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हैदर: नैतिक दुविधा का बम्बइया संस्करण

 

“एकतरफा,स्त्री विरोधी और अतिसरलीकृत सपाटदिमागी… रूपात्मक और सौन्दर्यात्मक दृष्टि से भी ‘हैदर’ एक लचर और बोरिंग मसाला फिल्म है जो बहुत लंबी खिंचती है.”

कायदे से दर्शन के युवा अध्येता ऋत्विक अग्रवाल की इस समीक्षा के बाद ‘हैदर’ के बारे में और कुछ  नहीं कहना चाहिए. लेकिन ‘हैदर’ देखकर चुप रहना भी तो ठीक  नहीं.

दिल्ली के पी.वी.आर रिवोली सिनेमा हाल में ‘हैदर’ देखना यंत्रणादायक अनुभव था. हाल में काफी  कम दर्शक थे. ज़्यादातर युवा थे. फिल्म शुरू हुई और कुछ देर आगे बढ़ी कि फुसफुसाहटें तेज़ होने लगीं.फिर वह दृश्य आया जिसमें हैदर का चाचा उसकी माँ के साथ ठिठोली कर रहा है.और किसी हास्यपूर्ण प्रसंग की प्रतीक्षा में बैठी जनता ने हँसना शुरू कर दिया. विशाल भारद्वाज ने सोचा होगा कि वे एक बहुत तनावपूर्ण दृश्य रच रहे हैं जिसमें हैदर में हैमलेट की आत्मा प्रवेश करती है.जनता ने इसमें ‘कॉमिक रिलीफ’ खोज लिया. ध्यान रखिए,फिल्म में अभी कुछ देर पहले इस औरत के पति को फौज उठा ले गई है और उसका घर उड़ा दिया गया है!फिर तो जगह-जगह हँसी का फौवारा फूट पड़ता था. चाहे सलमान खान के दीवाने दो सरकारी मुखबिरों का दृश्य हो या हैदर को प्यार करने वाली अर्शी का कश्मीरी उच्चारण हो! लोग जैसे हंसने के लिए तैयार बैठे थे और कोई मौक़ा हाथ से जाने न देना चाहते थे . मैंने सोचा कि फिल्म आगे चलकर दर्शकों को शर्मिन्दा कर देगी और खामोश भी. लेकिन वह न होना था,न हुआ. आख़िरी हिस्से में जहाँ बर्फ पर कब्र खोदते हुए बूढ़े नाटकीय ढंग से गा रहे हैं, फिर हँसी छूट पड़ी. बिलकुल अंत में जब इखवानियों और इन बूढों के बीच गोली-बारी हो रही है, एक बूढा उसी गीत को गाता है और हाल में हँसी तैरने लगती है. Continue reading हैदर: नैतिक दुविधा का बम्बइया संस्करण