Category Archives: Bad ideas

Modi’s Meditation ‘Tour’

The art of legitimising religiosity in a secular country and live happily ever after.

Modi in KedarnathReligion is regarded by the common people as true, by wise people as false and by the rulers as useful. — Seneca (4 BC-AD65)

A picture is worth a thousand words.

An outgoing Prime Minister of the ‘world’s biggest democracy’ seen meditating under the glare of cameras in a cave specially opened for the occasion and with a dress stitched for the event, conveys many things simultaneously.

First and foremost, it tells us that the present incumbent to the post would at least be remembered for his varied sartorial tastes among the galaxy of PMs who headed the republic earlier. It appears that either all the others lacked the sense to dress for the occasion or found it a mundane job not befitting the post and the responsibilities they held then. Continue reading Modi’s Meditation ‘Tour’

नयी पेशवाई, पुरानी पेशवाई 

भीमा कोरेगांव संघर्ष: एक अन्तहीन लड़ाई ?

(उदभावना के आगामी अंक में प्रकाशन हेतु)

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Image : Courtesy – scroll.in

‘वे कौन लोग थे जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना में भरती हुए और जिन्होंने हिन्दोस्तां जीतने में ब्रिटिशों की मदद की ? मैं जो उत्तर दे सकता हूं और – वह काफी सारे अध्ययन पर आधारित है – कि वे लोग जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा बनायी गयी सेना में शामिल हुए वह भारत के अछूत थे। प्लासी की लड़ाई में क्लाइव के साथ जो लोग लड़े वे दुसाध थे और दुसाध अछूतों की श्रेणी में आते हैं। कोरेगांव की लड़ाई में जो लोग लड़े वे महार थे और महार अछूत होते हैं। इस तरह चाहे उनकी पहली लड़ाई या आखरी लड़ाई हो अछूत ब्रिटिशों के साथ लड़े और उन्होंने हिन्दोस्तां जीतने में ब्रिटेन की मदद की। इस सच्चाई को मार्केस आफ टिवडलीडेल ने पील आयोग के सामने पेश अपनी नोट में रेखांकित किया है, जिसका गठन भारतीय सेना के पुनर्गठन के बारे में रिपोर्ट तैयार करने के लिये 1859 में किया गया था।

ऐसे कई हैं जो अछूतों द्वारा ब्रिटिश सेना में शामिल होने को देशद्रोह का दर्जा देते हैं। देशद्रोह हो या न हो, अछूतों की यह कार्रवाई बिल्कुल स्वाभाविक थी। इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा है कि किस तरह एक मुल्क के लोगों के एक हिस्से ने आक्रमणकारियों से सहानुभूति दिखायी है, इसी उम्मीद के साथ कि आगुंतक उन्हें अपने देशवासियों के उत्पीड़न से मुक्ति दिला देगा। वे सभी जो अछूतों की आलोचना करते हैं उन्हें चाहिये कि वे अंग्रेज मजदूर वर्ग द्वारा जारी घोषणापत्रा को थोड़ा पलट कर देखें।’’

– अम्बेडकर

/लन्दन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन हेतु अम्बेडकर ने जो आलेख प्रस्तुत किया, जो बाद में ‘अनटचेबल्स एण्ड द पैक्स ब्रिटानिका’ नाम से उनकी संकलित रचनाओं में शामिल किया गया, उसमें उन्होंने यह बात कही थी।/

प्रस्तावना

स्मृति का वजूद कहां होता है ? और विस्मृति के साथ उसका रिश्ता कैसे परिभाषित होता है ?

कभी लगता है कि स्मृति तथा उसकी ‘सहचर‘ विस्मृति एक दूसरे के साथ लुकाछिपी का खेल खेल रहे हों। स्मृति के दायरे से कब कुछ चीजें, कुछ अनुभव, कुछ विचार विस्मृति में पहुंच जाएं और कब किसी शरारती छोटे बच्चे की तरह अचानक आप के सामने नमूदार हो जाएं इसका गतिविज्ञान जानना न केवल बेहद मनोरंजक बल्कि मन की परतों की जटिल संरचना को जानने के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है । यह अकारण ही नहीं कि किसी चीज / घटनाविशेष को मनुष्य कैसे याद रखता है और कैसे बाकी सबको भूल जाता है इसको लेकर मन की पड़ताल करने में जुटे मनीषियों / विद्वानों ने कई सारे ग्रंथ लिख डाले हैं । Continue reading नयी पेशवाई, पुरानी पेशवाई 

Thejus – The Death of a Daily Newspaper

[This is a GUEST POST by N P CHEKKUTTY]

 

It is rarely that a journalist writes about himself or herself, because they are supposed  to be detached observers of history-in-the-making. But this time I cannot help it because one of the things that happened in the Sabarimala-obsessed state of Kerala this week happens to be the demise of Thejas, a daily newspaper that I was associated with for almost 14 years. It was a death foretold over two and half months ago, but no one took notice and no one raised any serious concerns about the passing of a newspaper that existed in our civil society for over a decade. It is sad that the newspaper which was known for its fierce anti-Sangh Parivar positions leave the scene just a few months ahead of a general election that will decide the future course of this country. Continue reading Thejus – The Death of a Daily Newspaper

Hindutva Terror and Left Hegemony: After Women’s Entry into Sabarimala

Hours after the two women entered Sabarimala, the Hindu terrorists began their handiwork. Mad mobs, including women, began to roam the streets and attack by-passers, in their desperation to foment violence and provoke riots. In Karunagappally, Muslim establishments and shops were singled out for vandalism. The Sangh-backed Sabarimala Action Council called for a hartal today and they have spared no effort to make sure that people are terrorized. Continue reading Hindutva Terror and Left Hegemony: After Women’s Entry into Sabarimala

50 Years Later, Shadow of Keezhvenmani Continues to Hover Over our Republic

December 25, 1968, termed as ‘Black Thursday’, saw the first mass crime against Dalits in independent India, who were fighting for respectable wages under the leadership of the Communist Party.

50 Years Later, the Shadow Keezhvenmani Continues to Hover Over our Republic

Image for representational use only; Image Courtesy : Socialist India

P Srinivasan, a veteran village functionary who cremates the dead had, in an interview done few years ago, described the darkening early morning on December 26, 1968, when the bodies began arriving from Keezhvenmani, a non-descript village in Thanjavur district of Tamil Nadu.

The village functionary, called Vettiyan, who is nearing 60 now, still remembered the number: “There were 42 corpses in all, horribly burnt and mangled. The stench was awful,” Pointing towards the plot of land where they were cremated, he said “All of them were Dalits, burnt to death in a caste clash. I cremated them on these very grounds.”

Srinivasan, then 23-year-old, shared vivid details of that ‘Black Thursday’ in 1968, a day that has remained etched in his mind.

December 25, 2018, completes 50 years of that ‘Black Thursday in 1968’, which is remembered as the first massacre of Dalits in independent India. The Dalits were martyred while fighting for respectable wages under the leadership of the Communist Party. All of these landless peasants had started to organise themselves into a campaign for higher wages following the increase in agricultural production in the area.

(https://www.newsclick.in/50-years-later-shadow-keezhvenmani-continues-hover-over-our-republic)

पवित्र गाय, त्याज्य लोग !

..बुलंदशहर की घटनाएं इस बात की ताईद करती हैं कि  हिंदुत्व वर्चस्ववाद का यह नज़रिया जिसमें मानवीय जीवन के प्रति गहरी असम्वेदनशीलता और असम्पृक्तता  टपकती है और जो एक चतुष्पाद को पूजनीय बनाती है, आज उरूज पर है।..

( Photo Courtesy : indianculturalforum.in)

कभी कभी एक अदद वक्तव्य किसी नेता की एकमात्र निशानी बन कर रह जाती है। विश्व हिन्दू परिषद के नेता गिरिराज किशोर इसका क्लासिकीय उदाहरण कहे जा सकते हैं जिनका नाम लेने पर अक्सर उनका विवादित वक्तव्य ही लोगों की जुबां पर आ जाता है। याद है कि उन्होंने कहा था कि ‘‘पुराणों में गाय को मनुष्य से अधिक पवित्रा समझा गया है।’’

वह अवसर बेहद शोकाकुल करनेवाला था, जब उनका वह वक्तव्य आया था। दिल्ली से बमुश्किल पचास किलोमीटर दूर दुलीना नामक स्थान पर पांच दलितों की भीड़ द्वारा पीट पीट कर हत्या कर दी गयी थी Continue reading पवित्र गाय, त्याज्य लोग !

വിട, IFFK! വിട, ബീനാ!

പ്രിയ ബീനാ

IFFK എന്ന പ്രസ്ഥാനത്തിനോട് വിട പറയാൻ സമയമായിയെന്ന് തോന്നുന്നു. ബീനയ്ക്ക് വേണം ഈ വിടവാങ്ങൽ കത്തെഴുതാനെന്നും തോന്നി. കാരണം ഇതിനെ ഒരു ജനകീയ പ്രസ്ഥാനമാക്കിയത് നിങ്ങളാണ്. ഇന്ന് അത് മറ്റൊന്നായി മാറിയിരിക്കുന്നു. ഇടങ്ങളെല്ലാം മാറിക്കൊണ്ടിരിക്കുന്ന ഈ കാലത്ത് ഇതു പ്രതീക്ഷിതമാണ്, അതുകൊണ്ട് ഇതു വ്യക്തിപരമായ കുറ്റപ്പെടുത്തലല്ല. Continue reading വിട, IFFK! വിട, ബീനാ!