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APCO to Kotler – The Artificial Glossing of Modi’s Image

Narendra Modi is the first mainstream Indian politician who has tried to build his image rather assiduously. But the acceptance of an award with dubious connections does not add to the glory of the Prime Minister’s post.

Philip Kotler Award

Image Coutesy: The Indian Express

Narendra Modi, the present incumbent to the Prime Minister’s chair, had a little break the other day for an award ceremony. Well, little different from the usual award ceremonies — where the Prime Minister presents awards and gives some pep talk, here Modi himself was presented with the ’First-ever Philip Kotler Award’.

Perhaps looking at Modi’s much-publicised workaholic nature (if one is to believe what is written about him, he is reported to work 18 hours a day without any break) the organisers had seen to it that people who were to be presenting the award were flown in to save his time.

As expected, not only the bhakts but many of Modi’s cabinet colleagues could not hide their glee with this ‘first-ever’ award and went on overdrive to shower praise on him. Soon it dawned upon them that (thanks to The Wire report, which merely posed a few basic questions about this award) there was not much to be elated over this award, so they preferred to suddenly turn mute.

(Read the full article here : https://www.newsclick.in/apco-kotler-artificial-glossing-modis-image)

 

 

 

 

 

Statement on the People’s Resistance against the Citizenship Amendment Bill : New Socialist Initiative

This is a guest post by New Socialist Initiative

New Socialist Initiative stands in solidarity with the people of Assam, Tripura and the other North Eastern states in their heroic struggle against the communally motivated Citizenship Amendment Bill (CAB). It was only because of the resistance of the people that the government couldn’t table the Bill for voting in the Rajya Sabha after surreptitiously passing it in the Lok Sabha. This is in fact a victory for all the progressive and democratic forces of the country,who have been fighting to save and expand the secular character of the nation. While the danger still looms large and there is a strong possibility that the government may try to bring back the bill in the upcoming budget session, the mass resistance of the people has demonstrated very clearly that the evil designs of the fascists in power will not go unanswered and that the people will fight back with all their might. Continue reading Statement on the People’s Resistance against the Citizenship Amendment Bill : New Socialist Initiative

विचार ही अब द्रोह !

(‘चार्वाक के वारिस : समाज, संस्कृति एवं सियासत पर प्रश्नवाचक ‘ की प्रस्तावना से)

कार्ल मार्क्‍स की दूसरी जन्मशती दुनिया भर में मनायी जा रही है।

दिलचस्प है कि विगत लगभग एक सौ पैंतीस सालों में जबसे उनका इन्तक़ाल हुआ, कई कई बार ऐसे मौके आए जब पूंजीवादी मीडिया में यह ऐलान कर दिया कि ‘मार्क्‍स इज डेड’ अर्थात ‘मार्क्‍स मर गया’; अलबत्ता, यह मार्क्‍स की प्रत्यक्ष मौत की बात नहीं थी बल्कि मानवमुक्ति के उस फलसफे के अप्रासंगिक होने की उनकी दिली ख्वाहिश को जुबां दिया जाना था, जो उनके नाम के साथ जाना जाता है। याद किया जा सकता है कि सोवियत रूस का विघटन होने के बाद और जिन दिनों पूंजीवाद की ‘अंतिम जीत’ के दावे कुछ अधिक जोर से उठने लगे थे, पूर्व सोवियत रूस के एक गणराज्य में बाकायदा एक पोस्टर मार्क्‍स की तस्वीर के साथ ‘‘मोस्ट वाटेंड’’ के नारे के साथ छपा था।

यह अलग बात है कि हर बार इस भविष्यवाणी को झुठला कर अग्निपक्षी/फिनिक्स की तरह मार्क्‍स राख से बार बार ‘नया जीवन’ लेकर उपस्थित होते रहे हैं। आलम तो यहां तक आ पहुंचा है कि 1999 में- अर्थात सोवियत रूस के विघटन के लगभग नौ साल बाद- बीबीसी के आनलाइन सर्वेक्षण में मार्क्‍स को सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा विचारक कहा गया था। Continue reading विचार ही अब द्रोह !

नयी पेशवाई, पुरानी पेशवाई 

भीमा कोरेगांव संघर्ष: एक अन्तहीन लड़ाई ?

(उदभावना के आगामी अंक में प्रकाशन हेतु)

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Image : Courtesy – scroll.in

‘वे कौन लोग थे जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना में भरती हुए और जिन्होंने हिन्दोस्तां जीतने में ब्रिटिशों की मदद की ? मैं जो उत्तर दे सकता हूं और – वह काफी सारे अध्ययन पर आधारित है – कि वे लोग जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा बनायी गयी सेना में शामिल हुए वह भारत के अछूत थे। प्लासी की लड़ाई में क्लाइव के साथ जो लोग लड़े वे दुसाध थे और दुसाध अछूतों की श्रेणी में आते हैं। कोरेगांव की लड़ाई में जो लोग लड़े वे महार थे और महार अछूत होते हैं। इस तरह चाहे उनकी पहली लड़ाई या आखरी लड़ाई हो अछूत ब्रिटिशों के साथ लड़े और उन्होंने हिन्दोस्तां जीतने में ब्रिटेन की मदद की। इस सच्चाई को मार्केस आफ टिवडलीडेल ने पील आयोग के सामने पेश अपनी नोट में रेखांकित किया है, जिसका गठन भारतीय सेना के पुनर्गठन के बारे में रिपोर्ट तैयार करने के लिये 1859 में किया गया था।

ऐसे कई हैं जो अछूतों द्वारा ब्रिटिश सेना में शामिल होने को देशद्रोह का दर्जा देते हैं। देशद्रोह हो या न हो, अछूतों की यह कार्रवाई बिल्कुल स्वाभाविक थी। इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा है कि किस तरह एक मुल्क के लोगों के एक हिस्से ने आक्रमणकारियों से सहानुभूति दिखायी है, इसी उम्मीद के साथ कि आगुंतक उन्हें अपने देशवासियों के उत्पीड़न से मुक्ति दिला देगा। वे सभी जो अछूतों की आलोचना करते हैं उन्हें चाहिये कि वे अंग्रेज मजदूर वर्ग द्वारा जारी घोषणापत्रा को थोड़ा पलट कर देखें।’’

– अम्बेडकर

/लन्दन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन हेतु अम्बेडकर ने जो आलेख प्रस्तुत किया, जो बाद में ‘अनटचेबल्स एण्ड द पैक्स ब्रिटानिका’ नाम से उनकी संकलित रचनाओं में शामिल किया गया, उसमें उन्होंने यह बात कही थी।/

प्रस्तावना

स्मृति का वजूद कहां होता है ? और विस्मृति के साथ उसका रिश्ता कैसे परिभाषित होता है ?

कभी लगता है कि स्मृति तथा उसकी ‘सहचर‘ विस्मृति एक दूसरे के साथ लुकाछिपी का खेल खेल रहे हों। स्मृति के दायरे से कब कुछ चीजें, कुछ अनुभव, कुछ विचार विस्मृति में पहुंच जाएं और कब किसी शरारती छोटे बच्चे की तरह अचानक आप के सामने नमूदार हो जाएं इसका गतिविज्ञान जानना न केवल बेहद मनोरंजक बल्कि मन की परतों की जटिल संरचना को जानने के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है । यह अकारण ही नहीं कि किसी चीज / घटनाविशेष को मनुष्य कैसे याद रखता है और कैसे बाकी सबको भूल जाता है इसको लेकर मन की पड़ताल करने में जुटे मनीषियों / विद्वानों ने कई सारे ग्रंथ लिख डाले हैं । Continue reading नयी पेशवाई, पुरानी पेशवाई 

हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश – स्मृतिलोप  से हट कर यथार्थ की ओर

( अकार, 51 – हिंदी समाज पर केंद्रित अंक में जल्द ही प्रकाशित)

‘देवताओं, मंदिरों और ऋषियों का यह देश ! इसलिए क्या यहां सबकुछ अमर है ? वर्ण अमर, जाति अमर, अस्पृश्यता अमर ! ..युग के बाद युग आए ! बड़े बड़े चक्रवर्ती आये ! ..दार्शनिक आए ! फिर भी   अस्पृश्यता  , विषमता अमर है ! ..यह सब कैसे हो गया ? किसी भी महाकवि, पंडित, दार्शनिक, सत्ताधारी सन्त की आंखों में यह अमानुषिक व्यवस्था चुभी क्यों नहीं ? ..बुद्धिजीवियों, संतों और सामर्थ्यवानों का यह अंधापन, यह संवेदनशून्यता दुनिया भर में खोजने पर भी नहीं मिलेगी ! इससे एक ही अर्थ निकलता है कि यह व्यवस्था बुद्धिजीवियों, सन्तों और राज करनेवालों को मंजूर थी ! यानी इस व्यवस्था को बनाने और उसे बनाये रखने में बुद्धिजीवियों और शासकों का हाथ है।

– बाबुराव बागुल /17 जनवरी 1930 –  26 मार्च 2008/

जानेमाने मराठी लेखक

1.

वर्ष 2014 में हिन्दी की प्रथम दलित कविता कही जानेवालीे एक कविता ‘अछूत की शिकायत’ 1 के सौ साल पूरे हुए। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित ‘सरस्वती’ पत्रिका के सितम्बर माह में प्रकाशित अंक में यह कविता छपी थी।

हीरा डोम द्वारा रचित इस कविता पर बहुत कुछ लिखा गया है, किस तरह यह कविता साहित्य में नयी जमीन तोड़ती है, धर्म, पूंजीवाद, सामाजिक गैरबराबरियों को वैधता प्रदान करती मौजूदा व्यवस्था को प्रश्नांकित करती है, ढेर सारी बातें लिखी गयी हैं। फिलवक्त़ न मैं इसकी तरफ आप का ध्यान दिलाना चाहता हूं, न इस बहस की तरफ कि क्या उसे प्रथम दलित कविता कहा जा सकता है या नहीं ! साहित्य के सुधी पाठक एवं प्रबुद्ध आलोचक इसके बारे में मुकम्मल राय दे सकते हैं। /इतनाही याद रखना जरूरी है कि पत्रिका में छपनेवाली रचनाओं के बारे में संपादक के तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी काफी सख्त माने जाते थे। उनकी इस सख्ती का अन्दाज़ा इस बात से लगता है कि निराला – जो बाद में महाकवि के तौर पर सम्बोधित किए गए – उनकी चन्द कविताएं भी शुरूआत में उन्होंने लौटा दी थीं। लाजिम है कि हीरा डोम की इस कविता को प्रकाशित करने में भी उन्होंने अपने पैमानों को निश्चित ही ढीला नहीं किया होगा।/

कल्पना की जाए कि सरस्वती के अंक में अगर उपरोक्त कविता छपी नहीं होती तो हीरा डोम नामक वह शख्स ताउम्र लगभग गुमनामी में ही रहते। कोई नहीं जान पाता कि उत्पीड़ित समुदाय में एक ऐसे कवि ने जन्म लिया है, जिसकी रचनाओं में जमाने का दर्द टपकता है। Continue reading हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश – स्मृतिलोप  से हट कर यथार्थ की ओर

50 Years Later, Shadow of Keezhvenmani Continues to Hover Over our Republic

December 25, 1968, termed as ‘Black Thursday’, saw the first mass crime against Dalits in independent India, who were fighting for respectable wages under the leadership of the Communist Party.

50 Years Later, the Shadow Keezhvenmani Continues to Hover Over our Republic

Image for representational use only; Image Courtesy : Socialist India

P Srinivasan, a veteran village functionary who cremates the dead had, in an interview done few years ago, described the darkening early morning on December 26, 1968, when the bodies began arriving from Keezhvenmani, a non-descript village in Thanjavur district of Tamil Nadu.

The village functionary, called Vettiyan, who is nearing 60 now, still remembered the number: “There were 42 corpses in all, horribly burnt and mangled. The stench was awful,” Pointing towards the plot of land where they were cremated, he said “All of them were Dalits, burnt to death in a caste clash. I cremated them on these very grounds.”

Srinivasan, then 23-year-old, shared vivid details of that ‘Black Thursday’ in 1968, a day that has remained etched in his mind.

December 25, 2018, completes 50 years of that ‘Black Thursday in 1968’, which is remembered as the first massacre of Dalits in independent India. The Dalits were martyred while fighting for respectable wages under the leadership of the Communist Party. All of these landless peasants had started to organise themselves into a campaign for higher wages following the increase in agricultural production in the area.

(https://www.newsclick.in/50-years-later-shadow-keezhvenmani-continues-hover-over-our-republic)

आई आई टी मद्रास – आधुनिक दौर का अग्रहरम !

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नागेश / बदला हुआ नाम/ – जो आई आई टी मद्रास में अध्ययनरत एक तेज विद्यार्थी है, तथा समाज के बेहद गरीब तबके से आता है – उसे उस दिन मेस में प्रवेश करते वक्त़ जिस अपमानजनक अनुभव से गुजरना पड़ा, वह नाकाबिले बयानात कहा जा सकता है। उसे अपने गांव की जातीय संरचना की तथा उससे जुड़े घृणित अनुभवों की याद आयी। दरअसल किसी ने उसे बाकायदा मेस में प्रवेश करते वक्त़ रोका और कहा कि अगर वह मांसाहारी है, तो दूसरे गेट से प्रवेश करे।

मेस के गेट पर बाकायदा एक पोस्टर लगा था, जिसे इस नये ‘निज़ाम’ की सूचना दी गयी थी। यहां तक कि अपने खाने की पसंदगी के हिसाब से हाथ धोने के बेसिन भी बांट दिए गए थे। ‘शाकाहारी’ और ‘मांसाहारी’। एक रिपोर्टर से बात करते हुए नागेश अपने गुस्से को काबू करने में असमर्थ दिख रहे थे। उन्होंने पूछा कि आखिर आई आई टी का प्रबंधन ऐसे भेदभावजनक आदेश को छात्रों से सलाह मशविरा किए बिना कैसे निकाल सकता है। Continue reading आई आई टी मद्रास – आधुनिक दौर का अग्रहरम !