6 दिसंबर : न्यायिक विस्मरण के विरुद्ध

एक बार फिर 6 दिसम्बर आ कर गुजर गया. लेकिन क्या ज़रूरी था कि हम इसे याद करें ही? क्या अठारह साल  पहले हुई एक ‘भूल’ की बार- बार याद दिला कर हम अपने  समाज को मानसिक रूप से आगे बढ़ने से  रोक तो नहीं रहे? याद करना और याद रखना  हमेशा स्वास्थ्यकर हो, आवश्यक नहीं. कई बार तो ज़िन्दगी में इत्मीनान के लिए भूलना बेहतर है. बल्कि,जैसा लातीन अमरीकी     कवि जुआन रामोन हिम्नेज़ का कहना है , याद करना  प्राय: कृत्रिम है जबकि  भूलना या विस्मृति अधिक प्राकृतिक क्रिया है. ऐसा तो नहीं कि हम याद करने को भूलने के ऊपर इसलिए तरजीह देते हैं कि याद रखने में आयास करना होता है और विस्मरण अपनेआप होने वाली क्रिया है?  क्या विस्मृति की निष्क्रियता उसे हीनतर बना देती है स्मृति के मुकाबले? और क्या इसी वजह से हम याद रखने को आधुनिक मनुष्य का नैतिक कर्तव्य मानते हैं? हिम्नेज़ लिखते हैं, ‘स्मृति शोर-शराबे की पुत्री है जबकि विस्मृति मौन की.’ वे कवि को यह कहते  हैं कि स्मृति पर काबू पाना विजयी होना है और उसके आगे घुटने टेक देना पराजित होना है. सबसे ताकतवर  व्यक्ति वह है जो सबसे अधिक भूलता है. हिम्नेज़ इसलिए विस्मृति का आदर करने की सलाह देते हैं क्योंकि वह  हमें वर्तमान  क्षण को विलक्षणता पर एकाग्र होने का अवसर देती है. कवि का मश्विरा है कि हमारे लिए ज़रूरी है अपनी ज़िंदगी के पैमाने पर स्मृति और विस्मृति को समान स्थान देना और दोनों के बीच  संतुलन की तलाश करना.
अगर स्मृति और विस्मृति के बीच संतुलन की तलाश करना हमारा कर्तव्य है, तो स्मृति के लिए जगह बनी रहती है. इसका अर्थ यह है कि हमें यह चुनाव करना होता है कि हम क्या भूलें और क्या याद रखें. यह व्यक्तिगत जीवन के लिए जितना ठीक है उतना ही सामुदायिक जीवन के लिए. वह समुदाय धार्मिक हो सकता है या राष्ट्र भी. लेकिन जब हम यह  कह रहे होते हैं तो मान कर चलते हैं कि हर किसी को, वह व्यक्ति हो या समुदाय, स्मृति और विस्मृति का अधिकार है. इस अधिकार का अर्थ यह है कि वह क्या  याद रखे और क्या नहीं, यह चुनने का अधिकार उसके पास है. स्मृतियों के चुनाव के ज़रिए हम अपने अतीत का निर्माण करते हैं. वह अतीत हमारे वर्तमान का अतीत होता है. इस प्रकार हम अतीत का निर्माण करते हुए वस्तुतः अपने वर्तमान का सृजन कर रहे होते हैं. ठीक यही बात विस्मृति के साथ भी लागू होती है. विस्मरण, अगर हम फिर हिम्नेज़ को दुहराएं , हमें यह मौका देता है कि हम वर्तमान को निरावरण,उसकी  अपनी अद्वितीयता में पहचानें और उसके साथ स्वतंत्र संबंध बनाएं जिस पर किसी और का बोझा न हो. जब हम याद करते हैं तो क्या हम किसी गुजर चुके के प्रति जिम्मेदारी के बोध के बोझ से दबे तो नहीं होते? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें लगता है भूलने का अर्थ है, इस बीत चुके से अपने रिश्ते को भूल जाना और यह हमारे भीतर एक तरह के अपराध-बोध को जन्म देता है? और इसी अपराध-बोध के चलते याद करने की नैतिक बाध्यता भी मालूम पड़्ती है. अगर हमें इस नैतिक बाध्यता से मुक्त कर दिया जाए तो शायद हम बहुत सारी यादों से भी आज़ाद हो जाना चाहें.
विस्मरण एक तरफ हमें अतीत के  अनावश्यक भार से मुक्त होने का अवसर देता है और आज के प्रति अपनी जवाबदेही पूरी करने के लिए निर्द्वन्द्व भी बनाता है. लेकिन प्रश्न यह है कि एक निर्द्वन्द्व समाज क्या अधिक श्रेयस्कर है उस समाज के मुकाबले जो अपने द्वन्द्वों को नज़रन्दाज नहीं करता और उनका सामना करता है? मैं यह नहीं कहना चाह्ता कि याद रखने में ही साहस है, भूलने में नहीं. लेकिन इस भूलने की प्रक्रिया की और बारीकी से परीक्षा करने की ज़रूरत है. जर्मनी और युरोप के बीसवीं सदी के अतीत को समझने की आवश्यकता बताते हुए थिओडोर अडोर्नो ने भूल जाने की वकालत के बारे में चेतावनी दी कि यह मांग इतनी निर्दोष नहीं जितनी ऊपर से दीखती है. अडोर्नो कहते हैं कि हर चीज़ को भुला देने और माफ कर देने का दृष्टिकोण शायद उनके लिए उपयुक्त हो जो अन्याय के शिकार हुए है लेकिन इसका प्रयोग उस दल के समर्थकों द्वारा किया जाता है जिन्होंने अन्याय किया है. एक दूसरे प्रसंग में उन्होंने लिखा, जल्लाद  के घर  में फांसी के फंदे की चर्चा नहीं करनी चाहिए वरना समझा यह जायेगा कि आपके मन में (उसके प्रति)कड़वाहट और विद्वेष है. ये दोनों ही  भाव नकारात्मक हैं . जो मन में कड़वाहट रखता है , जीवन के प्रति उसका नज़रिया सकारात्मक नहीं. जिस व्यक्ति या समुदाय का रवैया नकारात्मक है वह पूरे समाज के लिए स्वतः बाधक हो जाता है.

फांसी के फन्दे के साये से  छुटकारा पाए बिना आगे बढ्ना मुमकिन नहीं. जो समाज आगे बढ़ने में यकीन रखता है वह अस्वस्तिकर यादों के साए से निकल आना चाहता है. 6 दिसंबर के सिलसिले में यह् किंचित लंबी चर्चा इसलिए प्रासंगिक है कि पिछले दो महीनों में हमने बार-बार यह सुना है कि बाबरी मस्जिद परिसर के स्वामित्व को लेकर  इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा दिए गए फैसले पर उसकी प्रतिक्रिया से भारतीय जनता की परिपक्वता और अतीत से चिपके न रहकर आगे बढ़ जाने की उसकी आकांक्षा का पता चलता है. इसका अर्थ है कि वह एक विभाजनकारी अतीत की स्मृति को भुला देना चाहती है. अनेक विद्वानों और राजनेताओं के लिए यह बड़े प्रीतिकर आश्चर्य का विषय था कि जिस परिसर को लेकर पिछली चौथाई सदी में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच इतनी उत्तेजना देखी गई, जिसका नतीजा कितनी बर्बादी और कत्लोगारत में देखा गया, उसे जब किसी एक को न देकर तीन हिस्सों में तकसीम कर दिया गया तो दोनों ही समुदायों ने इसे बड़ी सौम्यता के साथ ग्रहण किया. इस सौम्यता का दबाव इतना अधिक था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख ने भी कहा कि इसकी व्याख्या  किसी की जीत और किसी की हार के रूप में नहीं की जानी चाहिए.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन में भारतीय न्याय प्रक्रिया के प्रति पैदा हुए  इस आदर भाव की व्याख्या भी इस रूप में की गई कि यह कटुतापूर्ण स्मृतियो को बिसराकर आगे बढ़्ने की जनता की इच्छा के वातावरण के  व्यापक प्रभाव के  कारण ही सम्भव हुआ है. जब कुछ लोगों ने लखनऊ पीठ के फैसले को पढ़कर यह पूछना शुरू किया कि ऐसा कैसे हुआ कि बाबरी मस्जिद के परिसर को लेकर दिए गए निर्णय में दिसंबर, 1992 का कोई जिक्र नहीं जिस दिन वह मस्जिद  दिन-दहाड़ॆ ध्वस्त कर दी गई थी. जिन्होंने इस दिन के विस्मरण की ओर ध्यान दिलाया,उनके बारे में यह कहा गया कि वे अतीत से चिपके रहना चाहते हैं और समाज के अलग-अलग तबकों के बीच कड़वाहट पैदा करना चाहते हैं, शांति नहीं चाह्ते. लेकिन 6 दिसम्बर के सिलसिले  में भूलने की वकालत करनेवाले शायद यह नहीं देख पाए कि बाबरी मस्जिद परिसर को लेकर दिया गया फैसला भारतीय जीवन और संस्कृति की परिभाषा के लिए कुछ स्मृतियों को प्राथमिकता देता है  और कुछ को त्याज्य मानता है, यानी इस लायक भी नहीं मानता कि उनकी चर्चा भी ज़रूरी हो.
लखनऊ पीठ की प्रशंसा करते हुए कहा गया कि यह न्यायिक ‘इंजीनियरिग’ का बेहतरीन नमूना है. उसके साथ ही यह भी कहा जाना चाहिए कि सम्भवतः स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास में स्मृतियों के न्यायिक वैधीकरण का भी यह अनूठा उदाहरण है. इतिहास और पुरातत्व को तकनीक का एक विशेष प्रकार की स्मृति को वैध ठहराने के लिए उपयोग किया गया और जहां उसने पूरी तरह साथ नहीं दिया वहां उसके बावजूद निष्कर्ष निकाले गए.

लखनऊ पीठ के 30 सितंबर के निर्णय के अध्ययन से कुछ दिलचस्प सवाल उठते हैं. आज हमारे लिए कौन सी याद अधिक महत्वपूर्ण है, इसका संबंध क्या उससे हमारी कालगत दूरी से है? उदाहरण के लिए जो लोग   हमसे  6 दिसंबर की घटना को भुला देने को कहते हैं वे खुद बाबर के ‘आक्रमण’ को याद रखने पर क्यों ज़ोर देते हैं?  गुजरात के जनसंहार की बात भी आठ साल में भी अब भुला दी जाने लायक याद में बदल दी गई है. कहा जा रहा है कि जो लोग इस याद को बार-बार कुरेद रहे हैं, वे गुजरात की वर्तमान शांति को भंग करना चाहते हैं. लखनऊ पीठ ने भी, 6 दिसंबर की घटना का जिक्र करना भी ज़रूरी नहीं समझा. न इस पीठ  ने नवम्बर, 1949 की एक राथ जबर्दस्ती मस्जिद के भीतर मूर्तियां रख दिए जाने की घटना पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी की. न्यायमूर्ति अग्रवाल और न्याय्मूर्ति शर्मा ने तो मस्जिद के मस्जिद के रूप में इस्तेमाल पर भी शक जताया. न्यायमूर्ति शर्मा ने ने तो यह मानने से इनकार कर दिया कि उस स्थान पर मुसलमान निरंतर इबादत कर रहे थे और इस निष्कर्ष के लिए कोई आधार बताना उन्हें ज़रूरी नहीं लगा. न्यायमूर्ति अग्रवाल ने यह कहा कि इस बात के प्रमाण हैं कि इस परिसर को लेकर विवाद होते रहे थे. वे कहते हैं कि मुसलमानों की ओर से लगातार शिकायत की जाती रही कि हिन्दू मस्जिद में घुस रहे हैं ,और इसे उन्होने इसका सबूत माना कि हिन्दू इस्में पूजा कर रहे थे. अगर मुसलमान इसे अपनी इबादतगाह नहीं मानंते थे और इसे मस्जिद के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर रहे थे, जैसा इन दोनों न्यायाधीशों का मानना है, तो फिर वे शिकायत क्यों कर रहे थे?
न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि युग –युगांतर से या मानवीय स्मृति की परिधि से भी आगे से इस स्थल को हिन्दू पवित्र भूमि मानते रहे हैं.  उन्होनें इस स्मृति को जो मानवीय स्मृति की क्षमता  से परे है , यथार्थ माना और बाबरी मस्जिद के यथार्थ को उससे कम मह्त्व दिया. न्यायमूर्ति अग्रवाल ने इस स्मृति के आधार पर बने विश्वास और आस्था को अपनेआप में यथार्थ का दर्जा दिया जिसकी  अपनी पवित्रता उसकी वैधता का  प्रमाण है.
जिस तरह भाषा वैज्ञानिक यह कहते हैं कि थल सेना, जल सेना और वायु सेना जिस बोली के पास हो वह भाषा बन जाती है, उस शक्ति से रहित होने पर वह बोली  ही रहती  है, उसी तरह कहा जा सकता है कि स्मृति भी इस शक्ति के सहारे वैधता या श्रेष्ठ्ता का दर्जा हासिल कराती है. अयोध्या में 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को सार्वजनिक अभियान की परिणति के रूप में गिरा दिए जाने की घटना का कोई उल्लेख न करके इलाहाबाद न्यायालय की लखनऊ पीठ ने भारतीय गणतंत्र को यह बतान ेकी कोशिश की है कि उसकी परिभाषा करते समय कौन से स्मृति के तत्व मह्त्वपूर्ण हैं और कौन से कूड़े में डाल दिए जाने योग्य. 6 दिसंबर को याद न करके न्यायमूर्ति भारत के धर्मनिरपेक्ष  भविष्य के लिए उस पूरे अभियान के अभिप्र्राय पर पर्दा डालने की कोशिश भी कर रहे हैं.
बाबरी मस्जिद को  ध्वस्त किए हुए अब अठारह साल बीत चुके हैं. अठारह साल पहले जो एक चीज़ थी, वह अब याद में बदल गई  है, ऐसी याद जिसका जिक्र करने में भारतीय संसद और उससे स्वतंत्र न्यायपालिका को अब हिचकिचाहट होने लगी है , या शायद बेहतर यह कहना हो कि उसका कोई जिक्र न करने में अब उसे कोई संकोच नहीं होता. एक आपराधिक कृत्य के जरिए रामलला विराजमान का, जो आज के पहले हिन्दू देवमाला में कहीं नहीं थे और न उसकी किसी स्मृति में, मंदिर मस्जिद की जगह बनाया गया और इस तरह एक राजनीतिक महत्वकांक्षा को धार्मिक यथार्थ में बदल दिया गया. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पौराणिक स्मृतियों का विश्लेषण करने का जो बौद्धिक श्रम किया है , वह कुछ अधिक नजदीक की धर्मनिरपेक्ष स्मृति को अवैध ठहराने के लिए तो नहीं?

4 thoughts on “6 दिसंबर : न्यायिक विस्मरण के विरुद्ध”

  1. Sharing Kaifi Azmi’ on this through his poem Doosara Banvas :

    “Ram banwas se jab laut kay ghar mein aaye
    Yaad jungle bahut aaya jo nagar mein aaye
    Raksse deewangee aangan mein jo dekha hoga
    6 December ko, Sri Ram ne socha hoga
    Itnay deewanay kahan say mayray ghar mein aaye?

    Jagmagaate thay jahan Ram ke kadamon ke nishaan
    Pyaar ki kahkashan leti thi angrayee jahan
    Mor nafrat ke usi raah guzar mein aaye

    Dharm kya unka hai, kya zaat hai, yeh jaanta kaun
    Ghar na jalta to unhe raat mein pehchanta kaun
    Ghar jalanay ko mera log jo ghar mein aaye

    Shakahari hai mere dost tumhare khanjar
    Tumnay Babar ki taraf phaykay thay saare patthar
    Hain mere sar ke khata zakhm jo sar mein

    Paoon Saryu mein abhi Ram ne dhoye bhi na the
    Ke nazar aaye wahan khoon ke gehre dhabbay
    Paun dhoye bina Saryu ke kinare se uthay
    Ram ye kehte hue apne dwaare se uthay
    Rajdhani ki fiza aaye nahin raas mujheay
    6 December ko mila doosra banvaas mujhay

    Like

    1. Yad ki yad.yahi takat hai.kiase babri masjid Ram janam bhumi ho gayi?Rasik ram ke mandir ko yad kartata hai kisi ne.

      Like

  2. Sharing Kaifi Azmi’ thoughts on this through his poem Doosara Banvas :

    “Ram banwas se jab laut kay ghar mein aaye
    Yaad jungle bahut aaya jo nagar mein aaye
    Raksse deewangee aangan mein jo dekha hoga
    6 December ko, Sri Ram ne socha hoga
    Itnay deewanay kahan say mayray ghar mein aaye?

    Jagmagaate thay jahan Ram ke kadamon ke nishaan
    Pyaar ki kahkashan leti thi angrayee jahan
    Mor nafrat ke usi raah guzar mein aaye

    Dharm kya unka hai, kya zaat hai, yeh jaanta kaun
    Ghar na jalta to unhe raat mein pehchanta kaun
    Ghar jalanay ko mera log jo ghar mein aaye

    Shakahari hai mere dost tumhare khanjar
    Tumnay Babar ki taraf phaykay thay saare patthar
    Hain mere sar ke khata zakhm jo sar mein

    Paoon Saryu mein abhi Ram ne dhoye bhi na the
    Ke nazar aaye wahan khoon ke gehre dhabbay
    Paun dhoye bina Saryu ke kinare se uthay
    Ram ye kehte hue apne dwaare se uthay
    Rajdhani ki fiza aaye nahin raas mujheay
    6 December ko mila doosra banvaas mujhay

    Like

  3. लेख अच्छा था. एक नियमित पाठक मांग करता है की काफिला में और अधिक हिन्दी लेखों को जगह दी जाय..

    Like

Leave a reply to L Krishnan Cancel reply