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लोकतंत्र के बुझते चिराग़: अनिल

Guest post by ANIL [freelance journalist and researcher, Mahatma Gandhi Antarrashtriya Hindi Vishwavidyalay, Wardha]

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक ख़त्म हो गया है. 1991 में उदारवाद के अभियान की बुनावट जिन आकर्षक शब्दजालों से शुरू हुई थी अब उसके परिणाम सतह पर स्पष्ट दिखने लगे हैं. इन दो दशकों में इज़ारेदारी ने सियासत से लोकतंत्र के मूल्यों के पालन की उम्मीद को तो पहले ही दफ़्न कर दिया था लेकिन इस क्रम में जो हालिया प्रगति हुई है वह और ख़तरनाक संकेत दे रही है. Continue reading लोकतंत्र के बुझते चिराग़: अनिल