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संशोधित नागरिकता-कानून, जनसँख्या-रजिस्टर एवं नागरिकता-रजिस्टर – एक तथ्यात्मक ब्यौरा : सप्तरंग व नागरिक एकता एवं सद्भाव समिति

[संशोधित नागरिकता-कानून, जनसँख्या-रजिस्टर  (एन पी आर ) एवं नागरिकता-रजिस्टर (एन आर सी ) पर  निन्मलिखित परचा रोहतक ज़िले के दो संगठनों  – सप्तरंग  व नागरिक एकता व  सद्भाव समिति ने शाया किया है. जनहित में इस सामग्री का किसी भी रूप में प्रयोग किया जा सकता है। ये सारी जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध सरकारी या भरोसेमंद प्रकाशनों से ली गई है न कि अपुष्ट स्रोतों से। ]

भाग 1            

आसाम समझौता, नागरिकता-कानून में संशोधन एवं आसाम का नागरिकता-रजिस्टर

  1. नागरिकता कानून में संशोधन एवं नागरिकता रजिस्टर का विरोध एक कारण से नहीं हो रहा। यह दो कारणों से हो रहा है – उत्तर-पूर्व में अलग  कारण से और शेष देश में अलग कारणों से । दोनों तरह की आलोचनाओं का समाधान ज़रूरी है।
  2. उत्तर-पूर्व के राज्यों में इस का विरोध इसलिए हो रहा है कि इस के चलते अवैध रूप से देश में 2014 तक दाखिल हुए लोगों को भी नागरिकता मिल जायेगी जब कि 1985 में भारत सरकार के साथ हुए आसाम समझौते के तहत केवल 1965 तक आसाम में आए हुए अवैध प्रवासियों को ही नागरिकता मिलनी थी। (मोदी सरकार द्वारा पिछले कार्यकाल में प्रस्तावित नागरिकता संशोधन कानून का उत्तर-पूर्व राज्यों में भयंकर विरोध हुआ था। इस सशक्त विरोध के चलते मोदी सरकार ने 2019 में पारित कानून के दायरे से उत्तर-पूर्व के कुछ इलाकों को बाहर रखा है पर इस से भी उत्तर-पूर्व के स्थानीय संगठन/लोग संतुष्ट नहीं हैं। वे इसे वायदा-खिलाफ़ी के रूप में देखते हैं।)
  3. आसाम (और तब के आसाम में लगभग पूरा उत्तर-पूर्व भारत आ जाता था) में अवैध प्रवासियों की समस्या बहुत पुरानी है। इस के नियंत्रण के लिए पहला कानून 1950 में ही बन गया था। इस का कारण यह है कि भारत-बंगलादेश सीमा हरियाणा-पंजाब सीमा जैसी ही है। कहीं-कहीं तो आगे का दरवाज़ा भारत में तो पिछला बंगलादेश में खुलता है। भारत के नक़्शे के अन्दर कुछ इलाके बंगलादेश के थे तो बंगलादेश के नक़्शे के अन्दर स्थित कुछ ज़मीन भारत की थी। (इन इलाकों का हाल में ही निपटारा हुआ है।) बोली, भाषा, पहनावा एक जैसा होने के चलते कलकत्ता में पहले-दिन-पहला-फ़िल्म शो देखने के लिए बंगलादेश से आना मुश्किल नहीं था। ऐसे अजीबो-गरीब तरीके से हुआ था देश का बंटवारा।

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