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क्या राम मंदिर की आड़ में अपनी विफलताएं छिपा रही है मोदी सरकार

यह मानने के पर्याप्त आधार हैं कि राम मंदिर के भूमि पूजन के लिए चुना गया यह समय एक छोटी रेखा के बगल में बड़ी रेखा खींचने की क़वायद है, ताकि नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की बढ़ती असफलताएं जैसे- कोविड कुप्रबंधन, बदहाल होती अर्थव्यवस्था और गलवान घाटी प्रसंग- इस परदे के पीछे चले जाएं.

Ayodhya: A hoarding of PM Narendra Modi and other leaders put up beside a statue of Lord Hanuman, ahead of the foundation laying ceremony of Ram Temple, in Ayodhya, Thursday, July 30, 2020. (PTI Photo)(PTI30-07-2020 000044B)

अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन से पहले लगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं का एक होर्डिंग. (फोटो: पीटीआई)

बीते दिनों जनाब उद्धव ठाकरे द्वारा अयोध्या में राम मंदिर के प्रस्तावित भूमि पूजन को लेकर जो सुझाव दिया गया है, वह गौरतलब है.

मालूम हो कि आयोजकों की तरफ से जिन लोगों को इसके लिए न्योता दिया गया है, उसमें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का नाम भी शामिल है, उसी संदर्भ में उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि ‘ई-भूमि पूजन किया जा सकता है और भूमि पूजन समारोह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये भी अंजाम दिया जा सकता है.’

उनका कहना है कि इस कार्यक्रम में लाखों लोग शामिल होना चाहेंगे और क्या उन्हें वहां पहुंचने से रोका जा सकता है? कोरोना महामारी को लेकर देश-दुनिया भर में जो संघर्ष अभी जारी है और जहां धार्मिक सम्मेलनों पर पाबंदी बनी हुई है, ऐसे में उनकी बात गौरतलब है.

गौर करें कि ऐसा आयोजन जिसका लाइव टेलीकास्ट भी किया जाएगा, कोई चाहे न चाहे देश में जगह जगह जनता के अच्छे-खासे हिस्से को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित करेगा.

और अगर दक्षिणपंथी जमातें इस बारे में अतिसक्रियता दिखा दें तो फिर जगह जगह भीड़ बेकाबू भी हो सकती है और केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय द्वारा जारी गाइडलाइंस की भी धज्जियां उड़ सकती हैं.

( Read the complete article here)

 

Release Prof Hany Babu – A Statement of Solidarity from his Students

We are publishing below a statement by about 350 current and former students of Hany Babu, condemning his arrest on cooked up charges, and expressing solidarity with him.  

Students’ Statement of Solidarity: Release Prof. Hany Babu

We, the undersigned former and current students of Prof Hany Babu M.T., condemn his arrest by the National Investigation Agency (NIA) on Tuesday and stand in firm solidarity with him. Prof. Babu is a noted academic, a well known anti-caste activist, and a member of the committee formed for the defence of G.N. Saibaba, a former Delhi University professor who is over 90% disabled, and wheelchair bound. Prof. Babu has maintained his innocence since the illegal raid at his Noida apartment last year in September by Pune police. The raid, which was conducted without a warrant, resulted in the Pune Police confiscating Prof. Babu’s laptop, mobile phones, two booklets printed for the G.N. Saibaba defence committee and two books which are publicly available in bookstores and libraries. The nature of his alleged ‘crime’ remains unclear because the NIA’s warrant is, in our opinion, deliberately vague with clearly fabricated accusations. According to news reports, the ‘evidence’ that has apparently led to Prof Babu’s arrest was based off of an e folder on his hard disk. He was, however, not given a hash value for his laptop. 

We believe this is a direct attack on education, activists and the academic space at large.     It is outrageous that on 23rd June Prof. Babu was summoned to Mumbai from Noida during a pandemic. His summon and arrest cannot be seen in isolation. Activists like Anand Teltumbde, Gautam Navlakha, Devangana Kalita, Natasha Narwal, Gulfisha Fatima and Sharjeel Usmani were also arrested during the ongoing pandemic which mandates social distancing. Overcrowded jails have now become the new Covid19 hotspots. Activists arrested earlier, like Sharjeel Imam, Akhil Gogoi, and Varavara Rao, and, according to recent news reports, many other prisoners, have also tested Covid positive.  

We demand Prof. Babu’s immediate release, and reaffirm our complete solidarity with our Professor, Dr. Hany Babu. We also demand the release of all political prisoners who were arrested in cases related to the Elgar-Parishad, as well as the anti-CAA protestors booked under the draconian Unlawful Activities and Prevention Act, which makes bail almost impossible under medical and humanitarian grounds despite the ongoing pandemic. Continue reading Release Prof Hany Babu – A Statement of Solidarity from his Students

आज़ाद जनतंत्र में सत्तर साल बाद भी वेल्लोर से विरमगाम तक श्मशान भूमि से वंचित हैं दलित

क्या कोई जानता है 21वीं सदी की शुरुआत में चकवारा के दलितों के एक अहम संघर्ष को? जयपुर से बमुश्किल पचास किलोमीटर दूर चकवारा के दलितों ने गांव के सार्वजनिक तालाब पर समान हक पाने के लिए इस संघर्ष को आगे बढ़ाया था। अठारह साल का वक्फा गुजर गया जब दलितों ने इस संघर्ष में जीत हासिल की थी, जिसमें तमाम मानवाधिकार संगठनों एवं प्रगतिशील लोगों ने भी उनका साथ दिया था। (सितम्बर 2002)

विश्लेषकों को याद होगा कि इस संघर्ष में तमाम लोगों को डॉ. अम्बेडकर द्वारा शुरू किए गए ऐतिहासिक महाड़ सत्याग्रह की झलक दिखायी दी थी जब मार्च 1927 में हजारों दलित एवं अन्य मानवाधिकारप्रेमी महाड़ के चवदार तालाब पर जुलूस की शक्ल में गए थे और वहां उन्होंने पानी पीया था। जानवरों को वहां पानी पीने से कोई मना नहीं करता था, मगर दलितों को रोका जाता था। (ज्‍यादा जानकारी के लिए देखें: Mahad – The Making of the First Dalit Revolt – Dr Anand Teltumbde, Navayana)

चकवारा में बाद में क्या हुआ इसके बारे में तो अधिकतर लोग नहीं जानते होंगे।

जब दलितों ने सार्वजनिक तालाब से पानी का उपयोग शुरू किया, ऊंची जाति के लोगों ने रफ्ता-रफ्ता इसके प्रयोग को बन्द किया क्योंकि उनका कहना था कि अब पानी अशुद्ध हो गया है। मामला वहीं तक नहीं रुका। दलितों द्वारा अपने अधिकारों पर की इस दावेदारी से क्षुब्ध और उन्हें और अपमानित करने के लिए सवर्णों ने एक सुनियोजित ढंग से इस तालाब को गांव के सीवर में तब्दील कर दिया। कुछ लोगों ने तो बाकायदा अपने घरों से गंदे पानी की निकासी के लिए नालियां बनवायीं और उनका मुंह तालाब की दिशा में मोड़ दिया।

इसे एक विचित्र संयोग कहा जा सकता है कि एक गांव के तालाब के सीवर में रूपांतरण – जिसे कभी ऊंची जाति के लिए पवित्र कहते थे – की इस घटना की खास किस्म की प्रतिध्वनि लगभग 800 किलोमीटर दूर विरमगाम, जो अहमदाबाद से बमुश्किल 50 किलोमीटर दूर स्थित है, सुनायी दी।

Dalit Adhikar Manch convener Kirit Rathod (second from right) with Viramgam civic body officials at Mukti Dham. Credits: Mahesh Trivedi

 

यहां गांव का एक श्‍मशान – जो दलितों के विशेष इस्तेमाल के लिए बना था, जहां वह मृतकों को गाड़ते थे और जो उनके लिए एक किस्म की पवित्र जगह थी, जहां वह आकर प्रार्थना करते थे – एक बड़े सीवर नाले में तब्दील कर दिया गया। इसे अंजाम देने वाले गांव वाले नहीं थे बल्कि अगल-बगल की नयी-नयी बनी हाउसिंग सोसायटीज़ के अपार्टमेण्ट के निवासी थे, जिनमें से अधिकतर शिक्षित मध्यमवर्गीय परिवारों से सम्बद्ध थे। छह माह का अरसा गुजर गया जबसे वनकर, चमार, रोहित, दंगासिया, शेतवा आदि सामाजिक तौर पर उत्पीड़ित जातियों के आत्मीयों की मुक्तिधाम में बनी कब्रें/समाधियां गंदे पानी में डूबी हैं। स्थितियां इतनी ख़राब हैं कि जब पिछले दिनों एक दलित बुजुर्ग की मौत हुई, तब उसके रिश्तेदारों को उसकी लाश पांच किलोमीटर दूर बने किसी अन्य श्‍मशान में ले जानी पड़ी।

यह अधिक विचलित करने वाली बात है कि दलितों द्वारा बार-बार की गयी शिकायतों के बावजूद जिला प्रशासन ने इस मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। शायद उनके लिए मृत्यु के बाद गरिमा का प्रश्न – खासकर वंचित तबकों के लिए – उठता ही नहीं है।

एक मीडियाकर्मी से बात करते हुए दलित आन्दोलन के एक कार्यकर्ता ने बेहद उद्विग्न मन से कहा, ‘उन्हें तब अपमानित किया गया जब वह जिन्दा थे। अब जब वे मर गए हैं तब ऊंची जाति के लोग सचेतन तौर पर हमारे श्‍मशान में गंदे, ठोस एवं तरल पदार्थ डाल रहे हैं।’’ (वही)

अब जबकि मामला सुर्खियों में आया है यह देखना समीचीन होगा कि क्या विजय रूपानी सरकार इस मामले में उचित कार्रवाई करेगी और इस योजना के अमलकर्ताओं के खिलाफ अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 (संशोधित) के प्रावधानों के तहत कार्रवाई करेगी।

इसके पहले कि हम इस गलतफहमी का शिकार हो जाएं, इस बात पर जोर डालना मौजूं होगा कि विरमगाम की घटना कोई अपवाद नहीं है।

गुजरात खुद एक क्लासिकीय केस प्रस्तुत करता है।

वर्ष 2001 की बात है जब नरेश सोलंकी के ढाई साल के भतीजे की मौत हुई। बनासकांठा जिले के पालनपुर ब्लॉक के हुडा ग्राम के पीड़ित परिवार ने उसे समुदाय के श्‍मशान में जाकर दफना दिया। जब तक वह घर पहुंचते, ख़बर आयी कि गांव के पटेल समुदाय के लोगों ने ट्रैक्टर से बाकायदा उस लाश को कब्र से बाहर निकाला है। दरअसल, दबंग पटेल जिन्होंने श्‍मशान के एक हिस्से पर कब्जा किया था वे इस बात से क्षुब्ध थे कि वहां दलितों ने अपनी लाश दफनायी है।

इस घटना के डेढ दशक बाद तक- जब तक इस मामले की रिपोर्ट मिली थी- हुडा गांव के दलित आज भी कलेक्टर तथा गांव पंचायत की तरफ से जमीन के एक टुकड़े के आवंटन के इन्तज़ार में है, जहां वह अपने मृतकों को दफना सकें।

आज से एक दशक से अधिक समय पहले मेल टुडे अख़बार ने फरवरी के पहले सप्ताह में (2009) इस मुददे पर विस्‍तृत स्टोरी की थी। रिपोर्ट में इस बात को रेखांकित किया गया था कि किस तरह दलितों को श्‍मशान की साझा जमीनों को इस्तेमाल करने नहीं दिया जाता और अक्सर उन्हें गांव के पास की किसी गंदी जमीन में अपने मृतकों का अंतिम संस्कार करना पड़ता है। अक्सर ऐसा होता है कि दलित जब इस टुकड़े का इस्तेमाल शुरू कर देते हैं तो वर्चस्वशाली जातियां इन जमीनों पर कब्जा करती हैं।

गुजरात राज्य ग्राम पंचायत सामाजिक न्याय समिति मंच द्वारा किए गए सर्वेक्षण में पाया था कि ‘‘गुजरात के 657 गांवों में से 397 गांवों में दलितों के अंतिम संस्कार के लिए कोई अलग जमीन नहीं है। जिन 260 गांवों में ऐसी जमीन आवंटित की गयी है, 94 गांवों की जमीनों पर वर्चस्वशाली जातियों ने कब्जा किया है और 26 गांवों में वह जमीन नि‍चली सतह पर है इसलिए अक्सर वहां पानी भर जाता है।’’

एक क्षेपक के तौर पर यहां इस बात को जोड़ा जा सकता है कि जब मृतकों को दफनाने का प्रश्न उठता है तब दलितों एवं मुसलमानों के बीच एक विचित्र साझापन दिखता है। वर्चस्वशाली तबकों द्वारा जब उनकी कब्रगाहों पर कब्जा जमाया जाता है तो मुसलमानों एवं दलितों का अनुभव एक जैसा ही होता है। कुछ साल पहले गुजरात उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा था और राज्य सरकार को यह निर्देश देना पड़ा था कि वह पाटन जिले में जहां मुसलमानों के कब्रगाह पर दबंग तबकों द्वारा कब्जा जमाया जा रहा है, वहां पुलिस तैनात करे।

अभी पिछले अगस्त की बात है जब तमिलनाडु के वेल्लोर जिले का वनियामबादी तालुक राष्ट्रीय सुर्खियों में आया जब एक वीडियो वायरल हुआ जहां एक मृतक की लाश को लोग रस्सी से बांधे हुए एक पुल के नीचे पहुंचाते दिख रहे थे। दरअसल 46 वर्ष के दलित व्यक्ति एन. कुप्पम की अंतिम यात्रा को ऊंची जातियों ने रोक दिया था कि वह उनके इलाकों से नहीं जाएगी, जिस वजह से उन्हें उस लाश को पुल से नीचे रस्सी बांध कर पहुंचाना पड़ रहा था।

बमुश्किल तीन माह बाद उसी किस्म की ख़बर कोयम्‍बटूर जिले के विधि गांव से सुनायी दी।

यहां भी एक वीडियो वायरल हुआ जहां दिखाया गया था कि श्‍मशान तक मृतक व्यक्ति को ले जा रहे दलित समुदाय के लोग सीवर के रास्ते या कूडादान के रास्ते आगे बढ़ रहे हैं। पता चला कि उनकी बस्ती से श्‍मशान तक जाता रास्ता ऊंची जातिबहुल इलाकों से गुजरता था और इसी वजह से उन्होंने रास्ता रोक दिया था। गौरतलब है कि इस दिक्कत के बारे में गांव के 1,500 दलित परिवारों ने जिला प्रशासन को बार-बार लिखा है मगर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। महज चार माह पहले सबरंग इंडिया ने इस परिघटना की अखिल भारतीय मौजूदगी पर नज़र डाली थी। रिपोर्ट का शीर्षक था ‘दलित्‍स, ओबीसीज़ फोर्स्‍ड टु बरी देयर डिसीज्ड बाई द रोडसाइड’ अर्थात सड़क किनारे अंतिम संस्कार के लिए मजबूर दलित, ओबीसी।

इसमें रेखांकित किया गया था कि किस तरह ‘जाति आधारित भेदभाव और कार्पोरेट द्वारा जमीनों पर कब्जा करने के चलते ऊंची जाति के लोग समुदाय के मृतकों की गरिमा तक छीन रहे हैं।

प्रस्तुत रिपोर्ट में उद्धृत दो अलग-अलग राज्यों के दो उदाहरणों से हम देख सकते हैं कि किस तरह आज़ादी के सत्तर से अधिक साल बीत जाने के बावजूद, जाति और उससे सम्बद्ध भेदभाव अब भी समूचे उपमहाद्वीप में मिलते हैं।

इस रिपोर्ट में वर्ष 2011 की डीएनए की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि महाराष्ट्र के सामाजिक न्याय मंत्रालय ने खुद बताया था कि ‘दलित श्‍मशानों पर 43,722 गांवों में से 72.13 फीसदी गांवों में कब्जा हो चुका है।’ इसमें इस बात का भी उल्लेख था कि दलितों की एक अंतिम संस्कार यात्रा पर पुरोहित की अगुआई में ऊंची जातियों द्वारा हमला किया गया था और ‘अंततः दलितों को मृतक की लाश को तयशुदा श्‍मशान में दफनाने के बजाय रोड के किनारे दफनाना पड़ा था।’

इस रिपोर्ट में उद्धृत एक और उदाहरण पंजाब से जुड़ा था। इसमें इस बात को रेखांकित किया गया था कि ‘दलित जो राज्य की आबादी का लगभग 30 फीसदी हिस्सा हैं उन्हें राज्य के पश्चिमी हिस्से में झुग्गियों में रहने के लिए मजबूर किया जाता है ताकि उनकी बस्ती से आने वाली हवाएं ऊंची जातियों का छुआछूत न करे। इतना ही नहीं, कि दलितों को मुख्य श्‍मशान में दफनाने से मना करने के साथ ही उन्हें इस बात के लिए भी मजबूर किया जाता है कि उनका अलग गुरुद्वारा बने।’ (वही)

महाराष्ट्र की तरह- जहां 19वीं सदी के मध्य से समाज सुधार आन्दोलन चले हैं- केरल में भी नारायण गुरु, अय्यनकली जैसों की अगुआई में आन्दोलन चले हैं; अलबत्ता विडम्बना यह है कि जब दलितों का सवाल आता है तो आज भी चीजें गुणात्मक तौर पर अलग नहीं हैं।

‘द न्यूजमिनट’ के मुताबिक सानु कुम्मिल नाम के एक पत्रकार ने इस विषय पर एक डाक्युमेण्टरी तैयार की है जिसका नाम है ‘सिक्स फीट अंडर’। सानु ने बताया कि सार्वजनिक श्‍मशानों में स्थान की कमी के चलते लोग अपनी ही जमीनों पर अपने मृतकों को दफनाने के लिए मजबूर हो रहे हैं और जिनके पास अपनी कोई जमीन नहीं है, वे अपने घरों को तोड़ने तथा वहीं अपने आत्मीयों को दफनाने को विवश हैं।

विरमगाम, गुजरात, वनियामबाडी तालुक, कोयम्‍बटूर जिले का विधि‍ गांव, सूबा महाराष्ट्र, पंजाब, केरल … हम इस फेहरिस्त को बढ़ा सकते हैं ताकि यह जाना जाए कि शुद्धता एवं प्रदूषण के तर्क पर टिका समाज किस तरह आज भी विभिन्न तरीकों से उन तबकों को अपमानित करने में मुब्तिला रहता है जिन्हें वह ‘अन्य’ मानता है। यह इस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि भारत के गणतंत्र बनने के सत्तर साल बाद तथा जाति, लिंग, नस्ल आदि आधारों पर भेदभाव की समाप्ति के ऐलान के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आया है।

शायद इस मामले में डॉ. अम्बेडकर को पूर्वानुमान था जिन्होंने भारत की जनता के नाम संविधान अर्पित करते हुए कहा था ‘‘हम राजनीतिक जनतंत्र के युग में पहुंच गए हैं – ऐसा युग जहां एक व्यक्ति को एक मत/वोट हासिल है, लेकिन सामाजिक जनतंत्र के दौर में – एक व्यक्ति एक मूल्य – अभी पहुंच नहीं सके हैं।’ इसीलिए शायद उन्होंने एक ऐसे जनतंत्र की कल्पना की थी ‘जो महज सरकार का रूप नहीं होगा। उनके लिए इसके मायने थे मुख्यतः सहजीवन का रूप; मुख्यतः एक सामुदायिक अनुभव का साझापन। सारतः यह अपने ही लोगों के प्रति सम्मान की भावना से जुड़ा होगा।

( First published here)

Statement on the Arrest of a Survivor of Sexual Assault in Araria, Bihar: Ambedkar University Delhi Faculty Association

15.7.2020

Ambedkar University Delhi Faculty Association (AUDFA is alarmed to hear of and strongly condemns the arrest of a survivor of gang rape along with two social workers (including former AUD student Tanmay Nivedita), at the office of the Judicial Magistrate (1st Class) in Araria, Bihar on 10 July 2020. The arrest was ordered during the course of recording of the survivors’ statement under section 164 CrPC in relation to a case of gang rape which took place just days earlier, on 6 July 2020.

It is further disturbing that the hon’ble court appears to have registered offence at the fact that the survivor sought the presence and support of two social workers prior to actually signing her statement under section 164 CrPC in the said case. The right of a survivor of sexual assault/rape to the presence of caregivers for psychological support is well established and is specifically noted in the Justice Verma Committee Report (2013, Appendix 8). Instead of recognising the right of the survivor to psychological support, the Judicial Magistrate, Araria District, thought it fit to order the arrest of the survivor and the two social workers under sections of the IPC, including 353 and 228, on grounds of “obstructing the work of public servants”.

The absence of sensitivity in dealing with cases of sexual assault, and the unfortunate use of power to discipline a survivor of gang rape for seeking psychological and social support at a time of deep trauma, lays bare the deeply worrisome reality of the functioning of the criminal justice system that survivors of sexual assault face on a regular basis. AUDFA unequivocally condemns these arrests and stands in solidarity with the arrested persons.

Trajectory of India’s Democracy and Contemporary Challenges : Prof Suhas Palshikar

[Inaugural Lecture of ‘Democracy Dialogues’ Series ( Webinar)
Organised by New Socialist Initiative, 12 th July 2020]

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( Prof Suhas Palshikar, Chief Editor, Studies in Indian Politics and Co-director, Lokniti at the Centre for the Study of Developing Societies, delivered the inaugural lecture in the ‘Democracy Dialogues’ Series initiated by New Socialist Initiative.

In this lecture he attempted to trace the roots of the current moment of India’s democracy in the overall global journey of democracy, the extra-ordinarily ambitious and yet problematic foundational moment of Indian democracy and the many diversions India’s democracy has taken over time. He argued that unimaginative handling of the extra-ordinary ambition and Statist understanding of the ‘power-democracy’ dialectic formed the basis for easy distortions of democratic practice and that while populism and majoritarianism are the current challenges, they are by no means only special to the present and therefore, even as critique and course-correction of present political crisis is urgently required, a more long-term view of the trajectory of Indian democracy is necessary.

Here follows a detailed summary of his presentation prepared by Dr Sanjay Kumar)

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Cisco Case Shows Indians Still Take Caste Where they Go

How discrimination is integrated into the daily lives of the Indian diaspora still needs to be understood.

Cisco Case Shows Indians

What happens to caste when Indians migrate to Western countries? Do their feelings of being born superior or inferior, their belief in the purity-pollution ethic, just melt away? The “model minority” has tried to avoid a conversation on this issue but it returns to haunt them time and again. Now the American state of California is at the centre of yet another caste controversy.

The last serious discussion around Indian-Americans and caste took place in 2015, when the California State Board of Education initiated a regular ten-year public review of the school curriculum framework. The conservative Hindu American Foundation (HAF) and the South Asian Histories for All Coalition (an interfaith, multi-racial, inter-caste coalition) clashed over HAF’s proposed interventions, which essentially sought to erase caste from the syllabus. The Coalition took the position that evidence and record of the injustices of caste and religious intolerance in South Asian must not be erased.

( Read the full article here)

वरवर राव को रिहा करो!

भीमा कोरेगाँव मामले तथा अन्य सभी मामलों में विचाराधीन लेखकों-मानवाधिकारकर्मियों को रिहा करो !

(न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, जन संस्कृति मंच, दलित लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन नाट्य मंच, इप्टा, प्रतिरोध का सिनेमा और संगवारी की ओर से जारी साझा  बयान )

State trying to kill Varavara Rao in jail, he needs immediate ...

( Photo Courtesy : New Indian Express)

‘…कब डरता है दुश्मन कवि से ?

जब कवि के गीत अस्त्र बन जाते हैं

वह कै़द कर लेता है कवि को ।

फाँसी पर चढ़ाता है

फाँसी के तख़्ते के एक ओर होती है सरकार

दूसरी ओर अमरता

कवि जीता है अपने गीतों में

और गीत जीता है जनता के हृदयों में।’

–वरवर राव, बेंजामिन मोलेस की याद में, 1985

देश और दुनिया भर में उठी आवाज़ों के बाद अन्ततः 80 वर्षीय कवि वरवर राव को मुंबई के जे जे अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया है। राज्य की असंवेदनशीलता और निर्दयता का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि जिस काम को क़ैदियों के अधिकारों का सम्मान करते हुए राज्य द्वारा खुद ही अंजाम दिया जाना था, उसके लिए लोगों, समूहों को आवाज़ उठानी पड़ी। Continue reading वरवर राव को रिहा करो!

Gendering the Pandemic in the Prison: Pratiksha Baxi, Navsharan Singh

Excerpts from an article published in The India Forum. Link to whole article given below.

A powerful analysis of the injustice of the prison system in India (in which 70 percent of the incarcerated are under trial), the authors PRATIKSHA BAXI and NAVSHARAN KAUR make an argument for recognizing women, as well as gender and sexual minorities, as ‘custodial’ minorities.   

We argue that all women inmates may be defined “custodial” minorities. As per the 2020 statistics we collated, there are 68 persons incarcerated under the category “others”. No grave threat is posed to society by UTPs belonging to sexual and gender minorities that non-custodial alternatives cannot be found for them, while they wait for investigations and trials to be over. And alternatives to prison system need to be innovated for all convicted women, and gender and sexual minorities. There does not seem to be an attempt to recognise that their right to health and life is made far more precarious in a transphobic prison-medical complex. They must be counted and accounted for…

All women in prisons without distinction of charge, crime or sentence, whether pregnant, lactating, menstruating or menopausal, differently abled or ailing may be thought of as “custodial” minorities. Muslim women face terrible targeting and blame, as do Dalit women who face intolerable discrimination and bear the brunt of misuse of law against them. Similarly, Muslim and Dalit male undertrials are also subjected to sexualised forms of torture in police and judicial custody. And policies that exclude foreigners from interim bail position them as custodial minorities, who face institutionalised racism. However, the law has difficulty in “seeing” these prison inmates, especially undertrials, as custodial minorities.

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बिहार चुनाव आते ही प्रतिबंधित रणवीर सेना को एक बार फिर कौन हवा दे रहा है?

रणवीर सेना, जिस पर बहुत पहले पाबंदी लगायी जा चुकी है, नए सिरे से सुर्खियों में है।

पिछले दिनों उसने अपने सोशल मीडिया पेज पर भीम आर्मी के बिहार प्रमुख गौरव सिराज और एक अन्य कार्यकर्ता वेद प्रकाश को खुलेआम धमकाया है। उसने अपने ‘सैनिकों’ को आदेश दिया है कि उन्हें ‘जिन्दा या मुर्दा’ गिरफ्तार करें। बताया जाता है कि इस युवा अम्बेडकरवादी ने ब्रह्मेश्वर मुखिया- जो रणवीर सेना के प्रमुख थे और 2012 में किसी हत्यारे गिरोह के हाथों मारे गए थे- के बारे में जो टिप्पणी की, वह रणवीर सेना के लोगों को नागवार गुजरी है।

प्रश्न उठता है कि इस तरह खुलेआम धमकाने के लिए, मारने पीटने की बात करने के लिए क्या ‘सेना’ पर कार्रवाई होगी? अगर इतिहास को गवाह मान लिया जाए तो इसकी संभावना बहुत कम दिखती है। Continue reading बिहार चुनाव आते ही प्रतिबंधित रणवीर सेना को एक बार फिर कौन हवा दे रहा है?

Shadow of Laxmanpur Bathe on Bihar Election

An unpredictable element has found a new lease of life thanks to the coming Assembly election.

Laxmanpur Bathe on Bihar Election

The outlawed Ranvir Sena—the private army of upper caste landlords of Bihar—is in the news again. It recently threatened the Bihar chief of the Bhim Army, Gaurav Siraj, and one of its activists, Ved Prakash, through a Facebook post. The so-called army has “ordered” its “sainiks” to “arrest” him dead or alive. The sena is apparently peeved over how the young dynamic leader of the Ambedkarite organisation has described Brahmeshwar Singh, their slain “Mukhiya” who was killed in 2012.

Will there be any action against those who have threatened the young leader? If history is any guide then there is little possibility of this.

Merely two years ago, Nawal Kishor Kumar, Editor Hindi, Forward Press was targeted by this “sena”. The aggrieved journalist had lodged a police complaint but there has been no progress in the investigation.

It is not that there is no law to punish such miscreants. Social media posts of the threatening kind relate to various offences under the Indian Penal Code, from criminal intimidation punishable under section 503 to section 505 related to creating mischief in public, to section 506 which awards punishment for criminal intimidation and section 153A which relates to penalties for promoting enmity between different groups and so on. In fact, based on its activities, the Ranvir Sena is also liable to be prosecuted under section 3 of the Bihar Control of Crimes Act, section 3 of the Arms Act and section 3 of the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989.”

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कोविड-19 संकट के दौरान मिसाल बनकर उभरा क्यूबा

मार्च महीने में इटली के मिलान में मालपेंसा एयरपोर्ट पर क्यूबाई डॉक्टर्स का दल. (फोटो: रॉयटर्स)

मार्च महीने में इटली के मिलान में मालपेंसा एयरपोर्ट पर क्यूबाई डॉक्टर्स और स्वास्थ्यकर्मियों का दल. (फोटो: रॉयटर्स)

हेनरी रीव, इस नाम से कितने लोग परिचित हैं?

यह अलग बात है कि इस युवा की याद में बनी एक मेडिकल ब्रिगेड की दुनिया भर की सक्रियताओं से तो सभी परिचित हैं, जिसने कोविड महामारी के दिनों में भी अपने चिकित्सा के कामों में- जो अंतरराष्ट्रीयतावाद की भावना को मजबूती देते हुए आगे बढ़ी है, कहीं आंच नहीं आने दी है, जिसका निर्माण क्यूबा ने किया है.

मालूम हो कि हेनरी रीव के बारे में इतना ही हम जानते हैं कि 19 साल का यह अमेरिकी नौजवान था, जो न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन स्थित अपने घर को छोड़ते हुए 19वीं सदी के अंतिम दौर में स्पेनिश हुक्मरानों के खिलाफ क्यूबाई संघर्ष से जुड़ गया था.

और क्यूबा ने अपने इस अनूठे स्वतंत्राता सेनानी की याद में मेडिकल ब्रिगेड का गठन किया है जो आज की तारीख में 22 मुल्कों में सक्रिय है.

आप को याद होगा वह दृश्य, जो कैमरे में कैद होते वक्त ही कालजयी बने रहने का संकेत दे रहा था. जब मिलान, जो इटली के संपन्न उत्तरी हिस्से का मशहूर शहर है, वहां अपने डॉक्टरी यूनिफॉर्म पहने एक टीम मालपेंसा एयरपोर्ट पर उतर रही थी और उस प्रसिद्ध एयरपोर्ट पर तमाम लोग खड़े होकर उनका अभिवादन कर रहे थे. (18 मार्च 2020)

यह सभी डॉक्टर तथा स्वास्थ्य पेशेवर हेनरी रीव ब्रिगेड के सदस्य थे, जो इटली सरकार के निमंत्रण पर वहां पहुंचे थे. एयरपोर्ट पर खड़े लोगों में चंद ऐसे भी थे, जिन्होंने तब अपने सीने पर क्रॉस बनाया, अपने भगवान को याद किया क्योंकि उनके हिसाब से क्यूबा के यह डॉक्टर किसी ‘फरिश्ते’ से कम नहीं थे. Continue reading कोविड-19 संकट के दौरान मिसाल बनकर उभरा क्यूबा

Break the Chain, Break the (Unconventional) Family?

My earlier posts on the Kerala Left’s inability to forge an adequate and democratizing response to the ‘societal emergencies’ that have challenged Malayali society in the 21st century, and on the completely-unjustified attack on the body artist Rehana Fathima seem to have irritated, even angered, many supporters of the CPM on Facebook.

These people are not youngsters, a detail that is really important. Indeed, they largely belong to the upper-middle-class professional elite, indeed, perhaps among the best-off sections of Malayali society, which include medical professionals, male and female. Their responses reveal very interesting details about how the pandemic shapes our understanding of ‘useful expertise’:  at this moment, we are told, just listen to medical professionals, and not just their views on issues pertaining to health, but also to ‘social health’.  Many of these professionals believe that the brazen violence unleashed against Rehana Fathima’s family — her mother-in-law has been denied free dialysis simply because she is Rehana Fathima’s mother-in-law, and BSNL has ordered the eviction of the family on completely ridiculous grounds – is a minor diversion, an irritating, trivial one, compared to the task of controlling the pandemic on the ground, which of course, brings the medical professional (even when he/she works in Kerala’s private hospitals, which are surely not the epitome of altruism) to the centre of public discourse as the ‘hero’ that everyone should be eternally grateful to. And if such heroes tell you that Rehana Fathima is just a child-abusing publicity-seeker, then you have to just say yes. And, as as the artist Radha Gomathy put it, participate in the Break-the-Chain-and-Break-the-Family campaign — or punish Rehana’s supportive family for not being freakishly conservative, like good Malayali families.

Bolstering their claim to be the only ‘real experts’ to talk about Malayali society at the moment is their implicit understanding that medical professionals are somehow more ‘scientific’ than others. Yet I was amazed — indeed, alarmed — by the carelessness with which they dealt with empirical information and their easy abandonment of logic.  The tendency to equate technical training with scientific is very strong in these Facebook debates, as also the idea that social science and history are some airy-fairy romance that lacks scientific basis.

I am mentioning these features not to put these people down — and I am also aware of, and grateful to, many other medical professionals who expressed unease at these acts of hubris. I wish only to flag what seems to me an emerging axis of power in post-pandemic Kerala. A form in which the state’s apparatus of biopower is projected insistently as the sole benevolent source of human sustenance that must engage us constantly; it is not that critical discourse should be abolished, but it must focus, and gently, on this pre-given object. In it, the biological body is the object on which the state builds its new protectionism; the only kind of body it is bound to protect. The ‘new expert’ wields power on it, and their technical interventions will henceforth be recognized as ‘scientific’  — and the significance of the gap between the two will be ignored. The suspension of neoliberal logic during the pandemic has indeed allowed the Left to behave, even think, like the left — this emerging protectionism seems to be actually riding on it.

It is not surprising at all then that for some of these experts, those of us who contested the purportedly ‘scientific claim’ that Rehana’s children will be necessarily harmed psychologically by the sight of their mother’s exposed torso, or the equally-shaky idea that they necessarily lack the psychological strength the resist the taunts of society, seem dangerous to society.  Rehana’s use of the body is aimed at the long-term; it signals the possibility of seeing the body as the site of aesthetic play and creativity; its androgynous appearance and breaking of stereotypes about the maternal body make it defy gendered classification (so necessary for the state). Her husband deserves punishment because he had abandoned the role of Reformer-Husband so central to the twentieth-century reformist discourse. Our experts’ ‘scientific temperaments’ do not allow them to perceive the fact that the Reformer-Husband carried the burden of ushering his wife into (a gendered) modernity, while in twenty-first century Kerala, women no longer need such ushering — there is data that shows that more women than men complete their education and enter higher education; that they outperform men in most examinations and have entered most modern professions; that in marriages, the bride is now likely to be more educated than the groom. The family needs to be punished as a whole for allowing such explorations of the body.

I still repose faith in the democratizing possibilities that this window of time gives us, but that does not make me blind to this wilful shutting out of the long-term and the agency of citizens. It is as if future society may be imagined by citizens only with or after the state. The state sees a vague and uncertain future, and therefore all citizens should, therefore, limit themselves to the immediate and present. Nothing should be allowed to disrupt the Left’s hegemony-building through pandemic-control exercises. Even if that requires that we turn a blind eye to the fact that the refurbishing of this hegemony may not be antithetical to the further entrenchment of biopower and the reign of these new experts.

 

साझी शहादत-साझी विरासत: वसंत राव और रजब अली को याद करना क्यों जरूरी है ?

वसंतराव और रजब अली। साभार-इंडियन एक्सप्रेस

अहमदाबाद के जमालपुर के पास स्थित वसन्त-रजब चौक कितने लोगों ने देखा है? देखा तो कइयों ने होगा, और आज की तारीख में उससे रोज गुजरते भी होंगे, मगर अंगुली पर गिनने लायक लोग मिलेंगे जिन्होंने चौराहे के इस नामकरण का इतिहास जानने की कोशिश की होगी। मुमकिन है गुजरने वाले अधिकतर ने आज के इस इकहरे वक्त़ में- जबकि मनुष्य होने के बजाय उसकी खास सामुदायिक पहचान अहम बनायी जा रही है- इस ‘विचित्र’ नामकरण को लेकर नाक भौं भी सिकोड़े होंगे।

वह जून 1946 का वक़्त था जब आज़ादी करीब थी, मगर साम्प्रदायिक ताकतों की सक्रियता में भी अचानक तेज़ी आ गयी थी और उन्हीं दिनों यह दो युवा साम्प्रदायिक ताकतों से जूझते हुए मारे गए थे। वसंत राव हेगिश्ते का जन्म 1906 में अहमदाबाद के एक मराठी परिवार में हुआ था तो रजब अली लाखानी एक खोजा मुस्लिम परिवार में कराची में पैदा हुए थे (27 जुलाई 1919) और बाद में उनका परिवार अहमदाबाद में बस गया था। हमेशा की तरह उस साल रथयात्रा निकली थी और उसी बहाने समूचे शहर का माहौल तनावपूर्ण हो चला था।

कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता रहे इन जिगरी दोस्तों ने अपने ऊपर यह जिम्मा लिया कि वह अपने-अपने समुदायों को समझाएंगे कि वह उन्मादी न बनें, इसी काम में वह जी जान से जुटे थे, छोटी बैठकें कर रहे थे, लोगों को समझा रहे थे। 1 जुलाई को एक खांड नी शेरी के पास एक उग्र भीड़ ने – जो जुनूनी बन चुकी थी – उन्हें उनके रास्ते से हटने को कहा और उनके इन्कार करने पर उन दोनों को वहीं ढेर कर दिया। Continue reading साझी शहादत-साझी विरासत: वसंत राव और रजब अली को याद करना क्यों जरूरी है ?

महिला आन्दोलनकारियों की गिरफ्तारियां और भारत सरकार की पितृसत्ता : अमन अभिषेक

Guest Post by Aman Abhishek

Big Brother's Patriarchal Authoritarianism

गुलफीशा फ़ातिमा, सफुरा जरगर, देवांगना कलिता और नताशा नरवाल

दुनिया के जाने-माने प्रोफ़ेसर और पत्रकार डॉक्टर लेता होन्ग फ़िंचर अपनी किताब “बिट्रेइंग बिग ब्रदर: दी फेमनिस्ट अवेकनिंग इन चाइना” में लिखती हैं कि किस तरह चीनी सरकार के द्वारा मार्च 2015 में पांच कार्यकर्तायों की गिरफ्तारी ने चीनी नारीवादी आन्दोलन को एक नया मोड़ दे दिया | जिन पांच महिलाओं को गिरफ्तार किया गया था वे विश्वमहिला दिवस के मौके पर यौन उत्पीडन के खिलाफ बसों और ट्रेनों में पर्चे बाँट रही थी | परन्तु चीनी सरकार ने झगड़े उसकाने के आरोप लगाकर गिरफ्तारी कर ली | इसका परिणाम यह हुआ कि ये पांच महिलाएं “फेमस फाइव” यानी “पांच प्रसिद्ध” के नाम से जानी गई | इन गिरफ्तारियों ने चीनी नारीवादी आदोंलन को कमजोर करने के बजाए एक नयी उर्जा प्रदान की और गिरफ्तारियों के विरोध में बड़े पैमाने पर आन्दोलन शुरू हो गए|

अब भारत में हाल की परिस्थितियों पर गौर करें | दिसम्बर 2019 से मार्च 2020 तक देश के सैकड़ों सार्वजनिक स्थानों पर हजारों आन्दोलनकारियों ने, महिलाओं के नेतृत्व में, सीएए के विरोध में सशक्त और शांतिपूर्ण आन्दोलन किया और लगातार धरना चला | शाहीनबाग जैसे जगहों पर रात दिन धरने चले | देश भर के आन्दोलनकारी उसी सीएए का विरोध कर रहे थे जिसे संयुक्त्त राष्ट्र संघ और और अनेकों मानवाधिकार संगठनों ने मुस्लिम विरोधी और घोर पक्षपातपूर्ण करार दिया है| महिलाओं के नेतृत्व और भागीदारी की वजह से सीएए विरोधी आन्दोलन केवल नागरिकता के सवालों तक सीमित न रहकर भारतीय नारीवादी आन्दोलन के इतिहास में एक अहम कड़ी बन गया |

अप्रैल से भारत सरकार ने सीएए विरोधी आन्दोलन के महिला नेतृत्व की गिरफ्तारियां शुरू कर दी | इन महिलाओं की गिरफ्तारियों की वजह हिंसा भड़काने से लेकर आतंकवाद तक बताई गई | गिरफ्तार लोगों में शामिल गुलफीशा फ़ातिमा मुस्लिम समुदाय की नेता हैं, सफुरा जरगर जामिया मिलिया की छात्रा हैं तथा गिरफ्तारी के वक्त तीन माह से गर्भवती थी | देवांगना कलिता और नताशा नरवाल , पिंजड़ा तोड़ आन्दोलन की संस्थापक हैं (पिंजड़ा तोड़ समूह के कार्यकर्ताओं ने शैक्षणिक संस्थाओं में लैंगिक भेद-भाव और पितृसत्ता के खिलाफ आन्दोलन किया है) | यह गिरफ्तारियां एक वैश्विक महामारी के दौरान की गई है, जो इस महिलाओं की जिन्दगी के लिए घातक साबित हो सकता है | Continue reading महिला आन्दोलनकारियों की गिरफ्तारियां और भारत सरकार की पितृसत्ता : अमन अभिषेक

Why does the Left in Kerala fear Rehana Fathima and not COVID- 19?

Before I start, a request:    Friends who are reading this, if you are close to Noam Chomsky, Amartya Sen, or Soumya Swaminathan, or the other left-liberals who appear in the Kerala government-sponsored talk series from outside Kerala, please do forward this to them? I hope to reach them.

 

The Left government in Kerala is gathering its international intellectual-activist support base to cash on its commendable  — ongoing — success in dealing with the COVID-19 pandemic.  This is not new — it has always been part of the dominant Left’s hegemony-bolstering exercises, especially after the 1990s, when its unquestionable hegemony in Kerala began to face a series of challenges. It has also been forced to pay attention to the oppositional civil society which relentlessly questions the dominant Left’s fundamental understanding of social justice and forces it to take seriously such ideas as freedom, autonomy, as well as identities not reducible to class. Continue reading Why does the Left in Kerala fear Rehana Fathima and not COVID- 19?

Treacherous Road to Make Manu History

Even today the attempt is to whitewash Manusmriti, not shun it. But all is not lost as the ripples of Black Lives Matter have reached Indian shores.

manusmiriti ambedkar hindutva

It was 1927, the second phase of the historic Mahad Satyagrah was on, and Dr. Bhimrao Ambedkar led thousands of people in burning the Manusmriti, an act he compared with the French Revolution of 1789. Time and again, in speeches and writings, he categorically opposed the world-view of Manu, the legendary figure to whom are attributed the tenets of the Manusmriti, said to be dated to around 100 CE.

In the book written by scholar and activist Anand Teltumbde, Mahad: The Making of the First Dalit Revolt, published by Navayana in 2017, is recorded the resolution which was proposed by the social activist Gangadhar Sahasrabuddhe, and then read out at the Mahad Satyagrah. It states that the firm opinion of this conference is that the Manusmriti, “taking into consideration its verses which undermined the Shudra caste, thwarted their progress, and made their social, political and economic slavery permanent…is not worthy of becoming a religious or a sacred book. And in order to give expression to this opinion, this conference is performing the cremation rites of such a religious book which has been divisive of people and destroyer of humanity.”

Twenty three years later, Dr Ambedkar marked the promulgation of the Constitution of India as the “end of the rule by Manu”. And yet, 70 years thereafter, a significant section of Indians are still fascinated by Manu and have no qualms in venerating him. Even the Black Lives Matter protests in the United States and large parts of Europe, in which statues of slave-owners and colonialists are being knocked down or disfigured, the Indian followers of Manu have no regrets about deifying him.

( Read the full article here)

कोविड संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए मलप्पुरम ने नई ज़मीन तोड़ी है

आज जब पूरे देश में धार्मिक स्थलों को खोला जा रहा है, तब बीते दिनों ‘सांप्रदायिक’ होने का इल्ज़ाम झेलने वाले केरल के मलप्पुरम ज़िले ने अपनी अलग राह चुनी है. कोरोना के बढ़ते मामलों के मद्देनज़र वहां की पांच हज़ार मस्जिदों को अनिश्चितकाल तक बंद रखने समेत कई धार्मिक स्थलों को न खोलने का फ़ैसला लिया गया है.

Minara masjid wears a deserted look on the first day of the holy fasting month of Ramzan, amid unprecedented circumstances due to the coronavirus pandemic and a nationwide lockdown, in Mumbai. PTI

लॉकडाउन के दौरान बंद एक मस्जिद. (फाइल फोटो: पीटीआई)

मलप्पुरम, केरल के एकमात्र मुस्लिम बहुल जिले, जहां उनकी आबादी 75 फीसदी है, ने एक इतिहास रचा. तय किया गया है कि जिले की 5,000 मस्जिदें अनिश्चितकाल के लिए बंद रहेंगी.

इस निर्णय के पीछे का तर्क समझने लायक है. क्योंकि राज्य में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बढ़ते दिख रहे हैं, इसलिए यह तय करना मुनासिब समझा गया कि उसके दरवाजे श्रद्धालुओं के लिए बंद ही रहें.

जाने-माने इस्लामिक विद्वान पनक्कड सययद सादिक अली शिहाब थंगल, जो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के जिला अध्यक्ष हैं, उन्होंने इस खबर को मीडिया के एक हिस्से में साझा किया.

इस तरह जबकि बाकी मुल्क में प्रार्थनास्थल, धार्मिक स्थलों को खोला जा रहा है, मलप्पुरम ने अपनी अलग राह चुनी है.

इस बात पर जोर देना जरूरी है कि आठ मुस्लिम संप्रदायों (denomination) की उस बैठक में, जहां 9 जून के बाद प्रार्थनास्थलों को खोलने के सरकारी निर्णय पर विचार करना था, यह फैसला एकमत से लिया गया.

सभी इस बात पर सहमत थे कि उन्हें इस छूट का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. एक ऐसे वक्त में जबकि कोविड-19 के मामले सूबे में बढ़ रहे हों, मस्जिद कमेटियों और धार्मिक नेताओं ने यह जरूरत महसूस की कि उन्हें सतर्कता बरतनी चाहिए.

खबरें यह भी आ रही हैं कि न केवल मस्जिदें बल्कि इलाके के कई मंदिरों और चर्च ने भी उन्हें तत्काल खोलना नहीं तय किया है.

मिसाल के तौर पर, श्री कदमपुजा भगवती मंदिर जो मलप्पुरम में है तथा श्री तिरूनेल्ली मंदिर जो वायनाड में है, वह बंद रहेंगे.

नायर सर्विस सोसायटी से संबंधित मंदिर भी 30 जून तक नहीं खुलेंगे. एर्नाकुलम-अंगमाली आर्चडाओसिस ऑफ सिरो मलबार चर्च ने भी तय किया है कि उसके मातहत चर्च 30 जून तक बंद रहेंगे.

निस्संदेह इस बात को लेकर इलाके के लोगों में गहरा एहसास दिख रहा है कि राज्य ने जिन भी सावधानियों को बरतने की बात की हो, स्पेशल ऑपरेटिंग प्रोसिजर्स का ऐलान किया है, हकीकत में उन पर अमल करना नामुमकिन होगा लिहाजा कोविड-19 के समुदाय आधारित संक्रमण की संभावना बनी रहेगी.

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Online Education, the Latest Stage of Educational Apartheid: Maya John

Guest post by MAYA JOHN

Given the rampant social and economic inequalities in our society, education has been seen by majority of the common masses as a tool for moving up the social ladder. Their aspirations for higher segment jobs and status constitute the largest component of the growing demand for higher education.Nevertheless, the opinion of the dominant classes that the state cannot pay for the education of all has come to enjoy hegemonic status, resulting in the lack of adequate development of educational infrastructure to meet the rapidly growing demand.In response to the widening gap between the demand and supply for education, successive governments have pushed through measures that allow for greater penetration of private capital in higher education, and its corollary, the persistent decline in per capita government allocation of funds towards education. Consequently, private colleges and universities have mushroomed across the country. Likewise,the expansion of the open and distance learning (ODL) mode and mainstreaming of e-learning have been consistently projected by policy makers as credible alternative routes to accessing higher education when higher educational institutions (HEIs) are not within reasonable distance, or when students do not have the marks or financial condition to enroll in formal education.

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Statement against the arrest of Pinjra Tod Activists, Devangana Kalita and Natasha Narwal: Students Against Fascism, Johns Hopkins University

Statement by Students Against Fascism, Johns Hopkins University, USA. Students Against Fascism is a group of international students at Johns Hopkins University (Baltimore, USA), which aims to build solidarities against fascism across borders.

We have been deeply saddened by the recent arrests of Natasha Narwal and Devangana Kalita, the founding members of the Feminist group, Pinjra Tod. At a time, when the entire country has been dealing with the pandemic of COVID-19 and the economic hardships of the lockdown, it is of extreme concern to see that the Indian state is selectively targeting the human rights activists who have been raising their voices against the pro-Hindutva fascist policies of the Indian state.

It is abundantly clear that these arrests are a part of the series of the crackdown on the activists, who have particularly been vocal against the CAA and anti-Muslim violence in north-east of Delhi, including Umar Khalid, being threatened with sedition charges alongside other protestors like Shifa-ur-Rahman, President of Jamia Alumni Association and Zafarul Khan, Chairman of Delhi Minorities Commission. In connection with this, it is also extremely disturbing to see the arrest of student activists Safoora Zargar, Meeran Haider and Asif Iqbal Tanha of Jamia Milia Islamia University and activists Gulfisha Fatima, Khalid Saifi and Ishrat Jahan, under the Unlawful Activities Prevention Act. This arbitrary branding of students and activists, particularly Muslim and women student activists, as “terrorists”, instead of investigating into the anti-Muslim violence in north-east Delhi and bringing the perpetrators to justice indicates the deepening of authoritarian tendencies in the Indian state. Pinjra Tod’s Natasha and Devangana’s arrests are the latest examples of this dangerous trajectory. Continue reading Statement against the arrest of Pinjra Tod Activists, Devangana Kalita and Natasha Narwal: Students Against Fascism, Johns Hopkins University

असहमति के दमन के लिए मानवाधिकार-कर्मियों और लेखकों-पत्रकारों की गिरफ्तारियों का सिलसिला बंद करो! 

राजनीतिक उत्पीड़न और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए तालाबंदी के इस्तेमाल के ख़िलाफ़ सांस्कृतिक-सामाजिक संगठनों का संयुक्त आह्वान

महामारी से मुक्ति के लिए जनएकजुटता का निर्माण करो!

तालाबंदी के दौरान जेलबंदी

महामारी और तालाबंदी के इस दौर में समूचे देश का ध्यान एकजुट होकर बीमारी का मुक़ाबला करने पर केन्द्रित है.

लेकिन इसी समय देश के जाने माने बुद्धिजीवियों, स्वतंत्र पत्रकारों, हाल ही के सीएए-विरोधी आन्दोलन में सक्रिय रहे राजनीतिक कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं की ताबड़तोड़ गिरफ़्तारियों ने नागरिक समाज की चिंताएं बढ़ा दी हैं.

बुद्धिजीवियों और राजनैतिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारियां सरकारी काम में बाधा डालने (धरने पर बैठने) जैसे गोलमोल आरोपों में और  अधिकतर विवादास्पद यूएपीए क़ानून के तहत की जा रही हैं. यूएपीए कानून आतंकवाद से निपटने के लिए लाया गया था. यह विशेष क़ानून ‘विशेष परिस्थिति में’ संविधान  द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों को परिसीमित करता है. जाहिर है, इस क़ानून का इस्तेमाल केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए जिनका सम्बन्ध आतंकवाद की किसी वास्तविक परिस्थिति से हो. दूसरी तरह के मामलों में इसे लागू करना संविधान के साथ छल करना है. संविधान लोकतंत्र में राज्य की सत्ता के समक्ष नागरिक के जिस अधिकार की गारंटी करता है, उसे समाप्त कर लोकतंत्र को सर्वसत्तावाद में बदल देना है.

गिरफ्तारियों के लगातार जारी सिलसिले में सबसे ताज़ा नाम जेएनयू की दो छात्राओं, देवांगना  कलिता और नताशा नरवाल के हैं. दोनों शोध-छात्राएं प्रतिष्ठित नारीवादी आन्दोलन ‘पिंजरा तोड़’ की संस्थापक सदस्य भी हैं.  इन्हें पहले ज़ाफ़राबाद धरने में अहम भूमिका अदा करने के नाम पर 23 मई को गिरफ्तार किया गया. अगले ही दिन अदालत से जमानत मिल जाने पर तुरंत अपराध शाखा की स्पेशल ब्रांच द्वारा क़त्ल और दंगे जैसे आरोपों के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया ताकि अदालत उन्हें पूछ-ताछ के लिए पुलिस कस्टडी में भेज दे. आख़िरकार उन्हें दो दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया गया है. Continue reading असहमति के दमन के लिए मानवाधिकार-कर्मियों और लेखकों-पत्रकारों की गिरफ्तारियों का सिलसिला बंद करो! 

प्रार्थना स्थलों पर लाउडस्पीकर पर प्रतिबंध

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कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय.
ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय

क्या अपने ‘खुदा’ को आवाज़ देने के लिए बांग देने की जरूरत पड़ती है ?

आज से छह सदी पहले ही कबीर ने यह सवाल पूछ कर अपने वक्त़ में धर्म के नाम पर जारी पाखंड को बेपर्दा किया था. पिछले दिनों यह मसला नए सिरे से उछला जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस बारे में एक अहम फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि अज़ान अर्थात प्रार्थना के लिए आवाज़ देने की बात इस्लाम का हिस्सा है लेकिन वही बात लाउडस्पीकर के इस्तेमाल के बारे में नहीं कही जा सकती, लिहाजा रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल के इजाजत नहीं दी जा सकती.

अदालत के मुताबिक मुअज्जिन मस्जिद की मीनार से अपनी मानवीय आवाज़ में अज़ान दे सकता है और उसे महामारी रोकने के लिए राज्य द्वारा लगायी गयी पाबंदियों के तहत रोका नहीं जा सकता, अलबत्ता उसके लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल वर्जित रहेगा.

ध्यान रहे कि अदालत यूपी पुलिस द्वारा जगह-जगह मनमाने ढंग से अज़ान पर लगायी गयी पाबंदी के खिलाफ दायर याचिका पर विचार कर रही थी. हाथरस, अलीगढ़ आदि स्थानों पर महामारी के कानूनों का हवाला देते हुए पुलिस वालों ने अज़ान देने पर ही पाबंदी लगायी थी, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था.

उम्मीद है कि अदालत के फैसले के मद्देनज़र यूपी पुलिस मनमाने तरीके से अज़ान पर नहीं रोक लगाएगी, निश्चित ही यह सुनिश्चित करेगी कि इसके लिए किसी ध्वनिवर्द्धक यंत्र का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है.

गौरतलब है कि अदालत ने संविधान के तहत प्रदत्त बुनियादी अधिकारों में शामिल आर्टिकल 19/1/ए का हवाला देते हुए जो इस बात को सुनिश्चित करता है कि‘किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह अन्य लोगों को बन्दी श्रोता (captive listeners) बना दें’ यह निर्देश दिया.

निश्चित ही मस्जिदों में जहां बिना अनुमति के लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल पर पाबंदी रहेगी, वही बात मंदिरों, गुरुद्धारों या अन्य धार्मिक स्थलों पर भी लागू रहेगी ताकि आरती के बहाने या गुरुबाणी सुनाने के बहाने इसी तरह लोगों को ‘बन्दी श्रोता’ मजबूरन न बनाया जाए. ( Read the full article here :https://hindi.theprint.in/opinion/allahabad-high-court-ban-loudspeakers-at-prayer-places-exposes-hypocrisy-in-the-name-of-faith/140765/)