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Democracy’s Structural Slippages and the Indian Experiment – Prof Harbans Mukhia

Professor Harbans Mukhia, Professor ( Retd.) of Medieval History at the Centre for Historical Studies, JNU ; an eminent authority on  Medieval India ; author and editor of many books will be delivering the 22 nd Democracy Dialogues lecture on Sunday, 15 th January 2023 at 6 PM (IST). The focus of his lecture will be Democracy’s Structural Slippages and the Indian Experiment

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बसु, रमण और सलाम की धरती पर वैज्ञानिक मिज़ाज की अनुपस्थिति पर कुछ बातें : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha

मैं वाशिंग्टन डी सी के इंडियन डाइस्पोरा’ को और रज़ी साहब का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा कि उन्होंने चंद बातें रखने का मौका दिया। यह मेरे लिए बेहद सम्मान की बात है कि मैं दो शख्सियतों के साथ – गौहर रज़ा और परवेज़ हुदभाॅय के साथ – आनलाइन ही सही – मंच साझा कर रहा हूं। मैं इस बात को लेकर चिंतित था कि रज़ी साहब वक्त़ के बेेहद पाबंद हैंइसलिए मैंने तय किया कि जो बातें मुझे कहनी हैंमैं लिख लेता हूँ। लेकिन इससे दिक्कत यह पैदा हुई कि इसे लिखते वक्त़ मुझे इस बात का एहसास नहीं था कि गौहर और परवेज़ क्या बात करेंगे। मुमकिन है कि मैं जो बातें रख रहा हूं वे इसके पहले कही गयी बातों के चलते अनावश्यक /व्यर्थ लगें या आयोजकों के या अन्य दो वक्ताओं के सरोकारों से महज छूती दिखाई दें। )



मेरे लिए यह बेहतर होगा कि मैं शुरूआत में ही कुछ प्रारंभिक क़िस्म की बातों पर अपनी राय ज़ाहिर कर दूँ। चर्चा के शीर्षक के तौर पर बसु, रमण और सलाम की धरती का हवाला दिया गया है, जिससे यह धारणा भी बन सकती है कि वैज्ञानिक के वैज्ञानिक मिज़ाज (Scientific Temper) से लैस होने की गारंटी है। साथ ही वह इतना प्रभावशाली भी होगा कि आम समाज पर भी अपनी छाप छोड़ सकेगा। एक आदर्श दुनिया में, शायद, यही होना चाहिए। लेकिन वैज्ञानिक भी आदर्श दुनिया में नहीं रहते।

आप सर आइज़क न्यूटन का उदाहरण देखें, जो आज भी विज्ञान के सबसे महान प्रतिमूर्ति (Icon) समझे जाते हैं, जिनकी प्रतिभा ने वैज्ञानिक क्रांति पर अपनी अंतिम और आधिकारिक मुहर लगा दी। कैम्ब्रिज में उन दिनों फैली प्लेग की महामारी से बचने के लिए भागकर अपने गाँव पहुँचे इस एकाकी युवा प्रतिभा ने अपने अकेले दम पर आधुनिक विज्ञान की नींव डाल दी। 1665-1666 के अपने चमत्कारी वर्षों के महज 18 महीनों में उन्होंने गति के नियमों को तथा गुरुत्वाकर्षण के नियमों को सूत्रबद्ध किया। इन्हीं महीनों में उन्होंने कैलकुलस (Calculus) की खोज की। लेकिन इसके बाद उन्होंने अपनी लंबी जिन्दगी का बड़ा हिस्सा कीमियागरी में तथा बाईबिल के अर्थापन की  धर्मशास्त्राीय विवेचना में लगाया। उन्होंने ऐसे विचारों की भी भर्त्सना  की (जैसे कि त्रिदेववाद -Trinitarianism), जो उनके मुताबिक ईसाई मत के प्रदूषण के प्रतीक थे, और एरियनवाद (Arianism) के अत्यधिक रैडिकल शुद्धतावादी संस्करण को अपनाया, जो मानता था कि बाइबिल भविष्य की बिल्कुल सटीक भविष्यवाणी है। न्यूटन के अंदर कुछ भी सामान्य अनुपात का नहीं था – न ही उनकी वैज्ञानिक प्रतिभा न ही उनका सख्त जडसूत्रवाद और आत्मविश्वास से भरपूर अंधश्रद्धा।

अगर आप यह समझ रहे हों कि मैं न्यूटन के प्रति अन्याय कर रहा हूं – आखिर वह भी तो अपने वक्त़ की ही पैदाइश हो सकते थे – तो एक तरह से मैं जिस प्रस्थापना की ओर उन्मुख हूँ उसे आप अभी ही स्वीकार करने की दिशा में हैं। लेकिन इसके पहले कि मैं विज्ञान और वैज्ञानिक मिज़ाज के अंतर्सम्बन्ध की पड़ताल करूँ, हाल के समय के कुछ अन्य उदाहरणों पर ग़ौर करना चाहूंगा। पास्कुअल जॉर्डन (Pascual Jordan) जो क्वाण्टम यान्त्रिकी के जन्मदाताओं में से था, एक सक्रिय नात्सी था। युद्धोत्तर जर्मनी में अपने पुनर्वास के बाद भी अपने फासीवादी विचारों पर अडिग रहा। भौतिक विज्ञान के नोबेल पुरस्कार विजेता फिलिप लेनार्ड (Philipp Lenard)और योहान स्टार्क (Johannes Stark) भी सक्रिय नात्सी थे और खुले रूप में यहूदी-विरोधी (anti semite) थे। उनके कुछ समय पहले, बीसवीं सदी के दूसरे दशक में, महान गणितज्ञ एम्मी नोदर (Emmy Noether) को गाॅटिंगन ( Gottingen ) विश्वविद्यालय के गणित विभाग में प्राध्यापक की नौकरी से वंचित किया गया था, महज इसलिए कि वह एक स्त्री थी। इस मामले से क्षुब्ध डेविड हिलबर्ट ने कहा था, ‘‘ विश्वविद्यालय में शिक्षक के तौर पर उसकी नियुक्ति के खिलाफ आखिर उसका लिंग कैसे आड़े आ सकता है। आखिर हम एक विश्वविद्यालय हैं, कोई स्नानगृह तो नहीं।’’ और मेरे एक वैज्ञानिक दोस्त ने मुझे कुछ दिन पहले ही याद दिलाया है कि खुद अपने सर सी वी रमण भी, जिनका नाम भी इस कार्यक्रम के शीर्षक में शामिल है, एक महिला प्रत्याशी को पीएचडी छात्रा के तौर पर प्रवेश देने के ख़िलाफ़ थे, क्योंकि उनके हिसाब से महिलायें वैज्ञानिक बनने के योग्य नहीं होतीं।

मैं जानेमाने वैज्ञानिकों को वैज्ञानिक मिज़ाज से लैस होने के प्रमाणपत्र दिए जाने का विरोध करने के लिये यहाँ नहीं आया हूं। मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या वैज्ञानिक मिज़ाज का अभाव विज्ञान के बेहतर ढंग से करने के रास्ते में बाधा बनता है। लगभग तीन दशक पहले परवेज़ हुदभाॅय ने एक किताब लिखी थी। किताब का शीर्षक था ‘इस्लाम एण्ड साइंस’, और उसका उपशीर्षक था ‘रिलीजियस आर्थोडाॅक्सी एण्ड द बैटल फाॅर रैशनेलिटी’ ( धार्मिक रूढिवाद और तार्किकता का संघर्ष). इस किताब में वह एक दिलचस्प उदाहरण पेश करते हैं। स्टीवन वाईनबर्ग और अब्दुस सलाम – वही सलाम जिनका नाम भी इस कार्यक्रम के शीर्षक में है – दोनों ने बीसवीं सदी के सबसे मूलभूत और महत्वपूर्ण भौतिकी सिद्वांतों में से एक का आविष्कार किया, जिसे हम युनिफाईड क्वांटम थियरी आफ इलेक्टोमैगनेटिजम एंड वीक नुक्लिअर फ़ोर्स कहते हैं। उन्होंने एक दूसरे से स्वतंत्र इस सिद्धांत का आविष्कार किया और उसके लिए नोबेल पुरस्कार साझा किया।  वाईनबर्ग एक घोषित नास्तिक थे और सलाम ने खुद स्वीकारा था कि वह आस्तिक हैं। सलाम ने परवेज़ के किताब की भूमिका लिखी थी। भूमिका में वह लेखक के इस विचार से सहमत होते हैं कि इस सिद्धांत तक पहुंचने के लिए उनके आस्तिक होने से कोई फर्क नहीं पड़ा। यह बात आप खुद आविष्कारक के मुंह से ही सुन रहे हैं। फिर विज्ञान और वैज्ञानिक मिज़ाज के बीच का रिश्ता क्या है ?

एक वैज्ञानिक महज विज्ञान पर ज़िन्दा नहीं रहता। उसके मस्तिष्क पर केवल तर्क और विज्ञान का क़ब्ज़ा नहीं होता। मैं नहीं जानता कि मस्तिष्क की तरह क्या मन के भी दो अलग अलग लेकिन एक दूसरे से जुड़े गोलार्द्ध होते हैं। लेकिन मुझे, सरल भाषा में, मन के ऐसे विभाजन का एक रूपक की तरह इस्तेमाल करने दीजिए। वैज्ञानिक चिन्तन का ताल्लुक, जैसा कि मुझे लगता है, उस प्रक्रिया से है जिसमें मन का तार्किक ‘गोलार्द्ध’ उसके भावनात्मक ‘गोलार्द्ध’ को प्रभावित करने की कोशिश करता है। इसका परिणाम एक तार्किक और सुसंस्कृत व्यक्ति के उभार में भी हो सकता है, लेकिन इसका नतीज़ा बहुत ख़राब भी निकल सकता है। तार्किक पक्ष के भावनात्मक पक्ष में ज़रूरत से ज़्यादा दखलअंदाजी करने से एक बचकाने वयस्क का भी उदय हो सकता है। ज़्यादा ख़तरनाक नतीज़े भी निकल सकते हैं – हो सकता है कोई डॉ स्ट्रेंजलव (Strangelove) जैसा शख़्स पैदा हो जाय। ( डॉ स्ट्रेंजलव नाम से एक फिल्म आयी थी, जिसमें इसी नाम का एक अधिकारी केन्द्र में है जो नाभिकीय युद्ध की शुरूआत करने का हिमायती है – अनुवादक)

वैज्ञानिक चिन्तन एक मुश्किल चीज़ है। इसमें शामिल होता है तर्कबुद्धि और संस्कृति के बीच का एक जटिल अंतरसंघर्ष। तुर्रा ये कि न तो हम तर्कबुद्धि को अच्छी तरह समझते हैं न ही संस्कृति को। कुछ लोग समझते हैं कि तार्किकता पारदर्शी होती है जबकि संस्कृति में कई अँधेरे कोने होते हैं। विरोधी पक्ष कहता है कि यह एक ग़लत तस्वीर है। वह यह दिखाने की कोशिश करता है कि तर्क की जड़ें धुँधली हैं – वह पवित्र-निर्मूल ढंग से धारण नही हुई। और वह स्वयं जागरूक नहीं है – वह नहीं जानती कि वह सत्ता की संरचनाओं से गहरे में उलझी हुई है।

कौन सा पक्ष महत्वपूर्ण है ताकि एक सफल और साथ ही साथ सार्थक जीवन जिया जा सके ? किस पक्ष को फैसला देने का हक है ? यह एक ऐसी बहस है जिसका आसानी से समाधान संभव नहीं है। इसे लेकर मज़ेदार प्रसंग भी हैं। मिसाल के तौर पर, जहां वैज्ञानिक कविता पर अपना फ़ैसला सुनाते दिखते हैं। पाॅल डिराक ( Paul Dirac ), जिन्हें 20 वीं सदी के महानतम वैज्ञानिकों में शुमार किया जाता है, उन्होंने एक बार जे आर ओपनहाइमर, जो भी एक बड़े वैज्ञानिक थे और एक बहुज्ञ-बहुप्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे, से कहा, ‘‘मैं समझ नहीं पाता कि आप भौतिकी में काम करते हैं और साथ ही साथ कविताएं भी लिखते हैं। विज्ञान मे आप उस बात को कहना चाहते है, जो पहले से कोई जानता नहीं हो, लेकिन ऐसे शब्दों में  कहना चाहते हैं जिसे सभी  समझ सकें। जब कि  कविता में आप  वही  कहते हैं जो सब पहले से ही जानते है, लेकिन ऐसे शब्दों में जिन्हें कोई समझ न सके।’’ दूसरी तरफ़, विज्ञान पर कवियों का फ़ैसला आम तौर पर अधिक स्याह होता है – वह अक्सर विज्ञान की यांत्रिकता की आलोचना करती है, या उसका ऐसे मज़ाक उड़ाती है जैसे कोई किसी वयस्क के बचपने का मज़ाक उड़ाए।

इतनी पृष्ठभूमि के बाद, मैं अब आज के विषय पर आना चाहूंगा। मैं इस बात से सहमत हूं कि वैज्ञानिक मिज़ाज उन समाजों एवं संस्कृतियों  से लगभग गायब है, जो इस उपमहाद्वीप की एक अलग क़िस्म की सभ्यता का निर्माण करते हैं। लेकिन मैं इस बात को लेकर आश्चर्यचकित नहीं हूं कि वह बसु, रमण और सलाम जैसे वैज्ञानिकों के बावजूद अनुपस्थित है। मैं इस बात पर अधिक आश्चर्यचकित हूं कि वह जवाहरलाल नेहरू जैसी शख्सियत के बावजूद अनुपस्थित है। मेरे हिसाब से, वैज्ञानिक मिज़ाज की वांछनीयता के सबसे श्रेष्ठ और सबसे समझदार हिमायती नेहरू थे। मैं ‘भारत एक खोज’ से एक उद्धरण साझा करना चाहूँगा भले ही इसमें थोड़ा वक़्त ख़र्च हो जाय :

‘‘विज्ञान सकारात्मक ज्ञान के दायरे में  व्यवहार करता है लेकिन जिस मिज़ाज  को वह निर्मित करता है, वह उस दायरे का उल्लंघन करता हैै। मनुष्य का अंतिम लक्ष्य ज्ञान हासिल करना, सत्य को पाना, अच्छाई और सुंदरता का  रसग्रहण करना  हो सकता है। वस्तुनिष्ठ खोज की वैज्ञानिक पद्धति इन सभी पर लागू नहीं होती, और जीवन में बहुत  कुछ ऐसा भी महत्वपूर्ण है, जो इसके दायरे के बाहर दिखता है – फिर वह चाहे कला और कविता के प्रति संवेदनशीलता, वह भावना जो सौंदर्य से निर्मित होती है, अच्छाई का बेहद गहराई में स्वीकार। मुमकिन है कि एक वनस्पति वैज्ञानिक और एक प्राणी वैज्ञानिक प्रक्रति का सम्मोहन और उसकीसुंदरता  का कभी अनुभव भी न करे ; संभव है एक समाजविज्ञानी मानवता के प्रति प्रेम से बिल्कुल वंचित हो। लेकिन जब हम पहाड़ों की उंचाई पर जाते हैं, जहां दर्शन का निवास होता है और उच्च कोटि की भावनाए मन में समा जाती है , या हमारे सामने खड़े विराट को अपलक हम देखते जाते हैं, उस वक्त भी  वैज्ञानिक मिज़ाज वाली  पहुँच और भावना की ज़रूरत बनी रहती है ।’’ ( अनुवादक द्वारा मूल टिप्पणी का भाषांतर)

मैं इस बात को भी जोड़ना चाहूंगा कि भारत का संविधान दुनिया का एकमात्र संविधान है जिसमें  हर नागरिक के बुनियादी कर्तव्य के तौर पर ‘‘वैज्ञानिक चिन्तन, मानवता और अनुसंधान और सुधार की भावना’’ का स्पष्ट उल्लेख है।

यह सब कुछ अत्यधिक दार्शनिक और आदर्शवादी लग सकता है। आखिर कोई इस बात का क्या प्रमाण है कि किसी समाज या किसी सभ्यता के लिए वैज्ञानिक मिज़ाज की वाकई ज़रूरत है ? मुझे लगता है कि इतिहास ने हमारे सामने एक वास्तविक मिसाल पेश की है। मैं चंद बातें उस पर भी रखना चाहूंगा।

परवेज़ की जिस किताब का मैंने अभी ज़िक्र किया है उसकी शुरूआत एक कल्पित कथा से होती है, ‘‘मान लें कि मंगल ग्रह पर रहने वाले मानवशास्त्रियों की एक टीम ने 9 वीं और 13 वीं सदी के दरमियान पृथ्वी की यात्रा की’’। उन्होंने पाया कि ‘‘यहां पर सबसे अधिक संभावनाओं वाली इस्लामिक सभ्यता दिखती है, जहां बैत उल हिकमा (Bait-ul-Hikmah) जैसा पुस्तकालय है, खगोलीय वेधशालाएं है, अस्पताल हैं और स्कूल हैं।’’फिर वे बीसवीं सदी के अंत में फिर एक बार यहां आते हैं और पाते हैं ‘‘उनका पहले का अनुमान बिल्कुल गलत साबित हुआ। मानवता का वह हिस्सा जो कभी सबसे अधिक संभावनासंपन्न दिखता था वह अवरूद्ध मध्ययुगीनता की स्थिति में जकड़ा है, नए को बिल्कुल खारिज कर रहा है और अतीत से बुरी तरह चिपका हुआ है। इसके उलट, अतीत के पीछे छूटे हुए लोग (यूरोप से तात्पर्य है) विकास की सीढ़ी चढ़ चुके हैं और अब सितारों को लक्ष्य किए हुए हैं। क्या यह भूमिकाओं का प्रचंड उलटफेर, आगंतुक पूछते हैं, महज एक का दुर्भाग्य और दूसरे का सौभाग्य कहा जा सकता है ? क्या उसकी वजह आक्रमण और सैनिक पराजय है ? या क्या यह  नज़रियों और रूख में बुनियादी बदलाव की परिणति है ?’’

कुछ मामूली फ़र्क़ों के साथ यह दृष्टान्त भारतीय उपमहाद्वीप पर भी समान रूप से लागू हो सकता है। अगर मंगल ग्रह के लोग 17 वीं सदी के दरमियान यहाँ पहुँचते तो सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों को देख कर चकित रह जाते; इस बात से अचंभित रह जाते कि पूरी दुनिया के सकल उत्पाद का लगभग एक तिहाई अकेले इस महाद्वीप पर ही पैदा होता है। लेकिन जब वे आज के समय में फिर इस महाद्वीप पर वापिस आते तो यहाँ की दुर्दशा देखकर और यहाँ का पिछड़ापन देखकर इस सभ्यता के बारे में उतने ही निराश हुए होते जितना कि वे इस्लामी सभ्यता के बारे में हुए थे।

शायद यह पूछने की बजाय कि सभी पीछे क्यों छूट गये, असली सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि पश्चिम आगे कैसे निकल गया ? इस से सभी के पीछे छूट जाने के मसले पर भी ज़्यादा आसानी से रौशनी पड़ सकती है। हो सकता है जवाब साफ हो, लेकिन कमरे में मौजूद हाथी की तरह उसे नज़रअन्दाज़ करने की कोशिश की जाती रही हो। हो सकता है, इतिहास के लम्बे दौर में अन्तर्भूत गहरे कार्यकारण सम्बन्धों का सन्धान आज की बौद्धिक-अकादमिक दुनिया में फ़ैशन में न हो। आख़िरकार, यह महान आख्यानों के प्रति संदेहों का दौर है। हम जो इस दौड़ में पीछे छूट गए हैं, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए सुकून हासिल कर सकते हैं और उन्हें इन अपराधों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहरा सकते हैं। हम इस बात पर भी खुश हो सकते है कि पश्चिमी अकादमिक जगत के बड़े बड़े विद्वतजन भी विज्ञान और आधुनिकता के खिलाफ बौद्धिक तूफान खड़ा कर रहे हैं, जो उनके हिसाब से कथित तौर पर, पूंजीवाद, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का नौकर और उपकरण मात्र रहे हैं। उत्तरऔपनिवेशिकता के सिद्धान्तकार उस उपनिवेशवाद के भयावह कारनामों को उजागर करने में व्यस्त रह सकते हैं जिसका युग बीत चुका है। लेकिन एक दिन तो हमें यह पूछना ही होगा –  उस अनुपस्थित उपनिवेशवाद की आलोचना से भारतीय उपमहाद्वीप पर रहने वाले हमलोगों को क्या हासिल होने वाला है ? पश्चिम के अकादमिक गढ़ों में बैठे उपनिवेशवाद के ये आलोचक और उत्तर-औपनिवेशिकता के ये सिद्धान्तकार निश्चित ही पश्चिमी समाजों को अधिक सभ्य, अधिक जनतांत्रिक और अधिक बहुसांस्कृतिक बनाने में योगदान कर रहे हैं। लेकिन पश्चिम के पास तो पहले से ही विज्ञान और आधुनिकता है, वह पहले ही आगे बढ़ चुका है। इस सब में हम पूरब वालों के लिए क्या है? गरीबी और अंधश्रद्धा के दलदल से हमें अपना रास्ता किस तरह निकालना है ? अपने लिए हमें किस तरह के भविष्य की कल्पना करनी है ? 

पश्चिम क्यों और किस तरह आगे निकल गया – यह एक विशद विषय है और इसपर तमाम पुस्तकालय भरे पड़े हैं। लेकिन कुछ मायनों में इसका जवाब इतना साफ़ है कि इसे दो शब्दों में कहा जा सकता है : विज्ञान और आधुनिकता की सहायता से  पश्चिम यह चमत्कार कर सकने में सफल रहा। यह सच है कि विज्ञान और आधुनिकता दोनों ही पूँजीवाद और उपनिवेशवाद के साथ पैदा हुए थे। लेकिन, जैसा कि मुहावरा है, हमें बच्चे को भी कठौते के गन्दे पानी के साथ फेंक नहीं देना चाहिए। यह बेहद आश्चर्यजनक है कि तमाम बड़े बड़े सिद्धांत मौजूद हैं जो कहते हैं कि सार्वभौमिक सत्य, वस्तुनिष्ठता और वैज्ञानिक पद्धति की विशिष्टता को लेकर विज्ञान की हैसियत कोई अलग नहीं है। सत्य और ज्ञान को लेकर सभी युगों में सभी संस्कृतियों के अपने-अपने दावे थे और उन सभी को विज्ञान तथा वैज्ञानिक पद्धति के दावों के बराबर का स्थान मिलना चाहिए। आज के भारत में ऐसी धारणा को पुष्ट करने के लिए एक आसान रास्ता निकाला गया है – हमें बस यही दावा करना है कि आधुनिक विज्ञान ने अब तक जो हासिल किया और आगे जो भी हासिल करेगा, वह सब वेदों में पहले से मौजूद है। 

बात जो भी हो, पश्चिम ने सबसे आगे निकल जाने ( Great Divergence )  का यह चमत्कार महज पूंजीवाद और औद्योगिक क्रांति के ज़रिए ही हासिल नहीं किया। प्रबोधन (Enlightenment) और आधुनिकता (Modernity) ने इसमें उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। हम लोगों ने विज्ञान और संस्कृति के बीच की जटिल अंतःक्रिया को पहले से ही संदर्भित किया है। 18 वीं सदी के पश्चिमी यूरोप में इसने इतिहास को और गतिमान बना दिया। आधुनिक विज्ञान के उभार के बाद लगभग दो सौ साल लगे जब वैज्ञानिक मिज़ाज पश्चिमी समाज और संस्कृति में नीचे तक पहुँचने लगा। सांस्कृतिक ज़मीन में वैज्ञानिक सोच और मिज़ाज के धीरे-धीरे रिसने की इस प्रक्रिया को ही प्रबोधन का नाम दिया जाता है। 

प्रबोधन और आधुनिकता को हम महज आयात नहीं कर सकते। इसे हासिल करने के लिए हम किसी का अन्धानुकरण नहीं कर सकते। इसकी वजह ये है कि विज्ञान भले एक ही हो, संस्कृतियाँ अनेक हैं। सभी संस्कृतियों को चाहिए कि वे विज्ञान को अपनाएँ और आधुनिकता को सक्रिय-सामाजिक रूप दें। लेकिन संस्कृतियों की अनेकता और विविधता के चलते सभी के रास्ते अलग-अलग होंगे। जो पीछे छूट गए, उनमें से कुछ ही ऐसे सफल उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने उन्नति, आधुनिकता और वैज्ञानिक मिज़ाज के मामले में अपने अलग ढंग से ही पश्चिम को पकड़ लिया और उस से बराबरी हासिल कर ली। पहले सोविएत संघ ऐसा उदाहरण था, लेकिन वह नष्ट हो गया। वैसे भी रूस यूरोपीय सभ्यता के इतना करीब था कि उसे बराबर में आ जाने के अलग सभ्यतात्मक उदाहरण के तौर पर देख पाना मुश्किल है। पूरब में, पहले जापान और अब चीन ऐसे उदाहरण के तौर पर सामने आते हैं। भारतीय महाद्वीप के ऐसा उदाहरण न बन पाने के पीछे कौन से कारण हैं?

यह भी एक बड़ा विषय है और बेहद जटिल मामला है। कहा जाता है कि समझदार जहाँ जाने में हिचकते हैं, अहमक वहाँ दौड़कर पहुँच जाते हैं। लेकिन अहमक होने का ख़तरा मुझे उठाने दीजिए। जिन सहस्राब्दिक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के द्वारा इस उपमहाद्वीप में एक विशिष्ट सभ्यता का निर्माण हुआ है उनमें एक ऐसी है जो विशिष्ट और अनूठी है। इसके तत्व अन्य मुल्कों और सभ्यताओं में पाए तो जा सकते हैं लेकिन इस उपमहाद्वीप में उसने जो भूमिका अदा की है, वह अन्य किसी इलाके में नहीं निभायी होगी। यही मेरे खयाल से वह अकेला सबसे बड़ा अवरोध है जिसने हमारी संस्कृति में वैज्ञानिक मिज़ाज को रिसने से रोकने में सबसे बड़ी भूमिका निभायी है। इसी पर ऊँगली उठाने की कोशिश करते हुए मैं अपनी बात समेटना चाहूँगा। 

मैं इस बात की तरफ संकेत करना चाहता हू कि इस उपमहाद्वीप में मौजूद लगभग सभी धर्मों ने, अलग अलग अंशों में, एक रहस्यवादी-भक्तिमार्गी रूप धारण किया। इसमें गुरुओं, पीरों, महात्माओं और अनेक प्रकार के गाॅडमेन की नेतृत्वकारी भूमिका बनी। ये सभी, पुरोहितों, पवित्र किताबों या अन्य बिचौलियों की मध्यस्थता के बग़ैर, ईश्वर तक सीधी पहुँच के लिये भक्ति का लोकमार्ग बनाने का दावा करते थे। हिन्दू पक्ष को देखें तो दक्षिण में उसका उदय पहली सहस्राब्दि के भक्ति आंदोलन के साथ हुआ और जो दूसरी सहस्राब्दि में उत्तर भारत में पहुचा। मुस्लिम पक्ष को देखें तो अनेक प्रकार के सूफ़ी पन्थ अफगानिस्तान के रास्ते भारत के उत्तर पश्चिम में पहुँचे और सूफियों, दरवेशों और पीरों के ज़रिए फैलते गये। इस परिघटना ने एक नए धर्म – सिख धर्म – को भी जन्म दिया। यही वह भक्ति, सूफी, सिख धर्म और संमिश्र रहस्यमयी-भक्तिमार्गी आंदोलनों की परिघटना है जिसने भारतीय उपमहाद्वीप में एक अलग और विशिष्ट सभ्यता के निर्माण में महती भूमिका निभायी है। 

लगभग सभी ने इस परिघटना की बेहद अनुकूल ढंग से व्याख्या की है। धार्मिेकों से लेकर गैरधार्मिकों तक, परंपरावादियों से लेकर आधुनिकतावादियों तक, दक्षिणपंथियों से लेकर वामपंथियों तक सभी ने इसकी प्रशंसा की है। लगभग हर कोई रूढिवादिता (Orthodoxy) की तुलना में वैविध्य या बहुलवाद ( heterodoxy ) की हिमायत करता है। इस बात से इन्कार तो नहीं किया जा सकता कि भक्ति-सूफी-सिख-संत आन्दोलनों ने उपमहाद्वीप की संस्कृति और सभ्यता में सकारात्मक योगदान भी किया है। इसके बावजूद यह कहना ज़रूरी है कि इसका एक बड़ा नकारात्मक परिणाम भी रहा है जिसे नज़रअंदाज़ किया गया है।

यह परिघटना ऐसी प्रक्रियाओ को आगे बढ़ाती दिखती है जो वैज्ञानिक चिन्तन और आधुनिकता की प्रगति को बाधित करते हैं। यह विस्मय और जिज्ञासा की जगह अंधी आस्था को प्रोत्साहित करती है; धार्मिकता को सही मायने में आध्यात्मिक, तत्वज्ञानशील और दार्शनिक बनने से रोकती है; दार्शनिक को तार्किक बनने से बाधित करती है; और तार्किकता को संस्कृति में रिसने से रोकती है। वह दुनिया के इस हिस्से में अतार्किकता, अंधी आस्था और अंधश्रद्धा का प्रधान वाहन बनती है। जार्ज आरवेल ने कभी कहा था  ‘‘संतों को हमेशा ही दोषी मान लेना चाहिए जब तक कि यह साबित न हो कि वह निरपराध हैं।’’ आज के भारत में आरवेल के इस कथन का एक विडम्बनापूर्ण अर्थ निकला है – अनेक साधुओं और महात्माओं के बलात्कारी और हत्यारे साबित होने के बावजूद और उनके जेल जाने के बावजूद उनके अनुयायियों की संख्या में कोई कमी आती नहीं दीखती।

नेहरू तक  भक्ति आंदोलन के सभ्यतात्मक परिणामों से जूझने में असफल रहे। वे अपने में अंतर्विरोधों को समाहित किये हुए थे। विवेकानन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर, गाँधी, भगत सिंह और आइन्स्टाइन – सभी की एक साथ और बराबर आदर से तारीफ़ करते थे। नेहरू एक महान व्यक्ति थे – वे दूरदर्शी थे, नेता थे, चिन्तक थे, राजनेता थे। विटमैन के तौर पर वह शायद कह सकते थे , ‘‘मैं विशाल हूँ, मुझमें बहुलता समाहित है।(I am large, I contain multitudes)” दरअसल वे असफल इसलिए हुए कि भारत के अतीत का बोझ उनके जैसे महान व्यक्ति के लिए भी बहुत भारी साबित हुआ। वे खरी खरी बात नहीं कह सकते थे क्योंकि उन्हें अपने लोगों को साथ लेकर चलना था।  इसीलिए कभी कभार आप को छोटे लोगों की बातें भी सुननी चाहिये। वे सच्ची बातें इसलिए कह सकते हैं क्योंकि नेहरू वाला बोझ उठाने की ज़िम्मेदारी उनकी नहीं है।

यहीं मैं अपनी बात खत्म करना चाहूंगा। 

नवम्बर 19, 2022

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( नोट : द इंडियन डाइस्पोरा वाॅशिंग्टन डीसी मेट्रो  संयुक्त राज्य अमेरिका की तरफ से ‘Absence of Scientific Temper in the Lands of Scientists Raman, Bose, Abdus Salaam  विषय पर, 19 दिसम्बर 2022 को आनलाइन पैनल डिस्कशन का कार्यक्रम हुआ।

अग्रणी भौतिकीविद, जनबुद्धिजीवी, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, लेखक और स्तंभकार प्रोफेसर परवेज हुदभाॅय, पाकिस्तान ; सैद्धांतिक भौतिकीविद, एक्टिविस्ट, प्रगतिशील आंदोलनों से जुडे़ बुद्धिजीवी एवं लेखक डा रवि सिन्हा ; पूर्व मुख्य वैज्ञानिक, कौन्सिल आफ साइंटिफिक एण्ड इंडस्टियल रिसर्च, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता, डाॅक्युमेंटरी फिल्म निर्माता गौहर रज़ा ने बातें रखीं। 

प्रो रजी रजीउददीन, वैज्ञानिक, इंडियन डाइस्पोरा के संस्थापक, ने स्वागत वक्तव्य दिए। 
कार्यक्रम में डा रवि सिन्हा द्वारा उपरोक्त लिखित वक्तव्य दिया गया।)

(डा रवि सिन्हा का मूल अंग्रेजी वक्तव्य यहां पढ़ सकते हैं : https://kafila.online/2022/11/23/a-few-remarks-on-the-absence-of-scientific-temper-in-the-land-of-bose-raman-and-salam/)

अनुवाद : सुभाष

Why everyone cares about Ukraine

Guest Post by Shylin Shekhar

The western world has been very vocal in support of Ukraine since the Russian invasion started. This has created a complete black and white image of the war, one side being a “civilized european country with pure aryan people” while the other being an evil authoritarian “oligarchy”.

People’s support of Ukraine in the western world is so strong that they would rather freeze to death than stop their economic sanctions on Russia. Instead, the ‘NAFO’ community and NATO supporters are seeking all out war with them.

But why is it that people only care about this conflict out of the dozens that’ve existed for decades. They didn’t care about the invasion of Iraq or Libya, there isn’t this level of support for Palestinians when they’re being genocided every single day. Is it because those were by western imperial powers instead of eastern ones?

There must be a good and a bad character in this type of story and this was very easy to create. Russia has been controlled by the rich since 1991 and so the west highlighted this point and condemned them as an “Oligarchy”.

An oligarchy is a state controlled by the top richest people, they own most if not all of the resources of the country and hold substantial political power, does this sound familiar? America is also an oligarchy; it’s just that their oligarchs are called ‘entrepreneurs’. In fact, the net worth of just Bezos, Musk and Gates is more than the top 100 “oligarchs’ in Russia.

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Stop the Slander: Solidarity Statement Against Attempts to Tarnish Activists in the Anti-Adani Seaport Struggle at Vizhinjam

The other day, the citizens of Kerala witnessed an extraordinary coming -together of CPM and BJP leaders in Thiruvananthapuram — in support of the Adani sea port, against the fisher community of the Thiruvananthapuram coast.

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മാറുന്ന ഭരണകൂടം, നവബ്രാഹ്മണിക പിതൃമേധാവിത്വം, ദണ്ഡനീതി ഫെമിനിസം കേരളത്തിൽ — 5

ഉപസംഹാരം

ഫെമിനിസ്റ്റ് ദണ്ഡനീതി നിയമ ഉപകരണങ്ങൾ നിരോധിക്കണമെന്നോ അവ തീർത്തും അപ്രസക്തമാണെന്നോ അല്ല ഈ ലേഖനത്തിൽ ഞാൻ വാദിച്ചിട്ടുള്ളത്. നേരെ മറിച്ച് അവ ഉപയോഗിക്കുമ്പോൾ ജനാധിപത്യവും മനുഷ്യാവകാശങ്ങളും ലിംഗാനീതിയ്ക്കെതിരെയുള്ള പോരോട്ടങ്ങളുടെ സാധ്യതകൾ തന്നെയും അധികാരത്തിൻറെ മേൽ-കീഴറ്റങ്ങൾ കാണാനാകാത്തവിധം പിളർന്ന വായിലകപ്പെട്ടു പോകും വിധം അവരെ പുണരുന്നത് അങ്ങേയറ്റം അപകടകരമായിരിക്കും എന്ന മുന്നറിപ്പ് വായനക്കാരുടെ മുന്നിൽ വയ്ക്കാനാണ് എൻറെ ശ്രമം.

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Partition Split Us Up: Can We Live in Peace as Neighbors? –

– Dr Vinod Mubayi

Dr Vinod Mubayi, Public Intellectual, Scientist and Activist will be delivering the 20 th Lecture in the Democracy Dialogues Series, organised by New Socialist Initiative on Sunday, 30 th October at 7 PM (IST)

He will be speaking on 

Partition Split Us Up: Can We Live in Peace as Neighbors?

Future Challenges and Reflections

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The programme will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi . 

Theme :

Partition Split Us Up: Can We Live in Peace as Neighbors?

Future Challenges and Reflections

75 years have passed since Partition and the prospects of peace between the two largest countries of the region, India and Pakistan, whose conflict impacts the entire South Asia region look dimmer than ever. The reasons and justifications offered by the protagonists for the separation, such as the two-nation theory, have been discussed at length in various forums and while the past is commonly understood to be prologue to the future it behooves us to imagine a future without all the baggage of the past.

This talk will refer at times to the past and the misdeeds of the present but focus mostly on possibilities for the future. A good amount of experience has shown that despite the most fraught and tense relations between governments, common people of south Asian countries, whether in the diaspora or while visiting each other’s countries, are able to establish bonds and friendships very quickly and easily. Perhaps 75 years cannot easily extinguish long standing cultural and linguistic bonds established over millennia. Dialectics also teaches us that opposing and contradictory views and ideas can co-exist within a society or group and which will prevail depends on the context in which the opposites interact.

Groups such as South Asia Peace Action Network (SAPAN), whose founding charter states that its minimum common agenda is reclaiming South Asia, have attracted members from all South Asian countries. SAPAN calls for soft borders and visa free travel between countries in the region in addition to demands for human rights, peace and justice. The talk will discuss possibilities of expanding the activities of people-to-people groups that can create civil society pressures for peace and prosperity as well as joint actions to counter existential threats like climate change.

About the Speaker :

Dr Vinod Mubayi is a reputed American Physicist of Indian origin.

PhD in Physics from Brandeis University, taught at Cornell University and was a research fellow at TIFR, Mumbai before joining Brookhaven National Laboratory, New York.

A member of the American Nuclear Society, the American Physical Society and the American Association for the Advancement of Science, he was also a Consultant to agencies of the United Nations on Energy Issues ( 1981-1985)

He joined INSAF bulletin as co-editor in 2004.  A keen observer of socio-political events in India, Mubayi has been close to progressive groups, espousing human rights issues and the cause of the downtrodden

His book ‘Where is India Headed ? – An Historical Critique ( 2021, Media House) which chronicles the contemporary Indian History during the last few decades has also been translated into Hindi

हिंदी में अंतर्राष्ट्रीयवाद – साहित्य और शीत युद्ध :प्रोफेसर फ़्रंचेस्का ओर्सीनी

Prof Fransesca Orisini, who has taught Hindi and Indian literature at SOAS, London, will be delivering the Seventh Lecture in the Sandhan Vyakhyanmala Series on Sunday, 18 th September, 6 PM ( IST).

She will be speaking on  हिंदी में अंतर्राष्ट्रीयवाद – साहित्य और शीत युद्ध ( Hindi Internationalism – Literature and Cold War

 Time: Sep 18, 2022 06:00 PM (IST) India

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Organised by :NEW SOCIALIST INITIATIVE ( NSI) Hindi Pradesh 


संधान व्याख्यानमाला : सातवां वक्तव्य 
विषय : हिंदी में अंतर्राष्ट्रीयवाद – साहित्य और शीतयुद्ध  

आज़ादी के बाद के दो दशक पत्रकारिता के लिए स्वर्णिम युग माना जाता है – हिंदी  और दूसरी भाषाओं में । ये वे दशक भी थे जब उपनिवेशवाद को खतम करने वाली हवा ज़ोरों से चलने लगी थी, और साथ साथ शीत युद्ध का प्रभाव भी दुनिया के हर कोने में महसूस होने लगा। तब साहित्य को बड़ी गम्भीरता से लिया जाता था। एक ख़ास क़िस्म के साहित्य के प्रचार, प्रसार और अनुवाद में बड़े पैमाने के प्रोग्राम स्थापित करके बहुत बड़ी रक़म खर्च की गयी  । मोनिका पोपेस्कु की हाल की किताब का शीर्षक लिया जाए तो शीतयुद्ध और उपनिवेशवाद से आज़ादी पाने के संघर्ष कलम की नोक पर (At Penpoint, २०२०) चलाए गए। साहित्य पर शीतयुद्ध के प्रभाव को लेकर ज़्यादातर काम अमेरिका, सोवियत  रूस और साम्यवादी चीन के प्रचार-प्रसार योजनाओं पर हुआ है । मेरा ध्यान हिंदी पत्रकारिता पर रहेगा, और विशेष तौर पर हिंदी की कहानी पत्रकारिता, जिनका पाठक-वर्ग न केवल साहित्यिक बिरादरी थी बल्कि सामान्य पाठक भी उसमें शामिल थे । क्या १९५० और १९६० के दशकों की हिंदी पत्रिकाओं में कोई अंतर्राष्ट्रीय चेतना नज़र आती है? क्या कहानी और सारिका जैसी लोकप्रिय पत्रिकाएँ भी शीतयुद्ध में भाग लेते दिखाई देती हैं ? क्या उनमें शीतयुद्ध और उपनिवेशवाद से मुक्ति पाने के संघर्षों की झलक मिलती है ? कहानी-पत्रिकाएँ पाठकों के मन में दुनिया की कल्पना कैसे गढ़ती हैं ? (एक ऐसी कल्पना, जो राजनीति से जुड़ी हो पर सिर्फ़ राजनीति से नहीं ।) और जो दुनिया पत्रिकाएँ–जो हर हफ़्ते या हर महीने सिलसिलेवार छपती तो हैं मगर जिनको पढ़ने के बाद रद्दी के हवाले किया जाता है—गढ़ती हैं, वह दुनिया पाठकों के मन में कहाँ तक अंकित रहती है? क्या पत्रिकाएँ भी अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को बनाने में सक्रिय होती हैं ? इन सवालों का जवाब देने की कोशिश करते हुए यह प्रस्तुति हिंदी के एक कम जाने माने पहलू पर रोशनी डालेगी।  


फ़्रंचेस्का ओर्सीनी SOAS, लंदन विश्वविद्यालय में हिंदी और भारतीय साहित्य की प्रोफ़ेसर रही है। उनकी लिखी हुई और सम्पादित किताबों में हिंदी का लोकवृत्त (The Hindi Public Sphere: Language and literature in the age of nationalism, 1920-1940, 2002), Love in South Asia (2006), Print and Pleasure (2009), Before the Divide (2010), After Timur Left (2014, with Samira Sheikh), Tellings and Texts (2015, with Katherine Schofield), Hinglish Live (2022, with Ravikant) और The Form of Ideology and the Ideology of Form: Cold War, Decolonisation, and Third World Print Cultures, with Neelam Srivastava and Laetitia Zecchini) शामिल हैं। 

Where Are We – 75 Years after Independence : Prof Aditya Mukherjee

 Eminent scholar of Modern Indian History Prof Aditya Mukherjee, ( Retd.) Centre for Historical Studies, JNU who is also editor of the ‘Sage Series in Modern Indian History’ will deliver the next (18 th) Lecture in the Democracy Dialogues series organised by New Socialist Initiative.

He will be speaking on ‘Where Are We : 75 Years After Independence.’ on Sunday, 28 th August 2022 at 6 PM (IST).

Join Zoom Meeting

https://us02web.zoom.us/j/81606280893?pwd=U3daWGVYSFV6MFIyMzROVDJ0Qm40Zz09

Meeting ID: 816 0628 0893
Passcode: 356973

The programme will also be live streamed at facebook.com/newsocialistinitiative.nsi . 

Theme :

Where Are We : 75 Years after Independence

“As we celebrate 75 Years of India’s independence, it is time to reflect on the extent to which the Indian nation-state has lived up to the vision of the Indian national movement and the spirit of the new Constitution. The core ideas behind this vision envisaged that Independent India would be sovereign, democratic, secular republic that will have a pro-poor orientation and would be based on reason rather than blind faith and obscurantism.

With the recent changes in the governmental power at the Centre and in many states where forces following precepts of the Right – forces which had remained outside the spectrum of the national movement – have become dominant resulting in a grave threat to the core components of the Idea of India. There is a reason why the world is no longer accepting India as a full democracy and is, instead, being variously describing it as a “partially free democracy”, a “flawed democracy” and even as an “electoral autocracy”.

In this lecture we will trace the course of developments that has led India to this predicament and will outline future prospects for overcoming the challenges.”

About the Speaker :

Prof Aditya Mukherjee has been associated with Centre for Historical Studies, JNU for the last more than four decades.
He has been Editor of the Series, ‘Sage Series in Modern Indian  History’ published by SAGE publications, and a member of Scientific Committee, International Review of Sociology, Rome, since 2011 and Regional Editor, International Journal of AsianStudies, Tokyo (Cambridge University Press)
He has been Visiting Professor at  Duke University, USA ; was a Visiting Fellow at Institute of Advanced Study, Lancaster University, UK ; Fellow at Institute of Advanced Study, Nantes, France ; Visiting Fellow , Institute of Advanced Study, Sao Paulo, Brazil ; Visiting Professor, La Sapienza, University of Rome at various periods during his long career.
He is author / co-author of many books : India’s Struggle for Independence, which has gone into 80 reprints ; India After Independence, 1947 – 2000 ; Imperialism, Nationalism and the Making of the Indian Capitalist Class 1927-1947 ; India Since Independence, Penguin, More than 35 reprints till 2016.7 ; RSS, School Texts and The Murder of Mahatma Gandhi: The Hindu Communal  Project , (co-author),

When ‘With the Survivor ‘ Rings Hollow: Observations on the Rage over the Civic Chandran Case

The internet frenzy over the Civic Chandran case has reached a new zenith over the two highly problematic — deeply elitist, sexist, logically and empirically flawed — anticipatory bail orders issued to the accused by the Sessions Court. There was a strange silence about the first one which was stuffed with elitist statements, and an even stranger pause over the blatantly sexist and conservative order before the active condemnation of the latter began to be voiced over the internet. Even stranger, because there is far more tolerance of elitism among the internet woke-folk than of conservative sexist understandings of the appropriate clothing for women’s bodies in Kerala. The three-day break from expressions of outrage did not, and still does not make sense.

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Carceral Feminism and the Punitive State: Why I am Not With the Mob — 2

II

In the 1980s, when the first feminist articulations began to be heard in Kerala, left-leaning feminists often sought to maintain a critical distance from the state, emphasizing its inherently patriarchal nature. This was not surprising as feminists of that generation had radical-Marxist roots or strong connections with it. Radical Marxism in that generation was clearly suspicious of the state – quite unlike the mainstream left.

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Carceral Feminism and the Punitive State: Why I am not with the Mob — 1

I have never been a carceral feminist anytime in my life. Right now, there is a massive tide of abuse and misrepresentation of non-carceral feminism in Kerala, so much so that any suggestion of solutions to the problem of sexual harassment outside the framework of the state is immediately dubbed anti-woman and anti-feminist. Carceral feminists are so warped, they seem to be totally unseeing of the fact that the debate has always been about the significance of the state and its instruments in the generally agreed-upon goal of gender justice, and not really about who is the true, or truer feminist. Indeed, this is strongly reminiscent of the mass attack on the sex worker activist Nalini Jameela years back and the anti-carceral feminists who were prepared to hear her out and stand with her. I remain a non-carceral feminist, rejecting the binary between carceral and anti-carceral feminism. I refuse the insistence that proportional punishment is irrelevant in dealing with sexual misconduct. I refuse to see ‘Men’ — I will not buy the idea that all male bodies share the same privilege and power and hence must be dealt with in the same way. I write the following in this spirit. If I am banished from the feminist mainstream for this, so be it.

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No End to ‘Tamas’ ( Darkness) Around ?

One can imagine that if the plan to provoke riots before Eid in Ayodhya would have been successful, how it could have easily spilled over to the other parts of the country.

Image for representational purpose. Credit: Hindustan Times

It was the early 1970s when Bhisham Sahni, the legendary Hindi writer had penned the novel Tamas. It looks at the Hindu-Muslim riots in India in the backdrop of the Partition. Its central character is Nathu, who is Dalit and does the work of removing hides from dead animals. A local politician persuades Nathu to kill a pig; the act is later used to foment a riot in the city.

It has been more than 40 years since the novel was written, but it still resonates with today’s India as it throws light on the ‘fault lines’ of Indian society and shows the ease with which they can be weaponised.

A fortnight back, a similar attempt to provoke a riot was made in Ayodhya using a similar technique; however, prompt action by the district police averted a riot there.

( Read the full article here)

Leftists who side with Russia are just not real leftists: Shilyn Shekhar

Guest Post by Shilyn Shekhar

The opinion that is shared here will certainly get hate from people who side with the rational side of politics but it must be addressed.

There are many mixed opinions about the Russian-Ukrainian conflict with people having many different opinions, it is this war that reveals to us the true reality of some who claim to be leftists.

The term for them is ‘Tankies’. This word originates from the 2nd half of the 20th century when the Soviet Union would crack down any uprisings in their eastern block. There was a large divide in the left at the time when the Soviet Union rolled tanks into Hungary and Czechoslovakia because they tried to break away from the oppressive Soviet Sphere of influence. Most leftists opposed this but there was still a group that was in favor of it, these are the original tankies.

The Soviet Union wasn’t socialist or communist at the time, it was an authoritarian fascist regime whether people agree or not and the ones that supported them were not real leftists because the ideology is based on rational thinking.

The modern day tankies are a very major reason leftism is seen as evil and irrational in the west because they give a wrong image to the people which makes them see leftism as authoritarianism.

The modern day tankie ideology can be summed up as this: “It’s because of America/CIA”. They see the west as monsters whose only intention is to cause suffering and hurt “their ideology”.

I will not try to defend the US because it remains a fact that they’ve done terrible things in the middle east, africa, latin america and many more examples. But blaming them for everything isn’t right and does not solve any problems.

To them, the US is such an exaggerated evil that even the most terrible actions by their opposition is justified.

If China bans forming independent workers’ unions then a tankie would say that they have to, those unions are surely controlled by the CIA.

Cuba throws political dissidents in jail? They’d reply that Cuba has to do it because those people are puppets of the US.

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Part 2: A Ukrainian political scientist explains the War, Ukrainian nationhood, Maidan, NATO and neo-Nazis

Guest Post By Tushar Dhara

Tushar Dhara: Is it fair to say that Ukraine’s economic performance, especially GDP per capita, is less today than it was in 1991? I also noticed that some of the country’s macro-economic indicators like public and foreign debt, forex reserves and cost of borrowing were not very good in 2020, a period when lockdowns and the pandemic created global economic disruption. Could this have made the country more vulnerable?
Denys Pilash: It’s true that Ukraine’s economy was doing badly, and it was contending with Moldova for being the poorest country in Europe, in terms of income and GDP per capita. It was a continuation of a malign economic policy, the frame work of which was neo-liberalism, more privatization and marketization. Russia and Belarus were ever more neo-liberal than Ukraine in the case of labour legislation. Still, the intention of the Ukrainian ruling class was pretty clear. This led to a bad economic situation and meant that their logic led to a vicious circle of foreign loans and IMF loans, and the rollover of foreign debt. It was done by all Ukrainian governments, whether pro-Russia or pro-West. It was leading to a debt trap. It was one of the pretexts to the second Maidan protest. When Yanukovich was thinking about whether to borrow more from the West or from Russia – signing an agreement with the EU then backtracked and went back to Russia – it was all about finding the funds to fill the hole in the budget. They had no strategic vision about long term economic growth.

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“Call It Invasion, an expression of Russian Imperialism.” Tushar Dhara in Conversation with Denys Pilash.

Guest Post by Tushar Dhara

Part 1: “The Russian invasion is a unilateral decision of the leadership which reflects the internal dynamics of Russian imperialism”: A Ukrainian political scientist explains the War, Ukrainian nationhood, Maidan, NATO and neo-Nazis.

In February Russian President Vladimir Putin claimed in a televised address that Ukraine is an illegitimate country that exists on a land that’s “historically” and “rightfully” Russian. Putin further claimed that a “genocide” was being perpetrated on “millions” of Russian supporters in the Donbas by Ukrainian far-right nationalists and neo-Nazis. Putin used this as an excuse to launch what he called “special military operations” in Ukraine, thus triggering the war.

One month into the Russian invasion, what is the situation in Ukraine? How does one understand the historicity of Ukraine’s nationhood, including its culture, language, status within the Soviet Union and its evolution since independence in 1991. How does one situate events like the maidan protests that rocked Ukrainian society, the role of far right formations like Azov and the aspirations of Ukrainians?

To understand these issues I spoke to Denys Pilash, a political scientist teaching at Kyiv National University. Pilash is on the editorial board of Commons magazine, a left of centre intellectual magazine. Pilash is currently in Transcarpathia in Western Ukraine, where he is helping deliver humanitarian aid. The interview is in two parts.      

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 मुसलमानों की उम्मीदों का मलबा:सालिक अहमद, अनुवाद: शुभेंद्र 

Guest Post by Salik Ahmad.

Originally published by The India Forum as The Shattering of The Muslim Hope in India(https://rb.gy/jfnxtz)

कुछ रोज पहले, एक शाम अपने दोस्त के साथ दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी से वक्त निकालकर, काई से काली पड़ चुकी अपनी छत पर बैठा, पीले आसमान के नीचे खड़े ठूँठे  रूख को देख रहा था। मेरा दोस्त, जो एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता है, अपने अनुभवों के बारे में बताते हुए कह रहा था कि कैसे उसका ऑफिस उसके लिए एक अजनबी जगह है।

 मेरे दोस्त कहता है, “वहाँ हर कोई मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों से कितना बेखबर है। मैं रोज लिंचिंग का नया वीडियो, नफरत उगलनेवाला भाषण, जनसंहार (Genocide)को उकसाने वाला कार्टून देखता हूँ लेकिन जब मैं ऑफिस जाता हूं तो वहां लोगों में चर्चा होती है, सबसे अच्छी सुशीज (Sushis) कहां मिलती है, और केक सबसे बेहतर कौन बनाता है। गुप्ता सांता का खेल चलता है और लोग अपनी तरक्की की योजनाएँ बनाने में मशगूल हैं। मैं ऑफिस को अचंभे के साथ देखता हूं और सोचता हूँ कि यह कैसी जगह है, या फिर मैं किसी दूसरे जमाने में आ गया हूँ।” 

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होली और जय श्रीराम:योगेश प्रताप शेखर

Guest Post by Yogesh Pratap Shekhar

फरवरी के महीने से विश्वविद्यालय परिसर में विद्यार्थियों का आना-जाना शुरू हो गया है । परिसर गुलज़ार रहता है । कक्षा के बाहर छोटे-छोटे समूहों में उन की आवाजाही और उन के बीच किसी भी विषय की चर्चा मन को एक सुकून देती है । कहीं-कहीं दोस्ती और आकार लेता प्रेम भी महसूस होता है । यह भी अत्यंत सहज एवं स्वाभाविक लगता है । विश्वविद्यालय केवल कक्षा मात्र के लिए नहीं होते न ! वहाँ एक नई दुनिया होती है । नए संबंध भी बनते हैं । पिछले एक माह से परिसर में लौटी रौनक़ मन में उत्साह जगाती है । फिर आया मार्च का महीना । होली के त्योहार का महीना !  रंग और गुलाल का उत्साह ! चार दिन की छुट्टी से पहले परिसर में ‘होली-मिलन समारोह’ आयोजित हुआ ।

उत्साह से भरी होली की गतिविधियों के दौरान अचानक ही ‘भगवा झंडा’ परिसर में लहराया जाने लगा । ‘जय श्रीराम’ के नारे भी सुनाई दिए । होली में ‘जय श्रीराम’ के नारे ! सोचने मात्र से ही मन सिहर उठता है । होली और छठ ऐसे त्योहार हैं जिनमें न तो पुरोहित की ज़रूरत होती है और न ही किसी प्रकार के कर्मकांड की । ‘होलिका-दहन’ की परंपरा भी इस पर्व में ब्राह्मण-पौराणिक वर्चस्व की स्थिति को प्रदर्शित करती लगती है । ऐसा इसलिए कि होली की पूरी संकल्पना और इस पर्व के मिज़ाज को देखकर ‘होलिका-दहन’ का इस से  ठीक-ठीक जुड़ाव महसूस नहीं होता ।

भगवा झंडा:जय श्रीराम

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Hate Grips The Nation: A book to mark 20 Years Of the Gujarat pogrom

ANHAD released a book on 28 February in an online event to mark 20 years of the Gujarat pogrom. As a reminder that it was a long campaign and organization of hate against Muslims in the state which made this pogrom possible. That hate has now gripped the entire country. We need to stop it before it is too late.

The book has essays by Father Cedric Prakash, Harsh mander, Syeda Hameed , Shabnam Hashmi and Apoorvanand and a list of hate speeches and hate crimes. The compilation of hate speeches and hate crimes against the religious minorities has been done by Leena Dabiru and Tarun Sagar .

The book can be accessed here:

https://rb.gy/p5f9q8

Help Us Fight ‘Progressive ‘ Cyberlynching: An Appeal from Kerala

The infamous infant-snatching case in Kerala has opened up too many harsh truths about this society. It is not easy to express the pain in acknowledging it. After all, for many of us who have stuck back here with the intention of participating in what was once a fairly vibrant political life, this monstrosity that looms over all aspects of life, private and public (as so terrifyingly evident in the experience of Anupama Chandran) is a daunting sight. Not that there weren’t glimmers of it earlier, but the full menace has become visible only now.

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How Could You Allow This to Happen? Urvashi Butalia Writes to the Kerala Chief Minister

Dear Chief Minister


Throughout the terrible times we have seen these last two years, it is the news from Kerala that has helped so many of us to keep faith in governance – that a state can be honest, open, participatory, concerned for its people, focused on health, and not play politics, all of these have been remarkable and many of us, Keralites and non-Keralites alike, have drawn valuable lessons from the Kerala experience.

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Let Good Sense Prevail — An Open Letter to the Kerala Chief Minister: Padmini Swaminathan

That the entire state machinery, ostensibly at the behest of parents who are important functionaries in the ruling party, has been deployed to not only keep the baby, mother and father apart but hem them in such a way that redressal will require untangling of very many complex issues that have deliberately been tied together, reveals the deep and destructive patriarchal underpinnings of the party and family.

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