अरुंधति का निर्वासन: वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

अरुंधति राय के खिलाफ अपशब्दों की, गाली-गलौच की, आरोपों की हिंसा ने हमें एक बार फिर यह प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया है – क्या हमने सचमुच अपने देश में सभ्यता व सहिष्णुता के महान मूल्यों की रक्षा करने के दायित्व से छुटकारा पा लिया है? कहीं हम पूरे राष्ट्र को ‘डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसआर्डर’ (खंडित व्यक्तित्व मनोरोग) का शिकार बनते तो नहीं देख रहे हैं जिसमें किसी व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के चरित्र में परस्पर विरोधी मूल्य इस प्रकार विषैले कांटों की तरह उग आते हैं कि राष्ट्र का पूरा व्यक्तित्व चरमराने या दिग्भ्रमित होने लगता है! एक सभ्य-लोकतांत्रिक देश के रूप में आत्मछवि और हिंसक बाहरी आचरण में जितना गहरा भेद पैदा हो जाता है, वह राष्ट्र की आत्मा मार देता है। जिसने भी स्वयं में अनूठी लेखिका को जीप के बोनट से बांधने की कल्पना की, उसे संभवतः अंदाजा भी नहीं था कि वह केवल एक वक्तव्य नहीं दे रहा है, बल्कि मनुष्यता के सभी संभव परिकल्पनाओं के विरुद्ध अपराध कर रहा है। ऐसी कल्पना में बीमार विचारशून्यता ही नहीं बल्कि भयानक सड़ांध, विकृति और मनोरोग की झलक मिलती है। परेश रावल के अरुंधति के विरोध में लिखे ट्वीट से उल्लसित सोशल मीडिया के एक समूह ने तो अरुंधति राय की सामूहिक ढंग से हत्या कर उनके शव को पाकिस्तान में दफनाने की वकालत भी कर डाली।

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1984 and Punjab’s Transformation to a Hindutva Laboratory: Gurpreet Singh

Guest post by GURPREET SINGH

It was summer of 1985 when we were visiting New Delhi, the national capital of India to attend a wedding in the family. I had a long hair back then and was aged 15. Both me and my uncle who were wearing turbans like other Sikh men were waiting at a bus stand for the next bus to go to our relatives. As soon as the bus arrived and we were about to climb in after other waiting passengers, the door was slammed on us.  When my uncle protested, the conductor shouted that there is no seat inside. Even as we pointed out at some empty seats, the answer was – “we have told you there is no seat.” Before we could argue the bus sped away.

The incident left me shocked but I wasn’t surprised.  Continue reading “1984 and Punjab’s Transformation to a Hindutva Laboratory: Gurpreet Singh”

बहुजन राजनीति की नयी करवट की अलामत है भीम आर्मी : प्रवीण वर्मा

Guest post by PRAVEEN VERMA

यूँ तो अम्बेडकर जयंती हर साल आती हैं और दलित-पिछड़े समुदाय का एक बड़ा तबक़ा इसे बड़ी शिद्दत से मनाता आया है। लेकिन इस बार अम्बेडकर का 126वां जन्मदिन कुछ और ही नज़ारा ले कर आया। यू॰पी॰ का सहारनपुर ज़िला जहाँ अच्छी ख़ासी तादाद में दलित समुदाय के लोग रहते हैं और अन्य जिलों की बनिस्बत ज़्यादा संगठित हैं, वहाँ दो आयोजनों और उसकी अनुमति को लेकर दबंग जाति के लोगों ने जम कर उत्पात मचाया, जिसका दलित समुदाय के द्वारा ना केवल डट कर मुक़ाबला किया गया बल्कि एक वाजिब जवाब भी दिया गया। हालाँकि प्रशासनिक कार्यवाही हमेशा की तरह एकतरफ़ा रही जिसमें 40 दलित युवकों को जेल में ठूँस दिया गया और दबंगो को सस्ते में जाने दिया गया। शब्बीरपुर की ये घटना(एँ) कई दिनों तक चलती रही जिसमें दबंग जाति के लोगों के अहम को चोट तो लगी ही, साथ ही साथ एक और संदेश दे गयी : जिस तरह से दबंग जाति के लोगों ने हिंसा को अपनी बपौती समझ लिया था, अब वैसा नहीं हैं, लगभग देश के कुछ हिस्सों में तो। 

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Photo Story on Bhim Army Rally in Delhi: Debalin Roy

Guest post by DEBALIN ROY

Debalin Roy takes us to some specific moments in the rally, aside from the bird’s eye view of the massive rally that we have already seen.

Dalits from all over northern India gathered at Jantar Mantar, Delhi on the 21st of May to protest the Saharanpur violence and increasing atrocities on Dalits across the country.

Although there were representatives from various states, especially from Haryana, U.P. and Rajasthan, Bhim Army took the center stage, with their blue flags waving like a giant dark blue field of tall grass, shaking and waving with every chant of Jai Bhim.

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The Anti-Democratic ‘Republic’: Bobby Kunhu

Guest post by BOBBY KUNHU

English language television news in India nowadays is nothing more than exaggerated visual editorials. They pick two or three stories, sensationalize them, run them in a loop through the day, alongside panel discussions where the editorial ideology of the channel is forced down the throat of the panelists and the viewers. In short there is hardly little journalism left in these channels. Though they do have panel discussions, regional language channels – at least Malayalam and Tamil channels that I watch – have a wider and more diverse reportage than self-proclaimed national television.

It wasn’t always like this. When Prannoy Roy pioneered private television content for Murdoch – regardless of the ideological content – there was reportage. Editorial proselytizing and endless panel discussions were limited most often to when psephologists stepped in.

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कट्टरता के खिलाफ अज्ञेय: वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय हिंदी के ही नहीं वरन समूचे भारतीय साहित्य में निरंतर जिज्ञासा और पाठकीय आकर्षण पैदा करने वाले रचनाकार के रूप में देखे जाते हैं। विभिन्न किस्म की दासता-वृत्तियों, परजीवीपन और क्षुद्र खुशामद से भरे मुल्क में उनका स्वाधीनता बोध जितना गरिमावान लगता है, उतना ही चौंकाने वाला भी। इसी स्वाधीनता बोध ने अज्ञेय की दृष्टि को भारत के लोकतांत्रिक मिजाज के अनुसार ज्यादा खुला व अपने रचना संसार को स्वेच्छा से निर्मित करने लायक बनाया। उनके इस स्वाधीनता बोध का प्रभाव व्यापक रूप से सृजन के बहुत सारे आयामों पर पड़ा है।

अज्ञेय के साहित्य पर लिखने वाले कई आलोचकों ने इस प्रभाव के मूल्यांकन का प्रयास किया है। जैसे कि निर्मल वर्मा ने स्वाधीनता बोध से उत्पन्न उनकी इसी खुली, व्यापक दृष्टि को उनके संपादन कर्म से जोड़कर देखा था। अपने द्वारा संपादित पत्र प्रतीक व दिनमान  में उन्होंने मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह व सज्जाद जहीर को जोड़ा तो तार सप्तक के विविध खंडों में अपने से पूर्णतया भिन्न दृष्टिकोण वाले कवियों को। स्वाधीनता के प्रति तीव्र संवेदनशीलता को व्यक्तिवाद के दायरे में रखकर समझने की सरल चिंतन-प्रक्रिया साहित्य में बहुतायत से मौजूद रही है। ऐसा मानने वालों की सीमा प्रकट करते हुए निर्मल वर्मा ने कहा है कि स्वाधीनता के प्रति अत्यंत सचेत अज्ञेय के प्रति लोगों को झुंझलाहट उस समाज में स्वाभाविक थी जहां लोगों को हर समय किसी ‘ऊपर वाले’ का मुंह जोहना पड़ता है। इन ऊपर वालों में परिवार, जाति, रूढ़ि, पार्टी, विचारधारा, संगठन आदि सभी कुछ शामिल रहा है। यहां तक कि गांव में जातिवाद-परिवार की गुलामी करने वाले लोग जब शहर आए तो उन्होंने विभिन्न पार्टियों, संगठनों व विचारधाराओं की गुलामी को बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया। जिन्होंने नहीं स्वीकारा उन्हें कुलद्रोही, जनविरोधी, परंपराद्वेषी, धर्मविरोधी, व्यक्तिवादी आदि आरोपों का सामना करना पड़ा।

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We are Baba Saheb’s Followers, We Believe in the Constitution – Vinay Ratan Singh, President of Bhim Army

The vicious and combined attack of the administration and the local media on Bhim Army continues. It is being villainized by them and they are threatened with impending arrests under the National Security Act. The  blatantly partisan attitude of the administration, backing in overt and covert ways, the attempts of the Thakurs and other upper castes, to provoke riots – are laid bare by VINAY RATAN SINGH in the interview below where he speaks to CHALCHITRA ABHIYAAN on what has been going on in Saharanpur and neighbouring areas. We unequivocally support the efforts of the Bhim Army to resist the vicious attacks of the upper castes, who are now emboldened by the presence of their own government in the state.