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Do Not Speak of The Noose…

‘Festival rubs off scars’, claimed a newspaper report with picture of Muslim men distributing water and sweets to the Hindus celebrating Ram Navami. The place was Balu Math in Latehar. The scars were obviously of the murder of two Muslim men, one of them an adolescent by members of the local Gau Raksha Samiti.

‘Rub off your scars and do not complain’,Muslims are told after each incident of violence against them. Their insistence to talk about their wounds is seen as a sign of their grumbling nature, their love with their victimhood. Also a proof of their disaffection towards Hindus.

“…In the house of the hangman one should not speak of the noose, otherwise one might seem to harbour resentment.”,Theodore Adorno wrote while responding to criticism against his study of the sources of authoritarian personality in Germans in the post Hitler years. Continue reading Do Not Speak of The Noose…

हिंदुओं के खिलाफ क्यों लिखना?

“आप मुसलमानों के खिलाफ कभी कुछ क्यों नहीं लिखते?,यह सवाल अक्सर इस लेखक की तरह के कुछ लोगों से किया जाता है.इस प्रश्न में छिपा हुआ आरोप है और एक धारणा जिस पर यह पहला प्रश्न टिका हुआ है कि आप हिंदुओं के विरुद्ध लिखते हैं. इसका उत्तर कैसे दिया जाए?यह सच है कि अभी तक के लिखे की जांच करें तो प्रायः भारत में बहुसंख्यकवाद को लेकर ही चिंता या क्षोभ मिलेगा.इसके कारण उन संगठनों या व्यक्तियों की आलोचना भी मिलेगी जो इस बहुसंख्यकवाद के प्रतिनिधि  या प्रवक्ता हैं.क्या यह करना मुझ जैसे व्यक्ति के लिए स्वाभाविक है या होना चाहिए? भारत में बहुसंख्यकवाद हिंदू ही हो सकता है.कई हैं जो उनमें नहीं जो इस बहुसंख्यकवाद पर  बात करते वक्त तराजू के पलड़े बराबर करने के लिए ‘मुस्लिम सम्प्रदायवाद’की भी फौरन निंदा करना ज़रूरी समझें

नाम से मुझे हिंदू ही माना जाएगा, मैं चाहे जितना उसे मानने से इनकार करूँ. मेरी मित्र फराह नकवी ने एकबार मुझसे कहा था कि अगर फिरकावारना फसाद में फँसे तो तुम्हारा नाम तुम्हें हिंदू साबित करने के लिए काफी होगा और तुम्हारा भाग्य इससे तय   होगा कि तुम फँसे किनके बीच हो-हिंदुओं या मुसलमानों के. उस वक्त यह बहस कोई न करेगा कि मैं अभ्यासी हिंदू हूँ या नहीं,नास्तिक हूँ या संदेहवादी हूँ! Continue reading हिंदुओं के खिलाफ क्यों लिखना?

शाकाहार, मांसाहार और बुद्धि का अधिकार

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने लखनऊ में भीमराव आंबेडकर की जयंती के अवसर पर लखनऊ में हुए एक कार्यक्रम में प्रोफ़ेसर कांचा इलैया के वक्तव्य की रिपोर्ट प्रकाशित की है.रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि शाकाहार राष्ट्र विरोधी है: “मेरा राष्ट्र गोमांस खाने से शुरू होता है.दुर्भाग्यवश, हमने गोमांस खाना छोड़ दिया और इस कारण हमारे दिमाग अब बढ़ नहीं रहे हैं.” आगे उन्होंने कहा कि शाकाहार राष्ट्र को नष्ट कर देगा. शाकाहारी राष्ट्रवाद  के सहारे  हम चीन, कोरिया,जापान और अमरीका से प्रतियोगिता नहीं कर सकते जो पूरी तरह गोमांसाहारी हैं.

यह वक्तव्य आक्रामक है और उस समय के लिहाज से साहसी कहा जा सकता है जब गोमांस रखने और खाने के नाम पर लोगों को मारा जा रहा हो. अखबार ने बताया कि इस बयान पर काफी तालियाँ मिलीं.रिपोर्ट ने इसके साथ यह बताना ज़रूरी समझा कि  श्रोताओं में अच्छी संख्या दलितों की थी. Continue reading शाकाहार, मांसाहार और बुद्धि का अधिकार

हम कौन थे,क्या हो गए हैं, और क्या होंगेअभी….

(यह टिप्पणी पहले कैचन्यूज़ हिन्दी पर इस रूप में प्रकाशित हो चुकी है:http://hindi.catchnews.com/india/dg-vanzara-what-we-were-what-we-are-what-we-ll-become-1460646292.html)

पाकिस्तान का विरोध करते करते-करते हम कब उसकी शक्ल में ढल गए,पता ही नहीं चला.सबसे ताज़ा उदाहरण गुजरात के प्रख्यात पुलिस अधिकारी दह्याजी गोबरजी वनजारा के जमानत मिलने के बाद गुजरात वापसी पर उनके ज़बरदस्त स्वागत और खुद उनके तलवार-नृत्य का है. इस खबर से कुछ लोगों को पाकिस्तान में सलमान तासीर के कातिल मुमताज कादिर की फाँसी के बाद उसके जनाजे पर उमड़ी हजारों की भीड़ याद आ गई.

कादिर ने सलमान तासीर को इसलिए मार डाला था कि उनकी नज़र में तासीर ने इस्लाम और मुहम्मद साहब की शान में गुस्ताखी की थी.तासीर का कसूर यह था उन्होंने पाकिस्तान के ईश-निंदा क़ानून की आलोचना की थी और एक ईसाई औरत आसिया बीबी के पक्ष में बात की थी जिस पर ईश निंदा का आरोप था.इसके बाद कादिर ने तासीर को , जिनका वह अंगरक्षक था, गोलियों से भून डाला.

कादिर गिरफ्तार हुआ, उस पर मुकदमा चला जो खासा डरावना और नाटकीय था.कादिर को फाँसी की सजा सुनाने वाले न्यायाधीश ने फैसला सुनाते ही देश छोड़ दिया.उस अदालत पर पहले हमला भी हुआ.कादिर की एक तरह से पूजा होने लगी और जेल में वह एक धर्मोपदेशक बन गया.

कादिर की इस भयंकर लोकप्रियता के बावजूद पाकिस्तान ने उसे न सिर्फ फांसी की सजा सुनाई बल्कि फांसी दे भी दी. इस सजा का हम सैद्धांतिक आधार पर विरोध कर सकते हैं,लेकिन इससे कम से कम यह जाहिर होता है कि पाकिस्तान अपने क़ानून के पालन को लेकर गंभीर है और अपराध को नतीजे तक पहुंचाता है.इसके पहले भी पाकिस्तान में कादिर की तरह के और लोगों को भी सजा दी गयी है. Continue reading हम कौन थे,क्या हो गए हैं, और क्या होंगेअभी….

प्रिय बेला: महताब आलम

अतिथि लेखक: महताब आलम

प्रिय बेला,

आपका ख़त (http://hindi.catchnews.com/india/i-will-not-leave-bastar-at-any-cost-1458658368.html)पढ़ा. पढ़कर बहुत ख़ुशी हुई और हिम्मत भी मिली। ख़ुशी इसलिए कि आप सही सलामत हैं और हिम्मत इसलिए क्योंकि जिस डर की हालत में बस्तर से मैं लौटा हूँ, उसमें आपका ख़त आशा की किरण है और यह सीख देता है कि हमें बिना डरे, हिम्मत के साथ अपना संघर्ष जारी रखना चाहिए।  संघर्ष हर प्रकार की हिंसा और उत्पीड़न के खिलाफ। संघर्ष शांति, न्याय और लोकतंत्र की स्थापना के लिए।

पिछले सप्ताह जब हम जगदलपुर में लगभग एक साल के बाद मिले थे तो आप कितनी खुश लग रही थीं! मुझे याद है और जैसा कि आपसे मैंने कहा था कि पिछली मुलाकात की बनिस्बत आप ज़्यादा तरोताज़ा और ऊर्जावान लग रही हैं जिसके जवाब में आपका कहना था कि, ” मैं बहुत ख़ुश हूँ क्योंकि वर्षों के संघर्ष बाद मैं वो कर पा रही हूँ जो करना चाहती थी।” आपने बताया था कि किस तरह  आप सिर्फ़ अकादमिक कामों से आगे बढ़कर, अपनी नागरिक ज़िम्मेदारी को निभाना चाहती थीं. यही आपने अपने पत्र में भी लिखा है:

“एक समय आया जब मुझे जरूरी लगने लगा कि मैं लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने में मदद करूं. मैं एक शोधकर्ता थी, और साथ में नागरिक भी. मैंने देश के अन्य राज्यों में भी जब-जब काम किया था, वहां भी यह जिम्मेदारी निभाई थी, तो बस्तर में क्यों नहीं? यह सोच कर मैंने आदिवासी लोगों के साथ उनके संवैधानिक हकों के लिए काम करना शुरू किया. मैं मानती हूं कि हमारे जैसे देश में जो लोग शिक्षित हैं उनकी समाज के प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती है.”

पर शायद बस्तर देश के दूसरे हिस्सों, खासतौर पर तथाकथित मेनलैंड की तरह नहीं है. बस्तर में अधिकार और संविधान जैसे शब्द  सिर्फ किताबों तक महदूद हैं. आपके ही शब्दों में कहूँ तो, “बस्तर में सरकार और माओवादियों के बीच युद्ध चल रहा है.” और ऐसी स्थिति में काम करना, ख़ासतौर पर जनता के संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ना,उसके बारे में लिखना और सच को उजागर करना और भी मुश्किल हो जाता है.और इसी मुश्किल काम को आप अंजाम दे रही हैं जो कि सराहनीय होने के साथ-साथ साहसिक भी है.  Continue reading प्रिय बेला: महताब आलम

Bhagat Singh: Bharat Bhakt or Inquilabi?

For nearly 90 years, India has been living in nostalgia of an iconic youth – Bhagat Singh. A sense of loss informs our discourse on Bhagat Singh. We keep turning to him and Subhas Chandra Bose again and again as sources of deliverance from the ills that India has been suffering. It’s too heavy a burden on him considering that Singh was just 23 years old when he was hanged.

Bhagat Singh is seen as the ultimate militant nationalist. Nationalism cannot do without militancy. It is believed that Mahatma Gandhi and his heir, the effeminate Jawaharlal Nehru, emasculated us and also conspired to remove two “real men” from the scene in Bhagat Singh and then Subhas Chandra Bose.

It is quite a different matter that Bhagat Singh did not want youth to emulate Bose. In the young Singh’s eyes, Bose was an emotional nationalist with a parochial outlook. He considered Bose dangerous for the youth as his rhetoric could arouse nationalistic passions easily. Continue reading Bhagat Singh: Bharat Bhakt or Inquilabi?

दुश्मन कौन है? : एक चिट्ठी विक्रम सिंह चौहान के नाम

अतिथि लेखक:सरोज गिरी और कमल नयन चौबे

प्रिय विक्रम सिंह चौहान जी,

हमने समाचार माध्यमों में आपके बारे में काफी पढ़ा है. आज के दौर में सब अपने बारे में सोचते हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि  आप इन सब से ऊपर उठकर देश के बारे में सोच रहे हैं. आपने जो कुछ भी किया, अपने लिए नहीं किया। शायद आपको यह लग रहा है कि  हमारे देश और समाज में ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जो नहीं होना चाहिए। आपके गुस्से में हम सिर्फ गुस्सा नहीं देखते हैं बल्कि ऐसा लग रहा है कि आप बहुत छटपटाहट में हैं, आप बेचैन हैं।जो हो रहा है वो आपको बिलकुल मंजूर नहीं है. जब टीवी पत्रकार आपसे पूछ रहे थे कि क्या आपने कन्हैया की पिटाई की है तो आपने इस बिलकुल ही इंकार नहीं किया। आपने और ओपी शर्मा दोनों ने यह कहा कि अगर आप लोगों को दुबारा ऐसा करना पड़े तो आप फिर से ऐसा करेंगे।

ऐसा लगता है कि आप जो कर रहे हैं उसमें आपका दृढ़ विश्वास है. शायद आप यह भी महसूस करते हैं कि  देश में बहुत दिवालियापन है,भ्रष्टाचार है और राजनीति में नेहरू-गांधी परिवार का वंशवाद हावी है. आपको यह भी लगता होगा कि  देश में ऐसा बहुत सा काम हो रहा है जो देश के खिलाफ है; और यहाँ जो अंग्रेजी बोलने वाले और सूट बूट पहनने वाले लोग हैं वे  सिर्फ अपने स्वार्थ की बात करते हैं. शायद आपको यह लगता है कि  ये लोग अपने ही देश के विरुद्ध हैं. अधिकांश लोग आपके द्वारा की गई हिंसा को गैरकानूनी मानते हुए इसकी निंदा कर रहे हैं , लेकिन हम सिर्फ इस आधार पर आपकी कार्रवाई को गलत नहीं मानते। इंसान कानून को बनता है न कि कानून इंसान को. इसलिए कानून का उल्लंघन किया जा सकता है. हम इंसानियत के नाते आपसे चंद बातें कहना चाहते हैं. Continue reading दुश्मन कौन है? : एक चिट्ठी विक्रम सिंह चौहान के नाम

सी पी एम की हिंसा भी हिंसा ही है,आर एस एस कार्यकर्ता की हत्या कोई न्याय नहीं है

दो रोज़ पहले केरल के कन्नूर में सुबह-सुबह पहली और दूसरी क्लास के बच्चों को स्कूल ले जाते हुए ऑटो-ड्राईवर ए वी बीजू को कुछ लोगों ने ऑटो से खींच लिया और उनपर चाकुओं और तलवारों  से हमला किया. बच्चे खौफ में देखते रहे कि उन्हें रोज़ सुबह स्कूल ले जाने बीजू को कैसे बेरहमी से काटा जा रहा है.बाद में खून के छीटों वाली पोशाक में आतंकित बच्चों को वापस घर ले जाया गया.

सौभाग्य से बीजू को हस्पताल ले जाया गया और वे बच गए. लेकिन यह भाग्य पिछले महीने अपने माँ-पिता के सामने काट डाले गए सताईस साल के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य पी. वी. सुजीत का नहीं था.वह बच नहीं सका. उस समय इसकी रिपोर्ट करते हुए स्क्रोल  और सत्याग्रह ने चेतावनी दी थी कि कन्नूर में होने वाली यह आख़िरी राजनीतिक ह्त्या नहीं है. बीजू भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं. Continue reading सी पी एम की हिंसा भी हिंसा ही है,आर एस एस कार्यकर्ता की हत्या कोई न्याय नहीं है

सुनो, सुनो: सुनने में श्रम है

कन्हैया ‘देशद्रोही’ से देश का दुलारा बन गया है.कल तक जो उसकी जान लेने को आमादा थे, आज उसे अपने भविष्य का नेता मान रहे हैं.ऐसा क्यों हुआ और कैसे?

ऐसा हुआ तो इसलिए कि इस बार कन्हैया को ध्यान से, गौर से सुना जा सका है. पहले कन्हैया की आवाज़ नारों के शोर में दब गई थी.आज हम टेलीविज़न चैनलों की आपाधापी में,उनके शोर शराबे में कन्हैया को सिर्फ देख नहीं रहे, सुन रहे हैं,सुनने की कोशिश कर रहे हैं.

सुनना एक सचेत क्रिया है. ‘सुनो, सुनो’, आप फुसफुसाते हुए गाँधी को सुनते हैं, जब वे उत्तेजित भीड़ को शांत करने की कोशिश कर रहे होते हैं. सुनने के लिए पहले उत्तेजना का शमन  आवश्यक है.उत्तेजित अवस्था में हम वह सुनते हैं, जो हमारे भीतर पहले से बज रहा होता है, हमारे अपने पूर्वग्रहों के कारण या कामनाओं के कारण. Continue reading सुनो, सुनो: सुनने में श्रम है

Umar Khalid, My Son

 ‘Umar is my son.’, I want to say. I have never met him. I do not know him. And yet, I want to claim him as my son. I do not have a son. All I have is a daughter. A daughter  fast approaching the age when young minds come into their own.  Omar is past that age. He is already an independent, autonomous mind. And  a heart bleeding for the oppressed of the earth, burning with rage for injustices against them, crying for  justice for them.

Umar is the son every parent should desire and be proud of. Because he is one who can disagree , who can have the courage to rebel against his parents, who can break free from the cage of identity his family or community or religion has built for him. Who can prove his humanity by transcending the boundaries others fear to cross. Continue reading Umar Khalid, My Son

A matter of Form

In extraordinary times, extraordinary measures need to be taken. And these are extraordinary times.  On Thursday when we heard these words coming from the highest seat of law, we heaved a sigh of relief. When the Supreme Court agreed to hear the bail petition of a young man, Kanhaiya, saying that “a citizen has come saying that his fundamental rights are under threat…” we felt safe.  We felt that the most ordinary, unarmed citizen of this country ,powerless before the might of a  state and defenceless before the viciousness of a mob ,had a place to go. That in this country the life and dignity of every single person matters. That concern and care for the  life and dignity of human beings survives in the otherwise soulless apparatus of the state. Continue reading A matter of Form

भारत माता की जय बोल

‘भारत माता की जय बोलो’, अचानक तिरंगा झंडा लिए नौजवानों का एक समूह शिक्षकों की सभा के पास आ धमका.  “मुझे माइक पर भारत माता की जय बोलने दो”, उसने धमका कर कहा.

टी वी चैनेल का  एंकर चीख कर सामने बैठे नौजवान से बोला: भारत माता की जय का नारा लगा कर दिखाओ.

मुझे रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यास ‘घर-बाहर’ का बिमला का पति निखिल याद आ गया. बिमला उससे खफा है क्योंकि वह जुनूनी बंदे मातरम का नारा लगाने से इनकार करता है. वह भारत माता जैसी किसी देवी की वंदना  करने से इनकार करता है. वह याद करता है कि उसके मास्टर साहब ने बताया था कि देश का मतलब पांवों के नीचे की ज़मीन नहीं, उसके ऊपर के लोग हैं. क्या जो भारत माता की जय का नारा लगाते हैं, उन्होंने इन करोड़ों-करोड़ लोगों की ओर आँख उठाकर भी देखा है, क्या वे उनके दुःख-दर्द के साझीदार हैं?

और मुझे फिर नेहरू याद आए. Continue reading भारत माता की जय बोल

दलाल स्ट्रीट और जे. एन. यू. : अपूर्वानंद

क्या जे.एन. यू.( जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय ) दरिद्रता या दरिद्र्तावाद की दलाल स्ट्रीट है? अगर एक प्रभावशाली संपादक और एक लोकप्रिय दलित चिन्तक की मानें तो यही उसका डी.एन.ए. है. वह लोगों के आत्म- निर्भर होने के खयाल के खिलाफ है. आत्मनिर्भरता का अर्थ क्या है? क्यों सारे दलित बराबरी के लिए पूंजीवाद नामक रामबाण को नहीं अपना लेते और क्यों वे बराबरी को जितना आर्थिक, उतना ही राजनीतिक और सांस्कृतिक मसला समझते हैं, इस पर बात कभी और की जा सकती है. इस पर भी कि क्यों ऐसा मानना खराब अर्थों में मार्क्सवादी होना है. भारत के मार्क्सवादी ही नहीं अनेक उदार लोकतांत्रिक विचारों वाले लोगों को पूंजी की शक्ति पर जो भरोसा था, उससे उबारने के लिए उन्हें दया पवार , नामदेव ढसाल, कुमुद पावड़े, शरण कुमार लिम्बाले, ओमप्रकाश वाल्मीकि जैसे लेखकों को अपनी कहानी सुनानी पड़ी. वह कहानी कितनी लंबी है, यह रोज़ ऐसे लेखकों की आमद से पता चलता है जो खुद को लेखक नहीं, दलित लेखक ही कहलाना चाहते हैं. अलग-अलग भाषाओं में कही जा रही यह कहानी पाठकों को ‘एक-सी’ लगती है. इन्हें पढ़ते हुए वे ‘दुहराव’ और ‘ऊब’ की शिकायत भी करते हैं. इन आख्यानों में ‘सर्जनात्मकता और कल्पनाशीलता की कमी’ मालूम पड़ती है. लेखक के अपने विशिष्ट व्यक्तित्व के दर्शन उन्हें नहीं हो पाते.

 

मार्क्स की शिकायत भी पूंजीवाद से यही थी, कि वह व्यक्ति को उसके अपने ख़ास व्यक्तित्व की सर्जनात्मक सम्भावना से ही वंचित कर देता है, कि वह उसे उसके आर्थिक व्यापारों में ही शेष कर देता है. मनुष्यता का बहुलांश सांस्कृतिकता उपलब्ध ही नहीं कर पाता. मार्क्सवाद मानवता को अपनी इस इस भीषण ट्रेजेडी को समझने और फिर एक सुखांत की कल्पना करने का आह्वान करता है. इस पर बहस आगे. क्यों उस सुखांत के संधान के लिए कम्युनिस्ट पार्टियां ही काफी न थीं, इस पर भी बात होनी चाहिए. अभी तो सिर्फ इतना ही समझने की कोशिश करनी है कि जे. एन. यू. पर ऐसा हमला क्यों! क्या जे.एन. यू. उस चिर-क्षुधित और चिर-असंतुष्ट पूंजीवाद की राह में पड़ा कोई रोड़ा है जो बांधों को ऊँचा-और ऊँचा करते, नदियों को पाटते, पर्वतों को चूर-चूर करते, जंगलों को निगलते, समुन्दर और जमीन को खोदते जाने कहाँ एक अदृष्ट की ओर भागा चला जा रहा है? वह पूंजीवाद वह गुलीवर है जिसे बाँधने की कोशिश करते सारे लोग लिलिपुटियों की तरह हास्यास्पद जान पड़ते हैं? क्या जे.एन.यू. ऐसे ही लिलिपुटियों को तैयार करने का कारखाना है?

जे. एन. यू. दरिद्रता के पैरोकारों की ही जगह नहीं, यह साबित करने के लिए दीपंकर गुप्ता और इला पटनायक के नाम काफी होने चाहिए. ये नाम इसलिए कि मीडिया इन्हें जल्दी पहचान लेगा. 1050 शब्दों और आधे मिनट की बाईट की आदत जिन्हें पड़ चुकी है उन्हें गंगा ढाबा के पत्थरों की किसी समाधान पर पहुंचे बिना अगली रात के लिए मुल्तवी हो जाने वाली शहरजाद की हजार रातों से भी लंबी बहसों को सुनने की न तो फुरसत है, न शौक ही. ये बहसें बेकार का शगल हैं जो कुछ उपयोगी पैदा नहीं करतीं. और मार्क्स भी दरअसल तलबगार है शौक का जो ज़रूरतों के बंधन से इंसान को आज़ाद करने का एक पागल सा सपना देखता है.

सारी ज़रूरतों के ऊपर एक ज़रूरत होती है संग-साथ की. नौजवान मार्क्स जे.एन.यू. के तालिबे-इल्मों के लिए लिखता मालूम पड़ता है, “ जब कम्युनिस्ट कामगार आपस में मिलते हैं, तो उनका फौरी मकसद होता है, प्रशिक्षण, प्रचार, वगैरह. लेकिन उसी पल वे एक नई ज़रुरत की भी ईजाद करते है, समाज की ज़रुरत की, और जो साधन मालूम पड़ता है, वह लक्ष्य में तब्दील हो जाता है. यह व्यावहारिक परिवर्तन सबसे ज़्यादा उजागर है फ्रांसीसी समाजवादी कामगारों के जमावड़ों में. तंबाकू,खाना और पीना,आदि अब लोगों के बीच रिश्ते बनाने का जरिया नहीं रह जाते हैं. संग-साथ, गप-शप, जिनकी मंजिल समाजियत है, उनके लिए अपने आप में काफी हैं. भाईचारा कोई नारा नहीं है, एक सचाई है, और इंसान की उदात्तता की चमक( रौशनी) उनके श्रम-जर्जर शरीरों से फूटती है.”जे.एन. यू. की रूह क्लासरूमों में नहीं बसती. वह जीवनानंद दास की चील की तरह खुले आसमानों में परवाज भरती है और अरावली की चट्टानों पर दम लेने को उतरती है. इंसान के तसव्वुर से जाने कितना पहले से पृथ्वी के पृथ्वी की शक्ल लेने की गवाह ये चट्टानें क्या निर्विकार रह पाती होंगी जब इन इंसानी सूरतों को कुछ फानी मसलों पर यों बहस करते सुनती होंगीं,मानो उन्हीं में सारी कायनात की मुश्किलों का हल छिपा है ? इन पाषाण-खंडों की तरह ही ये बहसें भी चिरंतन जान पड़ती हैं और उतनी ही बेकार.

छात्र संघ का चुनाव है और दो छात्र दल चुनावी तालमेल की बात करते हैं.दोनों ही वामपंथी हैं और मार्क्स को अपना आदि गुरु मानते हैं. तालमेल के लिए कुछ मुद्दों पर सहमति आवश्यक है. जे. एन. यू. की परिपाटी के मुताबिक़ रात को मीटिंग तय पाई जाती है. जब दोनों मिलते हैं तो एक का नेता दूसरे से पूछता है, “ तो पहले इसकी सफाई हो जाए कि आपकी नज़र में भारतीय राज्य का चरित्र क्या है?” बहस रात भर चलती है और पौ फटने तक बेनतीजा रहती है. समझौता नहीं हो पाता और दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं.

भारतीय राज्य के चरित्र से एक विश्वविद्यालय के छात्र संघ के चुनाव का रिश्ता? या इराक पर अमरीकी हमले या चीन के थ्येन आन मन चौक काण्ड के बारे में किसी की राय का छात्र संघ का अध्यक्ष या सचिव बनने या न बनने पर असर क्यों पड़ना चाहिए? यह सवाल जे. एन. यू. के ही शहर के दूसरे बड़े और कहीं पुराने विश्वविद्यालय में अचरज से पूछा जाता है और इस पर फिर हंसा भी जाता है. क्योंकि यहाँ और बाकी विश्विद्यालयों में छात्र संघ चुनाव वैसे लड़े जाते हैं जैसे उन्हें लड़ा जाना चाहिए. यह किसी ने नहीं पूछा, न लिंगदोह समिति ने और न जे.एन. यू. के छात्र संघ का चुनाव सालों तक रोक देने वाले उच्चतम न्यायालय ने, कि उनके पहले ऐसा हो सका था कि छात्र संघ का चुनाव सिर्फ हाथ लिखे पोस्टरों और छात्रों की सभाओं के बल पर साल-दर साल होता रहा, कि छात्रों के चुनाव-अधिकारी होते हुए भी बिना किसी खून-खराबे और पक्षपात के चुनाव होते रहे? चूँकि उन्होंने यह नहीं पूछा , उन्होंने जे.एन.यू. पर भी अपना सार्वभौम मॉडल थोपा,उससे सीखने की बात तो दूर रही!

यह जे. एन. यू. है जहां त्रात्स्कीवादी छात्र को सुनने भी सैकड़ों की तादाद में लोग इकट्ठा हो सकते थे. और इस भीड़ में छात्र ही नहीं अध्यापक भी हो सकते थे. यहाँ छात्र नेताओं को दास कैपिटल के हवाले देते सुना जा सकता था. और अगली सुबह दास कैपिटल से उद्धरण निकाल कर पोस्टरों पर यह भी साबित किया जाता था कि गई रात भाषण में मार्क्स को गलत पेश किया गया था.

जे. एन. यू. ने बनने के साथ ही दाखिले के लिए जो प्रक्रिया अपनाई उसने मुमकिन किया कि समाज के सबसे पिछड़े तबकों , सबसे पिछड़े इलाकों के नौजवान उच्च शिक्षा के ‘अभिजात’ अनुभव में साझेदारी करने आएँ. और इसलिए जब इस प्रक्रिया से छेड़छाड़ की कोशिश हुई तो जे. एन. यू. के छात्र लड़े. यह भी जे. एन. यू. में ही हो सकता था, और शुरू में ही कि लड़के और लडकियों के हॉस्टल मिले हुए हों और वे अजूबों की तरह एक दूसरे से न मिलें. ध्यान रहे कि इन छात्रों में ज़्यादातर वे थे जो ‘पिछड़े’ राज्यों से आए थे, जहां सामाजिक मेल जोल में यौन-संकोच अधिक है. फिर भी जे. एन. यू. में लड़कियों के साथ बदतमीजी की खबर शायद ही सुनी गई. एक छात्र ने ध्यान दिलाया , ये घटनाएं तब होना शुरू हुईं, जब छात्र संघ ठप्प पड़ गया था क्योंकि चुनाव रोक दिए गए थे.

स्वागत, यारबाशी जे. एन. यू. के डी. एन. ए. में हैं. जब बिहार से उदास होकर चंद्रशेखर दिल्ली आया तो जे. एन. यू. के पूर्वांचल और महानदी के कमरों ने उसका स्वागत किया. न सिर्फ उसके किशोर भैया ने, जयंत, नीरज लाभ ने भी. और बाद में न जाने कितने छात्रों ने उसे,जो जे.एन.यू.का छात्र नहीं था,इत्मीनान दिया. यह तो बाद की बात थी कि वह जे. एन. यू. का सबसे लाड़ला छात्र संघ अध्यक्ष बना.

जे. एन. यू. सिर्फ जे. एन. यू. में नहीं है. वह उनकी कोई न थी, जिसके साथ दिल्ली की सडकों पर दिसम्बर की एक रात बलात्कार किया गया, फिर भी जे. एन. यू. के छात्र निकल पड़े और राष्ट्रपति भवन का द्वार उन्होंने झकझोर डाला. दिल्ली इन नौजवानों के क्रोध से जगी और पहचानना मुश्किल हो गया कि इनमें कौन जे. एन. यू. है और कौन शहर. रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक ऐसे विश्वविद्यालय की कल्पना की थी जो चहारदीवारी में घिरा न हो. उसका सबसे सुंदर उदाहरण दिसंबर के वे दिन और रातें थीं जब जे. एन. यू. शहर के बीचोंबीच आ गया. तभी यह भी हुआ कि जे. एन. यू . के नौजवानों ने पुकारा और शहर उसके पास गया, मुनीरका की गलियों में युवा कदमों से कदम मिलाने की कोशिश करता हुआ, मुक्तिबोध के शब्दों में पश्चातपद. शहर को इसका इत्मीनान है कि वह जब पुकारेगा, कोई सुने न सुने, जे. एन. यू. उसे सुनेगा. इस भरोसे के आगे किसी विश्वविद्यालय को क्या चाहिए?

महात्मा की ह्त्या और हमारे बच्चे:नासिरुदीन हैदर खान

GUEST POST by Nasiruddin Haider Khan

किसी की हत्या की गई हो तो उसकी वजह भी होगी. महात्मा गांधी की भी हत्या की गई थी. जाहिर है, इसकी भी कोई वजह होगी. वैसे क्‍या वजह है? हम कह सकते हैं, 68 साल बाद क्या यह भी कोई सवाल है? ऐसा सवाल जिसका जवाब तलाशने की जरूरत हो?

पिछले दिनों उत्‍तरी बिहार के एक स्‍कूल में कुछ साथियों के साथ जाना हुआ. हमें नौवीं क्‍लास के छात्रों से रू-ब-रू होना था. यह उस शहर का नामी निजी स्‍कूल है. स्‍टूडेंट भी मेधावी हैं. हम इनसे बातचीत का मौजू तलाश रहे थे. जनवरी का महीना है. हमें सूझा, क्‍यों न महात्मा गांधी की हत्या पर बात की जाए. देखा जाए बच्चे  क्या सोचते या जानते हैं? तो हमने तय किया कि इसी पर बात होगी.

क्‍लास में करीब 60 लड़के-लड़कियाँ रही होंगी. सबकी उम्र 15 के आसपास होगी. हमारे सामने सवाल था, कहाँ से और कैसे शुरू किया जाए. हमने बोर्ड पर लिखा ‘30 जनवरी.’ बातचीत शुरू हुई. क्या 30 जनवरी कुछ खास तारीख है? सभी छात्रों से अलग-अलग जवाब मिले- इस दिन गांधी जी की हत्या हुई थी…शहीद दिवस है… गांधी जी राष्ट्रपिता हैं आदि.

हमार अगला सवाल था- अगर हत्या हुई थी तो क्या आप बता सकते हैं, गांधी जी की हत्या किसने की थी? नाथूराम गोडसे- यह जवाब ज़्यादातर बच्चे जानते थे. इसके बाद सवाल किया गया- नाथूराम गोडसे ने गांधी जी को क्यों मारा? इसके जवाब काफी अलग-अलग थे. कुछ व्यक्तिगत जवाब थे तो कुछ सामूहिक. इन जवाबों से यह  झलक भी मिलती है कि गोडसे को बच्चे क्या समझते हैं?

आगे के लिए यह लिंक देखिए:

http://hindi.catchnews.com/india/why-did-nathuram-godse-kileed-mahatma-gandhi-1454050822.html

 

 

गांधी एक प्रेत का नाम है…

 

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गांधी से खुद को जोड़ने की कोशिश करने वाले ज़्यादातर लोग राजघाट तो जाते हैं लेकिन बिड़ला भवन नहीं, क्योंकि वहां जाने के मायने हैं उस व्यक्ति की हत्या से रूबरू होना जिसे राष्ट्रपिता कहा जाता है.

या जैसा एक लेखक ने कहा, बिड़ला भवन में एक प्रेत रहता है. हम उसका सामना करने से घबराते हैं. वह किसका प्रेत है?

गांधी की हत्या को उचित मानने वालों की संख्या कम नहीं है और वे सब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदू महासभा या शिव सेना के सदस्य नहीं हैं.

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Calculated Tears

modi lko croppedThe lacrimal glands have been activated once again but even if the tears remained trapped in the eyes of the leader, must they blur our vision?
That a full five days were allowed to elapse since suicide the suicide of a dalit student in Hyderabad before these gland optics tells us that what we saw in Lucknow on Friday was not at all a spontaneous expression of grief. The Telegraph has shown frame by frame the pictures of a smiling, beaming Modi on different joyous occasions – when the mother of Rohith was grieving and the nation was trying to make sense of her loss – to prove that the prime minister’s act is a little too late and unconvincing. Rohith’s father has seen through the bluff and already spoken up about it.

While some were keen to see in those brimming eyes a humane approach, I saw a cynical, strategic mind which kept its emotions in check so as to let it flow on an appropriate occasion, against a suitable backdrop.

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रोहित और राष्ट्रवादी धोखाधड़ी

रोहित वेमुला की खुदकुशी पर बात करने के लिए भावुकतावाद से बाहर निकल आने की जरूरत है. क्योंकि यह खुदकुशी एक क्रूर, ठंडी, असंवेदनशीलता की वजह से ही हुई है जो किसी भी तरह की मानवीय भावुकता को रौंद डालती है.

हम रोहित के अंतिम पत्र की काव्यात्मक भाषा की बात न करें, न यह कहें कि वह अपनी दलित पहचान के दायरे से निकल कर एक कहीं बड़ी पहचान खुद बनाना चाहता था. उस पत्र का विश्लेषण करने की जगह, बेहतर हो कि हम इस खुदकुशी पर शासक वर्ग की प्रतिक्रिया का विश्लेषण करें. यह जानने के लिए कि हमारा सामना किस यथार्थ से है.

विस्तार से पढ़ने के लिए नीचे के  लिंक को देखें http://hindi.catchnews.com/india/we-should-come-out-of-sentimentalism-to-talk-on-rohit-issue-1453295543.html

Our cowardice killed Rohith Vemula

“I forgot to write the formalities. No one is responsible for my this act of killing myself. No one has instigated me, whether by their acts or by their words to this act. This is my decision and I am the only one responsible for this. Do not trouble my friends and enemies on this after I am gone.”

This is the conclusion of the letter that Rohith Vemula composed before ending his life on Sunday. As anyone who has followed the case has now gathered, Vemula was one of five Dalit students suspended by the University of Hyderabad in August after an alleged altercation with a member of the Bharatiya Janata Party’s student wing, the Akhil Bhartiya Vidyarthi Parishad. Matters escalated after the BJP’s Union minister of labour and employment Bandaru Dattatreya Dattatreya reportedly sent a letter to Smriti Irani  indicating his personal interest in the case. The letter was not merely a forwarding note attached to a complaint by the ABVP, as the Minister now claims, as it explicitly expresses concern that the university authorities have remained mute spectators even as  the university in turning into a den of anti national and casteist politics. He requested the Minister to intervene. Continue reading Our cowardice killed Rohith Vemula

उदारता की ईमानदारी:प्रसंग गुलाम अली का

कोलकाता में खचाखच भरे स्टेडियम ने गुलाम अली को गाते सुना. वे वहाँ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के न्योते पर गए थे.यह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह कार्यक्रम पठानकोट काण्ड के फौरन बाद हुआ और राष्ट्रवादी क्षोभ के कारण रोका नहीं गया.गुलाम अली ने कहा कि कुछ वक्त पहले अपने समानधर्मा जगजीत सिंह की याद में मुंबई में उनके गायन के कार्यक्रम के न होने की तकलीफ इससे कुछ कम हो गई है.

केरल में भी गुलाम अली का सरकार ने स्वागत किया. उनका गायन भी हुआ. कार्यक्रम स्थल के बाहर गुलाम अली के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ लेकिन इस वजह से उसे स्थगित नहीं किया गया.

हम जानते हैं कि बिहार में भी गुलाम अली गा पाएँगे और शायद उत्तर प्रदेश में भी. इससे एक राहत यह मिलती है कि भारत में अभी भी इंसानियत के लिए गुंजाइश बची है जो उदारता के बिना संभव नहीं. Continue reading उदारता की ईमानदारी:प्रसंग गुलाम अली का

आने पर आशंका, जाने पर उल्लास: भारतीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की खोज

देश के दो बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अपने नए कुलपतियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं .दिल्ली विश्वविद्यालय पिछले तीन महीने से कुलपतिविहीन है और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति का कार्यकाल इस महीने खत्म हो जाएगा. दोनों ही जगहों के लिए इस काम के लिए बनाई गयी खोज और चयन समितियों ने अपना काम पूरा कर लिया है,ऐसी खबर है. उन्होंने अपनी ओर से इस पद के लिए ‘श्रेष्ठतम’ नामों की सूची इन विश्वविद्यालयों के कुलाध्यक्ष यानी राष्ट्रपति के पास भेज दी है. अब वे किस नाम पर सही करके भेजते हैं, इसका इन्तजार है. इस बीच अकादमिक जगत में और इसमें दिलचस्पी रखने वालों के बीच अफवाहों का बाज़ार गर्म है.

कुछ नामों के पक्ष-विपक्ष में बहस चल रही है. आशंका जताई जा रही है कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तरह ही शासक दल की राजनीतिक विचार के अनुयायी चुने जाएँगे. एक मित्र ने कहा कि जब देश ने ही उस विचारधारा को चुन लिया तो अकादमिक परिसर क्योंकर उससे आज़ाद रहें! जो हो, चयन के पहले ही परिसर में संभावित नामों को लेकर पक्ष और विपक्ष तैयार हो जाता है. इस सबके बीच जिस नाम का भी चुनाव हो, वह परिसर में इस जानकारी के साथ प्रवेश करता है कि उसका पक्ष कौन-सा है और विपक्ष कौन-सा और वह अपनी सुरक्षा की तैयारी को अपनी स्थिरता के लिए प्राथमिकता देता है. पूरे कार्यकाल तक यह तनाव बना रहता है और कुलपति के फैसले इस चिंता से प्रभावित होते रहते हैं कि उसके विपक्षियों की तादाद और ताकत परिसर में न बढ़े. इसका असर सबसे अधिक नए अध्यापकों के चयन और पुराने अध्यापकों की प्रोन्नति पर पड़ता है. जाहिर है, जब अध्यापक के चुनाव का आधार ही गैर-अकादमिक है तो योग्य शिक्षक का चुन लिया जाना भी सिर्फ संयोग है. यह बहुत कम देखा गया है कि किसी कुलपति ने अपने विरोधियों की आशंकाओं को निर्मूल किया हो. अगर विरोध और समर्थन का आधार राजनीतिक विचार हैं तब तो तालमेल और मुश्किल हो जाता है. Continue reading आने पर आशंका, जाने पर उल्लास: भारतीय विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की खोज

अर्धेंदु भूषण बर्धन

अर्धेंदु भूषण बर्धन,या सिर्फ कामरेड बर्धन को आखिर कैसे याद किया जाए? पिछले साल उन्होंने नब्बे पार किया था.यह एक भरा-पूरा जीवन था और आख़िरी मिनट में शायद उन्हें इसका पछतावा न रहा हो कि ज़िंदगी का कोई रंग उनके देखे से रह गया.क्या उन्हें इसका अफ़सोस रह गया होगा  कि वे भारत में साम्यवाद कायम होते न देख पाए! उन जैसा प्रखर व्यावहारिक बुद्धि का मालिक ऐसे किसी भ्रम में अब हो, मानना मुश्किल है. वे सतत क्रांतिकारी स्वप्नवाले कम्युनिस्ट आन्दोलन के दौर से आगे बढ़ते हुए चिर जनतांत्रिकता के पैरोकार बन गए थे.अगर उन्हें एक संसदीय जनतांत्रिक राजनीति का आदर्श राजनेता कहा जाए तो गलत न होगा. Continue reading अर्धेंदु भूषण बर्धन