Category Archives: Bad ideas

इस तरह चूर्ण चट्टान हो कि रेणु-रेणु सूरज पर चले जाएँ

मुक्तिबोध शृंखला:32

अच्छी कविता और बड़ी कविता में फर्क होता है। अच्छी कविता के नियम बड़ी कविता पर लागू नहीं होते। जैसे आम तौर पर कविता का उद्घोषात्मक होना अच्छा नहीं माना जाता। उपदेशात्मकता और शिक्षापरक होना अच्छी कविता के गुण नहीं माने जाते। लेकिन बड़ी कविता शिक्षापरक, यहाँ तक कि उपदेशात्मक होकर भी बड़ी हो सकती है। मुक्तिबोध की कविताओं के इस पक्ष को सहज ही लक्ष्य किया जा सकता है। जीवन कैसा हो? अच्छा जीवन कैसे जिया जाए या मानवीय जीवन किसे कहते हैं और उसे हासिल करने का तरीका क्या है, मुक्तिबोध की कविताएँ इसकी सीख देती चलती हैं और ऐसा करती हुई दीखती भी हैं। उन्हें जैसे इसकी परवाह नहीं कि उन्हें कविता माना जाएगा भी या नहीं।

मुक्तिबोध की कविताएँ एक ‘मैं’ गढ़ती रहती हैं। वह ‘मैं’ अक्सर अपने आप से बात करता रहता है। उसके मन में एक उधेड़बुन सी चलती रहती है। ज़िंदगी की अपनी राह को लेकर, उस रास्ते पर चलने की अपनी तैयारी को लेकर, कभी कभी रास्ते के चुनाव पर भी। एक घोर आत्म-चेतस् व्यक्ति जो कभी चैन से नहीं रहता। क्योंकि उसकी एक निगाह भीतर को ओर मुड़ी होती है।

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मेरे ही चंगुल से मुझको तुम मुक्त करो!

मुक्तिबोध श्रृंखला:31

“वीरान मैदान, अँधेरी रात, खोया हुआ रास्ता, हाथ में एक पीली मद्धिम लालटेन। यह लालटेन समूचे पथ को पहले से उद्घाटित करने में असमर्थ है। केवल थोड़ी-सी जगह पर ही उसका प्रकाश है। ज्यों-ज्यों वह पग बढ़ाता जाएगा, थोड़ा-थोड़ा उद्घाटन होता जाएगा।”

मुक्तिबोध रचना की प्रक्रिया के लिए एक रूपक प्रस्तुत कर  रहे हैं। अँधेरी रात, वीरान मैदान और एक खोया हुआ रास्ता। ‘खोया हुआ’ का आशय क्या है? यह वह रास्ता है जो जाना हुआ था और खो गया? यह प्रश्न ‘अँधेरे में’ कविता की खोई हुई ‘परम अनिवार आत्म संभवा अभिव्यक्ति’ के संदर्भ में उठाया जाता रहा है। क्या वह थी और खो गई या वह कभी मिली ही नहीं थी? ‘अँधेरे में’ की आख़िरी पंक्तियाँ हैं,

 “वह मेरे पास कभी बैठा ही नहीं था,

 वह मेरे पास कभी आया ही नहीं था,

तिलिस्मी खोह में देखा था एक बार,

आख़िरी बार ही।”

और आगे,

परम अभिव्यक्ति

अविरत घूमती है जग में

पता नहीं जाने कहाँ, जाने कहाँ

वह है।”

इसलिए हर गली, हर रास्ता देखना है, हर चेहरे पर गौर करना है, हर चरित्र में झाँकना है। मालूम नहीं वह अभिव्यक्ति कहाँ हो, कहाँ मिल जाए!

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समीक्षा एक प्रेम दर्शन है

मुक्तिबोध प्रगतिवादी नहीं रह गए। मार्क्सवादी बने रहे। दोनों में विरोध कुछ लोगों को दीख सकता है। लेकिन मुक्तिबोध के अनुसार मार्क्सवादी होने के कारण ही वे प्रगतिवाद के दायरे से आगे निकल सके। प्रगतिवाद एक समय के बाद एक आग्रह जैसा बन कर रह गया था। एक मायने में दुराग्रह। कम से कम मुक्तिबोध को ऐसा ही प्रतीत होता था। जबकि मार्क्सवाद उनके लिए विज्ञान था। विज्ञान अपने व्यापकतम अर्थ में। विज्ञान जो विज्ञानवादी जड़ता से ग्रस्त नहीं है। वह जो प्रश्न, प्रयोग और परीक्षा पर टिका हुआ है। मार्क्सवाद को शेष विचार-प्रणालियों या दर्शनों से श्रेष्ठ साबित करने के लिए भी उसे विज्ञान कहा जाता है। मुक्तिबोध में भी यह  प्रवृत्ति देखी जाती है। फिर भी रचनाकार होने के कारण उनके लिए मार्क्सवाद को एक मूल्य व्यवस्था के रूप में ही श्रेय है। बुद्ध की तरह ही मार्क्स यह कहते जान पड़ते हैं कि दुःख है,  दुःख का कारण है और उसका निवारण भी है।

‘समीक्षा की समस्या’ नामक निबंध में मुक्तिबोध ‘ईमानदार प्रखर वैज्ञानिकता’ को मानव धर्म कहते हैं: 

उसमें एक साथ आत्म-निरपेक्षता और ग्रहण (?) आत्मसंबंध, लक्ष्योन्मुखता और विस्तृत अनेकपक्षीय तथ्य संवेदना, तथ्य ग्रहण-क्षमता उपस्थित है। अपने अज्ञान का स्वीकार और ज्ञान का अग्र-वेग भी उसमें है।”

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प्रगतिवाद : मानवता-सिंधु में डूबी व्यक्ति-धारा ?

मुक्तिबोध शृंखला:29 

मुक्तिबोध मार्क्सवादी हैं। मार्क्सवादी होने के साथ-साथ प्रगतिवादी भी। क्या मार्क्सवादी दृष्टि ही साहित्य और कला में प्रगतिवाद के नाम से जानी जाती है? क्या कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रभाव विस्तार करने के लिहाज से ही प्रगतिशील आंदोलन का महत्त्व है? क्या प्रगतिवाद और प्रगतिशील आंदोलन या संगठन एक दूसरे में गुँथे हुए हैं? 

मुक्तिबोध का रिश्ता प्रगतिवाद और प्रगतिशील लेखक संघ से पेचीदा रहा। मार्क्सवादी होने के कारण और राजनीतिक रूप से सक्रिय होने की वजह से वे प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े। लेकिन उस दायरे में साहित्य को देखने के तरीके को लेकर उनकी बहस उन लोगों से होती रही जो इस आंदोलन या संगठन के विचारधारात्मक नेता थे। दृष्टि के संगठन में बदलते ही एक प्रकार की दृष्टिबद्धता दिखलाई पड़ने लगी। यह मुक्तिबोध के स्वभाव के विरुद्ध था। याद कीजिए ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में शमशेर बहादुर सिंह की भूमिका का वह अंश:

” ” तुम क्यों उनका दमन कर रहे हो!” वह बेहोशी में भी बड़बड़ा कर पूछता है। …. “अपने अपने आइडियाज़ हैं।”…”

लेकिन जब एक संगठित आंदोलन चल रहा हो तो वह बेहोश नहीं हो सकता। सबको अपने आइडियाज़ रखने की छूट नहीं दी जा सकती। उदारता संगठन के स्वभाव के ही विरुद्ध है शायद। और संवाद की जगह विवादात्मकता को संगठन अपनी शैली बना लेता है। प्रगतिवाद पहली ऐसी साहित्यिक प्रवृत्ति थी जिसने एक संगठन के सहारे अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने की कोशिश की।

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मुक्तिबोध और मार्क्सवाद: एक अधूरा संवाद

मुक्तिबोध शृंखला:28

मुक्तिबोध के मार्क्सवाद और उनके व्यक्तित्व में एक फाँक की शिकायत एक समय तक हिंदी के कुछ मार्क्सवादी आलोचक करते रहे। उसका कारण था उनके अनुसार मुक्तिबोध में निजता या आत्मपरकता का अतिरेक। लेकिन मुक्तिबोध मार्क्सवाद तक आए थे अपनी उस समस्या का समाधान खोजते हुए कि मनुष्य अपना विस्तार कैसे कर सकता है। एक सार्थक जीवन जीने की कोई पद्धति हो सकती है या नहीं? वह अपना अकेलापन कैसे दूर करे? अपने आत्म को वह समृद्ध कैसे करे? क्या मार्क्सवाद औसतपन का शास्त्र है? या वह व्यक्ति के, हर व्यक्ति के जीनियस को महत्त्व देता है और उसके प्रस्फुटन में उसकी मदद करता है?

‘मार्क्सवादी साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र’ में मुक्तिबोध मार्क्सवाद के बारे में कहते हैं:

मार्क्सवाद मनुष्य को कृत्रिम रूप से बौद्धिक नहीं बनाता है, वरन उसे ज्ञानालोकित आदर्श प्रदान करता है। मार्क्सवाद मनुष्य की अनुभूति को ज्ञानात्मक प्रकाश प्रदान करता है। वह उसकी अनुभूति को बाधित नहीं करता, वरन बोधयुक्त करते हुए उसे अधिक परिष्कृत और उच्चतर स्थिति में ला देता है। संक्षेप में, मार्क्सवाद का मनुष्य की संवेदन-क्षमता से कोई विरोध नहीं है, न हो सकता है।

संवेदना को बोधयुक्त करके उसके परिष्कार का क्या अर्थ है? संवेदन क्षमता तो हर मनुष्य में है। लेकिन क्या हर किसी के पास वह एक जैसी है? क्यों कुछ की वह सीमित होती है और कुछ की तीक्ष्ण? क्या इसका कारण उस मनुष्य या व्यक्ति के भीतर है? मार्क्स के अनुसार इसका कारण बाहर है। बाहरी भौतिक परिस्थितियाँ किसी मनुष्य की संवेदना की सीमा तय करती हैं ।

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मार्क्सवाद : वीरान अमानवीय दूरियाँ

मुक्तिबोध शृंखला:27

मार्क्सवादी अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की शताब्दी के मौक़े पर उसकी सांसारिक उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए भी उसे समाजवादी व्यवस्था मानने से इनकार किया है। उसका कारण उनके मुताबिक़ यह है कि चीन में व्यक्ति अभी भी पार्थक्यविहीन जीवन नहीं जी रहा है। चीन का जन आज भी खंडित जन ही है। यानी उसकी सर्जनात्मकता पर उसका अधिकार नहीं है। उसका समय उसका नहीं है। अपने वजूद का मालिक वह खुद नहीं है, उसकी पार्टी है। दूसरे शब्दों में, वह स्वतंत्र या स्वाधीन नहीं है। स्वाधीनता चीन में अपराध है और ख़तरनाक है। इस मत से अलग कुछ कम्युनिस्ट पार्टियों की समझ है कि चीन ने अपने क़िस्म का समाजवाद विकसित किया है।

60 साल पहले ‘वसुधा’ में चीन के साहित्य को लेकर गोरखनाथजी की आपत्ति का उत्तर मुक्तिबोध ने दिया था। उनकी आपत्ति यह थी कि चीन का साहित्य सौंदर्य पक्ष की उपेक्षा करता है। साथ ही उन्होंने मौलिकता और साहित्य की श्रेष्ठता का प्र्श्न भी उठाया था। समाजवादी मुल्कों में क्यों तोलस्तोय जैसे लेखक पैदा नहीं होते, यह सवाल भी था। इन 60 वर्षों में इन प्रश्नों पर काफ़ी बहस हो चुकी है। गोरखनाथ की शिकायत यह थी कि जन-मंगल की भावना से प्रेरित होते हुए भी साम्यवादी साहित्य कलाहीन है, श्रीहीन है, अनुभूति-प्रवण नहीं है। ’मार्क्सवादी साहित्य का सौंदर्य पक्ष’ शीर्षक इस निबंध में मुक्तिबोध ने कहा कि चीन की जनता मुक्ति के वातावरण में साँस ले रही है और अपने देश के पुनर्निर्माण में लगी है। वह अपना साहित्य भी तैयार कर रही है।

मुक्तिबोध यह भी  कहते हैं कि साम्यवादी संसार में सबसे विकसित साहित्य रूस का है, सो उदाहरण वहाँ से लेना चाहिए। लेकिन वे जिन ‘श्रेष्ठ’ लेखकों की सूची गोरखनाथ के आरोप को काटने के लिए पेश करते हैं, उनमें से ज़्यादातर सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के आधिकारिक रूप से स्वीकृत लेखक ही थे और ‘सकारात्मक’ लेखन करने के लिए वे तत्कालीन सत्ता के प्रिय पात्र थे। अब उस अवधि के बारे में बात करने पर मुक्तिबोध की सूची से एकाध नाम ही ठहर पाते हैं।

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घृणा का दैत्य और स्नेह का शुचि-कान्त मादक देवता

मुक्तिबोध शृंखला:26

पूँजीवाद से मुक्तिबोध की घृणा समझौताविहीन थी। क्या वे उसके कारण कम्युनिस्ट हुए या कम्युनिस्ट होने के कारण पूँजीवाद को उन्होंने अस्वीकार किया? यह प्रसिद्ध है कि नेमिचंद्र जैन ने उन्हें कम्युनिस्ट बनाया। 30 अक्टूबर 1945 के पात्र में वे नेमिजी को लिखते हैं,

याद है, आपकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। आपने एक व्यक्ति के साथ नाज़ुक खेल खेला है। उसे कम्युनिस्ट बनाया, दुर्धर्ष घृणा के उत्ताप से पीड़ित।”

सिर्फ घृणा नहीं, उस व्यक्ति यानी मुक्तिबोध को अधिक ‘सहनशील भावनामय’ भी बनाया। सहनशील भावनामयता या प्रेम और घृणा, दोनों ही एक साथ एक ही वक्ष में हैं। बल्कि एक के लिए दूसरी ज़रूरी है। ‘नूतन अहं’ शीर्षक कविता में आरम्भ ही इस प्रश्न से होता है;

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ईमान का डंडा, बुद्धि का बल्लम, अभय की गेती और हृदय की तगारी!

मुक्तिबोध शृंखला:25

‘नए की जन्म कुंडली: एक’ में लेखक या वाचक की मुलाकात अपने एक मित्र से 12 वर्ष बाद होती है। ऐसा मित्र जिसे वह बहुत बुद्धिमान समझता था। वह ऐसा व्यक्ति था जो अपने विचारों को अत्यधिक गम्भीरतापूर्वक लेता:

 “वे उसके लिए धूप और हवा जैसे स्वाभाविक प्राकृतिक तत्त्व थे।दरअसल, उसके लिए न वे विचार थे, न अनुभूति। वे उसके मानसिक भूगोल के पहाड़, चट्टान, खाइयाँ, ज़मीन, नदियाँ, झरने, जंगल और रेगिस्तान थे।

विचारों के साथ उस मित्र का रिश्ता सतही न था:

वह अपने विचारों या भावों को केवल प्रकट ही नहीं करता था, वह उन्हें स्पर्श करता था, सूँघता था, उनका आकार-प्रकार, रंग-रूप और गति बता सकता था, मानो उसके सामने वे प्रकट, साक्षात् और जीवंत हों। उसका दिमाग़ लोहे का एक शिकंजा था या सुनार की एक छोटी-सी चिमटी, जो बारीक-से बारीक और बड़ी से-बड़ी बात को सूक्ष्म रूप से और मज़बूती से पकड़कर सामने रख देती है।” 

चूँकि विचारों के साथ उसका ऐसा, जीवन-मरण के प्रश्न जैसा रिश्ता था, वह सामान्य व्यक्ति तो नहीं ही था। विचारों के साथ इस गंभीर रिश्ते के कारण उसका इस ज़माने में मिसफिट रहना भी तय था। जिस ज़माने में हर वस्तु की कीमत उपयोगिता के आधार पर तय की जाती है, वहाँ विचारों के साथ इस तरह के उत्कट रिश्ते की कीमत चुकानी पड़ती है। या रिश्ता आख़िरकार आपको क्या हासिल देगा? दुनियादारी सिखलाती है कि वैसे विचारों से मुँह मोड़ लें या उन्हें कहने भीतर दफन कर दें जो जीने के रास्ते में आ जाते हों! विचारों को जो अपनी रक्त-मज्जा का इस प्रकार अंग बना लें, उनकी ज़िंदगी तकलीफदेह होना तय है। वे खुद को जाहिर करते हैं तो किसी बाहरी वजह से नहीं, इसलिए नहीं कि उसका कोई इस्तेमाल हो जाए। और वे खुद को प्रकट करने से घबराते भी नहीं इस आशंका से कि कहीं उनका कोई नुकसान न हो जाए।

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पूँजीवाद : तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ

मुक्तिबोध शृंखला : 24

मनुष्य इतना अकेला क्यों है? मनुष्यों में इतने फासले क्यों हैं? क्यों अमानवीय दूरियां हम सबको घेरे हुए हैं? या एक दूसरे से अलग किए हुए हैं? जीवन में इतना ओछापन क्यों हैं? सतहीपन, छिछलापन क्यों हैं? क्यों इंसान खुद को हासिल नहीं कर पाता? क्यों हम सब अपने बदले किसी और का जीवन जीते रहते हैं? क्यों अपना किया हुआ श्रम अकारथ लगता है? क्यों हर नई सुबह मन में स्फूर्ति नहीं जगती? क्यों हमेशा कुछ खो गए होने का अहसास दीमक की तरह मन को चाटता रहता है? हमारे चारों तरफ व्यक्तित्वों के खँडहर क्यों? ज़िंदगी क्यों ढहकर मलबा बन जाती है? क्यों हम आँख उठाकर अपने चारों तरफ जो कुदरत का नूर है, उसे देख नहीं पाते, उसमें डूब नहीं पाते? क्यों भव्यता, ऊँचाई का दर्शन करने में हमारी गर्दन दुखने लगती है? क्यों हम अपनी खोह में दुबके रहना चाहते हैं? जीवन के विस्तार का आभास हमें क्यों नहीं हो पाता?

यह तो सोचो कि वह कौन मैनेजर है जो हमें-तुम्हें, सबको रीछ-शेर-भालू-चीता-हाथी बनाये हुए है?”  

‘समझौता’ कहानी का अंत इस प्रश्न पर होता है। कहानी में एक दूसरे को खा जाने, एक दूसरे पर चढ़ बैठने का नाटक करने की कवायद कराई जाती है। यह नाटक है। लेकिन सच तो यह है कि हम ऐसी ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं जिसमें हर कोई दूसरे को खा डालना चाहता है, वह उसका भोज्य है। हर पड़ोसी दूसरे पर निगाह रखता है, वह जासूस या खबरी है। किसी की तरक्की की शर्त किसी का और नीचे धँस जाना है?

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प्रभात के कपोलों को हृदय के दाह-चुंबन से लाल कर दूँगा मैं

मुक्तिबोध शृंखला:23

लिखना और पढ़ना मुक्तिबोध के साहित्य संसार में विशालता के स्पर्श का एक जरिया है। ‘आ-आकर कोमल समीर’ कविता के आरम्भ में ही एक टेबल पर झुका सर दिखलाई देता है जिसके उलझे बालों को समीर आ-आकर सहलाता रहता है। यह तूफ़ान नहीं है जो मुक्तिबोध की कविता के प्रचलित स्वभाव के लिहाज़ से स्वाभाविक होता, वह झकझोरता नहीं है। टेबल पर जो बैठा है, वह गंभीर काम में तल्लीन है। इसलिए समीर बहुत दुलार से उसके बालों को सहला रहा है। वह एक गंभीर काम में, जो मेहनत का काम है,लगा जो है। फिर कवि का कैमरा जिस टेबल पर सर झुका है, उसपर अपनी निगाह ले जाता है:

“विद्रूप अक्षरों की बाँकी-

टेढ़ी टाँगों के बल चलती,

स्याही के नीले धब्बों से जो रँगी हुई

पीले कागज़ की दुनिया है,”

यह पीले कागज़ पर लिखे जाते जो टेढ़े-मेढ़े अक्षरों की दुनिया है। किसी-किसी को वह सिर्फ धब्बों से रंगा पीला कागज़ दिखलाई पड़ सकता है। लेकिन है वह ज़िंदगी से धड़कता एक संसार। यह दुनिया बनती कैसे है? 

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How Might a Feminist Respond to a Collegial Mansplaining of Feminism? Anannya Dasgupta

Guest post by ANANNYA DASGUPTA

Scroll had recently featured the Foreword to a book, with the heading ‘What do allies write about when they write (poetry) about feminism?’ The descriptive tag read – Saikat Majumdar surveys a unique anthology in his Foreword to ‘Collegiality and Other Ballads’. What makes this anthology unique? Sometime in 2020, Shamayita Sen had circulated a call ‘seeking poems on feminist ideology’ from ‘non-women’. I remember thinking, surely the call will be revised; feminist allies must know that there is a problem with excluding women from a space meant to check the pulse of contemporary feminisms. Besides, who is non-woman enough to want to be a part of such a man-book? While the premise of the book was not revised, the category ‘non-woman’ has been. The title page of the anthology now reads: Collegiality and Other Ballads with a tag – feminist poetry by males and non-binary allies. The opening line of Majumdar’s Foreword adds to the uniqueness of this mostly male-only feminist anthology by attributing uniqueness to feminism itself: ‘Feminism is the name of a unique battle.’

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विराट की सौंदर्याभा के जल का स्पर्श!

मुक्तिबोध शृंखला:22

“… पहली कठिनाई यह है कि इस युग का संगीत टूट गया है और जिस निश्चिंतता के साथ लोग अब तक गाते और छंद बनाते आए थे, वह निश्चिंतता तेरे लिए नहीं है।

“…. भावों के तूफ़ान को बुद्धि की जंजीर से कसने की उमंग कोई छोटी उमंग नहीं है। तेरी कविता के भीतर जब भी तेरे दिमाग की चरमराहट सुनता हूँ, मुझे भासित होने लगता है, काव्य में एक नई लय उतर रही है, जो भावों के भीतर छिपकर चलनेवाले विचारों की लय है, जो कवि से एककार होकर उठनेवाले विचारों का संगीत है।

“… जब नीति और धर्म की मान्यताएँ सुदृढ़ होती हैं और लोगों  को उनके विषय में शंका नहीं रह जाती, तब साहित्य में क्लासिकल शैली का विकास होता है। … जब वायु असंतुष्ट और क्रान्ति आसन्न होती है, तब साहित्य की धारा रोमांटिक हो उठती है। … किन्तु तू जिस काल-देवता के अंक में बैठा है, उसकी सारी मान्यताएँ चंचल और विषण्ण हैं तथा उन्हें इस ज्ञान से भी काफी निराशा मिल चुकी है कि रोमांस की राह किसी भी निर्दिष्ट दिशा में जाने की राह नहीं है। … तू क्लासिकल बने तो मृत और रोमांटिक बने तो विक्षिप्त हो जाएगा। तेरी असली राह वही है जो तू अपनी अनुभूतियों से पीटकर तैयार कर रहा है।” (रामधारी सिंह दिनकर)

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हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है

मुक्तिबोध शृंखला:21

जीवन में अनाह्लाद उत्पन्न होता है अगर हम उसे तत्त्व प्रणाली से बाँधने की कोशिश करें। सैद्धांतिक आत्मविश्वास एक प्रकार की ट्रेजेडी है क्योंकि वह जीवन की पेचीदगी के प्रति पूरी तरह लापरवाह होता है। वह अपने सिद्धांत की काट में जीवन को फिट करने की कोशिश करते हुए उसकी हत्या कर डालता है। जीवन जीने में ही आह्लाद है। कहीं किसी अंतिम बिंदु पर पहुँच जाने में नहीं। प्रसन्नता, हर्ष, उल्लास, खुशी सच्ची कब है? जब वह स्वार्थ से परे जलनेवाली, असंतोष की वह्नि हो। स्वार्थमय प्रसन्नता निश्चय ही निःस्वार्थ प्रसन्नता से हीन है।

मुक्तिबोध की कविता में हर्ष और आह्लाद के क्षणों की भरमार है। ‘हरे वृक्ष’ कविता में सहचर मित्रों-से हरे वृक्ष की हरी आग हृदय के तल को डँस लेती है और

इनके प्राकृत औदार्य-स्निग्ध

पत्तों-पत्तों  से

स्नेह-मुग्ध

चेतना

प्राण की उठी जाग।”

उदारता से स्निग्ध पत्तों से स्नेह-मुग्ध चेतना जगती है। विशेषण मुक्तिबोध को बहुत प्रिय हैं और उनकी भाषा में जो ऐन्द्रिकता और मांसलता है, वह उस कारण भी है। वह विशेषणों से समृद्ध है। हेमिंग्वे परिश्रमपूर्वक विशेषण रहित गद्य में उपन्यास लिखना चाहते थे। मुक्तिबोध का काम उनके बिना नहीं चलता।  उन विशेषणों से ही वे उन भावों की रचना कर पाते हैं जो नितांत, उत्कट रूप से मानवीय हैं।

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अंगार-राग और मधु-आवाहन

मुक्तिबोध शृंखला: 20

मुक्तिबोध मृत्युशैय्या पर थे। उनके तरुण प्रशंसक मित्र उनका पहला काव्य संग्रह प्रकाशित करने की तैयारी कर रहे थे। मुक्तिबोध के जीवन काल में ही यह हो रहा था लेकिन वे उसे प्रकाशित देखनेवाले न थे। नाम क्या हो किताब का? अशोक वाजपेयी ने इस घड़ी का जिक्र कई बार अपने संस्मरणों में किया है। श्रीकांत वर्मा और उन्हें यह तय करना था। खुद मुक्तिबोध जो नाम चाहते थे, वह था ‘सहर्ष स्वीकारा है।’ अशोकजी ने लिखा है,

हमीदिया अस्पताल में मुक्तिबोध से जिस अनुबंध-पत्र पर दस्खत कराए थे, उसमें उनके पहले कविता संग्रह का शीर्षक था: सहर्ष स्वीकारा है। बाद में हमलोगों यानी नेमिजी, श्रीकांत वर्मा और मुझे लगा कि उनकी कविता में हर्ष और स्वीकार दोनों ही ज़्यादातर नहीं हैं, कोई और शीर्षक होना चाहिए। अंततः हम चाँद का मुँह टेढ़ा हैपर सहमत हुए।”

मुक्तिबोध इस पर कोई राय देने की हालत में न थे। कविता-संग्रह इसी नाम से छपा। मुक्तिबोध की मृत्यु के बाद दिल्ली में हुई गोष्ठी में अशोक वाजपेयी ने मुक्तिबोध पर अंग्रेज़ी में एक निबंध पढ़ा जो बाद में हिंदी में ‘भयानक खबर की कविता’ शीर्षक कविता से छपा। कविता संग्रह के इस शीर्षक ने और खुद मुक्तिबोध के अपने मित्रों ने मुक्तिबोध के बारे में एक धारणा बन जाने में जाने-अनजाने (?) मदद की: यह कि मुक्तिबोध भयावह, भयंकर, अस्वीकार, संघर्ष और क्रांति के कवि हैं।

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मनुष्यता: भाव और अभाव

मुक्तिबोध शृंखला:19

‘स्व’ के प्रश्न से मुक्तिबोध जीवन भर जूझते रहे। स्व के प्रति सचेत होना व्यक्ति बनने के लिए अनिवार्य है। और व्यक्तित्व तो उसके बाद ही बन सकता है। लेकिन वह क्या आसान है? उसमें बहुत मेहनत है। कौन इस पचड़े में पड़े? उससे बेहतर है खुद को भूल जाना। भूल जाने के खूबसूरत तरीके या बहाने खोजना भी क्या इतना मुश्किल है? एक अधूरी टिप्पणी में मुक्तिबोध लिखते हैं,

“कुछ बुद्धिमान कहते हैं कि भीड़ में व्यक्तित्व खो जाता है। लेकिन मैं कहता हूँ कि इसमें बुराई क्या है। मुझे तो भीड़ में अपने से मुक्ति मिल जाती है। चहल-पहल,रौनक, रफ़्तार,और शोर में ही क्यों न सही, खुद का भूलना तो होता ही है।”

यह भरम कई तरीकों से पैदा किया जा सकता है। आप कह सकते हैं कि मैं तो समाज में लगा हुआ हूँ, कोई  कह सकता है कि मैं राजनीति में व्यस्त हूँ और मुक्तिबोध व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि कलाकार भी खुद को इस धोखे में रख सकते हैं,

“बहुत से लेखक और कलाकार अपनी चेतना को इस तरह जगाते हैं कि निजी व्यक्तित्व आँखों से ओझल हो जाता है। यह तो कहने की बातें हैं कि हम उच्चतर स्तर पर जागे हुए हैं।”

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मैं बदल चला सहास, दीर्घ प्यास

मुक्तिबोध शृंखला:18

स्व का निर्माण, सृजन, परिष्कार आजीवन चलनेवाली प्रक्रिया है। स्व स्वायत्त है लेकिन अपने आप में बंद नहीं। उसकी प्राणमयता उसकी गतिशीलता में है। वह कभी भी पूरा बन नहीं चुका होता है। उसके अधूरेपन का अहसास क्या उसे निर्बल  करता है या उसे चुनौती देता है कि वह अपना विस्तार करता रहे?  ‘रबिन्द्रनाथ’ शीर्षक कविता में स्व की इस अनंत यात्रा को इस प्रकार प्रकट किया गया है:

“मैं बदल चला सहास

दीर्घ प्यास

मुझे देखना अरे अनेक स्थान

अभी मुझे कई बार मरण, और प्राण प्राप्त

कई बार शुरुआत, कई बार फिर समाप्त

मुझे अभी गूँजना क्षितिज तीव्र वायु

मुझे अभी अनेक पर्वतों-उभार पर अनेक साँझ बहुत प्रात

देखना। अपूर्ण आयु।

(अ)पूर्ण उर, अपूर्ण स्वर!”

यह कई बार का मरना क्या हो सकता है? कई बार मरकर फिर नए प्राण प्राप्त करना? यह एक नई ज़िंदगी हासिल करने की बड़ी प्यास है जो कभी बुझती नहीं? आत्मा की यात्रा जिसका कोई अंतिम बिंदु नहीं हो सकता। उसमें तृप्ति नहीं है। पूर्णता का अहंकार नहीं है।

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यह असंतोष की वह्नि स्वार्थ से परे रही

मुक्तिबोध शृंखला:17

‘अँधेरा मेरा ख़ास वतन जब आग पकड़ता है’, इस पंक्ति पर ध्यान अटक गया। क्या अँधेरे वतन की बात की जा रही है? या अँधेरे की जो कवि का ख़ास वतन है? क्या इस अँधेरे को आग लग जाती है?  वह अँधेरा को कवि का स्वदेश है? मुक्तिबोध का जिक्र आते ही अँधेरा पहला शब्द है जो मन में उभरता है। अँधेरे के साथ और जो भाव आ सकते हैं, वे भी। आशंका, भय, असुरक्षा, आतंक! एक दूसरे प्रसंग में मुक्तिबोध अँधेरे के साथ अपने रिश्ते की बात कुछ इस तरह करते हैं:

“… मेरे लिए अन्धकार तो एक आकर्षण है। अतएव मैं इस ध्वांत  को चीरकर उसके सौंदर्य को नष्ट नहीं करना चाहता। मैं तो वस्तुओं को टटोलना चाहता हूँ और उन्हें वैसे ही रखना चाहता हूँ जैसे वे हाथों को लग रही हैं।”

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अँधेरा मेरा ख़ास वतन जब आग पकड़ता है

मुक्तिबोध शृंखला:16

‘समझौता’ कहानी का अंत इस प्रश्न से होता है कि वह कौन सी अदृश्य शक्ति है जो हमें आपको पालतू भालू बन्दर बनाकर नचाती रहती है। किसके हाथ हमारे गले के पट्टे की चेन है। हमारे ‘मैं’  की हत्या किस तरह कर दी जाती है। किस तरह हमें गुलामी बर्दाश्त करना सिखलाया जाता है। हम खुद इस दासता को न सिर्फ सहते हैं बल्कि दूसरों को उसमें दीक्षित करना अपना कर्तव्य मानने लगते हैं। जो अनुकूलित होने से इनकार करे, हमें अपना शत्रु नज़र आने लगता है और हम उसकी हत्या होते देखते ही नहीं, कई बार खुद उसकी हत्या को तैयार हो जाते हैं। चलते फिरते शिरविहीन कबंधों का यह संसार कितना उदास और कितना भयावह है। चारों ओर जाने कितने हताहत व्यक्तित्व हैं। कितने सत्यों की भ्रूण हत्या कर दी गई है।

मुक्तिबोध की शिकायत इस ज़माने से इसी वजह से है। प्रकृति ने मनुष्य के रूप में जिस संभावना को गढ़ा, मानव के रूप में जो स्वप्न देखा उसका ऐसा अनादर कैसे सहन किया जा सकता है?  उनकी कविता  “आ-आकर कोमल समीर!” में यह दुख इस प्रकार प्रकट होता है:

    “नित देख-देख उद्ध्वस्त शिखर जीवन के, जन के

  मैं आहत हो गया,

  प्राण का श्वास रुक गया।”

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इस नगरी में सूर्य नहीं है, ज्वाल नहीं है

मुक्तिबोध शृंखला : 15

‘पक्षी और दीमक’ कहानी में अपने पंख देकर दीमक मोल लेने वाले पक्षी की त्रासदी हमारी-आपकी, सबकी हो सकती है। कहानी सुनाते- सुनाते और उसके अंत तक पहुँचते ही ‘मैं’ को धक्का-सा लगता है। जब आप एक एक कर अपने पंख देते जाएँ तो फिर एक दिन रेंगने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। पक्षी को तंबीह की गई थी कि दीमक उसका स्वाभाविक आहार नहीं। और कुछ हो, पक्षी को अपने पंख नहीं देने चाहिए। लेकिन उसे तो दीमक की चाट लग गई। फिर दीमक बेचनेवाले गाड़ीवान को दो दीमकों के बदले अपना एक पंख देने की उसकी आदत पड़ गयी। एक-एक कर अपने पंख गँवाते हुए वह उड़ने की ताकत खो बैठा। और फिर एक दिन एक बिल्ली का ग्रास बन गया।

कहानी के अंत तक पहुँचकर कहानी सुनानेवाले को धक्का लगता है। उसे जान पड़ता है कि कहीं वह अपनी ही कहानी तो नहीं कह रहा! वह संकल्प लेता है कि वह खुद को धोखा नहीं देगा। आसान ज़िंदगी नहीं चुनेगा। जहाँ उसका दिल होगा वहीं उसका नसीब होगा।

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जहाँ मेरा हृदय है, वहीं मेरा भाग्‍य है!

मुक्तिबोध शृंखला : 14

‘पक्षी और दीमक’ मुक्तिबोध के पाठकों की जानी हुई कहानी है। लेकिन जैसा मुक्तिबोध की कई रचनाओं के बारे में कहा जा सकता है, इस कहानी में दो कहानियाँ हैं। और उनके बीच एक आत्म-चिंतन जैसा भी।

कहानी एक कमरे में शुरू होती है। लेकिन वह जितना कमरा है उतना ही किसी का मन भी हो सकता है। एक कमरा जिसके बाहर चिलचिलाती धूपभरी दोपहर है लेकिन भीतर ठंडी हलकी रौशनी। बाहर और भीतर के बीच सिर्फ एक खिड़की नहीं है, काँटेदार बेंत की झाड़ी और उससे लिपटी हुई बेल। मुक्तिबोध की रचनाओं को जन-संकुल माना जाता रहा है लेकिन कुदरत, जैसा हम पहले भी नोट कर आए हैं, उनकी बनावट को तय करती है। यह भी कह सकते हैं कि प्रकृति के बिना मुक्तिबोध की कल्पना नहीं की जा सकती है। वह उनसे उसी कदर गुँथी हुई है जैसे इस बेंत की झाड़ी से यह बेल।

“बाहर चिलचिलाती हुई दोपहर है लेकिन इस कमरे में ठंडा मद्धिम उजाला है। यह उजाला इस बंद खिड़की की दरारों से आता है। यह एक चौड़ी मुँडेरवाली बड़ी खिड़की है, जिसके बाहर की तरफ, दीवार से लग कर, काँटेदार बेंत की हरी-घनी झाड़ियाँ हैं। इनके ऊपर एक जंगली बेल चढ़ कर फैल गई है और उसने आसमानी रंग के गिलास जैसे अपने फूल प्रदर्शित कर रखे हैं। दूर से देखनेवालों को लगेगा कि वे उस बेल के फूल नहीं, वरन बेंत की झाड़ियों के अपने फूल हैं।”

एक साथ इसमें कई संवेदनाएँ हैं- धूप की चिलचिलाहट का अनुमान, मद्धम उजाले की शीतलता, खिड़की का खुलापन, काँटेदार बेंत और आसमानी फूल।

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फिलिस्तीन के नाम क्षमा पत्र : मनोज कुमार झा

Guest Post: Manoj Kumar Jha

प्रिय फिलिस्तीनवासियो,

    हम चाहते हैं कि आप इस पत्र को करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दुःख और पछतावे की अभिव्यक्ति की तरह पढ़ें  जो हमें सयुंक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति में प्रस्तुत किए गए फिलिस्तीन के प्रस्ताव में अनुपस्थित होने का है। हम न केवल गाजा पट्टी में हुई व्यापक हिंसा से संबंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव से अलग रहे,बल्कि हमारे राजनैतिक प्रतिनिधियों ने भारत-फिलिस्तीन के सम्बन्धों की उस समृद्ध विरासत से मुँह मोड़ लिया जो इतिहास के अनेक उतार चढ़ाव भरे दौरों में भी अक्षुण्ण रही है।

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