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“Haider” – Hamlet in Kashmir: Suhas Munshi

This is a guest post by SUHAS MUNSHI

The challenge of telling stories of a conflict is its victims. Each, traumatized in their own way, needs their own story. The narrator is bound to fail not only those he didn’t include but those who didn’t see their stories recreated faithfully. Had Basharat Peer set himself the task of faithfully adapting the violence done to Kashmiris he would have had to script a pornographic narrative for the screen. Some of the bile directed at him from Kashmiris comes from a dissatisfaction of not depicting the true extent of the brutality of the Indian army and rendering its casualties adequately pitiful. An opinion piece written on the movie in ‘The Parallel Post’ titled ‘Setting the wrong precedent’ condemns torture scenes in the movie as having actually undermined the actual extent of army atrocity in Kashmir. The piece goes on to say, ‘army excesses wane out by the time movie reaches its climax.’

However, the only service that a story teller from Kashmir could do to art and to humanity is to depict the people living there, especially the victims, as humans; as people, just as they are found anywhere else in the world, and not continue to peddle the cliché of the valley being a dehumanized pastoral paradise. Accusations of betrayal, conceit and condescension are being hurled at Basharat Peer, the writer, when he has got, for the first time ever, the words ‘plebiscite’, ‘half-widows’ and the rousing call of ‘Azadi’ in a script, through a movie, on mainstream cinema. Continue reading “Haider” – Hamlet in Kashmir: Suhas Munshi

हैदर: नैतिक दुविधा का बम्बइया संस्करण

 

“एकतरफा,स्त्री विरोधी और अतिसरलीकृत सपाटदिमागी… रूपात्मक और सौन्दर्यात्मक दृष्टि से भी ‘हैदर’ एक लचर और बोरिंग मसाला फिल्म है जो बहुत लंबी खिंचती है.”

कायदे से दर्शन के युवा अध्येता ऋत्विक अग्रवाल की इस समीक्षा के बाद ‘हैदर’ के बारे में और कुछ  नहीं कहना चाहिए. लेकिन ‘हैदर’ देखकर चुप रहना भी तो ठीक  नहीं.

दिल्ली के पी.वी.आर रिवोली सिनेमा हाल में ‘हैदर’ देखना यंत्रणादायक अनुभव था. हाल में काफी  कम दर्शक थे. ज़्यादातर युवा थे. फिल्म शुरू हुई और कुछ देर आगे बढ़ी कि फुसफुसाहटें तेज़ होने लगीं.फिर वह दृश्य आया जिसमें हैदर का चाचा उसकी माँ के साथ ठिठोली कर रहा है.और किसी हास्यपूर्ण प्रसंग की प्रतीक्षा में बैठी जनता ने हँसना शुरू कर दिया. विशाल भारद्वाज ने सोचा होगा कि वे एक बहुत तनावपूर्ण दृश्य रच रहे हैं जिसमें हैदर में हैमलेट की आत्मा प्रवेश करती है.जनता ने इसमें ‘कॉमिक रिलीफ’ खोज लिया. ध्यान रखिए,फिल्म में अभी कुछ देर पहले इस औरत के पति को फौज उठा ले गई है और उसका घर उड़ा दिया गया है!फिर तो जगह-जगह हँसी का फौवारा फूट पड़ता था. चाहे सलमान खान के दीवाने दो सरकारी मुखबिरों का दृश्य हो या हैदर को प्यार करने वाली अर्शी का कश्मीरी उच्चारण हो! लोग जैसे हंसने के लिए तैयार बैठे थे और कोई मौक़ा हाथ से जाने न देना चाहते थे . मैंने सोचा कि फिल्म आगे चलकर दर्शकों को शर्मिन्दा कर देगी और खामोश भी. लेकिन वह न होना था,न हुआ. आख़िरी हिस्से में जहाँ बर्फ पर कब्र खोदते हुए बूढ़े नाटकीय ढंग से गा रहे हैं, फिर हँसी छूट पड़ी. बिलकुल अंत में जब इखवानियों और इन बूढों के बीच गोली-बारी हो रही है, एक बूढा उसी गीत को गाता है और हाल में हँसी तैरने लगती है. Continue reading हैदर: नैतिक दुविधा का बम्बइया संस्करण