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बंगलादेशी जनउभार और भारत की मुर्दाशान्ति: किशोर झा

Kishore Jha is a development professional and is working in the field of children’s rights for the last two decades. This piece was originally published on the NSI blog.

सन २०११ में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन में उमड़े हजारों लोगों की तस्वीरें आज भी ज़ेहन में ताज़ा है। उन तस्वीरों को टी वी और अख़बारों में इतनी बार देखा था कि चाहें तो भी नहीं भुला सकते। लोग अपने-अपने घरों से निकल कर अन्ना के समर्थन में इक्कठे हो रहे थे और गली मोहल्लों में लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे लगा रहे थे। इंडिया गेट से अख़बारों और न्यूज़ चैनलों तक पहुँचते पहुँचते सैकडों समर्थकों की ये तादात हजारों और हजारों की संख्या लाखों में पहुँच जाती थी। तमाम समाचार पत्र इसे दूसरे स्वतंत्रता आन्दोलन की संज्ञा दे रहे थे और टी वी देखने वालों को लग रहा था कि हिंदुस्तान किसी बड़े बदलाव की दहलीज़ पर खड़ा है और जल्द ही सूरत बदलने वाली है। घरों में सोयी आवाम अचानक जाग गयी थी और राजनीति को अछूत समझने वाला मध्यम वर्ग राजनैतिक रणनीति का ताना बाना बुन रहा था। यहाँ मैं आंदोलन के राजनितिक चरित्र की बात नहीं कर रहा बल्कि ये याद करने की कोशिश कर रहा हूँ कि उस आंदोलन को उसके चरम तक पहुचाने वाला मीडिया अपने पड़ोस बांग्लादेश में उठ रहे जन सैलाब के जानिब इतना उदासीन क्यों है और कुछ ही महीने पहले बढ़ी आवाम की राजनैतिक चेतना आज कहाँ है? Continue reading बंगलादेशी जनउभार और भारत की मुर्दाशान्ति: किशोर झा