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सब चंगा सी: मुरीद बरघूती/अनुवाद: आयेशा किदवई

You can see the English translation by Radwa Ashour of the original poem in Arabic by the Palestinian poet Mourid Barghouti , after this translation into Hindustani by AYESHA KIDWAI

The Roadmap Creeps in the Page of My Notebook by Arpita Singh

सब चंगा सी

मैं अपने आप को देखता हूँ:

सब चंगा सी.

अच्छा ही तो दिखता हूँ,

और कुछ लड़कियों को तो,

मेरे पक्के बाल भी भा जाएं;

मेरा चश्मा सुड़ौल है,

शरीर का तापमान ठीक ३७ डिग्री.

इस्त्री-की हुई कमीज़ है मेरी, और मेरे जुते काटते नहीं.

सब चंगा सी. Continue reading सब चंगा सी: मुरीद बरघूती/अनुवाद: आयेशा किदवई

यह भी तो ठीक है : मुरीद बरघूती/अनुवाद: आयेशा किदवई

You can see the English translation by Radwa Ashour of the original poem in Arabic by the Palestinian poet Mourid Barghouti , after this translation into Hindustani by AYESHA KIDWAI

http://www.metmuseum.org/art/collection/search/454359

“The Death of King Dasharatha, the Father of Rama”, Folio from a Ramayana ca. 1605. Courtesy the Metropolitan Museum of Modern Art

 

ऐसे मरना भी ठीक है, अपने बिस्तर में

साफ़ तकिया पर सर रखे

अपने दोस्तों के बीच.

ऐसे मरना भी तो ठीक है,

चाहे एक बार ही सही,

हाथ सीने पर बांधे हुए,

खाली, बेरौनक़,

बिन एक भी खरौंच के,

बिन बेड़ियों के,

बिन बैनर उठाये,

बिन याचिका दिए. Continue reading यह भी तो ठीक है : मुरीद बरघूती/अनुवाद: आयेशा किदवई

एक अनोखी रात: मुरीद बरघूती/अनुवाद: आयेशा किदवई

You can see the English translation by Radwa Ashour of the original poem in Arabic by the Palestinian poet Mourid Barghouti , after this translation into Hindustani by AYESHA KIDWAI

एक अनोखी रात

उसकी उंगली दरवाज़े की घंटी को बस छूनेवाली है

दरवाज़ा, बहुत ही आहिस्ता आहिस्ता,

खुलता है.

वो अंदर आता है.

अपने कमरे में जाता है.

है तो, यहां:

उसकी तस्वीर, उसके नन्हे से पलंग के बराबर

उसका स्कूल का बस्ता, अँधेरे में,

जागता हुआ.

अपने आप को सोते हुए देखता है

दो ख़्वाबों के दरमियाँ, दो झंडों के.

वो सभी दरवाज़ों को खटखटाता है

— खटखटाने वाला था. पर नहीं.

सब उठ जाते हैं:

“लौट आया!”

“ख़ुदा कसम, लौट आया!,” चिल्लाते हैं

पर उनके शोर से कोई आवाज़ नहीं मचती.

बाहें फैलाते हैं मोहम्मद को समेटने के लिए

पर उनके हाथ उसके कन्धों तक पहुंचते नहीं. Continue reading एक अनोखी रात: मुरीद बरघूती/अनुवाद: आयेशा किदवई