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मुकुल सिन्हा

यह विचित्र और विडम्बनापूर्ण संयोग है कि जब सारे टेलीविज़न चैनल नरेंद्र मोदी नीत राजनीति के भारतीय केंद्रीय सत्ता में आने की खबर दे रहे थे, उसी वक्त मुकुल सिन्हा के हम सबसे अलग होने समाचार नासिरुद्दीन ने फोन से दिया. मुकुल कैंसर से जीत न पाए. उनकी मौत की खबर से ज़्यादा सदमा इस बात से पहुँचा कि हमें उनके हस्पताल में होने की खबर ही न थी. हमें इसका इल्म न था कि नरेंद्र मोदी के मोहजाल को, जो करोड़ों,अरबों रुपयों और अखबारों और टेलीविज़न के विशालकाय तंत्र के ज़रिए बुना जा रहा था, छिन्न-भिन्न करने के लिए प्रेमचंद के सूरदास की तरह ही गुजरात का सच बताने का अभियान जो शख्स चला रहा था, उसे मालूम था कि वह अपनी ज़िंदगी के किनारे पर खड़ा था.

धर्मनिरपेक्ष कामकाजीपन का रिश्ता ही हम सबका एक दूसरे से है, मानवीय स्नेह की ऊष्मा से रिक्त!यह एक उपयोगितावादी सम्बन्ध है जिसमें हम एक दूसरे से धर्मनिरपेक्ष, राजनीतिक चिंताओं से ही मिलते-जुलते और बातचीत करते हैं.अपने मित्रों की जिंदगियों और उनकी जाती फिक्रों क साझेदारी हम शायद ही करते हैं.मुझे खुद पर शर्म आई कि मैं मुकुल के कैंसर के बारे में नहीं जानता था, गुस्सा उन दोस्तों पर आया जो इसे जानते थे पर इस दौरान कभी इसे बात करने लायक नहीं समझा. हम अपनी ही बिरादरी नहीं बना पाए हैं फिर हम एक बड़ी इंसानी बिरादरी बनाने का दावा क्योंकर करते हैं! Continue reading मुकुल सिन्हा