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अमर नश्वरता का कथावाचक: विजय दान देथा

मृत्युहीन अमरता से बड़ा अभिशाप और कुछ नहीं, विजयदान देथा की एक कहानी में एक कौवा सिकंदर को सीख देता है. फिर भी मृत्यु से दुखी न होना मनुष्यता के विरुद्ध है,यह भी हम जानते हैं. इसलिए कि प्रत्येक व्यक्ति अपनेआप ही ऐसी क्षमताओं और संभावनाओं का आगार है जो उसके अलावा और किसी के पास नहीं होतीं. हमें पता है कि उसके जाते ही वह सब कुछ चला जाता है जो उसने अर्जित किया, संग्रह किया और फिर उसके बल पर  गढ़ा. वह संग्रह और गढ़ने की वह ख़ास कला भी उसके साथ चली जाती है.दुख इससे  हमेशा के लिए वंचित हो जाने का होता है.विजयदान देथा के जाने से हुई तकलीफ और खालीपन दरअसल इस बात के अहसास से पैदा होता  है कि जो प्रयत्न उनके द्वारा संभव हुआ और जिसने प्रसन्न कला का रूप ग्रहण किया, वह कितना विराट और दुष्कर था, इसका आभास हम सबको है. Continue reading अमर नश्वरता का कथावाचक: विजय दान देथा