Category Archives: Debates

Crisis for the People, Opportunity for the Corporate-Government Nexus : NSI

Statement of New Socialist Initiative (NSI) on India’s ‘war against Covid 19’

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Today, India has emerged as a new epicentre for the novel corona virus in the Asia Pacific region.With 1,58,333 confirmed cases of Covid 19 and deaths of total of 4,531 people after contracting the virus, it has already crossed China’s Covid-19 numbers.

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New Socialist Initiative (NSI) feels that the grim news of steadily rising infections and fatalities reveal before everyone a worrying pattern but the government either seems to be oblivious of the situation or has decided to shut its eyes. It is becoming increasingly clear that the Union government has used incomplete national-level data to justify arbitrary policy decisions, defend its record and underplay the extent of Covid-19 crisis.

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Absence of transparency vis-a-vis data collection of Covid infection levels could be said to be the tip of the iceberg of what has gone wrong with India’s ‘war against Covid 19’.
The Prime Minister’s announcement of a 21-day countrywide lock down came with a mere four-hour notice. It was done without engaging in any collective decision-making process with states to honour and enhance the spirit of “cooperative federalism” between the Centre and the States. Continue reading Crisis for the People, Opportunity for the Corporate-Government Nexus : NSI

असहमति के दमन के लिए मानवाधिकार-कर्मियों और लेखकों-पत्रकारों की गिरफ्तारियों का सिलसिला बंद करो! 

राजनीतिक उत्पीड़न और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए तालाबंदी के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ सांस्कृतिक-सामाजिक संगठनों का संयुक्त आह्वान

महामारी से मुक्ति के लिए जनएकजुटता का निर्माण करो!

तालाबंदी के दौरान जेलबंदी

महामारी और तालाबंदी के इस दौर में समूचे देश का ध्यान एकजुट होकर बीमारी का मुक़ाबला करने पर केन्द्रित है.

लेकिन इसी समय देश के जाने माने बुद्धिजीवियों, स्वतंत्र पत्रकारों, हाल ही के सीएए-विरोधी आन्दोलन में सक्रिय रहे राजनीतिक कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं की ताबड़तोड़ गिरफ़्तारियों ने नागरिक समाज की चिंताएं बढ़ा दी हैं.

बुद्धिजीवियों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारियां सरकारी काम में बाधा डालने (धरने पर बैठने) जैसे गोलमोल आरोपों में और  अधिकतर विवादास्पद यूएपीए क़ानून के तहत की जा रही हैं. यूएपीए कानून आतंकवाद से निपटने के लिए लाया गया था. यह विशेष क़ानून ‘विशेष परिस्थिति में’ संविधान  द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों को परिसीमित करता है. जाहिर है, इस क़ानून का इस्तेमाल केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए जिनका सम्बन्ध आतंकवाद की किसी वास्तविक परिस्थिति से हो. दूसरी तरह के मामलों में इसे लागू करना संविधान के साथ छल करना है. संविधान लोकतंत्र में राज्य की सत्ता के समक्ष नागरिक के जिस अधिकार की गारंटी करता है, उसे समाप्त कर लोकतंत्र को सर्वसत्तावाद में बदल देना है.

गिरफ्तारियों के लगातार जारी सिलसिले में सबसे ताज़ा नाम जेएनयू की दो छात्राओं, देवांगना  कलिता और नताशा नरवाल के हैं. दोनों शोध-छात्राएं प्रतिष्ठित नारीवादी आन्दोलन ‘पिंजरा तोड़’ की संस्थापक सदस्य भी हैं.  इन्हें पहले ज़ाफ़राबाद धरने में अहम भूमिका अदा करने के नाम पर 23 मई को गिरफ्तार किया गया. अगले ही दिन अदालत से जमानत मिल जाने पर तुरंत अपराध शाखा की स्पेशल ब्रांच द्वारा क़त्ल और दंगे जैसे आरोपों के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया ताकि अदालत उन्हें पूछ-ताछ के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दे. आख़िरकार उन्हें दो दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया है. Continue reading असहमति के दमन के लिए मानवाधिकार-कर्मियों और लेखकों-पत्रकारों की गिरफ्तारियों का सिलसिला बंद करो! 

प्रार्थना स्थलों पर लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध

news on judiciary

कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय.
ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय

क्या अपने ‘खुदा’ को आवाज़ देने के लिए बांग देने की जरूरत पड़ती है ?

आज से छह सदी पहले ही कबीर ने यह सवाल पूछ कर अपने वक्त़ में धर्म के नाम पर जारी पाखंड को बेपर्दा किया था. पिछले दिनों यह मसला नए सिरे से उछला जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस बारे में एक अहम फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि अज़ान अर्थात प्रार्थना के लिए आवाज़ देने की बात इस्लाम का हिस्सा है लेकिन वही बात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के बारे में नहीं कही जा सकती, लिहाजा रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल के इजाजत नहीं दी जा सकती.

अदालत के मुताबिक मुअज्जिन मस्जिद की मीनार से अपनी मानवीय आवाज़ में अज़ान दे सकता है और उसे महामारी रोकने के लिए राज्य द्वारा लगायी गयी पाबंदियों के तहत रोका नहीं जा सकता, अलबत्ता उसके लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल वर्जित रहेगा.

ध्यान रहे कि अदालत यूपी पुलिस द्वारा जगह-जगह मनमाने ढंग से अज़ान पर लगायी गयी पाबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर विचार कर रही थी. हाथरस, अलीगढ़ आदि स्थानों पर महामारी के कानूनों का हवाला देते हुए पुलिस वालों ने अज़ान देने पर ही पाबंदी लगायी थी, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था.

उम्मीद है कि अदालत के फैसले के मद्देनज़र यूपी पुलिस मनमाने तरीके से अज़ान पर नहीं रोक लगाएगी, निश्चित ही यह सुनिश्चित करेगी कि इसके लिए किसी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है.

गौरतलब है कि अदालत ने संविधान के तहत प्रदत्त बुनियादी अधिकारों में शामिल आर्टिकल 19/1/ए का हवाला देते हुए जो इस बात को सुनिश्चित करता है कि‘किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह अन्य लोगों को बन्दी श्रोता (captive listeners) बना दें’ यह निर्देश दिया.

निश्चित ही मस्जिदों में जहां बिना अनुमति के लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल पर पाबंदी रहेगी, वही बात मंदिरों, गुरुद्धारों या अन्य धार्मिक स्थलों पर भी लागू रहेगी ताकि आरती के बहाने या गुरुबाणी सुनाने के बहाने इसी तरह लोगों को ‘बन्दी श्रोता’ मजबूरन न बनाया जाए. ( Read the full article here :https://hindi.theprint.in/opinion/allahabad-high-court-ban-loudspeakers-at-prayer-places-exposes-hypocrisy-in-the-name-of-faith/140765/)

The Ferocious Face of Class War – Rekindling the Revolutionary Imagination

 

Pyramid of Capitalist System, 1911 image from Industrial Worker (paperof Industrial Workers of the World)

Face of Class War in Contemporary India

It is time again to state one thing absolutely clearly. ‘Class struggle’ or ‘class warfare’ were not invented by Karl Marx, for he and his predecessors merely identified and named the beast. It is something that the rich and the powerful always did and continue to do as we speak. Look at the way the Indian lumpenbourgeoisie has bared its fangs, even as the country is reeling under the deadly impact of COVID 19; look at the way it is sharpening its knives, waiting for its opportunity to make a kill – and you will know what class war is all about. Look at them and it will be crystal clear that it is not the hapless migrant worker and the poor – or the peasant who silently commits suicide – who  indulge in this thing called class war, but they who prey on the weak and the dispossessed. They are once again preparing to make good their losses by yoking in workers as slaves, not allowing them to travel safely back to their homes, keeping them hostage to lumpencapital and ready with  their plans to make them work for 12 hours a day. There isn’t even a pretense – barring an Azim Premji here or an Asian Paints there – of recognizing workers as partners or stakeholders in business.

In a sense, ‘lumpencapitalism’ and the ‘lumpenbourgeoisie’ are the general form of Indian capital, pioneered by Dhirubhai Ambani and his Reliance Industries (interested readers can  read The Polyester Prince by Hamish McDonald) and its arrival with Gautam Adani whose recent rise to front ranks is generally understood to be linked to his closeness to the present regime. And in between, we have conglomerates like Sahara India, whose ‘primitive accumulation’ is alleged to have come almost entirely through chit fund theft.

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Covid-19 and the Idea of India: Manish Thakur and Nabanipa Bhattacharjee

Guest post by MANISH THAKUR and NABANIPA BHATTACHARJEE

Much has already been said and written about the plight of the migrants during the lockdown necessitated by the current Covid-19 outbreak in India. The visual images of their endless walk – which reminds us of the flight of Partition refugees – in their desperate bid to reach home in the scorching summer heat on almost empty stomachs with throats parched (women in tow with the children on men’s shoulders and their meagre belongings on the heads) is heart-wrenching to say the least. Whatever be the cause, it is a living testimony to the entrenched structures of poor governance that define our polity. It is also revealing of the class character of the Indian state, a term that has for long left the public discourse of our republic. One need not invoke Marx or be a communist to see the glaring contrast in the ways say, for instance, state functionaries conduct themselves at airports in Delhi or Kochi and railway stations at Barkakana in Jharkhand or Bapu Dham, Motihari in Bihar.

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भारत की कोरोना नीति के चंद नुक्सानदेह पहलू: राजेन्द्र चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

कोरोना से हमारा वास्ता अभी लम्बे समय तक चलने वाला है. काफिला पर छपे पिछले आलेखों में (यहाँ एवं यहाँ) में हम ने इस के सही और गलत, दोनों तरह के सबकों की चर्चा की थी पर भारत की करोना नीति की समीक्षा नहीं की थी.  आपदा और युद्ध काल में एक कहा-अनकहा दबाव रहता है कि सरकार को पूरा समर्थन दिया जाए और उस की आलोचना न की जाय पर कोरोना के मुकाबले के लिए भारत में अपनाई गई रणनीति की समीक्षा ज़रूरी है; यह समीक्षा लम्बे समय तक चलने वाली इस आपदा में रणनीति में सुधार का मौका दे सकती है. कोरोना से कैसे निपटना चाहिए इस में निश्चित तौर पर सब से बड़ी भूमिका तो कोरोना वायरस की प्रकृति की है- ये गर्मी में मरेगा या सर्दी में या नहीं ही मरेगा; बूढों को ज्यादा मारेगा या बच्चों को, इन तथ्यों का इस से निपटने की रणनीति तय करने में सब से बड़ी भूमिका है. इस लिए भारत में कोरोना की लड़ाई के मूल्यांकन से पहले हमें वायरस की प्रकृति के बारे में उपलब्ध जानकारी को रेखांकित करना होगा.

कोरोना वायरस के नए स्वरूप की बुनियादी प्रकृति

कोरोना किस्म के वायरस वैज्ञानिकों के लिए नए नहीं हैं. ये पहले भी उभरते रहे हैं और वैज्ञानिक इन का लगातार अध्ययन करते रहे हैं. परन्तु हाल में कोरोना किस्म के वायरस का एक नया स्वरूप सामने आया है, जिस से उत्पन्न होने वाली नयी बीमारी को कोविड नाम दिया गया है.  इस लिए कोरोना के इस नए वायरस के बारे में अभी सब कुछ पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. अभी इस की पड़ताल चल रही है.  फिर भी दुनिया भर के वैज्ञानिकों के मिले जुले काम से और कोरोना के पहले से उपलब्ध वायरसों के जीवन चक्र को ध्यान में रखते हुए कुछ बाते काफी हद तक स्पष्ट हैं.  इन के बारे में आम तौर पर वैज्ञानिकों में सर्वानुमति है. हालाँकि विश्व स्वास्थ्य संगठन को सर्वज्ञानी तो नहीं माना जा सकता परन्तु काफी हद तक इस द्वारा प्रदत जानकारी पर भरोसा किया जा सकता है.

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Community-Based Mapping of Covid: Nothing Official About it

No doubt the clarification that India will not map Covid-19 infections on the basis of religion has many heaving sighs of relief. But will the peace last?

Community-Based Mapping of Covid: Nothing Official About it

Image Courtesy: AP

Move for community-based mapping of coronavirus?” a recent news item in a prestigious daily asked, getting tongues wagging about “closed-door meetings at the highest level”, though no “official” decision had been taken in themThe Ministry of Health declared that any such news is “baseless, incorrect and irresponsible”. Lav Agarwal, the top bureaucrat in the ministry—who interacts with the media on Covid-related developments—called such news reports “…very irresponsible”. “The virus does not see people’s caste, creed or religion,” he said, quoting the Supreme Court’s directions on controlling non-factual or fake news.

No doubt the official clarification has many heaving sighs of relief.

The relief is understandable, because it was only last month—when the Novel Coronavirus pandemic had started taking a toll—that Muslims were being stigmatised as “super-spreaders” of the disease.

Taking a grim view of the situation, in its press conference o6 April, the World Health Organisation had given the Indian government some simple advice. The WHO said, in response to an India-specific question, that countries should not profile Covid-19 infections in religious, racial or ethnic terms. The WHO Emergency Programme Director Mike Ryan also underlined that every positive case should be considered a victim.

( Read the full article here)