‘प्रतिमान’ के आगामी अंक के लिए लिखा गया
28 जुलाई के महाराष्ट्र टाईम्स में प्रकाशित एक अलग किस्म के लेख पर अचानक निगाह गयी थी जिसका शीर्षक था ‘आमचा दादोजी’। प्रस्तावना पढ़ने पर पता चला कि गो पु देशपांडे अर्थात गोविंद पुरूषोत्तम देशपांडे ( जो मराठी भाषिकों के लिए ‘गोपु’ के नाम से तो ‘इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली’ जैसी अन्तरराष्ट्रीय ख्याति की पत्रिका के पाठकों के लिए – जहां उन्होंने तीन दशक तक नियमित कॉलम लिखा – जीपीडी के नाम से जाने जाते रहे) की अनुजा ज्योति सुभाष ने अपने दादोजी अर्थात सबसे बड़े भाई के पचहत्तरवे वर्ष पूरे करने पर यह लेख लिखा था। लेख में सातारा जिले के रहमतपुर गांव में बीते गो पु के बचपन की तमाम यादें थीं, जिन्हें कोलाज के रूप में उन्होंने पेश किया था। आजादी के आन्दोलन में शामिल उनके दादाजी और उनके माता पिता, बचपन से ही प्रचण्ड मेधावी के रूप में चर्चित गो पु की भुलक्कडी के तमाम किस्से जो हमेशा सोचने समझने में ही खोए रहते थे, यहां तक कि उन्हें खाने पीने का भी ध्यान नहीं रहता था, इन सभी को उन्होंने बयां किया था. गो पु की पहली विदेश यात्रा के लिए उन्हें बिदा करने गए सभी छोटे भाई बहन किस तरह दुखी होकर हवाई अड्डे पर रो रहे थे, इसका भी जिक्र उन्होंने किया था।
अपनी अनुजा के संस्मरण के बहाने गो पु के जीवन का एक ऐसा अध्याय सामने खुल रहा था, जिसके बारे में शायद ही कहीं लिखा गया हो। लेख पढ़ते हुए किसे इस बात का गुमान हो सकता था कि मैं जिस वक्त उन पंक्तियों को पढ़ रहा था तब मस्तिष्काघात अर्थात ब्रेन हैमरेज के चलते वह अस्पताल में भरती थे और कोमा में चले गए थे। उन्हें इसके बाद कभी होश नहीं आया। पुणे के अपने घर में ही उन्होंने अन्तिम सांस ली। Continue reading गो पु का न रहना
