कासगंज हिंसा- तिरंगे को हड़प जाएगा भगवा? वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

kasganj-uttar-pradesh-violence, image courtesy ndtv

पूरे हिंदी क्षेत्र में और विशेषकर उत्तरप्रदेश में ऐसे बडे, छोटे और मंझोले किस्म के नेताओं की बड़ी फौज पैदा हो गई है जिसकी नेतागिरी केवल सांप्रदायिक नारे लगाने और समाज में सांप्रदायिकता फैलाने पर टिकी है। सार्वजनिक जीवन पर इन संकीर्ण सोच वाले हिंदुत्व नेताओं की निरंतर मजबूत होती पकड़ ने सांप्रदायिक हिंसा को ‘न्यू नार्मल’ के रूप में मान्यता दिला दी है। हिंदू धर्म को कलंकित करने में इस नए जमाने के हिंदुत्व की क्या भूमिका है, यह अब किसी से छिपा नहीं है। एक समय था जब समाज पर समाजवादी और गांधीवादी विचारों के प्रभाव के कारण सांप्रदायिकता का सामना करना अपेक्षाकृत कम मुश्किल काम था। पर इन विचारधाराओं का प्रभाव कम हो जाने से सांप्रदायिक नेताओं-समूहों का तेजी से विस्तार हो रहा है। एबीवीपी, विहिप, हिंदू युवावाहिनी और बजरंग दल जैसे संगठन सामाजिक-राजनीतिक जीवन के पूरे परिदृश्य पर हावी हो चुके हैं।अक्सर साधारण परिवारों के युवक इन संगठनों की चपेट में इसलिए आ जाते हैं क्योंकि सांप्रदायिक संगठन समाज सेवा के मुखौटे के भीतर रहकर अपना काम करते हैं। वे दिखावे के तौर पर ब्लड डोनेशन या स्वच्छता मिशन या फिर शहीदों के सम्मान जैसी गतिविधियां करते हैं पर उनका असल मकसद समाज में सांप्रदायिकता का विचारधारा का विस्तार करना होता है। मुस्लिमों में भी सांप्रदायिकता है, पर वे उस प्रकार से संगठित सांप्रदायिकता को व्यक्त नहीं कर रहे हैं।

उत्तरप्रदेश के कासगंज में जो भयंकर हिंसा भड़की, जिसने शहर के जीवनको लूटपाट व आगजनी के हवाले कर दिया, वह उप्र में धीमी प्रक्रिया से फैलते सांप्रदायिक संगठनों का ही नतीजा है। कासगंज, जो सुनने में लगता है कि पहले कभी खासगंज रहा होगा, में 26 जनवरी को सवेरे 10 बजे एक मोहल्ले में विहिप-बजरंग दल के लोगों ने तिरंगा यात्रा निकालने का दावा किया। पर वीडियो फुटेज और मीडिया की खबरों को देखने से पता चलता है कि सौ लोगों की संख्या में बाइक पर निकली हुड़दंगी यात्रा में तिरंगा केवल दिखावे के लिए इस्तेमाल होना था, और मुख्य रूप से भगवा झंडे लहराए जा रहे थे। जिस इलाके में उसे निकाला गया, वह मुस्लिम बहुल इलाका है जहां पर बसे मुस्लिम बहुत ही साधारण निम्नवर्गीय लोग हैं और छोटी-मोटी दुकानों व आटोमोबाइल के काम करते हैं। पूरे क्षेत्र में तीन सौ दुकानों में से केवल 30 दुकानें ही मुस्लिमों की हैं। गणतंत्र दिवस में खुद को शामिल करने के लिए इलाके के मुस्लिम भी तिरंगा लहराने की तैयारी कर रहे थे। बाइकर्स की रैली अचानक वहां पर पहुंची और रास्ता खोलने के लिए कहा ताकि वे उसी रास्ते से आगे जा सकें। इसके बाद कहासुनी हुई और पत्थरबाजी से लेकर देसी हथियार तक निकल आए। इस हिंसा में चंदन गुप्ता नामक 20 साल के लड़के की जान गई और नौशाद व अकरम नामक दो लोग भीड़ की हिंसा के शिकार बन बुरी तरह से घायल हो गए। चंदन गुप्ता के दोस्तों ने माना है कि वह एबीवीपी से जुड़ा हुआ था और इन संगठनों के सामाजिक कार्यों के कारण इनकी ओर आकृष्ट हुआ था। इस प्रकार जो संगठन मुख्यतः सांप्रदायिक उद्देश्यों से संचालित हैं, वे दिखावे के छद्म सामाजिक कार्यों के बल पर सामान्य सोच-समझ के युवाओं को अपने से जोड़ने में कामयाब होते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस ने हिंसक वारदात वाले स्थान के बारे में लिखते हुए बताया है कि तिरंगा दोनों ही समुदायों के लोगों के हाथ में था, पर बात तब बिगड़ी जब विहिप-बजरंग दल के लोगों ने खास गली से भड़काऊ नारे लगाते हुए जबरन रैली निकालने का प्रयास किया। विहिप-बजरंग दल वालों ने ‘हिंदुस्तान में रहना होगा, तो वंदे मातरम कहना होगा’, ‘भारत माता की जय’ आदि भड़काऊ नारे लगाए। इस प्रकार जो यात्रा तिरंगा यात्रा के नाम से निकाली जा रही थी, वह संविधान लागू होने वाले दिन खास समुदाय को आतंकित करने वाली यात्रा में बदल गई। यूपी के विभिन्न शहरों में ताजिया निकालने, नमाज के वक्त रामलीला जुलूस निकालने या दुर्गापूजा पर मस्जिदों के आगे हुल्लड़ करने के नाम पर कई दशकों से हिंसा होती रही है। प्रेमचंद ने 1934 में माधुरी नामक पत्र में ‘त्यौहार में दंगे’ शीर्षक संपादकीय में खीज से लिखा था कि त्यौहार आते ही कुछ लोग दंगों की तैयारी करने लगते हैं, कुछ लोग दंगों की संभावना से दहशत में आ जाते हैं। उन्होंने ‘पुश्तों के भाईचारे’ के नष्ट होने पर अपनी चिंता जताई थी।लेकिन सामान्य त्यौहारों पर होने वाली सांप्रदायिक हिंसा से परे अब गणतंत्र दिवस पर भी अगर देशभक्ति की आड़ में समुदायों पर निशाना साधा जाने लगे तो मानना पड़ेगा कि उत्तरप्रदेश हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला के रूप में विकसित किया जा रहा है।

26 जनवरी या 15 अगस्त जैसी तारीखों का संबंध धर्म से नहीं है बल्कि एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष भारत के जन्म से है। ये वे तारीखें हैं जब भारत ने खुद को सभी धर्मों व संस्कृतियों को समानता की निगाह से देखते हुए समावेशी देश के रूप में खुद को पहचान प्रदान की थी। पर अब इन तारीखों का इस्तेमाल भी अगर धार्मिक पर्वों की तरह हिंदू-मुस्लिम समुदाय की भिड़त और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाने लगेगा, तो यह केवल इन तारीखों के साथ नहीं बल्कि देश के स्वाधीनता आंदोलन के साथ नाइंसाफी होगी। उत्तरप्रदेश के समाज में सांप्रदायिकता का एक पहलू राममंदिर आंदोलन के बाद विकसित हुआ है। पहले तो राम-रहीम या मंदिर-मस्जिद के आधार पर सारे फसाद होते थे, पर अब झंडे, राष्ट्रीयता और देशप्रेम बनाम देशद्रोह के मुद्दों को अचानक से निकाला जाता है और समाज जल उठता है। तिरंगा व राष्ट्रवाद जिस सांप्रदायिकता को रोकने व नियंत्रित करने में इस्तेमाल होने वाली शक्तियां थीं, उन्हीं का इस्तेमाल अब विहिप-बजरंग दल जैसे संगठन सांप्रदायिकता फैलाने के लिए कर रहे हैं। इस प्रकार की हिंसा का समाजशास्त्र ढूंढने वालों ने युवाओं की बेरोजगारी को ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार माना है, जो एक सीमा तक सच है। उत्तरप्रदेश मेंलगभग 2 करोड़ युवा बेरोजगार बैठा है और कृषि में शामिल श्रमशक्ति में गिरावट आ रही है। पहले दस में आठ आदमी खेती करते थे, अब पांच ही करते हैं। पर सांप्रदायिकता एक कारण ही बेरोजगारी है, वास्तविक कारण ऐसे संगठनों का तेजी से फैलाव है, जो भाजपा-संघ के लिए समर्पित हैं और जो यूपी की राजनीति में सवर्णों की सत्ता को पुनर्स्थापित करने के लिए बेचैन है। चार साल पहले मुजफ्फरपुर में भी मामूली व्यक्तिगत शत्रुता को लेकर शुरू हुई हिंसा ने भयानक रूप ले लिया क्योंकि उस समय उसका इस्तेमाल करने वाली संगठित मशीनरी कूद पड़ी थी और 60 लोगों की जान चली गई थी। उप्र को सांप्रदायिक हिंसा से तभी बचाया जा सकता है जब प्रशासन पूरे प्रदेश में फैले सांप्रदायिक संगठनों से जुड़े लोगों का ‘डोजियर’ तैयार करे, उनपर कड़ी निगरानी रखे और बहुत सारी रैलियों व प्रदर्शनों को अनुमति देने से इनकार कर दे।जो हिंदूवादी संगठन हैं, उनके तथाकथित सामाजिक कार्यों की निर्मम तरीके से समीक्षा की जाए। पर क्या मौजूदा योगी सरकार ऐसा करेगी? शायद कोई भी पैनी सूझबूझ वाला व्यक्ति ऐसा न माने और उल्टा अकबर इलाहाबादी का यह शेर ही सुना दे-

आंखों को देखने का सलीका जब आ गया

कितने नकाब चेहरा-ए-असरार से उठे।

 

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