बहुजन राजनीति की नयी करवट की अलामत है भीम आर्मी : प्रवीण वर्मा

Guest post by PRAVEEN VERMA

यूँ तो अम्बेडकर जयंती हर साल आती हैं और दलित-पिछड़े समुदाय का एक बड़ा तबक़ा इसे बड़ी शिद्दत से मनाता आया है। लेकिन इस बार अम्बेडकर का 126वां जन्मदिन कुछ और ही नज़ारा ले कर आया। यू॰पी॰ का सहारनपुर ज़िला जहाँ अच्छी ख़ासी तादाद में दलित समुदाय के लोग रहते हैं और अन्य जिलों की बनिस्बत ज़्यादा संगठित हैं, वहाँ दो आयोजनों और उसकी अनुमति को लेकर दबंग जाति के लोगों ने जम कर उत्पात मचाया, जिसका दलित समुदाय के द्वारा ना केवल डट कर मुक़ाबला किया गया बल्कि एक वाजिब जवाब भी दिया गया। हालाँकि प्रशासनिक कार्यवाही हमेशा की तरह एकतरफ़ा रही जिसमें 40 दलित युवकों को जेल में ठूँस दिया गया और दबंगो को सस्ते में जाने दिया गया। शब्बीरपुर की ये घटना(एँ) कई दिनों तक चलती रही जिसमें दबंग जाति के लोगों के अहम को चोट तो लगी ही, साथ ही साथ एक और संदेश दे गयी : जिस तरह से दबंग जाति के लोगों ने हिंसा को अपनी बपौती समझ लिया था, अब वैसा नहीं हैं, लगभग देश के कुछ हिस्सों में तो। 

Continue reading “बहुजन राजनीति की नयी करवट की अलामत है भीम आर्मी : प्रवीण वर्मा”

Photo Story on Bhim Army Rally in Delhi: Debalin Roy

Guest post by DEBALIN ROY

Debalin Roy takes us to some specific moments in the rally, aside from the bird’s eye view of the massive rally that we have already seen.

Dalits from all over northern India gathered at Jantar Mantar, Delhi on the 21st of May to protest the Saharanpur violence and increasing atrocities on Dalits across the country.

Although there were representatives from various states, especially from Haryana, U.P. and Rajasthan, Bhim Army took the center stage, with their blue flags waving like a giant dark blue field of tall grass, shaking and waving with every chant of Jai Bhim.

Continue reading “Photo Story on Bhim Army Rally in Delhi: Debalin Roy”

A Day Against Kalluri at IIMC, Delhi: Bastar Solidarity Network Delhi Chapter

Guest Post by Bastar Solidarity Network Delhi Chapter

The democratic forces, organizations and the thinking minds of IIMC took part in a spirited protest today against the invitation extended to notorious ex-IG Kalluri by the IIMC administration to take part in a seminar. To start with, since last two days, there were several attempts on the part of the organizers to confuse/conceal Kalluri’s invitation. Immediately after the declaration of the protest, Kalluri’s name was dropped from the poster. There were also threats of counter-mobilisation by the BJP goons. But undeterred, as we reached the gates of IIMC at 11am, the site echoed with slogans of “Killer Kalluri Go Back”!

Continue reading “A Day Against Kalluri at IIMC, Delhi: Bastar Solidarity Network Delhi Chapter”

Violence against Dalits in Saharanpur, UP : A Report by CPI-ML (Liberation) & AISA Team that Visited Saharanpur

Guest Post by Sucheta De

CPI-ML- AISA Team’s Visit to Saharanpur – A Report

“Sarkar Hamari Hai, Police-Prashashan Bhi Hamara Hai”- Yogi Government Boosts Up Morale of Casteist Feudal Goons Who Burnt Dalit Village in Shabbirpur!

Casteist Goons from Dominant Rajput Community Enjoy Complete Impunity while Bhim Army Activists Continue to Face Witch-Hunt!

CPI-ML-AISA Appeal Everyone to Join Hands with the Dalits of Saharanpur in their Struggle for Justice!

Saharanpur Carnage: Teaching a Lesson to Politically Assertive, Self-Reliant Dalits Who Refuse to be Foot Soldiers of Hindutva’s Hate Politics

When BJP gains electoral majority, Saharanpur happens.

For last several years the belt of western Uttar Pradesh has been made the laboratory of the RSS-BJP’s sinister design of communal polarization and violence against Muslims. The 2013 Muzaffarnagar riots was a planned design by the RSS-BJP to polarize the belt on communal lines and reap electoral benefits. And now, after that design had delivered ‘electoral success’ for the RSS and BJP, upper caste feudal forces have started celebration of their ‘victory’ by unleashing attack on Dalits.

Continue reading “Violence against Dalits in Saharanpur, UP : A Report by CPI-ML (Liberation) & AISA Team that Visited Saharanpur”

The Anti-Democratic ‘Republic’: Bobby Kunhu

Guest post by BOBBY KUNHU

English language television news in India nowadays is nothing more than exaggerated visual editorials. They pick two or three stories, sensationalize them, run them in a loop through the day, alongside panel discussions where the editorial ideology of the channel is forced down the throat of the panelists and the viewers. In short there is hardly little journalism left in these channels. Though they do have panel discussions, regional language channels – at least Malayalam and Tamil channels that I watch – have a wider and more diverse reportage than self-proclaimed national television.

It wasn’t always like this. When Prannoy Roy pioneered private television content for Murdoch – regardless of the ideological content – there was reportage. Editorial proselytizing and endless panel discussions were limited most often to when psephologists stepped in.

Continue reading “The Anti-Democratic ‘Republic’: Bobby Kunhu”

और इस बार नंबर आईआईएमसी का था : Rohin Kumar

Guest Post by ROHIN KUMAR

संस्थान के गेट पर सरस्वती की प्रतिमा थी ही. नारद पहले पत्रकार बताए जाते रहे हैं. अब बचा था हवन वो भी होने ही वाला है. आईआईएमसी मीडिया स्कैन नामक संस्था के साथ मिलकर ‘वर्तमान परिदृश्य में राष्ट्रीय पत्रकारिता’ पर सेमिनार आयोजित करने जा रहा है. इसकी शुरुआत हवन से होनी है. उसमें पांचजन्य के संपादक और बस्तर का खूंखार आईजी कल्लूरी आमंत्रित है. चौंकाने वाली बात है कि कल्लूरी जिसने सबसे ज्यादा आदिवासियों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं को तंग किया, उनपर फर्जी केस डाले वो ‘वंचित समाज के सवाल’ पर बोलने आ रहा है.

हमें इसकी सूचना दो दिन पहले मिली. सोशल मीडिया पर इसके पोस्टर रिलीज़ किये गए थे.

सबसे पहले हम छात्रों ने इसका सोशल मीडिया पर विरोध दर्ज किया. इसमें कई पूर्व छात्रों का हमें समर्थन भी प्राप्त हुआ. संस्थान में पढ़़ाने वाले शिक्षकों को फ़ोन किया, उनसे जानना चाहा कि आखिर उनकी इसपर कोई राय है?

जानकर हैरानी हुई कि उन्होंने छात्रों से बिलकुल डरे सहमे अंदाज़ में बात किया. इस बाबत जानकारी से इनकार कर दिया. फिर डिप्लोमेटिक जवाब देने शुरू किये- “चुंकि हमें कोई आधिकारिक सूचना इस कार्यक्रम के बारे में नहीं मिली है इसलिए मैं इसे फेक न्यूज़ मान रहा हूं.” इतना कहकर मीडिया एथिक्स पढ़ाने वाले टीचर ने कन्नी काट लिया.

Continue reading “और इस बार नंबर आईआईएमसी का था : Rohin Kumar”

कट्टरता के खिलाफ अज्ञेय: वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय हिंदी के ही नहीं वरन समूचे भारतीय साहित्य में निरंतर जिज्ञासा और पाठकीय आकर्षण पैदा करने वाले रचनाकार के रूप में देखे जाते हैं। विभिन्न किस्म की दासता-वृत्तियों, परजीवीपन और क्षुद्र खुशामद से भरे मुल्क में उनका स्वाधीनता बोध जितना गरिमावान लगता है, उतना ही चौंकाने वाला भी। इसी स्वाधीनता बोध ने अज्ञेय की दृष्टि को भारत के लोकतांत्रिक मिजाज के अनुसार ज्यादा खुला व अपने रचना संसार को स्वेच्छा से निर्मित करने लायक बनाया। उनके इस स्वाधीनता बोध का प्रभाव व्यापक रूप से सृजन के बहुत सारे आयामों पर पड़ा है।

अज्ञेय के साहित्य पर लिखने वाले कई आलोचकों ने इस प्रभाव के मूल्यांकन का प्रयास किया है। जैसे कि निर्मल वर्मा ने स्वाधीनता बोध से उत्पन्न उनकी इसी खुली, व्यापक दृष्टि को उनके संपादन कर्म से जोड़कर देखा था। अपने द्वारा संपादित पत्र प्रतीक व दिनमान  में उन्होंने मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह व सज्जाद जहीर को जोड़ा तो तार सप्तक के विविध खंडों में अपने से पूर्णतया भिन्न दृष्टिकोण वाले कवियों को। स्वाधीनता के प्रति तीव्र संवेदनशीलता को व्यक्तिवाद के दायरे में रखकर समझने की सरल चिंतन-प्रक्रिया साहित्य में बहुतायत से मौजूद रही है। ऐसा मानने वालों की सीमा प्रकट करते हुए निर्मल वर्मा ने कहा है कि स्वाधीनता के प्रति अत्यंत सचेत अज्ञेय के प्रति लोगों को झुंझलाहट उस समाज में स्वाभाविक थी जहां लोगों को हर समय किसी ‘ऊपर वाले’ का मुंह जोहना पड़ता है। इन ऊपर वालों में परिवार, जाति, रूढ़ि, पार्टी, विचारधारा, संगठन आदि सभी कुछ शामिल रहा है। यहां तक कि गांव में जातिवाद-परिवार की गुलामी करने वाले लोग जब शहर आए तो उन्होंने विभिन्न पार्टियों, संगठनों व विचारधाराओं की गुलामी को बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया। जिन्होंने नहीं स्वीकारा उन्हें कुलद्रोही, जनविरोधी, परंपराद्वेषी, धर्मविरोधी, व्यक्तिवादी आदि आरोपों का सामना करना पड़ा।

Continue reading “कट्टरता के खिलाफ अज्ञेय: वैभव सिंह”