लखनऊ और फैज़: अतुल तिवारी

Guest posy by ATUL TIWARI

(प्रगतिशील लेखन के आंदोलन से जुडे हुए प्रसिद्ध पटकथा लेखक
अतुल तिवारी ने यह लेख लाहौर में आयोजित फैज़ शताबदी समारोह में प्रस्तुत किया था और फिर दिल्ली में थिंक इंडिया मैगज़ीन के फैज़ नम्बर की रिलीज के समय होने वाले कार्यक्रम में भी उन्होंने यह लेख प्रस्तुत किया । काफिला के लिए लेखक की अनुमति से प्रकाशितThe English translation is given below the Urdu original. – SH)

“हज़रात!

ये जलसा हमारी अदब की तारीख़ में एक यादगार वाक़या है।  हमारे सम्मेलनों,अंजुमनों में – अब तक, आम तौर पर – ज़ुबान और उसकी अशात अत से बहस की जाती रही है। यहाँ तक कि उर्दू और हिंदी का इब्तेदाई लिटरेचर – जो मौजूद है – उसका मंशा ख़यालात और जज़्बात पर असर डालना नहीं, बल्कि बाज़ ज़ुबान की तामीर था।…लेकिन ज़ुबान ज़रिया है मंजिल नहीं ।

…अदब की बहुत सी तारीफें की गयीं हैं।  लेकिन मेरे ख़याल से इसकी बेहतरीन तारीफ़ “तनक़ीद-ए-हयात” है – चाहे वो मकालों की शक्ल में हो। या अफसानों की। या शेर की। इससे हमारी हयात का तब्सिरा कहना चाहिए।

हम जिस दौर से गुज़रें हैं उसमें…लिटरेचर का ज़िन्दगी से कोई तालुक़ है- इसमें कलाम हि न था। इश्क़ का मियार नफ्स-परवरी था और हुस्न कादीदा-ज़ेबी। इन्हीं जिंसी जज़्बात के इज़्हार में शोरा अपनी जिद्दत औरजीलानी के मोजिज़े दिखाते थे…और आज भी वो शायरी किस क़दर मकबूल है, ये
आप और हम खूब जानते हैं।

क्या वो अदब – जिसमें दुनिया और दुनिया की मुश्किलात से किनाराकश होना ही – ज़िंदगी का माहिस्ल समझा गया हो, हमारी ज़ेहनी और जज़्बाती ज़रूरतों को पूरा कर सकता है? जिंसियात इंसान का एक जुज़्व है, और जिस अदब का बेशतर हिस्सा – इसी से मुताल्लिक हो – वो उस कौम और ज़माने के लिए फ़ख्र का बाईस  नहीं हो सकता।

जो हम में सच्चा इरादा और मुश्किलात पर फ़तेह पाने के लिए सच्चा इस्तक्लाल न पैदा करे – वो अदब आज हमारे लिए बेकार है।

”तरक्की पसंद मुसन्नफीन का उन्वाँ मेरे ख़याल से नाक़िस है। अदब या आर्टिस्ट, तबन और ख्स्ल्तन तरक्की पसंद होता है। अगर ये उस की फितरत न होती तो शायद वो अदीब न होता।

अब हमें हुस्न का मियार तब्दील करना होगा। फ़ाक़ा और उरियानी में भी हुस्न का वजूद हो सकता है – इसे अदब तस्लीम नहीं करता। हुस्न हसीं औरत में है – उस बच्चे वाली ग़रीब बे-हुस्न औरत में नहीं, जो बच्चे को खेत की मेड़ पर सुलाए, पसीना बहा रही है। अदब ने तय कर लिया है कि रंगे होठों और रुखसारों और अबरूओं में फिलवाकई हुस्न का वास है – उलझे हुए बालों, पपड़ियाँ पड़े होठों और कुम्भ्लाये हुए रुखसारों में हुस्न का गुज़र कहाँ? – लेकिन ये उसकी तंग-नज़री का कुसूर है।

जब हम इस माशरत को बर्दाशत न कर सकेंगे कि हज़ारों इंसान एक जाबिर की ग़ुलामी करें – तब हमारी ख़ुद्दार इंसानियत इस सरमायेदारी, अस्करियत और मलूकियत के खिलाफ अल्म-ए-बगावत बुलंद करेगी। तभी हम सिर्फ सफ-ए-काग़ज़ पर तखलीक करके खामोश न हो जायेंगे।

अदीब का मिशन महज़ निशात और महफ़िल आराई और तफरीह नहीं है। उस का मर्तबा इतना न गिराइए। वो वतानियत और सियासियत के पीछे चलने वाली हक़ीक़त नहीं – बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली हक़ीक़त है।

जब तक अदब का काम महज़ तफरीह का सामान पैदा करना, महज़ लोरियां गा कर सुलाना, महज़ आंसू बहा कर ग़म ग़लत करना था – उस वक़्त तक अदब के नए अमल की ज़रुरत न थी। वो दीवाना था जिसका ग़म दुसरे खाते थे। मगर हम अदब को महज़ तफरीह और तय्युश की चीज़ नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही अदब खरा उतरेगा जिस में तफ़क्कुर हो, आज़ादी का जज़्बा हो, हुस्न का जौहर हो, तामीर की रूह हो, ज़िंदगी की हक़ीक़तों की रौशनी हो – जो  हम में हरकत और हंगामा और बेचैनी पैदा करे – सुलाए नहीं – क्यूंकि अब और ज्यादा सोना मौत की अलामत होगी।”

दोस्तों, ऑफ़कोर्स ये मेरे अलफ़ाज़ नहीं हैं, न मेरा अंदाज़…काश…!

जो मैंने यहाँ पढ़ा यह, वो गुरबाणी थी, वो कलमा, वो गायत्रीमंत्र था – जो १० अप्रैल १९३६ के दिन, शहर लखनऊ में, धनपत राय नाम के आदमी ने – फैज़ के कानों में फूँका था। पी.डब्ल्यू.ऐ की पेहली कांफेरेंस में मुंशी प्रेमचंद का ये इनौगुएरल एड्रेस, हिन्दुस्तान के अदब की ही नहीं, आर्ट्स की, थियेटर
की, फिल्मों की और पोलिटिक्स की भी तस्वीर बदलने वाला क्षण/लम्हा साबित होने वाला था। और ये महज़ इत्तेफाक़ न था कि फैज़ इतनी दूर – पंजाब – से आके उस दिन लखनऊ में मौजूद थे। अभी अभी फैज़ सिर्फ पच्चीस के हुए थे, – जवान थे, जोशीले थे, इम्प्रेस्सिव थे, और इम्प्रेशनेब्ल भी। और लखनऊ ने उनपर जो छाप छोड़ी, जो रिश्ता उनसे बनाया – वो एक लाइफ लॉन्ग रिलेशनशिप बनने जा रहा था।

असल में लखनऊ से उनके गहरे रिश्ते की बुनियाद उसी दिन पड़ गयी थी जिस दिन डॉ. रशीद जहाँ, अमृतसर छोड़ के लखनऊ चली आयीं थीं। डॉ. रशीद जहाँ के नाम और शक्सियत से आप में से कौन वाकिफ़ नहीं है। अफ़साना-निगर, नाटक-कार, डॉक्टर और सबसे बढ़ कर एक कमिटेड कोमरेड। १९३२ में शाया हुई ‘अंगारे’ की तपिश पूरे हिन्दुस्तान में पहुंच चुकी थी। और १९३३ में जब वो किताब अंग्रेजों ने बैन कर दी, तो डॉ. रशीद जहाँ की प्रसिद्धि उन जगहों, लोगों, और हलाकों तक भी पहुँच गयी जो उन्हें अब तक नहीं जानते थे। उनके शौहर – दानिशवर-विद्वान- कम्युनिस्ट कॉमरेड. मह्मूदुज्ज़फर ज़फ़र जब लाहोर के एम्.ऐ.ओ कॉलेज में वाइस प्रिंसिपल हुआ करते थे, उन्हीं दिनों जवान फैज़ भी, अंग्रेज़ी- अरबी में एम्.ऐ करने के बाद वहीं लेक्चरार मुक़र्रर हुए थे। डॉ. रशीद जहाँ और कॉमरेड मह्मूदुज्ज़फर ने ही सबसे पहले फैज़ को तर्रक्कीपसंद ख्यालों, आन्दोलन और मर्क्सिस्म से भी जोड़ा था।

ऐसी मेंटर के लखनऊ चले आने से, फैज़ शायद वैसे भी लखनऊ कि तरफ रुख करना चाह रहे होंगे। और पी.डब्ल्यू.ऐ की पेहली कांफेरेंस ने फैज़ को इस कदर खींचा के  – सिर्फ एक तरफ का किराया जेब में लिए – फैज़ लखनऊ चले आये।

पी.डब्ल्यू.ऐ कि पेहली कांफेरेंस के न सिर्फ कन्वीनर बल्कि पीर-बावर्ची-भिश्ती-खर सब थे जनाब सज्जाद ज़हीर साहिब। इनसे भी फैज़ की पहली मुलाक़ात अमृतसर में डॉ. रशीद जहाँ करवा चुकी थी। मगर सज्जाद ज़हीर के होम ग्राउंड – लखनऊ में – उनकी अज़ीम चुम्बक जैसी शख्सियत से फैज़ और ज्यादा मुत्तासिर हुए। बेहरहाल पी.डब्ल्यू.ऐ कांफेरेंस ख़तम होने पर, डॉ. रशीद जहाँ से ट्रेन का किराया लेकर, फैज़ लाहोर को लौट गए… पर लखनऊ से उनका ऐसा गहरा नाता बन चूका था के अब तो जब भी मौका मिले लखनऊ फैज़ की रह देखता था और फैज़ लखनऊ आने की ।

उन दिनों का लखनऊ भी कोई आम शहर नहीं था। ये शहर था अनवर जमाल किदवाई का, सिब्ते हसन का, फरहतुल्लाह अंसारी का, अली जवाद ज़ैदी का, यशपाल का, डॉ. अशरफ और डॉ. ज़ेड.ऐ. अहमद का लखनऊ। इस लखनऊ में जहाँ ‘नैशनल हेराल्ड’, ‘द पाईनियर’, ‘हिन्दुस्तां’, ‘विप्लव’ और ‘नया-अदब’ जैसे अखबार और रिसाले निकलते थे, वहीं लखनऊ यूनीवर्सिटी के वाइस चान्सेल्लर शेख हबीबुल्लाह का घर, प्रोफ. डी.पी. मुखर्जी का क़ुतुबखाना जैसी जगहें भी थीं, जहां नौ-उम्र राइटरों की बेबाक बहसों के अड्डे जमा करते थे। उधर हज़रतगंज के कॉफ़ी हाउस, रेस्टुरंट्स, मैखाने, अमीनाबाद के चायखाने और किताब कि दुकानें, और चौक के कहवा-खाने भी कम मशहूर नहीं थे।

दिसंबर १९४१ को एक बार फिर, ऑफिशियली लखनऊ आने का मौका फैज़ साहिब को तब मिला – जब ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ के डाइरेक्टर सोमनाथ चिब साहिब ने – फैज़ को लखनऊ आने और नौवारिद शोरा के मुशायरे में अपना कलाम सुनाने के दावत दी। जोश मलिहाबादी उस मुशायरे की सदारत कर रहे थे – मगर आज वो अपनी नज़्म सुनाने नहीं – बल्कि बाकियों कि तरह नौ-उम्र तर्रक्कीपसंद शायरों का कलाम सुनने आये थे। ऑफ़कोर्स सुनने वाले लखनऊ के परसतारों में फैज़ के दोस्त सज्जाद ज़हीर अपनी बीवी रज़िया के साथ मौजूद थे। और सुनाने वालों में – तो लग रहा था की तर्रक्कीपसंद शोरा कि पूरी फेहरिस्त मौजूद थी – जिनमे मजाज़ थे, जज़्बी थे, जां निसार अख्तर थे, अली सरदार जाफरी थे और फैज़ अहमद ‘फैज़’ थे।

अभी-अभी जेल से छूट के आये सज्जाद ज़हीर कि मौजूदगी ने जैसे सारे शायरों में एक नया जज़्बा, नया एहसास, नयी जुबां और नया जोश भर दिया था। मुशाएरा बहुत हि कामयाब रहा, ये कहना ज़रूरी नहीं है। पर दिसंबर कि उस सर्द रात में मुशायरे के बाद दोस्तों की एक महफ़िल और भी जमी और वहाँ इन सारे हम कारवां – कोमरेड-इन-आर्म्स की गरमजोशी का जो ज़िक्र अली सरदार जाफरी साहिब ने किया है, वो सुनने के काबिल है। जाफरी साहिब लिखते हैं “कंधारी लेन के उस घर में फर्नीचर के नाम पर एक मेज़, बेंतकी  चंद कुर्सियां, और मूंज के ३ पलंग थे। उन्हें किनारे सरका के ज़मीन पर चटायिओं का फर्श बिछा दिया गया था। कार्निस के ऊपर स्पेन कि एक मुजाहिद खातून की  बड़ी सी तस्वीर लगी थी। उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थी, सीना उभरा हुआ, जिसकी दोशीज़गी को फौजी लिबास भी नहीं छुपा सकता था। तस्वीर के नीचे लिखा था ‘टू डेथ’। दो औंधी बाल्टियों पर जलती हुई मोम्बतियों कि रौशनी में यह तस्वीर और भी ज्यादा पूरहौसला और दिलावेज़ मालूम होती थी…महफ़िल कि गर्मी बढ़ती गयी, दिलों का सुरूर बढ़ता गया, चेहरे ज्यादा रोशन होते गए। एक दुसरे कि तारीफ़ें इस तरह हो रहीं थीं जैसे आशिक़-माशूक़ सरगोशियाँ कर रहें हों। तभी फैज़ ने कहा ‘भाई, लाहोर में एक बहुत अच्छा शेर सुना था, मालूम नहीं किसका है-

जब कश्ती साबित-ओ-सालिम थी, साहिल कि तमन्ना किसको थी,
अब ऐसी शिकस्ता कश्ती पर, साहिल कि तमन्ना कौन करे

जज़्बी का उदास चेहरा फूलों कि तरह खिल गया। ये जज़्बी का शेर था जो उस से पहले लखनऊ से लाहोर पहुँच कर मशहूर हो चूका था। फैज़ और जज़्बी गले मिले। अभी फैज़ को बैठने कि फुरसत नहीं मिली थी कि, जज़्बी ने बग़ैर किसी तम्हीद के फैज़ कि नज़्म ‘मौज़ू-ए-सुखन’ को तरन्नुम के साथ पढ़ना शुरू कर दिया –

गुल हुई जाती है अफसुर्दा सुलगती हुई शाम
धुल के निकलेगी अभी चश्म-ए-मेहताब से रात
और मुश्ताक निगाहों कि सुनी जायेगी
और उन होठों से मस होंगे ये तरसे हुए होंठ

जज़्बी ने पहला बंद पढ़ा ही था के  मजाज़ ने दूसरा बंद उठा लिया और अपना राग छेड़ दिया। फिर तो दोनों ने बारी-बारे एक एक बंद गा कर फैज़ के नज़्म मुकम्मल कि। फैज़ के चेहरे पर एक मासूम और तश्क्कुर आमेज़ मुस्कराहट थी। एक शायर के लिए इससे बेहतर दाद क्या हो सकती थी?”

और ये शायद लखनऊ में हि मुमकिन था। इस रात ने फैज़ पर कितना असर छोड़ा था ये इसी से साबित होता है कि १२ साल बाद हैदराबाद जेल से ‘प्यारी भाभी रज़िया’ को लिखे एक ख़त में भी उन्होंने इस रात का ज़िक्र किया है।

इसके बाद तो देश और दुनिया के हालात बहुत तेज़ी से बदलने लगे थे। सेकण्ड वर्ल्ड वॉर,  कुइट  इंडिया, डू और डाए, आज़ादी और तकसीम या…तकसीम और आज़ादी। मगर इस सारे झमेले और झंझट में भी कहीं न कहीं अपने फ्रेंड-फिलोस्फर-गाइड सज्जाद ज़हीर की डोर के ज़रिये फैज़ लखनऊ से जुड़े ही रहे। और उस “दाग़-दाग़ उजाले, उस शब् गज़ीदा सहर” की आमद के बाद तो जैसे लखनऊ और लाहोर की ये दोस्ती और परवान चढ़ आयी।

हालांकि नक़्शे पे खिंची एक लकीर ने दो मुल्क बना दिए थे, दो परचम, दो निजाम अब हमारे सबकोंटीनेंट की हकीकत बन चुके थे मगर कुछ लोग अभी भी ये कह रहे थे – ”देश कि जनता भूखी है ये आज़ादी झूठी है”। इन्ही लोगों में थे फैज़, और पाकिस्तान में कौम्युनिस्ट मूवमेंट को दोबारा कायम करने के लिए इंडिया से भेजे गए उनके दोस्त, हमसाया बड़े भाई सज्जाद ज़हीर। अभी अंग्रेजों से आज़ादी मिले ४ साल भी न गुज़रे थे कि ५१’ में फैज़ और सज्जाद ज़हीर को दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया। अगले ४ साल इन दोनों साथियों को पाकिस्तान की नामालूम कितनी जेलों में, न जाने कितनी अज़ीयतें सहते हुए रहना पड़ा। तन्हाई तक की सजा से दोनों को गुज़रना पड़ा। इस बात का तस्सवुर कर के भी जी काँप जाता है कि अगर जेल के इस तनहा सफ़र में इस पंजाब वाले के साथ वो अवध वाला न होता तो दोनों पे क्या बीती होती। और शायद अगर लाहोर और लखनऊ का ज़िन्दां में साथ न होता तो – बहुत सी वो चीज़ें फैज़ के यहाँ पैदा ही न होतीँ जो उनके जेल में गुज़ारे दिनों कि मरहून-ए-मिन्नत हैं। इसी दौर में, २२ मई १९५२ में रज़िया सज्जाद ज़हीर के एक ख़त के जवाब में फैज़ साहिब लिखते हैं, “आपने पुछा है कि लखनऊ मैंने देखा है या नहीं? देखा तो ज़रूर है, पर ज्यादा देखने की हवास है। लखनऊ मैं कई दफा गया – दो तीन दिन के लिए आपके घर भी रह चूका हूँ – लेकिन कभी भी एक-आध दिन से ज़्यादा रुक नहीं सका। हर बार तस्कीन के बजाये, प्यास का एहसास लेके लौटा हूँ।”

पाकिस्तान की जेल से छूट के सज्जाद ज़हीर हिन्दुस्तान पहुँच गए, पर अपने-अपने मुल्कों में दोनों कि गिरफ़्तारियों का सिलसिला नहीं थमा। और न थमी इन दोनों कि दोस्ती। फैज़ जब भी लखनऊ आते वज़ीर हसन रोड पे सज्जाद और रज़िया ज़हीर के घर ज़रूर जाते। सज्जाद ज़हीर साहिब की चारों बेटियां भी फैज़ के लिए अपनी बेटियों कि तरह थीं। इन दो आला हस्तियों कि दोस्ती कि गहराई शायद इन्ही लाइनों से समझी जा सकती है जो सज्जाद ज़हीर के न रहने पर फैज़ के मुंह  से निकली थीं-

बिसाते बादा-ओ-मीना उठा लो
बढ़ा दो शाम-ए-महफ़िल बज़्म वालों
पीयो अब एक जामे अलविदाई
पीयो और पीके सागर तोड़ डालो

सज्जाद ज़हीर साहब के चले जाने के बाद भले ही  फैज़ और लखनऊ के बीच की एक डोर टूट गयी हो पर अभी और कई बंधन थे जिनसे लखनऊ ने फैज़ को बाँध रखा था। इन में एक आवाज़ का भी रिश्ता था। ये आवाज़ थी बेगम अख्तर कि। फैज़ के शुरुआती दौर से लेकर आखिर तक – जिस तरह बेगम अख्तर ने फैज़ को समझा और गाया था वो अपने आप में एक मिसाल है। अदब और आवाज़ के इस रिश्ते ने दोनों को ही एक नयी ऊँचाई दी थी और फैज़ जब भी लखनऊ जाते बेगम साहिबा के घर – ४, फाइनब्रेक आवेन्यु चक्कर ज़रूर लगाते थे।

इन्ही दौरों के दौरान एक-आध बड़े लखनौव्वा किस्म के मज़ाक भी फैज़ साहिब को झेलने पड़े। एक बार फैज़ साहिब के चाहने वाले उन्हें अमीनाबाद के अब्दुल्लाह के होटल ले गए – जहाँ की चाय, कहवा और शेर-सुखन कि महफ़िलें बड़ी नामचीन थीं। फैज़ साहिब को आता देख तहज़ीब के लिए जाने जाने वाले लखनऊ के सारे अदीब खड़े हो गए। सिर्फ एक साहिब अपनी जगह टस-से-मस न हुए और बैठे रहे। नाम था नाज़िर खय्याम । किसी ने पुछा, “नाज़िर साहिब, आप फैज़ जैसे शायर का इस्तेकबाल नहीं करेंगे क्या?” तो वो बोंले, “मैं फैज़ को शायर ही नहीं मानता”। “क्यूं?” के जवाब में उन्होंने फ़रमाया, “फैज़ साहब ने एक शेर कहा है –

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के,
लो जा रहा है कोई शब्-ए-ग़म गुज़ार के

अब ये बताएँ फैज़ साहिब, के अल्लाह’ताला के बनाये दो जहाँ इनके बाप के हैं जो इन्होने अपनी मोहब्बत में हार दिए? और दो ही तो जहान हैं कायनात में। अगर दोनों ये हार चुके हैं, तो फिर अब हैं किस जहान में?” फैज़ साहब खुद भी हंस पड़े और खय्याम साहिब खड़े होकर उन्हें आदाब बजा लाये।

अब तक फैज़ के लखनऊ के जिन रिश्तों का मैंने ज़िक्र किया है उन सारे लोगों के बारे में – तो बहुतों ने लिखा है, बात की है। मगर फैज़ का लखनऊ से एक गहरा रिश्ता ऐसा भी था जो कैसरबाग की कोतवाली के पीछे खयालीगंज कि एक पतली सी कुलिया में रहता था। ये आदमी न शायर था, न ईंटेलेक्चुअल, न कोई पोलिटिकल आईडीओलॉग। ये आदमी सिर्फ कोम्युनिस्ट पार्टी का एक कमिटिड फुट सोल्जर था। पर इस इंसान से फैज़ कि दोस्ती कितनी शदीद थी, इसका एहसास इस बात से होता है के 70s में जब फैज़ लखनऊ आये तो लखनऊ के पहले ५ सितारा होटल क्लार्क्स अवध पहुँचते ही मेज़बानो से बोंले, “सुना है मेरा एक दोस्त अब यहीं आ गया है। क्या आप मुझे म्युनिस्ट पार्टी के दफ्तर का नंबर ढूंढ देंगें?”

सी.पी.आई के दफ्तर जब फोन लगा तो फैज़ ने पुछा, “क्या मैं नईम खान साहिब से बात कर सकता हूँ?” फोन नईम साहिब ने हि उठाया था, क्यूंकि वो ऑफिस सेक्रेटरी हुआ करते थे। “जी हाँ मैं नईम बोल रहा हूँ।” “नईम मैं  फैज़.”…दोनों तरफ से आवाजों का सिलसिला थम गया, और आंसुओं का सिलसिला शुरू हो गया। दरअसल सहारनपुर के रहने वाले नईम खान साहिब पार्टी के वो फुट-सोल्जर थे जिन्हें पार्टी ने कभी लाहोर भेजा था। वहां फैज़ साहिब से उनका कुछ ऐसा रिश्ता बन गया जैसा डेईटी और डिवोटी की बीच होता है। दोनों तरफ से ये एक अजब म्युचुअल एडमिरेशन क्लब था। और जब एलिस से शादी रचाने फैज़ लाहोर से श्रीनगर के लिए रवाना हुए तो उनकी बारात में शामिल दो तीन बारातियों में कॉमरेड नईम खान भी शामिल थे। श्रीनगर में महाराज हरी सिंह के महल में जब शेख अब्दुल्लाह ने, एलिस और फैज़ का निकाह पढ़वाया तो शेख अब्दुल्लाह, गुल जाफरी और नूर हसन के साथ कॉमरेड नईम भी वकील-गवाह थे।

फोन रखते ही नईम खान फैज़ के पास होटल क्लार्क्स अवध पहुँच गए। शायद पहली बार उन्होंने ऐसे किसी होटल में क़दम रखा होगा। दो पुराने शनासा इस तरह से गले मिले जैसे इसी घड़ी के इंतज़ार में ज़िन्दगी जी रहे हों। “फैज़ तुम घर चलो।” “चलो।” “पर मेरा घर एक बहुत पतली गली में है।” “तो क्या हुआ?”

फैज़ जब खयालीगंज की उस पतली गली को पार करते हुए – नईम साहिब के घर पहुंचे तो आस पड़ोस के लोगों, और पार्टी कॉमरेडों से वो छोटा सा घर खचाखच भर चुका था। उस घड़ी के एक चश्मदीद गवाह शकील सिददीकी साहिब लिखते हैं कि, “दोनों कि आँखों में आंसूं थे साथ ही दूर तक देख सकने वाली चमक। फैज़ ने घर के सभी अफ़राद और दीगर लोगों से तार्रुफ्फ़ किया और सिगरेट सुलगा के चुप-चाप बैठ गए। तभी नईम साहिब ने पूरे हक से कहा, “भाई फैज़ कुछ सुनाओ।”

“क्या सुनाएं।”
“कुछ भी।”
और फैज़ सुनाने लगे। सुनने-सुनाने का सिलसिला चल रहा था कि एक लड़की ने कहा – “अंकल वो वाली सुनाईये न!”
“कौन सी”
“वो जो आपने जेल में लिखी थी”
“जेल में तो बहुत सी लिखी थी, जेल जाने का यही तो फायदा हुआ”
उस लड़की को छोड़ के सब हंस पड़े।

दोस्तों,
अभी लाहोर आने से दो दिन पहले मैं – कॉम. नईम खान के घर उनकी बेगम शमीमा और बेटे असद से मिलने गया था। शमीमा चाची – जिनके बनायी सेवेइय्याँ खाए बिना बरसों मेरी कोई ईद पूरी नहीं होती थी, अब काफी ज़ईफ़ हो चुकी हैं और काफी हद तक अपनी याद-दाश्त खो बैठीं हैं, पर फैज़ साहिब का ज़िक्र होते ही, उनकी आँखों में एक चमक आ गयी। और उन्हें याद आया कि कैसे उनके बबलू ने फैज़ चाचा से पूछा था कि क्या आपने फिल्मों में भी गाने लिखे हैं? “हाँ लिखे हैं।” “तो सुनाइये न” “अब इस वक़्त तो याद नहीं।” कह कर शायद फैज़ साहब ने बबलू को टाल दिया था। पर बबलू यानी असद अपने बचपने के उस इंटरएक्शन से बिलकुल शरमिंदा नहीं था, बल्कि उसके तईं आज भी उस दिन की याद ताज़ा थी। असद ने बताया के जब किसी ने फैज़ साहिब से तरन्नुम में कुछ सुनाने को कहा तो, उन्होंने जवाब दिया था, “ये गाने बजाने वालों का काम है, मेरा नहीं।” मगर पंजाब से रेफ्यूजी होकर गए कॉमरेड करनैल सिंह के कहने पर उन्होंने पंजाबी की कई चीज़ें उस शाम सुनाईं थी।

लखनऊ से फैज़ साहिब का आखिरी लम्बा साथ हुआ था सन १९८१ में, – जब बाकी दुनिया की तरह फैज़ साहिब के ज़िंदगी के ७० सालों का जश्न लखनऊ की सफ़ेद बारादरी में धूम-धाम से मनाया गया था। उन दिनों के लखनऊ के मेयर डॉ. दाउजी गुप्ता उस जलसे को ऐसे याद कर रहे थे जैसे अभी कल की बात हो। आज कल वो पेन (PEN) के इंडिया चैप्टर से सद्र हैं। वो बोंले, “तुम लाहोर से लौट के आ जाओ तो यहाँ भी हम लोग फिर कुछ उसी जोश से फैज़ साहिब के सौ सालों का जलसा मनाते हैं। जैसे सत्तर का मनाया था।” हजरतगंज के कॉफ़ी हाउस से उठते हुए मैं सोच रहा था कि, “हालांकि साल २०११ – हमारे यहाँ संटेनरी सेलेब्रेशंस का साल है, जब शमशेर, अज्ञेय, नागार्जुन, केदारनाथ और मजाज़ के सौ साल पूरे हो रहे हैं। पर क्या इनमें से किसी भी कवी-शायर का सेलेब्रेशन – सरहद के इधर और उधर ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की तमाम शहरों में उस गर्मजोशी से मनाया जायेगा – जैसे फैज़ का मन रहा है?” जवाब साफ़ है और क्यूँ न हो। इन सारे नामों में से सिर्फ फैज़ एक ऐसा शायर था, इंसान था, कॉमरेड था जिसकी फ़िक्र-ओ-सोच का दायरा इतना वसी था कि – जितना वो एशिया के थे – उतना ही अफ्रीका के भी, जितना वो बेरूत के थे – उतना ही बंगलादेश के भी, जितना पकिस्तान के थे – उतना हिन्दुस्तान के भी, और जितना वो लाहोर के थे – उतना ही लखनऊ के भी।

सलीमा जी और मुनीज़ा जी, मैं तह-ए-दिल से आपका शुक्रगुज़ार हूँ कि आप लोग इस ख़ुलूस से – हम सबके फैज़ को सेलेब्रेट करे रहे हैं, और इस जश्न में आपने हमें भी शरीक किया है। आप के इस जज्बे के लिए फैज़ का लखनऊ – फैज़ के लाहोर को भी सलाम करता है। जिंदाबाद लाहोर। जिंदाबाद लखनऊ। जिंदाबाद फैज़।

*

Lucknow and Faiz

(This paper was especially written and presented, on the 12th February 2011, at the colloquium on Faiz, at his centenary celebrations at Lahore. ATUL TIWARI had written the original paper in Urdu (in Devnagri script) and it has been translated in English for Think India. Translation credit: Gyanesh Pandey and Atul Tiwari.)

Honorable Guests!

This gathering will mark a memorable date in the history of our literature. In our conferences and colloquiums, we have been mostly arguing about the language and its spread/power. So much so, that the intention of early Hindi and Urdu Literature – which is present – was not to impact our thoughts and emotions, but to make a perfect linguistic construct.

But language is but a bridge and not the destination.

Literature has been defined in various ways, but in my opinion, the most apt definition of literature is – “A critique of our life and world” – be it form of essays, stories or poetry.  It must analyze and critique our life.

The era that we have been through had no imagination about literature being connected with real life. The measure of love was titillation of senses and the ideal of beauty was to satiate the eyes. The job of poetry was to work towards these sensory emotions. And we all know how popular such poetry is even today.

Can a literature, that makes us escape the real world and it’s problems, ever fulfill our mental and emotional needs? Carnality is only a part of our being, and if that is the chief concern of a body of literature, then it cannot be the pride of a people their society.

A writing that does not incite true commitment and a conviction to overcome our problems – it is useless for us today!

‘Progressive Writers Association’. The idea of a Progressive Writer, in my opinion is a fallacy. A writer or an artist, by his very nature is progressive. Had that not been the nature, he or she might not have been a writer at all.

We will have to change the scales by which we measure beauty. Literature (till today) did not accept that ‘hunger and nudity’ could also be aesthetic. It saw beauty in an attractive young lady –but not in the poor unattractive mother, who puts her child to sleep in the field, as she sweats in heat. Literature has decided that beauty lies in the painted lips, soft cheeks and arched eyebrows and not in the mangled hair, dry chapping lips and withered cheeks! But that is the offense of its narrow vision.

When we refuse to tolerate a system that makes thousands slave under a brute force, then our self-esteem would goad us to raise a flag of revolt against this capitalistic, dictatorial, militaristic culture. Only then writing quietly on a piece of paper would not suffice.

A Litterateur’s mission is not simply to assemble gatherings and to entertain. Let’s not degrade him so much. Literature is not even meant to succumb to patriotism and politics. It is a torch which marches ahead illuminating their paths.

Until the time Literature’s function was only producing mere mindless amusement, singing lullabies or shedding tears – we did not need a new practice & protocol for it. It was a lunatic-romantic whose grief fed others apatite for amusement. But we don’t consider Literature as a mere thing of entertainment, amusement and appeasement of senses. On our new measure literature is that, which has exalted thoughts, passion for freedom, aesthetic for beauty, constructive spirit, and that shows light on the reality of life. Literature is that incites, inspires, inconveniences and invigorates us, and not that lulls us to sleep. For now, to sleep is to die.”

Friends, of course these are neither my words nor my expression…

I wish I could ever be as lucid, insightful, in-depth and intense.

What you just read here was a gurbaani-qalma-gayatrimantra–a holy invocation – which, in a ritual of initiation, was whispered into the ears of Faiz by a man called Dhanpat Rai. The date was: 10th of April 1936, and place: the city of Lucknow. This inaugural address, delivered by Munshi Premchand, at the first conference of the PWA, was going to be a watershed moment, which would change the scenario of literature, arts, theater, films and even politics in India. And it was no coincidence that Faiz, who had traveled all the way from Punjab, was present in Lucknow that evening. Faiz, who had just turned 25, – was young, full of verve, impressive and impressionable. And the stamp/imprint that Lucknow left on him, the bond that this city made with him was the bedrock of a life long relationship.

Actually, the foundation of his bond with Lucknow was laid, the day Dr. Rasheed Jahan settled down in Lucknow after leaving Amritsar. And who, amongst you, is not aware of the name and personality of Dr. Rasheed Jahan – a novelist, short story writer, dramatist, doctor and most of all a committed comrade. “Angaarey”(Burning Embers), her short story collection published in 1932, was a trail blazer that had scorched people all over the country. And when the British banned the book, in 1933, Dr. Rasheed became famous in even in circles where one had not heard her name. Her husband, the learned communist Com. Mahmooduzzafar, was the principal of MAO College, Lahore. It was during his tenure that Faiz, a fresh post-graduate of English & Arabic, was appointed a lecturer there. Dr. Rasheed Jahan and Com. Mahmooduzzafar were also the first ones to have introduced Faiz to the progressive revolutionary thoughts and tenets of Marxism.

With such a mentor being in Lucknow, Faiz, probably, would have been looking forward to come to Lucknow anyways. And the first conference of PWA pulled him with such intensity that, with only one way fare in his pocket, Faiz left for Lucknow.

PWA’s first conference was conceived-convened-catered-cared for by Hon’ble Sajjad Zaheer Sahib. Faiz had been introduced to him, earlier in Amristsar, by Dr. Rasheed Jahan. But at Sajjad Zaheer’s home ground, Lucknow, Faiz was even more impressed – rather besotted – by his magnetic persona. After the PWA conference, with the return fare realized from Dr. Rasheed Jahan, Faiz somehow returned to Lahore. But not before a deep bond that had been formed between Faiz & Lucknow. And since then, whenever he got a chance, Faiz eagerly waited to go to Lucknow and Lucknow always awaited him.

The Lucknow of those days was not just another township. It was the conurbation of Anwar Jamal Kidwai, Sibte Hasan, Farahtullah Ansari, Ali Jawad Zaidi, Yashpal, Dr. Ashraf, Dr. Z. A. Ahmad and his wife Hajra Aapa. This was the urbane capitol of Awadh where Journals and newspapers like ‘National Herald’, ‘The Pioneer’, ‘Hindustan’, ‘Viplav’, and ‘Naya-Adab’ were published. Along with that the hospitable home of the Vice Chancellor of Lucknow University Mr. Sheikh Habibullah, and the personal library of Prof D.P. Mukherjee were places where young writers powwowed. No less famous were the coffee-house, restaurants and bars of Hazratganj, along with tea-houses, bookshops of Ameenabad, and the Qahwa-kiosks of the Chowk.

In Dec 1941, Faiz once again got to travel to Lucknow, ‘officially’, when Somnath Chhib, the director of All India Radio, invited him to present his poems at the symposium of young-emerging poets. Veteran poet Josh Malihabadi was invited too – not to recite his work – but to listen to the young poets and chair the event. Of course amongst other aficionados, Faiz’s friend Sajjad Zaheer was present with his wife Razia to listen to the young voices. And those voices consisted of almost the whole catalogue of Progressive poets like Majaz, Jazbi, Jaan Nisaar Akhtar, Ali Sardar Jafri and Faiz Ahmad ‘Faiz’.

The presence of Sajjad Zaheer, recently released from colonial jail, added a new enthusiasm, a new experience, a new verve and a new commitment to the voices of young poets. To say that the symposium was a runaway success is not important. But on that cold December night, the sheer energy and warmth that the company of these young fellow-travelers, comrade-in-arms generated is worth listening to in words of Ali Sardar Jafri:

“That little house, located in Kandhari Lane, had a small bench,a few cane stools and three cots in the name of furniture. We pushed all that aside into a corner and the covered the whole floor with mats. Above the mantelpiece was a big portrait of a Spanish revolutionary girl – her fists clinched, and breast protruding in a way, that even the military-uniform failed to conceal the curves. Below the portrait it was written, “To Death”. The flickering light of candles – perched on two inverted buckets – made this portrait even livelier, inspiring and touching….The warmth the our little congress, the intoxication of hearts and the glow of faces kept increasing by the minuet. Praises were being showered as if lovers were complimenting each other. Just then Faiz said, “I heard this wonderful couplet in Lahore, though I don’t know the name of the poet.” And he quoted:

Jab kishti saabit-o-saalim thi, saahil ki tamanna kisko thi,

Ab aisi shikastaa kisthi par, saahil ki tamanna kaun kare

(When the boat was new, solid, intact, who wished to see the shore,

Now with boat all tattered-shattered, who would dream to come ashore)

Jazbi’s melancholic face just lit up. It was his couplet that had traveled all the way from Lucknow to Lahore and back. Faiz and Jazbi hugged each other. And when Faiz was just about to sit, Jazbi, without any invitation, started reciting Faiz’s ‘Mauzu-e-Sukhan’, in tune.

Gul hui jaati hai afsurda sulagti hui shaam

Dhul ke niklegi abhi chashm-e-mehtab se raat

Aur mushtaq nigahon ki suni jayegi

Aur unn haathon se mass honge yeh tarse huey haanth

(The melancholic aflame evening will melt soon

And night will emerge, bathed in the brook of moon

Now you will hear from the eager eyes beautiful and bold

And feel the touch of hands that you wanted to hold)

Jazbi sang the first stanza and Majaz followed with the second – in his own peculiar style. And then both, alternately, kept reciting stanzas from Faiz’s long poem. Faiz’s face lit with a smile of innocence and contentment. There could not have been a better compliment for a poet.”

And probably this was possible only in Lucknow. This night left such a lasting impression on Faiz that, 12 years later, in a letter written to his ‘dear Bhabhi (sister-in-law) Razia’, he reminisces about this night.

After the next year the situation in the country and the world started changing dramatically and at a break-neck pace. World War II, Quit India, Do or Die, Freedom and partition or Partition and freedom. But even amidst all this chaos, Faiz stayed connected with Lucknow through his friend-philosopher-guide Sajjad Zaheer.

Even though new lines had been drawn on the map of the world and now two nations had become a reality of our sub-continent, but still some people refused to accept this and their slogan was,

“desh ki janata bhooki hai, yeh azaadi jhooti hai.”

(With hunger poor still die, such a ‘freedom’ is a lie)

Among those were Faiz and his friend, fellow and ‘elder brother’ Sajjad Zaheer, who was sent from India to re-establish communist movement in newly made Pakistan.

It had not even been 4 years since freedom that Faiz and Sajjad Zaheer both were arrested and incarnated again in 1951. For the next 4 years these brothers-in-arms were forced to spent countess time in innumerable jails, facing limitless hardships, immeasurable suffering and indescribable torture. They were both even subjected to solitary confinement. When one thinks about this period one wonders, what would have happened if this man from Lahore was not accompanied by the man from Lucknow in the confines of gaol. And probably without this forced confluence of Awadh and Punjab in prison, a whole body of Faiz’s work, that emerged from the dark depths of detention, may not have emerged at all.

During this period, on 22nd May 1952, Faiz in a reply to a letter by Razia Sajjad Zaheer, writes “You asked me, if I have seen Lucknow or not? I sure have seen it, but I lust for it even more. I have been to Lucknow a few of times – stayed for 2-3 days at your house too – but could never stay beyond a couple of days. Each time, instead of coming back contented, I have come back yearning for more.”

After being released from the Pakistani jail, Sajjad Zaheer returned back to India. But both the friends continued frequenting jails in their respective countries. Since then whenever Faiz came to Lucknow, he always visited Sajjad & Razia Zaheer at their house on Wazir Hasan Road. Sajjad Zaheer’s four daughters were for Faiz’s like his own daughters. The depth of the bonding between these two greats of this era can perhaps be understood by the the lines that Faiz uttered when Sajjad Zaheer suddenly passed away:

bisaate bada-o-meena uttha lo

badha do sham-e-mehfil bazm walon

peeyo ab ek jaame alvidai

peeyo aur peeke sagar tod daalo

(Take the cups away, the bottle, and the wine-measure

Close this evening soiree for ever

Just raise a toast of farewell to the departed friend

Then smash the wine-glass, bringing this party to an eternal end)

With Sajjad Zaheer’s passing away, a strong connection between Faiz and Lucknow was broken, but there were many others threads through which Lucknow had tied him to itself. One such connect was through a voice. The voice of Begum Akhtar. From the beginning of Faiz’s career till the end, the way Begum Akhtar understood, interpreted and rendered Faiz’s poetry in her inimitable voice is legendry. This osmotic relationship between word and voice had taken both these artists to new unconquered heights. And whenever Faiz visited Lucknow, he did make it a point to visit Begum Akhtar at her 4, Finebrake Avenue home.

Sometimes on such tours Faiz had to subjected to very ingenious Lucknow humor too. A few of Faiz’s fans once took him to Abdullah Hotel in Ameenabad, which was a known hotspot for tea, Qahwa and lively gathering of poets. When Faiz reached there all the litterateurs stood up as a mark of respect to him, except one. His name was Nazir Khayyami. Somebody asked him “Nazir sahib, would you not show any courtsy towards such a senior poet?” To which he replied, “I don’t consider Faiz to be a poet at all.” When asked why, he retorted, “Faiz has written in a poem:

Dono jahan kisi ki mohabbat mein haar ke,

Lo jaa raha koi shab-e-gham guzaar ke

(Having loved and lost both the worlds to her, there

He walks away after spending a night of despair)

“He must explain”, demanded Khayyam, “if the two worlds that he lost in love, belonged to his father that he was so careless about them? And when there are only two worlds in this whole cosmos, where does he reside right now, after having lost both of them?” Faiz himself could not but laugh at this wit and repartee and conceded the point. And Mr. Khayyam immediately stood and saluted him in all respect due to a senior poet.

The connects, between Faiz and Lucknow, that I have mentioned till now have been written, noted and talked about by others too. But there was another deep rooted relationship that Faiz had with the city of Lucknow. And this one lived in a narrow unsung lane of Khayaliganj, right behind the Police Station of Kaiserbagh. This man was neither a poet, nor an intellectual, or even a political ideologue. This man was just a common committed foot soldier of the communist party. But the bond  of this relationship was so strong that once in 70’s, when Faiz came to Lucknow and checked into the first Five-Star Hotel in Lucknow – Clarks Awadh, he immediately asked his hosts, “I have a friend who lives in Lucknow now. Could you get me the number of the office of Communist Party of India here, so I could enquire about him?”

When the phone got connected to the CPI’s office, Faiz asked, “Could I speak to Naeem Khan?” Incidentally it was Naeem Khan on the other side because he was the office secretary of CPI.

“Yes sir! It’s Naeem here.”

“Naeem this is Faiz…”

The voices fell silent on both the sides and the tears started speaking. Actually, Mr. Naeem Khan as a foot soldier of the party had been sent to Lahore at one point of time.

There the relationship that developed between Faiz and Naeem Khan was something like a bond between a deity and a devotee. It was a mutual admiration club from both the sides. And when Faiz left Lohore to go to Srinagar, to wed Alys, Comrade Naeem Khan accompanied him with the wedding party consisting of barly a couple of other friends. Sheikh Abdullah solemnized this Nikah-marriage in the palace of Maharaja Hari Singh and Com. Naeem Khan along with Gul Jafri and Noor Hassan, signed the nikah-nama as a witness.

Immediately after the phone call, Com. Naeem reached Faiz’s hotel, stepping into a five-star environs perhaps for the first time in his life.  Two old friends met and hugged each other as if this was the moment they had been living for.

“Faiz you should come home!”

“Let’s go”

“But my house is in a very narrow lane…”

“So what?”

Passing through the narrow lanes and by lanes of Khayaliganj, when Faiz reached Com. Naeem’s house, it was already full of people from the neighborhood and other party comrades. An eye witness of this evening Shakeel Siddiqui writes:

“Both the friends had tears in their eyes and a vision which could see far beyond. Faiz enquired about the welfare of family people, greeted all the gathered guests, lit up a cigarette and silently sat down in a corner.

Comrade Naeem then exerted his rightful right – ‘Bhai Faiz, you should recite something to us.’

‘What?’

‘Anything’

And Faiz began reciting in his inimitable style and the audience was mesmerized. The evening was still unfolding when a young girl asked Faiz, ‘Uncle, you must sing that one…, you know.’

‘Which one?’

‘The one that you wrote in the jail’

‘Oh! I wrote so many in the jail, afterall this was the biggest advantage of going to the jail’

Everybody laughed out aloud but for the girl…”

Friends,

Two days before leaving for Lahore, to attend Faiz’s centaniray celebration there, I went to meet Late Comerade Naeem Khan’s wife, Shameema, and son Asad. Aunt Shameema, without who’s sweet-sewaiyyans my Eid would never feel like one, is now very old, and has almost lost her memory. But as soon as I mentioned Faiz, her eyes lit up. She started reminiscing how her son Bablu had asked uncle Faiz if he had written songs for films too. Faiz had replied in affirmative. Then Bablu asked him to sing one film song, but Faiz deferred the request saying, “I don’t remember any right now”. But Bablu, meaning Asad, was not embarrassed by his childhood antic that evening; on the contrary he is proud of his little exchange with, arguably, the greatest Urdu poet of 20th century. Asad told me that when some one asked Faiz to, “sing” one of his poems, he dismissed him saying, “Singing is the work of crooners and dancers, not of poets.” But when Comrade Karnal Singh, a Sikh refugee from Punjab, requested him to recite some Punjabi poems, Faiz had immediately obliged.

The last long association between Faiz and Lucknow happened in 1981, when, like in the rest of the world, Lucknow too celebrated 70th birthday of Faiz. The elegent event was hosted in the historical Safed Baradari – a favorite venue for the pomp of last Awadh Nawab Wajid Ali Shah.  The then Mayor of Lucknow, Dr. Dauji Gupta recollects that 30 year old evening as if it happened just yesterday. He told me enthusiastically, “Once you are back from Lahore, we will also celebrate a Faiz Centenary here, like we celebrated his 70 years.”

As I got up from the coffee-house at Hazratganj to leave, I was wondering that 2011 is an year of centenary celebrations in India, as poets Shamsher, Agyeya, Nagarjun, Kedarnath and Majaz all are completing their hundred years. But is there a poet whose centenary celebrations will happen with such intensity, enthusiasm and fervor, not only on both sides of the borders, but in the whole world, as Faiz’s Centenary Celebrations? The answer is clear. And why not! Amongst all the names that I just listed, Faiz was the only poet-man-comrade whose sphere was not limited by any geographical, cultural or national boundaries. He belonged as much to Asia as to Africa, as much to Beirut as to Bangladesh, as much to Pakistan as to India, and belonged as much to Lahore as he belonged to Lucknow.

I am very grateful to Faiz’s daughters Salima and Moneeza, who not only have been celebrating Faiz with mass melas every year, but have now made a befitting museum to him called ‘Faiz Ghar’. His centenary celebrations have brought Faiz scholars and fans, like me, from all over the world to Faiz’s Lahore. For such passion Faiz’s Lucknow salutes Faiz’s Lahore. Long live Lahore. Long live Lucknow. Long live Faiz!

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