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मौजूदा किसान आन्दोलन पर वक्तव्य : रवि सिन्हा

Guest Post by Ravi Sinha

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किसानों के इस आन्दोलन को उसके तात्कालिक उद्देश्यों और सम्भावनाओं मात्र के सन्दर्भ में देखें तो भी यह ऐतिहासिक है. अपनी अंतिम और सम्भावित सफलता से स्वतन्त्र इसकी उपलब्धियाँ अभी ही ऐतिहासिक महत्त्व की साबित हो चुकी हैं. लेकिन इस आन्दोलन के अर्थ और इसकी सम्भावनायें और भी बड़ी हैं. भारत की दुर्दशा के इस घोर अँधेरे में, जहाँ अधिनायकवादी फ़ासिस्ट शक्तियों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध की सम्भावनााओं को एक के बाद एक कुचल दिया जाता रहा है, यह आन्दोलन एक मशाल बनकर सामने आया है. किसानों से शुरू होकर यह आन्दोलन सिर्फ़ किसानों का नहीं रह गया  है. पंजाब और हरियाणा के किसानों के द्वारा दिल्ली को घेरने से शुरू हुई यह मुहिम अब दिल्ली की सत्ता को घेरने वाली चौतरफ़ा मुहिम का रूप लेती जा रही है. हम किसानों के इस आन्दोलन को सर्वप्रथम इसलिए समर्थन देते हैं और उसमें इस लिये शामिल हैं कि उनकी माँगें जायज़ हैं और इस सरकार द्वारा ज़बरदस्ती लाये गये तीनों क़ानूनों को लेकर उनकी आशंकायें वास्तविक हैं. और हम इस आन्दोलन को इसलिये सलाम करते हैं और इससे प्रेरणा लेते हैं कि यह अँधेरे में रौशनी की मशाल बनकर सामने आया है.

 अगर हम आंदोलन की तात्कालिक माँगों और उद्देश्यों की विस्तृत चर्चा यहाँ नहीं करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि इनके जायज़ और ऐतिहासिक महत्त्व के होने में हमें कोई संदेह है. अब यह जगज़ाहिर है कि ये तीनों क़ानून उस शैतानी योजना का हिस्सा हैं जिसके तहत कृषि क्षेत्र को कारपोरेट पूँजी के प्रत्यक्ष आधिपत्य में ले जाने की तैयारी है. यह न केवल किसानों की रही-सही आर्थिक सुरक्षा को समाप्त करेगा, सरकार को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त करेगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य तथा राज्य-संचालित मंडियों की व्यवस्था को तोड़ देगा, बल्कि यह पूरे देश की आम जनता की खाद्य-सुरक्षा – जितनी भी है और जैसी भी है – को ख़तरे में डाल देगा. साथ ही ये क़ानून भारत के संघीय ढाँचे के विरुद्ध भी हैं, और केन्द्र द्वारा राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण हैं. यह सब आप सभी को मालूम है और इन कारणों से ही इस आंदोलन का सूत्रपात हुआ है.

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Pandemic Lowers India’s Level of Democracy

THIS GOVERNMENT HAS STIGMATISED THE VERY IDEA OF PROTEST, YET IT IS STRUGGLING TO MANAGE THE MASS UPSURGE AGAINST THE FARM LAWS.

Parliament Closed

For nearly a month, lakhs of farmers have staged sit-ins on various points along the border shared by the national capital and neighbouring states. Their peaceful movement, which is drawing support from farmers across the country, is meant to persuade the government to repeal the farm-related laws that it pushed through Parliament in September.

The farmers have refused to accept the government’s claim that the new laws would benefit them. They insist that these laws would dismantle state procurement and open up agriculture to contract farming, which would only help big corporations. They have also been insisting that corporations will amass essential food commodities and manipulate stocks and prices, for the government has also revoked stocking limits.

The three laws were initially introduced as ordinances this summer while the Covid-19 pandemic was raging and the country was still segregated into red, green and amber zones. Thereafter, they were passed in Parliament without discussion or debate. The manner of their introduction—rather, imposition—threw all democratic norms to the winds and so farmers see no reason to trust the intention behind them either.

Farmers do not look forward to a time when large retail chains would dictate terms and impose conditions on them. They rightly say that these laws would usher in an attack on the right to food security of working people and escalate food prices, which would hurt all consumers.

The immediate response of the government to the concerns of farmers was to repress and distort their movement. Not a day has passed without fresh abuse hurled at them. Starting from “Khalistani” to “Urban Naxal” to “anti-national” to “fake farmers”, every trick in the book has been tried to stigmatise them. Nor have the authorities made serious efforts to stop those who are maligning this historic peaceful protest.

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Farm Laws, Farmer Protests and Agrarian Crisis : Dr Jaya mehta

 

Dr Jaya Mehta, economist and activist, has been associated with the Joshi-Adhikari Institute of Social Studies, author of many books who coordinated an all India study of the Agrarian Crisis delivered a special lecture on ‘Farm Laws, Farmer Protests and Agrarian Crisis’ on 27 th December 2020.
Abstract of talk :
The reforms in agricultural marketing contained in the three farm laws were first announced by the finance minister on 15th May 2020 as Prime Minister’s relief package for the people. When Covid and lock-down had created crisis in the entire economy, migrant workers were walking hundreds of kilometers to reach home and the majority of households desperately needed state support and protection, the Modi government chose to withdraw state intervention and deregulate market forces in agriculture to leave people in complete disarray. After the controversial monsoon session of parliament, the reforms to deregulate market became laws.

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Fascism, Democracy and the Left : Com Dipankar Bhattacharya

 

The 6th lecture in the Democracy Dialogues series organized by the New Socialist Initiative was delivered by Com Dipankar Bhattacharya, General Secretary of CPI (ML) Liberation on 20 th December 6 pm (IST) where he spoke on ‘Fascism, Democracy and the Left’

Abstract  : ‘Fascism, Democracy, and the Left’

With the rise of the Modi government, BJP has managed to establish a vicious grip on Indian polity. Parliamentary democracy and the constitutional vision of a secular democratic Indian republic have come under fierce attack. Instead of remaining busy with studying historical parallels we should treat the present phase as the rise of the Indian model of fascism and resist it with all our might. While we can locate the present Indian developments in the context of global economic and political trends in the post-Soviet world, there are strong roots in Indian history and society. One should revisit Ambedkar and the warnings he had issued right at the time of adoption of India’s Constitution.
The Left vision and role in politics has been historically identified with ideas and experiments of building socialism, but the challenge for socialism to offer a superior model of democracy has remained fatally neglected. In the face of a fascist offensive, the Left in India must emerge and assert as the most consistent and reliable champion of democracy.

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किसान आंदोलन की माँगों और 8 तारीख के भारत बंद के समर्थन में जारी बयान

( न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिवदलित लेखक संघअखिल भारतीय दलित लेखिका मंचप्रगतिशील लेखक संघजन संस्कृति मंचइप्टासंगवारीप्रतिरोध का सिनेमा और जनवादी लेखक संघ द्वारा किसान आंदोलन की माँगों और  तारीख के भारत बंद के समर्थन में जारी बयान  )

Image : Courtesy Reuters

तीन जनद्रोही कृषि-क़ानूनों के खिलाफ़ किसानों के ऐतिहासिक आन्दोलन का साथ दें!

केन्द्र सरकार के कार्पोरेटपरस्त एजेण्डा के विरोध में अपनी आवाज़ बुलन्द करें!

दिसम्बर के भारत बंद को सफल बनाएं!

 भारत का किसान – जिसके संघर्षों और कुर्बानियों का एक लम्बा इतिहास रहा है – आज एक ऐतिहासिक मुक़ाम पर खड़ा है।

हज़ारों-लाखों की तादाद में उसके नुमाइन्दे राजधानी दिल्ली की विभिन्न सरहदों पर धरना दिए हुए हैं और उन तीन जनद्रोही क़ानूनों की वापसी की मांग कर रहे हैं जिनके ज़रिए इस हुकूमत ने एक तरह से उनकी तबाही और बरबादी के वॉरंट पर दस्तख़त किए हैं। अपनी आवाज़ को और बुलंद करने के लिए किसान संगठनों की तरफ़ से 8 दिसम्बर को भारत बंद का ऐलान किया गया है।

सरकार भले ही यह दावा करे कि ये तीनों क़ानून – जिन्हें महामारी के दिनों में पहले अध्यादेश के ज़रिए लागू किया गया था और फिर तमाम जनतांत्रिक परंपराओं को ताक़ पर रखते हुए संसद में पास किया गया – किसानों की भलाई के लिए हैं, लेकिन यह बात बहुत साफ़ हो चुकी है कि इनके ज़रिए राज्य द्वारा अनाज की खरीद की प्रणाली को समाप्त करने और इस तरह बड़े कॉर्पोरेट घरानों के लिए ठेका आधारित खेती करने तथा आवश्यक खाद्य सामग्री की बड़ी मात्रा में जमाखोरी करने की राह हमवार की जा रही है।

लोगों के सामने यह भी साफ़ है कि यह महज़ किसानों का सवाल नहीं बल्कि मेहनतकश अवाम के लिए अनाज की असुरक्षा का सवाल भी है। अकारण नहीं कि किसानों के इस अभूतपूर्व आन्दोलन के साथ खेतमज़दूरों, औद्योगिक मज़दूरों के संगठनों तथा नागरिक समाज के तमाम लोगों, संगठनों ने अपनी एकजुटता प्रदर्शित की है।

 जनतंत्र और संवाद हमेशा साथ चलते हैं। लेकिन आज यह दिख रहा है कि मौजूदा निज़ाम की ओर से जिस ‘न्यू इंडिया’ के आगमन की बात की जा रही है, उसके तहत जनतंत्र के नाम पर अधिनायकवाद की स्थापना का खुला खेल चल रहा है।

आज की तारीख में सरकार किसान संगठनों के साथ वार्ता करने के लिए मजबूर हुई है, मगर इसे असंभव करने की हर मुमकिन कोशिश सरकार की तरफ़ से अब तक की जाती रही है। उन पर लाठियां बरसायी गयीं, उनके रास्ते में तमाम बाधाएं खड़ी की गयी, यहां तक कि सड़कें भी काटी गयीं। यह किसानों का अपना साहस और अपनी जीजीविषा ही थी कि उन्होंने इन कोशिशों को नाकाम किया और अपने शांतिपूर्ण संघर्ष के काफ़िलों को लेकर राजधानी की सरहदों तक पहुंच गए।

किसानों के इस आन्दोलन के प्रति मुख्यधारा के मीडिया का रवैया कम विवादास्पद नहीं रहा। न केवल उसने आन्दोलन के वाजिब मुद्दों को लेकर चुप्पी साधे रखी बल्कि सरकार तथा उसकी सहमना दक्षिणपंथी ताक़तों द्वारा आन्दोलन को बदनाम करने की तमाम कोशिशों का भी जम कर साथ दिया। आंदोलन को विरोधी राजनीतिक पार्टी द्वारा प्रायोजित बताया गया, किसानों को खालिस्तान समर्थक तक बताया गया।

दरअसल, विगत कुछ सालों यही सिलसिला आम हो चला है। हर वह आवाज़ जो सरकारी नीतियों का विरोध करती हो – भले ही वह नागरिकता क़ानून हो, सांप्रदायिक दंगे हों, नोटबंदी हो – उसे बदनाम करने और उसका विकृतिकरण करने की साज़िशें रची गयीं। किसानों का आंदोलन भी इससे अछूता नहीं है।

यह सकारात्मक है कि इन तमाम बाधाओं के बावजूद किसान शांतिपूर्ण संघर्ष की अपनी राह पर डटे हैं।

हम सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन किसानों के इस अभूतपूर्व आन्दोलन के प्रति अपनी एकजुटता प्रगट करते हैं। हम जनता तथा जनता के संगठनों, पार्टियों से अपील करते हैं कि वे इस आन्दोलन के साथ जुड़ें और 8 दिसम्बर के भारत बंद को सफल बनाकर केंद्र सरकार को एक स्पष्ट संदेश दें।

हम सरकार से यह मांग करते हैं कि वह अपना अड़ियल रवैया छोड़े और तीन जनद्रोही कृषि-क़ानूनों को रद्द करने का ऐलान करे।

 हम आंदोलनरत किसानों से भी अपील करते हैं कि वे शांति के अपने रास्ते पर अडिग रहें।

जीत न्याय की होगी ! जीत सत्य की होगी !! जीत हमारी होगी !!

न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिव   दलित लेखक संघ   अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच   प्रगतिशील लेखक संघ   जन संस्कृति मंच   इप्टा   संगवारी   प्रतिरोध का सिनेमा   जनवादी लेखक संघ

जेल और थानों में सीसीटीवी: क्या इससे पुलिस ज़्यादतियों पर अंकुश लग सकता है?

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य एवं जिला स्तरों पर ऐसी निगरानी कमेटियों का भी निर्माण किया जाए तथा ऐसे कैमरों को स्थापित करने की दिशा में तेजी लायी जाए।

सीसीटीवी

सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका के संदर्भ में पिछले दिनों एक अहम फैसला दिया। इसके तहत उसने तमाम राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वह हर थाने में क्लोजड सर्किट टीवी (सीसीटीवी), जिसमें आवाज़ रिकॉर्डिंग की भी सुविधा हो तथा रात में ‘देखने’ की व्यवस्था हो, जल्द से जल्द स्थापित करे। अदालत की इस त्रिसदस्यीय पीठ ने – जिसमें न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति के एम जोसेफ और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस भी शामिल थे – अपने आदेश में यह भी जोड़ा कि ऐसी सुविधा केन्द्रीय एजेंसियों के दफ्तरों में भी स्थापित की जानी चाहिए फिर चाहे सीबीआई हो, नेशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) हो या नारकोटिक्स कन्टोल ब्यूरो (एनसीबी) हो या एनफोर्समेण्ट डायरेक्टोरेट हो।

भारत जैसे मुल्क में पुलिस बलों या अन्य केन्द्रीय एजेंसियों के दस्तों द्वारा की जाने वाली प्रताड़ना एवं यातनाओं से अक्सर ही रूबरू होना पड़ता है। आप तमिलनाडु के थोडकुडी जिले में पिता पुत्रों- जयराज उम्र 62 वर्ष और बेंडक्स उम्र 32 साल – की हिरासत में मौत के प्रसंग को देखें, जब दोषी पुलिसकर्मियों की संलिप्तता को साबित करने के लिए जन आंदोलन करना पड़ा था। जून, 2020 या आप कुछ वक्त़ पहले राजधानी दिल्ली से ही आर्म्स एक्ट के तहत बंद विचाराधीन कैदी की पुलिस द्वारा निर्वस्त्र कर की गयी पिटाई का दृश्य चर्चित हुआ था जब किसी न कैमरे में उपरोक्त नज़ारा कैद कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया था।

त्रिसदस्यीय पीठ का मानना था कि चाहे मानवाधिकार आयोग हो या मुल्क की अदालतें हो, वह किसी विवाद की स्थिति में इस सीसीटीवी फुटेज का इस्तेमाल कर सकती हैं, जहां हिरासत में बंद लोगों के मानवाधिकारों के हनन की अक्सर शिकायतें आती रहती हैं और जनाक्रोश भी सड़कों पर उतरता रहता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य एवं जिला स्तरों पर ऐसी निगरानी कमेटियों का भी निर्माण किया जाए तथा ऐसे कैमरों को स्थापित करने की दिशा में तेजी लायी जाए।

गौरतलब है कि जहां तक थानो में सीसीटीवी लगाने का सवाल है, देश के अन्य न्यायालय भी इस किस्म का निर्देश पहले दे चुके हैं।

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How Can India Reinvigorate Phule’s Revolutionary Legacy ?

Remembering a colossus in the times of Hindutva.

Jyotirao phule.

Who will reinvigorate Phule’s legacy? This question stares us in the eye on 28 November, the 130th death anniversary of Jyotirao Phule, considered the “father of social revolution in India”. Phule largely remains relegated to the background—a result of selective amnesia and identity politics in modern India, where his path-breaking contributions, and those of his wife Savitribai and her fellow traveller Fatima Sheikh are rarely remembered.

They are credited with opening the first school for girls from the historically “untouchable” communities in Pune, which was once ruled by the Peshwas. This school created an upheaval in the Brahmin-dominated Maharashtra of yore, as a 14-year-old Muktabai, belonging to the formerly “untouchable” Mang caste, who studied in the school, wrote: “O learned Pandits, wind up the selfish prattle of your hollow wisdom and listen to what I say.” The student’s essay was published in 1855 in Dnyanodaya, a journal popular then. (From Women Writing in India, Edited by Susie Tharu and K Lalitha, Pandora.)

Jyotirao Phule was given the honorific of “Mahatma” a few years before he breathed his last in 1890, for a life spent engaging in tremendous innovation and creativity. He initiated his wife into writing and she later became an independent activist too—a rarity in those days. He opened the doors of his home for those considered the lowliest among the low. He came to the defence of scholar-activists, such as Pandita Rambai, when she embraced Christianity. So he fought against the conservative onslaught single-handedly. Many such instances in his life are worth emulating today.

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इस्लामिस्ट एवं हिन्दुत्ववादी: कब तक चलेगी यह जुगलबंदी!

आखिर इस्लामिस्ट क्यों खुश हैं नागरिकता संशोधन अधिनियम से

not in my name

प्रतीकात्मक तस्वीर। 

विजयादशमी के दिन सरसंघचालक की तकरीर आम तौर पर आने वाले समय का संकेत प्रदान करती है।

विश्लेषक उस व्याख्यान की पड़ताल करके इस बात का अंदाज़ा लगाते हैं कि दिल्ली में सत्तासीन संघ के आनुषंगिक संगठन भाजपा की आगामी योजना क्या होगी।

विगत माह विजयादशमी के दिन संघ सुप्रीमो के व्याख्यान का फोकस नागरिता संशोधन अधिनियम पर था, जिसमें उन्होंने यह दावा किया कि यह अधिनियम किसी भी ‘धार्मिक समुदाय’ के साथ भेदभाव नहीं करता है और मुसलमानों को एक छद्म प्रचार से गुमराह किया गया है। उनके मुताबिक संसद में यह कानून संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करके पारित हुआ है, एक तरह से सरहद पार के उन भाइयों एवं बहनों को सुरक्षा प्रदान करता है, जिन्हें वहां धार्मिक प्रताडना झेलनी पड़ती है।

मालूम हो कि उन दिनों चूंकि बिहार चुनावों की सरगर्मियां बनी हुई थीं, लिहाजा उनके वक्तव्यों से निकले संकेतों पर अधिक बात नहीं हो सकी।

गौरतलब है कि बंगाल के चुनावों के मद्देनज़र भाजपा के कुछ अग्रणी नेताओं ने भी इसी किस्म की बातें शुरू कर दी हैं। मालूम हो कई बार अपनी आम सभाओं में उनके कई अग्रणी, ‘दीमक’ की तरह ऐसे ‘अवांछितों’ को हटाने की बात पहले ही कर चुके हैं।

प्रश्न यह है कि क्या कोविड काल में इस सम्बन्ध में नियम बनाने का जो सिलसिला छोड़ दिया गया था क्या उसी मार्ग पर सरकार चलने वाली है और इसे लागू किया जाने वाला है या यह सिर्फ चुनावी सरगर्मी बनाए रखने का मामला है।

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Jawaharlal Nehru and the Current Challenge to the Idea of India : Prof aditya mukherjee

 

 

 

The fourth lecture in the Democracy Dialogues series organised by New Socialist Initiative was  delivered by eminent scholar Prof Aditya Mukherjee, Centre for Historical Studies, JNU who is also editor of the ‘Sage Series in Modern Indian History’

Theme :
Jawaharlal Nehru and the Current Challenge to the Idea of India
Sunday, November 15, 2020
Facebook.Com / newsocialistinitiative.nsi
Abstract :

In this talk I will look at how Jawaharlal Nehru tried to implement the vision of our national liberation struggle, which was reflected in our Constitution.  Critical elements of this vision were the creation  of a sovereign, secular, inclusive, democratic and pro-poor state. There was a consensus among the entire  Nationalist spectrum, from the Left to the Right on all these elements. While there was a consensus on the “pro-poor” aspect, from the early nationalists to Gandhiji to socialists and communists, there was no consensus on the idea of socialism, though a large and growing section was moving towards that objective. (The communalists and other loyalists who claimed to represent sectional interests, naturally did not share any aspect of this vision).

I will seek to outline how Nehru undertook the stupendous and in many respects historically unique task of creating a modern democratic nation state in a plural society, left deeply divided through the active collusion of the colonial state; of promoting modern industrialization within the parameters of democracy and sovereignty in a backward and colonially structured economy; of finding the balance between growth and equity in an impoverished, famine-ridden country; of empowering the people and yet expecting them to tighten their belt for the sake of the nation as a whole; of promoting the highest level of scientific education, a field left barren by colonialism; in short, of un-structuring colonialism and bringing in rapid economic development but doing it consensually, without the use of force, keeping what has been called the “Nehruvian consensus” intact in the critical formative years of the nation. I will also briefly discuss Nehru, who was deeply influenced by Marxism, tried to creatively move towards the socialist objective without compromising on the non-negotiable principle of democracy; though with limited success because of  a variety of reasons.

I shall end with reminding ourselves that, in these days of trying to erase Nehru’s memory altogether or to remember him in an unrecognisable demonised image created though false propaganda, much can be learnt from the legacy left behind by Nehru’s ideas and practice by those who wish to struggle to meet the current challenges to all the pillars of the Idea of India.
Sun, 15 Nov at 06:00 GMT+05:30
[https://www.youtube.com/playlist?list=PLtXBfoS5KZ78UFI_aYzROjUss8ZzhUKxy
This is the link of the playlist where you can find all the democracy dialogues video.]

 

 

India is Hungry: Who is Listening?

Hunger is a matter of structural anomalies. It cannot just be explained away by who holds the reins of power.

Starvation Deaths Continue to Occur in UP

Image Courtesy: Sabrang India

The “good news” is that India now stands at the 94th position on the Global Hunger Report 2020’s ranking of 107 countries. India has improved several notches over its 102nd rank last year, but is still firmly in the category of countries with a “serious” hunger problem. Only a handful of countries are doing worse than India, such as Rwanda (ranked 97), Afghanistan (99), Mozambique (103) and Chad (107).

The “good news” cannot hide the fact that that with an overall score of 27.2 India has performed worse than its neighbours, Pakistan (ranked 88), Bangladesh (75), Nepal (73) and Indonesia (70).

Seen any way, India has spent yet another year failing to tackle its massive chronic hunger problem. According to official figures, more than 14% of the population is undernourished and the child stunting rate is over 37.4%. One supposes this fits in with the strong belief in some quarters that India is a Vishwa Guru—teacher to the world—and can boldly claim to be a superpower in future.

The situation is such that news of starvation deaths is not uncommon despite excess of food grains stored in the godowns of the Food Corporation of India. Thousands of tonnes of these food grains go waste every year for a number of equally unjustifiable reasons.

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Unpacking Religious Nationalism

Review of ‘Religious Nationalism – Social Perceptions and Violence : Sectarianism on Political Chessboard‘- Ram Puniyani (Media House 2020)

“Blatant dictatorship – in the form of fascism, communism, or military rule – has disappeared across much of the world. Military coups and other violent seizures of power are rare. Most countries hold regular elections. Democracies still die, but by different means.

Since the end of the Cold War, most democratic breakdowns have been caused not by generals and soldiers but by elected governments themselves.”

(How Democracies Die, Steven Levitsky and Daniel Ziblatt)

The contrast had never been so sharper.

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जेपी से अण्णा : आख़िर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन किस तरह दक्षिणपंथ का रास्ता सुगम करता आया है

हम बारीकी से विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि वर्ष 2014 के बाद भारत में लिबरल जनतंत्र के बरअक्स हिन्दुत्व की जो बहुसंख्यकवादी सियासत हावी होती गयी, उसके कई तत्व इसी आंदोलन /सरगर्मी में मजबूती पाते गए हैं।

अण्णा
वर्ष 2011 के जनलोकपाल आंदोलन के दौरान अण्णा हजारे (फाइल फोटो)। साभार : गूगल

ग्रीक पुराणों में मिनर्वा को ज्ञान, विवेक या कला की देवी समझा जाता है, जिसका वाहन है उल्लू।

उन्नीसवीं सदी के महान आदर्शवादी दार्शनिक हेगेल का ‘फिलॉसाफी आफ राइट’ नामक किताब का चर्चित कथन है, ‘‘मिनर्वा का उल्लू तभी अपने पंख फैलाता है, जब शाम होने को होती है’’; (Only when the dusk starts to fall does the owl of Minerva spread its wings and fly.) – कहने का तात्पर्य दर्शन किसी ऐतिहासिक परिस्थिति को तभी समझ पाने के काबिल होता है, जब वह गुजर गयी होती है।]

अपनी अतीत की ग़लतियों की तहे दिल से आलोचना करना, साफ़गोई के साथ बात करना, यह ऐसा गुण है, जो सियासत में ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन में भी इन दिनों दुर्लभ होता जा रहा है। इसलिए अग्रणी वकील एवं नागरिक अधिकार कार्यकर्ता जनाब प्रशांत भूषण ने अपनी अतीत की ग़लतियों के लिए जब पश्चताप प्रगट किया तो लगा कुछ अपवाद भी मौजूद हैं।

दरअसल इंडिया टुडे से एक साक्षात्कार में उन्होंने ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’ आंदोलन जिसका चेहरा बन कर अण्णा हजारे उभरे थे – जिसकी नेतृत्वकारी टीम में खुद प्रशांत शामिल थे – को लेकर एक अनपेक्षित सा बयान दिया। उनका कहना था कि यह आंदोलन ‘संघ-भाजपा’ द्वारा संचालित था। ईमानदारी के साथ उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्हें अगर इस बात का एहसास होता तो वह तुरंत अण्णा आंदोलन से तौबा करते, दूर हट जाते।

विडम्बना ही है इतने बड़े खुलासे के बावजूद छिटपुट प्रतिक्रियाओं के अलावा इसके बारे में मौन ही तारी है या बहुत कमजोर सी सफाई पेश की गयी है।

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State of the judiciary and reforms required : Prashant Bhushan

Democracy Dialogues Lecture Series Organised by New Socialist Initiative – 3 rd Lecture

Topic: State of the Judiciary and Reforms Required
Speaker: Prashant Bhushan, eminent Supreme Court lawyer and civil rights activist
Date and Time: Sunday, September 20, 2020 at 6 PM IST

Zoom and Facebook Live details in the poster below.

Image may contain: one or more people, text that says 'Democracy Dialogues 3rd Lecture State of the Judiciary and Reforms Required Time: 20 Sep 2020 06:00 PM India Join us on Zoom!! Meeting ID: 848 2963 1643 Passcode: 799603 f fb.com/newsocialistinitiative.nsi Live link: Prashant Bhushan Public Interest Lawyer and Civil Liberty Activist New Socialist Initiative A World for the Workers! A Future for the World'

[New Socialist Initiative Presents Democracy Dialogues – Lecture Series

The idea behind this series – which we call ‘Democracy Dialogues’ – is basically to initiate as well as join in the on-going conversation around this theme in academic as well as activist circles.

The inaugural lecture in the series was delivered by Prof Suhas Palshikar on 12 th July 2020. The theme of Prof Palshikar’s presentation was  TRAJECTORY OF INDIA’S DEMOCRACY AND CONTEMPORARY CHALLENGES, Professor Pratap Bhanu Mehta delivered the second lecture on THE STRUCTURAL CONTRADICTIONS OF INDIAN DEMOCRACY AND THE RISE OF THE BJP on 16 th August 2020 ]

How to really compensate for injustice committed

It is disheartening when the Constitution is not followed in letter and spirit, but the balm of monetary compensation will not fix the problem.

Dr Kafeel Khan Speech allahabad hc

Someone must have been telling lies about Joseph K, he knew he had done nothing wrong but one morning, he was arrested.

These opening lines of Franz Kafka’s classic novel, The Trial, published just over a century ago, in 1925, still ring true. 

Joseph K, the novel’s protagonist, is cashier at a bank. On his 30th birthday, two unidentified agents arrest him for an unspecified crime. The plot of the novel revolves around his efforts to deduce what the charges against him are, and which never become explicit. Joseph K’s feverish hopes to redeem himself of these unknown charges fail and he is executed at a small quarry outside the city—“like a dog”—two days before his 31st birthday.

Kafka, a major figure of 20th century-literature died of tuberculosis in 1924, when he was barely 40 years old. He had wanted all his manuscripts, including of the unfinished The Trial, destroyed after his death, but close friend and executor of his will, Max Brod, ignored the instruction and the world gained a strong literary indictment of an apathetic and inhuman bureaucracy and how completely it can lack respect for civil rights. 

Kafka’s novel resonates with us today for it is not difficult to spot people who have been wronged by our system. Their endless wait for justice, especially those charged with petty crimes, or those who spend the prime of their lives behind bars on concocted charges, is on open public display. 

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केन्द्रीय विश्वविद्यालय: वर्चस्वशाली जातियों के नए ठिकाने ?

अगर हम प्रोफेसरों के पदों की बात करें तो यूजीसी के मुताबिक अनुसूचित जाति से आने वाले प्रत्याशियों के लिए आरक्षित 82.82 फीसदी पद, अनुसूचित जनजाति तबके से आने वाले तबकों के लिए आरक्षित 93.98 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 99.95 फीसदी पद आज भी खाली पड़े हैं। असोसिएट प्रोफेसर के पदों की बात करें तो स्थिति उतनी ही खराब दिखती है: अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 76.57 फीसदी पद, अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 89.01 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 94.30 फीसदी पद खाली पड़े हैं।

क्या हम कभी जान सकेंगे कि मुल्क के चालीस केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में नियुक्त उपकुलपतियों के श्रेणीबद्ध वितरण- अर्थात वह किन सामाजिक श्रेणियों से ताल्लुक रखते हैं- के बारे में ?

शायद कभी नहीं !

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के केन्द्रीय विश्वविद्यालय ब्युरो में ऐसे कोई रेकॉर्ड रखे नहीं जाते।

किसी बाहरी व्यक्ति के लिए इन सूचनाओं का अभाव बेहद मामूली लग सकता है अलबत्ता अगर हम अधिक गहरे में जाकर पड़ताल करें तो हम पूछ सकते हैं कि सर्वोच्च पदों की यह कथित ‘जातिविहीनता’ का सम्बन्ध क्या इसी तथ्य से जोड़ा जा सकता है कि इन चालीस विश्वविद्यालयों में- सामाजिक और शारीरिक तौर पर हाशिये पर रहने वाले तबकों से आने वाले अध्यापकों की मौजूदगी नगण्य है। फिर वह चाहे अनुसूचित जाति, जनजाति हो या अन्य पिछड़ी जातियां हो या विकलांग तबके से आने वाले लोग हों। इन तबकों की इन पदों से साद्रश्यता के अभाव का अन्दाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इन श्रेणियों से आने वाले तबकों के लिए आरक्षित प्रोफेसरों के 99 फीसदी पद आज भी खाली पड़े हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में, एडहॉक/तदर्थ अध्यापक के तौर पर कार्यरत लक्ष्मण यादव द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को सूचना अधिकार के तहत जो याचिका दायर की गयी थी, उसी के औपचारिक जवाब के तौर पर ऐसे कई सारे अचम्भित करने वाले तथ्य सामने आए हैं। अगर हम प्रोफेसरों के पदों की बात करें तो यूजीसी के मुताबिक अनुसूचित जाति से आने वाले प्रत्याशियों के लिए आरक्षित 82.82 फीसदी पद, अनुसूचित जनजाति तबके से आने वाले तबकों के लिए आरक्षित 93.98 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 99.95 फीसदी पद आज भी खाली पड़े हैं। अगर हम असोसिएट प्रोफेसर के पदों की बात करें तो स्थिति उतनी ही खराब दिखती है: अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 76.57 फीसदी पद, अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 89.01 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 94.30 फीसदी पद खाली पड़े हैं। असिस्टेंण्ट प्रोफेसर पद के लिए आरक्षित पदों के आंकड़े उतने खराब नहीं हैं जिसमें अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 29.92 फीसदी पद, अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित 33.47 फीसदी पद और अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित 41.82 फीसदी पद खाली पड़े हैं। (देखें- मीडिया विजिल की रिपोर्ट)

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Trajectory of India’s Democracy and Contemporary Challenges : Prof Suhas Palshikar

[Inaugural Lecture of ‘Democracy Dialogues’ Series ( Webinar)
Organised by New Socialist Initiative, 12 th July 2020]

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( Prof Suhas Palshikar, Chief Editor, Studies in Indian Politics and Co-director, Lokniti at the Centre for the Study of Developing Societies, delivered the inaugural lecture in the ‘Democracy Dialogues’ Series initiated by New Socialist Initiative.

In this lecture he attempted to trace the roots of the current moment of India’s democracy in the overall global journey of democracy, the extra-ordinarily ambitious and yet problematic foundational moment of Indian democracy and the many diversions India’s democracy has taken over time. He argued that unimaginative handling of the extra-ordinary ambition and Statist understanding of the ‘power-democracy’ dialectic formed the basis for easy distortions of democratic practice and that while populism and majoritarianism are the current challenges, they are by no means only special to the present and therefore, even as critique and course-correction of present political crisis is urgently required, a more long-term view of the trajectory of Indian democracy is necessary.

Here follows a detailed summary of his presentation prepared by Dr Sanjay Kumar)

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वरवर राव को रिहा करो!

भीमा कोरेगाँव मामले तथा अन्य सभी मामलों में विचाराधीन लेखकों-मानवाधिकारकर्मियों को रिहा करो !

(न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, जन संस्कृति मंच, दलित लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन नाट्य मंच, इप्टा, प्रतिरोध का सिनेमा और संगवारी की ओर से जारी साझा  बयान )

State trying to kill Varavara Rao in jail, he needs immediate ...

( Photo Courtesy : New Indian Express)

‘…कब डरता है दुश्मन कवि से ?

जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हैं

वह कै़द कर लेता है कवि को ।

फाँसी पर चढ़ाता है

फाँसी के तख़्ते के एक ओर होती है सरकार

दूसरी ओर अमरता

कवि जीता है अपने गीतों में

और गीत जीता है जनता के हृदयों में।’

–वरवर राव, बेंजामिन मोलेस की याद में, 1985

देश और दुनिया भर में उठी आवाज़ों के बाद अन्ततः 80 वर्षीय कवि वरवर राव को मुंबई के जे जे अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया है। राज्य की असंवेदनशीलता और निर्दयता का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि जिस काम को क़ैदियों के अधिकारों का सम्मान करते हुए राज्य द्वारा खुद ही अंजाम दिया जाना था, उसके लिए लोगों, समूहों को आवाज़ उठानी पड़ी। Continue reading वरवर राव को रिहा करो!

Shadow of Laxmanpur Bathe on Bihar Election

An unpredictable element has found a new lease of life thanks to the coming Assembly election.

Laxmanpur Bathe on Bihar Election

The outlawed Ranvir Sena—the private army of upper caste landlords of Bihar—is in the news again. It recently threatened the Bihar chief of the Bhim Army, Gaurav Siraj, and one of its activists, Ved Prakash, through a Facebook post. The so-called army has “ordered” its “sainiks” to “arrest” him dead or alive. The sena is apparently peeved over how the young dynamic leader of the Ambedkarite organisation has described Brahmeshwar Singh, their slain “Mukhiya” who was killed in 2012.

Will there be any action against those who have threatened the young leader? If history is any guide then there is little possibility of this.

Merely two years ago, Nawal Kishor Kumar, Editor Hindi, Forward Press was targeted by this “sena”. The aggrieved journalist had lodged a police complaint but there has been no progress in the investigation.

It is not that there is no law to punish such miscreants. Social media posts of the threatening kind relate to various offences under the Indian Penal Code, from criminal intimidation punishable under section 503 to section 505 related to creating mischief in public, to section 506 which awards punishment for criminal intimidation and section 153A which relates to penalties for promoting enmity between different groups and so on. In fact, based on its activities, the Ranvir Sena is also liable to be prosecuted under section 3 of the Bihar Control of Crimes Act, section 3 of the Arms Act and section 3 of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989.”

( Read the full text here)

Can Rest of India ‘Do’ a Mallapuram ?

Ruins of an ancient Jain temple in Arimbra

Ruins of old Jain Style Temple at Arimbra 

Mallapuram, Kerala’s lone Muslim-majority district, made history recently.

The 5,000 mosques in the district would remain closed indefinitely.

Logic behind this decision is simple.

As the state is witnessing spike in Coronavirus infection recently, it was found more prudent to keep the doors closed for devotees. Panakkad Sayyed Sadiq Ali Shihab Thangal, a leading Islamic Scholar and Malappuram district president of the Indian Union Muslim League, shared this news with a section of the media.

Thus while the rest of the country is witnessing opening of places of worship under Unlock 1, Mallapuram has decided otherwise. Continue reading Can Rest of India ‘Do’ a Mallapuram ?

Public Display of Faith Can Wait, Humanity Cannot

It is inevitable that the virus will spread anywhere people gather in numbers.

Faith in India

Representational Image

India went for the world’s toughest lockdown in March, when just about 500 Covid-19 cases had been reported. And it has started withdrawing the lockdown when India has become the seventh-worst pandemic-affected nation, with over 1.91 lakh infections and close to 5,500 deaths. India is registering giant spikes in active cases of Covid-19, but the home ministry has come out with a phased plan to unlock India. The current phase of re-opening will focus on the economy. It has been decided that malls, hotels, restaurants and places of worship will reopen from 8 June onwards.

Concerns over the economic downturn are understandable. The latest GDP data shows the slowest pace of growth in 11 years in the last quarter of 2019-20, and the economy has been hit hard by the Covid-inspired sudden and complete lockdown. But one fails to understand the decision to open religious places at such an early date.

It remains unanswered whether religious places are being thrown open to pre-empt Mamata Banerjee, the Chief Minister of West Bengal, who has announced that her state would open all places of worship from 1 June. It is also not known whether this is being done, as BS Yediyurappa, the Chief Minister of Karnataka, wrote in his letter to the Prime Minister, because devotees are insisting that religious sites be opened.

( Read the full article here )

SAB YAAD RAKHA JAEGA: Nationwide Protest against repression on anti-CAA activists and democratic voices of dissent

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Guest Post by PEOPLE UNITED AGAINST REPRESSION ON ANTI CAA PROTESTERS

Over the past two months the Delhi Police has arrested Jamia students Safoora Zargar, Meeran Haider, Asif Iqbal Tanha, JNU students Natasha Narwal and Devangana Kalita along with activists Ishrat Jahan, Khalid Saifi, Gulfisha Fatima, Sharjeel Imam and hundreds of other Muslim youth. Some among them have been booked under the amended UAPA as a means of punishing the widespread protests against the CAA-NRC that emerged across the country in December last year. Most recently AMU students Farhan Zuberi and Ravish Ali Khan have been arrested by the UP police for participating in the anti-CAA protests. It is clear that the spate of arrests are far from over and new names of democratic activists are likely to be added to this already long list. Meanwhile those openly advocating violence against peaceful protesters such as Kapil Mishra, Parvesh Verma and Anurag Thakur have gone scot-free. Continue reading SAB YAAD RAKHA JAEGA: Nationwide Protest against repression on anti-CAA activists and democratic voices of dissent