Police Violence against the Fisher People on the Kerala Coast: A People’s Account

Below, I share a write-up by Johnson Jament, an academic researcher from the coast of the Thiruvananthapuram district, where an intense struggle against the Adani Port Project has been unfolding. Arrayed on opposing sides are the fisher people who have inhabited the coast since the past 500 years (according to historical record) and more, whose livelihoods are at stake, and the Adani Port Project, supported by the combination of natural resource predators and the CPM-led government of Kerala. The leadership of the CPM (though not the ranks, or at least all of the ranks) can be quite fairly described as a ‘post-socialist oligarchy’, and hence their support of Adani Ports is pretty understandable. The battle has been equally one of wits too, with the Kerala government pulling out all their progressive aces, including the longtime literary-cultural acolytes of the CPM but also some of the (former) stars of Kerala’s oppositional civil society — notably, the poet and critic, K Satchidanandan! Questioned about his stance, this early teacher of Euro-Marxism of a whole generation claimed that the conflict was because of ‘binary thinking’ that supporters and opponents of the Port project both equally indulge in, forgetting notably, that something like ‘structural contradiction’ may be becoming evident in and through this struggle. Perceiving it, of course, is not indulging in binary thinking.

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Questioning the Make-in-Odisha Conclave and the Current Development Model: People’s Movements Write to Governor

Following is the text of an open letter sent by the Bisthapan Birodhi Jana Andolon Mancha, a coalition of people’s organizations, activists, journalists and citizens to the Governor of the Odisha. It was released in Bhubaneswar yesterday the 3rd of December 2022.

Respected Sir,

We as concerned citizens, social activists, political and human rights activists, environmentalists and journalists and the leaders of twelve mass organizations on behalf of Bisthapan Birodhi Jana Andolon Mancha, Odisha appeal for the protection of natural resources and an immediate end to the continuous forceful displacement of people from their lands and dwelling places.

We express our protest and dissent against the Odisha government’s Make-in-Odisha Conclave in Bhubaneswar. Inviting more investments in the name of development will uproot the lives and livelihoods of people dependent on these land, forests and coasts. We appeal to your conscience to intervene and prevent the exploration and exploitation of natural resources through unmindful and unwanted mining of bauxite, iron ore, chromite, coal, river sand, china clay and other resources in the name of development. People are struggling against all odds and hardships to protect the same for future generations even as they remain deprived of access to basic needs like education, health and nutritional food security.

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बसु, रमण और सलाम की धरती पर वैज्ञानिक मिज़ाज की अनुपस्थिति पर कुछ बातें : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha

मैं वाशिंग्टन डी सी के इंडियन डाइस्पोरा’ को और रज़ी साहब का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा कि उन्होंने चंद बातें रखने का मौका दिया। यह मेरे लिए बेहद सम्मान की बात है कि मैं दो शख्सियतों के साथ – गौहर रज़ा और परवेज़ हुदभाॅय के साथ – आनलाइन ही सही – मंच साझा कर रहा हूं। मैं इस बात को लेकर चिंतित था कि रज़ी साहब वक्त़ के बेेहद पाबंद हैंइसलिए मैंने तय किया कि जो बातें मुझे कहनी हैंमैं लिख लेता हूँ। लेकिन इससे दिक्कत यह पैदा हुई कि इसे लिखते वक्त़ मुझे इस बात का एहसास नहीं था कि गौहर और परवेज़ क्या बात करेंगे। मुमकिन है कि मैं जो बातें रख रहा हूं वे इसके पहले कही गयी बातों के चलते अनावश्यक /व्यर्थ लगें या आयोजकों के या अन्य दो वक्ताओं के सरोकारों से महज छूती दिखाई दें। )



मेरे लिए यह बेहतर होगा कि मैं शुरूआत में ही कुछ प्रारंभिक क़िस्म की बातों पर अपनी राय ज़ाहिर कर दूँ। चर्चा के शीर्षक के तौर पर बसु, रमण और सलाम की धरती का हवाला दिया गया है, जिससे यह धारणा भी बन सकती है कि वैज्ञानिक के वैज्ञानिक मिज़ाज (Scientific Temper) से लैस होने की गारंटी है। साथ ही वह इतना प्रभावशाली भी होगा कि आम समाज पर भी अपनी छाप छोड़ सकेगा। एक आदर्श दुनिया में, शायद, यही होना चाहिए। लेकिन वैज्ञानिक भी आदर्श दुनिया में नहीं रहते।

आप सर आइज़क न्यूटन का उदाहरण देखें, जो आज भी विज्ञान के सबसे महान प्रतिमूर्ति (Icon) समझे जाते हैं, जिनकी प्रतिभा ने वैज्ञानिक क्रांति पर अपनी अंतिम और आधिकारिक मुहर लगा दी। कैम्ब्रिज में उन दिनों फैली प्लेग की महामारी से बचने के लिए भागकर अपने गाँव पहुँचे इस एकाकी युवा प्रतिभा ने अपने अकेले दम पर आधुनिक विज्ञान की नींव डाल दी। 1665-1666 के अपने चमत्कारी वर्षों के महज 18 महीनों में उन्होंने गति के नियमों को तथा गुरुत्वाकर्षण के नियमों को सूत्रबद्ध किया। इन्हीं महीनों में उन्होंने कैलकुलस (Calculus) की खोज की। लेकिन इसके बाद उन्होंने अपनी लंबी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा कीमियागरी में तथा बाईबिल के अर्थापन की  धर्मशास्त्राीय विवेचना में लगाया। उन्होंने ऐसे विचारों की भी भर्त्सना  की (जैसे कि त्रिदेववाद -Trinitarianism), जो उनके मुताबिक ईसाई मत के प्रदूषण के प्रतीक थे, और एरियनवाद (Arianism) के अत्यधिक रैडिकल शुद्धतावादी संस्करण को अपनाया, जो मानता था कि बाइबिल भविष्य की बिल्कुल सटीक भविष्यवाणी है। न्यूटन के अंदर कुछ भी सामान्य अनुपात का नहीं था – न ही उनकी वैज्ञानिक प्रतिभा न ही उनका सख्त जडसूत्रवाद और आत्मविश्वास से भरपूर अंधश्रद्धा।

अगर आप यह समझ रहे हों कि मैं न्यूटन के प्रति अन्याय कर रहा हूं – आखिर वह भी तो अपने वक्त़ की ही पैदाइश हो सकते थे – तो एक तरह से मैं जिस प्रस्थापना की ओर उन्मुख हूँ उसे आप अभी ही स्वीकार करने की दिशा में हैं। लेकिन इसके पहले कि मैं विज्ञान और वैज्ञानिक मिज़ाज के अंतर्सम्बन्ध की पड़ताल करूँ, हाल के समय के कुछ अन्य उदाहरणों पर ग़ौर करना चाहूंगा। पास्कुअल जॉर्डन (Pascual Jordan) जो क्वाण्टम यान्त्रिकी के जन्मदाताओं में से था, एक सक्रिय नात्सी था। युद्धोत्तर जर्मनी में अपने पुनर्वास के बाद भी अपने फासीवादी विचारों पर अडिग रहा। भौतिक विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता फिलिप लेनार्ड (Philipp Lenard)और योहान स्टार्क (Johannes Stark) भी सक्रिय नात्सी थे और खुले रूप में यहूदी-विरोधी (anti semite) थे। उनके कुछ समय पहले, बीसवीं सदी के दूसरे दशक में, महान गणितज्ञ एम्मी नोदर (Emmy Noether) को गाॅटिंगन ( Gottingen ) विश्वविद्यालय के गणित विभाग में प्राध्यापक की नौकरी से वंचित किया गया था, महज इसलिए कि वह एक स्त्री थी। इस मामले से क्षुब्ध डेविड हिलबर्ट ने कहा था, ‘‘ विश्वविद्यालय में शिक्षक के तौर पर उसकी नियुक्ति के खिलाफ आखिर उसका लिंग कैसे आड़े आ सकता है। आखिर हम एक विश्वविद्यालय हैं, कोई स्नानगृह तो नहीं।’’ और मेरे एक वैज्ञानिक दोस्त ने मुझे कुछ दिन पहले ही याद दिलाया है कि खुद अपने सर सी वी रमण भी, जिनका नाम भी इस कार्यक्रम के शीर्षक में शामिल है, एक महिला प्रत्याशी को पीएचडी छात्रा के तौर पर प्रवेश देने के ख़िलाफ़ थे, क्योंकि उनके हिसाब से महिलायें वैज्ञानिक बनने के योग्य नहीं होतीं।

मैं जानेमाने वैज्ञानिकों को वैज्ञानिक मिज़ाज से लैस होने के प्रमाणपत्र दिए जाने का विरोध करने के लिये यहाँ नहीं आया हूं। मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या वैज्ञानिक मिज़ाज का अभाव विज्ञान के बेहतर ढंग से करने के रास्ते में बाधा बनता है। लगभग तीन दशक पहले परवेज़ हुदभाॅय ने एक किताब लिखी थी। किताब का शीर्षक था ‘इस्लाम एण्ड साइंस’, और उसका उपशीर्षक था ‘रिलीजियस आर्थोडाॅक्सी एण्ड द बैटल फाॅर रैशनेलिटी’ ( धार्मिक रूढिवाद और तार्किकता का संघर्ष). इस किताब में वह एक दिलचस्प उदाहरण पेश करते हैं। स्टीवन वाईनबर्ग और अब्दुस सलाम – वही सलाम जिनका नाम भी इस कार्यक्रम के शीर्षक में है – दोनों ने बीसवीं सदी के सबसे मूलभूत और महत्वपूर्ण भौतिकी सिद्वांतों में से एक का आविष्कार किया, जिसे हम युनिफाईड क्वांटम थियरी आफ इलेक्टोमैगनेटिजम एंड वीक नुक्लिअर फ़ोर्स कहते हैं। उन्होंने एक दूसरे से स्वतंत्र इस सिद्धांत का आविष्कार किया और उसके लिए नोबेल पुरस्कार साझा किया।  वाईनबर्ग एक घोषित नास्तिक थे और सलाम ने खुद स्वीकारा था कि वह आस्तिक हैं। सलाम ने परवेज़ के किताब की भूमिका लिखी थी। भूमिका में वह लेखक के इस विचार से सहमत होते हैं कि इस सिद्धांत तक पहुंचने के लिए उनके आस्तिक होने से कोई फर्क नहीं पड़ा। यह बात आप खुद आविष्कारक के मुंह से ही सुन रहे हैं। फिर विज्ञान और वैज्ञानिक मिज़ाज के बीच का रिश्ता क्या है ?

एक वैज्ञानिक महज विज्ञान पर ज़िन्दा नहीं रहता। उसके मस्तिष्क पर केवल तर्क और विज्ञान का क़ब्ज़ा नहीं होता। मैं नहीं जानता कि मस्तिष्क की तरह क्या मन के भी दो अलग अलग लेकिन एक दूसरे से जुड़े गोलार्द्ध होते हैं। लेकिन मुझे, सरल भाषा में, मन के ऐसे विभाजन का एक रूपक की तरह इस्तेमाल करने दीजिए। वैज्ञानिक चिन्तन का ताल्लुक, जैसा कि मुझे लगता है, उस प्रक्रिया से है जिसमें मन का तार्किक ‘गोलार्द्ध’ उसके भावनात्मक ‘गोलार्द्ध’ को प्रभावित करने की कोशिश करता है। इसका परिणाम एक तार्किक और सुसंस्कृत व्यक्ति के उभार में भी हो सकता है, लेकिन इसका नतीज़ा बहुत ख़राब भी निकल सकता है। तार्किक पक्ष के भावनात्मक पक्ष में ज़रूरत से ज़्यादा दखलअंदाजी करने से एक बचकाने वयस्क का भी उदय हो सकता है। ज़्यादा ख़तरनाक नतीज़े भी निकल सकते हैं – हो सकता है कोई डॉ स्ट्रेंजलव (Strangelove) जैसा शख़्स पैदा हो जाय। ( डॉ स्ट्रेंजलव नाम से एक फिल्म आयी थी, जिसमें इसी नाम का एक अधिकारी केन्द्र में है जो नाभिकीय युद्ध की शुरूआत करने का हिमायती है – अनुवादक)

वैज्ञानिक चिन्तन एक मुश्किल चीज़ है। इसमें शामिल होता है तर्कबुद्धि और संस्कृति के बीच का एक जटिल अंतरसंघर्ष। तुर्रा ये कि न तो हम तर्कबुद्धि को अच्छी तरह समझते हैं न ही संस्कृति को। कुछ लोग समझते हैं कि तार्किकता पारदर्शी होती है जबकि संस्कृति में कई अँधेरे कोने होते हैं। विरोधी पक्ष कहता है कि यह एक ग़लत तस्वीर है। वह यह दिखाने की कोशिश करता है कि तर्क की जड़ें धुँधली हैं – वह पवित्र-निर्मूल ढंग से धारण नही हुई। और वह स्वयं जागरूक नहीं है – वह नहीं जानती कि वह सत्ता की संरचनाओं से गहरे में उलझी हुई है।

कौन सा पक्ष महत्वपूर्ण है ताकि एक सफल और साथ ही साथ सार्थक जीवन जिया जा सके ? किस पक्ष को फैसला देने का हक है ? यह एक ऐसी बहस है जिसका आसानी से समाधान संभव नहीं है। इसे लेकर मज़ेदार प्रसंग भी हैं। मिसाल के तौर पर, जहां वैज्ञानिक कविता पर अपना फ़ैसला सुनाते दिखते हैं। पाॅल डिराक ( Paul Dirac ), जिन्हें 20 वीं सदी के महानतम वैज्ञानिकों में शुमार किया जाता है, उन्होंने एक बार जे आर ओपनहाइमर, जो भी एक बड़े वैज्ञानिक थे और एक बहुज्ञ-बहुप्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे, से कहा, ‘‘मैं समझ नहीं पाता कि आप भौतिकी में काम करते हैं और साथ ही साथ कविताएं भी लिखते हैं। विज्ञान मे आप उस बात को कहना चाहते है, जो पहले से कोई जानता नहीं हो, लेकिन ऐसे शब्दों में  कहना चाहते हैं जिसे सभी  समझ सकें। जब कि  कविता में आप  वही  कहते हैं जो सब पहले से ही जानते है, लेकिन ऐसे शब्दों में जिन्हें कोई समझ न सके।’’ दूसरी तरफ़, विज्ञान पर कवियों का फ़ैसला आम तौर पर अधिक स्याह होता है – वह अक्सर विज्ञान की यांत्रिकता की आलोचना करती है, या उसका ऐसे मज़ाक उड़ाती है जैसे कोई किसी वयस्क के बचपने का मज़ाक उड़ाए।

इतनी पृष्ठभूमि के बाद, मैं अब आज के विषय पर आना चाहूंगा। मैं इस बात से सहमत हूं कि वैज्ञानिक मिज़ाज उन समाजों एवं संस्कृतियों  से लगभग गायब है, जो इस उपमहाद्वीप की एक अलग क़िस्म की सभ्यता का निर्माण करते हैं। लेकिन मैं इस बात को लेकर आश्चर्यचकित नहीं हूं कि वह बसु, रमण और सलाम जैसे वैज्ञानिकों के बावजूद अनुपस्थित है। मैं इस बात पर अधिक आश्चर्यचकित हूं कि वह जवाहरलाल नेहरू जैसी शख्सियत के बावजूद अनुपस्थित है। मेरे हिसाब से, वैज्ञानिक मिज़ाज की वांछनीयता के सबसे श्रेष्ठ और सबसे समझदार हिमायती नेहरू थे। मैं ‘भारत एक खोज’ से एक उद्धरण साझा करना चाहूँगा भले ही इसमें थोड़ा वक़्त ख़र्च हो जाय :

‘‘विज्ञान सकारात्मक ज्ञान के दायरे में  व्यवहार करता है लेकिन जिस मिज़ाज  को वह निर्मित करता है, वह उस दायरे का उल्लंघन करता हैै। मनुष्य का अंतिम लक्ष्य ज्ञान हासिल करना, सत्य को पाना, अच्छाई और सुंदरता का  रसग्रहण करना  हो सकता है। वस्तुनिष्ठ खोज की वैज्ञानिक पद्धति इन सभी पर लागू नहीं होती, और जीवन में बहुत  कुछ ऐसा भी महत्वपूर्ण है, जो इसके दायरे के बाहर दिखता है – फिर वह चाहे कला और कविता के प्रति संवेदनशीलता, वह भावना जो सौंदर्य से निर्मित होती है, अच्छाई का बेहद गहराई में स्वीकार। मुमकिन है कि एक वनस्पति वैज्ञानिक और एक प्राणी वैज्ञानिक प्रक्रति का सम्मोहन और उसकीसुंदरता  का कभी अनुभव भी न करे ; संभव है एक समाजविज्ञानी मानवता के प्रति प्रेम से बिल्कुल वंचित हो। लेकिन जब हम पहाड़ों की उंचाई पर जाते हैं, जहां दर्शन का निवास होता है और उच्च कोटि की भावनाए मन में समा जाती है , या हमारे सामने खड़े विराट को अपलक हम देखते जाते हैं, उस वक्त भी  वैज्ञानिक मिज़ाज वाली  पहुँच और भावना की ज़रूरत बनी रहती है ।’’ ( अनुवादक द्वारा मूल टिप्पणी का भाषांतर)

मैं इस बात को भी जोड़ना चाहूंगा कि भारत का संविधान दुनिया का एकमात्र संविधान है जिसमें  हर नागरिक के बुनियादी कर्तव्य के तौर पर ‘‘वैज्ञानिक चिन्तन, मानवता और अनुसंधान और सुधार की भावना’’ का स्पष्ट उल्लेख है।

यह सब कुछ अत्यधिक दार्शनिक और आदर्शवादी लग सकता है। आखिर कोई इस बात का क्या प्रमाण है कि किसी समाज या किसी सभ्यता के लिए वैज्ञानिक मिज़ाज की वाकई ज़रूरत है ? मुझे लगता है कि इतिहास ने हमारे सामने एक वास्तविक मिसाल पेश की है। मैं चंद बातें उस पर भी रखना चाहूंगा।

परवेज़ की जिस किताब का मैंने अभी ज़िक्र किया है उसकी शुरूआत एक कल्पित कथा से होती है, ‘‘मान लें कि मंगल ग्रह पर रहने वाले मानवशास्त्रियों की एक टीम ने 9 वीं और 13 वीं सदी के दरमियान पृथ्वी की यात्रा की’’। उन्होंने पाया कि ‘‘यहां पर सबसे अधिक संभावनाओं वाली इस्लामिक सभ्यता दिखती है, जहां बैत उल हिकमा (Bait-ul-Hikmah) जैसा पुस्तकालय है, खगोलीय वेधशालाएं है, अस्पताल हैं और स्कूल हैं।’’फिर वे बीसवीं सदी के अंत में फिर एक बार यहां आते हैं और पाते हैं ‘‘उनका पहले का अनुमान बिल्कुल गलत साबित हुआ। मानवता का वह हिस्सा जो कभी सबसे अधिक संभावनासंपन्न दिखता था वह अवरूद्ध मध्ययुगीनता की स्थिति में जकड़ा है, नए को बिल्कुल खारिज कर रहा है और अतीत से बुरी तरह चिपका हुआ है। इसके उलट, अतीत के पीछे छूटे हुए लोग (यूरोप से तात्पर्य है) विकास की सीढ़ी चढ़ चुके हैं और अब सितारों को लक्ष्य किए हुए हैं। क्या यह भूमिकाओं का प्रचंड उलटफेर, आगंतुक पूछते हैं, महज एक का दुर्भाग्य और दूसरे का सौभाग्य कहा जा सकता है ? क्या उसकी वजह आक्रमण और सैनिक पराजय है ? या क्या यह  नज़रियों और रूख में बुनियादी बदलाव की परिणति है ?’’

कुछ मामूली फ़र्क़ों के साथ यह दृष्टान्त भारतीय उपमहाद्वीप पर भी समान रूप से लागू हो सकता है। अगर मंगल ग्रह के लोग 17 वीं सदी के दरमियान यहाँ पहुँचते तो सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों को देख कर चकित रह जाते; इस बात से अचंभित रह जाते कि पूरी दुनिया के सकल उत्पाद का लगभग एक तिहाई अकेले इस महाद्वीप पर ही पैदा होता है। लेकिन जब वे आज के समय में फिर इस महाद्वीप पर वापिस आते तो यहाँ की दुर्दशा देखकर और यहाँ का पिछड़ापन देखकर इस सभ्यता के बारे में उतने ही निराश हुए होते जितना कि वे इस्लामी सभ्यता के बारे में हुए थे।

शायद यह पूछने की बजाय कि सभी पीछे क्यों छूट गये, असली सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि पश्चिम आगे कैसे निकल गया ? इस से सभी के पीछे छूट जाने के मसले पर भी ज़्यादा आसानी से रौशनी पड़ सकती है। हो सकता है जवाब साफ हो, लेकिन कमरे में मौजूद हाथी की तरह उसे नज़रअन्दाज़ करने की कोशिश की जाती रही हो। हो सकता है, इतिहास के लम्बे दौर में अन्तर्भूत गहरे कार्यकारण सम्बन्धों का सन्धान आज की बौद्धिक-अकादमिक दुनिया में फ़ैशन में न हो। आख़िरकार, यह महान आख्यानों के प्रति संदेहों का दौर है। हम जो इस दौड़ में पीछे छूट गए हैं, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए सुकून हासिल कर सकते हैं और उन्हें इन अपराधों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। हम इस बात पर भी खुश हो सकते है कि पश्चिमी अकादमिक जगत के बड़े बड़े विद्वतजन भी विज्ञान और आधुनिकता के खिलाफ बौद्धिक तूफान खड़ा कर रहे हैं, जो उनके हिसाब से कथित तौर पर, पूंजीवाद, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का नौकर और उपकरण मात्र रहे हैं। उत्तरऔपनिवेशिकता के सिद्धान्तकार उस उपनिवेशवाद के भयावह कारनामों को उजागर करने में व्यस्त रह सकते हैं जिसका युग बीत चुका है। लेकिन एक दिन तो हमें यह पूछना ही होगा –  उस अनुपस्थित उपनिवेशवाद की आलोचना से भारतीय उपमहाद्वीप पर रहने वाले हमलोगों को क्या हासिल होने वाला है ? पश्चिम के अकादमिक गढ़ों में बैठे उपनिवेशवाद के ये आलोचक और उत्तर-औपनिवेशिकता के ये सिद्धान्तकार निश्चित ही पश्चिमी समाजों को अधिक सभ्य, अधिक जनतांत्रिक और अधिक बहुसांस्कृतिक बनाने में योगदान कर रहे हैं। लेकिन पश्चिम के पास तो पहले से ही विज्ञान और आधुनिकता है, वह पहले ही आगे बढ़ चुका है। इस सब में हम पूरब वालों के लिए क्या है? गरीबी और अंधश्रद्धा के दलदल से हमें अपना रास्ता किस तरह निकालना है ? अपने लिए हमें किस तरह के भविष्य की कल्पना करनी है ? 

पश्चिम क्यों और किस तरह आगे निकल गया – यह एक विशद विषय है और इसपर तमाम पुस्तकालय भरे पड़े हैं। लेकिन कुछ मायनों में इसका जवाब इतना साफ़ है कि इसे दो शब्दों में कहा जा सकता है : विज्ञान और आधुनिकता की सहायता से  पश्चिम यह चमत्कार कर सकने में सफल रहा। यह सच है कि विज्ञान और आधुनिकता दोनों ही पूँजीवाद और उपनिवेशवाद के साथ पैदा हुए थे। लेकिन, जैसा कि मुहावरा है, हमें बच्चे को भी कठौते के गन्दे पानी के साथ फेंक नहीं देना चाहिए। यह बेहद आश्चर्यजनक है कि तमाम बड़े बड़े सिद्धांत मौजूद हैं जो कहते हैं कि सार्वभौमिक सत्य, वस्तुनिष्ठता और वैज्ञानिक पद्धति की विशिष्टता को लेकर विज्ञान की हैसियत कोई अलग नहीं है। सत्य और ज्ञान को लेकर सभी युगों में सभी संस्कृतियों के अपने-अपने दावे थे और उन सभी को विज्ञान तथा वैज्ञानिक पद्धति के दावों के बराबर का स्थान मिलना चाहिए। आज के भारत में ऐसी धारणा को पुष्ट करने के लिए एक आसान रास्ता निकाला गया है – हमें बस यही दावा करना है कि आधुनिक विज्ञान ने अब तक जो हासिल किया और आगे जो भी हासिल करेगा, वह सब वेदों में पहले से मौजूद है। 

बात जो भी हो, पश्चिम ने सबसे आगे निकल जाने ( Great Divergence )  का यह चमत्कार महज पूंजीवाद और औद्योगिक क्रांति के ज़रिए ही हासिल नहीं किया। प्रबोधन (Enlightenment) और आधुनिकता (Modernity) ने इसमें उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। हम लोगों ने विज्ञान और संस्कृति के बीच की जटिल अंतःक्रिया को पहले से ही संदर्भित किया है। 18 वीं सदी के पश्चिमी यूरोप में इसने इतिहास को और गतिमान बना दिया। आधुनिक विज्ञान के उभार के बाद लगभग दो सौ साल लगे जब वैज्ञानिक मिज़ाज पश्चिमी समाज और संस्कृति में नीचे तक पहुँचने लगा। सांस्कृतिक ज़मीन में वैज्ञानिक सोच और मिज़ाज के धीरे-धीरे रिसने की इस प्रक्रिया को ही प्रबोधन का नाम दिया जाता है। 

प्रबोधन और आधुनिकता को हम महज आयात नहीं कर सकते। इसे हासिल करने के लिए हम किसी का अन्धानुकरण नहीं कर सकते। इसकी वजह ये है कि विज्ञान भले एक ही हो, संस्कृतियाँ अनेक हैं। सभी संस्कृतियों को चाहिए कि वे विज्ञान को अपनाएँ और आधुनिकता को सक्रिय-सामाजिक रूप दें। लेकिन संस्कृतियों की अनेकता और विविधता के चलते सभी के रास्ते अलग-अलग होंगे। जो पीछे छूट गए, उनमें से कुछ ही ऐसे सफल उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने उन्नति, आधुनिकता और वैज्ञानिक मिज़ाज के मामले में अपने अलग ढंग से ही पश्चिम को पकड़ लिया और उस से बराबरी हासिल कर ली। पहले सोविएत संघ ऐसा उदाहरण था, लेकिन वह नष्ट हो गया। वैसे भी रूस यूरोपीय सभ्यता के इतना करीब था कि उसे बराबर में आ जाने के अलग सभ्यतात्मक उदाहरण के तौर पर देख पाना मुश्किल है। पूरब में, पहले जापान और अब चीन ऐसे उदाहरण के तौर पर सामने आते हैं। भारतीय महाद्वीप के ऐसा उदाहरण न बन पाने के पीछे कौन से कारण हैं?

यह भी एक बड़ा विषय है और बेहद जटिल मामला है। कहा जाता है कि समझदार जहाँ जाने में हिचकते हैं, अहमक वहाँ दौड़कर पहुँच जाते हैं। लेकिन अहमक होने का ख़तरा मुझे उठाने दीजिए। जिन सहस्राब्दिक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के द्वारा इस उपमहाद्वीप में एक विशिष्ट सभ्यता का निर्माण हुआ है उनमें एक ऐसी है जो विशिष्ट और अनूठी है। इसके तत्व अन्य मुल्कों और सभ्यताओं में पाए तो जा सकते हैं लेकिन इस उपमहाद्वीप में उसने जो भूमिका अदा की है, वह अन्य किसी इलाके में नहीं निभायी होगी। यही मेरे खयाल से वह अकेला सबसे बड़ा अवरोध है जिसने हमारी संस्कृति में वैज्ञानिक मिज़ाज को रिसने से रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभायी है। इसी पर ऊँगली उठाने की कोशिश करते हुए मैं अपनी बात समेटना चाहूँगा। 

मैं इस बात की तरफ संकेत करना चाहता हू कि इस उपमहाद्वीप में मौजूद लगभग सभी धर्मों ने, अलग अलग अंशों में, एक रहस्यवादी-भक्तिमार्गी रूप धारण किया। इसमें गुरुओं, पीरों, महात्माओं और अनेक प्रकार के गाॅडमेन की नेतृत्वकारी भूमिका बनी। ये सभी, पुरोहितों, पवित्र किताबों या अन्य बिचौलियों की मध्यस्थता के बग़ैर, ईश्वर तक सीधी पहुँच के लिये भक्ति का लोकमार्ग बनाने का दावा करते थे। हिन्दू पक्ष को देखें तो दक्षिण में उसका उदय पहली सहस्राब्दि के भक्ति आंदोलन के साथ हुआ और जो दूसरी सहस्राब्दि में उत्तर भारत में पहुचा। मुस्लिम पक्ष को देखें तो अनेक प्रकार के सूफ़ी पन्थ अफगानिस्तान के रास्ते भारत के उत्तर पश्चिम में पहुँचे और सूफियों, दरवेशों और पीरों के ज़रिए फैलते गये। इस परिघटना ने एक नए धर्म – सिख धर्म – को भी जन्म दिया। यही वह भक्ति, सूफी, सिख धर्म और संमिश्र रहस्यमयी-भक्तिमार्गी आंदोलनों की परिघटना है जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में एक अलग और विशिष्ट सभ्यता के निर्माण में महती भूमिका निभायी है। 

लगभग सभी ने इस परिघटना की बेहद अनुकूल ढंग से व्याख्या की है। धार्मिेकों से लेकर गैरधार्मिकों तक, परंपरावादियों से लेकर आधुनिकतावादियों तक, दक्षिणपंथियों से लेकर वामपंथियों तक सभी ने इसकी प्रशंसा की है। लगभग हर कोई रूढिवादिता (Orthodoxy) की तुलना में वैविध्य या बहुलवाद ( heterodoxy ) की हिमायत करता है। इस बात से इन्कार तो नहीं किया जा सकता कि भक्ति-सूफी-सिख-संत आन्दोलनों ने उपमहाद्वीप की संस्कृति और सभ्यता में सकारात्मक योगदान भी किया है। इसके बावजूद यह कहना ज़रूरी है कि इसका एक बड़ा नकारात्मक परिणाम भी रहा है जिसे नज़रअंदाज़ किया गया है।

यह परिघटना ऐसी प्रक्रियाओ को आगे बढ़ाती दिखती है जो वैज्ञानिक चिन्तन और आधुनिकता की प्रगति को बाधित करते हैं। यह विस्मय और जिज्ञासा की जगह अंधी आस्था को प्रोत्साहित करती है; धार्मिकता को सही मायने में आध्यात्मिक, तत्वज्ञानशील और दार्शनिक बनने से रोकती है; दार्शनिक को तार्किक बनने से बाधित करती है; और तार्किकता को संस्कृति में रिसने से रोकती है। वह दुनिया के इस हिस्से में अतार्किकता, अंधी आस्था और अंधश्रद्धा का प्रधान वाहन बनती है। जार्ज आरवेल ने कभी कहा था  ‘‘संतों को हमेशा ही दोषी मान लेना चाहिए जब तक कि यह साबित न हो कि वह निरपराध हैं।’’ आज के भारत में आरवेल के इस कथन का एक विडम्बनापूर्ण अर्थ निकला है – अनेक साधुओं और महात्माओं के बलात्कारी और हत्यारे साबित होने के बावजूद और उनके जेल जाने के बावजूद उनके अनुयायियों की संख्या में कोई कमी आती नहीं दीखती।

नेहरू तक  भक्ति आंदोलन के सभ्यतात्मक परिणामों से जूझने में असफल रहे। वे अपने में अंतर्विरोधों को समाहित किये हुए थे। विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, गाँधी, भगत सिंह और आइन्स्टाइन – सभी की एक साथ और बराबर आदर से तारीफ़ करते थे। नेहरू एक महान व्यक्ति थे – वे दूरदर्शी थे, नेता थे, चिन्तक थे, राजनेता थे। विटमैन के तौर पर वह शायद कह सकते थे , ‘‘मैं विशाल हूँ, मुझमें बहुलता समाहित है।(I am large, I contain multitudes)” दरअसल वे असफल इसलिए हुए कि भारत के अतीत का बोझ उनके जैसे महान व्यक्ति के लिए भी बहुत भारी साबित हुआ। वे खरी खरी बात नहीं कह सकते थे क्योंकि उन्हें अपने लोगों को साथ लेकर चलना था।  इसीलिए कभी कभार आप को छोटे लोगों की बातें भी सुननी चाहिये। वे सच्ची बातें इसलिए कह सकते हैं क्योंकि नेहरू वाला बोझ उठाने की ज़िम्मेदारी उनकी नहीं है।

यहीं मैं अपनी बात खत्म करना चाहूंगा। 

नवम्बर 19, 2022

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( नोट : द इंडियन डाइस्पोरा वाॅशिंग्टन डीसी मेट्रो  संयुक्त राज्य अमेरिका की तरफ से ‘Absence of Scientific Temper in the Lands of Scientists Raman, Bose, Abdus Salaam  विषय पर, 19 दिसम्बर 2022 को आनलाइन पैनल डिस्कशन का कार्यक्रम हुआ।

अग्रणी भौतिकीविद, जनबुद्धिजीवी, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, लेखक और स्तंभकार प्रोफेसर परवेज हुदभाॅय, पाकिस्तान ; सैद्धांतिक भौतिकीविद, एक्टिविस्ट, प्रगतिशील आंदोलनों से जुडे़ बुद्धिजीवी एवं लेखक डा रवि सिन्हा ; पूर्व मुख्य वैज्ञानिक, कौन्सिल आफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्टियल रिसर्च, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, डाॅक्युमेंटरी फिल्म निर्माता गौहर रज़ा ने बातें रखीं। 

प्रो रजी रजीउददीन, वैज्ञानिक, इंडियन डाइस्पोरा के संस्थापक, ने स्वागत वक्तव्य दिए। 
कार्यक्रम में डा रवि सिन्हा द्वारा उपरोक्त लिखित वक्तव्य दिया गया।)

(डा रवि सिन्हा का मूल अंग्रेजी वक्तव्य यहां पढ़ सकते हैं : https://kafila.online/2022/11/23/a-few-remarks-on-the-absence-of-scientific-temper-in-the-land-of-bose-raman-and-salam/)

अनुवाद : सुभाष

Who are these ‘Hindus’? The Tragedy of Vizhinjam and the Despicable Cruelty of the Majority

The struggle against the ecologically-fatal Adani seaport being built at the seaside village of Vizhinjam in south Kerala is probably the first large-scale instance of ‘accumulation by dispossession’ in the history of this state. The state — the ruling government, the police, and judiciary — hold hands now in their effort to dispossess the large population of fisher people whose home this coast has been since centuries, for the convenience of predatory capital. As usual, the port-building commenced after massive ‘opinion-building’ exercises by all the major political parties among their supporters in the port-affected villages, promising them golden futures (now that the resources of the sea, which they had depended on for centuries, were robbed, in the course of some seventy years since the 20th century, through the commercialization of fisheries). Doing fieldwork in those areas around 2013, I remember how hard it was to even broach the topic without provoking massive, sometimes, violent, disagreements — it has divided the people completely and left the major social force there, the Latin Catholic Church, quite confused. Now, after 2018, the ecological destruction wrought by this foolish act of greed is nakedly evident for all with eyes to see; and most residents of the sea coast are convinced that in just a few years, the sea will take everything, including the houses built with sweat and tears, labouring for years abroad, even.

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A Few Remarks On The Absence of Scientific Temper in the Land of Bose, Raman, and Salam

Guest Post by Ravi Sinha

[I must begin with a “thank you” to the Indian Diaspora of Washington DC* and to Razi Saheb for letting me say a few words here. It is an honour for me to share the dais, even if virtually, with Gauhar Raza and Pervez Hoodbhoy. I was stressed about Razi Saheb being a stern time-keeper. So, I decided to jot down what I have to say. But the flip side is that I did not know at the time of preparing these notes what Gauhar and Pervez would say. Please bear with me if what I say turns out to be redundant in the light of what has already been said, or if it appears tangential to the concerns of the organizers or of the other two speakers.]

Let me first get some elementary considerations out of the way. The title refers to the land of Bose, Raman and Salam, which might betray an assumption that a scientist is guaranteed to possess scientific temper and he is influential enough to leave an imprint on the society. In an ideal world, perhaps, that ought to be the case. But even scientists do not live in an ideal world.

Take the example of Sir Isaac Newton, the greatest icon of science, whose genius did put its final and authoritative seal on the Scientific Revolution. Running away from plague in Cambridge to his native village, the young and solitary scholar single-handedly laid the foundation of modern science. He accomplished this during a mere 18 months of his anni mirabiles of 1665-66 when he formulated his laws of motion and his theory of gravitation. In addition, he also invented calculus during the same months. But, after that, he devoted a large part of his long life to the practice of alchemy and to the theological labours of interpreting the Bible. He denounced what he thought were corruptions of Christianity – such as trinitarianism – and adopted a radically puritanical version of Arianism that considered the Bible as an exact Revelation about the future. Nothing in Newton was of normal proportions – neither his scientific genius nor his rigid dogmatism and confident superstitions.

If you think I am being unfair to Newton – after all he could only be a product of his times – you are already conceding part of the point I am driving at. But let me cite a few examples from more recent times before I try to peep into the relationship between Science and Scientific Temper. Pascual Jordan, a pioneer of Quantum Mechanics, was an active Nazi who continued to hold his fascist views even after his rehabilitation in post-war Germany. Physics Nobel laureates Philipp Lenard and Johannes Stark too were active Nazis and confirmed anti-Semites. A little earlier, the great mathematician, Emmy Noether, had been prevented from becoming a faculty in the mathematics department of the University of Gottingen just because she was a woman. An exasperated David Hilbert famously said, “I do not see that the sex of the candidate is an argument against her admission as a privatdozent. After all, we are a university, not a bathhouse.” And a scientist friend of mine reminded me the other day that our own Sir C V Raman, one in the title of this program, was opposed to a woman being admitted as a Ph.D. student, because, in his views, women were unfit to do science.

I am not here to withhold the certificate of scientific temper from being awarded to eminent scientists. My purpose is to examine whether lack of scientific temper comes in the way of doing good science. Pervez Hoodbhoy wrote a book some thirty years ago. The book is called “Islam and Science”, and the subtitle is “Religious Orthodoxy and the Battle for Rationality”. In the book he cites a telling example. Steven Weinberg and Abdus Salam – the same Salam who too is in the title of this program – came up with one of the greatest physical theories of 20th century – the unified quantum theory of electromagnetism and the weak nuclear force. They invented this theory independently of each other and shared the Nobel Prize for it. Weinberg was an avowed atheist; Salam was self-confessedly a believer. Salam wrote the foreword to Pervez’s book in which he concurs with the author that being a believer made no difference, one way or the other, to his coming up with the theory. There you have it from the horse’s mouth. What, then, is the relationship between science and scientific temper?

The scientist does not live by science alone. Even a scientist’s mind is not entirely colonised by Scientific Reason. I do not know if, like the brain, the mind too has two separate but interconnected lobes. But allow me to use a simple-minded metaphor. Scientific temper, it seems to me, has something to do with the rational side of the mind trying to influence the emotional side. This may give rise to a reasonable and cultivated individual, but it can also result in disaster. With the rational side meddling too much with the emotional side, it may give rise to a rather childish adult, if not a veritable Dr Strangelove.

Scientific temper is a tricky business. It involves a very intricate game between Reason and Culture. Neither side of the game we understand very well. There are those who think that Reason is transparent, whereas Culture harbours dark corners. The opposing side points out that this is a false picture. It labours to show that Reason has murky origins – it did not result from an immaculate conception. And, it is not at all self-aware – it does not know that it is inextricably entangled in structures of power.

Which side is more important for a successful and at the same time a meaningful life? Which side should sit in judgement? It is a debate that is hard to settle. There are funny episodes, for example, of scientists sitting in judgment over poetry. Paul Dirac, one of the greatest scientific minds of the 20th century once told J R Oppenheimer, another great scientist and a polymath, “I don’t see how you can work on physics and write poetry at the same time. In science, you want to say something nobody knew before, in words everyone can understand. In poetry, you are bound to say something that everybody knows already, in words that nobody can understand.” The judgements of poets about science, on the other hand, are usually not so funny. They are often much darker – prone to denouncing the supposed soullessness of science or mocking it as one mocks the childishness of a grown-up.

With this much as a background, let me now come to the topic of the day. I do agree with the assertion that scientific temper is largely missing from the societies and cultures that form a distinct civilisation on the subcontinent. But, I am less surprised that it is missing despite scientists likes of Bose, Raman and Salam. I am more surprised that it is missing despite someone like Jawaharlal Nehru. To my mind, Nehru was the best and the wisest proponent of the desirability of scientific temper. Let me quote a passage from The Discovery of India even if it consumes a precious minute,

“Science deals with the domain of positive knowledge but the temper which it should produce goes beyond that domain. The ultimate purposes of man may be said to be to gain knowledge, to realize truth, to appreciate goodness and beauty. The scientific method of objective inquiry is not applicable to all these, and much that is vital in life seems to lie beyond its scope – the sensitiveness to art and poetry, the emotion that beauty produces, the inner recognition of goodness. The botanist and the zoologist may never experience the charm and beauty of nature; the sociologist may be wholly lacking in love for humanity. But even when we visit the mountain tops where philosophy dwells and high emotions fill us, or gaze at the immensity beyond, that approach and temper are still necessary.”

I might also add that the Indian Constitution is the only Constitution in the world which prescribes developing “scientific temper, humanism and the spirit of inquiry and reform” as a fundamental duty of every citizen.

All this, however, may sound too philosophical and too idealistic. How can one be sure that scientific temper really matters to a society or a civilisation? I think history has provided a very real example. Let me dwell on it for a minute.

Pervez’s book that I have already mentioned opens with a parable of “a team of Martian anthropologists visiting Earth sometime between the 9th and 13th centuries”. They find that “the civilization with greatest promise is the Islamic civilization with its Bait-ul-Hikmah, astronomical observatories, hospitals and schools”. Then they visit again towards the end of 20th century and find that “their earlier prediction had turned out to be wrong. The part of humanity which once seemed to offer the greatest promise now appears inescapably trapped in a state of frozen medievalism, rejecting the new and clinging desperately to the old. On the other hand, the former retrogrades have climbed the evolutionary ladder and are now aiming for the stars. Was this stunning reversal of roles, ask the visitors, the mere misfortune of one and the good fortune of the other? Was it due to invasions and military defeats? Or was it the result of a fundamental shift in outlook and attitudes?”

With minor variations the parable may apply equally well to the fate of the subcontinent. If the Martians were to visit here sometime during the 17th century, they would be dazzled by the Navratnas (nine jewels) in Akbar’s court and they would marvel at the fact that the subcontinent accounted for nearly one third of the total world production. However, on their second visit at the turn of the millennium, they would be equally disappointed with this civilisation.

Perhaps the real question to ask is: why and how did the West pull ahead? That may shed easy light on why everyone else got left behind. The answer is obvious, but, like the case of the elephant in the room, there have been reasons for ignoring the obvious. Looking for deeper causalities behind the long trajectories of history may no longer be the intellectual flavour of the day. After all, this is the era of suspicions about grand narratives. We who got left behind can derive satisfaction from the all-round denunciations of colonialism and imperialism and attribute all that we suffer from to their crimes. We may rejoice that those in the high chairs of western academia are raising an intellectual storm against science and modernity which, supposedly, have been nothing but handmaidens of capitalism, colonialism and imperialism. The postcolonial theorist may continue to uncover sinister doings of the long dead colonialism. But someday we will have to ask – what is in it for us on the subcontinent? These critics are definitely making the western societies better, more cultivated, more democratic and more multicultural. But they already had science and modernity; they had already pulled ahead. How should we find our path out of poverty and superstition? What kind of future should we visualize for ourselves?

Explanations about why and how did the West pull ahead fill entire libraries. But, in some ways, the answer is too obvious: West did it with the help of science and modernity. Of course, both were born along with capitalism and colonialism. But one should not throw the baby with the bathwater. It is truly astonishing that there exist high theories declaring that all claims of science about universal truths, objectivity and uniqueness of scientific method are false; that all cultures and communities in all ages had equally valid claims to knowledge and method. In India a simple way has been found to support such theories – all one has to do is to claim that everything that modern science has accomplished, and will ever accomplish, is already there in the Vedas.

In any case, West did not accomplish the miracle of Great Divergence only through capitalism and industrial revolution. Enlightenment and Modernity played an equally important role. I have already referred to the complex interaction between Science and Culture. In 18th century Western Europe this imparted an added acceleration to history. And it took nearly two centuries after the advent of modern science for scientific temper to seep into western culture. Enlightenment was the name given to this process of seeping in.

Enlightenment and Modernity cannot just be imported or imitated. This is because of the fact that science is one but cultures are many. All cultures must find their own ways to imbibe science and animate modernity. Among those who were left behind, there have been a few successful examples of catching up with the West. Soviet Union used to be one such example but it collapsed. Russia, in any case, was too close to the European civilisation to count as a distinctive example. In the East, Japan earlier and China now have been such examples. What has stopped the subcontinent from being another such example?

This too is an enormous subject and an extraordinarily complex one. It is said that fools rush in where angels fear to tread. But let me rush in nevertheless. Among many millennial historical processes that have gone into the making a distinct civilisation on the subcontinent, one is special and unique. Elements of it may be found in other lands but on the subcontinent it has played role like no other place on the planet. This, in my opinion, has been the single largest obstacle to scientific temper seeping into our culture. Let me conclude by pointing a finger at it.

I am alluding to the fact that nearly all religions on the subcontinent took, in varying degrees, a mystical-devotional form, comprising of numerous sects led by gurus, pirs, mahatmas and other god-men – all engaged in the task of paving a plebeian road for a direct access to God without the mediation of priests or books or other intermediaries. On the Hindu side it emerged in the South as the Bhakti Movement and spread to the North in the second millennium. On the Muslim side it made its way through Afghanistan to the north-west of India and spread through sufis, dervishes and pirs. The phenomenon also gave rise to a new religion – Sikhism. It is this phenomenon of Bhakti, Sufism, Sikhism and assorted mystical-devotional movements that is at the heart of a distinct civilisation on the subcontinent.

This phenomenon has been judged favourably by nearly everyone. It has won praises from the religious and the non-religious, from traditionalists and modernists, from the right-wing as well as the left-wing. Nearly everyone prefers heterodoxy to orthodoxy. There is no denying that in many ways it has contributed positively to the culture and civilization on the subcontinent. And yet, there is a very large negative fall-out that has been largely ignored.

This phenomenon triggers processes that obstruct the advance of scientific temper and modernity. It encourages blind faith at the cost of a genuine sense of wonder; prevents religiosity from turning genuinely spiritual and becoming philosophical; prevents the philosophical from becoming reasoned; prevents Reason from seeping into Culture. It has been the principal vehicle of unreason, blind faith and superstition in our part of the world. George Orwell once said, “Saints should always be judged guilty until proven innocent”. An ironical meaning has been added to Orwell by today’s India where god-men do not lose followers even after being convicted as rapists and murderers.

Even Nehru fails to grapple with the civilizational consequences of Bhakti Movement. He harbours contradictions. He admires Vivekanand, Rabindranath Tagore, Gandhi, Bhagat Singh and Einstein – all at the same time. He was a great man – a visionary, a leader, a thinker, a statesman. Like Whitman he could perhaps say, “I am large, I contain multitudes”. He failed because the weight of the past was too heavy. He could not speak bare truths because he had to carry his people along. That is why, sometimes, you need to listen to small men too. They can speak the bare truth as they are spared the onerous task of carrying Nehru’s burden.

This is where I will stop.

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Dr Ravi Sinha, Theoretical Physicist, Activist, Scholar, associated with Progressive Movements and Writer

[* The Indian Diaspora Washington DC Metro, USA organised an online panel discussion on the theme ‘Absence of Scientific Temper in the Lands of Scientists Raman, Bose, Abdus Salaam on 19 th November 2022.

Professor Pervez Hoodbhoy, Eminent Physicist, Prominent Public Intellectual, Civil Rights Activist, Author, Columnist from Pakistan ; Dr Ravi Sinha, Theoretical Physicist, Activist, Scholar, associated with Progressive Movements and Writer ; Mr Gauhar Raza, Former Chief Scientist, Council of Scientific and Industrial Research, Civil Rights Activist, Poet, Documentary Filmmaker both from India shared their ideas at the programme which was followed by discussion.

Prof Razi Raziuddin, Scientist, Founder, Indian Diaspora, Washington DC Metro, USA shared welcoming remarks. ]

The Two-Nation Theory, Partition and the Consequences – Prof Ishtiaq Ahmed

 Prof Ishtiaq Ahmed, Professor Emeritus of Political Science, Stockholm University and a leading authority on the Politics of South Asia and an eminent author will deliver next lecture (21 st one) in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative

He will be speaking on ‘The Two-Nation Theory, Partition and the Consequences’ on Sunday, 27 th November 6 PM (IST) 

The lecture will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Topic : 

The Two-Nation Theory, Partition and the Consequences

1.    The Two-Nation Theory as an Idea and an Argument: The talk will contextualize the origins of the Two-Nation Theory in the background of pre-colonial and British colonial rule and analyse it in relation to competing ideas of a One-Nation Theory as well as the vaguer ideas of multiple nationalities deriving from language, ethnicity and religion. This section will also deal with British policy regarding such competing ideas of group identity and nation and nationalism. This will cover the period 1857 – 1932. However, most attention will be given to the 1928 Motilal Nehru Report (which a section of Muslims including one faction of the Muslim League was willing to accept) and Jinnah’s 14 points.

 2.      The Two-Nation Theory and the demand for Partition: The Government of India Act 1935, the election speeches and manifestos, election results and the Muslim League’s deployment of communalism as political strategy to demand partition on behalf of Muslims. The stands of the Indian National Congress, the Muslim League, the Communist Party of India, the Hindu Mahasabha, the Jamiat Ulema e Hind and other Islamist, regional and working-class parties of Muslims and the Sikhs of Punjab.

 3.      British policy on the future of India: from unwillingness to grant India freedom to retaining influence and control through defence treaty to finally deciding in favour of partition. The Cabinet Mission Plan, Wavell’s schemes to transfer power as an award, The British military’s transformation from opposition to support for partition; 3 June Partition Plan, the partitions of Bengal and Punjab, the 18 July 1947 Indian Independence Act.

 4.      The Partition as a flawed exercise in the transfer of power which claimed at least one million Hindu, Muslim and Sikh lives, caused the biggest migration in history (14 – 15 million) and bequeathed bitter disputes over the sharing of colonial assets, territory and claims to princely states. In this regard, the

 5.      The Partition as a referent for nation-building: while agreeing finally to the partition of India on a religious basis India held steadfastly to nation-building on a secular, liberal-democratic, inclusive and pluralist basis. The Indian constitution came to represent such a view of nation and nation-building. On the other hand, since Pakistan had been won in the name of Islam its nation-building was based on distinguishing Muslims from non-Muslims and generating different formulae of differential rights. More importantly, it brought to light the deep divisions among Muslims based on sect, sub-sect and ethno-linguistic criteria.

 6.      The Partition and settling of disputes between India and Pakistan: The two-nation theory continued to define and determine relations between India and Pakistan resulting in wars, terrorism and zero-sum games in international forums.

 7.      The Partition as a historical, political, ideological and intellectual phenomenon: An Evaluation

About the Speaker :

Prof Ishtiaq Ahmed

Professor Emeritus of Political Science, Stockholm University; Honorary Senior Fellow, Institute of South Asian Studies, National University of Singapore. Published several books with special focus on the politics of South Asia discussed in context of regional and international relations

Latest publications, Jinnah: His Successes, Failures and Role in History,  New Delhi: Penguin Viking, 2020 won the English Non-Fiction Book Award for 2021 at the Valley of Words Literary Festival, Dehradu, India; Jinnah: His Successes, Failures and Role in History, Vanguard Books, Lahore 2021;

Pakistan: The Garrison State, Origins, Evolution, Consequences (1947-2011), Karachi: Oxford University Press, 2013;

The Punjab Bloodied, Partitioned and Cleansed, Karachi: Oxford University Press, 2012- It won the Best Non-Fiction Book Prize at the 2013 Karachi Literature Festival and the 2013 UBL-Jang Groups Best Non-Fiction Book Prize at Lahore and the Best Book on Punjab Award from Punjabi Parchar at the Vaisakhi Mela in Lahore, 2016

He is working on a new book, The Partitions of India, Punjab and Bengal: Who What and Why

He is the Editor-in-Chief of the “Liberal Arts & Social Sciences International Journal (LASSIJ)” and also regularly writes columns in several Pakistani newspapers

Why everyone cares about Ukraine

Guest Post by Shylin Shekhar

The western world has been very vocal in support of Ukraine since the Russian invasion started. This has created a complete black and white image of the war, one side being a “civilized european country with pure aryan people” while the other being an evil authoritarian “oligarchy”.

People’s support of Ukraine in the western world is so strong that they would rather freeze to death than stop their economic sanctions on Russia. Instead, the ‘NAFO’ community and NATO supporters are seeking all out war with them.

But why is it that people only care about this conflict out of the dozens that’ve existed for decades. They didn’t care about the invasion of Iraq or Libya, there isn’t this level of support for Palestinians when they’re being genocided every single day. Is it because those were by western imperial powers instead of eastern ones?

There must be a good and a bad character in this type of story and this was very easy to create. Russia has been controlled by the rich since 1991 and so the west highlighted this point and condemned them as an “Oligarchy”.

An oligarchy is a state controlled by the top richest people, they own most if not all of the resources of the country and hold substantial political power, does this sound familiar? America is also an oligarchy; it’s just that their oligarchs are called ‘entrepreneurs’. In fact, the net worth of just Bezos, Musk and Gates is more than the top 100 “oligarchs’ in Russia.

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Stop the Slander: Solidarity Statement Against Attempts to Tarnish Activists in the Anti-Adani Seaport Struggle at Vizhinjam

The other day, the citizens of Kerala witnessed an extraordinary coming -together of CPM and BJP leaders in Thiruvananthapuram — in support of the Adani sea port, against the fisher community of the Thiruvananthapuram coast.

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മാറുന്ന ഭരണകൂടം, നവബ്രാഹ്മണിക പിതൃമേധാവിത്വം, ദണ്ഡനീതി ഫെമിനിസം കേരളത്തിൽ — 5

ഉപസംഹാരം

ഫെമിനിസ്റ്റ് ദണ്ഡനീതി നിയമ ഉപകരണങ്ങൾ നിരോധിക്കണമെന്നോ അവ തീർത്തും അപ്രസക്തമാണെന്നോ അല്ല ഈ ലേഖനത്തിൽ ഞാൻ വാദിച്ചിട്ടുള്ളത്. നേരെ മറിച്ച് അവ ഉപയോഗിക്കുമ്പോൾ ജനാധിപത്യവും മനുഷ്യാവകാശങ്ങളും ലിംഗാനീതിയ്ക്കെതിരെയുള്ള പോരോട്ടങ്ങളുടെ സാധ്യതകൾ തന്നെയും അധികാരത്തിൻറെ മേൽ-കീഴറ്റങ്ങൾ കാണാനാകാത്തവിധം പിളർന്ന വായിലകപ്പെട്ടു പോകും വിധം അവരെ പുണരുന്നത് അങ്ങേയറ്റം അപകടകരമായിരിക്കും എന്ന മുന്നറിപ്പ് വായനക്കാരുടെ മുന്നിൽ വയ്ക്കാനാണ് എൻറെ ശ്രമം.

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മാറുന്ന ഭരണകൂടം, നവബ്രാഹ്മണിക പിതൃമേധാവിത്വം, ദണ്ഡനീതി ഫെമിനിസം കേരളത്തിൽ –4

ദണ്ഡനീതി ഫെമിനിസവും നവബ്രാഹ്മണ പിതൃമേധാവിത്വവും

കേരളത്തിൽ ഇരുപതാം നൂറ്റാണ്ടിൽ രൂപമെടുത്ത ബ്രാഹ്മണിക പിതൃമേധാവിത്വത്തിന് സവിശേഷസ്വഭാവങ്ങളുണ്ടായിരുന്നു. ഇരുപതാം നൂറ്റാണ്ടിൽ ഉയർന്നുവന്ന നവവരേണ്യസമുദായങ്ങളെ — നവോത്ഥാന വ്യവഹാരത്തിൻറെ വാഹകങ്ങളെ — പണിതെടുത്ത അടിസ്ഥാന അധികാര-കൂടങ്ങളിൽ ഒന്നായിരുന്നു നവബ്രാഹ്മണിക പിതൃമേധാവിത്വം.

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മാറുന്ന ഭരണകൂടം, നവബ്രാഹ്മണിക പിതൃമേധാവിത്വം, ദണ്ഡനീതി ഫെമിനിസം കേരളത്തിൽ –3

സംരക്ഷക-അന്നദാതാ ഭരണകൂടവും ദണ്ഡനീതി ഫെമിനിസവും

കേരളത്തിലിന്ന് രാഷ്ട്രീയരംഗത്തും ഭരണരംഗത്തും (ഉദ്യോഗസ്ഥകളല്ലാത്ത) സ്ത്രീകളുടെ പ്രാതിനിധ്യവും അധികാരവും ഇടതുഭരണത്തിനു കീഴിൽപോലും കുറവാണ്. ഇടതുരാഷ്ട്രീയക്കാരികൾക്കു പോലും സ്വന്തമായ രാഷ്ട്രീയസ്വാധീനവലയം ഉണ്ടാക്കാൻ അനുവാദം ഇല്ലെന്നതിന് തെളിവ് ഇപ്പോഴത്തെ സർക്കാർ തന്നെ തന്നിട്ടുമുണ്ട് — ശൈലജ ടീച്ചറെ മാറ്റി സർക്കാരിലെ ആൺ അധികാരികളെ തികച്ചും ആശ്രയിച്ചു മാത്രം നിലനില്പുള്ള മറ്റൊരു സ്ത്രീയെ അവരുടെ സ്ഥാനത്ത് പ്രതിഷ്ഠിച്ചതോടെ. പാർട്ടി അധികാരശ്രേണികളിൽ സ്ത്രീകൾ കുറയുകയും കീഴ്ത്തല-കാലാളുകളുടെ കൂട്ടത്തിൽ അവരുടെ സാന്നിദ്ധ്യം ഉയരുകയും ചെയ്യുന്നുണ്ട്. പൊതുവെ ഭരണനയതലത്തിൽ ഫെമിനിസ്റ്റ് സ്വാധീനം കുറഞ്ഞിട്ടുമുണ്ട് (മഹിളാ സമഖ്യയിലും കുടുംബശ്രീയിലും ഇതു പ്രകടമാണ്). എങ്കിലും സ്ത്രീശാക്തീകരണ സർക്കാരെന്ന പ്രതിച്ഛായ നിലനിർത്താൻ ഇപ്പോഴത്തെ സോഷ്യലിസ്റ്റ്- അനന്തര ദുഷ്പ്രഭുത്വത്തിൻറെ വാഹനമായ സിപിഎമ്മിനും അവർ നയിക്കുന്ന സർക്കാരിനും കഴിഞ്ഞിട്ടുണ്ട്.

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മാറുന്ന ഭരണകൂടം, നവബ്രാഹ്മണിക പിതൃമേധാവിത്വം, ദണ്ഡനീതി ഫെമിനിസം കേരളത്തിൽ — 2

മലയാളി ഫെമിനിസത്തിലെ ‘ദണ്ഡനീതിനിമിഷം’?

ദണ്ഡനീതി ഫെമിനിസം (Carceral feminism) എന്ന സങ്കല്പനം ഇന്ന് ലോകഫെമിനിസ്റ്റ് ചർച്ചകളിൽ സുപരിചിതമാണ്. പോലീസ്, കോടതി, ശിക്ഷ, തടവ് മുതലാവയുൾപ്പെടുന്ന ഭരണകൂടശാഖയെ മുഖ്യമായും ആശ്രയിച്ചുകൊണ്ട് സ്ത്രീകൾക്കെതിരെയുള്ള എല്ലാത്തരം ഹിംസയും പരിഹരിക്കാമെന്ന വിശ്വാസത്തിൽ ഊന്നിനിൽക്കുന്ന ഫെമിനിസ്റ്റ് പ്രയോഗങ്ങളെയും ചിന്തയെയുമാണ് അത് സൂചിപ്പിക്കുന്നത്. പാശ്ചാത്യ ഫെമിനിസത്തിൽ ഏറെ പഴക്കമുണ്ടെങ്കിലും അത് 1980-90 ദശകങ്ങളിൽ അമേരിക്കൻ ഫെമിനിസത്തിലെ പ്രമുഖ ധാരയായി ഉയർന്നുവന്നു. ലൈംഗികത്തൊഴിലിനെപ്പറ്റിയുള്ള ചർച്ചകളിലാണ് സമീപകാലത്ത് അതിൻറെ പുനരുജ്ജീവിതരൂപം പ്രത്യക്ഷമായത്.

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മാറുന്ന ഭരണകൂടം, നവബ്രാഹ്മണിക പിതൃമേധാവിത്വം, ദണ്ഡനീതി ഫെമിനിസം കേരളത്തിൽ — 1

സംശയത്തിൽ നിന്ന് സ്വീകാര്യതയിലേക്ക്

കേരളത്തിൽ ഫെമിനിസത്തിൻറെ രാഷ്ട്രീയപരിണാമത്തെ മാറുന്ന ഭരണകൂടത്തിൻറെ പശ്ചാത്തലത്തിൽ മനസ്സിലാക്കാനൊരു ശ്രമമാണ് ഈ എഴുത്ത്. ഫെമിനിസം എന്ന പേര് സ്വയം അവകാശപ്പെടുന്ന രാഷ്ട്രീയം ഇവിടെ 1980കളിലാണ് പൂർണമായ അർത്ഥത്തിൽ പ്രത്യക്ഷമാകുന്നത്.

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Partition Split Us Up: Can We Live in Peace as Neighbors? –

– Dr Vinod Mubayi

Dr Vinod Mubayi, Public Intellectual, Scientist and Activist will be delivering the 20 th Lecture in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative on Sunday, 30 th October at 7 PM (IST)

He will be speaking on 

Partition Split Us Up: Can We Live in Peace as Neighbors?

Future Challenges and Reflections

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/82348327214?pwd=MUZvYVJyRnhUSXpHZkxPdG9NVmpadz09

Meeting ID: 823 4832 7214

Passcode: 825754

The programme will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi . 

Theme :

Partition Split Us Up: Can We Live in Peace as Neighbors?

Future Challenges and Reflections

75 years have passed since Partition and the prospects of peace between the two largest countries of the region, India and Pakistan, whose conflict impacts the entire South Asia region look dimmer than ever. The reasons and justifications offered by the protagonists for the separation, such as the two-nation theory, have been discussed at length in various forums and while the past is commonly understood to be prologue to the future it behooves us to imagine a future without all the baggage of the past.

This talk will refer at times to the past and the misdeeds of the present but focus mostly on possibilities for the future. A good amount of experience has shown that despite the most fraught and tense relations between governments, common people of south Asian countries, whether in the diaspora or while visiting each other’s countries, are able to establish bonds and friendships very quickly and easily. Perhaps 75 years cannot easily extinguish long standing cultural and linguistic bonds established over millennia. Dialectics also teaches us that opposing and contradictory views and ideas can co-exist within a society or group and which will prevail depends on the context in which the opposites interact.

Groups such as South Asia Peace Action Network (SAPAN), whose founding charter states that its minimum common agenda is reclaiming South Asia, have attracted members from all South Asian countries. SAPAN calls for soft borders and visa free travel between countries in the region in addition to demands for human rights, peace and justice. The talk will discuss possibilities of expanding the activities of people-to-people groups that can create civil society pressures for peace and prosperity as well as joint actions to counter existential threats like climate change.

About the Speaker :

Dr Vinod Mubayi is a reputed American Physicist of Indian origin.

PhD in Physics from Brandeis University, taught at Cornell University and was a research fellow at TIFR, Mumbai before joining Brookhaven National Laboratory, New York.

A member of the American Nuclear Society, the American Physical Society and the American Association for the Advancement of Science, he was also a Consultant to agencies of the United Nations on Energy Issues ( 1981-1985)

He joined INSAF bulletin as co-editor in 2004.  A keen observer of socio-political events in India, Mubayi has been close to progressive groups, espousing human rights issues and the cause of the downtrodden

His book ‘Where is India Headed ? – An Historical Critique ( 2021, Media House) which chronicles the contemporary Indian History during the last few decades has also been translated into Hindi

The Partition of India: Three Outstanding Questions – Professor Pervez Hoodbhoy

Professor Pervez Hoodbhoy, eminent physicist, author, public intellectual and a forceful voice for reason, science and democracy will be delivering the 19th Democracy Dialogues lecture on Sunday, October 9th, 2022 at 6 PM (IST)

The Partition of India: Three Outstanding Questions 

Seventy five years after the communal storm of 1947 countless important questions still remain. From among them I will concentrate upon three which are particularly important in understanding the past but which, in addition, continue to influence current trajectories.

  1. How, when, and why did the two-nation theory emerge? 
  1. Why is Pakistan a praetorian state but India is not? 
  2. Was Partition preventable and had it not happened what might have been the consequences? 

Speaker: 

Pervez Hoodbhoy is a nuclear physicist, a frequent commentator on Pakistani television channels, founder-director of The Black Hole in Islamabad, and an author. He received his undergraduate and graduate degrees from MIT and taught physics at Quaid-e-Azam University for 47 years.  

The lecture will be held on zoom and for security reasons the link will be shared individually only closer to the event. Please write to us at democracydialogues@gmail.com if you want to join the lecture online.

It will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi

Letter to Consul General, Iranian Consulate, Mumbai: Indian women’s organisations

The following letter, signed by over 300 individuals from different national and regional organisations was handed over at the  Iranian Consulate in Mumbai by six representatives on September 29, 2022.  It was received politely and acknowledged.

Mr. Abolfazi Mohammad Alikhani
Consul General,
Iran Consulate, Mumbai.

Sir,

We, women and women’s organization from India, are writing this letter to register our horror at the  brutal attacks on the women and citizens  of Iran as they protest the killing of Mahsa Amini at the hands of the Gasht-e-Ershad. These brutal attacks have resulted in and continue to result in further deaths and imprisonments.

These brave women of Iran are demanding freedom from the Morality Police and the State imposing upon them what they must or must not wear and how to wear it; what they must and must not do, or act, or behave. They are rejecting this control. The men of Iran are giving full support and putting their bodies on the line alongside them. The resulting violent repression is heinous and inhuman.

We stand in solidarity with the women of Iran who came out in public to protest killing of Mahsa Amini and to voice their demands for  freedom, equality and autonomy. Continue reading Letter to Consul General, Iranian Consulate, Mumbai: Indian women’s organisations

In solidarity with the Iranian people fighting for democracy and justice: Ayesha Kidwai & Nivedita Menon

This post is jointly written by AYESHA KIDWAI AND NIVEDITA MENON

On this international day of solidarity with the Iranian people, two feminists from India send you our greetings, in complete awe of your courage, your creativity, your solidarity with one another, your relentless resistance in the face of cruel and brutal repression.

Watching the panel discussion on Jadaliyya on the ongoing struggle of the Iranian people against the authoritarian regime, we were struck by the complexity of the arguments being made. The struggle is not against Islam, and it is not about hijab everywhere and at all times. What we are witnessing in Iran is reflected all over the world wherever there is resistance to the gendered ways in which all states control populations – whether by compulsory conscription in wars the people have no interest in, or by making the hijab central to the reason of state – in Iran by compulsory veiling, in France and in India by compulsory unveiling of the Muslim woman; or in the USA by denying autonomy over their bodies to women by criminalizing abortion. Continue reading In solidarity with the Iranian people fighting for democracy and justice: Ayesha Kidwai & Nivedita Menon

Feminist reflections on the brave women of Iran: Ayesha Kidwai

Guest post by AYESHA KIDWAI

Women in Iran cast off their hijabs and occupy the streets.

Looking at these women in this photo, I think of what feelings they struggle with at this moment.

How many emotions populate this picture? Courage, triumph, feelings of being exposed, fear, the sense of a point of no-return being crossed…

But one knows they have found the one thing that will carry them beyond this moment—the long, deep embrace of sisterhood.

Inquilab Zindabad is not only said with clenched fists, it’s said with interlinked arms and bodies curved into each other. Continue reading Feminist reflections on the brave women of Iran: Ayesha Kidwai

Why no Admissions this year in Central Universities? JNUTA statement

Did you even know this? That there have been no admissions this academic session so far, to any Central University,  as the results of the new UGC mandated centralized Common Universities Entrance Test (CUET) are yet to be announced as late as September 2022, when the academic session was to have begun in July/August. The UGC Chairperson M Jagadesh Kumar (who ran JNU to the ground in his extended tenure) has tweeted that results for the Undergraduate courses will be announced latest by September 15th. The exams for Postgraduate  courses were conducted only this month!

And I dare you to find a single news item that reports the CUET as the large scale massive failure it is. At best you get bland information such as that undergraduate admissions are about to begin in Deli University this month and that classes are expected to begin on October 20th.  No questioning of why there has been a three month delay already and even now everything is only “expected”!

And again earlier this month, as late as September 2022, the National Testing Agency informed Central Universities it will be unable to conduct the Common Test for the Ph.D programme, and the universities will, at this point, START the process of conducting these exams themselves.

The first time in India admissions to universities were severely delayed was due to the Covid virus in 2020-21, but different universities had different processes and could accomplish admissions by the end of the year. In the last year too there was delay, but as universities were still holding different entrance text exams,   universities differed in when they managed to complete admissions in 2021. This academic year, however, when there are no pandemic induced closure of any university, the situation is the worst ever, due entirely to a targeted human endeavour to destroy India’s public university system, by imposing an unmanageable, centralised examination that lakhs and lakhs of students all over the country must take for admission into universities.

That this disaster for public universities and for two generations of students is not making  the news, let alone the headlines, says much about the state of the media in India today.  That nobody will be held accountable for this national disaster is almost unbelievable except that  we have had to to believe so many unbelievable developments in our unfortunate country since 2014, that perhaps the destruction of public universities seems minor in comparison?

Please take a look at the detailed critique provided by the JNUTA.

Continue reading Why no Admissions this year in Central Universities? JNUTA statement

हिंदी में अंतर्राष्ट्रीयवाद – साहित्य और शीत युद्ध :प्रोफेसर फ़्रंचेस्का ओर्सीनी

Prof Fransesca Orisini, who has taught Hindi and Indian literature at SOAS, London, will be delivering the Seventh Lecture in the Sandhan Vyakhyanmala Series on Sunday, 18 th September, 6 PM ( IST).

She will be speaking on  हिंदी में अंतर्राष्ट्रीयवाद – साहित्य और शीत युद्ध ( Hindi Internationalism – Literature and Cold War

 Time: Sep 18, 2022 06:00 PM (IST) India

Join Zoom Meeting
https://us02web.zoom.us/j/87009880306?pwd=VUdFTnFYVTJTd0lsbUFGQmsyL013Zz09

Meeting ID: 870 0988 0306
Passcode: 235401

Organised by :NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh 


संधान व्याख्यानमाला : सातवां वक्तव्य 
विषय : हिंदी में अंतर्राष्ट्रीयवाद – साहित्य और शीतयुद्ध  

आज़ादी के बाद के दो दशक पत्रकारिता के लिए स्वर्णिम युग माना जाता है – हिंदी  और दूसरी भाषाओं में । ये वे दशक भी थे जब उपनिवेशवाद को खतम करने वाली हवा ज़ोरों से चलने लगी थी, और साथ साथ शीत युद्ध का प्रभाव भी दुनिया के हर कोने में महसूस होने लगा। तब साहित्य को बड़ी गम्भीरता से लिया जाता था। एक ख़ास क़िस्म के साहित्य के प्रचार, प्रसार और अनुवाद में बड़े पैमाने के प्रोग्राम स्थापित करके बहुत बड़ी रक़म खर्च की गयी  । मोनिका पोपेस्कु की हाल की किताब का शीर्षक लिया जाए तो शीतयुद्ध और उपनिवेशवाद से आज़ादी पाने के संघर्ष कलम की नोक पर (At Penpoint, २०२०) चलाए गए। साहित्य पर शीतयुद्ध के प्रभाव को लेकर ज़्यादातर काम अमेरिका, सोवियत  रूस और साम्यवादी चीन के प्रचार-प्रसार योजनाओं पर हुआ है । मेरा ध्यान हिंदी पत्रकारिता पर रहेगा, और विशेष तौर पर हिंदी की कहानी पत्रकारिता, जिनका पाठक-वर्ग न केवल साहित्यिक बिरादरी थी बल्कि सामान्य पाठक भी उसमें शामिल थे । क्या १९५० और १९६० के दशकों की हिंदी पत्रिकाओं में कोई अंतर्राष्ट्रीय चेतना नज़र आती है? क्या कहानी और सारिका जैसी लोकप्रिय पत्रिकाएँ भी शीतयुद्ध में भाग लेते दिखाई देती हैं ? क्या उनमें शीतयुद्ध और उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने के संघर्षों की झलक मिलती है ? कहानी-पत्रिकाएँ पाठकों के मन में दुनिया की कल्पना कैसे गढ़ती हैं ? (एक ऐसी कल्पना, जो राजनीति से जुड़ी हो पर सिर्फ़ राजनीति से नहीं ।) और जो दुनिया पत्रिकाएँ–जो हर हफ़्ते या हर महीने सिलसिलेवार छपती तो हैं मगर जिनको पढ़ने के बाद रद्दी के हवाले किया जाता है—गढ़ती हैं, वह दुनिया पाठकों के मन में कहाँ तक अंकित रहती है? क्या पत्रिकाएँ भी अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को बनाने में सक्रिय होती हैं ? इन सवालों का जवाब देने की कोशिश करते हुए यह प्रस्तुति हिंदी के एक कम जाने माने पहलू पर रोशनी डालेगी।  


फ़्रंचेस्का ओर्सीनी SOAS, लंदन विश्वविद्यालय में हिंदी और भारतीय साहित्य की प्रोफ़ेसर रही है। उनकी लिखी हुई और सम्पादित किताबों में हिंदी का लोकवृत्त (The Hindi Public Sphere: Language and literature in the age of nationalism, 1920-1940, 2002), Love in South Asia (2006), Print and Pleasure (2009), Before the Divide (2010), After Timur Left (2014, with Samira Sheikh), Tellings and Texts (2015, with Katherine Schofield), Hinglish Live (2022, with Ravikant) और The Form of Ideology and the Ideology of Form: Cold War, Decolonisation, and Third World Print Cultures, with Neelam Srivastava and Laetitia Zecchini) शामिल हैं। 

SL Govt – Stop Labeling Student Protestors and Activists as Terrorists! South Asian Feminists

Statement released by feminists from Sri Lanka, Bangladesh, Pakistan, Fiji, Malaysia and India, August 27, 2022

We are a group of feminists writing to call urgent attention to the extra-constitutional attempts of the Government of Sri Lanka (GoSL) to suppress dissent. Lacking a popular mandate, hunting down student protestors and activists, including a LGBTIQ activist has become a central strategy of the political élite to retain power. The latest move by the GoSL is to brand three student leaders and the student union they represent, the Inter University Student Federation (IUSF), as ‘terrorists’.

Wasantha Mudalige, Convenor of IUSF, Galwewa Siridhamma thero, Convenor of the Inter-University Bhikkhu Federation, and Hashan Jeewantha, a student activist, were among the 20 arrested on August 18, 2022, for participating in a peaceful protest led by the student movement. All three of them are prominent student leaders who have been at the forefront of struggles for socio-economic justice in Sri Lanka, particularly against numerous ongoing attempts to dismantle free education. Continue reading SL Govt – Stop Labeling Student Protestors and Activists as Terrorists! South Asian Feminists

DISSENT, DEBATE, CREATE

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