Category Archives: Debates

Statement on the People’s Resistance against the Citizenship Amendment Bill : New Socialist Initiative

This is a guest post by New Socialist Initiative

New Socialist Initiative stands in solidarity with the people of Assam, Tripura and the other North Eastern states in their heroic struggle against the communally motivated Citizenship Amendment Bill (CAB). It was only because of the resistance of the people that the government couldn’t table the Bill for voting in the Rajya Sabha after surreptitiously passing it in the Lok Sabha. This is in fact a victory for all the progressive and democratic forces of the country,who have been fighting to save and expand the secular character of the nation. While the danger still looms large and there is a strong possibility that the government may try to bring back the bill in the upcoming budget session, the mass resistance of the people has demonstrated very clearly that the evil designs of the fascists in power will not go unanswered and that the people will fight back with all their might. Continue reading Statement on the People’s Resistance against the Citizenship Amendment Bill : New Socialist Initiative

विचार ही अब द्रोह !

(‘चार्वाक के वारिस : समाज, संस्कृति एवं सियासत पर प्रश्नवाचक ‘ की प्रस्तावना से)

कार्ल मार्क्‍स की दूसरी जन्मशती दुनिया भर में मनायी जा रही है।

दिलचस्प है कि विगत लगभग एक सौ पैंतीस सालों में जबसे उनका इन्तक़ाल हुआ, कई कई बार ऐसे मौके आए जब पूंजीवादी मीडिया में यह ऐलान कर दिया कि ‘मार्क्‍स इज डेड’ अर्थात ‘मार्क्‍स मर गया’; अलबत्ता, यह मार्क्‍स की प्रत्यक्ष मौत की बात नहीं थी बल्कि मानवमुक्ति के उस फलसफे के अप्रासंगिक होने की उनकी दिली ख्वाहिश को जुबां दिया जाना था, जो उनके नाम के साथ जाना जाता है। याद किया जा सकता है कि सोवियत रूस का विघटन होने के बाद और जिन दिनों पूंजीवाद की ‘अंतिम जीत’ के दावे कुछ अधिक जोर से उठने लगे थे, पूर्व सोवियत रूस के एक गणराज्य में बाकायदा एक पोस्टर मार्क्‍स की तस्वीर के साथ ‘‘मोस्ट वाटेंड’’ के नारे के साथ छपा था।

यह अलग बात है कि हर बार इस भविष्यवाणी को झुठला कर अग्निपक्षी/फिनिक्स की तरह मार्क्‍स राख से बार बार ‘नया जीवन’ लेकर उपस्थित होते रहे हैं। आलम तो यहां तक आ पहुंचा है कि 1999 में- अर्थात सोवियत रूस के विघटन के लगभग नौ साल बाद- बीबीसी के आनलाइन सर्वेक्षण में मार्क्‍स को सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा विचारक कहा गया था। Continue reading विचार ही अब द्रोह !

Thejus – The Death of a Daily Newspaper

[This is a GUEST POST by N P CHEKKUTTY]

 

It is rarely that a journalist writes about himself or herself, because they are supposed  to be detached observers of history-in-the-making. But this time I cannot help it because one of the things that happened in the Sabarimala-obsessed state of Kerala this week happens to be the demise of Thejas, a daily newspaper that I was associated with for almost 14 years. It was a death foretold over two and half months ago, but no one took notice and no one raised any serious concerns about the passing of a newspaper that existed in our civil society for over a decade. It is sad that the newspaper which was known for its fierce anti-Sangh Parivar positions leave the scene just a few months ahead of a general election that will decide the future course of this country. Continue reading Thejus – The Death of a Daily Newspaper

Hindutva Terror and Left Hegemony: After Women’s Entry into Sabarimala

Hours after the two women entered Sabarimala, the Hindu terrorists began their handiwork. Mad mobs, including women, began to roam the streets and attack by-passers, in their desperation to foment violence and provoke riots. In Karunagappally, Muslim establishments and shops were singled out for vandalism. The Sangh-backed Sabarimala Action Council called for a hartal today and they have spared no effort to make sure that people are terrorized. Continue reading Hindutva Terror and Left Hegemony: After Women’s Entry into Sabarimala

The Triumph of Streevaashi! Women break the wall of caste at Sabarimala

Out of the dark, seemingly never-ending night, a streak of light! Two women of menstruating ages, Bindu and Kanakdurga, finally entered Sabarimala, breaking the concerted walls built against them by brahmanical-Hindutva male authorities on the right and left. Continue reading The Triumph of Streevaashi! Women break the wall of caste at Sabarimala

हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश – स्मृतिलोप  से हट कर यथार्थ की ओर

( अकार, 51 – हिंदी समाज पर केंद्रित अंक में जल्द ही प्रकाशित)

‘देवताओं, मंदिरों और ऋषियों का यह देश ! इसलिए क्या यहां सबकुछ अमर है ? वर्ण अमर, जाति अमर, अस्पृश्यता अमर ! ..युग के बाद युग आए ! बड़े बड़े चक्रवर्ती आये ! ..दार्शनिक आए ! फिर भी   अस्पृश्यता  , विषमता अमर है ! ..यह सब कैसे हो गया ? किसी भी महाकवि, पंडित, दार्शनिक, सत्ताधारी सन्त की आंखों में यह अमानुषिक व्यवस्था चुभी क्यों नहीं ? ..बुद्धिजीवियों, संतों और सामर्थ्यवानों का यह अंधापन, यह संवेदनशून्यता दुनिया भर में खोजने पर भी नहीं मिलेगी ! इससे एक ही अर्थ निकलता है कि यह व्यवस्था बुद्धिजीवियों, सन्तों और राज करनेवालों को मंजूर थी ! यानी इस व्यवस्था को बनाने और उसे बनाये रखने में बुद्धिजीवियों और शासकों का हाथ है।

– बाबुराव बागुल /17 जनवरी 1930 –  26 मार्च 2008/

जानेमाने मराठी लेखक

1.

वर्ष 2014 में हिन्दी की प्रथम दलित कविता कही जानेवालीे एक कविता ‘अछूत की शिकायत’ 1 के सौ साल पूरे हुए। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित ‘सरस्वती’ पत्रिका के सितम्बर माह में प्रकाशित अंक में यह कविता छपी थी।

हीरा डोम द्वारा रचित इस कविता पर बहुत कुछ लिखा गया है, किस तरह यह कविता साहित्य में नयी जमीन तोड़ती है, धर्म, पूंजीवाद, सामाजिक गैरबराबरियों को वैधता प्रदान करती मौजूदा व्यवस्था को प्रश्नांकित करती है, ढेर सारी बातें लिखी गयी हैं। फिलवक्त़ न मैं इसकी तरफ आप का ध्यान दिलाना चाहता हूं, न इस बहस की तरफ कि क्या उसे प्रथम दलित कविता कहा जा सकता है या नहीं ! साहित्य के सुधी पाठक एवं प्रबुद्ध आलोचक इसके बारे में मुकम्मल राय दे सकते हैं। /इतनाही याद रखना जरूरी है कि पत्रिका में छपनेवाली रचनाओं के बारे में संपादक के तौर पर महावीर प्रसाद द्विवेदी काफी सख्त माने जाते थे। उनकी इस सख्ती का अन्दाज़ा इस बात से लगता है कि निराला – जो बाद में महाकवि के तौर पर सम्बोधित किए गए – उनकी चन्द कविताएं भी शुरूआत में उन्होंने लौटा दी थीं। लाजिम है कि हीरा डोम की इस कविता को प्रकाशित करने में भी उन्होंने अपने पैमानों को निश्चित ही ढीला नहीं किया होगा।/

कल्पना की जाए कि सरस्वती के अंक में अगर उपरोक्त कविता छपी नहीं होती तो हीरा डोम नामक वह शख्स ताउम्र लगभग गुमनामी में ही रहते। कोई नहीं जान पाता कि उत्पीड़ित समुदाय में एक ऐसे कवि ने जन्म लिया है, जिसकी रचनाओं में जमाने का दर्द टपकता है। Continue reading हिंदी समाज में हीरा डोम की तलाश – स्मृतिलोप  से हट कर यथार्थ की ओर

आई आई टी मद्रास – आधुनिक दौर का अग्रहरम !

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नागेश / बदला हुआ नाम/ – जो आई आई टी मद्रास में अध्ययनरत एक तेज विद्यार्थी है, तथा समाज के बेहद गरीब तबके से आता है – उसे उस दिन मेस में प्रवेश करते वक्त़ जिस अपमानजनक अनुभव से गुजरना पड़ा, वह नाकाबिले बयानात कहा जा सकता है। उसे अपने गांव की जातीय संरचना की तथा उससे जुड़े घृणित अनुभवों की याद आयी। दरअसल किसी ने उसे बाकायदा मेस में प्रवेश करते वक्त़ रोका और कहा कि अगर वह मांसाहारी है, तो दूसरे गेट से प्रवेश करे।

मेस के गेट पर बाकायदा एक पोस्टर लगा था, जिसे इस नये ‘निज़ाम’ की सूचना दी गयी थी। यहां तक कि अपने खाने की पसंदगी के हिसाब से हाथ धोने के बेसिन भी बांट दिए गए थे। ‘शाकाहारी’ और ‘मांसाहारी’। एक रिपोर्टर से बात करते हुए नागेश अपने गुस्से को काबू करने में असमर्थ दिख रहे थे। उन्होंने पूछा कि आखिर आई आई टी का प्रबंधन ऐसे भेदभावजनक आदेश को छात्रों से सलाह मशविरा किए बिना कैसे निकाल सकता है। Continue reading आई आई टी मद्रास – आधुनिक दौर का अग्रहरम !