Category Archives: Culture

Lockdown 4.0 – A Tribute to Labourers by Navchintan Kala Manch

नवचिंतन कला मंच द्वारा – बीते दिनों में अपनी ही धरती पे बेगानेपन का अहसास कर हज़ारों किलोमीटर दूर अपने घरों की उम्मीद के निकले लोगों के साथ हुए हादसों की दास्तान ज़रूर देखें।

प्रार्थना स्थलों पर लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध

news on judiciary

कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय.
ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय

क्या अपने ‘खुदा’ को आवाज़ देने के लिए बांग देने की जरूरत पड़ती है ?

आज से छह सदी पहले ही कबीर ने यह सवाल पूछ कर अपने वक्त़ में धर्म के नाम पर जारी पाखंड को बेपर्दा किया था. पिछले दिनों यह मसला नए सिरे से उछला जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस बारे में एक अहम फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि अज़ान अर्थात प्रार्थना के लिए आवाज़ देने की बात इस्लाम का हिस्सा है लेकिन वही बात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के बारे में नहीं कही जा सकती, लिहाजा रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल के इजाजत नहीं दी जा सकती.

अदालत के मुताबिक मुअज्जिन मस्जिद की मीनार से अपनी मानवीय आवाज़ में अज़ान दे सकता है और उसे महामारी रोकने के लिए राज्य द्वारा लगायी गयी पाबंदियों के तहत रोका नहीं जा सकता, अलबत्ता उसके लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल वर्जित रहेगा.

ध्यान रहे कि अदालत यूपी पुलिस द्वारा जगह-जगह मनमाने ढंग से अज़ान पर लगायी गयी पाबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर विचार कर रही थी. हाथरस, अलीगढ़ आदि स्थानों पर महामारी के कानूनों का हवाला देते हुए पुलिस वालों ने अज़ान देने पर ही पाबंदी लगायी थी, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था.

उम्मीद है कि अदालत के फैसले के मद्देनज़र यूपी पुलिस मनमाने तरीके से अज़ान पर नहीं रोक लगाएगी, निश्चित ही यह सुनिश्चित करेगी कि इसके लिए किसी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है.

गौरतलब है कि अदालत ने संविधान के तहत प्रदत्त बुनियादी अधिकारों में शामिल आर्टिकल 19/1/ए का हवाला देते हुए जो इस बात को सुनिश्चित करता है कि‘किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह अन्य लोगों को बन्दी श्रोता (captive listeners) बना दें’ यह निर्देश दिया.

निश्चित ही मस्जिदों में जहां बिना अनुमति के लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल पर पाबंदी रहेगी, वही बात मंदिरों, गुरुद्धारों या अन्य धार्मिक स्थलों पर भी लागू रहेगी ताकि आरती के बहाने या गुरुबाणी सुनाने के बहाने इसी तरह लोगों को ‘बन्दी श्रोता’ मजबूरन न बनाया जाए. ( Read the full article here :https://hindi.theprint.in/opinion/allahabad-high-court-ban-loudspeakers-at-prayer-places-exposes-hypocrisy-in-the-name-of-faith/140765/)

Hari Vasudevan, the Soviet Archives and the Left Establishment: Sobhanlal Datta Gupta

This tribute to Prof HARI VASUDEVAN by Prof SOBHANLAL DATTA GUPTA, who passed away in Kolkata recently, is being reproduced here, courtesy Mainstream Weekly.

Thereafter, as we proceeded in our work on the publication of the texts of the documents, we began to face insurmountable resistance, quite surprisingly, from a section of the Left establishment in West Bengal. We were threatened, maligned and discouraged not to proceed with this work any further and ridiculed for our research on documents which were described as “fake” and “doctored”.

It was May, 1995, exactly 25 years ago. Hari Vasudevan (Calcutta University), Purabi Roy (Jadavpur University) and I myself (Calcutta University) were in Moscow for two months, working as a team sent by The Asiatic Society, Calcutta in connection with a project of collection of documents from the newly opened Soviet archives on Indo-Russian Relations : 1917-1947. This project was the result of a Protocol signed between The Asiatic Society, Calcutta and Moscow’s Institute of Oriental Studies. With extremely limited funding we were expected to prepare catalogues of as many documents as possible and bring home photocopies/microfilms of those documents which we considered most important, depending, of course, upon their accessibility. It was a Herculean job, since we had no idea of the materials we had to handle. Working on hundreds and hundreds of documents, catalouging and copying them (in many cases because of paucity of funds and since we had no laptop, quite often we had to take down a document by hand) demanded a division of labour. While Purabidi worked in the State Archives of the Russian Federation (GARF), Archives of the Ministry of External Affairs (MID), Russian State Military Historical Archive (RGVIA), Hari and I worked in the former Central Party Archives, Institute of Marxism-Leninism (now known as Russian State Archive for Social and Political History or RGASPI ). Continue reading Hari Vasudevan, the Soviet Archives and the Left Establishment: Sobhanlal Datta Gupta

Community-Based Mapping of Covid: Nothing Official About it

No doubt the clarification that India will not map Covid-19 infections on the basis of religion has many heaving sighs of relief. But will the peace last?

Community-Based Mapping of Covid: Nothing Official About it

Image Courtesy: AP

Move for community-based mapping of coronavirus?” a recent news item in a prestigious daily asked, getting tongues wagging about “closed-door meetings at the highest level”, though no “official” decision had been taken in themThe Ministry of Health declared that any such news is “baseless, incorrect and irresponsible”. Lav Agarwal, the top bureaucrat in the ministry—who interacts with the media on Covid-related developments—called such news reports “…very irresponsible”. “The virus does not see people’s caste, creed or religion,” he said, quoting the Supreme Court’s directions on controlling non-factual or fake news.

No doubt the official clarification has many heaving sighs of relief.

The relief is understandable, because it was only last month—when the Novel Coronavirus pandemic had started taking a toll—that Muslims were being stigmatised as “super-spreaders” of the disease.

Taking a grim view of the situation, in its press conference o6 April, the World Health Organisation had given the Indian government some simple advice. The WHO said, in response to an India-specific question, that countries should not profile Covid-19 infections in religious, racial or ethnic terms. The WHO Emergency Programme Director Mike Ryan also underlined that every positive case should be considered a victim.

( Read the full article here)

Poetry of resistance against the suppression of dissent

On 16th May 2020, the Campaign against Witch-hunt of Anti-CAA Activists inaugurates its Poetry Week.  

Poetry bears witness. It records, it remembers. Resistance, indeed life itself, has long been sustained and nourished by the words of poets.
So, it is with poetry that we celebrate the inspiring movement against the Citizenship Amendment Act, and with the power of words fight the wrongful arrests and malicious prosecution of anti-CAA activists.
The first session will feature poets Aamir Aziz, Aquila, Neha and Rabiya of the Parcham Collective, Miya’h poet Shalim Hussain & Naveen Chourey
Host and anchor: Tanzil Rahman
FIRST SESSION
On 16th May | Saturday | 8 pm onwards
Register using this link

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Paean – A Song for Triumphs, For Usha Ganguly and Irrfan Khan: The Mocking Birds

Guest Post by the group THE MOCKING BIRDS

आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आएगी
सब उठो, मैं भी उठूँ तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी
ये ज़मीं तब भी निगल लेने पे आमादा थी
पाँव जब टूटती शाख़ों से उतारे हम ने
उन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बर
उन दिनों की जो गुफाओं में गुज़ारे हम ने ( कैफ़ी आज़मी )
              सच है इस लॉक डॉउन में हमने लगभग गुफाओं में दिन गुजारे है, कुछ आब ला पा सड़क पर दर ब दर है, कुछ ऐसे है जो इस फानी दुनिया से चले गए, ऐसा लगता है जैसे उनको इस आगत का इलहाम हो गया था आज के ग़म का, और जल्द ही चले गए …. फ़ैज़ से कुछ पंक्तियां लेकर

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निरंकुशता के स्रोत, प्रतिरोध के संसाधन : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha

राजनीति का आम सहजबोध यह है कि सत्ता की निरंकुशता लोकतंत्र का निषेध है। लोकतंत्र राजनीतिक सत्ता का गठन तो करता है, लेकिन उसे निरंकुश नहीं होने देता। यदि किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत निरंकुश सत्ता का उद्भव होता है तो उसे लोकतंत्रा की दुर्बलता, उसके विकार या उसमें किसी बाहरी अलोकतांत्रिक शक्ति के हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है। यदि लोकतंत्र का अर्थ यह है कि सत्ता के स्रोत लोक में स्थित हैं तो यह स्वयंसिद्ध है कि लोकतांत्रिक सत्ता निरंकुश नहीं हो सकती।

इसी तरह राजनीति का सहजबोध यह भी है कि सत्ता की निरंकुशता प्रतिरोध को जन्म देती है और प्रतिरोध की जड़ें लोक में स्थित होती हैं। निरंकुशता यदि लोकतंत्र का निषेध है तो यह भी स्वयंसिद्ध है कि लोक या जन ही प्रतिरोध के मूल आधार और उसके प्रमुख संसाधन हैं। यह दूसरी मान्यता पहली के साथ जुड़ी हुई है। यदि पहली मान्यता टिकती है तो दूसरी की सत्यता भी साबित होती है। यदि पहली संदेह के घेरे में आती है तो दूसरी के स्वयंसिद्ध होने पर भी प्रश्न खड़े होते हैं।

और, प्रश्न तो खड़े होते हैं। वास्तविकता की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वह मान्यताओं की परवाह नहीं करती – बहुप्रचलित और स्वयंसिद्ध प्रतीत होने वाली मान्यताओं की भी नहीं। दूसरी तरफ़, मान्यताओं की – ख़ास तौर पर बहुप्रचलित मान्यताओं की – बनावट और उनकी ज़मीन ऐसी होती है कि वास्तविकताओं के उलट होने के बावजूद वे चलन में बनी रहती हैं। ऐसी स्थिति में पहले तो यह देखना होता है कि वास्तविकता क्या है और संबंधित मान्यताओं से उसकी संगति बैठती है या नहीं। फिर यह अलग से देखना होता है कि मान्यताएं जब ग़लत होती हैं, तब भी उनके चलते रहने के कारण कहां पर स्थित हैं। एक तरह से यह सहजबोध की जांच-पड़ताल का समय होता है। और कभी-कभी नये सहजबोध के निर्माण का समय भी होता है।

भारत की आज की हक़ीक़त यह तो है ही कि मौजूदा सरकार के अधीन राज्य और राजनीतिक सत्ता निरंकुश हो चले हैं। संवैधानिक, संस्थागत तथा लोकतांत्रिक नियमों, नियंत्रणों और परंपराओं को रौंदा जा रहा है और व्यवस्था तथा समाज, दोनों क्षेत्रों में मनमानी की जा रही है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, असम से गुजरात तक, संसद से और भीमा कोरेगांव से तीस हज़ारी तक और तिहाड़ तक नंगी निरंकुशता के उदाहरण सभी के सामने हैं। लेकिन क्या सभी को यह सब दिखायी दे रहा है? Continue reading निरंकुशता के स्रोत, प्रतिरोध के संसाधन : रवि सिन्हा