नयी पेशवाई, पुरानी पेशवाई 

भीमा कोरेगांव संघर्ष: एक अन्तहीन लड़ाई ?

(उदभावना के आगामी अंक में प्रकाशन हेतु)

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Image : Courtesy – scroll.in

‘वे कौन लोग थे जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना में भरती हुए और जिन्होंने हिन्दोस्तां जीतने में ब्रिटिशों की मदद की ? मैं जो उत्तर दे सकता हूं और – वह काफी सारे अध्ययन पर आधारित है – कि वे लोग जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा बनायी गयी सेना में शामिल हुए वह भारत के अछूत थे। प्लासी की लड़ाई में क्लाइव के साथ जो लोग लड़े वे दुसाध थे और दुसाध अछूतों की श्रेणी में आते हैं। कोरेगांव की लड़ाई में जो लोग लड़े वे महार थे और महार अछूत होते हैं। इस तरह चाहे उनकी पहली लड़ाई या आखरी लड़ाई हो अछूत ब्रिटिशों के साथ लड़े और उन्होंने हिन्दोस्तां जीतने में ब्रिटेन की मदद की। इस सच्चाई को मार्केस आफ टिवडलीडेल ने पील आयोग के सामने पेश अपनी नोट में रेखांकित किया है, जिसका गठन भारतीय सेना के पुनर्गठन के बारे में रिपोर्ट तैयार करने के लिये 1859 में किया गया था।

ऐसे कई हैं जो अछूतों द्वारा ब्रिटिश सेना में शामिल होने को देशद्रोह का दर्जा देते हैं। देशद्रोह हो या न हो, अछूतों की यह कार्रवाई बिल्कुल स्वाभाविक थी। इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा है कि किस तरह एक मुल्क के लोगों के एक हिस्से ने आक्रमणकारियों से सहानुभूति दिखायी है, इसी उम्मीद के साथ कि आगुंतक उन्हें अपने देशवासियों के उत्पीड़न से मुक्ति दिला देगा। वे सभी जो अछूतों की आलोचना करते हैं उन्हें चाहिये कि वे अंग्रेज मजदूर वर्ग द्वारा जारी घोषणापत्रा को थोड़ा पलट कर देखें।’’

– अम्बेडकर

/लन्दन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन हेतु अम्बेडकर ने जो आलेख प्रस्तुत किया, जो बाद में ‘अनटचेबल्स एण्ड द पैक्स ब्रिटानिका’ नाम से उनकी संकलित रचनाओं में शामिल किया गया, उसमें उन्होंने यह बात कही थी।/

प्रस्तावना

स्मृति का वजूद कहां होता है ? और विस्मृति के साथ उसका रिश्ता कैसे परिभाषित होता है ?

कभी लगता है कि स्मृति तथा उसकी ‘सहचर‘ विस्मृति एक दूसरे के साथ लुकाछिपी का खेल खेल रहे हों। स्मृति के दायरे से कब कुछ चीजें, कुछ अनुभव, कुछ विचार विस्मृति में पहुंच जाएं और कब किसी शरारती छोटे बच्चे की तरह अचानक आप के सामने नमूदार हो जाएं इसका गतिविज्ञान जानना न केवल बेहद मनोरंजक बल्कि मन की परतों की जटिल संरचना को जानने के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है । यह अकारण ही नहीं कि किसी चीज / घटनाविशेष को मनुष्य कैसे याद रखता है और कैसे बाकी सबको भूल जाता है इसको लेकर मन की पड़ताल करने में जुटे मनीषियों / विद्वानों ने कई सारे ग्रंथ लिख डाले हैं ।

और अगर किसी व्यक्तिविशेष के बजाय समाज के ‘मानस’ की चर्चा की जाय तो ‘स्मृतियों’ और ‘विस्मृतियों’ की इस लुकाछिपी को जानना जटिलता के नये आयामों से हमें परिचित करा सकता है ।

आज का यह दौर भी वैसे अजीब है। हम यह पा रहे हैं कि स्मृतियों का यह फ़लक ही संघर्ष का नया मैदान बना दिया गया है। स्मृति-विस्मृति की इस लुकाछिपी में काल्पनिक, आभासी बातों का आरोपण हो रहा है , भावनाओें की दुहाई देते हुए चुनिन्दा स्मृतियों को छांटा जा रहा है और इन आरोपित ‘स्मृतियों’ और ‘मिथकीय’ घटनाओं के जरिये एक नया ‘इतिहास’ रचा जा रहा है। यथार्थ के बजाय मिथक, हकीकत के बजाय भावनाओं के पुर्नस्थापन के जरिये इतिहास के इस ‘पुननिर्माण’ को अंजाम दिया जा रहा है।

वैसे इस प्रकल्प के बरअक्स इतिहास के वास्तविक पुनर्निर्माण की एक समानान्तर प्रक्रिया भी निरन्तर चलती रहती है जहां बार-बार अतीत को खंगाला जाता है , उस पर नये नये कोणों से देखा जाता है और पुराणों में वर्णित समुद्रमंथन के मिथक से तुलना करें तो इससे नये-नये ‘मोती‘ निकाले जाते हैं।

स्मृति-विस्मृति के द्वंद और उनके नये व्याख्यापन की ऐसी कोशिशों की पृष्ठभूमि में दो सौ साल पहले हुई एक लड़ाई, जो पुणे के पास स्थित भीमा कोरेगांव में सम्पन्न हुई थी, जिसमें पेशवाओं को शिकस्त मिली और अंग्रेजी राज के परचम पर हिन्दोस्तां में मुहर लगी, अचानक बहस के केन्द्र में आयी है।

क्या हुआ था भीमा कोरेगांव में ?

भीमा कोरेगांव के इस संघर्ष को भारत के दलितों के इतिहास में एक अहम मुक़ाम पर रखा जाता है।

मालूम हो कि 1818 को पुणे के पास स्थित कोरेगांव में पेशवाओं के खिलाफ अंग्रेजों की आखरी लड़ाई हुई थी, जिसमें अन्ततः दूसरे बाजीराव पेशवा की अगुआईवाली सेना को हार का सामना करना पड़ा था। कहा जाता है कि 1757 में प्लासी की लड़ाई में जीत के बाद अंग्रेजी राज की नींव पड़ने का जो काम यहां शुरू हुआ था, वह 1818 की पेशवाओं की हार ने पूरा किया। वे तमाम सैनिक जो कोरेगांव की इस लड़ाई में अंग्रेजों के साथ लड़ते हुए मारे गये थे और जिन्होंने पेशवाओं की विशाल सेना को परास्त करने में अहम भूमिका अदा की थी, उनकी याद में इसी कोरेगांव में अंग्रेजों ने एक ‘जयस्तम्भ’ खड़ा किया है, जिसमें अंग्रेजों ने इन सैनिकों के नाम अंकित किये हैं। अगर इन नामों को गौर से देखें तो इनमें कई ऐसे नाम हैं जो बताते हैं कि ये नाम दलित समुदाय से आने वाले लोगों के हैं।

लेकिन चार दशक बाद ही दलितों के लिए ब्रिटिश सेना में स्थितियां बदल गयी थीं।

यह इतिहासविदित तथ्य है कि अंग्रेजों ने 1857 के बाद सेना में भरती सम्बन्धी अपने नियमों में काफी परिवर्तन किये, जिसमें न केवल कुछ जातियों को ‘मार्शल’ ( सैनिक) समुदायों का दर्जा दिया गया बल्कि धीरे-धीरे दलित जातियों के बहिष्करण की प्रक्रिया भी शुरू की। 1890 तक आते-आते उन्होंने यह बाकायदा ऐलान भी कर दिया कि इसके आगे ‘अछूतों’ को सेना में भरती नहीं किया जाएगा। अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि महासमर की असफलता के बाद बड़े-बड़े सामन्तों, राजे-रजवाड़ों की सेना के धीरे-धीरे विलोपीकरण ने वर्ण समाज के सदस्यों को भी ब्रिटिश सेना में भरती होना पड़ा होगा और इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि वे लोग अपने जाति अभिमान के प्रति कितने सचेत हैं, अंग्रेजों ने उनके साथ हमेशा से सम्बद्ध रहे दलितों के प्रवेश पर पाबन्दी लगायी गयी होगी।

19 वीं सदी की अन्तिम दहाई में हम ब्रिटिश फौज से सेवानिवृत्त हुए दलित सिपाहियों द्वारा अंग्रेजों को भेजे गये ज्ञापन को देख सकते हैं, जहां वे सेना में दलितों के भरती पर लगायी गयी पाबन्दी उठाने की अपील करते दिखते हैं। गोपाल बाबा वलंगकर 1 जैसे पूर्व सैनिकों ने – जो महात्मा फुले द्वारा स्थापित सत्यशोधक समाज से जुड़े थे – जो पूरे समाज को जागरूक बनाने में मुब्तिला थे, इनमें अग्रणी थे। कोंकण इलाके के वलंगकर,  विदर्भ के किसन फागुजी बनसोडे और पुणे के शिवराम जानबा कांबले को अम्बेडकर की पहले की पीढ़ी के अगुआ कहा जाता है, जिन्होंने एक तरह से जमीन तैयार की, जिस पर अम्बेडकर की अगुआई में स्वायत्त दलित आन्दोलन आकार ले सका।

हम अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि डा अम्बेडकर का जब जन्म हुआ तब दलितों/महारों के सेना में प्रवेश पर पाबन्दी कायम थी और वह एक तरह से उस परिवेश में पले बढ़े कि दलित घरों में वे चर्चाएं आम होंगी कि किस तरह दलितों ने मौका मिलने पर बहादुरी दिखायी और उन्हीें पेशवाओंका  को परास्त किया, जिनके ब्राहमणवादी विचारों का आज बोलबाला था।

पेशवाओं की ऐतिहासिक हार का प्रतीक कोरेगांव के निकट बने उस विशाल स्तम्भ पर अपने दलित पुरखों के नाम पढ़ कर डा अम्बेडकर फक्र महसूस करते रहे हैं और इस बात को साफगोई के साथ रखते रहे हैं कि दलित जातियों को मनुष्य से बदतर स्थिति में रखने वाले पेशवाओं के ब्राहमणी शासन के खिलाफ दलितों के जबरदस्त गुस्से का ही यह प्रतीक था कि उन्होंने इसे हराने में अपनी जान की बाजी तक लगा दी।

1 जनवरी 1927 के पहली दफा युवा अम्बेडकर ने ब्रिटिश सेना में कार्यरत तथा उससे सेवानिव्रत्त महार सैनिकों के साथ भीमा कोरेगांव के इस विजयस्तंभ की यात्रा की थी, जो भीमा नदी के किनारे स्थित है। याद रहे कि उसके बाद लगभग हर साल 1 जनवरी को वह भीमा कोरेगांव स्तंभ पर पहुंचते रहे और अपने इन पुरखों को नमन करते थे। उनके साथ सैकड़ों लोगों के वहां पहुंचने का सिलसिला भी तब शुरू हुआ, जो आज़ादी के बाद भी चलता रहा है, और अब हजारों लोग वहां पहुंचते रहते हैं।

1 जनवरी 2018 को इस भीमा कोरेगांव संघर्ष के दो सौ साल पूरे होने पर भी इसी तरह हजारों की तादाद में लोग जुटे, इस सिलसिले में पुणे में ‘‘एल्गार परिषद’’ का भी आयोजन हुआ /31 दिसम्बर 2017/ जिसकी पहल दो रिटायर्ड न्यायाधीशों – न्यायमूर्ति सावंत और न्यायमूर्ति कोलसे पाटील ने की थी । 2 शनिवारवाडा – जहां से पेशवाओं का शासन संचालित होता था, वहां पर आयोजित उस सभा में जिग्नेश मेवाणी से लेकर राधिका वेमुला तथा तमाम अन्य लोग जुटे थे, जिन्होंने वहां भाषण दिए। सभा के अन्त में वहां एकत्रित 20 हजार से अधिक जनसमूह ने संविधान एवं लोकतंत्रा को बचाने की कसम खायी।

इस घटना को एक साल पूरा हो गया है, मगर आज भी शनवारवाड़ा पर हुई उस सभा और 1 जनवरी 2018 को निकले उस जुलूस की अनुगूंज सुनाई दे रही है।

मालूम हो कि 1 जनवरी 2018 को भीमा कोरेगांव स्तंभ की तरफ निकली रैली पर हिन्दुत्ववादी संगठनों की पहल पर संगठित हमले किए गए, हमलों में एक व्यक्ति की जान भी गई। इस घटना के तत्काल बाद दायर प्रथम सूचना रिपोर्ट में संभाजी भिडे और दूसरे हिन्दुत्ववादी नेता मिलिन्द एकबोटे को सीधे जिम्मेदार ठहराया गया था। प्रकाश अम्बेडकर, जो डा अम्बेडकर के पोते हैं, तथा जो ‘‘एल्गार परिषद’’ वक्ताओं में से एक थे, जिसका आयोजन ‘‘दलित जीत के स्मरणोत्सव’’ के पहले दिन हुआ था, उन्होंने भी इन कटटरपंथियों के खिलाफ इसी किस्म की शिकायत दर्ज की थी और पुलिस को कहा था कि वह इस मामले को अनुसूचित जाति और जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम /1989/ के तहत दर्ज कर दे, जबकि महाराष्ट्र  पुलिस ने संभाजी भिडे से पूछताछ करना भी मुनासिब नहीं समझा है – तथा महाराष्ट्र के मुख्यमंत्राी देवेन्द्र फडणवीस सदन के पटल पर भिडे को क्लीन चिट दे चुके हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस हमले के मास्टरमाइंड अग्रणियों और उनके संगठनों को बचाने की पूरी कोशिश अभी भी जारी हैैं, संगठित हिंसा की जांच के लिए सरकार की तरफ से बनी कमेटी बेहद धीमे तरीके से काम कर रही है, और दलितों के न्याय पाने की उम्मीद लगातार कम होती जा रही है।

ऐसे अध्ययन सामने आए हैं कि जो इस बात की ताईद करते हैं कि यह हिंसा पूर्वनियोजित थी, जिसे हिन्दुत्ववादी जमातों ने अंजाम दिया और जिसका मकसद था कि पूरे इलाके में जातिगत एवं साम्प्रदायिक आधार पर वैमनस्य तेज किया जाए।3

दूसरी तरफ, यह बात भी सामने आ रही है कि इस पूरे मामले को बिल्कुल अलग दिशा में मोड़ने की कोशिश हो रही है।

देश के अलग अलग हिस्सों से वकील, लेखक, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफतारियां हुई हैं, जिन्हें ‘अर्बन नक्सल’ घोषित किया गया है और कहा जा रहा है कि वह प्रधानमंत्राी की हत्या की साजिश में शामिल थे। गैरकानूनी गतिविधियों में मुब्तिला होने और माओवादी हथियारबन्द समूहों से ताल्लुक रखने के आरोप इन पर लगे हैं। सरकार ने यह भी दावे किए हैं कि भीमा कोरेगांव हमले को इन्हीं ‘अर्बन नक्सल’ ने उकसाया था। दूसरी तरफ, जब सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं संगठनों ने हिन्दुत्ववादी एवं जातिवादी संगठनों ने भीमा कोरेगांव की रैली पर हुए हमलों की जांच त्वरित कराने तथा उसके मास्टरमाइंडों को पकड़ने की मांग की है तो सरकार ने जांच आयोग का सहारा लिया है और कहा है कि जब तक रिपोर्ट नहीं आती तब तक वह कोई कार्रवाई नहीं करेगी। सरकार का यह विरोधाभासपूर्ण रवैया ही इस बात की ताईद करता है कि वह रैली के हमलावरों पर कार्रवाई को लेकर कितनी गंभीर है और किस तरह दलितों के उभार के खिलाफ खड़ी ताकतों को प्रश्रय दे रही है और उन्हें शह प्रदान कर रही है।4

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कई सारे सवाल इसी बहाने खड़े हुए हैं।

रेखांकित करनेवाली बात है कि बीते पूरे साल में घटनाओं का सिलसिला जितनी तेजी से इस प्रसंग को लेकर आगे बढ़ा है, जिसमें आए दिन नए नए आयाम जोड़े जाते दिख रहे हैं, उसके चलते इस पूरे प्रसंग के अहम पहलुओं पर बात तक नहीं हो सकी हैै।

– एक अहम मसला भीमा कोरेगांव संघर्ष के मूल्यांकन का है, आज दलित इतिहास में अहम मुकाम पाई इस लड़ाई को किस तरह देखा जाना चाहिए? पेशवाओं के खिलाफ महार सैनिकों द्वारा दिखाए शौर्य की, ब्रिटिश सेना में ‘‘अछूत’’ कहलानेवाले तबकों की सक्रिय भूमिका की व्याख्या किस तरह की जाए – क्या उसे ‘अछूतों’ के मुक्तिसंग्राम के तौर पर देखा जाए, क्या यह कहा जा सकता है कि यह दलित सैनिक किसी व्यापक भविष्यदृष्टि  के साथ इसमें शामिल हुए थे ? या यह समझा जाए कि ऐसा चित्रण एक मिथक से अधिक कुछ नहीं है, जैसे मिथकों का निर्माण जननेताओं को करना पड़ता है ताकि हारी हुई या पराजित कौमों में एक नए जोश का संचार किया जा सके ?

पेशवाओं के परास्त होने के बाद ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को लेकर अंतिम बाधा दूर हो गयी थी,  यह एक वस्तुनिष्ठ सच्चाई है, मगर क्या इससे पेशवाओं के चरित्राचित्राण को लेकर हम कुछ नए आकलन तक हम पहुंच सकते हैं कि उनमें किसी किस्म के ‘‘राष्टवादी’’ तत्व थे या यह ऐसा सवाल है जो उस वक्त़ उठाया नहीं जा सकता था ?

– दूसरा अहम मसला, ‘नई पेशवाई’ के तौर पर मौजूदा हुकूमत के चित्रण ने निश्चित ही दलित एवं अन्य प्रगतिशील ताकतों को एक साथ जुड़ने का मौका मिला है। आज के दौर में साम्प्रदायिक फासीवाद का एजेण्डा लेकर आगे बढ़ रही हुकूमत के – जिसे जनता के एक हिस्से का भी समर्थन हासिल है – खिलाफ ऐसी हर किस्म की गोलबन्दी जरूरी है, जो उसके ‘अजेय’ लगनेवाले रथ को रोक सके ; मगर क्या इससे उन उलझे हुए सवालों से बचा जा सकता है, जो इसमें अन्तर्निहित हैं। यह सवाल बर्तानिया की हुकूमत के भारत के अन्दर पैर जमाने से ताल्लुक रखते हैं। यह कुछ वैसे ही सवाल हैं, जैसे सवाल 1857 के महासमर के बहाने हमारे सामने उपस्थित हुए थे कि उसका कैसे आकलन किया जाए। / देखें, सुभाष गाताडे ‘1857 का महासमर और शूद्र अतिशूद्र’ उदभावना, अंक 75, अप्रैल-जून 2007/

– तीसरा अहम मसला, यह समझने का है कि क्या इस हमले के पीछे हम कोई एक पैटर्न देखते हैं जिसमें हमेशा ऐसे दलित विद्रोहों, आन्दोलनों को – जो सत्ता की राजनीति के बाहर खड़े हैं और जो स्थापित पूंजीवादी पार्टियों को चुनौती देते दिख रहे हैं – उनका ‘आतंकवादीकरण’ करने या ‘अपराधीकरण’ करने की कोशिशें तेज होती रहती हैं। इस सन्दर्भ में खैरलांजी /महाराष्ट/ में भोतमांगे परिवार की मां बेटी के साथ सामूहिक बलात्कार एवं उनकी हत्या तथा परिवार दो युवा सन्तानों की हत्या के खिलाफ उठ खड़ी व्यापक जनसरगर्मी को याद किया जा सकता है /2006/ जिसकी अगुआई स्थापित दलित संगठनों/पार्टियों ने नहीं की थी और उस व्यापक आन्दोलन पर भी ‘‘माओवाद’’ का ठप्पा लगाने की कोशिशें चली थीं।

चौथा अहम मसला, दलितों एवं उनकी मित्रा शक्तियों की जो ऐतिहासिक पहल – भीमा कोरेगांव संघर्ष के दो सदी पूरे होने पर – विगत साल सामने आयी जिसने पुरानी पेशवाई के जनद्रोही रूपक को मौजूदा हुकूमत के साथ जोड़ कर उसे व्यापकता प्रदान करने की कोशिश की, वह पहल राज्य की दमनकारी शक्तियों एवं उनकी सहमना ताकतों के हमले का इस कदर शिकार क्यों बनीं ?

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मिथक और यथार्थ

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‘‘ऐ पढ़े लिखे पण्डितों, अपने खोखले ज्ञान को तोतारटन्त शैली में दोहराना छोड़ दो और सुनो, जो मैं कहना चाहती हूं।’’

ये लब्ज थे 14 साल की मुक्ताबाई के जो महाराष्ट्र के ‘ज्ञानोदय’ नामक अख़बार में 1855 में प्रकाशित हुए थे। अपने उपरोक्त पत्र में मुक्ताबाई ने पेशवाओं के शासन में दलितों ( मांग एवम महार जाति के लोगों ) पर ढाये जाते जुल्म का वर्णन किया था किस तरह ‘पेशवाओं के जमाने में दलितों को लाल सीसा/सिंदूर पीला दिया जाता था और किस तरह उनकी हवेलियों की बुनियाद में गाड़ दिया जाता था’ तथा किस तरह उनकी छाया से भी घृणा की जाती थी। उसने यह भी जोड़ा था कि आज भी दलित छात्र ‘शिकायत नहीं कर सकते भले ही ब्राह्मण बच्चे उन्हें पत्थर से मारें और उन्हें घायल कर दे। वे चुपचाप सब बरदाश्त करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि उन्हें फिर ब्राह्मणों के दरवाजे पर ही बचा-खुचा अन्न मांगने जाना पड़ेगा।’

1848 में सावित्राीबाई फुले और ज्योतिबा फुले द्वारा लड़कियों के लिए शुरू किये स्कूल में तालीम हासिल की मुक्ताबाई का यह छोटासा निबन्ध ऐतिहासिक दस्तावेज ही समझा जाएगा जिसमें उसने पेशवाओं के शासन के खातमे के सैंतीस साल बाद जारी दलितों की स्थिति पर रौशनी डाली थी। हालांकि जिस तरह हम बीसवीं सदी की शुरूआत में ‘सरस्वती’ में छपी अपनी रचना ‘अछूत की शिकायत’ से चर्चित हुए महाकवि हीरा डोम के बारे में कुछ भी नहीं जानते उसी तरह हम यह नहीं जानते कि 1841 में पैदा हुई मुक्ताबाई ने बाद में क्या किया, वह कहां रही। लेकिन क्या यह कहा जा सकता है कि 14 साल की मुक्ताबाई कुछ मनगढंत लिख रही थीं जिसका सच्चाई से ताल्लुक नहीं था। निश्चित ही यह समझना भारी भूल होगी।

अगर हम न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानडे की किताब ‘द मिसलेनियस रायटिंग्जस’ ( पेज 350-352) देखें तो वह उत्तर पेशवाई शासन में जातिभेद की बढ़ती अहमियत और अन्य जातियों की अपेक्षा प्रत्यक्ष शासन में ब्राह्मणों को दी जा रही अहमियत पर रौशनी डालती है। लेखक के मुताबिक ‘सातारा से पुणे राजधानी आने पर 1760 के बाद के काल में कीर्तिशाली फौजी सरदारों में ब्राह्मण लोग ही प्रमुख रूप से झलकने लगे। प्रभु, शेणवी आदि सफेदपोश ब्राह्मणेतरों का पुणे दरबार में टिकना मुश्किल हो गया। फलतः सभी वर्गों मे अशान्ति फैल गई।… शिवाजी, राजाराम और शाहू के शासन काल में समाज के ये वर्ग एकता से रहें, इस तरह की राजनीतिक दृष्टि थी। पेशवाई में ब्राह्मणों को लगने लगा कि अब हम सचमुच ही राजा हैं। ब्राह्मणों को स्वतंत्रा रियासतें मिलने लगीं, कानून के बंधन उनके लिये शिथिल किये जाने लगे। ..ज्ञान हो या न हो, ब्राह्मणों के लिए सरकार ने दक्षिणा और भोजन के लिए भरपूर प्रावधान किया। अतः पुणे शहर ब्राह्मण भिखारियों का बड़ा केन्द्र बन गया। तीस से चालीस हजार ब्राह्मण सतत अनेक दिनों तक पकवानों के भोजन करते रहते थे।..’

ज्योतिबा फुले ने अपनी रचनाआंे में बिना कष्ट करके पुष्ट हुए ब्राह्मणवर्ग और दरिद्रता से धूल में मिले ब्राह्मणेतर बहुजन समाज की स्थिति को बयां किया है। ज्योतिबा कहते हैें ‘कोई शूद्र नदी किनारे अपने कपड़े धोता हो और वहां पर कोई ब्राह्मण आए, तो शूद्र या ब्राह्मणेतर को अपने सारे कपड़े इकट्ठा करके ऐसी जगह पर जाकर उन्हें धोना पड़ता जहां से ब्राह्मण के शरीर पर एक छींटा भी न पड़े।’ देशी कानून की जंगली कठोरता के बारे में उन्होंने अनेक मिसालें पेश की हैं। फौजदारी अपराध करने वाले को अंगभंग की सज़ा दी जाती थी। हाथ तोड़ना, पांव तोड़ना , हाथी के पैर के नीचे कुचलना, मुंह में तेल-सिंदूर या धातु का तप्त रस डालना, पहाड़ से धकेलना आदि सज़ायें सुनायी जाती थीं।

अपने आलेख ‘जातिभेद का उन्मूलन’ में डा अम्बेडकर पेशवाओं के शासन में दलितों की स्थिति पर रौशनी डालते बताते हैं: ‘मराठा देश के पेशवाओं के शासन में यदि एक हिन्दू आ रहा है तो उस आम रास्ते का प्रयोग एक ‘अछूत’ को करने की अनुमति नहीं थी ताकि उसकी छाया से भी हिन्दू अपवित्र न हो जाये। हिन्दू गलती से भी छूकर अपने को अपवित्रा होने से बचा सके इसलिए अछूतों के लिए अनिवार्य था कि वे अपनी कलाई या गले में प्रतीक या चिन्ह स्वरूप काला डोरा बांधे। पेशवाओं की राजधानी पूना में ‘अछूतों’ के लिए कमर पर झाडू बांध कर चलना आवश्यक था तथा अपनी गर्दन में मिट्टी का बर्तन लटका कर चलना आवश्यक था’ ताकि हिन्दू अपवित्रा न हो जाये।

जाहिर है कि पेशवाओं की रूखसत के बाद तथा अंग्रेजी शासन कायम होने के बाद कमसे कम मनुस्मृति के विधान पर संचालित पेशवा के नेतृत्व वाले सामाजिक ढांचे में तब्दीलियों का – जातिभेद के अनुसार मानी गयी उच्च-नीच की अवधारणा और भेदभाव के समाप्त हो जाने का – रास्ता खुला। पेशवाओं के राज में अगर जातिभेद की विषमता और आपसी भेदभाव को कानून मान कर उसे सख्ती से लागू करना शासक अपना कर्तव्य समझते थे, यहां तक कि रहन-सहन, पोशाक, रीति-रिवाज आदि के बारे में ब्राह्मणों का अनुकरण करना भी कानूनन अपराध माना जाता था, उस पर रोक लगी। ( काबिलेगौर मिसाल है, दूसरे बाजीराव पेशवा के जमाने में कायस्थों की स्त्रिायों द्वारा ब्राह्मण महिलाओं की नकल कर साड़ी पहनना, इसी बात पर उन्हें भारी अत्याचार का सामना करना पड़ा था।)

तयशुदा बात है कि एक ऐसी हुकूमत की बिदाई न केवल दलित अवाम के लिए बल्कि व्यापक गैरब्राहमण समुदायों के लिए भी हवा की ताज़ी बयार का अनुभव था। इस तरह वस्तुगत तौर पर देखें तो पेशवाओं को मिली शिकस्त ऐसे सभी तबकों के लिए सामाजिक गुलामी के बन्धनों से मुक्ति की दिशा में एक अवसर के तौर पर सामने आयी थी।

अपने चर्चित ग्रंथ ‘द अनटचेबल्स एण्ड द पॅक्स ब्रिटानिका’ में – जिसे डाक्टर भीमराव अम्बेडकर ने लन्दन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन के लिए तैयार किया था -, अम्बेडकर ब्रिटिशों के आगमन के दलितों पर पड़े प्रभाव के सन्दर्भ में अपनी बात रखते हुए कहते हैं:

आखिर ब्रिटिशों की जीत ने अछूतों का क्या भला किया है ? शिक्षा में कुछ भी नही ; नौकरियों में कुछ भी नहीं ; सामाजिक ओहदे में, कुछ भी नहीं । एक ही चीज़ है जिसमें उन्होंने कुछ हासिल किया है और वह है कानून के सामने समानता का अधिकार। हालांकि उसमें कोई खास बात नहीं है क्योकि कानून के सामने समानता सबके लिए लागू है। उसमें कुछ ठोस  बात भी नहीं है क्योंकि जो विभिन्न पदों पर आसीन हैं अक्सर अपने ओहदे का दुरूपयोग करते हैं और अछूतों को इस नियम का फायदा उठाने से वंचित करते हैं। इसके बावजूद, कानून के सामने समानता का सिद्धान्त अछूतों के लिए विशेष लाभ का रहा है वह महज इसी वजह से कि ब्रिटिशों के आगमन के पहले उनके पास ऐसा अधिकार नहीं था। मनु के  कानून समानता का सिद्धान्त स्वीकारते नहीं हैं। मनु के कानूनों की आत्मा है असमानता। वह जीवन के सभी क्षेत्रों में, सभी सामाजिक रिश्तों में और राज्य के सभी इदारों में व्याप्त थी। उसने हवा को प्रदूषित किया था और अछूतों का बस दमन होता था। कानून के सामने समानता के सिद्धान्त ने एक दोषनाशक का काम किया है। उसने हवा को साफ किया है और अछूत के लिये यह मुमकिन हुआ है कि वह आज़ादी की सांस ले सके। यह अछूतों के लिए वास्तविक लाभ है और प्राचीन अतीत को मद्देनज़र रखते हुए कोई छोटा फायदा नहीं है।

मगर क्या यह कहा जाना उचित होगा कि जो महार सैनिक अंग्रेज सेना में भरती हुए थे और जिन्होंने पेशवाओं के खिलाफ पराक्रम का परिचय दिया, वह किसी व्यापक भविष्यद्रष्टि के साथ उससे जुड़े थे या वह उसी तरह भरती हुए थे, जैसे बाकी जातियों के लोग भरती हुए थे क्योंकि सेना में रोजगार के अच्छे अवसर उपलब्ध थे और वहां नियमित कालावधि में तनखा मिलती थी।

रिचर्ड बी व्हाईट अपने आलेख ‘द महार मूवमेण्टस मिलिटरी काम्पोनेन्ट’ लिखते हैं कि महारों ने ब्रिटिशों के साथ अपनी सेवाएं 1750 की दहाई में शुरू की। वह स्टिफन पी कोहेन का हवाला देते हैं, जो भारतीय सेना के विशेषज्ञ थे और उनकी चर्चित रचना ‘द इंडियन आर्मी: कान्टिब्युशन टू द डेवलपमेण्ट आफ ए नेशन’ की बात करते हैं। कोहेन लिखते हैं कि महार ‘‘मराठा राजा शिवाजी की सेना में भी अच्छी संख्या में शामि8ल थे, जो स्थानीय पुलिसकर्मी के पद की विरासत संभाले थे और वह ‘‘स्वाभाविक’’ तौर पर मार्शल तबका थे। 1857 के विद्रोह के पहले के वर्षों में बड़े पैमाने पर भरती महार, समूची बॉम्बे आर्मी का एक बंटा पांचवा या चौथा हिस्सा थे।5

इसे हम ब्रिटिश सेना की वास्तविक सामाजिक संरचना पर निगाह डाल कर देख सकते हैं।

उदाहरणार्थ, बंगाल आर्मी को देखें – जिसके सैनिक 1857 के विद्रोह की रीढ़ बने थे – उसकी सामाजिक संरचना की पड़ताल करने पर ज्ञात होता है कि उसमें शूद्र-अतिशूद्रों की तादाद कम नहीं थी। बर्तानवी सेना की सामाजिक संरचना पर बात करते हुए डा अम्बेडकर भी अलग सन्दर्भ में इस बात की ताइद करते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा बनायी सेना में शूद्रों-अतिशूद्रों की तादाद काफी थी। ( द अनटचेबल्स एण्ड पैक्स ब्रिटानिका)

अगर हम इस सिलसिले में चन्द आंकड़ों पर नज़र डाले तो अन्दाज़ा लग सकता है। विद्रोह के बाद भंग की गयी रेजिमेन्टों में से 34 नेटिव इनफेन्ट्री के सदस्यों का विवरण बताता है ( बंगाल आर्मी की आन्तरिक संरचना पर सीमा अल्वी एवम रूद्रांश मुखर्जी के अध्ययन पर आधारित जिसका उल्लेख विभूतिनारायण राय अपने आलेख ‘कलकतिया पलटन..’ में करते हैं।)

ब्राह्मण  335

क्षत्रिय  237

नीची जातियों के हिन्दू  231

ईसाई  12

मुसलमान  200

सिक्ख  74

योग  1089

अग्रणी विचारक आनन्द तेलतुम्बडे लिखते हैं:

..हालांकि दलित सैनिक ब्रिटिश सेना में सापेक्षतः अधिक संख्या में हो सकते हैं, मगर ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वह मुस्लिम या मराठा सेनाओं में नहीं थे। सभी समुदायों की तरह, सभी जातियों का वजूद सभी सेनाओं में बना हुआ था। कोरेगांव की लड़ाई में पेशवा पैदल सेना की तीन विंग में से एक विंग अरबों से बनी थी, जो कथित तौर पर अत्यधिक बहादुरी से लड़े थे और जिनमें से कई मारे भी गए। आखिर उनके लिए क्या बात प्रेरणा बनी थी ? क्या वह पेशवाओं के ब्राहमणवादी शासन को जारी रखना चाह रहे थे ? हक़ीकत यही है कि वह महज सिपाहियों की तरह अपने स्वामियों के लिए लड़े, जैसे कि दलितों ने किया। इसके अलावा उनकी इस सहभागिता को महान उददेश्यों से आरोपित करना गलत होगा।6

वह इस बात को भी जोड़ते हैं:

‘…उन्हें जातिविरोधीन या धर्मविरोधी समझना, न केवल तथ्यात्मक तौर पर गलत होगा, बल्कि ऐतिहासिक जाति के मसले की गलत व्याख्या भी करना होगा। 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध तक, जब तक शिक्षा व्यवस्था का ठीकठाक प्रसार दलितों में नहीं हुआ था, तब तक वही लोगों के जीवनविश्व का आधार थी। वह जाति को स्वाभाविक व्यवस्था मानते थे और अपने उत्पीड़न को ऐसी नियति मानते थे, जिसे बरदाश्त करना ही है। इसलिए जाति के प्रति किसी प्रतिरोध का सवाल नहीं उठ सकता न उसके खिलाफ बाकायदा युद्ध की बात कहीं दिखती है। शौर्य की इस किस्म के तमाम मिथों के विपरीत, इस बात के प्रमाण नहीं मिलते कि ब्राहमणवादी उत्पीड़न के खिलाफ दलितों ने कोई लड़ाकू प्रतिरोध खड़ा किया गया हों।’ / वही/

हालांकि एक बात अवश्य कही जा सकती है कि ब्रिटिश सेना में नौकरी के दौरान उत्पीड़ित तबकों से आने वाले हर व्यक्ति को उन जातीय उत्पीड़नों/वंचनाओं का प्रत्यक्ष सामना नहीं करना पड़ता था – जो सदियों से उनकी नियति बन चुका था – इतनाही नहीं नए विचारों से, नए इलाकों में अपनी यात्राओं के जरिए भी उन्हें देश दुनिया समझने-बुझने के अवसर मिलते होंगे, जो उनके अन्दर चीज़ों को बदलने की प्रेरणा देते रहते होंगे। इन अनुभवों के चलते उनकी बाद वाली पीढ़ी के युवाओं में सेना में जाने की ललक बढ़ती होगी।

इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि अम्बेडकर की पहले की पीढ़ी के कई समाज सुधारक, जैसे गोपाल बाबा वलंगकर- जो दलित तबके से सम्बद्ध थे – पहले ब्रिटिश सेना में कार्यरत रह चुके थे। खुद डा अम्बेडकर के पिताजी एवं उनके कई चाचा भी सेना में सूबेदार तथा अन्य पदों पर रह चुके थे।

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प्रतिरोध का अपराधीकरण

..उठो, अछूत कहलानेवाले असली जनसेवको तथा भाइयो! उठो ! अपना इतिहास देखो। ….उठो, अपनी शक्ति पहचानो। संगठनबद्ध हो जाओ। असल में स्वयं कोशिश किए बिना कुछ भी न मिल सकेगा। (Those who would be free must themselves strike the blow.) स्वतन्त्रता के लिए स्वाधीनता चाहनेवालों को यत्न करना चाहिए। ..संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दे दो। तब देखना, कोई भी तुम्हें तुम्हारे अधिकार देने से इन्कार करने की जुर्रत न कर सकेगा। तुम दूसरों की खुराक मत बनो। दूसरों के मुँह की ओर न ताको। लेकिन ध्यान रहे, नौकरशाही के झाँसे में मत फँसना। यह तुम्हारी कोई सहायता नहीं करना चाहती, बल्कि तुम्हें अपना मोहरा बनाना चाहती है। यही पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी और गरीबी का असली कारण है। इसलिए तुम उसके साथ कभी न मिलना। उसकी चालों से बचना। तब सब कुछ ठीक हो जायेगा। तुम असली सर्वहारा हो… संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ भी हानि न होगी। बस गुलामी की जंजीरें कट जाएंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बगावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होनेवाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रांति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रांति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो। सोए हुए शेरो! उठो और बगावत खड़ी कर दो।

– अछूत समस्या, भगत सिंह 7

भीमा कोरेगांव संघर्ष के दो सौ साल पूरे होने पर दलितों एवं अन्य परिवर्तनकामी शक्तियों की जो एकजुटता दिखाई दी, जिसके तहत कार्यक्रम महज दलित जातियों तक और महज अम्बेडकरी संगठनों की सक्रियताओं तक सीमित नहीं रहा, जिसमें गैरदलित जातियों, संगठनों के प्रतिनिधि, वाम विचारों, आन्दोलन से जुड़े लोग भी शामिल हुए, वह कई मायनों में अभूतपूर्व था।

क्या यही वह वजह थी कि उसके संगठनकर्ता और उससे कहीं जुड़े लोग उस संगठित आक्रमण का शिकार हुए, जिसकी चर्चा हम पहले भाग में कर चुके हैं।

दरअसल हुकूमत में बैठे लोग – जो मुल्क को हिन्दु राष्ट्र  में तब्दील करना चाहते हैं – इस बात को बरदाश्त नहीं कर सकते कि ऐसी दलित दावेदारी पनपे, जो उनके इस एजेण्डे में ही पलीता लगा दे।

प्रोफेसर सौजन्या तमालापाकुला, जो फिलवक्त़ हैद्राबाद के ‘टाटा इन्स्टिटयूट आफ सोशल साईसंेस’ में जेण्डर स्टडीज का अध्यापन करती हैं, वह लिखती हैं कि स्वायत्त दलित प्रतिरोध पर माओवाद का ठप्पा लगा देने के दो फायदे दिखते हैं:

‘‘एक, दलित आन्दोलन को बदनाम किया जाए तथा उस पर लांछना लगायी जाए और दूसरे, अतिवादी ताकतों का तुष्टिकरण करने के लिए हिंसा के वास्तविक अंजामकर्ताओं को बचाया जाए। मुसलमान समुदाय को ‘‘राष्ट्र विरोधी’’ कह कर और उन्हें व्यापक हिन्दू समुदाय का ‘‘अन्य’’ गढ़ कर मुस्लिम प्रश्न से निपटा गया है। ‘साझा सतत दुश्मन’ के ऐसे गढंत के तौर पर मुसलमान को पेश करने से, जाति प्रश्न से निम्न जातियों के ध्यान को भी बांटा जा सकता है और हिन्दुओं की ढीली ढाली एकता कायम की जा सकती है।

कलंकित करने की ऐसी ही समानान्तर प्रक्रिया दलितों के साथ मुमकिन नहीं दिखती क्योंकि दलित ‘‘हिन्दू समुदाय’’ का अनिवार्य हिस्सा हैं। इसलिए दलित प्रतिरोध पर माओवाद का ठप्पा लगा कर, हिन्दुत्व ताकतों की कोशिश दिखती है कि वह दलित आन्दोलन की एक नकारात्मक छवि गढ़े और इस तरह दलित एक्टिविजम को एक गैरकानूनी गतिविधि के तौर पर प्रस्तुत करे। हालांकि साम्प्रदायिक ताकतों के लिए यह मुमकिन नहीं होताा कि वह समूची दलित आबादी को कलंकित करे, उस पर लांछना लगाए, मगर दलित नेत्रत्व के माओवाद के साथ जोड़ने से – जैसा कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हालिया गिरफतारी बताती है – वह उदितमान दलित आवाज़ों पर लांछना लगा सकता है। मौजूदा हुकूमत के सामने यही एकमात्रा व्यवहार्य रास्ता है, जिससे वह दलित प्रश्न का दमन कर सकता है, जो लम्बे वक्त़ से उसके साम्प्रदायिक और जातिवादी एजेण्डा के लिए खतरा बना हुआ है।’’8

मौजूद हुक्मरान इस तथ्य से अच्छी तरह वाकीफ है कि दलित अवाम के अच्छे खासे हिस्से का भाजपा की तरफ – विभिन्न कारणों से – अनपेक्षित झुकाव एक तरह से 2014 में उनकी चुनावी जीत में एक महत्वपूर्ण कारक था, अब दलितों की बढ़ती दावेदारी इसी बात का प्रमाण है कि अब उन्हें और बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। हिन्दुत्व वर्चस्ववादियों के वास्तविक एजेण्डा की परतें खुलते जाने से – जो न केवल इस बात में प्रगट हो रहा है कि शोषितों एवं हाशिये में पड़े समुदायों के जीवन एवं जीवनयापन के अधिकारों पर संगठित हमला हो रहा है बल्कि उनकी इस बौखलाहट में भी सामने आ रहा है कि वह डा अंबेडकर को अपने असमावेशी एजेण्डा के ‘प्रातःस्मरणीयों’ में शामिल करना चाहते हैं मगर दलित दावेदारी के हर तत्व को कुचल देना चाहते हैं – दोनों ओर सीमारेखाएं खींच गयी हैं।

इस नए दलित उभार की कुछ खासियतें पहले से स्पष्ट हैं:

वह आन्दोलन के पुराने गढ़ों से वह नए इलाकों में फैलता दिखा है

एक बिल्कुल नया नेतृत्व सामने आया है, जो उन मुददों को उठा रहा है जिन्हें दलित आन्दोलन में लम्बे समय से उठाया नहीं गया, उन सरोकारों को बुलन्द कर रहा है जो लम्बे वक्त़ से हाशिये पर रहे हैं, ऐसी ताकतों/समुदायों/समूहों से गठजोड़ कायम कर रहा है जो विभिन्न कारणों से दलित आन्दोलन से दूर रहे हैं या असम्प्रक्त रहे हैं या कहीं कहीं उसके खिलाफ खड़े होते रहे हैं। 9

यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि यह तमाम सरगर्मियां स्थापित दलित पार्टियों के दायरे के बाहर चल रही हैं या चली हैं, जिसने उनके नेतृत्व  को एक हद तक बेचैन भी कर दिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का इलाका,  2013 के दौरान साम्प्रदायिक राजनीति के अलग प्रयोग के रूप में सामने आया था, जब मुजफफरनगर में दंगे फैले थे, उसी इलाके में उठा भीम आर्मी का आन्दोलन इन नए किस्म के दलित आन्दोलन की अच्छी नज़ीर पेश करता है, जिसने तमाम गांवों में स्कूल खोलकर एक अलग जमीन तोड़ी है और दलित आन्दोलन को मिलिटेण्ट रास्ते पर डालने की कोशिश की है और अपनी सक्रियताओं से बहुजन समाज पार्टी को भी बेचैन कर दिया है। 10

यह उभार इसके बावजूद भी सामने आया है कि स्थापित नेतृत्व  का अच्छा खासा हिस्सा, जो अपने स्तर पर सामाजिक न्याय के सवालों को बुलन्द करता रहा है और जिसने कभी हिन्दुत्व की असमावेशी सियासत की जबरदस्त मुखालिफत की थी, उसने पारा बदला और वह खुद हिन्दुत्व की बारात में शामिल हो गया है। इन नेताओं का यह काफकाई रूपांतरण – जो कभी अपने समुदाय द्वारा पूजे जाते थे – जहां वह प्रतिरोध की आवाज़ों के स्थान पर सत्ताधारी पार्टी के चारण बनते दिखे हैं और उसके हिन्दुत्व वर्चस्ववादी एजेण्डा को आगे बढ़ाने में मुब्तिला हैं, उसने न दलित उभार की नयी आवाज़ों को मद्धिम होने दिया है और न ही दलित अवाम के उत्साह को कमजोर किया है।

उना में गोआतंकियों द्वारा दलितों की पीटाई और इस घटना का विडिओ बना कर उसे सोशल मीडिया पर डालने की घटना से उपजा गुजरात का दलित विद्रोह और जिस तरीके से उसने राज्य सरकार को हिला दिया और देश भर में दलितों के बीच अपने आधार को विस्तारित करने की भाजपा की सुचिंतित योजनाओं को पलीता लगा दिया, यह इस परिघटना का अहम उदाहरण कहा जा सकता है। /जुलाई-अगस्त 2016/

याद कर सकते हैं कि इस आन्दोलन के दौरान जिस चीज़ ने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया था, वह था आन्दोलन का प्रमुख नारा जो कहता था कि ‘गाय की पूछ अपने पास रखो और हमें अपनी जमीन दो।’ वह एक ऐसा नारा है जो जातिगत भेदभाव, साम्प्रदायिकता के सवाल को समाहित करता है, एक चतुष्पाद/जानवर के नाम पर लोगों के बीच ध्रुवीकरण तेज करने के उनके इरादों को चुनौती देता है और भौतिक वंचना – जो जाति के सोपानक्रम का अविभाज्य हिस्सा है – उसे लेकर सकारात्मक मांग पेश करता है। आन्दोलन का यह जोर कि दलित अपने ‘लांछन लगे पेशों’ को छोड़ दें – जिन्होंने उन्हें वर्ण/जाति के सोपानक्रम में सबसे नीचले पायदान पर रखा है – और हजारों हजार दलितों की उसमें सहभागिता, आन्दोलन का जुझारू तेवर आदि सभी ने दलित आन्दोलन में एक नयी जमीन तोड़ने का काम किया था।

अगर हम पचास के दशक में डा अंबेडकर के अभिन्न सहयोगी दादासाहब गायकवाड द्वारा जमीन के सवाल पर छेड़े गए ऐतिहासिक सत्याग्रह को छोड़ दें तो आजादी के बाद के दिनों में ऐसे अवसर बेहद कम आए है कि दलितों की भौतिक वंचना के सवाल को सामाजिक-सांस्क्रतिक भेदभाव  एवं राजनीतिक हाशियाकरण के साथ जोड़ा जा सका है। उना ने इस परिद्रश्य को हमेशा के लिए बदला।

विश्लेषकों ने इस बात को सही समझा है कि लम्बे समय से दलित आन्दोलन ‘अस्मिता’ के मुददे तक ही सीमित रहा है? मगर उना ने इस मामले में एक नयी जमीन तोड़ी है जहां अब अस्तित्व का सवाल भी साथ जुड़ा है।

निश्चित ही उना के आन्दोलन को – जिसने हिन्दुत्व वर्चस्ववादियों को काफी बेचैन कर दिया – उसे  देश में दलित उभार में आई तेजी का की अन्य घटनाओं, मुहिमों, आन्दोलनों की निरन्तरता में ही देखा जा सकता है। यह साफ दिख रहा है कि वर्ष 2014 में जब से मोदी की अगुआई में सरकार बनी है तबसे दलितों के उभार की कई घटनाएं सामने आयी हैं और दिलचस्प यह है कि हर आनेवाली घटना अधिक जनसमर्थन जुटा सकी है। दरअसल यह एहसास धीरे धीरे गहरा गया है कि मौजूदा हुकूमत न केवल सकारात्मक कार्रवाई वाले कार्यक्रमों /आरक्षण तथा अन्य तरीकों से उत्पीड़ितों को विशेष अवसर प्रदान करना/ पर आघात करना चाहती है बल्कि उसकी आर्थिक नीतियांें – तथा उसके सामाजिक आर्थिक एजेण्डा के खतरनाक संश्रय ने दलितों एवं अन्य हाशियाक्रत समूहों/तबकों की विशाल आबादी पर कहर बरपा किया है। यह अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि हुकूमत में बैठे लोगों के लिए एक ऐसी दलित सियासत की दरकार है, जो उनके इशारों पर चले। वह भले ही अपने आप को डा अंबेडकर का सच्चा वारिस साबित करने की कवायद करते फिरें, लेकिन सच्चाई यही है कि उन्हें असली अंबेडकर नहीं बल्कि उनके साफसुथराक्रत संस्करण की आवश्यकता है। वह वास्तविक अंबेडकर से तथा उनके रैडिकल विचारों से किस कदर डरते हैं यह गुजरात की पूर्वमुख्यमंत्राी आनंदीबेन पटेल के दिनों के एक निर्णय से समझा जा सकता है जिसने किसी विद्वान से सम्पर्क करके लिखवाये अंबेडकर चरित्रा की चार लाख प्रतियां कबाड़ में डाल दीं, वजह थी कि उस विद्वान ने किताब के अन्त में उन 22 प्रतिज्ञाओं को भी शामिल किया जो डा अंबेडकर ने 1956 में धर्मांतरण के वक्त़ अपने अनुयायियों के साथ ली थीं। 11

और शायद इसी एहसास ने जबरदस्त प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। और अब यही संकेत मिल रहे हैं कि यह कारवां रूकनेवाला नहीं है।

चाहे चेन्नई आई आई टी में अंबेडकर पेरियार स्टडी सर्कल पर पाबंदी के खिलाफ चली कामयाब मुहिम हो 12 या हैद्राबाद सेन्टल युनिवर्सिटी के मेधावी छात्रा एवं अंबेडकर स्टुडेंट एसोसिएशन के कार्यकर्ता रोहिथ वेमुल्ला की ‘सांस्थानिक हत्या’ के खिलाफ देश भर में उठा छात्रा युवा आन्दोलन हो13 या महाराष्ट में सत्तासीन भाजपा सरकार द्वारा अंबेडकर भवन को गिराये जाने के खिलाफ हुए जबरदस्त प्रदर्शन हों या इन्कलाबी वाम के संगठनों की पहल पर पंजाब में दलितों द्वारा हाथ में ली गयी ‘जमीन प्राप्ति आन्दोलन’ हो – जहां जगह जगह दलित अपने जमीन के छोटे छोटे टुकड़ों को लेकर सामूहिक खेती के प्रयोग भी करते दिखे हैं, यही बात समझ में आती है कि दलित दावेदारी की तीव्रता बढ़ रही है और उसका लड़ाकूपन तथा व्यापकता में नयी तेजी आयी है।14

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भीमा कोरेगांव: मोटी चार्जशीट, कमजोर कड़ियां 

इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान ही एनडीटीवी चैनल ने /26 दिसम्बर 2018, एनडीटीवी /15 भीमा कोरेगांव गिरफतारियों के सिलसिले में दायर 5,600 पन्नों की चार्जशीट को लेकर अहम खुलासे किए, उसके मुताबिक ‘जिन वकीलों, कवियों और प्रोफेसरों के खिलाफ जून माह में आरोपपत्रा दायर किए गए हैं, उसमें कई स्तरों पर कमजोर कड़ियां हैं।’ रिपोर्ट के मुताबिक

मालूम हो कि सुधीर ढवले, रोना विल्सन, सुरेन्द्र गड़लिंग, शोमा सेन और महेश राउत को भीमा कोरेगांव हिंसा को भड़कानें के आरोप में गिरफतार किया गया है। नवम्बर माह में महाराष्ट पुलिस ने पुणे की अदालत में उनके खिलाफ 5,600 पेजी चार्जशीट दायर की है। प्रस्तुत आरोपपत्रा जाति आधारित हिंसा से परे जाकर उस कथित माओवादी षडयंत्र की बात करता है। आरोपों के सबूत के तौर पर पुलिस ने एक्टिविस्टों के घरों आदि पर डाले गए छापों में बरामद सामग्रियों – पत्रा, कॉल रेकॉर्ड विवरण, पुलिस अधिकारियों के बयान और एल्गार परिषद के आयोजन में मुब्तिला लोगों के बयान दिए हैं।

रेखांकित करनेवाली बात है कि अभियुक्तों ने नफरत भरे भाषण दिए और विस्फोटक प्रचार सामग्री का वितरण किया, इसकी पुष्टि के लिए पुलिस ने सभा स्थल पर वितरित पर्चे मात्रा जोड़े हैं। इन पर्चों में कहीं भी माओवादी गतिविधियों का जिक्र नहीं है, अधिकतर सामग्री का फोकस भाजपा तथा राष्टीय स्वयंसेवक संघ की मुखालिफत करने पर है।

अपने इस दावे को पुष्ट करने के लिए कि अभियुक्तों ने ही इस प्रोग्राम के लिए पैसा इकटठा किया, पुलिस ने पचास से अधिक बयानों की कापियां जोड़ी है। यह बयान इस दावे को कत्तई पुष्ट नहीं करते, महज इसी बात को प्रमाणित करते हैं कि 250 संगठनों ने इस कार्यक्रम के लिए चन्दा इकटठा किया।

दलित संगठनों और अन्य सामाजिक संगठनों से जुड़े छह लोगों ने इस बात की ताईद की है कि इस कार्यक्रम का आयोजन दो रिटायर्ड न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति पी बी सावंत और न्यायमूर्ति कोलसे पाटील ने किया था। अभियुक्तों के वकीलों दावा है कि पुलिस ने न्यायाधीशों के बयान अभी तक दर्ज नहीं किए हैं।

गौरतलब है कि अभी तक पुलिस ने उसके सबसे सनसनीखेज दावे – कि अभियुक्तों ने प्रधानमंत्राी मोदी की हत्या की साजिश रची – को प्रमाणित करने के लिए कोई ताज़ा सबूत नहीं दिया है।

यह आरोप उसी पत्र के इर्दगिर्द घुमते हैं जो कामरेड ‘आर’ और कामरेड प्रकाश के बीच हुआ है। पत्रा में लिखा गया है कि ‘‘कामरेड किसन और कुछ अन्य वरिष्ठ कामरेडों ने मोदी राज को समाप्त करने के लिए ठोस प्रस्ताव रखे हैं। हम लोग राजीव गांधी किस्म की घटना के बारे में सोच रहे हैं।

इस पत्र की प्रामाणिकता पर – तथा मीडिया के लिए जारी अन्य पत्रों पर – जानकारों ने इस आधार पर सवाल उठाए हैं कि उनमें रणनीतियों का प्रगट उल्लेख किया गया है और उस कोडेड भाषा का अभाव है जो बेहद गोपनीय पत्राव्यवहार में इस्तेमाल होती है। इस बात के बावजूद कि प्रस्तुत पत्रा पांच माह पहले सार्वजनिक दायरे में आया, आरोपपत्रा में हत्या की साजिश को लेकर कोई अतिरिक्त सामग्री नहीं है।

अभियुक्तों के कॉल रेकार्ड के दो खंड, जो आरोपपत्रा के साथ जोड़े गए हैं, वह भी माओवादी सम्बन्ध स्थापित करते नहीं दिखते। …./वही/

ध्यान रहे कि एनडीटीवी की प्रस्तुत रिपोर्ट के बाद बचाव पक्ष के वकीलों में से एक – निहालसिंह राठौड – ने अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता के बारे में सवाल उठाते हुए ढेर सारी बातें कहीं। उनका कहना है कि ‘‘ गिरफतारियों के इतने माह में बाद भी पुलिस ने हमें उन सबूतों की mirror images (मिरर इमेजेस) नहीं सौंपी है, लिहाजा छापे में बरामद वस्तुओं की प्रामाणिकता को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता।  /मिरर इमेजेस का आम भाषा में अर्थ है कि अगर किसी कम्प्युटर की हार्ड डिस्क पुलिस छापे के दौरान जब्त करती है तो उसे इस हार्ड डिस्क की – बिना छेड़छाड़ की हुई एक कॉपी अभियुक्त के वकील को देनी होती है ताकि अदालत में जिरह के दौरान यह न कहा जाए कि आप ने जब्ती के बाद हार्डडिस्क से छेड़छाड़ की।/ और इसके बारे में जब जांच अधिकारी शिवाजी पवार से पत्राकार ने बात की तब उन्होंने हम अदालती कार्रवाई के दौरान ही इसके बारेे में बात करेंगे। 16

याद रहे कि जून माह में हुई इन गिरफतारियों के बाद अगस्त माह में गिरफतारियों का दूसरा सिलसिला चला था, जिसमें कवि वरवरा राव मानवाधिकार कार्यकर्ती एवं वकील सुधा भारद्वाज, वेरनॉन गोन्साल्विस, अरूण परेरा और गौतम नवलखा को भी गिरफतार किया गया था।

फिलवक्त यह बात इतिहास हो चुकी है कि मगर इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि पुणे पुलिस के इस अविचारी कदम की उलट प्रतिक्रिया हुई थी और इसने समूचे मुल्क में जबरदस्त आक्रोश और गुस्से को जन्म दिया था। देश के तमाम शहरों एवं नगरों में इसके खिलाफ जुलूस निकले थे और रैलियों का आयोजन हुआ था। देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मामले में किए गए अभूतपूर्व हस्तक्षेप ने सरकार को ही बचावात्मक पैंतरा अपनाने के लिए मजबूर किया था। सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से इस मामले में इतिहास रचा जब उसने इस मामले में तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप को मंजूरी दी जब उसने  इस सन्दर्भ में अग्रणी बुद्धिजीवियों द्वारा पेश याचिका को स्वीकारते हुए तीन सदस्यीय पीठ का गठन किया तथा महाराष्ट सरकार को नोटिस जारी किया। ‘असहमति को जनतंत्र का सेफटी वॉल्व’ घोषित करते हुए उसने सरकार को याद दिलाया कि अगर सरकार असहमति का दमन करती है तो जनतंत्र सुरक्षित नहीं रहेगा।

एक तरफ दावे प्रधानमंत्राी की हत्या की साजिश के और दूसरी तरफ बेहद ढीले ढाले ढंग से चल रही इस जांच को देखते हुए तथा गिरफतारियों के दो दौर में तीन माह का अन्तर को रेखांकित करते हुए विश्लेषकों द्वारा यह भी कहा गया कि समूचा घटनाक्रम लोगों को 21 वीं सदी के पहली दहाई के गुजरात की याद दिलाता है, जब ऐसी ही साजिशों के खुलासे हो रहे थे, जब जनाब मोदी राज्य के मुख्यमं़त्राी थे। इस दौरान राज्य में कई फर्जी मुठभेड़ो में कई निरपराध मारे गए थे, इस दिखावटी दावे के साथ वह विशिष्ट ‘‘जिहादी’’ जनाब मोदी की हत्या के लिए आया था। और जब इन मामलों में जांच आगे बढ़ी तो कई पुलिस अधिकारियों ने इन फर्जी मुठभेड़ों में संलिप्तता के नाम पर कई साल जेल में बीताए थे।

विश्लेषकों ने गिरफतारियों के इस दूसरे दौर में इस बात को नोट किया था कि पुणे पुलिस द्वारा की गयी इस कार्रवाई का फौरी कारण खुद महाराष्ट एटीएस द्वारा कथित तौर पर सनातन संस्था और आनुषंगिक हिन्दुत्ववादी संगठनों से जुुड़े कार्यकर्ताओं के घरों से बरामद हथियारों का जखीरा, विस्फोटक और डिटोनेटर्स और उनमें से पांच कार्यकर्ताओं की गिरफतारी और एक ऐसी साजिश का खुलासा था जिसके तहत भीड़ भरे स्थानों और उत्सवों की जगहों पर बम रख कर साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने की योजना थी। दरअसल, इन खुलासों ने राज्य स्तर पर तथा केन्द्र स्तर पर भी अत्यधिक दबाव बनाया था कि वह सनातन संस्था और उसके आनुषंगिक संगठनों हिन्दु जनजाग्रति समिति पर पाबन्दी लगा दे, जो खुल्लमखुल्ला ‘शैतानी ताकतों के विध्वंस को आध्यात्मिक कार्य’ घोषित करते आए हैं। यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि यह संगठन विगत एक दशक से अधिक समय से, हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने और यहां तक कि आतंकी गतिविधियों में अपने कार्यकर्ताओं की संलिप्तता के चलते – जांच एजेंसियों के निशाने पर हैं और राज्य में सत्तासीन पूर्ववर्ती सरकारों ने भी इन संगठनों पर पाबन्दी के लिए केन्द्र सरकार के पास अपनी सिफारिशें भेजी थीं।

हुक्मरानों का अनुमान था कि देश के पैमाने पर की गयी इन गिरफतारियों को अंजाम देने के बाद – निष्ठावान मीडिया के सहयोग से – उन्हें आर्थिक मोर्चे पर अपनी प्रचंड नाकामियों पर परदा डालने का अवसर मिलेगा। सरकार के अनुमान के विपरीत मुख्यधारा के प्रिन्ट मीडिया ने भी इस अविचारी कदम पर प्रश्न उठाया था और कहा था कि यह भाजपा का मैकार्थी मुक़ाम है, वही दौर जब चालीस के दशक के उत्तरार्द्ध और पचास के दशक की शुरूआत में अमेरिकी सरकार ने वामपंथी रूझानों का आरोप लगाते हुए तमाम लेखकों, विद्वानों और कार्यकर्ताओं को प्रताडित किया था।

सितम्बर माह में बहुमत के आधार पर दिए अपने फैसले में आला अदालत के तीन सदस्यीय पीठ ने इस पूरे मामले की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम द्वारा जांच करने की मांग ठुकरायी थी और यह कहा था कि अभियुक्त जमानत के लिए टायल अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। रेखांकित करनेवाली बात यह थी कि तीन सदस्यीय पीठ में जहां तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति खानविलकर ने कहा कि यह ‘‘समूचा मामला असहमति और राजनीतिक नज़रिये के फरक के चलते नहीं है, लिहाजा अभियुक्तों को यह कहने का अधिकार नहीं है कि कौनसी जांच एजेंसी इस मामले को देखे’। वहीं पीठ के तीसरे सदस्य न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने बहुमत की राय से असहमति प्रगट की थी और अपनी कार्रवाइयों के लिए महाराष्ट पुलिस की तीखी आलोचना की थी। उनका कहना था कि ‘ इस पूरे मामले की जांच महाराष्ट पुलिस निष्पक्ष ढंग से करेगी, इस पर उन्हें सन्देह है और वह स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम द्वारा जांच के पक्ष में हैं।17

अगर हम न्यायमूर्ति चंद्रचूड के असहमति के वक्तव्य को पढ़ें तो दूसरे दौर में हुई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, कवि एवं प्रोफेसरों की गिरफतारी के पूरे मामले की भी कई कमजोर कड़ियां साफ दिखती हैं। ऐसे मामलों में मीडिया द्वारा ही फैसला सुनाने की आलोचना करते हुए वह यह सवाल भी उठाते हैं कि जबकि मामले की जांच चल रही हो तब जांच एजेंसियों द्वारा प्रेस सम्मेलन कर चुनिन्दा बातों को साझा करना जांच की निष्पक्षता को सन्देह के घेरे में डालता है। /वही/

फिलवक्त़ सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, वेरनॉन गोन्साल्विस और अरूण परेरा जेल में है, जबकि गौतम नवलखा को दिल्ली की उच्च अदालत से जमानत मिली है। याद रहे अगस्त में देश भर में पड़े इन छापों के दौरान प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बडे, जो दलित मसलों के अध्येता हैं तथा गोवा इन्स्टिटयूट आफ मेनेजमेण्ट में प्रोफेसर है, के घर पर भी छापा डाला गया था, अपने मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट खारिज करने की उनकी याचिका अभी सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

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बैटल आफ भीमा कोरेगांव: एन अनएन्डिंग जर्नी’

पुणे विश्वविद्यालय से मीडिया स्टडीज में अध्ययन कर चुके युवा सोमनाथ वाघमारे ने लगभग 55 मिनट की एक डाक्युमेण्टरी बनायी है जिसका शीर्षक है ‘‘बैटल आफ भीमा कोरेगांव: एन अनएन्डिंग जर्नी’ अर्थात भीमा कोरेगांव का संघर्ष: एक अन्तहीन संघर्ष। 18

बचपन से भीमा कोरेगांव के संघर्ष की गाथा सुनते आ रहे सोमनाथ ने युवावस्था में यह देखा कि इस संघर्ष को सार्वजनिक विमर्श मे कोई स्थान नहीं है, जबकि पेशवाओं के राज का महिमामंडन हो रहा है। अण्णा हजारे का गांव रालेगांव सिद्धी भीमा कोरेगांव के पास ही स्थित है, मगर मुख्यधारा की मीडिया जो समय समय पर रालेगांव सिद्धी का गुणगान करता रहा है, उसने भीमा कोरेगांव पर निगाह डालना भी मुनासिब नहीं समझा है।

यह डाक्युमेण्टरी हर साल 31 दिसम्बर-1 जनवरी को भीमा कोरगांव में बने ‘जयस्तंभ’ पर आयोजित होने वाले महोत्सव पर केन्द्रित है।

बंगलौर की किसी बहुदेशीय कम्पनी में कार्यरत रोहन आर्थर बताते हैं कि ‘‘इस फिल्म का टाइटल ‘बैटल आफ भीमा कोरेगांव है .. लेकिन किसी को इस बात पर दिग्भ्रमित नहीं होना चाहिए कि वह इतिहास की एक घटना है।.. दरअसल वह ‘‘कभी समाप्त होने वाली यात्रा’ है। ब्राहमणवादी ताकतों के खिलाफ संघर्ष हिन्दोस्तां में आज भी हर पल जारी है.. /वही/

उनके मुताबिक डाक्युमेंटरी ‘एक किस्म से जश्न का जश्न’  (Celebration of Celebration )  है और ‘दावेदारी पर दावेदारी’  (assertion over assertion )  है।

आप गौर से देखेंगे कि इस फिल्म में कोई एक नायक नहीं है, इसमें इतने सारे लोग दिखाई देते हैं, जो दुनिया के अलग अलग हिस्सों से वहां आए हैं। न कोई ‘महामहिम’ है और न ही कोई ‘सेलेब्रिटी’। दरअसल वह उनके बारे में है ही नहीं।

फिल्म की शुरूआत एक बैण्ड से होती है, जिसमें जय भीम आदि का उदघोष हो रहा है। वहां कोई असहाय या पीड़ित नहीं हैं बल्कि वहां एक जीत का जश्न मनाते और संघर्ष को जारी रखने का संकल्प लेते दलित हैं।..

मगर इसमें महज सेलिब्रेशन / जश्न ही नहीं है।

वह करारा प्रहार भी है हुकूमती जमातों पर, उनकी मीडिया पर, सत्ता संरचनाओं पर और खोखले गर्व पर।

अम्बेडकरी आन्दोलनों को भी वह नहीं बक्शती, उनकी भी आलोचना करती है और अलग अलग उददेश्यों के नाम पर विचारधारा के विघटन से आगाह करती है।

फिल्म के आखिर में परदे पर एक छोटा बच्चा आता है जो आसपास की समूची दुनिया को विस्मयकारी निगाहों से निहार रहा है। उसके आंखें उसके मन में व्याप्त कुतुहल, जिज्ञासा, जीजीविषा को बखूबी बयां करती है। बिल्कुल आखरी शॉट समर्पण का है। और परदे पर रोहिथ वेमुल्ला की एक तस्वीर उभर आती है।

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संदर्भ एवं टिप्पणियां

  1. गोपाल बाबा वलंगकर /1840-1900/ ब्रिटिश सेना से 1886 में रिटायर होने के बाद गोपाल बाबा ने समाजसुधार के कार्यों को अपने हाथ में लिया, जो खुद महार जाति में पैदा हुए थे। उन्होंने न केवल समकालीन पत्रपत्रिकाओं में समाज में जागृति  लाने के लिए लेखन किया बल्कि एक साप्ताहिक समाचार पत्रा का प्रकाशन भी किया और अपने विचारों को दूर तक पहुंचाने के मकसद से ‘‘अनार्य दोष परिहार’’ नामक संस्था भी बनायी। उनकी बहुचर्चित रचना है ‘‘विटाल विध्वंसन’ /1888/ जिसमें उन्होंने हिन्दुओं से 26 प्रश्न पूछे थे और यह प्रश्न उनके धर्मग्रंथों के आधार पर थे। किताब का निचोड यही था कि सनातनी हिन्दू कितने स्वार्थी और मतलबी हैं. और अछूतों की दयनीय दशा के लिए हिन्दू और उनके धर्म-ग्रन्थ जिम्मेदार हैं। वलंगकर के सामाजिक कार्यों को देखते हुए अंग्रेज सरकार ने उन्हें महाड़ जिला  लोकल बोर्ड का सदस्य नियुक्त किया था. लोकल बोर्ड के सदस्य के बतौर सूबेदार गोपाल बुआ वलंगकर ने दलित जातियों के लिए कई कल्याण-कारी योजनायें मंजूर करवाने में अहम भूमिका निभाई थी। डा अम्बेडकर गोपाल बाबा वलंगकर को दलित आन्दोलन का प्रणेता मानते थे।
  1. https://scroll.in/article/892631/they-want-fascist-forces-to-reign-retired-judges-who-organised-elgar-parishad-speak-out
  1.    भीमा-कोरेगांव में हिंसा की घटना पुलिस की लापरवाही से हुई और यह पूर्व नियोजित थी। संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे ने हिंसा भड़काने के हालात बनाए। यह दावा कोल्हापुर आईजी के निर्देश पर गठित सत्यशोधन समिति ने अपनी जांच रिपोर्ट में किया है। समिति ने हिंसा की जांच कर रही पुणे ग्रामीण पुलिस को अपनी जांच रिपोर्ट भी सौंप दी है। 1 जनवरी को कोरेगांव भीमा में दो गुटों के बीच दंगे हुए थे। जिसमें एक युवक को अपनी जान गंवानी पड़ी। इसमें आगजनी, पथराव जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया था।

क्या है सत्यशोधन समिति ?

– भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले को लेकर कई स्वतंत्रत संस्थाएं जांच कर रही हैं। जिनमें 10 लोगों की सत्यशोधन समिति भी शामिल है। इसे कोल्हापुर आईजी के निर्देश पर गठित किया गया है। इसकी अध्यक्षता पुणे के उप महापौर डॉ. सिद्धार्थ धेंडे कर रहे हैं। जबकि महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले में दो सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया है। जिसकी जांच रिपोर्ट आना अभी बाकी है।

जांच रिपोर्ट में यह सामने आया:

पुलिस को सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक, मिलिंद एकबोटे ने महार समाज के इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने के लिए श्धर्मवीर संभाजी महाराज स्मृति समितिश् का गठन किया था। इसमें हिंसा को लेकर मिलिंद एकबोट और भिड़े गुरूजी को मुख्य आरोपी बनाया गया है। साथ ही कहा गया है कि कुछ पुलिसवालों ने भी उनका साथ दिया था।

जबरदस्ती दिया जा रहा है नक्सल एंगल:

सत्यशोधन समिति के अध्यक्ष डॉ.सिद्धार्थ धेंडे ने बताया कि इसके सबूत बहुत पहले ही पुलिस को सौंप दिए गए लेकिन उस पर पुलिस ने अभी तक कुछ भी नहीं किया है। इस प्रकरण को नक्सल मोड़ देकर जांच की जा रही है, जो गलत है। पुलिस ने जांच की दिशा ही बदल डाली है।

इस आधार पर तैयार की जांच रिपोर्ट:

डॉ. सिद्धार्थ धेंडे ने बताया कि फाइनल रिपोर्ट बनाने से पहले उनकी समिति से जुड़े लोगों ने हिंसा वाले इलाके का दौरा किया। वहां के लोगों से बात की और उनके इंटरव्यू भी रिकॉर्ड किए। यही नहीं उस दौरान ड्यूटी पर तैनात पुलिसवालों के बयान भी रिकॉर्ड किए गए। इन सबके बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे कि यह हिंसा पूर्व नियोजित थी। हिंसा में इस्तेमाल पत्थर और लाठी-डंडों का इंतजाम पहले से किया गया था।

राज्य सरकार द्वारा गठित आयोग पर बनाया गया दबाव:

डॉ. सिद्धार्थ धेंडे ने बताया कि राज्य सरकार ने जांच के लिए जो आयोग नियुक्त किया है। उस आयोग के समक्ष मामले के मुख्य आरोपी मिलिंद एकबोटे अपने वकील के साथ बैठते हैं। यह एक प्रकार से आयोग पर दबाव डालने की कोशिश है। डॉ. सिद्धार्थ धेंडे का आरोप है कि सरकार एकबोटे और संभाजी भिड़े को बचाने की कोशिश कर रही है।

क्या कहना है पुणे ग्रामीण पुलिस का?

भीमा कोरेगांव हिंसा मामले की जांच कर रही पुणे ग्रामीण पुलिस का दावा है कि 1 जनवरी को भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के पीछे 31 दिसंबर को पुणे के शनिवारवाड़ा में आयोजित यलगार परिषद में हुए भाषण भी एक कारण हैं। इसी साल जून महीने में भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में पुणे ग्रामीण पुलिस ने प्रतिबंधित माओवादी संगठन से जुड़े पांच एक्टिविस्ट शोमा सेन, महेश राऊत, सुरेंद्र गडलिंग, रोना विल्सन और सुधीर ढवले को मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद औऱ रांची से गिरफ्तार किया था। इसके बाद इसी मामले में अगस्त महीने में रांची से फादर स्टेन स्वामी, हैदराबाद से वामपंथी विचारक और कवि वरवरा राव, फरीदाबाद से सुधा भारद्धाज और दिल्ली से सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलाख की गिरफ्तारी हुई है। सभी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अगली सुनवाई तक नजरबंद रखने का आदेश दिया गया है।

https://www.bhaskar.com/maharashtra/pune/news/koregaon-bhima-was-pre-planned-violence-says-investigation-report-5955982.html)

https://www.epw.in/journal/2018/13/commentary/investigating-violence-koregaon-bhima.html ; https://mumbaimirror.indiatimes.com/mumbai/crime/bhima-koregaon-violence-inflammable-substance-used-for-torching-vehicles-stones-stored-on-buildings-top-floor-claims-report/articleshow/65821013.cms;

4- http://roundtableindia.co.in/index.php?option=com_content&view=article&id=9515:bhima-koregaon-justice-for-victims-of-casteist-attack&catid=129:events-and-activism&Itemid=195

5-https://web.archive.org/web/20051102115844/http://asnic.utexas.edu/asnic/sagar/spring.1994/richard.white.art.html

6. https://thewire.in/caste/myth-bhima-koregaon-reinforces-identities-seeks-transcend

7. https://www.marxists.org/hindi/bhagat-singh/1923/achoot-samasya.htm

8- https://thewire.in/rights/why-the-state-is-attempting-to-link-dalit-resistance-to-maoism

9-https://kafila.online/2017/01/04/watch-marching-with-the-bhim-army/; http://nsi-delhi.blogspot.in/2016/08/dalit-uprising-and-after-why-hindutva.html ; https://www.forwardpress.in/2016/07/dalits-launch-land-rights-movement-in-punjab/

10-  https://www.news18.com/news/politics/mayawati-takes-dig-at-bhim-army-young-cadre-point-to-bjp-rss-synergy-1521597.html ; https://timesofindia.indiatimes.com/city/lucknow/bhim-army-is-a-product-of-bjp-mayawati/articleshow/58842123.cms ; https://www.hindustantimes.com/lucknow/bsp-plans-to-counter-jignesh-s-moves-in-west-up/story-sVpARkPzl4gQalh1VoAL1K.html

11- http://www.baiae.org/resources/great-people/dr-babasaheb-ambedkar/12-ambedkar-writings-and-speeches/7-22-vows-of-dr-ambedkar.html

12- https://kafila.org/2015/06/05/no-to-ambedkar-periyar-in-modern-day-agraharam/

  1. https://kafila.org/2016/01/22/long-live-the-legacy-of-comrade-vemula-rohith-chakravarthy-statement-by-new-socialist-initiative-nsi/

14.https://nbsdelhi.wordpress.com/2016/08/24/hail-the-assertion-by-landless-dalits-of-punjab-and-gujarat-of-their-right-to-land-land-to-the-tiller-key-to-annihilating-caste/

..पंजाब में पंचायत की 1,58,000 एकड पंचायत जमीन में से दलितों का हिस्सा महज 52,667 एकड़ का है। नजूल जमीनों के तहत भी उन्हें कानूनी हक मिला है, मगर इन तमाम जमीनों पर वास्तविक कब्जा भूस्वामियों और धनी किसानों का है। 2010-11 के क्रषि जनगणना को देखें तो पंजाब में अनुसूचित जाति के लोग, जो आबादी का तीसरा हिस्सा हैं, उनके पास भूमि का महज 6.02 फीसदी हिस्सा था और राज्य की भूमिक्षेत्रा का महज 3.2 फीसदी था। …

वर्ष 2014 के बाद से दलित किसान जमीन प्राप्ति संघर्ष समिति के बैनर तले संगठित हुए हैं और उन्होंने लाल झंडा लेकर जो उनकी अपनी जमीन है, उस पर हक जताना शुरू किया है। इन जमीनों को भूस्वामियों के पिटठु उम्मीदवारों का नीलाम किया जाता था ; उदाहरण के लिए संगरूर जिले में एक गोशाला को तीस साल तक के लिए सात हजार रूपया प्रति एकड़ के हिसाब से तीस साल के लिए तत्कालीन अकाली दल-भाजपा सरकार द्वारा जमीन आवंटित की गयी थी जबकि दलितों के लिए यही कीमत 20,000 रूपए से अधिक बतायी जाती है।

15. https://www.ndtv.com/india-news/bhima-koregaon-arrests-5-600-page-chargesheet-has-many-weak-links-1968335

16. https://mumbaimirror.indiatimes.com/mumbai/cover-story/in-a-5000-page-charge-sheet-little-on-urban-rascals-plot-to-kill-modi/articleshow/66962271.cm

  1. https://thewire.in/rights/justice-chandrachud-bhima-koregaon-maharashtra-police-activists-arrests

18.http://roundtableindia.co.in/~roundta3/index.php?option=com_content&view=article&id=9053:somnath-waghamare-s-battle-of-bhima-koregaon-an-unending-journey&catid=119:feature&Itemid=132

 

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