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केन्द्रीय विश्वविद्यालय: वर्चस्वशाली जातियों के नए ठिकाने ?

अगर हम प्रोफेसरों के पदों की बात करें तो यूजीसी के मुताबिक अनुसूचित जाति से आने वाले प्रत्याशियों के लिए आरक्षित 82.82 फीसदी पद, अनुसूचित जनजाति तबके से आने वाले तबकों के लिए आरक्षित 93.98 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 99.95 फीसदी पद आज भी खाली पड़े हैं। असोसिएट प्रोफेसर के पदों की बात करें तो स्थिति उतनी ही खराब दिखती है: अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 76.57 फीसदी पद, अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 89.01 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 94.30 फीसदी पद खाली पड़े हैं।

क्या हम कभी जान सकेंगे कि मुल्क के चालीस केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में नियुक्त उपकुलपतियों के श्रेणीबद्ध वितरण- अर्थात वह किन सामाजिक श्रेणियों से ताल्लुक रखते हैं- के बारे में ?

शायद कभी नहीं !

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के केन्द्रीय विश्वविद्यालय ब्युरो में ऐसे कोई रेकॉर्ड रखे नहीं जाते।

किसी बाहरी व्यक्ति के लिए इन सूचनाओं का अभाव बेहद मामूली लग सकता है अलबत्ता अगर हम अधिक गहरे में जाकर पड़ताल करें तो हम पूछ सकते हैं कि सर्वोच्च पदों की यह कथित ‘जातिविहीनता’ का सम्बन्ध क्या इसी तथ्य से जोड़ा जा सकता है कि इन चालीस विश्वविद्यालयों में- सामाजिक और शारीरिक तौर पर हाशिये पर रहने वाले तबकों से आने वाले अध्यापकों की मौजूदगी नगण्य है। फिर वह चाहे अनुसूचित जाति, जनजाति हो या अन्य पिछड़ी जातियां हो या विकलांग तबके से आने वाले लोग हों। इन तबकों की इन पदों से साद्रश्यता के अभाव का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन श्रेणियों से आने वाले तबकों के लिए आरक्षित प्रोफेसरों के 99 फीसदी पद आज भी खाली पड़े हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में, एडहॉक/तदर्थ अध्यापक के तौर पर कार्यरत लक्ष्मण यादव द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को सूचना अधिकार के तहत जो याचिका दायर की गयी थी, उसी के औपचारिक जवाब के तौर पर ऐसे कई सारे अचम्भित करने वाले तथ्य सामने आए हैं। अगर हम प्रोफेसरों के पदों की बात करें तो यूजीसी के मुताबिक अनुसूचित जाति से आने वाले प्रत्याशियों के लिए आरक्षित 82.82 फीसदी पद, अनुसूचित जनजाति तबके से आने वाले तबकों के लिए आरक्षित 93.98 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 99.95 फीसदी पद आज भी खाली पड़े हैं। अगर हम असोसिएट प्रोफेसर के पदों की बात करें तो स्थिति उतनी ही खराब दिखती है: अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 76.57 फीसदी पद, अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 89.01 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 94.30 फीसदी पद खाली पड़े हैं। असिस्टेंण्ट प्रोफेसर पद के लिए आरक्षित पदों के आंकड़े उतने खराब नहीं हैं जिसमें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 29.92 फीसदी पद, अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 33.47 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 41.82 फीसदी पद खाली पड़े हैं। (देखें- मीडिया विजिल की रिपोर्ट)

 

आज के इस समय में जब किसी भी ख़बर को वायरल होने में चन्द पल लगते हैं, यह विस्फोटक जानकारी, जो कई सारे सवाल खड़ी करती है, दबी सी रह गयी है।

आप यह कह सकते हैं कि इस ख़बर की नवीनता समाप्त हो चुकी है।

ऐसा प्रतीत होता है कि हर कोई जानता है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय नए किस्म के अग्रहरम /अर्थात उंची जातियों के अडडों में तब्दील हो चुके हैं/

हम याद कर सकते हैं इंडियन एक्सप्रेस में पिछले साल प्रकाशित वह ख़बर जो सूचना अधिकार का इस्तेमाल करते हुए डिपार्टमेण्ट ऑफ पर्सोनेल एण्ड टेनिंग, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और मानव संसाधन मंत्रालय के मार्फत प्राप्त जानकारी पर आधारित थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक ‘कुल 1,125 प्रोफेसर पदों में महज 39/ 3.47 फीसदी/ अनुसूचित जाति से और सिर्फ 8 /0.7 फीसदी/ अनुसूचित जनजाति तबके से और कुल 2,620 एसोसिएट प्रोफेसर पदों में सिर्फ 130 /4.96 फीसदी/ अनुसूचित जाति से और सिर्फ 34 / 1.3 फीसदी/ अनुसूचित जनजाति तबके से; और कुल 7,741 असिस्टेण्ट प्रोफेसर पदों में से 931 / महह 12.02 फीसदी/ अनुसूचित जाति से, 423 / 5.46 फीसदी/ अनुसूचित जनजाति से और 1,113 /14.38 फीसदी/ अन्य पिछड़ी जाति से थे।

ग्राफिक- इंडियन एक्सप्रेस से साभार

गौरतलब है कि पदों के न भरे जाने का एक लम्बा इतिहास है और उसकी जड़ें गहरी हैं।

अगर हम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए बने राष्टीय आयोग की 1999-2000 की रिपोर्ट को पलटें जो चुनिन्दा केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में अध्यापकों के कुल पदों के बारे में और उनमें से आरक्षित पदों पर तैनात लोगों का विवरण प्रस्तुत करती है, जो आंखें खोलने वाला हो सकता हैः

प्रोफेसर: बीएचयू 1/360, अलीगढ़ 0/233, जनेवि, 2/183, दिल्ली विवि 3/332, जामिया 0/80, विश्वभारती 1/148, हैद्राबाद सेन्टल युनिवर्सिटी 1/72

रीडर: बीएचयू 1/396, अलीगढ़ 0/385, जनेवि 3/100, दिल्ली विवि 2/197, जामिया 1/128, विश्वभारती 1/70, हैद्राबाद सेन्टल युनिवर्सिटी 2/87

लेक्चरर: बीएचयू 1/329, अलीगढ़ 0/521, जनेवि 11/70, दिल्ली विवि 9/140, जामिया 1/216, विश्व भारती 16/188, हैद्राबाद सेन्टल युनिवर्सिटी 13/44

सवाल उठता है कि आखिर किस तरह अनुसूचित जाति, जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों के दावों की पूरी अनदेखी मुमकिन हो सकती है जब उसे लागू करने के लिए संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं ?

अगर हम प्रबुद्ध तबके की चर्चा को थोड़ा मुल्तवी कर दें, हम देख सकते हैं कि वर्ण समाज में ऐतिहासिक तौर पर उत्पीड़ित तबके को आरक्षण देने के लिए एक सामान्य असहमति दिखती है। निश्चित ही ऐसे मौके बहुत कम ही आते हैं जब वर्ण समाज के इन तबकों में शूद्र अतिशूद्र तबके के बारे में व्याप्त धारणाएं खुल कर सामने आती हैं। दिलचस्प बात है कि औपचारिक चर्चाओं में उन्हें यह कहते भी सुना जा सकता है कि ‘हमारी युगीन सभ्यता में सहिष्णुता रची बसी है, लेकिन वास्तविक आचरण में वह मनु द्वारा प्रस्तुत श्रेणीबद्धता को स्वीकारते दिख सकते हैं।

अनुसूचित जाति, जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों का यह हाशियाकरण या उनका साद्रश्य न होना एक तरह से- बकौल समाजशास्त्राी रमेश कांबले ‘संस्थागत व्यवहार और संरचनात्मक डिज़ाइन दोनों को हिस्सा होता है। वह दरअसल अस्तित्वमान सत्ता संरचना द्वारा हकदारी/एनटायटलमेण्ट से इन्कार करने की भी प्रणाली होती है।’

वह एक तरह से उत्पीड़ित एवं हाशिये पर पड़े तबकों द्वारा की जा रही बढ़ती दावेदारी को रोकने का भी तरीका होता है।

एक क्षेपक के तौर पर बता दें कि कम से कम नौकरशाही तबके में इसे सुगम बनाने का एक तरीका लेटरल एन्टी का भी जुड़ा है, जिसके तहत कार्यक्षमता बढ़ाने के नाम पर बाहरी विशेषज्ञों को सीधे जाइन्ट सेक्रेटरी के पद पर तैनात करने का सिलसिला चल पड़ा है। निश्चित ही इस लेटरल एन्टी में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।

आईआईटी मद्रास की कार्यप्रणाली पर निगाह डाल कर हम देख सकते हैं कि ‘हकदारी से इन्कार’ का सिलसिला कैसे आगे बढ़ता है या किस तरह वह ‘संस्थागत आचरण के तौर पर जड़मूल हो जाता है।’

यह बात बेहद विचित्र मालूम पड़ सकती है कि विगत डेढ दशक से अधिक समय से यह अग्रणी संस्थान- जो आज़ादी के बाद स्थापित राष्टीय महत्व के अग्रणी तकनीकी संस्थानों में शुमार था / स्थापना 1959/- वह कई बार जातिकेन्द्रित मुददों के चलते अधिकाधिक सूर्खियों में आता रहा है- मिसाल के तौर पर अभी पिछले ही साल इस संस्थान ने यह विवादास्पद कदम उठाया था कि मांसाहारी छात्रों के लिए मेस के अलग प्रवेश द्वार का, जिस योजना को जबरदस्त हंगामे के चलते उसे स्थगित करना पड़ा था।

 

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कुछ साल पहले ‘तहलका’ ने ‘कास्ट इन कैम्पस: दलितस नाट वेलकम इन आई आई टी मद्रास’ शीर्षक से एक स्टोरी की थी जिसमें उसने ‘इस अभिजात संस्थान के चन्द दलित छात्रों और शिक्षकों के बारे में विवरण दिया था, जिन्हें व्यापक प्रताडना का शिकार होना पड़ता है।’’ गणित विभाग की असिस्टेण्ट प्रोफेसर सुश्री वसंता कंडासामी ने रिपोर्टर को बताया था कि संस्थान की समूची फैकल्टी में महज चार दलित हैं जो संख्या कुल फैकल्टी संख्या का महज 0.86 पड़ती है।

आईआईटी की संस्क्रति में उत्पीड़ित जातियों के प्रति एक किस्म का विद्वेष/घ्रणाभाव किस कदर व्याप्त है, इसे इस बात से भी देखा जा सकता है कि सत्तर के दशक में जब अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए वहां सीटें आरक्षित की गयीं, तब जिस व्यक्ति ने इस प्रावधान का जबरदस्त विरोध किया था वह थे प्रोफेसर पी वी इंदिरेसन, जिन्हें 1979 से 1984 के दरमियान संस्थान के निदेशक के पद पर नियुक्त किया गया था।

1983 की अपनी डाइरेक्टर की रिपोर्ट में इंदिरेसन ने ‘‘सामाजिक तौर पर वंचित’’- जो विशेष सुविधाओं की मांग करते हैं और ‘‘प्रतिभाशाली’’ उंची जातियों जो ‘‘अपने अधिकारों के बलबूते’’ स्थान पाने के हकदार होते हैं, इसमें फरक किया था। उनके लिए और उनके जैसे तमाम लोगों के लिए, उंची जातियां ही वह एकमात्र ‘‘प्रतिभाशाली’’ होती हैं, जो एक जातिविहीन, जनतांत्रिक और प्रतिभाशाली नियम के अनुसार चलती है जिसे आरक्षण की नीतियों से खतरा पैदा हो गया है। वर्ष 2011 में यह इंदिरेसन ही थे जो पिछड़ी जातियों के लिए 2006 में प्रदान किए गए आरक्षण की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए अदालत पहुंचे थे। /वही/

निश्चित ही आईआईटी मद्रास को अपवाद नहीं कहा जा सकता।

आईआईटी तथा आईआईएम में विविधता का अभाव एक जानी हुई बात है। ‘मानव संसाधन मंत्रालय के मुताबिक, आईआईटी के फैकल्टी में अनुसूचित जाति, जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों का अनुपात 9 फीसदी है तो आईआईएम में वह महज 6 फीसदी है।’

केन्द्रीय विश्वविद्यालय, आईआईटी, आईआईएम, क्षेत्राीय विश्वविद्यालय – यह फेहरिस्त और बढ़ती जा सकती है जो दिखाती है कि किस तरह हकदारी से यह इन्कार अनुशासनों, संस्थानों को लांघता हुआ पसरा हुआ है।

सवाल उठता है कि आखिर इस का प्रतिरोध किस तरह किया जाए, जब वर्चस्वशाली तबका इस हकदारी के इन्कार से जुड़ा हो।

इस रास्ते की चुनौतियां निश्चित ही अभूतपूर्व हैं। शायद डॉ अम्बेडकर को इस चुनौती का गहरे में एहसास था, जहां उन्होंने लिखा था:

“अगर समुदाय खुद ही बुनियादी अधिकारों का विरोध करता है, तब कोई कानून, कोई संसद, कोई न्यायपालिका इसकी गारंटी नहीं कर सकती। आखिर अमेरिका में एक निग्रो के लिए बुनियादी अधिकारों का क्या महत्व है, जर्मनी में यहूदियों के लिए उनकी क्या अहमियत है या भारत के अस्प्रश्यों के लिए उसके क्या मायने निकलते हैं। जैसा कि बुर्के ने कहा है कि  बहुलता/समूह को दंडित करने की कोई पद्धति नहीं होती।”

क्या 21 वीं सदी की तीसरी दहाई की दहलीज पर हम इस चुनौती की गंभीरता को समझने के लिए तैयार हैं ?

हमें दरअसल यह समझना ही होगा कि संवैधानिक सिद्धांतों और उसके व्यवहार में तथा उससे बिल्कुल विपरीत आदर्श पर आधारित नैतिक आचरण में कितना बड़ा अंतराल व्याप्त है। हरेक को समझना ही होगा कि शुद्धता और प्रदूषण पर टिके इस विमर्श में जो हमारी जाति प्रथा की बुनियाद है, गैर बराबरी को न केवल वैधता प्राप्त है बल्कि उसे पवित्रता भी हासिल है। असमानता को इस तरह सिद्धांत और व्यवहार में स्वीकारा जाता है, एक कानूनी संविधान को जाति आधारित समाजों की नैतिक बुनियाद पर बेअसर रहता है।

( See here for the original article)

 

 

Trajectory of India’s Democracy and Contemporary Challenges : Prof Suhas Palshikar

[Inaugural Lecture of ‘Democracy Dialogues’ Series ( Webinar)
Organised by New Socialist Initiative, 12 th July 2020]

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( Prof Suhas Palshikar, Chief Editor, Studies in Indian Politics and Co-director, Lokniti at the Centre for the Study of Developing Societies, delivered the inaugural lecture in the ‘Democracy Dialogues’ Series initiated by New Socialist Initiative.

In this lecture he attempted to trace the roots of the current moment of India’s democracy in the overall global journey of democracy, the extra-ordinarily ambitious and yet problematic foundational moment of Indian democracy and the many diversions India’s democracy has taken over time. He argued that unimaginative handling of the extra-ordinary ambition and Statist understanding of the ‘power-democracy’ dialectic formed the basis for easy distortions of democratic practice and that while populism and majoritarianism are the current challenges, they are by no means only special to the present and therefore, even as critique and course-correction of present political crisis is urgently required, a more long-term view of the trajectory of Indian democracy is necessary.

Here follows a detailed summary of his presentation prepared by Dr Sanjay Kumar)

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वरवर राव को रिहा करो!

भीमा कोरेगाँव मामले तथा अन्य सभी मामलों में विचाराधीन लेखकों-मानवाधिकारकर्मियों को रिहा करो !

(न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, जन संस्कृति मंच, दलित लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन नाट्य मंच, इप्टा, प्रतिरोध का सिनेमा और संगवारी की ओर से जारी साझा  बयान )

State trying to kill Varavara Rao in jail, he needs immediate ...

( Photo Courtesy : New Indian Express)

‘…कब डरता है दुश्मन कवि से ?

जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हैं

वह कै़द कर लेता है कवि को ।

फाँसी पर चढ़ाता है

फाँसी के तख़्ते के एक ओर होती है सरकार

दूसरी ओर अमरता

कवि जीता है अपने गीतों में

और गीत जीता है जनता के हृदयों में।’

–वरवर राव, बेंजामिन मोलेस की याद में, 1985

देश और दुनिया भर में उठी आवाज़ों के बाद अन्ततः 80 वर्षीय कवि वरवर राव को मुंबई के जे जे अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया है। राज्य की असंवेदनशीलता और निर्दयता का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि जिस काम को क़ैदियों के अधिकारों का सम्मान करते हुए राज्य द्वारा खुद ही अंजाम दिया जाना था, उसके लिए लोगों, समूहों को आवाज़ उठानी पड़ी। Continue reading वरवर राव को रिहा करो!

Shadow of Laxmanpur Bathe on Bihar Election

An unpredictable element has found a new lease of life thanks to the coming Assembly election.

Laxmanpur Bathe on Bihar Election

The outlawed Ranvir Sena—the private army of upper caste landlords of Bihar—is in the news again. It recently threatened the Bihar chief of the Bhim Army, Gaurav Siraj, and one of its activists, Ved Prakash, through a Facebook post. The so-called army has “ordered” its “sainiks” to “arrest” him dead or alive. The sena is apparently peeved over how the young dynamic leader of the Ambedkarite organisation has described Brahmeshwar Singh, their slain “Mukhiya” who was killed in 2012.

Will there be any action against those who have threatened the young leader? If history is any guide then there is little possibility of this.

Merely two years ago, Nawal Kishor Kumar, Editor Hindi, Forward Press was targeted by this “sena”. The aggrieved journalist had lodged a police complaint but there has been no progress in the investigation.

It is not that there is no law to punish such miscreants. Social media posts of the threatening kind relate to various offences under the Indian Penal Code, from criminal intimidation punishable under section 503 to section 505 related to creating mischief in public, to section 506 which awards punishment for criminal intimidation and section 153A which relates to penalties for promoting enmity between different groups and so on. In fact, based on its activities, the Ranvir Sena is also liable to be prosecuted under section 3 of the Bihar Control of Crimes Act, section 3 of the Arms Act and section 3 of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989.”

( Read the full text here)

Can Rest of India ‘Do’ a Mallapuram ?

Ruins of an ancient Jain temple in Arimbra

Ruins of old Jain Style Temple at Arimbra 

Mallapuram, Kerala’s lone Muslim-majority district, made history recently.

The 5,000 mosques in the district would remain closed indefinitely.

Logic behind this decision is simple.

As the state is witnessing spike in Coronavirus infection recently, it was found more prudent to keep the doors closed for devotees. Panakkad Sayyed Sadiq Ali Shihab Thangal, a leading Islamic Scholar and Malappuram district president of the Indian Union Muslim League, shared this news with a section of the media.

Thus while the rest of the country is witnessing opening of places of worship under Unlock 1, Mallapuram has decided otherwise. Continue reading Can Rest of India ‘Do’ a Mallapuram ?

Public Display of Faith Can Wait, Humanity Cannot

It is inevitable that the virus will spread anywhere people gather in numbers.

Faith in India

Representational Image

India went for the world’s toughest lockdown in March, when just about 500 Covid-19 cases had been reported. And it has started withdrawing the lockdown when India has become the seventh-worst pandemic-affected nation, with over 1.91 lakh infections and close to 5,500 deaths. India is registering giant spikes in active cases of Covid-19, but the home ministry has come out with a phased plan to unlock India. The current phase of re-opening will focus on the economy. It has been decided that malls, hotels, restaurants and places of worship will reopen from 8 June onwards.

Concerns over the economic downturn are understandable. The latest GDP data shows the slowest pace of growth in 11 years in the last quarter of 2019-20, and the economy has been hit hard by the Covid-inspired sudden and complete lockdown. But one fails to understand the decision to open religious places at such an early date.

It remains unanswered whether religious places are being thrown open to pre-empt Mamata Banerjee, the Chief Minister of West Bengal, who has announced that her state would open all places of worship from 1 June. It is also not known whether this is being done, as BS Yediyurappa, the Chief Minister of Karnataka, wrote in his letter to the Prime Minister, because devotees are insisting that religious sites be opened.

( Read the full article here )

SAB YAAD RAKHA JAEGA: Nationwide Protest against repression on anti-CAA activists and democratic voices of dissent

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Guest Post by PEOPLE UNITED AGAINST REPRESSION ON ANTI CAA PROTESTERS

Over the past two months the Delhi Police has arrested Jamia students Safoora Zargar, Meeran Haider, Asif Iqbal Tanha, JNU students Natasha Narwal and Devangana Kalita along with activists Ishrat Jahan, Khalid Saifi, Gulfisha Fatima, Sharjeel Imam and hundreds of other Muslim youth. Some among them have been booked under the amended UAPA as a means of punishing the widespread protests against the CAA-NRC that emerged across the country in December last year. Most recently AMU students Farhan Zuberi and Ravish Ali Khan have been arrested by the UP police for participating in the anti-CAA protests. It is clear that the spate of arrests are far from over and new names of democratic activists are likely to be added to this already long list. Meanwhile those openly advocating violence against peaceful protesters such as Kapil Mishra, Parvesh Verma and Anurag Thakur have gone scot-free. Continue reading SAB YAAD RAKHA JAEGA: Nationwide Protest against repression on anti-CAA activists and democratic voices of dissent

प्रार्थना स्थलों पर लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध

news on judiciary

कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय.
ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय

क्या अपने ‘खुदा’ को आवाज़ देने के लिए बांग देने की जरूरत पड़ती है ?

आज से छह सदी पहले ही कबीर ने यह सवाल पूछ कर अपने वक्त़ में धर्म के नाम पर जारी पाखंड को बेपर्दा किया था. पिछले दिनों यह मसला नए सिरे से उछला जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस बारे में एक अहम फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि अज़ान अर्थात प्रार्थना के लिए आवाज़ देने की बात इस्लाम का हिस्सा है लेकिन वही बात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के बारे में नहीं कही जा सकती, लिहाजा रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल के इजाजत नहीं दी जा सकती.

अदालत के मुताबिक मुअज्जिन मस्जिद की मीनार से अपनी मानवीय आवाज़ में अज़ान दे सकता है और उसे महामारी रोकने के लिए राज्य द्वारा लगायी गयी पाबंदियों के तहत रोका नहीं जा सकता, अलबत्ता उसके लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल वर्जित रहेगा.

ध्यान रहे कि अदालत यूपी पुलिस द्वारा जगह-जगह मनमाने ढंग से अज़ान पर लगायी गयी पाबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर विचार कर रही थी. हाथरस, अलीगढ़ आदि स्थानों पर महामारी के कानूनों का हवाला देते हुए पुलिस वालों ने अज़ान देने पर ही पाबंदी लगायी थी, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था.

उम्मीद है कि अदालत के फैसले के मद्देनज़र यूपी पुलिस मनमाने तरीके से अज़ान पर नहीं रोक लगाएगी, निश्चित ही यह सुनिश्चित करेगी कि इसके लिए किसी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है.

गौरतलब है कि अदालत ने संविधान के तहत प्रदत्त बुनियादी अधिकारों में शामिल आर्टिकल 19/1/ए का हवाला देते हुए जो इस बात को सुनिश्चित करता है कि‘किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह अन्य लोगों को बन्दी श्रोता (captive listeners) बना दें’ यह निर्देश दिया.

निश्चित ही मस्जिदों में जहां बिना अनुमति के लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल पर पाबंदी रहेगी, वही बात मंदिरों, गुरुद्धारों या अन्य धार्मिक स्थलों पर भी लागू रहेगी ताकि आरती के बहाने या गुरुबाणी सुनाने के बहाने इसी तरह लोगों को ‘बन्दी श्रोता’ मजबूरन न बनाया जाए. ( Read the full article here :https://hindi.theprint.in/opinion/allahabad-high-court-ban-loudspeakers-at-prayer-places-exposes-hypocrisy-in-the-name-of-faith/140765/)

The Ferocious Face of Class War – Rekindling the Revolutionary Imagination

 

Pyramid of Capitalist System, 1911 image from Industrial Worker (paperof Industrial Workers of the World)

Face of Class War in Contemporary India

It is time again to state one thing absolutely clearly. ‘Class struggle’ or ‘class warfare’ were not invented by Karl Marx, for he and his predecessors merely identified and named the beast. It is something that the rich and the powerful always did and continue to do as we speak. Look at the way the Indian lumpenbourgeoisie has bared its fangs, even as the country is reeling under the deadly impact of COVID 19; look at the way it is sharpening its knives, waiting for its opportunity to make a kill – and you will know what class war is all about. Look at them and it will be crystal clear that it is not the hapless migrant worker and the poor – or the peasant who silently commits suicide – who  indulge in this thing called class war, but they who prey on the weak and the dispossessed. They are once again preparing to make good their losses by yoking in workers as slaves, not allowing them to travel safely back to their homes, keeping them hostage to lumpencapital and ready with  their plans to make them work for 12 hours a day. There isn’t even a pretense – barring an Azim Premji here or an Asian Paints there – of recognizing workers as partners or stakeholders in business.

In a sense, ‘lumpencapitalism’ and the ‘lumpenbourgeoisie’ are the general form of Indian capital, pioneered by Dhirubhai Ambani and his Reliance Industries (interested readers can  read The Polyester Prince by Hamish McDonald) and its arrival with Gautam Adani whose recent rise to front ranks is generally understood to be linked to his closeness to the present regime. And in between, we have conglomerates like Sahara India, whose ‘primitive accumulation’ is alleged to have come almost entirely through chit fund theft.

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भारत की कोरोना नीति के चंद नुक्सानदेह पहलू: राजेन्द्र चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

कोरोना से हमारा वास्ता अभी लम्बे समय तक चलने वाला है. काफिला पर छपे पिछले आलेखों में (यहाँ एवं यहाँ) में हम ने इस के सही और गलत, दोनों तरह के सबकों की चर्चा की थी पर भारत की करोना नीति की समीक्षा नहीं की थी.  आपदा और युद्ध काल में एक कहा-अनकहा दबाव रहता है कि सरकार को पूरा समर्थन दिया जाए और उस की आलोचना न की जाय पर कोरोना के मुकाबले के लिए भारत में अपनाई गई रणनीति की समीक्षा ज़रूरी है; यह समीक्षा लम्बे समय तक चलने वाली इस आपदा में रणनीति में सुधार का मौका दे सकती है. कोरोना से कैसे निपटना चाहिए इस में निश्चित तौर पर सब से बड़ी भूमिका तो कोरोना वायरस की प्रकृति की है- ये गर्मी में मरेगा या सर्दी में या नहीं ही मरेगा; बूढों को ज्यादा मारेगा या बच्चों को, इन तथ्यों का इस से निपटने की रणनीति तय करने में सब से बड़ी भूमिका है. इस लिए भारत में कोरोना की लड़ाई के मूल्यांकन से पहले हमें वायरस की प्रकृति के बारे में उपलब्ध जानकारी को रेखांकित करना होगा.

कोरोना वायरस के नए स्वरूप की बुनियादी प्रकृति

कोरोना किस्म के वायरस वैज्ञानिकों के लिए नए नहीं हैं. ये पहले भी उभरते रहे हैं और वैज्ञानिक इन का लगातार अध्ययन करते रहे हैं. परन्तु हाल में कोरोना किस्म के वायरस का एक नया स्वरूप सामने आया है, जिस से उत्पन्न होने वाली नयी बीमारी को कोविड नाम दिया गया है.  इस लिए कोरोना के इस नए वायरस के बारे में अभी सब कुछ पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. अभी इस की पड़ताल चल रही है.  फिर भी दुनिया भर के वैज्ञानिकों के मिले जुले काम से और कोरोना के पहले से उपलब्ध वायरसों के जीवन चक्र को ध्यान में रखते हुए कुछ बाते काफी हद तक स्पष्ट हैं.  इन के बारे में आम तौर पर वैज्ञानिकों में सर्वानुमति है. हालाँकि विश्व स्वास्थ्य संगठन को सर्वज्ञानी तो नहीं माना जा सकता परन्तु काफी हद तक इस द्वारा प्रदत जानकारी पर भरोसा किया जा सकता है.

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Operation Eklavya in Action at Premier Institutes

India is neglecting caste-based discrimination in higher educational institutions at its own peril.

AIIMS Caste Discrimination

It was exactly 13 years back that the Thorat Committee, constituted in September 2006 to enquire into allegations of differential treatment of Scheduled Caste and Scheduled Tribe students at the premier medical institute, AIIMS—was released.

The first of its kind in independent India, this three-member committee led by then chairman of the University Grants Commission, Sukhdeo Thorat, had looked deeply into the many shades of discrimination faced by students of non-elite castes in the institute.

What it discovered after talking to students and faculty was, to say the least, shocking. Some 72% of SC/ST students mentioned facing some discrimination during the teaching sessions. Second, caste-based discrimination was prevalent in the hostels, for instance around 88% students reported experiencing of social isolation in various forms. The committee’s report also outlined the discrimination faced by SC/ST professors.

This context frames the alleged suicide attempt of a female doctor a fortnight ago in the same institute. The doctor, who worked at the Dental Research Centre of AIIMS, was allegedly facing sexual harassment and caste discrimination. This is another reminder that there has not been a qualitative change in the institute in the long years since the Thorat Committee report.

( )Read the full article here)

Why Activists Want Prisons Decongested

The Supreme Court also wants to reduce the Covid-19 risks posed by overcrowded jails, but there is little progress so far.

Navlakha and Teltumbde

Late in March, Sirous Asgari, a materials science and engineering professor from Iran, who is at present detained by the United States Immigration and Customs Enforcement (ICE), had warned about the “inhumane” conditions at the ICE facility that could turn it into a hot spot of Covid-19 fatalities.

April has made his worst nightmares come true. Asgari, who has a history of respiratory problems, has been infected by the Novel Coronavirus, which causes the Covid-19 disease. The news created international outrage last month. Not only the Iranian foreign ministry, many United States lawmakers and human rights groups also demanded his release, but it was not to be.

At the facility in which Asgari is still lodged (though he has been exonerated of all the charges he faced in the United States), people are usually detained for no more than 72 hours, but the Coronavirus outbreak has delayed deportations. People like him are simply caught up in the system. Asgari can leave the United States and resume work in Iran—where the viral epidemic has already claimed more than 60,000 lives—because he simply isn’t being taken before a judge.

Asgari’s plight reminds of another incarceration, this one in an Indian jail; that of Anand Teltumbde, who has been arrested in the Bhima-Koregaon case. On 26 April, noted activist-filmmaker Anand Patwardhan had, in a Facebook post, expressed deep concern about the health of 70-year-old Teltumbde, who also suffers from respiratory problems.

( Read the full text here : https://www.newsclick.in/Prisons-during-lockdown-needs-to-be-decongested)

E-commerce platforms: Corona Warriors or Disaster Capitalists?

This is a Guest Post by ANITA GURUMURTHY and NANDINI CHAMY

 

In 2007, in her book, ‘Shock Doctrine’, Naomi Klein argued that history is a chronicle of “shocks” – the shocks of wars, natural disasters, and economic crises, but more importantly, of their aftermath characterised by disaster capitalism, calculated, free-market “solutions” to crises that exploit and exacerbate existing inequalities. This is why Big-Tech-to-the-rescue in times of the virus does not strike the right chord. It started with the lockdown order issued by the central government on March 24 with the exemption for essential services and supplies getting extended to delivery of foods, pharma products and medical equipment through e-commerce channels. The upper classes had to be assured that their means of shopping would not be affected. Notably, the order issued no such explicit exemption on the movement of foodgrains through Food Corporation of India channels, integral to the Public Distribution System. The lockdown order was a candid admission that e-commerce companies have now become infrastructural utilities indispensable to India’s aspirational middle class.

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An Open Letter to the Kerala Governor Sri Arif Mohammad Khan About Our Fight Against the Virus, But Also About Our Resistance to CAA-NRC

Dear Sir

First of all, thank you for acknowledging, even praising,the efforts of the government of Kerala and the people to protect ourselves and humanity against the threat of the corona virus. It is true that Kerala’s efforts and achievements are being lauded the world over, but those voices are never going to make any impact on the supporters of the Sangh parivar in Kerala. But your views cannot be dismissed so easily as ‘Western’ or ‘leftist’ (though they may still murmur about your Muslim name). What has really riled me in the recent past is their systematic effort at downplaying Kerala’s achievements, heaping abuse on our effort to help migrant workers, and raising baseless allegations against those who are working to mitigate the crisis. So as a historian of modern Kerala, I am writing this to offer some insights into why we have been able to do this, in the hope that you may be able to see what they will never tell you — simply because they are so sadly blinded by hate. Continue reading An Open Letter to the Kerala Governor Sri Arif Mohammad Khan About Our Fight Against the Virus, But Also About Our Resistance to CAA-NRC

Appeal for Contributions – A Citizens’ Initiative to Provide Humanitarian Relief to the City’s Working Classes

In the wake of the health and subsistence crisis triggered by the rapid spread of Covid-19 in India, the Citizen Collective for Humanitarian Relief, in association with the Centre for Education & Communication, is organizing emergency distribution of food among the working-class families of Delhi NCR. As part of this initiative we have set up a Mazdoor Dhaba (workers’ kitchen) in Delhi University.

Our aim is to provide two cooked meals a day to those families who have lost all source of livelihood following the complete nation-wide lockdown ordered on 25th March. The cost for one family’s meal (5 persons) is about Rs. 250, and as of today we are able to reach 500 people every day. We need your help and financial support to sustain and expand this effort.

On behalf of the Citizen Collective for Humanitarian Relief

Apoorvanand, Aruna Roy, Avinash Kumar, Lokesh, Najma Rehmani, Naveen Chander,  Rahul Roy, Richa Jairaj, Satish Deshpande, Usman Jawed

If you wish to assist us, please transfer money to the following accounts. If you are an Indian citizen (even if you live abroad), then please make sure to transfer money only to the Corporation bank account. If you are a foreign national, please transfer money to the SBI account.

Bank details for INDIAN CITIZENS:

Centre for Education & Communication

Corporation Bank

SB Account No: 520101261257941

IFSC Code: CORP0000286

Branch: Greater Kailash, New Delhi

 

Bank details for FOREIGN NATIONALS:

Centre for Education & Communication  

State Bank of India

Current Account No: 10786724071

Swift Code: SBININBB710

Branch: Green Park Extension, New Delhi

If you are sending money to these accounts, please inform us of the same by sending an email to the following ID along with your name and address. If you want to send more than Rs 5,000/-, please send us your PAN number. We request the foreign nationals to send a copy of their passport.

Donor Information required for Foreign Citizens

Name:

Address:

Amount donated in foreign currency:

*Please attach copy of valid passport.

Please inform us when you make contribution to following email ids:

accounts@cec-india.org/ finance@cec-india.org

workersdhaba@gmail.com

For queries regarding the relief work, and how you can support it, please contact

workersdhaba@gmail.com

Avinash – +918010833325

Naveen – +919013074978

Praveen-  +919911078111

Richa-     + 919820027364

Usman –  +919953947739

 

For queries the money transfer, please contact the Center for Education and Communication (CEC) by email or on phone

accounts@cec-india.org/ finance@cec-india.org

Ruchika – +919899230545

Statement on the imminent arrest of Gautam Navlakha and Anand Teltumbde : Alan-Thaha Human Rights Committee, Kerala

The Alan-Thaha Human Rights Committee, Kerala, expresses its deep concern and anguish over the imminent arrest of prominent intellectuals Gautam Navlakha and Anand Teltumbde in the Bhima-Koregaon case.

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Denying Interim Bail To Anand Teltumbde and Gautam Navlakha Is Alarming : MRSD

Guest Post by MRSD ( Mumbai Rises to Save Democracy)

Statement by MRSD on Supreme Court’s rejection of pre-arrest bail plea of Anand Teltumbde and Gautam Navlakha in the Bhima Koregaon violence case

Mumbai Rises to Save Democracy (MRSD) is deeply disappointed with the Supreme Court’s rejection of the plea by Anand Teltumbde and Gautam Navlakha seeking anticipatory bail in the cases registered against them in relation to the violence at Bhima Koregaon on 1st January 2018. Their arrest is imminent in next three weeks. Nine other activists and intellectuals who have been accused in this case and charged with sections of the draconian Unlawful Activities Prevention Act (UAPA) have been imprisoned since 2018.

The top court’s order to deny interim bail is alarming given that the case against the activists is based on very thin evidence. Moreover, the cyber forensic analysis by credible investigative journalists and technical experts discredit the evidence used by Pune police to incriminate the activists. The analysis reveals that the letters which were allegedly recovered from the hard disk of Rona Wilson, one of the nine activists accused in the case, and used by the police to link the accused to a banned political party are most likely to have been planted in the disk through use of malware which allowed remote access to Wilson’s computer (https://caravanmagazine.in/politics/bhima-koregaon-case-rona-wilson-hard-disk-malware-remote-access). This clearly indicates manipulation of evidence and the fabricated nature of the case.

The government is sparing few chances for truth to emerge in this case. In January 2020, more than a year after the chargesheets were filed by the Pune police, the Union Home ministry got the case suddenly transferred to the National Investigation Agency (NIA) and thus brought the case under its control at a time when the Home department in the newly formed Maha Vikas Aghadi government in Maharashtra had announced a review of the case, setting up of a Special Investigating Team (SIT) and dropping of the false cases against the activists.

While full-blown attempts are being made by the government to incriminate the eleven intellectuals in a fabricated case, the investigation into the role of Hindutva brigade led by Milind Ekbote and Manohar Bhide in carrying out planned organised attacks on Dalits at Bhima Koregaon has come to a standstill. The state government’s failure to set up a SIT shows that the real perpetrators of violence are being shielded from prosecution.

These developments in the case and now the rejection of pre-arrest bail to two of the stalwarts of the democratic rights movement in the country on the grounds of what is not just flimsy but manipulated evidence shows the desperation of the government to repress democratic voices and spread a sense of fear amongst those who oppose the anti-people policies and actions of the Hindutva Fascist regime. MRSD extends its solidarity to the eleven activists who have been relentless defenders of human rights and people’s movements in this country and who now stand wrongly accused in this conspiracy case. We also reiterate our resolve to continue to struggle for their release and for the pursuit of truth about the violence unleashed on the peaceful Dalit-Bahujan masses at Bhima Koregaon.

  • MRSD

Participating Organisations: People’s Union of Civil Liberties (PUCL), Committee for Protection of Democratic Rights (CPDR), National Trade Union Initiative (NTUI), Trade Union Centre of India (TUCI), Student Islamic Organisation (SIO), Ambedkar Periyar Phule Study Circle (APPSC) – IIT Mumbai, Co-ordination Of Science And Technology Institute’s Student Association (COSTISA), LEAFLET, Police Reforms Watch, NCHRO, Bebaak Collective, Forum Against Oppression of Women (FAOW), LABIA- A Queer Feminist LBT Collective, Jagrut Kamgar Manch (JKM), Majlis, Indian Muslims for Secular Democracy (IMSD), Women against Sexual Violence and State repression (WSS), Bharat Bachao Andolan (BBA), Indian Social Action Forum (INSAF), People’s Commission for Shrinking Democratic Spaces (PCSDS), Human Rights Law Network (HRLN), Cause Lawyers Alliance, National Alliance of People’s Movements (NAPM), Nivara Hakk Suraksha Samiti, Kashtakari Sanghatna – Palghar, Sarvahara Jan Andolan – Raighad, Jagrut Kashtkari Sanghatana, students from various colleges in Mumbai including Homi Bhabha Research Centre, St.Xaviers and Tata Institute of Social Sciences.

Jantar Mantar Declaration Against CAA, NRC and NPR

Guest Post : Jantar Mantar Declaration of 1 March 2020 Against CAA, NRC and NPR

Adopted  at the Convention of writers, artists, cultural activists, scientists and various associations such as Indian Cultural Forum, Janwadi Lekhak Sangh, Progressive Writers Association , Jan Sanskriti Manch, Dalit Lekhak Sangh, New Socialist Initiative, Jana Natya Manch, Delhi Science Forum, Janasamskriti (Malayalam), Vikalp, Cinema of Resistance, All India Peoples Science Network

We, at this  Convention of writers, artists, cultural activists, scientists and various associations express our deep concern over recent violence and communal genocide in Delhi.

We understand that this tragic situation is a direct outcome of the communal design and divisive politicsof CAA-NPR-NRC. The silver lining is that the common people of Delhi remained united in their fight against this outrage.  This convention reiterates that only by this unity and  mutual trust and cooperation  that the CAA-NPR-NRC design can be defeated.

We, at this  Convention of writers, artists, scientists, cultural activists and various associations declare our solidarity with the on-going non-violent movement against the draconian CAA  (Citizenship Amendment Act. 2019 ), proposed new format of NPR ( National Population Register) and the proposed NRC (National Register of Citizens) . Continue reading Jantar Mantar Declaration Against CAA, NRC and NPR

Why Modi and Sangh Parivar Want to ‘Disremember’ Golwalkar

PM Modi didn’t mention former RSS chief Golwalkar on his recent 114th birth anniversary. The idea is to implement his ‘essence’ in private while not mentioning him in public.

Why Modi and Sangh Parivar Want

The 114th birth anniversary of Madhav Sadashiv Golwalkar went unnoticed. Barring a stray article by a second-rung leader of the saffron party in a national daily, none from the top hierarchy deemed it even necessary to remember the second chief of the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) who followed the organisation’s founder, KB Hedgewar.

Interestingly, while Twitter-savvy Prime Minister Narendra Modi found time to tweet about his litti chokha conquest at Hunar Haat in Delhi, there was not a single line about Golwalkar on his timeline that day. It appeared a bit strange because in his book titled ‘Jyotipunj’ on the “greatest social workers” who “burnt their lives to glow the Motherland”, Modi had devoted forty pages to Golwalkar. “The life of Golwalkar Guruji is a fine example of dedication. Guruji, possessed all those qualities which are expected of an individual who lives for his goal—patience, determination, perseverance,” he wrote.

Was Modi’s or his senior colleagues’ silence inadvertent, or deliberate?

( Read the full article here : https://www.newsclick.in/Modi-Sangh-Parivar-Want-Disremember-Golwalkar)

 

Gandhi and the Hindutva Right

From Nehru to Patel and Ambedkar, the saffron party has appropriated freedom-fighters or tarnished legacies. Gandhi, however, poses a different problem.

Why BJP’s Subjugation of Gandhi

Death ends all enmity’ (Marnanti Vairani) goes a maxim in Hinduism.

The story also goes that when Ravana was on death bed, Ram had even asked Laxman to go to him and learn something which no other person except a great scholar like him could teach him, declaring that though he has been forced to punish him for his terrible crime, ‘you are no more my enemy’.

It is a different matter that Hindutva supremacists — who are keen ‘to transform Hinduism from a variety of religious practices into a consolidated ethnic identity’ — are believers in the exact opposite.

For them, once the enemy is dead, the enmity flares up without any limits. They have no qualms that their adversary is no more to defend himself/ herself.

It has been more than five and half years that they are in power at the Centre and we have been witness to complete vilification, demonisation and obfuscation of many of their adversaries, all great leaders of the anti-colonial struggle. Of course, few were found to be ‘lucky’ enough that were promptly co-opted/appropriated by them, of course, in a sanitised form.

( Read the full article here : https://www.newsclick.in/BJP-Subjugation-Gandhi-Legacy-Roadblock-Shaheen-Bagh

CAA-NPR-NRC’s Impact on Urban Poor : National Coalition for Inclusive and Sustainable Urbanisation (NCU)

 

Guest Post by National Coalition for Inclusive and Sustainable Urbanisation (NCU)

The National Coalition for Inclusive and Sustainable Urbanisation (NCU) unequivocally condemns the unconstitutional and anti-constitutional CAA-NPR-NRC being unilaterally imposed by the National Democratic Alliance (NDA) government. The NCU is a network of activists, researchers, urban practitioners, lawyers, informal sector workers, collectives and individuals who, for the past two years have been involved with issues of urban class and caste inequalities and is continually monitoring this acutely dangerous social condition in our cities. Therefore, are working for an alternative paradigm of urbanization. These inequalities are brought to light when basic rights such as the right to housing, participation in governance mechanisms, right to livelihood and most importantly, equal right to the city, are denied to the urban poor.

India has been going through tumultuous times. The massive inequities in Indian cities are best highlighted by a recent Oxfam report. Shockingly, just 63 billionaires have more money than the entire budget of the government of India. This disparity is mirrored in asset holdings in cities. The difference between the top 10 per cent and the bottom ten per cent is 50,000 times in Indian cities! This is further accentuated by the huge informality that exists in urban India-93 per cent.This exposes the extreme vulnerabilities faced by urban population. Continue reading CAA-NPR-NRC’s Impact on Urban Poor : National Coalition for Inclusive and Sustainable Urbanisation (NCU)