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एन आर सी और उससे जुड़े चंद सवाल : सबीहा फ़रहत

Guest post by SABIHA FARHAT

[भारतीय-हिन्दू मिथकों और परम्परा पर लंबे समय से लिखते आ रहे  बुद्धिजीवी श्री देवदत्त  पट्टनायक  अपनी एक ट्वीट में  एक लाजवाब  बात  कही . उनहोंने कहा कि जहाँ हिन्दू धर्मं  का मतलब  वसुधैव  कुटुम्बकम है , उसके  लिए  अगर  समूची वसुधा , सारी एक कुनबा  है , वहीँ  हिंदुत्व  का मतलब  सिर्फ़  एन आर सी  (यानी नागरिकों की राष्हैट्रीय फेहरिश्त ) है. बिलकुल दो शब्दों में  , बड़ी खूबसूरती  से पट्टनायक साहब ने इन दोनों  फलसफों के बीच का फर्क़ खोल कर सामने रख दिया  है. इस  संक्षिप्त लेख में   डाक्यूमेंट्री  फ़िल्मकार  और पत्रकार  सबीहा फ़रहत  उसी एन आर सी  से पैदा हुए  चंद सवाल उठा रही हैं.]

आजकल अमित शाह केवल एनआरसी पर स्टेटमेंट दे रहे हैं। “घुसपैठियों ” को बाहर फेंक देंगे और हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी को नागरिकता दे देंगें। फिर चाहे उसके लिये संविधान को तक पर रख  कर सिटीज़नशिप ऐक्ट ही क्यों ना बदलना पड़े!

उनकी इस बात से साफ़ ज़ाहिर है कि देश के 16 करोड़ मुसलमान ही “घुसपैठिये” हैं। “दीमक” हैं और उन्हें देश से बाहर खदेड़ने की ज़रूरत है। लेकिन सिर्फ़ मुसलमान से इतनी नफ़रत क्यों? मुसलमान ने इस देश का क्या बिगाड़ा है? क्या उसने किसी की रोटी छीनी, किसी की नौकरी छीनी, किसी का बिज़नेस हड़प लिया। नहीं! क्योंकि अगर वो ऐसा करता तो आर्थिक तौर पर सबसे ज़्यादा कमज़ोर नहीं होता।

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