[निम्नलिखित बयान साठ से ज़्यादा ऐसे संगठनों और कार्यकर्ताओं की तरफ़ से 15 फरवरी को जारी किया गया है जिनका मनरेगा के कार्यान्वयन से संबंध रहा है। ]
हम, नीचे दस्तखत करने वाले एक्टिविस्ट्स, जो भारत के कोने-कोने में मनरेगा मजदूरों के साथ काम करते हैं, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को खत्म करने की कड़ी निंदा करते हैं, जो माँग पर मिलने वाला ‘काम के अधिकार‘ का प्रोग्राम था।
हमारा मानना है कि:
– मनरेगा महाराष्ट्र की रोजगार गारंटी योजना से सीख लेकर भारी समर्थन और बातचीत के बाद शुरू किया गया था।
– पहली बार हर परिवार को 100 दिन का काम मिलना पक्का किया गया था।
– जाति और जेंडर के भेदभाव को मिटाकर, गांव के मजदूरों को वर्ग के आधार पर अपनी यूनियन बनाने का मौका मिला । मनरेगा के आने से, उदाहरण के लिए कर्नाटक में ‘ग्राकुस’ नाम की एक लाख मेंबर वाली गाँव के मजदूरों की यूनियन बनी। ये मजदूरों की यूनियन बनाने का एक ज़रिया बन गया।
– बुवाई और कटाई के वक़्त खेतिहर मजदूरों को मोलभाव करने की ताक़त मिली।
– इसके चलते कई लोगों, खासकर औरतों ने पहली बार बैंक खाते खुलवाए, बैंक गईं और पैसे निकाले ।
– गांव की औरतें, जो घर की चहारदिवारी में बंद थीं, उन्हें एकजुट होकर अपनी हालत सुधारने पर बात करने और अपने गाँव से लेकर देश की राजधानी तक अपनी माँगें उठाने का मौका मिला । 2026 के इकनॉमिक सर्वे के हिसाब से, 2025 में 187 करोड़ मजदूरों में से 58% औरतें थीं।
– कई जगहों पर पहली बार मर्दों और औरतों को बराबर मजदूरी देखने को मिली।
– कोविड की महामारी के दौरान यह कामकाजी लोगों के लिए सबसे बड़ा सहारा था।
– ग्राम सभा को ये हक मिला कि वो अपने इलाके के सार्वजनिक कार्यों का प्लान और बजट बनाएं, लोगों को एक साथ बैठकर बात करना सिखाया, और पानी बचाने के इंतजामों का एक नेटवर्क बनाया जिससे सूखे से बचने में मदद मिली।
– जिन ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधन मैनेजमेंट का अधिकार मिला हुआ था, उन्हें वन अधिकार अधिनियम के तालमेल में मनरेगा को चलाने वाली एजेंसियां बनाया गया।
– छोटे किसानों को सब्जी की खेती और मछली पालन करके अपनी आय बढ़ाने में मदद मिली।
– जब उन्हें कोई काम नहीं मिला तब बेरोजगारी भत्ता मिला, जिसका फायदा कम से कम संगठित मज़दूर ले पाए।
– मिट्टी और पानी को बचाने का बहुत जरूरी काम हुआ।
– सरकारी अध्ययनों में भी इसे एक बढ़िया प्रोग्राम बताया गया।
– अगर भ्रष्टाचार या अमलीकरण में गड़बड़ी या स्टाफ की कमी वगैरह इस एक्ट को खत्म करने की वजहें थीं, तो सरकार का पहला फ़र्ज़ था कि वो ग़लत काम रोके और कामकाज में जो कमी है उसे दूर करे, जिसमें अक्सर सरकारी अफसरों की मिलीभगत होती है।
– केंद्र सरकार ने लगातार और जानबूझकर अपना हिस्सा नहीं दिया, जिससे मजदूरी देने में देरी हुई।
– डिजिटलीकरण और ई-केवाईसी के चक्कर में लाखों मजदूर अपना रोज़गार खो बैठे । पारदर्शिता के नाम पर मोबाइल ऐप, जियो-टैगिंग, केवाईसी के द्वारा आधार से जोड़ना शुरू किया गया, लेकिन इससे कई मजदूरों के जॉब कार्ड रद्द हो गए और उन्हें बाहर कर दिया गया।
हम इस दलील को एक सिरे से ख़ारिज करते हैं कि मनरेगा की कमियों को दूर करने के लिए वीबीग्रामजी बनाया गया है,
– वीबीग्रामजी में माँगने पर काम नहीं मिलेगा, सिर्फ सरकार बताएगी वहीं काम मिलेगा।
– खेती के मौसम में खेतिहर मजदूरों की दिहाड़ी कम हो जाएगी क्योंकि 60 दिन काम नहीं मिलेगा।
– ज़मींदारों और पोलिटिकल नेताओं ने मनरेगा का विरोध किया, जिन्होंने इसमें अपनी ताकत के लिए खतरा देखा । इसे खत्म करने का विचार तब आया जब इन्होंने देखा कि इसका इस्तेमाल मजदूरों, खासकर औरतों द्वारा अपनी यूनियन बनाने के लिए किया जा रहा है । ये इसलिए भी हटाया जा रहा है ताकि मजदूरी कम की जा सके और पूँजीपतियों को सस्ते मजदूर मिल सके।
– भाजपा मनरेगा की शक्ति के खिलाफ है, जैसे कि काम का असली हक मिलना, विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा देना, वर्ग के आधार पर गांव के मजदूर अपनी यूनियन बनाना, और नारीशक्ति मजबूत बनाना । कुल मिला कर समाज में जड़ से बदलाव हो, वह उसे रास नहीं आता।
– ठेकेदार पहले मनरेगा में चोरी-छिपे घुस रहे थे, हालांकि, इसमें प्रतिबंध था । वीबीग्रामजी अब ठेकेदारों के काम को कानूनी बना देगा, क्योंकि इसमें आमूल ढांचे पर ध्यान दिया जाएगा।
– वीबीग्रामजी में सब कुछ ऊपर से तय होगा, ग्राम सभा की भूमिका बस नाम की रह गई है।
– भ्रष्टाचार तो रहेगा ही क्योंकि सरकारी अफसर इससे सने हुए हैं, और सरकार के पास इससे निपटने के लिए बहुत वक़्त था, लेकिन उसने कुछ नहीं किया । प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करने और वर्कप्लेस की जियोटैगिंग करने के बाद भी, इससे बचने के तरीके खोज लिए गये हैं, जैसे कि मजदूरों को एक ही दिन में एक जगह से दूसरी जगह ले जाना।
हमें डर है कि मनरेगा को खत्म करने और वीबीग्रामजी को लागू करने से –
– गाँव में रोजगार घट जाएगा, क्योंकि राज्य सरकारों के पास पहले से ही वेलफेयर स्कीम चलाने के लिए ‘अनटाईड’ फंड कम है।
– झारखंड जैसे राज्यों में, ख़ासकर खेती के मौसम के उन 60 दिनों में जब वीबीग्रामजी के तहत कोई काम नहीं दिया जाएगा, तब बंधुआ मजदूरी बढ़ेगी, गांव में दिक़्क़तें बढ़ेंगी, जिसमें भूखमरी फैलेगी और मजबूरी में पलायन बढ़ जाएगा।
– जब औरतों को भी पलायन करना पड़ेगा, तो बच्चों का स्कूल छूट जाएगा और उनकी पढ़ाई पर असर पड़ेगा।
– वीबीग्रामजी लाभार्थी के माईबाप जैसी स्कीम बन जाएगी, और जिन राज्यों में चुनाव होंगे उन्हें केंद्र से ज्यादा पैसा मिलेगा । जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें नहीं हैं वे फंड के लिए तरसते रह जाएंगे।
– हर परिवार को 125 दिन का काम देने का वादा एक हवा-हवाई दावा बनकर रह जाएगा और हर परिवार को मिलने वाले काम के दिनों की औसत संख्या वास्तव में घट जाएगी क्योंकि 40 प्रतिशत खर्च करना राज्यों के बस की बात नहीं होगी क्योंकि वे तो वैसे ही कर्ज़ में डूबे हुए हैं।
हम संकल्प लेते हैं कि:
– ग्राम सभा प्रस्ताव पारित कराएंगे, बार-बार मार्च और प्रदर्शन आयोजित कराएंगे, और अपने चुने हुए प्रतिनिधि पर दबाव डालेंगे कि वह वीबीग्रामजी को रद्द कर के मनरेगा को बहाल करने की माँग करें।
1. सुरेश राठौड़, मनरेगा मजदूर यूनियन, उत्तर प्रदेश
2. सीमा काकड़े, कल्पवृक्ष, महाराष्ट्र
3. दिलीप कामत, ग्रामीण कूलिकारा संघ, कर्नाटक
4. पीएम टोनी, बगइचा, रांची, झारखंड
5. शनियारो देवी, नरेगा मजदूर सहायता केंद्र, लोहरदगा, झारखंड
6. अजय आशु, क्रांतिकारी मनरेगा मजदूर यूनियन, हरियाणा
Endorsed by:
Organisations:
1. Rajesh Ramakrishnan, Campaign to Defend Nature and People (CDNP)
- Arvind Murti, Indian Community Activists Network (ICAN)
- Geeta Mahajan, National Federation of Indian Women (NFIW)
- Viren Lobo, Akhil Bharatiya Mazdoor Kisan Sangharsh Samiti (ABMKSS)
- Prasad Chacko, People’s Union for Civil Liberties (PUCL)
- Meera Sanghamitra, National Alliance of People’s Movements (NAPM)
- Manthan, Jan Mukti Sangharsh Vahini
- Sushil Kumar, Jan Mukti Sangharsh Vahini
- Subhash Lomte, National Campaign Committee for Rural Workers (NCCRW); Jai Kisan Andolan; Swaraj Abhiyan
- Tapan Padhi, Mission Justice
- Shashi Shekhar Singh, Citizens for Democracy
- Dipak Dholakia, Campaign to Defend Nature and People (CDNP)
- Nootan, Campaign to Defend Nature and People (CDNP)
- Mahendra Rathaur, Indian Community Activists Network (ICAN)
- Monisha Rao, India Friends Association, USA
- Dasharath Jadhav, Shramjivi Sangathana Marathwada, Maharashtra
- Gufran, People’s Alliance, Uttar Pradesh
- Ashish Ranjan, Jan Jagran Shakti Sangathan, Bihar
- Shankar Gopal, Chetna Andolan, Uttarakhand
- Indra Narayan Singh, Kosi Nav Nirman Manch, Bihar
- Gopinath Majhi, Campaign for Survival and Dignity, Odisha
- Chhaya Datar, Mahila Kisan Adhikar Manch (MAKAAM), Maharashtra
- Raj Kumar Sinha, Bargi Bandh Visthapit Evam Prabhavit Sangh, Madhya Pradesh
- Dr. Sricharan Behera, Campaign for Survival and Dignity, Odisha
- Ambika Yadav, Jharkhand Kisan Parishad, Jharkhand
- Praveer Peter, Sajha Kadam, Jharkhand
- Ranjana Kanhere, Lokshahi Jagar Samiti, Nandurbar, Maharashtra
- Raviraj Mankar, Labour Study and Research Centre, Wardha, Maharashtra
- Sharada Gopal, Jagruta Mahila Okkuta, Belgaum, Karnataka
- Sujata Gothoskar, Nari Atyachar Virodhi Manch, Mumbai, Maharashtra
- Jagmohan Singh, Association For Democratic Rights, Ludhiana, Punjab
- Kiran, Sanbhava Injor, Ranchi, Jharkhand
Individuals
- Seema Kulkarni, Pune, Maharashtra
- Ravi Chopra, Dehra Dun, Uttarakhand
- Usha Rao, Chikkaballapur, Karnataka
- Jyotsna Tirkey, West Singhbhum, Jharkhand
- Nandita, Pune, Maharashtra
- Pradeep Chavan, Maharashtra
- Suresh Khole, Pune, Maharashtra
- Ujjwala, Maharashtra
- Chinmayee
- Chetan, Maharashtra
- Ramnarayan K., Uttarakhand
- Kanupriya, Chandigarh
- James Herenj, Jharkhand
- Savita Tare, Maharashtra
- Varsha Mehta, Ahmedabad, Gujarat
- Mohammed Ishak, Nainital, Uttarakhand
- Mehjabeen, Haridwar, Uttarakhand
- Meena, Kutch, Gujarat
- Adv Dr. Shalu Nigam, Delhi NCR
- K.J. Joy, Pune, Maharashtra
- Sunil M. Caleb, Kolkata, West Bengal
- Suhas Kolhekar, Maharashtra
- Kavita Gandhi
- Jagriti Rahi, Varanasi, Uttar Pradesh