‘सत्य को बयां करने के रास्ते की मुश्किलों के बारे में’ क्या लेखक सचेत और सक्रिय हैं?

(जनवादी लेखक संघ, दिल्ली के 10 वें राज्य सम्मेलन (4 अप्रैल 2026)  में प्रस्तुत वक्तव्य का संशोधित एवं विस्तारित रूप, सम्मेलन के विचार सत्र का फोकस था : हमारा समय और लेखक की भूमिका)

प्रस्तावना

हम एक नाजु़क वक्त़ से गुजर रहे हैं।

कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति – जो न्याय, अमन और बराबरी की चाहत रखता हो, समूची मानवता को तरक्की के रास्ते पर ले जाना चाहता हो, यह दावा नहीं कर सकता कि उनमें से किसी ने भी इस बात का तसव्वुर भी किया होगा कि 21 वीं सदी की तीसरी दहाई में हम ऐसे दौर से रूबरू होंगे।

एक ऐसा दौर जहां हम और वे की सियासत उरूज पर दिख रही है, आबादी के अच्छे खासे हिस्से को अमनुष्य घोषित करना, दीमक, कीड़ों, मकौड़ों की श्रेणी में शुमार करना एक सम्मानित उद्यम में रूपांतरित हुआ है। नागरिक शुद्धता की कवायदों के जरिए – अवांछितों को, अधर्मियों को, असहमतों को -गणतंत्र के दायरों से भी बाहर सरहद पार मुल्कों के बियाबान में ढकेल देने की मुहिमों पर इन्साफ के रखवाले कहे गए संस्थानों से भी मुहर लग रही है।

इस खत़रनाक समय को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया जा रहा है। 

कोई कहता है कि यह ऐसा दौर है जब यह प्रतीत हो रहा है कि समूचा समाज एक उन्मादी खुशी के साथ एक गर्त में जा रहा है और उसे इस बात का कोई इल्म भी नहीं है।

मेरे एक मित्र – जो एक प्रख्यात मार्क्सवादी  विचारक हैं – कहते हैं, यह ऐसा दौर है जब समाज को गोया अंधेरे की आदत हो गयी है, मद्धिम सी रौशनी से भी उसकी आंखें चुंधिया जाती हैं। ( Read the full text here : https://janchowk.com/is-the-author-aware-ofand-actively-engaged-withthe-difficulties-inherent-in-the-path-of-articulating-the-truth/)

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