उना कांड की पहली बरसी पर राष्ट्रीय आह्वान, गुजरात में होगा ‘आज़ादी कूच’ : जिग्नेश मेवाणी

On the First Anniversary of the Una Floggings – Call from JIGNESH MEWANI and RASHTRIYA DALIT ADHIKAR MANCH

Continue reading “उना कांड की पहली बरसी पर राष्ट्रीय आह्वान, गुजरात में होगा ‘आज़ादी कूच’ : जिग्नेश मेवाणी”

धर्म का बोझ और बच्चे

आखिर जिन छोटे बच्चों को क़ानून वोट डालने का अधिकार नहीं देता, जीवनसाथी चुनने का अधिकार नहीं देता, उन्हें आध्यात्मिकता के नाम पर इस तरह जान जोखिम में डालने की अनुमति कैसे दी जा सकती है?

Aradhna Varshil

17 साल का वर्षिल शाह – जिसने 12 वीं की परीक्षा में 99.93 परसेन्टाइल हासिल किए, अब इतिहास हो गया है.

दुनिया उसे सुविरा महाराज नाम से जानेगी और वह अपने गुरु कल्याण रत्न विजय की तरह बाल भिक्खु में शुमार किया जाएगा, ऐसे लोग जिन्होंने बचपन में ही जैन धर्म की दीक्षा ली और ताउम्र जैन धर्म के प्रचार में मुब्तिला रहे.

बताया जा रहा है कि इन्कम टैक्स आफिसर पिता जिगरभाई शाह और मां अमीबेन शाह ने अपनी सन्तान को बिल्कुल ‘धार्मिक’ वातावरण में पाला था, उनके घर में टीवी या रेफ्रिजरेटर भी नहीं था और बिजली का इस्तेमाल भी बहुत जरूरी होने पर किया जाता था क्योंकि शाह दंपति का मानना था कि उर्जा निर्माण के दौरान पानी में रहने वाले जीव मर जाते हैं, जो जैन धर्म के अहिंसा के सिद्धांत के खिलाफ पड़ता है.

वर्षिल-जो अभी कानून के हिसाब से वयस्क नहीं हुआ है, जो वोट भी डाल नहीं सकता है, यहां तक कि अख़बारों में प्रकाशित उसकी तस्वीरों में मासूमियत से भरे उसके चेहरे को भी देखा जा सकता है- के इस हालिया फैसले ने बरबस तेरह साल की जैन समुदाय में जन्मी हैदराबाद की आराधना (जो चार माह से व्रत कर रही थी) के बहाने उठी बहस को नए सिरे से जिंदा किया है, जो पिछले साल खड़ी हुई थी.

( Read the full article here : http://thewirehindi.com/11503/monk-jain-bal-diksha-fasting/)

बिहार क्या सिर्फ बिहार में है ?

बिहार फिर से खबर में है. इंटरमीडिएट परीक्षाओं के परिणाम आए हैं.पैंसठ प्रतिशत छात्र फेल हो गए हैं.बिहार में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं.कॉपियों की दुबारा जाँच कराने की माँग की जा रही है. जन संचार माध्यमों के जरिए वैसे छात्रों की व्यथा और क्रोध का पता चल रहा है जिन्होंने आई आई टी जैसी कठिन प्रवेश परीक्षाओं में सफलता प्राप्त की है लेकिन जो बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में फेल हो गए हैं.इसे पर्याप्त माना जा रहा है यह कहने के लिए कि परीक्षा परिणामों में घपला ज़रूर है वरना इतने प्रतिभाशाली युवा, जो आई आई टी की परीक्षा की बाधा दौड़ पार कर गए हैं,बोर्ड के इम्तहान में फेल कैसे हो जाएँगे! Continue reading “बिहार क्या सिर्फ बिहार में है ?”

अरुंधति का निर्वासन: वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

अरुंधति राय के खिलाफ अपशब्दों की, गाली-गलौच की, आरोपों की हिंसा ने हमें एक बार फिर यह प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया है – क्या हमने सचमुच अपने देश में सभ्यता व सहिष्णुता के महान मूल्यों की रक्षा करने के दायित्व से छुटकारा पा लिया है? कहीं हम पूरे राष्ट्र को ‘डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसआर्डर’ (खंडित व्यक्तित्व मनोरोग) का शिकार बनते तो नहीं देख रहे हैं जिसमें किसी व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र के चरित्र में परस्पर विरोधी मूल्य इस प्रकार विषैले कांटों की तरह उग आते हैं कि राष्ट्र का पूरा व्यक्तित्व चरमराने या दिग्भ्रमित होने लगता है! एक सभ्य-लोकतांत्रिक देश के रूप में आत्मछवि और हिंसक बाहरी आचरण में जितना गहरा भेद पैदा हो जाता है, वह राष्ट्र की आत्मा मार देता है। जिसने भी स्वयं में अनूठी लेखिका को जीप के बोनट से बांधने की कल्पना की, उसे संभवतः अंदाजा भी नहीं था कि वह केवल एक वक्तव्य नहीं दे रहा है, बल्कि मनुष्यता के सभी संभव परिकल्पनाओं के विरुद्ध अपराध कर रहा है। ऐसी कल्पना में बीमार विचारशून्यता ही नहीं बल्कि भयानक सड़ांध, विकृति और मनोरोग की झलक मिलती है। परेश रावल के अरुंधति के विरोध में लिखे ट्वीट से उल्लसित सोशल मीडिया के एक समूह ने तो अरुंधति राय की सामूहिक ढंग से हत्या कर उनके शव को पाकिस्तान में दफनाने की वकालत भी कर डाली।

Continue reading “अरुंधति का निर्वासन: वैभव सिंह”

बहुजन राजनीति की नयी करवट की अलामत है भीम आर्मी : प्रवीण वर्मा

Guest post by PRAVEEN VERMA

यूँ तो अम्बेडकर जयंती हर साल आती हैं और दलित-पिछड़े समुदाय का एक बड़ा तबक़ा इसे बड़ी शिद्दत से मनाता आया है। लेकिन इस बार अम्बेडकर का 126वां जन्मदिन कुछ और ही नज़ारा ले कर आया। यू॰पी॰ का सहारनपुर ज़िला जहाँ अच्छी ख़ासी तादाद में दलित समुदाय के लोग रहते हैं और अन्य जिलों की बनिस्बत ज़्यादा संगठित हैं, वहाँ दो आयोजनों और उसकी अनुमति को लेकर दबंग जाति के लोगों ने जम कर उत्पात मचाया, जिसका दलित समुदाय के द्वारा ना केवल डट कर मुक़ाबला किया गया बल्कि एक वाजिब जवाब भी दिया गया। हालाँकि प्रशासनिक कार्यवाही हमेशा की तरह एकतरफ़ा रही जिसमें 40 दलित युवकों को जेल में ठूँस दिया गया और दबंगो को सस्ते में जाने दिया गया। शब्बीरपुर की ये घटना(एँ) कई दिनों तक चलती रही जिसमें दबंग जाति के लोगों के अहम को चोट तो लगी ही, साथ ही साथ एक और संदेश दे गयी : जिस तरह से दबंग जाति के लोगों ने हिंसा को अपनी बपौती समझ लिया था, अब वैसा नहीं हैं, लगभग देश के कुछ हिस्सों में तो। 

Continue reading “बहुजन राजनीति की नयी करवट की अलामत है भीम आर्मी : प्रवीण वर्मा”

A Day Against Kalluri at IIMC, Delhi: Bastar Solidarity Network Delhi Chapter

Guest Post by Bastar Solidarity Network Delhi Chapter

The democratic forces, organizations and the thinking minds of IIMC took part in a spirited protest today against the invitation extended to notorious ex-IG Kalluri by the IIMC administration to take part in a seminar. To start with, since last two days, there were several attempts on the part of the organizers to confuse/conceal Kalluri’s invitation. Immediately after the declaration of the protest, Kalluri’s name was dropped from the poster. There were also threats of counter-mobilisation by the BJP goons. But undeterred, as we reached the gates of IIMC at 11am, the site echoed with slogans of “Killer Kalluri Go Back”!

Continue reading “A Day Against Kalluri at IIMC, Delhi: Bastar Solidarity Network Delhi Chapter”

The Anti-Democratic ‘Republic’: Bobby Kunhu

Guest post by BOBBY KUNHU

English language television news in India nowadays is nothing more than exaggerated visual editorials. They pick two or three stories, sensationalize them, run them in a loop through the day, alongside panel discussions where the editorial ideology of the channel is forced down the throat of the panelists and the viewers. In short there is hardly little journalism left in these channels. Though they do have panel discussions, regional language channels – at least Malayalam and Tamil channels that I watch – have a wider and more diverse reportage than self-proclaimed national television.

It wasn’t always like this. When Prannoy Roy pioneered private television content for Murdoch – regardless of the ideological content – there was reportage. Editorial proselytizing and endless panel discussions were limited most often to when psephologists stepped in.

Continue reading “The Anti-Democratic ‘Republic’: Bobby Kunhu”