मीडिया और मज़दूर: फ़ैज़ुल्लाह

Guest Post by Faiz Ullah

The following text is a version of a text originally written for Faridabad Majdoor Samachar, a workers’ paper distributed in Faridabad, Gurgaon and Delhi. It is an attempt to speak to the concerns often expressed by  workers’ about what they consider to be inadequate and unfair representation of their issues in the mainstream media

Maruti Suzuki Workers Demanding to talk to the Media
Maruti Suzuki Workers Demanding to talk to the Media

मीडिया और मज़दूर

समाज जैसे-जैसे बड़ा और जटिल होता जाता है वैसे-वैसे हमारे एक दूसरे से सम्बन्ध कमज़ोर होने लगते हैं। ऐसे में हम एक दुसरे को कैसे जानें, कैसे समझें? मीडिया के ज़रिये हम अपनी बात आगे रख सकते हैं, दूसरों की सुन सकते हैं और अपने तजुर्बों को साझा कर सकते हैं। चर्चा-बहस भी कर सकते हैं और किस तरह का समाज बनाना है उसकी एक साथ कल्पना कर सकते हैं। समाज में मीडिया की एक बड़ी भूमिका बनती है। वैसे तो मीडिया को आपकी और हमारी बातों को जगह देनी चाहिए पर आमतौर पर ऐसा होता नहीं है। हमारी बातों, हमारे मुद्दों को बड़े टीवी चैनल और अखबार हमेशा ही नज़रअंदाज़ करते रहे हैं।

ऐसा क्यों होता है समझना मुश्किल नहीं है। मीडिया भी कार, मोटरसाइकिल, कपड़े, जूते बनाने वाले उद्योगों की तरह एक उद्योग है जहां पर ख़बरों का उत्पादन होता है। जो ख़बर बिकती है वही बनती है। बाज़ारीकरण से मीडिया अछूता नहीं है।

मीडिया में मज़दूर

मीडिया उद्योग विज्ञापनों के ज़ोर पर चलता है। बड़ी-छोटी कंपनियां आपके और हमारे बनाये हुए सामान को बेचने के लिए विज्ञापनों पर हर साल करोड़ों-अरबों रुपये ख़र्च करती हैं। टीवी चैनलों और अख़बारों को विज्ञापन देने वाली कम्पनियों की मन-मुताबिक़ खबरों को जगह देनी पड़ती है। ऐसा न समझें की वह मजबूरन ऐसा करते हैं। पर यह ज़रूर कह सकते हैं की उन्हें ऐसा करने में कोई गुरेज़ भी नहीं है। मामला धंधे का जो है।

ख़रीद-बेच की होड़ को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह ज़रूरी है की दर्शकों और पाठकों को कोई ऐसे बात न दिखाई या बताई जाए जो उन्हें आज की व्यवस्था पर सोचने या सवाल उठाने का मौक़ा दे। अगर आपको मालूम हो की जिस चीज़ को आप खरीदना चाहते हैं उसके बनने में कितना ख़ून, पसीना, गाली-गलौज, लाठी-गोली लगती है तो क्या आप उस चीज़ को ख़रीदेंगे? तेज़ी से बढ़ती बाज़ारीकरण की प्रक्रिया मीडिया के दम पर ही चलती हैं। सब सही है, सब कुछ ठीक है, सब ख़ुश हैं – हमेशा यही दिखाने या बताने की कोशिश रहती है। अगर कोई ज़रूरी मुद्दा उठाया भी जाता है तो उसे एक अपवाद की तरह पेश किया जाता है. मामला कितना व्यापक या गंभीर है यह छुपाया जाता है। उसे इतना तोड़-मरोड़ दिया जाता है की समझना मुश्किल हो जाता ज़ालिम कौन है और मज़लूम कौन।

मारुती सुज़ुकी मज़दूरों के संघर्ष की ही बात को लें तो मीडिया के अनुसार मज़दूरों ने देश की छवि पर दाग़ लगाया है और तरक़्क़ी की राह में रोड़ा अटकाया है। दूसरी ओर मैनेजमेंट का गुणगान – की बेचारे जैसे-तैसे करके काम चला रहे हैं और देश का परचम ऊंचा लहरा रहे हैं। मारुती सुजुकी के 147 मज़दूर दो साल से जेल में क़ैद हैं। पर उन के लिए ख़बरों में कोई जगह नहीं है। जगह है तो मारुती सुजुकी के चेयरमैन के लिए जिन्हें प्रधानमंत्री हाल ही में अपने साथ जापान दौरे पर ले गए थे।

इसी बात का दूसरा पहलू यह भी है कि आज के दौर में मीडिया भी शासन तंत्र का एक एहम हिस्सा बन गया है। हाल ही में हुए लोक सभा चुनावों में एक अंदाज़े से सभी राजनीतिक पार्टियों ने मिला कर 30 हज़ार करोड़ रुपये प्रचार-प्रसार में ख़र्च किये। ज़ाहिर है कि इस में से ज़्यादार पैसा देश के पूंजीपति वर्ग से आया। सोचने वाली बात है नेता और मंत्रीगण इन पैसों की अदायगी कैसे करेंगे?

Protest Outside TV-18 Office by Media Workers, Photo Courtesy, Mahtab Alam
Protest Outside TV-18 Office by Media Workers, Photo Courtesy, Mahtab Alam

मीडिया के मज़दूर

मीडिया को एक उद्योग के तौर पर दूसरे नज़रिए से भी देखना बनता है। हर उद्योग की तरह यह भी मज़दूरों की ताक़त और मेहनत से चलता है। और यहां भी हालात किसी और उद्योग से अलग नहीं हैं। काम करते-करते दिन रात एक हो जाते हैं। मोबाइल फ़ोन और ई-मेल की बदौलत मीडिया कर्मी हमेशा ही काम पर रहते हैं। अगर फ़ोन या ई-मेल का जवाब न दें तो आसमान टूट पड़ता है। जल्दी-जल्दी काम करने का इतना बोझ रहता है ठीक से कभी नींद भी नहीं आती। 24-25 साल के लड़के और लड़कियों गंभीर स्वस्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से जूझते रहते हैं। कभी डिप्रेशन, कभी मानसिक तनाव के कारण चर्म-रोग, और कभी स्ट्रोक। कैमरा-पर्सन,एडिटर, ड्राइवर, और हाउस-कीपिंग स्टाफ़ की भी यही स्थिति है। बोलो की तबियत ख़राब है तो जवाब मिलता है की गोली खा कर काम पर आ जाओ। कहीं दूर रिपोर्टिंग करने जाओ तो कहा जाता है की आने-जाने पर इतना ख़र्चा कर रहें हैं सिर्फ एक रिपोर्ट से काम नहीं चलेगा, दो-तीन करके ही वापस आना। पत्रकारों को प्रोडक्शन टारगेट पूरे करने पड़ते हैं। मैनेजर हिसाब रखते हैं की किसने कितनी रिपोर्ट पूरी करीं। टारगेट से कम काम करने पर डांट-फटकार या तनख्वाह में कटौती। अब टीवी और अख़बार के अलावा कंपनी वेबसाइट के लिए भी काम करना पड़ता है। फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया साइट्स पर भी अपनी और कंपनी की साख बनाने के लिए पोस्ट करने पड़ते हैं। जिस तरह की रिपोर्टिंग आप करना चाहते हैं उसका मौक़ा नहीं मिलता। हमेशा आपको बताया जाता है की आदर्शवादी नहीं मौक़ापरस्त बनो। अपने करियर की सोचो। मन को रोज़ाना मारना पड़ता है। नौकरी जाने का डर हमेशा बना रहता है। कई जगह ऐसा भी हुआ है की अचानक ही एक शाम फ़ोन पर ही कह दिया जाता है की कल से काम पर आने की ज़रुरत नहीं है। लोग ऐसी शामों में अपना फ़ोन उठाने से भी डरने लगते हैं।

इस डर के चलते कोई क्या बेबाक़ रिपोर्टिंग करेगा? ऑफिस में एक दूसरे पर चीख़ना-चिल्लाना आम बात है। अगर सीनियर आप के ऊपर चिल्लाते हैं तो आप अपनी झुंझलाहट अपने जूनियर्स पर निकालते हैं। सिलसिला चलता रहता है। पर इस ख़राब माहौल के बावजूद दोस्तियां पनपती हैं और मौज-मस्ती के लिए वक़्त निकाल ही लिया जाता है। यारी-दोस्ती में कुछ अपनी मन-मर्ज़ी का अच्छा काम भी हो जाता है। बहुत सारे साथी अभी भी कंपनी और नौकरी की चौहद्दी में संघर्ष कर रहें हैं।

पर कुछ साथी अब मीडिया उद्योग छोड़ कर अपना ख़ुद का काम शुरू कर रहे हैं। वह कहानियाँ रहे हैं जिनको कहने की ज़रुरत है। इंटरनेट ने आज़ाद पत्रकारिता के लिए काफी जगह बनायी हैं। रास्ते कई हैं, तरीक़े कई हैं।

मज़दूरों का मीडिया?

अब बात यह उठती है कि क्या हमें इंतज़ार या उम्मीद करनी चाहिए की कोई और कहीं से आकर हमारी कहानियाँ कहेगा? हम अपनी बात ख़ुद अपने बीच या दुनिया के सामने क्यों नहीं रख सकते? आज हमारे पास पहले से कहीं ज़्यादा ज़रिये हैं। मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट ने आज ऐसा करना बहुत हद तक आसान कर दिया है। कैमरा फ़ोन से वीडियो बनाना, फ़ोटो खींचना, अपनी बात-बहसों को रिकॉर्ड करना, व्हाट्सएप्प ग्रुप पर मैसेज, फोटो, और वीडियो भेजना – यह सब तो हम करते ही हैं। इन्हीं सब चीज़ों को क्या हम एक हथियार की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते? हम इतना कुछ बनाते हैं तो अपना मीडिया क्यों नहीं? ख़ुद आज़मा कर देखें?

यह कुछ टीवी चैनलों और अखबारों के नंबर हैं. खुद बात कर के देखें की क्या वह आपकी कहानियों में दिलचस्पी रखते हैं…

सीएनएन-आईबीएन/आईबीएन-7: +91 120 4341818, +91 120 3987777

एनडीटीवी 24X7/ एनडीटीवी इंडिया: + 91 11 26446666

टाइम्स नाव: +91 22 24999944

हेडलाइंस टुडे/आज तक: +91 120 4807100

टाइम्स ऑफ़ इंडिया: +91 11 23302367, +91 11 23492172

हिंदुस्तान टाइम्स/हिंदुस्तान: +91 11 23361234, +91 11 60004242

दी हिन्दू: +91 44 2857 6300

इंडियन एक्सप्रेस: +91 11 23702100-07

जनसत्ता: +91 11 23702141

Faiz Ullah is currently a research at the Tata Institute of Social Sciences, Mumba. Previously he has worked as a reporter for Television news programmes.

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