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SAB YAAD RAKHA JAEGA: Nationwide Protest against repression on anti-CAA activists and democratic voices of dissent

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Guest Post by PEOPLE UNITED AGAINST REPRESSION ON ANTI CAA PROTESTERS

Over the past two months the Delhi Police has arrested Jamia students Safoora Zargar, Meeran Haider, Asif Iqbal Tanha, JNU students Natasha Narwal and Devangana Kalita along with activists Ishrat Jahan, Khalid Saifi, Gulfisha Fatima, Sharjeel Imam and hundreds of other Muslim youth. Some among them have been booked under the amended UAPA as a means of punishing the widespread protests against the CAA-NRC that emerged across the country in December last year. Most recently AMU students Farhan Zuberi and Ravish Ali Khan have been arrested by the UP police for participating in the anti-CAA protests. It is clear that the spate of arrests are far from over and new names of democratic activists are likely to be added to this already long list. Meanwhile those openly advocating violence against peaceful protesters such as Kapil Mishra, Parvesh Verma and Anurag Thakur have gone scot-free. Continue reading SAB YAAD RAKHA JAEGA: Nationwide Protest against repression on anti-CAA activists and democratic voices of dissent

Crisis for the People, Opportunity for the Corporate-Government Nexus : NSI

Statement of New Socialist Initiative (NSI) on India’s ‘war against Covid 19’

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Today, India has emerged as a new epicentre for the novel corona virus in the Asia Pacific region.With 1,58,333 confirmed cases of Covid 19 and deaths of total of 4,531 people after contracting the virus, it has already crossed China’s Covid-19 numbers.

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New Socialist Initiative (NSI) feels that the grim news of steadily rising infections and fatalities reveal before everyone a worrying pattern but the government either seems to be oblivious of the situation or has decided to shut its eyes. It is becoming increasingly clear that the Union government has used incomplete national-level data to justify arbitrary policy decisions, defend its record and underplay the extent of Covid-19 crisis.

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Absence of transparency vis-a-vis data collection of Covid infection levels could be said to be the tip of the iceberg of what has gone wrong with India’s ‘war against Covid 19’.
The Prime Minister’s announcement of a 21-day countrywide lock down came with a mere four-hour notice. It was done without engaging in any collective decision-making process with states to honour and enhance the spirit of “cooperative federalism” between the Centre and the States. Continue reading Crisis for the People, Opportunity for the Corporate-Government Nexus : NSI

असहमति के दमन के लिए मानवाधिकार-कर्मियों और लेखकों-पत्रकारों की गिरफ्तारियों का सिलसिला बंद करो! 

राजनीतिक उत्पीड़न और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए तालाबंदी के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ सांस्कृतिक-सामाजिक संगठनों का संयुक्त आह्वान

महामारी से मुक्ति के लिए जनएकजुटता का निर्माण करो!

तालाबंदी के दौरान जेलबंदी

महामारी और तालाबंदी के इस दौर में समूचे देश का ध्यान एकजुट होकर बीमारी का मुक़ाबला करने पर केन्द्रित है.

लेकिन इसी समय देश के जाने माने बुद्धिजीवियों, स्वतंत्र पत्रकारों, हाल ही के सीएए-विरोधी आन्दोलन में सक्रिय रहे राजनीतिक कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं की ताबड़तोड़ गिरफ़्तारियों ने नागरिक समाज की चिंताएं बढ़ा दी हैं.

बुद्धिजीवियों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारियां सरकारी काम में बाधा डालने (धरने पर बैठने) जैसे गोलमोल आरोपों में और  अधिकतर विवादास्पद यूएपीए क़ानून के तहत की जा रही हैं. यूएपीए कानून आतंकवाद से निपटने के लिए लाया गया था. यह विशेष क़ानून ‘विशेष परिस्थिति में’ संविधान  द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों को परिसीमित करता है. जाहिर है, इस क़ानून का इस्तेमाल केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए जिनका सम्बन्ध आतंकवाद की किसी वास्तविक परिस्थिति से हो. दूसरी तरह के मामलों में इसे लागू करना संविधान के साथ छल करना है. संविधान लोकतंत्र में राज्य की सत्ता के समक्ष नागरिक के जिस अधिकार की गारंटी करता है, उसे समाप्त कर लोकतंत्र को सर्वसत्तावाद में बदल देना है.

गिरफ्तारियों के लगातार जारी सिलसिले में सबसे ताज़ा नाम जेएनयू की दो छात्राओं, देवांगना  कलिता और नताशा नरवाल के हैं. दोनों शोध-छात्राएं प्रतिष्ठित नारीवादी आन्दोलन ‘पिंजरा तोड़’ की संस्थापक सदस्य भी हैं.  इन्हें पहले ज़ाफ़राबाद धरने में अहम भूमिका अदा करने के नाम पर 23 मई को गिरफ्तार किया गया. अगले ही दिन अदालत से जमानत मिल जाने पर तुरंत अपराध शाखा की स्पेशल ब्रांच द्वारा क़त्ल और दंगे जैसे आरोपों के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया ताकि अदालत उन्हें पूछ-ताछ के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दे. आख़िरकार उन्हें दो दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया है. Continue reading असहमति के दमन के लिए मानवाधिकार-कर्मियों और लेखकों-पत्रकारों की गिरफ्तारियों का सिलसिला बंद करो! 

Lockdown 4.0 – A Tribute to Labourers by Navchintan Kala Manch

नवचिंतन कला मंच द्वारा – बीते दिनों में अपनी ही धरती पे बेगानेपन का अहसास कर हज़ारों किलोमीटर दूर अपने घरों की उम्मीद के निकले लोगों के साथ हुए हादसों की दास्तान ज़रूर देखें।

प्रार्थना स्थलों पर लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध

news on judiciary

कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय.
ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय

क्या अपने ‘खुदा’ को आवाज़ देने के लिए बांग देने की जरूरत पड़ती है ?

आज से छह सदी पहले ही कबीर ने यह सवाल पूछ कर अपने वक्त़ में धर्म के नाम पर जारी पाखंड को बेपर्दा किया था. पिछले दिनों यह मसला नए सिरे से उछला जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस बारे में एक अहम फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि अज़ान अर्थात प्रार्थना के लिए आवाज़ देने की बात इस्लाम का हिस्सा है लेकिन वही बात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के बारे में नहीं कही जा सकती, लिहाजा रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल के इजाजत नहीं दी जा सकती.

अदालत के मुताबिक मुअज्जिन मस्जिद की मीनार से अपनी मानवीय आवाज़ में अज़ान दे सकता है और उसे महामारी रोकने के लिए राज्य द्वारा लगायी गयी पाबंदियों के तहत रोका नहीं जा सकता, अलबत्ता उसके लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल वर्जित रहेगा.

ध्यान रहे कि अदालत यूपी पुलिस द्वारा जगह-जगह मनमाने ढंग से अज़ान पर लगायी गयी पाबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर विचार कर रही थी. हाथरस, अलीगढ़ आदि स्थानों पर महामारी के कानूनों का हवाला देते हुए पुलिस वालों ने अज़ान देने पर ही पाबंदी लगायी थी, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था.

उम्मीद है कि अदालत के फैसले के मद्देनज़र यूपी पुलिस मनमाने तरीके से अज़ान पर नहीं रोक लगाएगी, निश्चित ही यह सुनिश्चित करेगी कि इसके लिए किसी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है.

गौरतलब है कि अदालत ने संविधान के तहत प्रदत्त बुनियादी अधिकारों में शामिल आर्टिकल 19/1/ए का हवाला देते हुए जो इस बात को सुनिश्चित करता है कि‘किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह अन्य लोगों को बन्दी श्रोता (captive listeners) बना दें’ यह निर्देश दिया.

निश्चित ही मस्जिदों में जहां बिना अनुमति के लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल पर पाबंदी रहेगी, वही बात मंदिरों, गुरुद्धारों या अन्य धार्मिक स्थलों पर भी लागू रहेगी ताकि आरती के बहाने या गुरुबाणी सुनाने के बहाने इसी तरह लोगों को ‘बन्दी श्रोता’ मजबूरन न बनाया जाए. ( Read the full article here :https://hindi.theprint.in/opinion/allahabad-high-court-ban-loudspeakers-at-prayer-places-exposes-hypocrisy-in-the-name-of-faith/140765/)

Community-Based Mapping of Covid: Nothing Official About it

No doubt the clarification that India will not map Covid-19 infections on the basis of religion has many heaving sighs of relief. But will the peace last?

Community-Based Mapping of Covid: Nothing Official About it

Image Courtesy: AP

Move for community-based mapping of coronavirus?” a recent news item in a prestigious daily asked, getting tongues wagging about “closed-door meetings at the highest level”, though no “official” decision had been taken in themThe Ministry of Health declared that any such news is “baseless, incorrect and irresponsible”. Lav Agarwal, the top bureaucrat in the ministry—who interacts with the media on Covid-related developments—called such news reports “…very irresponsible”. “The virus does not see people’s caste, creed or religion,” he said, quoting the Supreme Court’s directions on controlling non-factual or fake news.

No doubt the official clarification has many heaving sighs of relief.

The relief is understandable, because it was only last month—when the Novel Coronavirus pandemic had started taking a toll—that Muslims were being stigmatised as “super-spreaders” of the disease.

Taking a grim view of the situation, in its press conference o6 April, the World Health Organisation had given the Indian government some simple advice. The WHO said, in response to an India-specific question, that countries should not profile Covid-19 infections in religious, racial or ethnic terms. The WHO Emergency Programme Director Mike Ryan also underlined that every positive case should be considered a victim.

( Read the full article here)

निरंकुशता के स्रोत, प्रतिरोध के संसाधन : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha

राजनीति का आम सहजबोध यह है कि सत्ता की निरंकुशता लोकतंत्र का निषेध है। लोकतंत्र राजनीतिक सत्ता का गठन तो करता है, लेकिन उसे निरंकुश नहीं होने देता। यदि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत निरंकुश सत्ता का उद्भव होता है तो उसे लोकतंत्रा की दुर्बलता, उसके विकार या उसमें किसी बाहरी अलोकतांत्रिक शक्ति के हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है। यदि लोकतंत्र का अर्थ यह है कि सत्ता के स्रोत लोक में स्थित हैं तो यह स्वयंसिद्ध है कि लोकतांत्रिक सत्ता निरंकुश नहीं हो सकती।

इसी तरह राजनीति का सहजबोध यह भी है कि सत्ता की निरंकुशता प्रतिरोध को जन्म देती है और प्रतिरोध की जड़ें लोक में स्थित होती हैं। निरंकुशता यदि लोकतंत्र का निषेध है तो यह भी स्वयंसिद्ध है कि लोक या जन ही प्रतिरोध के मूल आधार और उसके प्रमुख संसाधन हैं। यह दूसरी मान्यता पहली के साथ जुड़ी हुई है। यदि पहली मान्यता टिकती है तो दूसरी की सत्यता भी साबित होती है। यदि पहली संदेह के घेरे में आती है तो दूसरी के स्वयंसिद्ध होने पर भी प्रश्न खड़े होते हैं।

और, प्रश्न तो खड़े होते हैं। वास्तविकता की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वह मान्यताओं की परवाह नहीं करती – बहुप्रचलित और स्वयंसिद्ध प्रतीत होने वाली मान्यताओं की भी नहीं। दूसरी तरफ़, मान्यताओं की – ख़ास तौर पर बहुप्रचलित मान्यताओं की – बनावट और उनकी ज़मीन ऐसी होती है कि वास्तविकताओं के उलट होने के बावजूद वे चलन में बनी रहती हैं। ऐसी स्थिति में पहले तो यह देखना होता है कि वास्तविकता क्या है और संबंधित मान्यताओं से उसकी संगति बैठती है या नहीं। फिर यह अलग से देखना होता है कि मान्यताएं जब ग़लत होती हैं, तब भी उनके चलते रहने के कारण कहां पर स्थित हैं। एक तरह से यह सहजबोध की जांच-पड़ताल का समय होता है। और कभी-कभी नये सहजबोध के निर्माण का समय भी होता है।

भारत की आज की हक़ीक़त यह तो है ही कि मौजूदा सरकार के अधीन राज्य और राजनीतिक सत्ता निरंकुश हो चले हैं। संवैधानिक, संस्थागत तथा लोकतांत्रिक नियमों, नियंत्रणों और परंपराओं को रौंदा जा रहा है और व्यवस्था तथा समाज, दोनों क्षेत्रों में मनमानी की जा रही है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, असम से गुजरात तक, संसद से और भीमा कोरेगांव से तीस हज़ारी तक और तिहाड़ तक नंगी निरंकुशता के उदाहरण सभी के सामने हैं। लेकिन क्या सभी को यह सब दिखायी दे रहा है? Continue reading निरंकुशता के स्रोत, प्रतिरोध के संसाधन : रवि सिन्हा