The Heavy Footsteps of Brahmanical Dandaneethi : The Hadiya Case

 

It appears that for women in India, the modern judiciary is fading and in its place, the terrifying face of Brahmanical Dandaneethi is emerging. A ten year old rape victim is denied abortion, women fleeing dowry harassment are to submit to the rule of local elders and leaders of ‘family welfare committees’, and now, in the Hadiya case, the judges declared that unmarried daughters should be under their parents according to ‘Indian tradition’.

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“No research please, we are college teachers” – On the HRD Ministry’s latest bright idea.

A version of this piece appeared yesterday in The Wire

“I would like to thank Huddersfield University for enabling me to have a sabbatical semester to work on this revised edition and for providing such a supportive environment. Thanks to many of the students on my Women, Power and Society module for their hard work and enthusiasm.”

That is the dedication in a book by British scholar and teacher Valerie Bryson – a text I often use for teaching at a college in Delhi University. Evidently, Bryson found her teaching and research lives complementing each other beautifully, as have thousands of university and college teachers who have had the luck to have what she calls a “supportive” professional and academic environment. What are the elements of this support? A sabbatical semester or year every once in a while, ready research facilities within the college premises or nearby, and an opportunity to formulate teaching courses that ally with your research focus. With these elements in place, both teaching and research benefit dramatically.

Until recently, college teachers in this country had the first two conditions. They were given in their entire careers – say from the age of 26 or 27 when one normally began teaching at a college to the age of 65 – three years of paid study leave to pursue or finish their PhDs (with the usual conditions and caveats including a strict bond that they signed with college promising to return the three years’ pay if the PhD remained incomplete, or if they resigned upon return to the institution) and a further two years of (until recently, paid and now invariably unpaid or “extraordinary”) leave to take a break from teaching and pursue a postdoctoral or visiting fellowship at a research institute.

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विश्वविद्यालय, अंध राष्ट्रवाद और देशभक्ति : वैभव सिंह

Guest post by VAIBHAV SINGH

भारत खुद को भले किसी महान प्राचीन ज्ञान-परंपरा का वारिस समझता हो पर उसके विश्वविद्यालयों की दशा चंद चमकदार अपवादों के बावजूद खस्ताहाल है। उच्चशिक्षा की हालत किसी मरणासन्न नदी जैसी है जिसपर पुल तो बहुत बड़ा बन गया है पर पानी सूखता जा रहा है। भारत अपने साथ ही यह झूठ बोल रहा है कि वह ज्ञान या ज्ञानियों का आदर करता है, जबकि सचाई इसके विपरीत है। आधुनिक युग में भारत ने जितना ज्ञान की अवहेलना और अनादर किया है, उतना शायद ही किसी देश ने किया होगा। हर तिमाही-छमाही आने वाली रिपोर्ट्स हमें शर्मिंदा करती हैं कि संसार के सर्वोच्च 100 विश्वविद्यालयों में भारत के किसी विश्वविद्यालय को नहीं रखा जा सका। पूरा शिक्षा-जगत डिग्रियों की खरीदफरोख्त में लगे विचित्र किस्म के अराजक और अपराधिक सौदेबाजियों से भरे बाजार में बदलता जा रहा है। यहां अपराधी, दलाल और कलंकित नेता अपने काले धन व डिजिटल मनी की समन्वित ताकत लेकर उतर पड़े हैं और हर तरह की कीमत की एवज में कागजी शिक्षा बेचने लगे हैं। इस बाजार में ‘नालेज’ और ‘डिग्री’ का संबंध छिन्नभिन्न हो चुका है। कमाल की बात यह है कि यह स्थिति हमें चिंतित नहीं करती।

दूसरी ओर, उच्चशिक्षा अभी भी समाज की नब्बे फीसदी आबादी के लिए सपने सरीखी है। उच्चशिक्षा में जीईआर यानी दाखिले के अनुपात की गणना 18-23 आयुवर्ग के छात्रों को ध्यान में रखकर की जाती है और अभी भी भारत में केवल दस फीसदी लोग उच्चशिक्षा के संस्थानों के दरवाजे तक पहुंच पाते हैं। इसमें भी दलित व गरीब मुस्लिमों की हालत बेहद खराब है। दलितों में दो फीसदी से भी कम लोग उच्चशिक्षा प्राप्त कर पाते हैं तो मुस्लिमों में यह आंकड़ा केवल 2.1 फीसदी का है। भारत की ग्रामीण आबादी में केवल दो फीसदी लोग ही उच्च माध्यमिक शिक्षा के पार जा पाते हैं। ये आंकड़े भारत में उच्चशिक्षा की आम लोगों तक पहुंच की भयावह तस्वीर को प्रस्तुत करते हैं और दिखाते हैं कि हम जिन संस्थानों, बड़े कालेजों-विश्वविद्यालयों आदि को भारत के विकास के प्रमाण के रूप में पेश करने की इच्छा रखते हैं, वे देश की नब्बे फीसदी आबादी से बहुत दूर रहे हैं। Continue reading “विश्वविद्यालय, अंध राष्ट्रवाद और देशभक्ति : वैभव सिंह”

JNUTA Statement on JNU VC’s ‘Tank’ Talk

Following the bizarre idea, earlier mooted by retired army officials, now taken up by the Vice Chancellor of JNU, to install a tank on university campus, ostensibly to instill nationalism in the university community, the JNUTA has issued the following statement:

The JNUTA is amused by the JNU VC’s earnest desire that a tank be rolled onto JNU campus. It is surprising that Prof. Jagadesh Kumar can only be inspired to patriotism upon beholding instruments of war. This seems to be only a personal affliction, since the rest of the JNU community does not need these visual aids to feel love and concern for this land, its environment and all its peoples, whether in the armed services or elsewhere.

The JNUTA also hopes that the JNU VC will understand that developing what he believes is the correct affective attachment towards the Indian Army is not part of his job description. JNU cannot be made into a theatre of war. His statutory role is one of “maintaining and promoting the efficiency and good order of the University” and of upholding the JNU Act and Statutes. The full statement can be read here.

हरियाणा की औरतें घूंघट को शान नहीं मानती: कशिश बदर

Guest post by KASHISH BADAR

हरियाणा सरकार को घू़ंघट पर कुछ बोलने से पहले इन महिलाओं की बात सुन लेनी चाहिए थी.

जब हरियाणा सरकार ने अपनी मासिक पत्रिका में एक घूँघट काढ़ी हुई औरत को राज्य की आन, बान और पहचान कहा तो मीडिया में इसका काफ़ी विरोध हुआ. फ़ेस्बुक पर लोगों का यह कहना था कि जब साक्षी मालिक, गीता फोगत, संतोष यादव और कल्पना चावला जैसी औरतें हरियाणा का नाम दुनिया भर में रौशन कर रही हैं, तब भी हरियाणा सरकार क्यूँ घूँघट वाली औरतों को ही अपनी शान समझती है. क्या उन औरतों की मेहनत, लगन और सफलता राज्य की शान नहीं है? क्या सिर्फ़ पुरुष खिलाड़ी ही राज्य को गर्व महसूस करवा सकते हैं?

स्वयं हरियाणा की औरतों के इस विषय पर विचार लेने मैं रेवाड़ी ज़िला गयी. वहाँ कुछ औरतों से घूँघट के और उनकी शान के विषय में बात की.

 

ममता यादव, सेंतिस साल की शादी शुदा औरत हैं.

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Promoting Superstition – Everything Official About It !

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Bhupendra Singh Chudasama, Education minister of Gujarat and his colleague Atmaram Paramar, who handles the Social Justice Ministry, were in the news sometime back- albeit for wrong reasons. A video went viral which showed them participating in a felicitation ceremony of exorcists in Botad. They were also seen watching how a couple of the exorcists were beating themselves with metal chains to live music near the stage.

Perhaps it did not matter to them that the Constitution frowns upon such activities and Article 51A (h) of the Indian constitution clearly says that it shall be a fundamental duty of all citizens “to develop the scientific temper, humanism and the spirit of inquiry and reform.” Neighbouring state Maharashtra has even enacted a law (The Maharashtra Prevention and Eradication of Human Sacrifice and other Inhuman, Evil and Aghori Practices and Black Magic Act, 2013) to rein in all such activities and it criminalises practices related to black magic, human sacrifices, use of magic remedies to cure ailments and other such acts which exploit people’s superstitions. And it was a culmination of a prolonged movement led by activists led by Dr Dabholkar – who even faced martyrdom for his activities. Continue reading “Promoting Superstition – Everything Official About It !”

प्रधानसेवक का मौन

ऊपर से शांत दिखने वाली भीड़ का हिंसक बन जाना अब हमारे वक्त़ की पहचान बन रहा है. विडंबना यही है कि ऐसी घटनाएं इस क़दर आम हो चली हैं कि किसी को कोई हैरानी नहीं होती.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi participates in the mass yoga demonstration at the Ramabai Ambedkar Maidan, on the occasion of the 3rd International Day of Yoga - 2017, in Lucknow on June 21, 2017.

15 वर्ष का जुनैद ख़ान, जिसकी चाहत थी कि इस बार ईद पर नया कुर्ता पाजामा, नया जूता पहने और इत्र लगा कर चले, लेकिन सभी इरादे धरे के धरे रहे गए. उसे शायद ही गुमान रहा होगा कि ईद की मार्केटिंग के लिए दिल्ली की उसकी यात्रा ज़िंदगी की आख़िरी यात्रा साबित होगी. दिल्ली बल्लभगढ़ लोकल ट्रेन पर जिस तरह जुनैद तथा उसके भाइयों को भीड़ ने बुरी तरह पीटा और फिर ट्रेन के नीचे फेंक दिया, वह ख़बर सुर्ख़ियां बनी है.

दिल्ली के एम्स अस्पताल में भरती उसका भाई शाकिर बताता है कि किस तरह भीड़ ने पहले उन्हें उनके पहनावे पर छेड़ना शुरू किया, बाद में गाली गलौज करने लगे और उन्हें गोमांस भक्षक कहने लगे और बात बात में उनकी पिटाई करने लगे. विडम्बना है कि समूची ट्रेन खचाखच भरी थी, मगर चार निरपराधों के इस तरह पीटे जाने को लेकर किसी ने कुछ नहीं बोला, अपने कान गोया ऐसे बंद किए कि कुछ हुआ ही न हो.

ट्रेन जब बल्लभगढ़ स्टेशन पर पहुंची तो भीड़ में से किसी ने अपने जेब से चाकू निकाल कर उन्हें घोंप दिया और अगले स्टेशन पर उतर कर चले गए. एक चैनल से बात करते हुए हमले का शिकार रहे मोहसिन ने बताया कि उन्होंने ट्रेन की चेन भी खींची थी, मगर उनकी पुकार सुनी नहीं गई. इतना ही नहीं, रेलवे पुलिस ने भी मामले में दखल देने की उनकी गुजारिश की अनदेखी की.

विडंबना ही है कि उधर बल्लभगढ़ की यह ख़बर सुर्ख़ियां बन रही थी, उसी वक़्त कश्मीर की राजधानी श्रीनगर की मस्जिद के बाहर सादी वर्दी में तैनात पुलिस अधिकारी को आक्रामक भीड़ द्वारा मारा जा रहा था. जुनैद अगर नए कपड़ों के लिए मुंतज़िर था तो अयूब पंडित को अपनी बेटी का इंतज़ार था जो बांगलादेश से पहुंचने वाली थी.

( Read the full article here : http://thewirehindi.com/12095/mob-lynching-and-india/)