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एक अनोखी रात: मुरीद बरघूती/अनुवाद: आयेशा किदवई

You can see the English translation by Radwa Ashour of the original poem in Arabic by the Palestinian poet Mourid Barghouti , after this translation into Hindustani by AYESHA KIDWAI

एक अनोखी रात

उसकी उंगली दरवाज़े की घंटी को बस छूनेवाली है

दरवाज़ा, बहुत ही आहिस्ता आहिस्ता,

खुलता है.

वो अंदर आता है.

अपने कमरे में जाता है.

है तो, यहां:

उसकी तस्वीर, उसके नन्हे से पलंग के बराबर

उसका स्कूल का बस्ता, अँधेरे में,

जागता हुआ.

अपने आप को सोते हुए देखता है

दो ख़्वाबों के दरमियाँ, दो झंडों के.

वो सभी दरवाज़ों को खटखटाता है

— खटखटाने वाला था. पर नहीं.

सब उठ जाते हैं:

“लौट आया!”

“ख़ुदा कसम, लौट आया!,” चिल्लाते हैं

पर उनके शोर से कोई आवाज़ नहीं मचती.

बाहें फैलाते हैं मोहम्मद को समेटने के लिए

पर उनके हाथ उसके कन्धों तक पहुंचते नहीं. Continue reading एक अनोखी रात: मुरीद बरघूती/अनुवाद: आयेशा किदवई