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अपराध के साथ सहजीवन Reading The Fiction of Fact Finding – Modi and Godhra

मैं 2014 की सबसे महत्वपूर्ण किताब पढ़ रहा हूँ. यह है मनोज  मित्ता की किताब  द फिक्शन ऑफ़ फैक्ट फाइंडिंग: मोदी एंड गोधरा  यह सौभाग्य बहुत कम किताबों को मिलता है कि वे अपने समाज की अंतरात्मा की आवाज़ की तरह उभरें जब ऐसा लगे कि वह पूरी तरह सो चुकी है. वे हमें खुद अपने सामने खड़ा कर देती हैं और मजबूर करती हैं कि हम अपने आपको पहचानें,खुद को दिए जाने वाले धोखे से निकल सकें और खुद को इम्तहान की खराद पर चढ़ा सकें.ऐसी किताब लिखने के लिए निर्मम तटस्थता चाहिए और सत्य के लिए अविचलित प्रतिबद्धता. इसमें तात्कालिक आग्रहों से स्वयं को मुक्त रखना एक चुनौती है.

सत्य की खोज के मायने क्या हैं? क्या यह सिर्फ इरादे से जुड़ा मसला है? अभी हम आध्यात्मिक स्तर पर सत्य की खोज की बात नहीं कर रहे.वहाँ भी यह मात्र नेक इरादे से हासिल नहीं किया जा सकता.दुनियावी मसलों में, खासकर राज्य के संदर्भ में इसका क्या अर्थ है? ऐसे अवसर आते हैं जब उसकी भूमिका और निर्णयों पर  प्रश्नचिह्न लगता है और सच जानने की मांग होती है. उस वक्त अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसे उपाय करेगा कि  उसके सीधे प्रभाव से मुक्त प्रक्रियाओं के माध्यम से सत्य का पता किया जा सके.आधुनिक राजकीय संरचना में न्यायालय को अपेक्षाकृत स्वायत्त संस्था माना जाता है,ऐसी व्यवस्था जो कार्यपालिका के सीधे नियंत्रण में नहीं है और इसलिए जो उसके बारे में भी सच बोल सकती है. लेकिन क्या भारत में यह हो पाया है? क्या सबसे संकटपूर्ण क्षणों में न्यायपालिका से जुड़े लोग इस भूमिका का निर्वाह कर पाए हैं? Continue reading अपराध के साथ सहजीवन Reading The Fiction of Fact Finding – Modi and Godhra