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Decolonizing Thought – Beyond Indian/ Hindu Exceptionalism

A Decolonization mural in Oakland, USA, photo HiMYSYeD, Oakland Wiki

This post is prompted by a discussion that followed some remarks I had made on social media regarding the way in which a certain common sense that we may call ‘Hindu Nationalist’, had come to dominate the sensibilities of even those intellectuals in the Hindi world who otherwise might stand opposed to the Hindu Right. ‘Decolonizing’ has lately become a banner of the Hindu Right and for many otherwise secular Hindi intellectuals too, an occasion for an often strident anti-West rhetoric. Such a common sense assumes, simply by default, that the only “authentic” position of critique of the West is one framed by Hindu/ Indian exceptionalism. Needless to say, as I have argued at length in my recent book (Decolonizing Theory), the narrative that structures the imaginative world of many such modern Hindus is already a narrative produced by colonialism.

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अमर नश्वरता का कथावाचक: विजय दान देथा

मृत्युहीन अमरता से बड़ा अभिशाप और कुछ नहीं, विजयदान देथा की एक कहानी में एक कौवा सिकंदर को सीख देता है. फिर भी मृत्यु से दुखी न होना मनुष्यता के विरुद्ध है,यह भी हम जानते हैं. इसलिए कि प्रत्येक व्यक्ति अपनेआप ही ऐसी क्षमताओं और संभावनाओं का आगार है जो उसके अलावा और किसी के पास नहीं होतीं. हमें पता है कि उसके जाते ही वह सब कुछ चला जाता है जो उसने अर्जित किया, संग्रह किया और फिर उसके बल पर  गढ़ा. वह संग्रह और गढ़ने की वह ख़ास कला भी उसके साथ चली जाती है.दुख इससे  हमेशा के लिए वंचित हो जाने का होता है.विजयदान देथा के जाने से हुई तकलीफ और खालीपन दरअसल इस बात के अहसास से पैदा होता  है कि जो प्रयत्न उनके द्वारा संभव हुआ और जिसने प्रसन्न कला का रूप ग्रहण किया, वह कितना विराट और दुष्कर था, इसका आभास हम सबको है. Continue reading अमर नश्वरता का कथावाचक: विजय दान देथा