Category Archives: Bad ideas

व्यक्ति और भाषा: सक्षम, सप्राण और अर्थदीप्त

मुक्तिबोध शृंखला : 9

पढ़ रहा था मुक्तिबोध को और भटक गया अज्ञेय की ओर. दोष मेरा जितना नहीं उतना नामवर सिंह का है. “साहित्यिक की डायरी” की समीक्षा करते हुए अज्ञेय से उनकी तुलना करते हुए नामवरजी ने उनमें देखी है ‘अमानुषिकता की हद को छूनेवाली कलात्मक निःसंगता.’ वे ‘साहित्यिक की डायरी’ के आस पास ही प्रकाशित होनेवाली अज्ञेय की कृति ‘आत्मनेपद’ को पढ़ते हुए दो कवि व्यक्तित्वों को अगल बगल रखने को कहते हैं. एक है, यानी मुक्तिबोध: ‘सामाजिक स्तर पर एक नितांत सामान्य निम्न मध्य वर्गीय पारिवारिक प्राणी’. उसके लिए ‘कविता अलग से किसी साधना की चीज़ नहीं, बल्कि जीने की ही जटिल प्रक्रिया का ही एक सहज अंग है.’  दूसरी तरफ  ‘आत्मनेपद’ से उभरता है एक शब्दसाधक ‘एस्थीट’ अथवा सौंदर्यजीवी का रूप. वह एक ‘दायरे में जीवन से पूरी तरह संसक्त होते हुए भी अपने रचना जगत में सर्वथा निःसंग है.’

नामवरजी भी कोई कम बड़े शब्द साधक नहीं. साहित्य अगर शब्द साधना नहीं तो कुछ भी नहीं. बेगुसराय के उनके एक व्याख्यान का जिक्र नंदकिशोर नवल प्रायः किया करते थे जिसमें ‘क्रांतिकारी’ साहित्यकारों को झिड़की देते हुए उन्होंने कहा था, ‘जो दो वाक्य सुंदर नहीं बना सकते वे समाज क्या ख़ाक सुंदर बनाएँगे!’ लेखक या साहित्यकार होता ही शब्दसाधक है. यही तो उसका कार्य है, अगर हम कर्तव्य नहीं कहना चाहते मुक्तिबोध के कारण. मुक्तिबोध कर्तव्य के मोहल्ले के वासी नहीं बने रहना चाहते, वे कार्य के विस्तृत मैदान में विचरण करना चाहते हैं. मुक्तिबोध के सम्पूर्ण जीवन का कार्य व्यापार अगर शब्दों की साधना नहीं, सौंदर्य का संधान नहीं तो और क्या है! नामवरजी की समीक्षा में मात्र यह एक वाक्य है जिसमें मुक्तिबोध का महत्त्व स्थापन करने के लिए वे अज्ञेय पर आक्रमण आवश्यक मानते हैं.

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समाज और व्यक्ति की लयतालता

मुक्तिबोध शृंखला : 8

कवि अपने जीवन में एक ही कविता बार-बार लिखता रहता है, जैसे कथाकार एक ही कहानी कहता है. मुक्तिबोध की खोज क्या है जो उनकी हर कविता, कहानी, निबंध, आलोचनात्मक निबंध में अनवरत चलती रहती है? क्या वह सम्पूर्णता की तलाश है? क्या वह एक विशाल जीवन (जिसे वे एक जगह immense लिविंग कहते हैं) की खोज है, उसे जीने के उसूल और तरीके का पता करने की तड़प है? विशाल जीवन या भरपूर ज़िंदगी! वह क्या है?

भरपूर ज़िंदगी या परिपूर्ण जीवन वह है जो मानवीय अनुभवों की विविधताओं से बुना गया हो? जो इकहरा न हो, जो कह सके कि हाँ! मैंने दुनिया देखी है. देखी ही नहीं, उसे अपनी हड्डियों और खून में महसूस भी किया है. ज़िंदगी को देखना, भोगना एक चीज़ है और उसके साथ मायने के रिश्ते बनाना अलग चीज़. ऐसा रिश्ता जिसमें वह ज़िंदगी भी आपसे मायने हासिल करती है.

“मानव जीवन-स्रोत की मनोवैज्ञानिक तह में” मुक्तिबोध इस विशालता के रास्ते में रुकावट मानते हैं उस अंतर को जो जीवन और जगत के बीच है. क्या इसका मतलब यह है कि जगत को मेरा जीवन हो जाना चाहिए या मेरी ज़िंदगी का फैलाव इतना हो कि उसमें दुनिया के होने का गुमान हो? फिर जगत है क्या?

“क्या यह जगत केवल बाज़ार की सडकों पर घूमनेवाले, खरीदने के लिए आतुर जन-समुदाय, या सरकारी दफ्तरों में बैठनेवाले कृत्रिम महान् मनुष्यों तक ही सीमित है? इनसे बाहर, इनसे परे क्या जगत का फैलाव नहीं है?”

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चाहिए मैत्री भाव का पाथेय

मुक्तिबोध शृंखला:7

मुक्तिबोध को जो स्नेह और आदर अपनी 47 साल की मुख़्तसर-सी ज़िंदगी में मिला, उससे किसी भी लेखक को  ईर्ष्या हो सकती है. वार्धक्य, आयु आदि को लेकर मुक्तिबोध के समय की समझ के मुताबिक़ वे बुजुर्ग हो चुके थे. आज 2021 में यह सोचकर आश्चर्य ही हो सकता है कि अपने चौथे दशक में ही उस वक्त के लेखक भी किस तरह खुद को प्रौढ़ मानने लगते थे. लंदन से लौटे नौजवान सज्जाद ज़हीर और मुल्कराज आनंद से प्रेमचंद की बातचीत याद आती है. वे ठहरे नौजवान और प्रेमचंद बूढ़े, उनके साथ दौड़ने पर कहीं उनके घुटने न फूट जाएँ! यह वयस-बोध उस वक्त की खासियत है. “मैं अकेला, देखता हूँ आ रही मेरे दिवस की सांध्य वेला.” निराला की उम्र इस कविता के समय आखिर कितनी थी?

उम्र के इस अहसास को समझना आज ज़रा मुश्किल है क्योंकि युवापन काफी लंबे समय तक हम सब पर हावी रहता है. एक बड़ा तबका खुद को प्रौढ़ मानने से इंकार करता रहता है. यह भी कह सकते हैं पिछली जिसे हो जाना चाहिए, वह पीढ़ी आसानी से जगह छोड़ने को तैयार नहीं होती. लेकिन मुक्तिबोध जल्दी ही आदरणीय के रूप में प्रतिष्ठित हो गए थे. तरुणों में उन्हें लेकर जो आदर था, वह उनके समवयसी लेखकों में भी था.

नरेश मेहता का 1957 का पत्र है. मुक्तिबोध की मृत्यु उनसे 7 वर्ष दूर है. नरेश मेहता नागपुर के उनके साथ गुजारे गए दिन याद करते हैं और उन्हें भी:

“पता नहीं कि आपमें वह कहाँ और कौन-सा आदर्श उत्स है जिसे धार कर आप गजानन नहीं गंगाधर हो जाते हैं और कदाचित् इसीलिए पहाड़ों में हिमालय, देवों में शंकर और समकालीन लेखकों में गजानन के प्रति ही मेरा मस्तक नत हो जाता है…”

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ज्ञान की सरहद को तोड़ना

मुक्तिबोध शृंखला 6

आलोचना आत्मपरकता से मुक्त दीखना चाहती है. भावना मुक्त. पसंद-नापसंद से परे वस्तुनिष्ठता की खोज. है तो लेकिन वह आखिर देखने की एक क्रिया. देखने का यह व्यापार क्या ‘दर्शक कौन है?’ के प्रश्न को परे कर सकता है? क्या यह देखनेवाले के कद पर निर्भर है? उसका फैसला कौन करेगा? क्या जो देखता है क्या खुद को देखते हुए देख सकता है? यानी जब हम दीखनेवाली वस्तु का वर्णन कर रहे हैं तो क्या अपने बारे में भी कुछ बता रहे हैं?  जो देखता है, वह दीखता भी तो है!

मुक्तिबोध की ‘साहित्यिक की डायरी’ को नामवर सिंह ने ठीक ही ‘एकालाप और संलाप’ कहा है. आप मुक्तिबोध को खुद से बात करते हुए देख, सुन सकते हैं. जो निबंध या टिप्पणियाँ ‘साहित्यिक की डायरी’ में संकलित हैं वे मात्र साहित्य के बारे में मुक्तिबोध के कतिपय निष्कर्ष नहीं हैं, वे साहित्य के विषय में सिद्धांत निरूपण भी नहीं. हालाँकि उसके सूत्र इनमें मौजूद हैं. विचार की प्रक्रिया में पाठक को शामिल करने की इच्छा इनके पीछे है. या शायद वह भी नहीं. यह एक तरह की विचार सजगता है. लेखक खुद अपनी विचार प्रक्रिया की ‘एम आर आई’ कर रहा है. आपके सामने फिर जो है वह इसकी तस्वीर है. इसलिए अलग-अलग टिप्पणियों में पूर्णता की तलाश व्यर्थ है. अपूर्णता या तदर्थता इनका स्वभाव है.

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ज्ञान के दाँत और ज़िंदगी की नाशपाती

मुक्तिबोध शृंखला : 5

“मुझे समझ में नहीं आता कि कभी-कभी खयालों को, विचारों को भावनाओं को क्या हो जाता है! वे मेरे आदेश के अनुसार मन में प्रकट और वाणी में मुखर नहीं हो पाते.”

यह क्या सिर्फ मुक्तिबोध का ही संकट है? हम सबके साथ यह होता है कि प्रायः वह जो इतना स्पष्ट लगता है जब तक अव्यक्त है, मौक़ा आते ही सिफ़र में तब्दील हो जाता है. कारण क्या अतिरिक्त आत्म सजगता है? क्या अतिशय आत्म-समीक्षा है? ऐसी लगातार चलनेवाली समीक्षा जो मन में उठनेवाले हर खयाल, हर भावना की चीरफाड़ करती रहती हो और उसे मुखरता के योग्य ही न पाती हो?

मुक्तिबोध इस आरोप को स्वीकार नहीं करते. वे इस असमंजस या अनिर्णय के लिए मन को जिम्मेदार मानते हैं जो अपने भीतर डूबा नहीं रहता, बल्कि एक नेपथ्य-संगीत का आयोजन करता चलता है. मन के नेपथ्य की यह कल्पना बहुत दिलचस्प है. नेपथ्य में चलनेवाला व्यापार मन के मंच पर चल रहे कार्य व्यापार में हस्तक्षेप करता है या उसे पूर्ण करता है? नेपथ्य में एक अलगाव है. वह जो आपसे अलग है लेकिन जुड़ा हुआ भी. इस नेपथ्य के प्रति संवेदनशील रहना आवश्यक है. वरना जो व्यक्त होगा, वह किसी के अभाव में पूर्ण या न्यायसंगत न होगा:

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The Tarun Tejpal Judgement – where do we go from here? Abhinav Sekhri

Guest post by ABHINAV SEKHRI

In a 2013 opinion piece, Professor Pratiksha Baxi wrote about the injustice that victims of sexual assault have historically suffered at the hands of the criminal process in India, reminding us that even those cases which forced our laws to change were stories of sexual assaults never proven before the eyes of law. That opinion piece was written in the wake of allegations in the case registered as State v. Tarun Tejpal, where on 21.05.2021, the Court of the Additional Sessions Judge at Panaji acquitted the accused on all charges, i.e. for alleged commission of offences under 376(2)(f), 376(2)(k), 354, 354A, 354B, 341, and 342 of the Indian Penal Code 1860.

The judgment has been critiqued on the court’s consideration of the victim’s testimony [see, for instance, here, here and here]. It appears that an appeal has been filed by the state challenging the acquittal, where the High Court has initially directed that sections of the judgment ought to be redacted as they reveal the identity of the victim.

This post does not attempt a microscopic review of the merits of the case, not only because an appeal is pending, but also because the judgment does not give a clear conspectus of the entire evidence on record to allow for such an exercise. Instead, while making some broad observations on the judgment (to the extent possible based on the evidence extracted) it brings up three issues that the judgment throws into sharp relief: (i) appreciating evidence, with a focus on witness credibility and the handling of inadmissible evidence at trial; (ii) consideration of digital evidence from victims in sexual assault cases, and; (iii) consequences of “bad” orders on the system itself.

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कितनी कठिन है न्याय्य मैत्री!  

मुक्तिबोध शृंखला:4

“जगत और जीवन में अंतर इतना! मनुष्य की अपनी आतंरिक मौलिक प्यास क्या यों ही अँधेरे में रह जाए सिसकती सी?”

“मानव जीवन-स्रोत की मनोवैज्ञानिक तह में” नामक निबंध में मुक्तिबोध मनुष्य की ‘अपनी आतंरिक मौलिक प्यास’ के न बुझ पाने का सवाल उठाते हैं. उन्होंने निश्चय ही कार्ल मार्क्स की “1844 की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपि” नहीं देखी है. लेकिन जगत और जीवन में जो अंतर वे कर रहे हैं, वह वही है जिसे मार्क्स हमारे वक्त की सारी व्याधियों की जड़ मानते हैं. यह अंतर एक अलगाव पैदा करता है. अजनबीयत. यह दुनिया पराई-सी जान पड़ती है और अपनी खुदी भी अलग हो गई मालूम होती है. एक समय के बाद मैं खुद को नहीं पहचान पाता.

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हार्दिक अंधकार की आँखें

मुक्तिबोध शृंखला : 3

“न नेमि बाबू, इस प्रकार तो काम नहीं चलने का. आखिर frustration है तो रहे, वह इतनी बुरी चीज़ नहीं जितना उसका gloom. …पर ज़रा सोचिए तो सही. कि ज़िंदा रहने का हक तो हमें है ही.”

मुक्तिबोध नेमिचंद्र जैन को हौसला दिला रहे हैं. उन दोनों के बीच पत्राचार में ऐसे मौके कम दीखते हैं. नेमिजी को वे गुरु मानते हैं. उन्होंने उन्हें मार्क्सवाद में दीक्षित किया है. मुक्तिबोध के पत्रों से नेमिचंद्र जैन की तस्वीर एक गंभीर ज्येष्ठ की उभरती है जो मुक्तिबोध के भीतर के उबलते लावा को पी रहा हो. यहाँ वे उन्हें हिम्मत दिला रहे हैं. इस पत्र का संदर्भ देने की आवश्यकता मुक्तिबोध रचनावली के संपादक नेमिचंद्र जैन ने महसूस नहीं की. क्या यह तार सप्तक के प्रकाशन के बाद उनपर हुए आक्रमण के कारण है? मुक्तिबोध के किसी निकटस्थ ने अपने संस्मरण में, यहाँ तक कि नेमिजी ने भी यह नहीं बताया.

हमारा मकसद इस पत्र के संदर्भ के संधान का नहीं है. अपने ज़िंदा रहने के हक पर जोर देते हुए मुक्तिबोध आगे अपने मित्र को समझाते हुए लिखते हैं,

“…लोग हमारी वैलिडिटी नहीं मानते तो न मानें. अभी हमने किया ही क्या है? हम अभी पुस्तक के भाव हैं — अलिखित पुस्तक हैं. अभी से उसपर आलोचना कैसी?”

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मुक्तिबोध के ‘नौजवान का रास्ता’

मुक्तिबोध शृंखला:2

“मैं कुछ शिकायत करना चाहता था इस दुनिया के खिलाफ लेकिन मैं रुक गया, सोचते हुए कि आखिर मैं अपने को दुनिया से अलग क्यों मान लूँ. दुनिया का खाकर, दुनिया का पीकर, दुनिया के मनुष्य से प्रेम कर, उससे अलग समझना अपने स्व को ज़रूरत से अधिक ऊँचा रखना है—दुनिया ने हमको बनाया, अब हमीं दुनिया को बनाएँगे.”

‘आधुनिक समाज का धर्म’ नामक टिप्पणी की शुरुआत यों होती है. यह आत्मविश्वास कि हम इस दुनिया को बना सकते हैं इस विनम्रता से संयमित किया जाता है कि उसके साथ ही खुद को बनाने की जिम्मेवारी भी है. उसके साथ पहली शर्त इस ज़िंदगी से मोहब्बत. ‘नौजवान का रास्ता’ के आरम्भिक अंश की पंक्तियाँ हैं,

“ज़िंदगी बड़ी खूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं. अच्छे आदमी क्यों दुःख भोगें—इतने नेक और इतने अभागे. दुनिया में बुरे आदमियों की संख्या नगण्य है, अच्छे आदमियों के सबब ज़िंदगी बहुत खूबसूरत चीज़ है, वह जीने के लिए है, मरने के लिए नहीं.”

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Legendary freedom fighter HS Doreswamy is no more

Doreswamy

Legendary freedom fighter and Civil Rights activist Harohalli Srinivasaiah Doreswamy popularly known as HS Doreswamy breathed his last yesterday.

The 103 year-old Gandhian, who kept the ‘conscience of Karnataka till his very last breath, and was the tallest public intellectual, who appeased none and spared none‘ would be remembered for his enthusiasm for public causes till he remained alive

Born on 10 April 1918 in Harohalli village in the then princely state of Mysore, he was jailed for the first time during Quit India movement – for his association with a group involved in making bombs and who spent 14 months of his life then – never stopped working for people even after independence.

In 1975, he had even challenged the then prime minister Indira Gandhi when emergency was declared, civil liberties stood suspended and who faced jail under the draconian Defence of India rule.

One of the issues closest to his heart remained getting land rights for the poor and the landless.

Before the first wave of Covid 19 struck he has been a prominent figure at protests against the controversial Citizenship Amendment Act (CAA) and has been openly critical of BJP-led central government’s policies.

He was cremated with state honours but it was clear as mirror that the BJP government in Karnataka always felt uncomfortable with his presence.

A year before last a leading BJP legislator had hurled choicest abuses at this legendary freedom fighter, and when the issue was raised in the Karnataka assembly, forget issuing any unconditional apology for his remarks the legislator not only remained adamant but received support from many of his colleagues.

मुक्तिबोध : हृदय के पंख टूटने पर

यह मुक्तिबोध की जन्मशती नहीं है. कोई ऐसा अवसर जिसके बहाने कवि या रचनाकार पर वार्ता फिर से शुरू करने का आयोजन किया जाए. एक तरह से यह मुक्तिबोध को असमय, बिना किसी प्रसंग के पढ़ने का निमंत्रण है. हर दूसरे दिन हम मुक्तिबोध के साथ हाजिर होंगे.

मुक्तिबोध शृंखला;1

प्रिय नेमि बाबू,

आपका पत्र नहीं. समय का भाव नित्य से अधिक ही होगा. पर याद आपकी आती रहती है. आजकल धूप अच्छी खिलती है और मन तैर तैर उठता है, और आपकी याद भी इसी सुनहले रास्ते से उतर आया करती है.”

देखा अक्टूबर का ख़त है. 26 अक्टूबर,1945 का. शारदीया धूप ही रही होगी? सोचता हूँ, मुक्तिबोध को “अँधेरे में” लिखने में अभी वक्त है. कोई 13 साल बाद वे इस कविता को लिखना शुरू करेंगे. और फिर उनकी याद से धीरे-धीरे यह धूप, यह सुनहली धूप पोंछ दी जाएगी. मुक्तिबोध अँधेरे के कवि रह जाएँगे. भीषण, भयंकर के भावों के.

उस युवा कवि का, लेखक का अपने मित्र को उसका पत्र न मिलने पर दिया गया उलाहना आगे पढ़ता हूँ. धूप ने उसके मन को रंग दिया है.

“गो मैं यह सोचता हूँ कि यह सब गलत है. दिन के बँधे हुए कार्य को अधिक बाँधकर करने के पक्ष में रहते हुए भी कामचोरी से दिली मुहब्बत टूट नहीं पाती. मैं मानता हूँ कि कर्तव्य ही सबकुछ है. … क्या ज़रूरी है कि कर्तव्य किया ही जाय और उस समय आनेवाली आपकी याद को बाहर खड़ा रखकर मन के दरवाज़े को बंद कर दिया जाय.”

यह कर्तव्य है रोज़मर्रा की ज़िंदगी को पटरी से लगाए रखने का कर्तव्य. जो आदमी को धीरे धीरे घिस डालता है और उसे औसतपन की सतह से बाँध देता है. इससे कैसे छुटकारा पाएँ?

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triumphalist torturers: or, life in kerala is no breeze

[Buffeted by many kinds of emotions, unable to think straight, eyes and mind clouded again and again with tears and the most tenebrous, threatening emotional clouds — this state of mind has been constant in me since many months. I have not been able to compose myself enough to write political commentary in these tumultuous times on Kafila, as I have always done. Not just because of the disease. I increasingly feel as if I am on my last journey, a forbidding one on a narrow, winding, rough, path up a hill, walking without being able to look left or right, unable to turn or help companions falling on the way behind me. Like Yudhishtira, maybe, but without knowing what lies beyond this mountain path up there.

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Molehills from mountains and other stories from kerala

Recently, on fieldwork in a peri-urban panchayat in Kerala devastated by illegal large-scale granite quarrying, a local resident pointed us to what looked like a hillock. It was covered with vegetation — and flowers of a pleasant lilac — which made a very pretty sight — and to the naked eye, looked as solid as any other hillock in the peripheries of the Western Ghats. “This hillock,” he clarified, “is actually just a heap. It is the earth loosened by quarrying, heaped up here over a long time. Because it is overgrown by weeds, we think it is a verdant hill.” Far from being the latter, he said, it poses a serious danger to the neighborhood. “A spell of really heavy rain can bring it down and just imagine what will happen to the houses below?”

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The gender between men’s legs and other learnings from a college in kerala

Over the past one year, I have been trying to make a college in Kerala – in a women’s college in Kerala– take some action against one of their faculty members who rained abuse on me publicly, including a public assertion about his possession of a penis, at a seminar in which I was an invited guest. This happened in November 2019.

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The Pride of piecemeal engineering : An open letter to the wcc

Dear Friends at the WCC

Seared by the news this morning, and knowing well that all of you are as burned as I am by it, I let my mind wander to graze and find its own source of comfort. It wandered, to my surprise, to a completely unexpected place: to some writings of a well-known philosopher of science, Karl Popper. More specifically, to Karl Popper’s vision of social intervention, which he called ‘piecemeal engineering’. Put very simply, ‘piecemeal engineering’ refers to taking small, even modest, cautious, self-critical steps towards some desired social goal of fighting a ‘concrete social evil’.

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A history of conservative strike on books

Even in a future in which books are outlawed, ideas cannot be vanquished.

Nazi's Boook burning

“You may burn my books and the books of the best minds in Europe, but the ideas those books contain have passed through millions of channels and will go on,” wrote Helen Keller, in An Open Letter to German Students in 1933. Keller’s How I Became a Socialist was on the list of books to be burned. “History has taught you nothing if you think you can kill ideas. Tyrants have tried to do that often before, and the ideas have risen up in their might and destroyed them,” she wrote.

Today you cannot perhaps have campaigns like Nazi’s book burnings, nor can books disappear off the shelves as they did in the United States during the McCarthy era. Yet the powers that be have thought of ingenious ways to stop people from reading books.

A recent order by the department of education in Britain needs to be seen in this context. It has ordered schools in England to stop accepting funds from groups or organisations which have expressed the desire to end capitalism. Anti-capitalism is seen by the department as an “extreme political stance”, similar to opposing freedom of speech, anti-Semitism and endorsing illegal activities.

( Read the full text here)

Over 10,000 Feminist groups and individuals condemn gangrape and murder of dalit woman in hathras

Received via SAHELI WOMEN’S RESOURCE CENTRE

We condemn the horrific rape and murder of a young Dalit woman from Hathras, UP.

We stand with the family in their sorrow. Extend support, solidarity and rage.

We demand immediate action against the state officials responsible for mishandling the case, destroying key evidence, and further traumatising the family and community.

SHAME ON THE STATE THAT STANDS WITH THE GUILTY.
SHAME ON THE STATE THAT INCREASES THE IMPUNITY WITH WHICH UPPER CASTE FORCES COMMIT VIOLENCE AND HATE CRIMES.

Today, over 10,000 people from all walks of life, cutting across caste, religion, gender, occupation and community came together from almost every state in India and more than a dozen countries across the world such US, UK, Canada, Australia, UAE, Hong Kong, Japan, Nepal, Netherlands, Sweden, Slovenia etc to demand justice for the heinous rape, brutalising attack and murder of a young Dalit woman from Hathras.

In a sharp statement condemning the incident, they got together to say thatdespite a continuing saga of countless other cases of brutal sexual assault and murders especially of young Dalit women the conscience of this nation does not seem to be shaken enough to do anything serious to stop the systematic targeting of women, Dalits and the poor.

While there is a historicity to these incidents, but under CM Yogi’s rule, Uttar Pradesh has only gone from bad to worse. Crimes against women and Dalits have increased, and police have been given unlimited powers without any accountability. Today UP tops the charts for atrocities against Dalits, it also tops the charts for crimes against women.

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बेटी बचाओ का नारा देने वाले बलात्कारियों को बचाने में लगे हैं – यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएँ

Statement by WOMEN AGAINST SEXUAL VIOLENCE AND STATE REPRESSION on Hathras and other cases in UP

यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएँ (WSS)  उत्तर प्रदेश में महिलाओं पर बढ़ रही यौन हिंसा पर चिंता व्यक्त करती है। पिछले दिनों हाथरस और बलरामपुर में दलित लड़कियों के साथ हुए बलात्कार और हाथरस के पूरे मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस और प्रशासन की लापरवाही और बलात्कारियों को फायदा पहुंचाने वाली कार्यवाही, जिसमें रातों रात पीड़िता के शव को जलाना भी शामिल है, की कड़े शब्दों में निंदा करते करते हैं। 

हाथरस के जघन्य बलात्कार और हत्या की घटना पर रोष व्यक्त करते हुए WSS का कहना है कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं और उसमे भी दलित समुदाय की महिला की कोई सुनवाई नहीं है।

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NEP 2020 – elitist and corporatized education under Hindu Rashtra

This study of the National Education Policy 2020, apart from my own  analysis, draws on extensive commentary on the final document and its earlier drafts, by education policy experts and teachers, including my own union,  JNU Teachers’ Association, which undertook a detailed critique of the Draft NEP 2019.  This needs to be said because neither educationists nor academics were consulted in the process of making the initial policy, nor were states, despite the fact that education is a concurrent subject. We begin therefore with the procedure of finalizing the NEP 2020.

Faulty procedures of formulating and finalizing the policy

No consultative process

All previous education policies have undergone massive consultation processes, as Niraja Gopal Jayal outlines, but not this one. At the press conference announcing the policy, Gopal Jayal points out, it was claimed that an “unprecedented collaborative, inclusive, and highly participatory consultation process” was conducted, but it is clear from the single slide that was shown, that states were not consulted at all.

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Has Indian democracy been facebooked ?

Those who disagreed that the internet would challenge dictatorships have been proven right.

facebook India

Belarus-born American writer Evgeny Morozov, a scholar of the political and social implications of technology, is among the early technology sceptics whose words have now proved prescient. Morozov had questioned the claim that the internet would challenge dictatorships even at an inconvenient time to do so. While thousands were out on streets during the Arab Spring, he delivered a Ted Talk on How Internet Aids Dictatorships. Considering that the Arab Spring protests had been organised and coordinated through social media, it quite a brave, even blasphemous, thing to do in those days.

Morozov’s 2011 book, The Net Delusion: The Dark Side of Internet Freedom, focuses on two delusions, namely, “cyber-utopianism” or the belief that the internet fosters an inherently emancipatory culture; and “internet-centrism” or the belief that every important question about modern society and politics can be framed in terms of the internet. His views were considered eccentric for the mood around the net was celebratory at the time. To cite another instance, the noted journal, MIT Technology Review, wrote in 2013 that new technologies would prove “deadly to dictators”. 

( Read the full text here)

The ‘Ecopolitical’ Imperative and the Janta Parliament

 

Janta Parliament, Environment session – courtesy Let India Breathe

A journey of a thousand miles begins with a single step, goes an old Chinese saying.  In the present context, that single step – and an absolutely essential step – for reclaiming the soul of India, is the coimng together of the social movements, non-party groups and the political parties – and this was accomplished in the six-day Janta Parliament held from 16-21 August as an online event. Organized by Jan Sarokar – a forum of 31 organizations and loose platforms ranging from Left aligned women’s organizations, National Alliance of People’s Movements (NAPM), National Campaign for Dalit Human Rights (NCDHR) and National Campaign for People’s Right to Information, to loose networks like Not In My Name – the people’s parliament managed to bring together many political parties together as well in the event. As a kind of base paper, Jan Sarokar had prepared a comprehensive 75-page document entitled ‘People’s Policy for Post-COVID 19 Times‘ covering important and urgent policy initiatives on practically every aspect of economic and social life. Attended by representatives of the Congress, the Left parties, the RJD and AAP among others, the people’s parliament session ended with the representatives of the parties present affirming support to the perspectives emerging out the resolutions adopted, which they felt could form the basis for a Common Minimum Programme not only for the political parties but also between parties and social / people’s movements. Continue reading The ‘Ecopolitical’ Imperative and the Janta Parliament