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हिन्दुत्व वर्चस्ववाद :  अतीत का गंधाता कुआं 

आर एस एस – काया और माया” की समीक्षा

धर्मान्ध लोग – जो हंसना भूल गए हैं, रोना भूल गए हैं, और करूणा भूल गए हैं – ऐसे ‘इन्सान’ हैं जो एटम बम से भी ज्यादा ख़तरनाक हैं

– पी लंकेश के काॅलम ‘कहां मैं भूल न जाउं’ से

(पेज 6, ‘आर एस एस – काया और माया’ से)

…कन्नड भाषा के अग्रणी साहित्यकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता देवनूर महादेव की हिन्दी में प्रकाशित ताज़ा किताब ‘राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ – काया और माया’ ( आर एस एस – आलू मत्तू अगला ‘ नाम से मूल कन्नड़ में प्रकाशित किताब का हिंदी अनुवाद है ) इस मामले में एक नया पत्थर गाड़ती प्रतीत होती है। जैसा कि सभी जानते हैं वर्ष 2022 में मूल कन्नड में प्रकाशित इस किताब ने हाल के समय में बिक्री का रेर्कार्ड कायम किया है, वह न केवल कन्नड, तेलूगू, मराठी, अंग्रेजी, हिन्दी में प्रकाशित  हुई है बल्कि इस किताब को काॅपीराइट से मुक्त करके और लोगों को प्रकाशन की छूट देकर संघ के असली स्वरूप को जन-जन तक पहुंचाने में किताब ने वितरण के मामले में और किताब या संघ के बारे में चर्चा होने के मामले में एक किस्म का मील का प्रत्थर कायम किया है। कन्नड़ और तेलुगु में इसकी एक लाख से भी अधिक प्रतियां बिकी हैं और अन्य जुबानों में दसियों हज़ार से अधिक प्रतियां।   

ध्यान रहे कि जिस बेबाकी से देवनूर महादेव ने संघ के बारे में लिखा है, उतनी साफगोई बहुत कम लोग दिखा पाते है। किताब की भूमिका ही इस बात को उजागर करती है, आप लिखते हैं :

‘.. आर एस एस इस देश को कहां ले जाने की कोशिश कर रहा है ? इस संगठन के बारे में आम धारणा और इस संगठन के असली चाल-चरित्र के बीच फर्क क्या है ? इस सवालों पर जनमानस को जागृत  करने’ / पेज 23-24/ के लिए यह किताब लिखी गयी है। भारतीय लोककथाओं में चर्चित मायावी की कथा के बहाने जिसकी जान सात समुंदर पार किसी तोते में समायी होती है, जो बहुरूपिया है और मानवलोक में तरह तरह की ज्यादतियां करता है और उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाता क्योंकि जान ‘तोते के रूप में गुफा में सुरक्षित है’ वह संघ की असलियत जानने और उजागर करने के लिए ‘आर एस एस के अतीत के बदबूदार कुएं में ’ ( पेज 23) झांकने के लिए निकले हैं और दिखाई दिए ‘भयावह दृश्य ‘ / (पेज 24 ) का एक अंश किताब के रूप में सामने ला रहे हैं ।.. [ Read the full review here :https://janchowk.com/review-of-rss-kaya-aur-maya-hindutva-supremacism-a-stinking-well-of-the-past/]