in the last few years have emerged as a major bulwark against authoritarian rule and the erosion of democratic dissent. For the Opposition it’s a moment of reckoning but there are signs of churning among the Opposition as well.

Axing Scholarships, Denying Opportunities

When Government itself Does Not Have Any Qualms in rationalising Drona Mindset

( Photo Courtesy : Feminism in India)

[H]istory has come to a stage when the moral man, the complete man, is more and more giving way, almost without knowing it, to make room for the . . .commercial man, the man of limited purpose. This process, aided by the wonderful progress in science, is assuming gigantic proportion and power, causing the upset of man’s moral balance, obscuring his human side under the shadow of soul-less organization.

—Rabindranath Tagore, Nationalism, 1917

( Quoted in ‘Not for Profit – Why Democracy Needs Humanities, Martha Nussbaum, Princeton University Press, 2010)

A single story is sometimes enough to tell how an institution functions and how it needs to be overhauled.

Aruna’s long struggle to get overseas scholarship is one such story.

Son of landless agricultural labourers from Orissa, this bright student, belonging to a socially oppressed community, had applied to get a overseas scholarship via the National Overseas Scholarship – which awards scholarships to students from SC, ST, Denotified tribes etc – and even had lost two years in bureaucratic wrangling despite the fact that he had already got admission into Essex University.

Thanks to the timely intervention of a group of Ambedkarite thinkers from Nagpur, who filed a petition in the Delhi Highcourt on his behalf , which ultimately ruled in the student’s favour.

It would be cliche to say that Aruna’s struggle is an exception.

Story of Vishal Kharat is qualitatively no different who is still trying to get a scholarship for the last two years and has discovered to his dismay that the scholarship portal itself does not work properly.

Instances galore how this ambitious scheme which was launched in the wee hours of India’s independence when Nehru was the Prime Minister and a great scholar and freedom fighter Maulana Abul Kalam Azad was a Cabinet Minister for education, has been left to go slowly into oblivion.

The latest decision by the Union ministry of social justice and empowerment, to not to fund scholarships for marginalised students keen to study India’s history, culture abroad, is just another indication of how it is being implemented.

We can recall that it was the year 2012 when UPA government led by Congress was in the saddle this scheme was extended to Humanities as well and every year 100 students from the socially deprived, oppressed communities started receiving it but with the change of power at the centre things started changing drastically

Like many of its earlier decisions, this decision to axe scholarship to study humanities abroad was taken without consulting the stakeholders involved in the process or without even giving a hint of how the government wants to proceed in this unique empowerment initiative. The fact that the final date to apply for this scheme is to expire on 31 st March and when there was hardly anytime left to young scholars who are keen to study abroad, to search for alternate path to fulfill their dreams.

The rationale being provided by the powers that be appears unconvincing.  

It talks of utilising rich availability of repositories, records as well as books available in Indian institutions and various experts on this subject of India’s culture, civilisation etc and divert the resources thus saved to study other subjects like Science, technology.

It is rather difficult to believe this claim but even if for the sake of discussion we concede, can it be said with certainty that the existing faculty and these institutions would be sensitive to the issue or the concerns of emerging talents from the oppressed, exploited sections of our society, and would be accommodating as well! Fact is that even Higher Educational Institutions are not free from exclusions, discrimination  on the basis of caste, gender, community and despite constitutional provisions for affirmative action existing since decades, the character of the academia in most of these institutions is very much exclusive mainly dominated by the so called upper castes.

Cases of discrimination faced by students from such Institutions keep piling up leading even to many unfortunate incidents – rightly called as ‘institutional murders’ of many such talents.

The stories of suicides of  the likes of of RohithVemula, ( HCU, Hyderabad) ; Payal Tadvi ( Medical College, Mumbai,) or Fathima Latheef ( IIT Madras) and many of their ilk cannot be seen as exceptions.

A related point is the status of academic freedom in India.

With the ascendance of right-wing politics world over the very idea of academic freedom has come under attack globally – including India

Thanks to the majoritarian turn in the Indian politics where religious minorities are being further marginalised and invisibilised – the ambience which exists here within the academia itself is a pale shadow of its earlier situation. It is becoming increasingly difficult nay impossible to have a critical, open minded discussion on themes, topics which are found not palatable to the ruling dispensation which is a prerequisite for any healthy educational institution.

We have before us cancellation of international seminars on innocuous themes even like Scientific Temper or teachers being hauled to courts after taking up discussions about ‘Kashmir within the class ‘ or for engaging in open ended discussion about nationalism inside class or students-teachers being charged with sedition for protesting about highhandedness of the government.

Secondly, with the rightwing holding reins of power with a brutal majority, has also led to radical changes in the content of humanity studies playing mythology over facts e.g. there are allegations how the draft history syllabus pushed by the UGC presents a theory of the origin of caste system which relates to the advent of the ‘Muslim rule’ here.

Can we ever accept that these bright students opting for scholarships abroad who have themselves experienced caste, community or class based deprivation, discrimination in their younger days, would be ever ready to easily gulp down such trash as intellectual discourse.

Definitely not.

This decision to axe funds to socially oppressed sections to study humanity abroad very much gels with the overt concerns of the people in power which are evident in the New Education Policy 2020 which envisions restoring the the role of India as a ‘Vishwa Guru’ and interestingly remains silent on caste and other discriminations and even does not talk about reservations. It clubs SC / ST, OBC and minority communities as an acronym SEDGs – Socially and Economically Disadvantaged Groups.

What needs to be underlined that this step by the Ministry has raised concerns among the members of the international academic community, and scholars of India spread all over the world as well  and in an open letter addressed to the Ministry of Social Justice and Empowerment they have demanded that the government withdraws this immediate changes in the policy.

It emphasises how ‘[t]he argument that one need not go abroad to study India is intellectually flawed and will only serve to isolate Indian scholarship from the rest of the world.’ and these amendments attest to a lack of understanding of how interdisciplinary research is conducted today, where natural sciences, law, history, sociology and the humanities work together beyond national boundaries.

Another important point which it make that how it will further negatively impact women recipients of this scholarship who are already ‘disproportionately under-represented in scientific and technological disciplines and tend to more easily find opportunities in the Social Sciences and Humanities’

Last but not the least it also displays the great hiatus between the outwardly, strong image of the ruling dispensation and how paranoid, insecure it is about deeper fault lines of the Indian society.

Perhaps it worries that with increasing interest of the academia of the west in what is happening to the largest democracy in the world, and the study of caste and its attendant asymmetries receiving special attention by them, and also dalit activists, scholars there pursuing it at various levels there, these exclusivist hierarchies have rapidly attracted attention. Not some time ago the California State University system added caste to its non-discrimination policy, prohibiting caste-based discrimination or bias across its 23 campuses.

The ruling dispensation knows very well that the more students from dalit, adivasi and other deprived sections of society go out to study abroad, it will have to be ready to face many such embarassing moments because whereas it itself is keen to invisibilise caste once for all, and even clubbed all these sections – the SC / ST, OBC and minority communities as an acronym SEDGs – Socially and Economically Disadvantaged Groups; the reality as it exists would continue to haunt it.

 Secularism, Communalism and Indian Politics Today : Professor Achin Vanaik

The 15 th lecture in the Democracy Dialogues Series will be delivered by Prof Achin Vanaik on Sunday, 27 th February at 6 PM (IST) 

He will be speaking on 

Secularism, Communalism and Indian Politics Today‘ 

Speaker 

Writer and Social Activist, Former Professor of Political Science at Delhi University Prof Achin Vanaik is a fellow of the Transnational Institute

He is author of numerous books including The Furies of Indian Communalism ( 1997) , The Painful Transition : Bourgeois Democracy in India ( 1990) , Hindutva Rising – Secular Claims, Communal Realities (2017), “Nationalist Dangers, Secular Failings:A Compass for an Indian Left”

Summary  : 

The presentation will start with a series of definitions of crucial concepts such as secular, secularization, secularism as well as distinguishing between religious fundamentalism, religious nationalism and communalism. This is important to get a handle on how the widespread Indian understanding of secularism as an ancient form of ‘tolerance’ is dangerously mistaken. Of course the rise of the political right and far-right is a global phenomenon in the last few decades giving rise to different forms of what can be called the ‘politics of cultural exclusivism’. So the first principle of explanation for this rise has also to be transnational. After this the question of the rise of the Sangh/BJP in the wider context of developments in India over time will be taken up. It is obvious that the Sangh/BJP is seeking to expand its existing power and influence i.e., to establish and expand its hegemony and this must be understood as well as what are the projects central to its efforts to establish a Hindu Rashtra or Nation. It should be obvious that its particular conception of how to secure a strong Indian nation/nationalism must be exposed and combated. The presentation will end with recognising that this is a long term struggle and how we must go about it.

New Socialist Initiative