एक  नायक की तलाश में भाजपा 

दीनदयाल उपाध्याय: भाजपा के ‘गांधी’

Image result for deendayal upadhyaya

( Photo Courtesy : thewire.in)

एक पेड़विहीन देश में एक एरंड भी बड़ा पेड़ कहलाता है – एक  संस्कृत सुभाषित का रूपांतरण

/In a treeless country even castor counts for a big tree/

/संदर्भ: http://www.epw.in/journal/2006/12/

 

राष्ट्रपति कोविन्द ने इस बात को स्वीकारा कि ‘‘भारत की कामयाबी की कंुजी उसकी विविधता में है’’ और ‘‘हमारी विविधता ही वह केन्द्र है जो हमें इतना अनोखा बनाती है’’। अपने भाषण का अन्त उन्होंने समतामूलक समाज बनाने के आवाहन के साथ किया जैसी ‘‘कल्पना महात्मा गांधी और दीनदयाल उपाध्यायजी’’ ने की थी।… महात्मा गांधी के साथ दीनदयाल उपाध्याय का नाम लेने पर कांग्रेस ने एतराज जाहिर किया। कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि ‘‘राष्टपति को यह याद रखना चाहिए कि वह अब भाजपा के प्रत्याशी नहीं हैं। वह भारत के राष्ट्रपति हैं। उन्होंने दलीय राजनीति से ऊपर  उठना चाहिए।’’

(https://www.telegraphindia.com/1170726/jsp/frontpage/story_163934.jsp मूल अंग्रेजी से अनूदित )

1

एक प्रतीक की खोज़

हिन्दु राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रयासरत जमातें – जो फिलवक्त़ दक्षिण एशिया के इस हिस्से में हुकूमत के सबसे उंचे मुक़ाम पर पहुंची है – वह अपने आप को एक विचित्र दुविधा में फंसी पाती है।

दुनिया जानती है कि उन्होंने अपने एजेण्डा के इर्दगिर्द हजारों कार्यकताओं की टीम खड़ी की है, उन्होंने अपने तमाम आनुषंगिक संगठनों के माध्यम से समाज के विभिन्न तबकों के बीच अपना आधार बनाया है, अपनी संसदीय और गैरसंसदीय सक्रियताओं के जरिए तथा अपने बीच सुनियोजित, सुविचारित ‘श्रम विभाजन’ के जरिए, उन्होंने रफता रफता देश की राजनीति में हाशिये से लेकर केन्द्र तक की अपनी यात्रा पूरी की है। बीत गया वह दौर जब उनकी पोशाक, उनके प्रलाप आदि समाज में हंसी के केन्द्र में रहते थे; आज वही मुख्यधारा बने हैं तथा समाज एवं सियासत की बागडोर सम्भाले हुए हैं। यह कयास भी लगाए जा रहे हैं कि अगर धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक एवं वाम ताकतों ने अपनी कमजोरियों का ठीक से सारसंकलन नहीं किया और राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में नयी जमीन तोड़ने की कोशिश नहीं की तथा साझा कार्रवाइयों का संचालन नहीं किया तो मुमकिन है कि असमावेशी और एकांगी विश्व  दॄष्टिकोण की वाहक यह ताकतें अपने प्रभाव को और गहरा कर सकती हैं।

गौरतलब है उरूज के इन दिनों में भी वह अपनी एक दुविधा से मुक्त नहीं हो पाए हैं। इसका ताल्लुक उनके बीच ऐसे किसी चेहरे का अभाव है जो उनके चिन्तन एवं सियासत की नुमाइन्दगी करता हो मगर उसकी स्वीकार्यता महज उनकी अनुशासित कतारों तक सीमित न हो ; शेष अवाम भी उस शख्स को अपना नेता मानती हो। ऐसा नहीं कि यह समूची तहरीक/आन्दोलन बिना नेतृत्व  के, कर्णधारों के यहां पहुंची है; मगर हुआ यही है कि उनके तमाम कर्णधार अपनी विशिष्ट चिन्तनप्रक्रिया, ‘हम’ बनाम ‘वे’ पर आधारित अपनी सोच के चलते , अपनी विशिष्ट सक्रियताओं के चलते व्यापक समाज के नहीं बल्कि अपनी तंज़ीम के ही नेता माने जाते रहे हैं।

हक़ीकत यही है कि न वह उपनिवेशविरोधी ऐतिहासिक सघर्ष की विरासत से अपना कोई सीधा नाता जोड़ सकते हैं क्योंकि उन्होंने हमेशा उससे  दूरी बनाए रखी या उसकी मुखालिफत की। और न ही वह अपने आप को  सामाजिक मुक्तिकामी/इन्कलाबी धारा के वास्तविक वाहक बता सकते हैं जिसका उदय उसी कालखण्ड में हुआ था तथा जिसने जाति तथा जेण्डर /स्त्राीपुरूष भेद/ के पवित्रा कहे जानेवाले तथा वैधताप्राप्त सोपानक्रम को चुनौती दी थी। ज्योतिबा तथा सावित्राी फुले, फातिमा शेख जैसों की अगुआई में खड़ी इस धारा ने विद्यमान धर्मों के विषमतामूलक स्वरूप पर तीखे ढंग से हमला बोला था। राजा राममोहन रॉय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, सर सैयद अहमद आदि की कोशिशों ने इस बहुधर्मीय मुल्क में अलग अलग तबकों में नये आधुनिक विचारों की बयार बहा दी थी।

जाहिर है कि भारतीय समाज को लेकर उनका बेहद रूढिवादी विश्व दृष्टिकोण जिसमें जाति, जेण्डर द्वारा परिभाषित आंतरिक विभाजनों से हमेशा ही इन्कार किया जाता रहा है और उनका खास किस्म का इतिहासबोध जिसमें ब्रिटिश औपनिवेशिक गुलामी की विशिष्टता एवं प्रभावों को देखने से हमेशा कन्नी काटी गयी है उसने ही उन्हें इस स्थिति में ला खड़ा किया है। बर्तानिया की गुलामी के बरअक्स उपनिवेशकाल से पहले भारतीय उपमहाद्वीप में कायम मुगल सल्तनत तथा अन्य मुस्लिम राजाओं की सल्तनतों को लेकर वह अधिक चिन्तित दिखते रहे हैं, जिसका लाजिमी नतीजा यही हुआ है कि उन्होंने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ उठे व्यापक जनान्दोलनों एवं जनविद्रोहों को हमेशा ही कम करके आंका है और उन्हें हल्का बनाने की कोशिश की है। हिन्दु बनाम मुसलमान बायनरी/द्विविध के प्रिजम से इतिहास को देखने की उनकी कवायद ने – जिसके तहत वह भारत में 1,200 सालों की गुलामी की बात करते आए हैं – चीजों को और जटिल बनाया है। /देखें: संदर्भ 1/

आज़ादी के बाद के वक्त़ की उनकी यात्रा भी गुणात्मक तौर पर भिन्न नहीं रही है।

यह बात इतिहास हो चुकी है कि किस तरह उन्होंने नवस्वाधीन मुल्क में संविधान बनाने का विरोध किया था और किस तरह यह प्रस्तावित किया था कि स्वतंत्र भारत के संविधान के तौर पर मनुस्मृति को अपनाना चाहिए।  ( Organiser’ November 30, 1949, p.3, details follow)  और संविधान स्थापित होने के इतने साल बाद भी उस  इरादे को त्यागे नहीं हैं। आए दिन संविधान बदलने तथा उसे ‘भारतीयता’ प्रतिबिम्बित करनेलायक बनाने की उनकी तमाम बातें आज भी बदूस्तर जारी हैं। (https://www.nationalheraldindia.com/eye-on-rss/we-should-remove-secularism-socialism-from-the-constitution-govindacharya)  यह तथ्य भी इतिहास में दर्ज है कि किस तरह उन्होंने हिन्दू कोड बिल निर्माण का विरोध किया था जो अंबेडकर के हिसाब से भारत के ज्ञात इतिहास में हिन्दु स्त्रिायों को कुछ अधिकार प्रदान करने का पहला संगठित प्रयास था, जिसके लिए उन्होंने यह आपत्ति दर्ज की थी कि यह भारत की संस्कृति पर हमला है। संघ के मुखपत्र कहे जानेवाले ‘आर्गनायजर’ में गोलवलकर ने साफ किया था कि

हम हिन्दु कोड बिल का विरोध करते हैं। हम उसका विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि यह अपमानजनक कदम पराए एवं अनैतिक सिद्धांतों पर टिका है। यह हिन्दू कोड बिल नहीं है। यह हिन्दू के बिना सबकुछ है। हम उसकी भर्त्सना करते हैं क्योंकि वह हिन्दू कानूनों, हिन्दू संस्कृति और हिन्दू धर्म के खिलाफ क्रूर और अज्ञानी तरीके से बदनाम करने की चाल है।  

(Golwalkar, Organiser, Dec 7, 1949, http://indianexpress.com/article/opinion/columns/br-ambedkar-2762688/)

ध्यान रहे यह विरोध महज मौखिक या लिखित नहीं रहा। इस बिल के विरोध में सनातनी एवं प्रतिगामी हिन्दू संगठनों के साथ मिल कर उन्होंने देश भर में रैलियां तथा प्रदर्शन भी किए, यहां तक कि इस बिल को लागू करने के लिए प्रयासरत तत्कालीन कानूनमंत्राी डा अंबेडकर – जो उसके लिए जनमत जुटाने में भी लगे थे – के दिल्ली स्थित आवास पर इन्होंने उग्र प्रदर्शन भी किए। यह भी जानी हुई बात है कि किस तरह हिन्दुत्ववादी संयुक्त राज्य अमेरिका के हिमायती थे और निर्गुट आन्दोलन की भारत सरकार की लम्बे समय से आ रही नीति की मुखालिफत करते थे। विएतनाम की जुझारू जनता के खिलाफ अमेरिका द्वारा छेड़े गए युद्ध का भी उन्होंने समर्थन किया था। ((https://www.countercurrents.org/comm-bidwai290504.htm) सामाजिक- सांस्कृतिक  जीवन को अपने संकीर्ण नज़रिये से विभाजित करने की उनकी कोशिशों का बार बार संज्ञान लिया गया है। यह अकारण नहीं कि तमाम जांच आयोगों द्वारा – जिनका गठन आज़ादी के बाद के कालखण्ड में साम्प्रदायिक हिंसा के उभार के बाद होता आया है – बार बार हिन्दुत्व वर्चस्ववादियों को अपने निशाने पर रखा है।

आपातकाल का दौर जब भारत के जनतंत्र के सामने पहली बार जबरदस्त चुनौती खड़ी हुई थी / 1975-77/ जब तमाम जनतांत्रिक अधिकार स्थगित कर दिए गए थे और विपक्ष के हजारों कार्यकर्ताओं को जेल की सलाखों के पीछे डाला गया था, उन दिनों संघ ने अपनाए दोहरे रूख ने ब्रिटिश काल में उनके समर्पण की याद ताज़ा की थी। यह जाहिर था कि तत्कालीन सरकार ने यह कदम बढ़ते जनान्दोलनों के तूफान की प्रतिक्रिया में उठाया था, जो व्यापक जनअसन्तोष के साथ बढ़ता ही जा रहा था। बहादुरी एवं शौर्य के हिन्दुत्ववादी दावे एक तरफ मगर उनकी कायरता, उनका डरपोकपन इन दिनों में खुल कर सामने आया था। आज चूंकि उनके हाथों में सत्ता की बागडोर है वह और कुछ कह सकते हैं मगर इस बात के दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं कि किस तरह उन दिनों में राष्टीय स्वयंसेवक संघ ने तथा उसके निर्देशों पर उससे सम्बद्ध आनुषंगिक संगठनों ने समझौतापरस्ती भरा, समर्पणवाला रूख अख्तियार किया था। /http://www.countercurrents.org/gatade240507.htm / तपन बसु, प्रदीप दत्ता, सुमित सरकार, तनिका सरकार द्वारा लिखी गयी चर्चित किताब ‘खाकी शॉर्टस एण्ड सैफ्रन फलेग्ज’ / पेज 55, ओरिएन्ट लॉगमैन, 1955/संघ के नेतृत्व के उन दिनों के व्यवहार पर रौशनी डालती है। उनके मुताबिक ‘‘

आपातकाल के दिनों में संघ का रूख विचित्र दोहरेपन/द्धंद से भरा था, जो 1948-49 के दिनों की याद ताज़ा कर रहा था।’’ जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगी थी और संघ सुप्रीमो बालासाहब देवरस को जेल की सलाखों के पीछे डाला गया था मगर उन्होंने 1948-49 के गोलवलकर की तरह ‘‘ ..आपातकाल के शासन के नियंताओं से अपना सम्वाद कायम किया, जिसमें उन्होंने अगस्त और नवम्बर 1975 में इंदिरा गांधी की तारीफ में पत्र भी लिखे और यह वायदा भी किया कि अगर संघ से पाबन्दी हटा दी गयी तो वह उन्हें सहयोग कर सकता है। उन्होंने संघ और सरकार के बीच मध्यस्थता के लिए विनोबा भावे से गुजारिश की और संजय गांधी से भी सम्पर्क साधा।’’

मालूम हो कि यह वह कालखण्ड था जब विभिन्न पार्टियों के हजारों कार्यकर्ता जेलों में थे, तमाम संगठन -जिनमें संघ भी शामिल था – पर पाबंदी लगी थी और इस अधिनायकवादी निज़ाम के खिलाफ प्रतिरोध भी खड़ा हो रहा था, जब लोगों को पता चला कि बालासाहब देवरस ने न केवल इंदिरा गांधी से सम्पर्क कायम किया है बल्कि उन्हें संघ से पाबन्दी हटाने का, अपने अनुयायियों से अंडरटेंिकंग/वचनपत्र लिखवा देने का वायदा कर रहे थे। इस वचनपत्र में स्वयंसेवकों से यही लिखवाया गया कि ‘‘जेल से बाहर आने के बाद वह ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे जिससे आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हो।’ चर्चित समाजवादी नेता बाबा आढाव की उन दिनों लिखी किताब ‘‘संघाची ढांेगबाजी‘‘ में वह इस वचनपत्र का मजमून भी पेश करते हैं।

‘‘श्री ….. /बंदी का नाम/… श्रेणी..कारागार शपथपत्र में इस बात के प्रति सहमति देता है कि अगर मुझे रिहा किया गया तो मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा जो देश की आंतरिक सुरक्षा और सार्वजनिक शांति के लिए नुकसानदेह होगा …मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा जो वर्तमान आपातकाल के प्रतिकूल होगा। / संघाची ढांेगबाजी, बाबा आढाव, 1977, मूल मराठी से लेखक द्वारा अनूदित/

नब्बे साल से अधिक कालखण्ड की अपनी इस यात्रा में उसके बीच वास्तविक नायकों की कमी – जिन्हें जनता प्यार करती है या उनका सम्मान करती है या जिनकी शोहरत महज कुछ कतारों तक सीमित नहीं होती / इन कतारों की बौद्धिक क्षमता को लेकर हिन्दी के प्रख्यात लेखक हरिशंकर परसाई ने चुटीले अंदाज में कुछ बातें कहीं हैं, जो किस्सा फिर कभी/ – एक तरह से उनके अपने अतीत के उनके वर्तमान पर हावी होने की एक बानगी महज है।  और इसे पूरा करने के लिए वह तरह तरह की कवायदों में मुब्तिला रहे हैं। और अपने आप को अधिक हास्यास्पद साबित करते रहे हैं।

अपनी इसी कवायदों के अनुभवों से सीखते हुए अन्ततः वह एक त्रिसूत्राीय रणनीति तक पहुंचे हैं जिन्हें इस ढंग से रखा जा सकता है:  गढ़ना, समाहित करना, साफसुथराकरण करना  (Manufacture/ Construct , Appropriate/Coopt, Sanitise) निश्चित ही वह इस रणनीति की सीमाओं से, संभावित नुकसान से वाकीफ होंगे, मगर इसके बावजूद उन्होंने इस रास्ते को सचेतन तौर पर अपनाया है।

2

Image result for nathuram godse

नायक कैसे गढ़े जाते हैं ?

लगभग 16 लाख आबादी के इस शहर इस्लामाबाद में 827 मस्जिदें हैं, जिनमें से कुछ के साथ मदरसे भी संलग्न हैं और ऐसे पवित्र स्थल जिनका अलग अलग स्तर का धार्मिक और राजनीतिक महत्व है। ‘‘संुदर इस्लामाबाद’’ के इस संग्रह में एक अब नयी बढ़ोत्तरी हो रही है – मुमताज कादरी नामक उस शख्स की कब्र जो अब पवित्र स्थल बन गयी है – वही मुमताज कादरी जिसने वर्ष 2011 में पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर को बंदूकों की गोलियों से भून डाला था।

(https://www.dawn.com/news/1302289)

हिन्दुत्व अतिवादी नथुराम गोडसे – जो उस आतंकी मोडयूल का अगुआ था जिसने महात्मा गांधी की हत्या की – का बढ़ता सार्वजनिक महिमामण्डन हमारे समय की एक नोट करनेलायक परिघटना है। याद करें उसके हिमायतियों की तरफ से इस ‘‘महान देशभक्त’’ के मंदिरों का देश भर में निर्माण करने की योजना भी बनी है। (http: //www. thehindu.com/ news/national/other-states/meerut-villagers-rally-against-godse-temple/article6754164.ece)  वैसे यह बात चुपचाप तरीके से लम्बे समय से चल रही है। शेष भारत में इस बात का खुलासा उस वक्त़ अचानक हुआ जब नांदेड बम धमाके हुए / अप्रैल 2006/ जब हिन्दु वर्चस्ववादी जमात के दो कार्यकर्ता ‘- हिमांशु पानसे और नरेश राजकोण्डवार बम बनाते वक्त मारे गए।(Ref : Portents of Nanded, 27 May 2006, EPW,http://www.epw.in/journal/2006/21/commentary/portents-nanded.htmlhttp://www.thehindu.com/todays-paper/tp-opinion/Nanded-case-of-lost-leads-and-shoddy-investigation/article15333964.ece ) पुलिस द्वारा आगे जांच करने पर पता चला कि यही गिरोह सूबे के अन्य स्थानों में हुई आतंकी घटनाओं में शामिल था। इतनाही नहीं यह आतंकी समूह गोडसे का ‘‘शहादत दिवस’’ भी मनाता था, जिसमें भाषण देने के लिए हिन्दु राष्टवादी तंज़िमों के नेता पहुंचते थे। और यह सिलसिला विभिन्न शहरों में चल रहा था।  सूबा महाराष्ट में एक नाटक लम्बे समय से चलता रहा है ‘‘मी नाथुराम बोलतोय’’ / मैं नाथुराम बोल रहा हूं/ जिसमें नथुराम के नज़र से गांधीहत्या को देखा गया है और औचित्य प्रदान किया गया है। /संदर्भ 2/

निश्चित ही गोडसे कोई अपवाद नहीं है नायक को ‘गढ़ने’ की हिन्दुत्ववादियों की अन्तहीन सी लगनेवाली कवायद में।

हिन्दुत्व ब्रिगेड में ऐसे तमाम लोगों को चिन्हित किया जा सकता है, जो जनता के खिलाफ अपराध करने के मामलों में अपने आप को सलाखों के पीछे पा सकते थे – बशर्ते देश की कानूनी प्रक्रिया को सही ढंग से आगे बढ़ने दिया जाता। यह अलग बात है कि वह अभीभी न केवल सम्मानित नागरिक बने हुए हैं बल्कि महिमामंडित भी होते आए हैं। हम याद कर सकते हैं पचीस साल पुराना वह उथल पुथल भरा दौर जब बाबरी मस्जिद का विध्वंस किया गया था और आज़ादी के बाद पहली दफा समूचे देश के पैमाने पर साम्प्रदायिकता का दावानल फैला था, तब इस मुहिम के एक ‘शिल्पकार’ ‘को देश की राजधानी में ‘हिन्दू हृदय  सम्राट’ के तौर पर नवाज़ा गया था। हम कैसे भूल सकते हैं कि हिन्दुत्व के हिमायती एक स्थापित गुजराती लेखक की जन्मशती का भव्य आयोजन जिसमें कई मुख्यमंत्रियों एवं केसरिया पलटन के अग्रणी नेताओं ने शिरकत की थी, जिस शख्स ने एक साक्षात्कार में कहा था कि किस तरह 2002 की संगठित हिंसा को उन्होंने सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया था। (It had to be done, Hindutva  leader says of riots, Sheela Bhatt, 12 March 2002, www.rediff.com)) इतनाही नहीं वर्ष 2008 में जब मालेगांव बाम्बर्स के आतंकियों को – जिनके आतंकी मोडयूल का खुलासा जांबाज कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अफसर हेमन्त करकरे ने किया था – नाशिक एवं पुणे की अदालत में पेश किया गया था तब किस तरह हिन्दुत्ववादी जमातों के कार्यकर्ताओं ने इन अभियुक्तों पर गुलाब फूल की पंखुडिया बरसायी थी, जो सिलसिला फिर पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भी दोहराया गया था जब इस्लामिक आतंकी मुमताज कादरी को लाहौर अदालत में पेश किया गया था।

नायकों को ‘गढ़ने’ के अलावा हिन्दुत्ववादी संगठनों की यह भी पूरी कोशिश रही है कि उपनिवेशवादी विरोधी ऐतिहासिक संघर्ष के अग्रणियों को ही नहीं बल्कि सामाजिक मुक्ति की जुझारू लहर से सम्बद्ध रहे कर्णधारों को, अपने प्रोजेक्ट में समाहित किया जाए। /संदर्भ 3/ इसमें यह आंस रहती है कि उन्हें ‘अपनाकर’ उनके पराक्रमों की छाया का गुणगान किया जाए और रफता रफता उन्हें इस ढंग से तोड़ा मरोड़ा जाए कि उनकी रैडिकल सम्भावनाएं कमसे कम जनता की निगाह में बोथरी पड़ें। आज नियमित चलनेवाली संघ की शाखाओं में भी यह आम बात है कि हिन्दुओं के महान नायकों की कतार में प्रातःस्मरणीयों की सूची में- जिन्हें संघ पहले से ही पूजता रहा है – गांधी और अंबेडकर भी शामिल कर दिए गए हैं। इस तरह यह बदलते वातावरण का ही परियाचक है कि उन्हें गांधी, अंबेडकर और पटेल को भी अपनाने में कोई संकोच नहीं है जबकि इन तीनों ने समय समय पर संघ के संकीर्ण नज़रिये का जोरदार विरोध किया था। पटेल जैसों ने तो गांधी हत्या में हिन्दुत्व के विचारों की छाया देखी थी तो अंबेडकर ने अपने अनुयायियों को आवाहन किया था कि -हिन्दू राज बनेगा तो वह आज़ादी के लिए खतरनाक साबित होगा।’ /संदर्भ 4/

अग्रणियों के ‘गढ़ने‘’ या ऐसे विशेष जनों को ‘‘समाहित’’ करने के अलावा उन्होंने एक तीसरा तरीका भी अपनाया है जिसमें उनकी कोशिश अपने ही नेताओं की साफसुथराकृत /सैनिटाइजड छवि को लोगों के बीच प्रोजेक्ट करने की रही है ताकि वह व्यापक आबादी के लिए अधिक स्वीकार्य हो। (http://www.catchnews.com/politics-news/deendayal-comic-strip-in-up-schools-haryana-univs-to-teach-golwalkar-savarkar-76767.html) यह अकारण नहीं कि सावरकर को भारतरत्न प्रदान करने की बात काफी समय से चल रही है जबकि इस बात के तमाम दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं कि किस तरह अंदमान जेल में अपने बन्दी जीवन में उन्होंने ब्रिटिश सरकार के पास याचिकाएं भेजीं कि उन्हें रिहा किया जाए, किस तरह गांधी हत्या में कथित भूमिका को लेकर गोडसे जैसे आतंकियों पर चले मुकदमे में वह भी अभियुक्त बनाए गए थे और किस तरह जे एल कपूर आयोग ने -जिसने 60 के दशक के अन्त में इस मसले की नए सिरेसे खोजबीन की थी, उन्होंने सबूतों के साथ स्पष्ट किया था कि किस तरह गांधी हत्या के प्रमुख साजिशकर्ताओं में वह शामिल थे। (http://www.frontline.in/static/html/fl2919/stories/20121005291911400 ; htm, https://thewire.in/140667/savarkar-gandhi-assassination) न्यायमूर्ति जे एल कपूर ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा है कि किस तरह ‘‘गोडसे उनका अनुयायी था’’ और किस तरह ‘‘सभी तथ्यों को मददेनज़र रखने के बाद यही बात स्पष्ट होती है कि ‘‘हत्या का यह षडयंत्र सावरकर एवं उनके समूह ने रचा था। /..”all these facts taken together were destructive of any theory other than the conspiracy to murder by Savarkar and his groupall these facts taken together were destructive of any theory other than the conspiracy to murder by Savarkar and his group/

पिछले दिनों यह भी ख़बर आयी थी कि केन्द्र सरकार संघ के दूसरे सुप्रीमो – जिनका विचारविश्व एवं कालखण्ड काफी विवादास्पद रहा है – गोलवलकर को ‘‘महान दार्शनिक और एक ‘‘मजबूत राष्टवाद (robust nationalism) के’’ कर्णधार के तौर पर प्रोजेक्ट करने की योजना बना रही है। (https://www.telegraphindia.com/1170705/jsp/nation/story_160286.jsp)

यह अलग मसला है कि हिन्दु राष्ट्र के हिमायती एक भी नेता को हिन्दुत्व ब्रिगेड के उस विवादास्पद अतीत से अलग करके नहीं देखा जा सकता , जिसने इस कार्यभार को और चुनौतीपूर्ण बनाया है। इसके बावजूद इस दिशा में उनकी कोशिशें जारी हैं और केन्द्र तथा कई राज्यों में सत्ता हासिल करने के बाद तथा समाज के प्रबुद्ध तबके के एक हिस्से में उनके विश्वदृष्टिकोण  की अधिक स्वीकार्यता के बाद, इस कवायद को गोया पंख लगे हैं।

3.

कथा दीनदयाला !

‘‘भाजपा के दीनदयाल उपाध्याय की वही अहमियत है जो कांग्रेस के लिए मोहनदास करमचंद गांधी की है। ’’ यह राय थी आर बालाशंकर की जो राष्टीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्रा कहे जानेवाले आर्गनायजर के पूर्व सम्पादक हैं और इन दिनों भाजपा की केन्द्रीय कमेटी के सदस्य के तौर पर प्रशिक्षण महा अभियान को देख रहे हैं।(The Indian Express,; September 24, 2016). 

दीनदयाल उपाध्याय – जो भारतीय जनसंघ की स्थापना के साथ से उससे सम्बद्ध रहे हैं, जो भाजपा का पूर्ववर्ती संगठन है – जिन्होंने अपने सामाजिक-राजनीतिक जीवन की शुरूआत संघ के एक प्रचारक के तौर पर की थी, उनकी जन्मशताब्दी के आयोजन ने हिन्दुत्व ब्रिगेड के संगठनों को यह अवसर प्रदान किया कि उनकी ‘‘महानायक’’ जैसी छवि प्रोजेक्ट की जाए।

याद करें कि दीनदयाल उपाध्याय के जन्मशति समारोह का उदघाटन पिछले साल प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी ने खुद किया था जिन्होंने पन्द्ररह खंडों में बंटी दीनदयाल उपाध्याय के लेखन एवं भाषणों की संकलित रचनाओं का विमोचन भी उस वक्त़ किया था। कुछ हजार रूपए में बिकनेवाली इन्हीं रचनाओं को अब भाजपाशासित विभिन्न राज्यों को भेजा जा रहा है ताकि उन्हें सरकारी स्कूलों में रखा जा सके। /देखें परिशिष्ट/ कोझिकोड, केरल में भाजपा की राष्टीय परिषद की बैठक को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्राी मोदी ने दीनदयाल उपाध्याय की भूरी भूरी प्रशंसा की, उन्हें ‘आधुनिक भारत के निर्माताओं’ की श्रेणी में शुमार किया था / देखें परिशिष्ट/। प्रधानमंत्राी मोदी ने उपाध्याय को उदध्रत करते हुए कहा था:

पंडित उपाध्याय ने कहा था कि मुसलमानों को पुरस्कृत मत करो, उनका तिरस्कार मत करो, उनका संस्कार करोे। मुसलमानों के साथ इस तरह का व्यवहार मत करो कि वह वोट की मंडी का माल है या घृणा की वस्तु हैं, उन्हें अपना समझो।

(https://www.thequint.com/politics/2016/09/25/prime-minister-narendra-modi-bjp-national-council-meeting-kozhikode-kerala-muslims-deendayal-updadhyay)

बीते इस साल में उनकी याद में क्विज आयोजित किए गए, योजनाओं को नए सिरेसे शुरू किया गया या पहले से चली आ रही योजनाओं के साथ उनके नाम को चस्पा किया गया, उनके नाम पर सड़कों का नामकरण हुआ, रेलवे स्टेशनों के साथ उनके नाम जोड़ दिए गए / और इस तरह सूबा यू पी में दो स्टेशनों का जो नया नामकरण हुआ उनमें दीनदयाल नाम जोड़ा गया (https://www.outlookindia.com/website/story/is-bjp-short-of-names-for-renaming-exercise-15-alternatives-for-deen-dayal-upadh/299245http://www.amarujala.com/uttar-pradesh/agra/now-farah-railway-station-is-named-after-deendayal-upadhyay / गौरतलब था कि राजस्थान सरकार ने अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को यह आदेश दिया कि वह आधिकारिक पत्रव्यवहार के लिए प्रयुक्त पत्रों पर दीनदयाल उपाध्याय की छवि को लोगो अवश्य अंकित करा लें। असम सरकार ने तो इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ने की सोची थी जब उसने तय किया था कि राज्य में खुलनेवाले नए बीस मॉडल कालेजों का नामकरण दीनदयाल के नाम से किया जाए। मगर इस प्रस्ताव का इतना जबरदस्त विरोध हुआ कि उसने चुपचाप अपने कदम पीछे खींच लिए।

हिन्दुत्व की विचारदृष्टी: चन्द झलकियां

..इन प्रश्नों पर गौर करें जिनका उल्लेख भाजपा द्वारा प्रकाशित उस पुस्तिका में किया गया है, जो एक तरह से छात्रों को सामान्य ज्ञान परीक्षा के लिए तैयार करने के लिए बनायी गयी थी जिसका आयोजन दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती के बहाने किया गया था। इसके लिए 2 लाख पार्टी कार्यकर्ताओं को तैयार किया गया था, जो इस परीक्षा का संचालन करें ‘‘ताकि आनेवाली पीढ़ियां इतिहास में हुई शख्सियतों के बारे में जान सकें जिनके बारे में लोगों को अभी तक नहीं बताया गया है।’’ (http://indianexpress.com/article/india/deendayal-upadhyaya-centenary-bjp-hands-students-booklets-to-prep-for-exam-on-rss-schemes-of-modi-yogi-govts-4778173/) देख सकते हैं कि शिक्षित युवाओं को देश के महान विचारकों के बारे में बताने की इस जल्दबाजी में पुस्तिका में गांधी और नेहरू का जिक्र तक नहीं मिलता। 

किसने कहा कि भारत एक हिन्दु राष्ट है ?

उत्तर: डा केशव बलिराम हेडगेवार

शिकागो की धर्मसभा में स्वामी विवेकानन्द ने किस धर्म की हिमायत की ?

उत्तर: हिन्दुत्व

महाराजा सुहेलदेव ने किस मुस्लिम आक्रांता को गाजर मूली की तरह काट दिया था ?

उत्तरः सैययद सालार मसूद गाज़ी

रामजन्मभूमि कहां है ?

उत्तर: अयोध्या

हरिजनों को लेकर गांधी और कांग्रेस के दावों को चुनौती देने के लिए डा अंबेडकर ने किस किताब की रचना की थी ?

उत्तर: कांग्रेस और गांधी ने 

पूर्वाग्रहों से भरे यह प्रश्न ‘‘सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता 2017’’ नामक 70 पेजी उस पुस्तिका का हिस्सा है जिन्हें उत्तर प्रदेश के स्कूलों में वितरित किया गया है।

डा अम्बेडकर को लेकर उठाए गए प्रश्न का सही जवाब है ‘‘अछूतों के लिए कांग्रेस और गांधी ने क्या किया’। वैसे उन्होंने ‘रिडल्स इन हिन्दुइजम’ और ‘जातिभेद का विनाश’ नामक किताबें भी लिखीं, मगर इनको लेकर प्रश्न से भाजपा का कोई हित नहीं सधता। विवेकानन्द ने हिन्दु धर्म के बारे में बात रखी न कि उसके राजनीतिक प्रगटीकरण हिन्दुत्व के बारे में, मगर इस पुस्तिका को प्रकाशित करने के पीछे का उददेश अचूक होना कत्तई नहीं था।

(https://thewire.in/163836/bjp-distributes-booklets-to-up-students-on-modi-yogi-government-schemes/)

हुकूमत द्वारा दीनदयाल उपाध्याय को राष्टीय स्तर पर विमर्श के केन्द्र में स्थापित करने की इस कवायद का प्रतिबिम्बन राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द द्वारा 71 वें स्वाधीनता दिवस के अवसर पर दिए भाषण में भी दिखाई दिया जब उन्होंने ‘‘एक ऐसा दयालु और समतामूलक समाज निर्माण का आवाहन किया जो जेण्डर या धार्मिक पृष्टभूमि के आधार पर भेदभाव न करता हो’’ और साथ ही उन्होंने संघ के विचारक दीनदयाल उपाध्याय की ‘‘एकात्म मानवतावाद’’ की अवधारणा की दुहाई भी दी।

‘‘नए भारत को चाहिए उस एकात्म मानववादी तत्व को शामिल करना जो हमारे डीएनए का हिस्सा है और जिसने हमारे मुल्क और हमारी सभ्यता को परिभाषित किया है।’’ स्वतंत्रतादिवस की पूर्वसंध्या पर दिए अपने भाषण में कोविन्द ने कहा, जो इस संदर्भ में अधिक अहमियत धारण करता  हैं क्योंकि साम्प्रदायिकता की बढ़ती घटनाओं को लेकर मोदी सरकार पर हमले तेज हुए हैं। यह पहला मौका रहा है जब ‘‘एकात्म मानववाद” की बात, जो भाजपा का सिद्धान्त है, उसका राष्टपति के भाषण में उल्लेख हुआ है। यह इसी का संकेत है कि किस तरह आज संघ का वर्चस्व बना हुआ है।

(http://timesofindia.indiatimes.com/india/kovind-new-india-must-have-integral-humanism/articleshow/60066912.cms)

प्रश्न उठता है कि क्या दीनदयाल उपाध्याय – जिन्होंने अपने राजनीतिक-सामाजिक जीवन की शुरूआत संघ के कार्यकर्ता के तौर पर 1937 में की और जो जल्द ही संघ के तत्कालीन सुप्रीमो गोलवलकर के करीबी बने, वह क्या वाकई इतनी बड़ी शख्सियत थे – जैसा कि उनके अनुयायी समझते हैं या वह संघ के तमाम प्रचारकों की तरह ही थे, उसी किस्म के संकीर्ण विश्वदृष्टिकोणवाले और पूर्वाग्रहों से भरे मानसवाले और ज्ञान तथा सूचनाओं के मामले में उसी तरह के कूपमंडूक ! हां, उनकी खासियत शायद यह थी कि भारतीय राजनीति के तत्कालीन हालात के मददेनज़र जब हिन्दुत्व की सियासत हाशिये पर थी, उन्होंने हिन्दुत्व की बहुसंख्यकवादी विचारधारा को उपरी तौर पर समय के हिसाब से ढालने की कोशिश की।

क्या वह हिन्दुत्व की कतारों के ‘विद्रोहियों’ में शुमार थे जो अपने संगठन की एक ही सांचे में ढालने का विरोध करते थे और चाहते थे कि उसे हिन्दुत्व से ‘‘भारतीयत्व’’ की दिशा में संक्रमण करना चाहिए या इस बात के प्रति सचेत थे कि अगर हिन्दुत्व के विचार को लोकप्रिय बनाना है तो उसे ‘‘समावेशी दिखना’’ भी पड़ेगा। शायद वह इस बात के प्रति भी सचेत थे कि आज़ादी के दिनों के ऐतिहासिक संघर्षों के दौर में संघ के दूर रहने का मामला अभी लोगों के दिलोदिमाग पर ताज़ा है या महात्मा गांधी की हत्या में हिन्दुत्व बहुसंख्यकवादी जमातों की भूमिका अभीभी लोगों के जेहन में कायम है और अब शायद समय आ गया है कि लोग एक ऐसी नयी जुबां में बोले गोया जो लोगों के प्रति अधिक सरोकार रखते हों।

निःस्सन्देह उनके मूल्यांकन में एक उलझन इस वजह से भी उपस्थित होती है कि उनका देहांत काफी कम उम्र में हुआ। / मौत के समय वह 52 वर्ष के थे/ एक ट्रेन यात्रा में वाराणसी के पास स्थित मुगलसराय में वह रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत पाए गए, और उनकी लाश कुछ घंटों तक वहीं पड़ी रही। उनकी मौत को लेकर एक विवाद यह भी चलता रहता है कि उन्हें किसने मारा। उनके एक पूर्व साथी बलराज मधोक – जो उनके असामयिक इन्तक़ाल के बाद भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने थे, अलबत्ता संघ के नियंत्रण से स्वायत्त होने की कोशिश में बाद में हटा दिए गए थे – के मुताबिक वह ‘‘परिवार’’ की आंतरिक राजनीति का शिकार हुए। अपनी आत्मकथा में वह साफ लिखते हैं कि उनके अपने लोगों द्वारा रची साजिश में ही वह मारे गए। अपनी इस आत्मकथा ‘‘जिन्दगी का सफर – 3ः दीनदयाल उपाध्याय की हत्या से इंदिरा गांधी की हत्या तक’’ /दिनमान प्रकाशन, दिल्ली, पेज 22-23/ में वह लिखते हैं कि

दीनदयाल की हत्या के पीछे न कम्युनिस्टों का हाथ था, न हीं किसी चोर का हाथ था..उन्हें अपने लोगों द्वारा भेजे गए हत्यारे ने ही मारा। ..उनकी हत्या भाड़े के हत्यारे ने की। मगर उनकी हत्या के साजिशकर्ता स्वार्थी एवं मतलबी किस्म के संघ-जनसंघ के ऐसे नेता थे।..’’

[Balraj Madhok, Zindagi Ka Safar—3:Deen Dayal Upadhyay Ki Hatya Se Indira Gandhi Ki Hatya Tak, Dinman Prakashan, Delhi, 22, 23.]

दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के बाद की पड़ताल पर अधिक सामग्री ए जी नूरानी के एक अन्य लेख मेें भी मिलती है। /देखें,https://thewire.in/181125/deen-dayal-upadhyaya-death-mystery/

एक अतिरिक्त कारण जिसकी वजह से उनका वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन थोड़ा चुनौतीपूर्ण हो जाता है उसका ताल्लुक उनकी रचना ‘एकात्म मानववाद’ से है जो भारतीय जनसंघ के सम्मेलन में उन्होंने दिए व्याख्यानों में पहली दफा प्रस्तुत किया गया था। इसमें पहली दफा हिन्दुत्व की अपील को विस्तारित करने की, गांधीवादी विमर्श का इस्तेमाल करने की कोशिश की गयी थी । शायद यही वजह हो कि जब संघ के मुखपत्र कहे जानेवाले ‘आर्गनायजर’ में प्रकाशित दीनदयाल उपाध्याय के कालम ‘‘पोलिटिकल डायरी’’ को जब किताब रूप में संकलित किया गया तब उसकी प्रस्तावना संपूर्णानन्द ने लिखी जो कांग्रेसी थे और कुछ समय तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्राी भी रह चुके थे। दीनदयाल को लेकर उनका कहना था:

.. ये शब्द हमारे समय के अत्यन्त महत्वपूर्ण नेताओं में से एक नेता की कल्पनाओं को अभिव्यक्त करते हैं, जो अपने देश के सर्वश्रेष्ठ हित सम्पादन के लिए अपने को अर्पित कर चुका था, जो निर्मल चरित्रवाला था और जो ऐसा नेता था, जिसके वजनदार शब्द हजारों-हजारों शिक्षित व्यक्तियों को भावाभिभूत कर देते थे।’’ /vi  दीनदयाल उपाध्याय, पोलिटिकल डायरी, सुरूचि प्रकाशन, दिल्ली, नवम्बर 2014/

यह बेहतर होगा कि हम दीनदयाल उपाध्याय की सामाजिक राजनीतिक यात्रा पर निगाह डालें और उनकी प्रमुख रचनाओं का आकलन करें ताकि हम यह समझ सकें कि ‘आधुनिक भारत के निर्माता’ की श्रेणी में उन्हें शुमार किया जाना कहां तक वाजिब है।

वैसे इस बात का संकेत पिछले साल ही दिया गया था कि दीनदयाल की जन्मशती को लेकर जारी विभिन्न आयोजन किस तरह उन्हें ‘आधुनिक भारत के निर्माताओं’ की कतार में शामिल कराने को लेकर है। खुद जनाब मोदी ने पिछले साल कोझिकोड की अपनी आम सभा में यह बात रेखांकित की थी। ( https://scroll.in/article/818729/why-is-br-ambedkars-stock-so-low-in-narendra-modis-books-now) गौरतलब है कि उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय को महात्मा गांधी और लोहिया जैसों की श्रेणी में रखा था ‘‘‘जिन्होंने विगत सदी में भारतीय राजनीतिक चिन्तन को प्रभावित किया एवं आकार दिया था।’’ उसी वक्त़ लोगों की निगाह में यह बात आयी थी कि किस तरह उन्होंने अंबेडकर का नामोल्लेख तक नहीं किया था।

4.

Image result for golwalkar deendayal

(Photo Courtesy : thewire.in)

गोलवलकरी सांचे में ढला व्यक्तित्व !

वर्ष 1916 में जनमे दीनदयाल / मृत्यु फरवरी 1968/ ने स्नातक की अपनी शिक्षा सनातन धर्म कालेज, कानपुर से की और इलाहाबाद से एल टी किया। कालेज के दिनों में ही वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध सुंदर सिंह भंडारी के करीबी दोस्त बने। उन्होंने 1937 में संघ के साथ जुड़ने का निर्णय लिया और 1942 में प्रचारक बनने का अर्थात संघ का पूरा वक्ती कार्यकर्ता बनने का निर्णय लिया। उनके जीवनीकार के मुताबिक

जब वह कानपुर से स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे तब दीनदयालजी अपने वर्गमित्र बालुजी महाशब्दे के माध्यम से संघ के सम्पर्क में आए। वहीं उनकी मुलाकात संघ के संस्थापक-सदस्य डा हेडगेवार से हुई। बाबासाहेब आपटे और दादाराव परमार्थ के साथ हेडगेवार छात्रावास में रहते थे।दीनदयालजी ने एक शाखा पर बौद्धिक विमर्श के लिए उन्हें आमंत्रित किया।…..दीनदयालजी 1937 से लेकर 1941 तक छात्र रहे, उसके बाद उन्होंने प्रयाग से बी टी की डिग्री हासिल की, मगर न उन्होंने कोई नौकरी की और न ही उन्होंने शादी की। उन्होंने नागपुर के संघ शिविर में चालीस दिन के गर्मी के कैम्प में उपस्थिति अवश्य दर्ज करायी। 1939 से 1942 के दरमियान उन्होंने संघ का प्रशिक्षण इन गर्मी के शिविरों में हासिल किया।

हालांकि दीनदयालजी इस प्रशिक्षण के शारीरिक मेहनत को अधिक झेल नहीं सके अलबत्ता वह उसके शैक्षिक हिस्से में सक्रिय रहे। इस सम्बन्ध में बाबासाहब आपटे लिखते हैं:‘‘ पंडित दीनदयालजी ने उनके उत्तरों के कई हिस्सों का पद्यरूप में प्रस्तुत किया। वह महज पद्य करना नहीं था, न ही वह कल्पना की उड़ान थी। उन्होंने उत्तर लिखने में गद्य के बजाय पद्य का माध्यम अपनाया। वह संतुलित और तार्किक था। ..

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद और संघ के शिक्षा विभाग में प्रशिक्षण लेने के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय संघ के पूरावक्त़ी प्रचारक बने और वह जीवन के अन्त तक इस पथ पर बने रहे। वह राष्टीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से राजनीति में आए और भारतीय जनसंघ के महासचिव बने और बाद में उसके अध्यक्ष बने। इस तरह उनका समूचा जीवन राजनीतिक विचार प्रक्रिया का मूर्तिमान रूप था।

(http://deendayalupadhyay.org/rss.html)

वर्ष 1942 में वह लखीमपुर जिले के पूरा वक्ती तहसील संगठनकर्ता बनाए गए, और 1945 तक आते आते वह समूचे संयुक्त प्रांत / आज के उत्तर प्रदेश/ के सहप्रांतीय संगठनकर्ता के तौर पर तैनात कर दिए गए। हालांकि वह कालखण्ड भारतीय समाज के लिए जबरदस्त उथल पुथल का था – जहां ब्रिटिशों के खिलाफ उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष अपने उरूज पर था और लोग जेलों में जा रहे थे, लाठी गोलियां संगीनें झेल रहे थे, मगर अपने तमाम सहमना स्वयंसेवकों/प्रचारकों की तरह दीनदयाल उपाध्याय भी उससे दूर रहे और अपने आप को संगठन निर्माण पर केन्द्रित किए रहे। संगठन के वफादार सिपाही होने के नाते वह संघ सुप्रीमो गोलवलकर द्वारा तय की राजनीतिक लाइन का ही अनुगमन कर रहे थे। गोलवलकर की संकलित रचनाओं में इसका स्पष्ट उल्लेख है जब वह बताते हैं:

‘1942 में कइयों के दिलों में कुछ करने की जबरदस्त तमन्ना थी। उन दिनों में भी संघ का दैनंदिन कार्य चलता रहा और संघ ने तय किया था कि वह प्रत्यक्ष कुछ नहीं करेगा, हालांकि संघ के स्वयंसेवकों में दिलो दिमाग में उथल पुथल जारी रही। हमारे भी कई स्वयंसेवक कहने लगे कि संघ निष्किय लोगों का संगठन है और उसकी बातें निरूपयोगी होती हैं। वह भी काफी निराश हुए।’ [M.S. Golwalkar, Shri Guruji Samagra Darshan (Collected Works of Golwalkar in Hindi), vol. IV, Bhartiya Vichar Sadhna, Nagpur, nd, 40]

अगर हम 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन पर अलग अलग स्थानों पर दिए विवरणों पर निगाह डालें तो उस भारी उथलपुथल की तीव्रता दिखाई देती है। मालूम हो कि 9 अगस्त 1942 से 21 सितम्बर 1942 के बीच भारत छोड़ो आन्दोलन में

550 डाकघरों पर, 250 रेलवे स्टेशनों पर हमले हुए, तमाम रेल लाईनों को नुकसान पहुंचाया गया, 70 पुलिस स्टेशन तबाह किए गए और 85 से अधिक सरकारी इमारतों को नष्ट किया गया। 2,500 से अधिक स्थानों पर टेलिग्राफ की लाइनों को काट दिया गया। सबसे अधिक हिंसा बिहार में हुई। व्यवस्था फिर कायम करने के लिए भारत सरकार को 57 बटालियन ब्रिटिश सेना तैनात करनी पड़ी।

(John F. Riddick, The History of British India: A Chronology (2006) p 115)

‘करो या मरो’ के नारे के साथ उठे इस आन्दोलन को कुचलने के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक लाख से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया, यहां तक जनविद्रोह को कुचलने के लिए कई स्थानों पर ब्रिटिश सेना को हेलिकॉप्टरों से भी गोलीचालन करना पड़ा। भारत छोड़ो आन्दोलन के इन झंझावाती दिनों में हजारों लोग मारे गए। कई स्थानों पर हड़तालें हुई। महाराष्ट्र का सातारा या उत्तर प्रदेश के बलिया जैसे कई स्थानों पर ब्रिटिश शासन को समाप्त घोषित कर ‘‘समानान्तर सरकारें’’ कायम की गयीं। जनता का दमन करने के लिए कई स्थानों पर ब्रिटिश सेना ने जनता को सरेआम चाबूकों से पीटा। /विस्तार से देखें:  [ D, Fisher D; Read A (1998). The Proudest Day: India’s Long Road to Independence. WW Norton. p. 330] / सभी जानेमाने राष्टीय नेताओं को या तो गिरफ्तार कर लिया गया या उन्हें भूमिगत होकर अपने संघर्ष का संचालन करना पड़ा। गुप्त रेडियो स्टेशनों से वह अपने संदेशों को लोगों तक पहुंचाते रहे। इस उग्र जनान्दोलनों, जनहलचलों से ब्रिटिश इतने आतंकित हुए थे कि उन्होंने एक जंगी जहाज तैयार रखा था, जिसमें गांधी और अन्य कांग्रेसी नेताओं को देश के बाहर ले जाने की योजना बनायी गयी थी। बाद में उन्होंने इस योजना पर अमल नहीं किया क्योंकि उन्हें लगा कि इस कदम से जनविद्रोह अधिक भड़क सकता है।

यह अलग बात है कि इतने बड़े पैमाने पर उठी जनहलचलों का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसके कार्यकर्ताओं पर कुछ भी असर नहीं था, वह बेहद अनुशासित तरीके से संगठन निर्माण में, शाखा लगाने में और स्वयंसेवकों को बौद्धिक सुनाने में मुब्तिला था। संघ के अग्रणी गोलवलकर जैसे लोगों से लेकर दीनदयाल उपाध्याय जैसे हजारों कार्यकर्ताओं के बीच यही आलम था कि वह आंदोलन के हिसाब से देखें तो पूरी तरह निष्क्रिय थे। संघ के कारिन्दों की यह निष्क्रियता या उनकी तटस्थता ब्रिटिश सरकार की जासूसी एजेंसियों के उन दिनों के रिपोर्टो में भी दिखती है। ऐसी एक रिपोर्ट के मुताबिक

.. संघ ने अपने आप को बेहद सुनियोजित तरीके से कानून के दायरे में रखा है और अगस्त 1942 की घटनाओं के आलोक में उठे संघर्षों में शामिल होने से इन्कार किया हैं । (Andersen, WalterK.&Damle, Shridhar D.The Brotherhood in Saffron: the Rashtriya Swayamsevak Sangh and Hindu Revivalism, Westview Press, 1987, 44.)

बाद में दीनदयाल उपाध्याय ने निम्नलिखित शब्दों में आंदोलन से अपनी दूरी को उचित ठहराते हुए लिखा। न इसमें कोई आत्मालोचना का स्वर था और न ही यह स्वीकारोक्ति की हमारी यह गलती थी बल्कि यह उन तमाम लोगों को अपमानित करना था जिन शहीदों ने अपनी जान कुर्बान की थी, आज़ादी के जिन दीवानों ने अपना सबकुछ उसके लिए कुर्बान किया था।

‘हम लोग इस गलत धारणा से अभिभूत थे कि स्वतंत्रता का मतलब महज विदेशी शासन की समाप्ति है। विदेशी हुकूमत के विरोध का मतलब यह कोई जरूरी नहीं कि मात्रभूमि के लिए सच्चा प्यार हो। …स्वतंत्राता के लिए संघर्ष के दरमियान ब्रिटिश शासन की मुखालिफत पर अधिक जोर दिया गया।.. और यही माना जाने लगा कि जिस किसी ने ब्रिटिशों का विरोध किया वही देशभक्त है। उन दिनों ब्रिटिशों के खिलाफ असन्तोष पैदा करने के लिए एक सुनियोजित मुहिम चलायी गयी जिसमें देश की जनता के सामने मौजूद हर समस्या और तकलीफ के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगा। 

(C. P. Bhishikar, Pandit Deendayal Upadhyaya: Ideology and Perception: Concept of the Rashtra,vol. v, Suruchi, Delhi, 169. )

5.

जाति याने स्वधर्म – दीनदयाल  

उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षो के उभार के अलावा – जबकि तीसरी दुनिया के तमाम मुल्कों में ऐसे संघर्ष तेज हो रहे थे – उस कालखण्ड की क्या विशिष्टता कही जा सकती है जब एक साधारण प्रचारक के तौर पर दीनदयाल उपाध्याय ने सामाजिक-राजनीतिक जीवन का आगाज़ किया। याद करें कि यही वह दौर रहा है जब नात्सीवाद-फासीवाद का उभार समूचे यूरोप को ग्रसने को करीब था और दूसरी तरफ सोविएत रूस में कम्युनिस्टों की अगुआई में चल रहा समाजवादी निर्माण का दौर तथा उसके साथ ही कई मुल्कों में कम्युनिस्टों की अगुआई में जुझारू संघर्ष की लहरें एक नयी इबारत लिखती दिख रही थीं। पीछे मुड़ कर देखें तो विश्व इतिहास में वह एक ऐसा मुक़ाम था जब सामन्तवाद, उपनिवेशवाद की पुरानी दुनिया भहराकर गिर रही थी और नयी दुनिया आकार ले रही थीं।

और इस झंझावाती दौर में हिन्दु राष्ट्र की सियासत किस दिशा में आगे बढ़ रही थी इसका अन्दाज़ा हम लगा सकते हैं कि किस तरह गोलवलकर – जो उन दिनों संघ के सुप्रीमो थे – चीज़ों को, आसपास की परिस्थिति को देख रहे थे और किस तरह की कार्रवाइयों में मुब्तिला थे। यह इस बात को स्पष्ट करेगा कि दीनदयाल उपाध्याय जैसे स्वयंसेवक/प्रचारक उन दिनों क्या कर रहे थे। और यह कहना कत्तई गलत नहीं होगा कि अपने खास किस्म के विश्वदृष्टिकोण के चलते जिसका फोकस ‘‘हिन्दु धर्म की गौरवशाली परम्पराओं पर आधारित हिन्दू राष्ट के निर्माण पर था ’’ और जिसमें बर्तानवी उपनिवेशवाद के बरअक्स मुसलमानों को बड़ा दुश्मन समझा जा रहा था और जिसमें नात्सीवाद-फासीवाद के अन्तर्गत हाथ में लिए गए ‘‘नस्लीय शुद्धिकरण’’ के अभियानों की तारीफ की जा रही थी, गोलवलकर के लिए यह मुमकिन नहीं हुआ कि वइ इतिहास की बदलती धारा पर अपनी नब्ज रख सके। यह वह अडियल रूख था जिसके चलते न केवल वह व्यक्तिगत तौर पर उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष से दूर रहे बल्कि उन्होंने अपने संगठन के लिए कोई ऐसा सकारात्मक कार्यक्रम नहीं बनाया ताकि वह उसमें सहभागी हो सके।

जैसा कि जानते हैं कि हिन्दुत्व  के फलसफे के प्रति उनका पहला प्रमुख सैद्धांतिक योगदान ‘‘वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड’’ /1938/ के रूप में सामने आया। सतहत्तर पेज की इस किताब का एक उद्धरण यह बताने के लिए काफी है कि उसकी अन्तर्वस्तु के बारे में राय बनायी जाए। गोलवलकर ने लिखा था:

‘‘भारत की विदेशी नस्लों को चाहिए कि वह हिन्दु संस्कृति और भाषा को अपना ले, उसे चाहिए कि वह हिन्दू धर्म का सम्मान करना सीखे ,,हिन्दू नस्ल और संस्कृति – अर्थात हिन्दू राष्ट्र – के महिमामंडन के अलावा उसे अन्य किसी विचार पर गौर नहीं करना चाहिए और उन्हें अपने अलग अस्तित्व को भुलाकर हिन्दू नस्ल में समाहित कर देना चाहिए या वे चाहे तो देश में रह सकते हैं, मगर उन्हें फिर हिन्दू  राष्ट्र के अधीन रहना पड़ेगा, किसी भी चीज़ पर दावा नहीं करना होगा, किसी भी तरह के विशेषाधिकार उन्हें हासिल नहीं होंगे – यहां तक कि नागरिक अधिकार भी नहीं मिलेंगे। कमसे कम, उनके सामने और कोई रास्ता अपनाने के लिए नहीं होगा। हम एक प्राचीन मुल्क हैं ; आईए एक प्राचीन मुल्क की तरह विदेशी नस्लों के साथ पेश आए, जिन्होंने इस देश में रहना तय किया है।

/माधव सदाशिव गोलवलकर, वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड/

जाननेयोग्य है कि 77 पेज की उपरोक्त किताब गोलवलकर ने तब लिखी थी जब हेडगेवार ने उन्हें सरकार्यवाह के तौर पर नियुक्त किया था। ‘गैरों’ के बारे में यह किताब इतना खुल कर बात करती है या जितना प्रगट रूप में हिटलर द्वारा यहुदियों के नस्लीय शुद्धिकरण के सिलसिले को अपने यहां भी दोहराने की बात करती है कि संघ तथा उसके अनुयायियों ने खुलेआम इस बात को कहना शुरू किया है कि वह किताब गोलवलकर की अपनी रचना नहीं है बल्कि बाबाराव सावरकर की किन्हीं किताब ‘राष्ट्र मीमांसा’ का गोलवलकर द्वारा किया गया अनुवाद है।

दिलचस्प बात है कि इस मामले में उपलब्ध सारे तथ्य इसी बात की ओर इशारा करते हैं कि इस किताब के असली लेखक गोलवलकर ही हैं। खुद गोलवलकर 22 मार्च 1939 को इस किताब के लिये लिखी गयी अपनी प्रस्तावना लिखते हैं कि प्रस्तुत किताब लिखने मंे राष्ट्र मीमांसा ‘ मेरे लिये ऊर्जा और सहायता का मुख्य स्त्रोत रहा है।’ मूल किताब के शीर्षक मंें लेखक के बारेमंे निम्नलिखित विवरण दिया गया है: ‘‘माधव सदाशिव गोलवलकर, एम. एस्सी. एल.एल.बी. ( कुछ समय तक प्रोफेसर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)।’’ इसके अलावा, किताब की भूमिका में, गोलवलकर ने निम्नलिखित शब्दों में अपनी लेखकीय स्थिति को स्वीकारा था: ‘‘यह मेरे लिये व्यक्तिगत सन्तोष की बात है कि मेरे इस पहले प्रयास – एक ऐसा लेखक जो इस क्षेत्र में अनजाना है – की प्रस्तावना लोकनायक एम. एस. अणे ने लिख कर मुझे सम्मानित किया है।’’ (‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड’ गोलवलकर की भूमिका से, पेज 3 )

अमेरिकी विद्वान जीन ए कुरन – जिन्होंने पचास के दशक की शुरूआत में संघ पर अध्ययन किया तथा जो उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं, अपनी किताब ‘‘‘मिलिटेन्ट हिन्दूइजम इन इंडियन पॉलिटिक्स: ए स्टडी आफ द आरएसएस ’ /1951/में इस बात की ताईद करते हैं कि किताब के रचयिता गोलवलकर ही है और उसे संघ की ‘बाइबिल’ के तौर पर संबोधित करते हैं। ए जी नूरानी अपनी चर्चित किताब ‘द आर एस एस एण्ड द बी जे पी: ए डिवीजन आफ लेबर’/ पेज 18-19, लेफटवर्ड बुक्स/ बताते हैं कि वर्ष 1978 में सरकार के सामने प्रस्तुत अपने लिखित शपथपत्र में अनुच्छेद 10 में आधिकारिक तौर पर बताते हैं कि ं

ः भारत ऐतिहासिक तौर पर प्राचीन समय से ही हिन्दू राष्ट रहा है, इसे वैज्ञानिक आधार प्रदान करने के लिए माधव सदाशिव गोलवलकर ने एक किताब लिखी थी जिसका शीर्षक था ‘‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड’’। अनुच्छेद 7 में उन्होंने उनकी किताब ‘‘‘बंच आफ थॉटस/विचार सुमन/’’1966/ का उल्लेख भी किया ताकि ‘‘संघ के कामों एवं उसकी गतिविधियों के उददेश्य, वास्तविक स्वरूप, दायरा आदि के बारे में स्पष्ट हुआ जा सके।’’

संघ सुप्रीमो के तौर पर गोलवलकर के विचारों का अन्य अहम मसला दलितों एवम स्त्रियों के प्रति तत्कालीन नेतृत्व का पुरातनपंथी नज़रिया रहा है जिस पर ब्राहमणवादी पुनरूत्थान का प्रभाव साफ दिखता है। यह अकारण नहीं था कि आज़ादी के वक्त जब नया संविधान बनाया जा रहा था, तब संघ ने उसका जोरदार विरोध किया था और उसके स्थान पर मनुस्मृति को अपनाने की हिमायत की थी। इस विरोध की बानगी ही यहां दी जा सकती है। अपने मुखपत्र  ‘आर्गेनायजर’, (30 नवम्बर, 1949, पृष्ठ 3) में संघ की ओर से लिखा गया था कि

‘हमारे संविधान में प्राचीन भारत में विलक्षण संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु की विधि स्पार्टा के लाइकरगुस या पर्सिया के सोलोन के बहुत पहले लिखी गयी थी। आज तक इस विधि की जो ‘मनुस्मृति’ में उल्लेखित है, विश्वभर में सराहना की जाती  रही है और यह स्वतःस्फूर्त धार्मिक नियम -पालन तथा समानुरूपता पैदा करती है। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए  उसका कोई अर्थ नहीं है।’’

उन्हीं दिनों जब अम्बेडकर एवं नेहरू की अगुआई में ‘हिन्दू कोड बिल’ के जरिए हिन्दू स्त्रियों को सम्पत्ति एवं विरासत में सीमित अधिकार दिलाने की पहल हुई तब गोलवलकर एवं उनके सहयोगियों ने महिलाओं के इस ऐतिहासिक सशक्तिकरण के खिलाफ व्यापक आन्दोलन छेड़ा था । उनका कहना था: यह हिन्दू परम्पराओं एवं संस्कृति के प्रतिकूल है।

निश्चित ही दीनदयाल उपाध्याय – जो संगठन के अनुशासित प्रचारक थे – इस समूचे घटनाक्रम के न केवल गवाह थे बल्कि उसमें सहभागी भी थे, उनकी इसी निष्ठा के चलते वह संघ सुप्रीमो के करीबियों में शुमार किए जाते थे। बाद के दिनों में भी दीनदयाल ने संघ सुप्रीमो के इन जाति के महिमामण्डन के विचारों पर सवाल नहीं उठाया बल्कि उसे अलग ढंग से औचित्य प्रदान करते रहे। उनके तर्कों में अलग किस्म का परिष्कार दिख रहा था, मगर जाति की वैधता पर कहीं भी प्रश्न नहीं थे बल्कि उसे स्वधर्म के समकक्ष रखा गया था।

‘‘हालांकि आधुनिक दुनिया में समानता के नारे उठते हैं, समानता की अवधारणा को सोच समझ कर स्वीकारने की जरूरत है। हमारा वास्तविक अनुभव यही बताता है कि व्यावहारिक और भौतिक नज़रिये से देखें तो कोई भी दो लोग समान नहीं होते …बहुत सारी उग्रता से बचा जा सकता है अगर हम हिन्दु चिन्तकों द्वारा प्रस्तुत किए गए समानता के विचार पर गंभीरता से गौर करें। सबसे पहला और बुनियादी प्रस्थानबिन्दु यही है कि भले ही लोगों के अलग अलग गुण होते हैं और उन्हें उनके गुणों के हिसाब से अलग अलग काम आवंटित होते हैं, मगर सभी काम समान रूप से सम्मानजनक होते हैं। इसे ही स्वधर्म कहते हैं और इसमें एक स्पष्ट गारंटी रहती है कि स्वधर्म का पालन ईश्वर की पूजा के समकक्ष होता है। इसलिए स्वधर्म की पूर्ति के लिए सम्पन्न किए गए किसी भी कर्तव्य में, उच्च और नीच और सम्मानित तथा असम्मानित का प्रश्न उठता ही नहीं है।  अगर कर्तव्य को बिना स्वार्थ के पूरा किया जाए, तो करनेवाले पर कोई दोष नहीं आता।” [vii]  [vii] C. P. Bhishikar, Pandit Deendayal Upadhyaya: Ideology and Perception: Concept of the Rashtra,vol. v, Suruchi, Delhi, 169

 

वैचारिक तौर पर गहरी नजदीकी हो या संगठन के उददेश्यों को लेकर अनुशासित ढंग से कार्य करना हो, या नेतृत्व के हर आदेश को सर आंखों पर लेना हो, दीनदयाल उपाध्याय सभी परीक्षाआंे में खरे उतरते गए। यह अकारण नहीं था कि संघ के एक वरिष्ठ नेता  ने लिखा है कि गोलवलकर गुरूजी तथा दीनदयालजी दोनों के बीच ‘‘काफी तादात्म्य था।’’ दत्तोपंत ठेंगडी, जो संघ के एक दूसरे वरिष्ठ नेता थे तथा जिन्होंने भारतीय मजदूर संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना में योगदान दिया लिखते हैं कि

‘पंडितजी का सबसे महत्वपूर्ण एवं आत्मीयता का अलौकिक संबंध तत्कालीन सरसंघचालक परम पूजनीय श्री गुरूजी के साथ था। 

परम पूजनीय श्री गुरूजी तथा श्री दीनदयाल जी के संबंधों का वर्णन करने में शब्द असमर्थ हैं। यह बात सभी निकटवर्तियों के ध्यान में आती थी कि स्वयंसेवक, प्रचारक तथा कार्यकर्ता के नाते दीनदयाल जी से श्री गुरूजी विशेष अपेक्षा रखते थे। दोनों की ‘‘वेवलैंग्थ’’ /वैचारिक तरंग-दैर्घ्य/ एक ही थी। किसी भी घटना पर श्री गुरूजी की प्रतिक्रिया क्या होगी, इसकी अचूक कल्पना दीनदयाल जी कर सकते थे।’’

/पेज 11, तत्वजिज्ञासा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय विचार दर्शन, सुरूचि प्रकाशन, दिल्ली 2016/

लाजिम था न दीनदयाल ने न जाति के प्रश्न पर, न ही स्वतंत्राता संग्राम के प्रश्न पर और न ही नात्सीवाद के आकलन पर गोलवलकर से कुछ अलग बात कही थी और यही स्थिति तबभी थी जब गोलवलकर ने ‘‘संकर को लेकर हिन्दु प्रयोगों’’ की बात करते हुए शेष हिन्दुओं की तुलना में उत्तर भारत के ब्राहमणों को वरीयता प्रदान की। उनका यह भी कहना था कि भारत में हिन्दुओं की एक बेहतर नस्ल मौजूद है और हिन्दुओं की एक कमजोर नस्ल मौजूद है, जिसे वर्णसंकर के माध्यम से बेहतर करना होगा।

गुजरात युनिवर्सिटी के समाज विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के सामने प्रस्तुत अपने इस व्याख्यान में / 17 नवम्बर, 1960/ गोलवलकर ने अपना यह नस्लवादी सिद्धांत पेश किया था / देखें, Organiser जनवरी 2, 1961, पेज 5/

आज के वक्त़ में  संकर  /क्रॉस ब्रिडिंग/ के प्रयोग सिर्फ जानवरों पर किए जाते हैं। ऐसे प्रयोगों को मनुष्य जाति पर करने  का साहस आज के कथित आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी नहीं किया। अगर आज कुछ हद तक मानवीय पार प्रजनन संभव हो सका है तो वह वैज्ञानिक प्रयोगों का नहीं बल्कि यौन सुख/कामुक वासना का ही परिणाम है। आइए अब देखते हैं कि हमारे पूर्वजों ने इस क्षेत्रा में किस तरह प्रयोग किए। क्रॉस ब्रीडिंग अर्थात वर्णसंकर के जरिए मानवीय नस्ल को बेहतर करने के लिए उत्तर के नम्बूद्री ब्राहमणों को केरल में बसाया गया था और यह नियम बनाया गया था कि नम्बूद्री परिवार का बड़ा बेटा वैश्य, क्षत्रिय या शूद्र समुदायों की बेटियों से ही ब्याह करेगा। इसके अलावा एक अन्य साहसी नियम था कि किसी भी वर्ग की शादीशुदा महिला की पहली संतान नम्बूद्री ब्राहमण से पैदा होगी और बाद में वह अपने पति से प्रजनन कराएगी। आज इस प्रयोग को व्यभिचार कह सकते हैं, मगर वह वैसा नहीं था, क्योंकि पहली सन्तान तक ही सीमित था।

कई सारे संदर्भों में अपमानजनक दिखनेवाले इस वक्तव्य पर चाहे दीनदयाल उपाध्याय हों या संघ के अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ता हों, कहीं से असहमति नहीं प्रगट होती। बकौल डा शमसुल इस्लाम / ‘‘गोलवलकरज वी आर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड ए क्रिटिक, 2006, फारोस मीडिया, दिल्ली पेज 30-31/ गोलवलकर का यह वक्तव्य बताता है कि वह हिन्दुओं में उत्तम नस्ल और हीन नस्ल की बात से इत्तेफाक रखते थे। दूसरे, उनका मानना था कि उत्तर भारत के ब्राहमण, विशेषकर नम्बूद्री ब्राहमण, ही उत्तम नस्ल से सम्बद्ध थे।

6

Related image

( Photo Courtesy : thefrontline.in)

श्यामाप्रसाद मुखर्जी, राष्टीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ का निर्माणः 

सुविधा का गठजोड़ या दिलों का मिलन ?

वर्ष 1947 में दीनदयाल उपाध्याय को संयुक्त प्रांत का सहप्रचारक बनाया गया। दत्तोपंत ठेंगडी बताते हैं:

‘‘..सन 1947 में ‘राष्टधर्म’ प्रकाशन की स्थापना हुई। उसकी ओर से ‘राष्टधर्म’ मासिक, ‘पांचजन्य’ साप्ताहिक तथा ‘स्वदेश’ दैनिक प्रकाशित होते थे। पंडित जी अंतिम दो पत्रों के संपादक के रूप में काम करते थे। प्रकाशन के प्रबंध निदेशक श्री नानाजी देशमुख थे। संपादन का कार्य सर्वश्री महावीर प्रसाद ़ित्रापाठी, राजीवलोचन अग्निहोत्राी, अटलबिहारी वाजपेयी, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, गिरीशचन्द्र मिश्र, तिलक सिंह परमार, यादवराव देशमुख, वचनेश त्रिपाठी आदि ने क्रमशः संभाला था। इनके अतिरिक्त मनमोहन गुप्त, ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी, /प्रबंधक/, राधेश्याम कपूर /प्रकाशक/, पावगी, बजरंगशरण तिवारी /प्रेस व्यवस्थापक/ आदि कार्यकर्ता भी राष्टधर्म परिवार में थे। इस परिवार के वत्सलकर्ता दीनदयाल जी थे। ’’

/ पेज 5, तत्वजिज्ञासा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय विचार दर्शन, सुरूचि प्रकाशन, दिल्ली 2016/

प्रस्तुत प्रकाशन के शुरू करने के पीछे मान्यता यही थी कि हिन्दुत्व राष्टवाद का प्रचार प्रसार किया जाए। यह अलग बात है कि आज़ादी के बाद घटनाक्रम जिस कदर तेजी से घुम रहा था और जिस तरह इस आज़ादी के आंदोलन से बनायी गयी दूरी तथा गांधीहत्या में हिन्दुत्ववादियों की संलिप्तता आदि के चलते पूरे मुल्क में ऐसा वातावरण बन रहा था कि संघ के बीच जारी एक पुराना विवाद नए सिरेसे उभरा।

एक हिन्दु वर्चस्ववादी नथुराम गोडसे और उससे सम्बद्व आतंकी मोडयूल द्वारा महात्मा गांधी की हत्या, जिसमें इस विचारधारा के कई अग्रणियों ने मौन तथा सक्रिय समर्थन दिया था, और उसके बाद संघ तथा अन्य हिन्दुत्ववादी संगठनों पर लगी पाबन्दी, उनके कार्यकर्ताओं की गिरफतारी आदि ने राष्टीय स्वयंसेवक संघ के लिए अब मुमकिन नहीं रहा था कि इस विवाद को दफना दे जिसका फोकस एक राजनीतिक मंच के निर्माण से था। इसी बहस की परिणति भारतीय जनसंघ के निर्माण में हुई जहां हिन्दु महासभा से निकले श्यामाप्रसाद मुखर्जी को इस नए राजनीतिक मंच का चेहरा बनाया गया।

आखिर कौन थे श्यामाप्रसाद मुखर्जी, जो अचानक राष्टीय स्वयंसेवक संघ के लिए महत्वपूर्ण हो गए थे।

1890 में जन्मे श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपनी राजनीतिक कैरियर 1929 में शुरू की थी और वह बंगाल लेजिस्लेटिव कौन्सिल के सदस्य बने थे। उन्होंने वर्ष 1939 में हिन्दू महासभा की सदस्यता ग्रहण की ताकि भारत के हिन्दुओं के हितों की हिमायत की जा सके। वह सावरकर के करीबी सहयोगी थे। जब बंगाल में कृषक प्रजा पार्टी एवं मुस्लिम लीग की गठबंधन सरकार सत्ता में थी वह विपक्ष के नेता थे। /1937-41/ बाद में उन्होंने फजलुल हक के नेत्रत्व में बनी सरकार में वित्त मंत्राी का पद संभाला और ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के झंझावाती दिनों में भी सत्ता संभाले रहे। यही वह वक्त़ था जब ब्रिटिशों की हुकूमत को चौतरफा जबरदस्त चुनौती मिल रही थी। इतिहास गवाह है कि हिन्दु महासभा द्वारा मुस्लिम लीग के साथ सत्ता में साझेदारी का यह प्रयोग महज बंगाल तक सीमित नहीं था, वह सिंध तथा उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत तक भी फैला था और हिन्दु महासभा द्वारा सचेत ढंग से अपनायी गयी नीति का परिणाम था। मुखर्जी जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी नवस्वाधीन भारत की कैबिनेट में भी मंत्राी पद सम्भाले थे और बाद में उन्होंने नीतिगत मसले पर इस्तीफा दिया था। कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद जब खुद श्यामाप्रसाद मुखर्जी नए दल के निर्माण के लिए प्रयासरत थे / तब तक उन्होंने हिन्दु महासभा से भी अलग होने का निर्णय लिया था, जिसके बहुत दिलचस्प कारण हैं, जिनकी हम आगे चर्चा करेंगे/ तब संघ के सुप्रीमो गोलवलकर के साथ उनकी वार्ताएं चली थीं और वहीं दल बनाने का निर्णय लिया गया था। इस नए दल के गठन के लिए संघ ने अपने कुछ वरिष्ठ प्रचारकों को उनकी सहायता के लिए भेजा। दीनदयाल उपाध्याय इनमें संघ की तरफ से सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति थे।

इस पूरे सिलसिले पर निगाह डालते हुए ठेंगडी बताते हैं:

अधिवक्ता राजकुमार /लखनउ/ की अध्यक्षता में उत्तर प्रदेश जनसंघ की स्थापना हुई। उस समय दीनदयाल जी को प्रदेश जनसंघ का काम सौंपा गया। उससे पूर्व 5 मई 1951 को डा श्यामाप्रसाद मुखर्जी के नेत्रत्व में कलकत्ता में ‘‘पीपुल्स पार्टी’’ की स्थापना हुई। 27 मई 1951 को विविध प्रांतों के कार्यकर्ताओं की दिल्ली में प्रारंभिक बैठक हुई। अखिल भारतीय दल की स्थापना का उसमें विचार हुआ। 20 से 22 अक्तूबर तक दिल्ली में अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित किया गया। उसका उदघाटन राघोमल हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्रांगण में हुआ। 21 अक्तूबर को भारतीय जनसंघ की स्थापना की अधिकृत घोषणा की गयी। जनसंघ का प्रथम अखिल भारतीय अधिवेशन दिसम्बर 1952 में कानपुर में हुआ। 

/ पेज 6, तत्वजिज्ञासा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय विचार दर्शन, सुरूचि प्रकाशन, दिल्ली 2016/

इस नए संगठन – जिसका नाम ‘‘भारतीय जनसंघ’’ रखा गया था – की जो प्रोविजनल कार्यकारी कमेटी बनी उसमें अध्यक्ष के तौर पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी थे, भाई महावीर और मौलीचन्द्र शर्मा /दोनों दिल्ली से/ महासचिव थे/ और उनकी सहायता के लिए पन्द्ररह सदस्यीय टीम थी जिसमें दीनदयाल उपाध्याय / उत्तर प्रदेश/, बलराज मधोक/दिल्ली/ और अन्य राज्यों से तेरह सदस्य थे।  ( P 29, The immediate Origin of the Bharatiya Jan Sangh quoted in Hindu Nationalism and Indian Politics – The Origins and Development of Bharatiya Jana Sangh, B. D. Graham, Cambridge University Press, 1990 )

यह विचारणीय मसला है कि हिन्दुत्व दक्षिणपंथ की इन दो धाराओं के साथ आने को कैसे देखा जाए ? क्या यह महज ‘‘सुविधा का गठजोड’’ था – क्योंकि मुखर्जी – जो तब तक एक लोकप्रिय चेहरा थे, आज़ाद भारत के पहले मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्राी रह चुके थे – एक संगठन की तलाश में थे जो पार्टी बनाने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करे और दूसरी तरफ राष्टीय स्वयंसेवक संघ था, जिसे एक राजनीतिक प्लेटफार्म का निर्माण करना था तथा जो एक ‘‘‘चर्चित चेहरे’’ की तलाश में था या वह वास्तविक रूप में दिलों का मिलन था क्योंकि उनमें यह एहसास गहरा गया था कि विकसित होती परिस्थिति में उनके सामने यही बेहतर विकल्प है। गोलवलकर के दिशानिर्देशन में, /संघ की तरफ से/ इस गठजोड़ को बनाने/मजबूत करने की चुनौती और पार्टी के लिए एक मजबूत आधार कायम करने की चुनौती दीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक तथा संघ से सम्बद्ध उनके सहयोगियों के हाथ में थी। शायद इस विकसित होते गठजोड़ को लेकर क्रेग बॅक्स्टर की प्रतिक्रिया सबसे सटीक दिखती है:

‘‘ यह बात बिल्कुल सही कही गयी है कि जनसंघ का निर्माण एक संगठनविहीन नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी और एक नेतृत्वहीन संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्मिलन से हुआ। (“It has been said with good reason that the Jana Sangh resulted from a combination of a partyless leader, Shyama Prasad Mookerjee, and a leaderless party, the RSS”.)

(The Jana Sangh: A Biography of an Indian Political Party, by Craig Baxter p. 54) 

खुद संघ ने इस उदितमान संगठन को किस तरह देखा इसका अन्दाज़ा हम के आर मलकानी द्वारा ‘आर्गनायजर’ के पहले अंक में लिखे लेख मंे देख सकते हैं जो संघ पर पाबन्दी उठाए जाने के तत्काल बाद लिखा गया था:

‘कमल’ नाम से लिखते हुए के आर मलकानी ने लिखा था ‘‘ धर्म को बचाने का एकमात्रा तरीका यही है कि राजनीतिक पहिये को अपना कंधा देना । (The Jana Sangh: A Biography of an Indian Political Party by Craig Baxter p. 55, quoted in https://thewire.in/11626/a-relationship-that-goes-back-a-long-way/)

खुद गोलवलकर की इस के बारे में क्या समझदारी थी और पितृ संगठन के साथ उसके रिश्ते को लेकर वह क्या सोचते थे इसे उन्होंने एक राजनीतिक प्रशिक्षण शिविर के दौरान स्पष्ट किया:

…बाद में सिन्दी /वर्धा, महाराष्ट/में तीन सौ प्रचारकों के लिए 9 मार्च से 16 मार्च तक राजनीतिक प्रशिक्षण हेतु शिविर का आयोजन किया गया /1954/ शिविर का मकसद था राष्ट्रीय स्तर पर संघ नेतृत्व को जनसंघ के मार्फत देश के कामकाज का संचालन करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। संघ सुप्रीमो गोलवलकर ने जनसंघ के लिए अपनी द्रष्टि को बयां करते हुए कहा:

‘मिसाल के तौर पर अगर हम सोचंे कि हम एक संगठन का हिस्सा हैं और उसके अनुशासन को स्वीकारते हैं तब चुनाव का सवाल नहीं उठता। आप को जो बताया जाएगा वही करना होगा। अगर कबडडी खेलने के लिए कहा जाएगा, कबडडी खेलें ; अगर मीटिंग करने के लिए कहा जाएगा तो मीटिंग करें …मिसाल के तौर पर हमारे कुछ दोस्तों को राजनीति करने के लिए कहा गया है इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें उसमें बहुत रूचि है या उसके लिए उन्हें प्रेरणा मिली है … अगर उन्हें कहा जाएगा कि राजनीति से हट जाएं तो भी कोई आपत्ति नहीं होगी। उनकी राय की कोई जरूरत नहीं होगी। ’’

/ गोलवलकर, श्री गुरूजी समग्र दर्शन खंड 3, भारतीय विचार साधना, नागपुर 1978, पेज 32, ुquoted in http://sacw.net/article865.html/

7

श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने हिन्दु महासभा क्यों छोड़ी ?

हाल की घटनाओं ने प्रमाणित किया है कि कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने ऐसा व्यवहार किया है गोया वह हिन्दु महासभा या उसके जैसे साम्प्रदायिक संगठन के सदस्य हों। वाकई, कुछ लोगों ने कांग्रेस से इस्तीफा दिया है और वह जनसंघ में शामिल हुए हैं। यह अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि एक असली कांग्रेसी को चाहिए कि वह साम्प्रदायिक संगठनों से जितना अधिक दूर रह सकता है, रहे। हमारे कामों में और चुनावों में हमारे प्रमुख दुश्मन यही साम्प्रदायिक संगठन हैं।(Nehru, letter to PCC presidents, 19 September 1951, in Congress Bulletin, September 1951, p. 173.)

कांग्रेस बुलेटिन में 19 सितम्बर को जारी एक परिपत्र में उन्होंने ऐलान किया कि

..कांग्रेस के तरीके एवं साम्प्रदायिक तरीके में कोई भी समानता नहीं है। इसलिए कांग्रेस प्रत्याशियों को अतिरिक्त सावधानी के साथ चुनना होगा ताकि वे पूरी तरह कांग्रेस के गैरसाम्प्रदायिक चरित्रा और तरीके की नुमाइन्दगी कर सकें। साम्प्रदायिक संगठनों से सम्बद्ध लोग इसलिए इस नज़रिये के तहत संदेह से देखे जाने चाहिए। यह अहम है क्योंकि विगत समय में कांग्रेस में साम्प्रदायिक तत्वों की थोड़ी घुसपैठ हुई है।

(Nehru, circular letter, 19 September 1951, in ibid., p. 176.)

विचारणीय मसला है कि आखिर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने हिन्दु महासभा से तौबा क्यों की और किस आधार पर उन्होंने संघ के साथ जुड़ कर राजनीतिक पार्टी बनाने का निर्णय लिया !

इसमें कोई सन्देह नहीं कि ब्रिटिश हुकूमत के प्रति रूख को लेकर हिन्दु महासभा का रूख संघ से गुणात्मक तौर पर भिन्न नहीं था। वह बात अब इतिहास हो चुकी है कि जब ब्रिटिश सरकार दूसरे विश्व युद्ध में उलझी थी और ‘भारत छोड़ो’ का कांग्रेस का आवाहन पूरे देश में गूंज रहा था, हजारों ऐसे लोग जो सरकारी नौकरियों में तैनात थे, यहां तक कि पुलिस एवं सेना में भी काम कर रहे थे, उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपना विरोध जताते हुए नौकरियां छोड़ी थीं ; जबकि हिन्दुत्व के विचारों की हिमायती जमातों ने समझौतापरस्ती का रूख अख्तियार किया था।  जहां संघ ने अपने आप को ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ से अलग रखा था तथा अपने संगठन निर्माण पर केन्द्रित किया था / जिसका जिक्र पहले किया जा चुका है / वहीं हिन्दु महासभा एवं उसके तत्कालीन अध्यक्ष सावरकर एक कदम आगे बढ़ कर ब्रिटिश सेना में भारतीय जवानों की भरती की मुहिम चला रहे थे। उनका आवाहन था ‘हिन्दुओं का सैन्यीकरण करो और राष्ट का हिन्दुकरण करो’ और इसी आवाहन के साथ वह पूरे देश के दौरे पर थे तथा इस तरह भारत में जनान्दोलनों की बढ़ती सरगर्मियांे को कुचलने में ब्रिटिश हुकूमत का साथ दे रहे थे। ब्रिटिशों के साथ उनका सहयोग महज यहां तक सीमित नहीं था, हिन्दु महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ सत्ता में भी साझेदारी की थी। जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है यह गठजोड़ महज बंगाल तक सीमित नहीं था, बल्कि सिंध एवं सीमा प्रांत तक फैला था और यह हिन्दु महासभा द्वारा अपनायी सचेत नीति का ही परिचायक था।

प्रोफेसर शमसुल इस्लाम, लम्बे अनुसंधान पर आधारित अपनी किताब ‘रिलीजियस डायमेन्शन्स आफ इंडियन नैशनेलिजम / मीडिया हाउस, दिल्ली 2006/ में बताते हैं कि किस तरह ‘‘हिन्दु महासभा और मुस्लिम लीग  ने सीमा प्रांत / उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत/ में भी साझा सरकार बनायी थी। वह बैक्स्टर को उदध्रत करते हैं:

सीमा प्रांत में, सरदार औरंगजेब खान ने मंत्रिमंडल बनाया जिसमें मुस्लिम लीग, सिख अकाली और महासभाइयों को साथ जोड़ा और डा खान साहिब की अगुआई में कांग्रेस को अस्थायी तौर पर विपक्ष में ढकेल दिया। कैबिनेट में महासभा की तरफ से सदस्य थे वित्त मंत्राी मेहर चंद खन्ना । /  (Craig Baxter, The Jan Sangh : A Biography of an Indian Political Party, (Philadelphia : University of Pennysylvania Press, 1969, P. 20)

सत्ता में इस साझेदारी को सही ठहराते हुए सावरकर ने लिखा था:

.. व्यावहारिक राजनीति में भी महासभा जानती है कि हमें उचित समझौतों के माध्यम से आगे बढ़ना चाहिए। हम इस बात को देखें कि हालही में सिंध में, सिंध हिन्दू सभा ने मुस्लिम लीग के निमंत्राण पर खुद उसके साथ गठबंधन सरकार चलाने की जिम्मेदारी उठायी है। बंगाल की स्थिति तो सभी जानते हैं। उग्र लीगी / मुस्लिम लीग के लोग/ जिन्हें कभी खुद कांग्रेस अपनी दब्बूनीति के चलते संतुष्ट कर नहीं पायी वह जब हिन्दू महासभा के सम्पर्क में आए तो समझौते के लिए तैयार हुए और फिर एक गठबंधन सरकार – जिसकी अगुआई जनाब फजलुल हक कर रहे थे और हिन्दू महासभा के हमारे सम्मानित नेता डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी कर्णधारों में थे – एक साल से अधिक वक्त तक चलती रही जिस दौरान दोनों समुदाय लाभान्वित हुए। 

( V.D.Savarkar, Samagra Savarkar Wangmaya Hindu Rasthra Darshan ( Collected works of V.D.Savarkar) Vol VI, Maharashtra Prantik Hindusabha, Poona, 1963, p 479-480 मूल अंग्रेजी से लेखक द्वारा अनूदित)

हिन्दु महासभा के कानपुर में आयोजित चौबीसवें सत्रा को सावरकर का भाषण उद्धृत करनेलायक है जो ब्रिटिश हुकूमत के साथ हिन्दु महासभा के ‘रचनात्मक सहयोग’ की बात करता है।

हिन्दू महासभा मानती है कि सभी किस्म की व्यावहारिक राजनीति का अग्रणी सिद्धांत है जिम्मेदार सहयोग की नीति। और इसके तहत, वह मानती है कि वे सभी हिन्दू संगठनवादी जो कहीं कौन्सिलर, कहीं मंत्राी, कहीं विधायक के तौर पर काम कर रहे हैं और नागरिक जीवन या अन्य सार्वजनिक कामों को संचालित कर रहे हैं ताकि शासकीय सत्ता के इन केन्द्रों का इस्तेमाल किया जा सके … वह हमारे देश के प्रति एक बहुत बड़ा देशभक्ति का काम कर रहे हैं। जिम्मेदार सहयोग की नीति जिसमें सभी किस्म की देशभक्तिपूर्ण गतिविधियां समाहित हैं – जिसमें बिनाशर्त सहयोग से लेकर सक्रिय यहां तक हथियारबन्द प्रतिरोध भी शामिल है – भी वक़्त की जरूरतों, अपने पास के संसाधनों और हमारे राष्टीय हितों के तकाज़ों के हिसाब से बदलती रहेगी। ( V.D.Savarkar, Samagra Savarkar Wangmaya Hindu Rasthra Darshan ( Collected works of V.D.Savarkar) Vol VI, Maharashtra Prantik Hindusabha, Poona, 1963, p 474)

दरअसल सावरकर तो इस राय के थे कि 1942 में कांग्रेस पर पाबन्दी के साथ एवं सियासी मंज़र से उनके हटाए जाने के बाद

‘‘ राजनीतिक दायरा अब खुला क्षेत्र बना है ..तथा जो भी कुछ ‘‘‘भारतीय राष्टीय’’ गतिविधियां हो सकती हैं उन्हें संचालित करने के लिए अकेले हिन्दु महासभा ही बची है। /वही – पेज 475/

सावरकर के अनन्य सहयोगी होने के नाते श्यामाप्रसाद मुखर्जी, जो बाद में खुद हिन्दु महासभा के अध्यक्ष बने /1944/, वह इन सभी निर्णयों में साझेदार थे और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ उठे जनान्दोलनों को कुचलने को लेकर उन्हें कोई गुरेज नहीं था। अपनी किताब ‘हिस्टरी आफ माडर्न बंगाल’ में रमेश चन्द्र मजुमदार बंगाल गवर्नर को लिखे उनके खत का विवरण देते हैं जिसमें वह भारत छोड़ा आन्दोलन के खिलाफ कदमों के बारे में सुझाव देते दिखते हैं। उनके मुताबिक

‘श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपने पत्र का अन्त कांग्रेस द्वारा संगठित जनान्दोलन की चर्चा के साथ किया। उन्होंने शंका प्रगट की कि यह जनान्दोलन आन्तरिक अव्यवस्था को जन्म देगा और युद्ध के दिनों में व्यापक जनमत को भड़का कर आन्तरिक सुरक्षा को खतरे में डाल देगा। उन्होंने यह राय भी प्रगट की कि ऐसी कोई भी सरकार जो सत्ता में है उसे इस आन्दोलन का दमन करना चाहिए, मगर उसे महज प्रताडना से नहीं किया जा सकता …इसी पत्रा में उन्होंने परिस्थिति से निपटने के लिए विभिन्न कदमों की रूपरेखा भी रखी। ..’’

(Ramesh Ch. Mazumdar, History of Modern Bengal, Part II, pp 350-351)

वह स्पष्ट तौर पर इस राय के थे कि

.. ऐसा कोईभी व्यक्ति जो युद्ध के दिनों में, जन भावनाओं को भड़काता है, जिसके आन्तरिक अशांति या असुरक्षा पैदा होती है, उसका उस वक्त सत्तासीन सरकार को विरोध करना चाहिए।’’ (Prabhu Bapu (2013). Hindu Mahasabha in Colonial North India, 1915–1930: Constructing Nation and History. Routledge. pp. 103–. ISBN 978-0-415-67165-1.)

उन्होंने ब्रिटिश सरकार से यह भी वायदा किया कि उनके नेत्रत्ववाली सरकार हर मुमकिन कोशिश करेगी ताकि बंगाल में सर उठाए आन्दोलन को कुचला जा सके:

‘‘ प्रश्न यह है कि किस तरह इस/भारत छोड़ो/ आन्दोलन से बंगाल में निपटा जाए ? सूबे के प्रशासन को इस तरह चलाना होगा कि कांग्रेस की तमाम कोशिशों के बावजूद, यह आन्दोलन इस सूबे में जड़ न जमा पाए। यह हमारे लिए मुमकिन होना चाहिए, खासकर जिम्मेदार मंत्रियों के लिए, कि जनता को बता सकें कि जिस आज़ादी के लिए कांग्रेस ने यह आन्दोलन शुरू किया है, वह जनता के प्रतिनिधियों के पास पहले से है। कुछ दायरों में आपातकाल में यह सीमित हो सकता है। भारतीयों को चाहिए कि वह ब्रिटिशों पर यकीन करें, ब्रिटेन के लिए नहीं, न ब्रिटिशों को कोई लाभ दिलाने के लिए नहीं, बल्कि सूबे की सुरक्षा और आज़ादी को बनाए रखने के लिए। गवर्नर होने के नाते आप सूबे के संवैधानिक प्रमुख के तौर पर काम करेंगे और पूरी तरह अपने मंत्रियों की सलाह से चलेंगे। 

(Abdul Gafoor Abdul Majeed Noorani (2000), The RSS and the BJP: A Division of Labour, LeftWord Books, pp. 56–, ISBN 978-81-87496-13-7)

गौरतलब है कि देश के बंटवारे के हकी़कत बनने के बाद, मुखर्जी ने यह एहसास किया कि /बहुसंख्यक/समुदाय आधारित पार्टियां अपने असमावेशी रूख को छोड़ दें और समावेशी हो जाएं। अगर हम इस बात के विवरण में जाएं कि किन वजहों से श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने हिन्दु महासभा छोड़ी और संघ के समर्थन से उन्होंने जिस पार्टी का निर्माण किया, उसको लेकर उनकी भविष्य दृष्टि /विजन क्या थी, तो हम कई दिलचस्प तथ्यों से रूबरू होते हैं, जिन पर पहले किसी ने ठीक से गौर नहीं किया है।

वर्ष 1944 में सावरकर द्वारा हिन्दु महासभा के अध्यक्षपद से इस्तीफा देने के बाद अध्यक्ष बने मुखर्जी की यह मुकम्मल राय थी कि आज़ादी के बाद हिन्दु महासभा की सदस्यता को हिन्दुओं तक सीमित नहीं रखना चाहिए। / स्टेटसमैन, 23 नवम्बर 1948, प्रेस विज्ञप्ति, कोलकाता, ” Hindu Nationalism and Indian Politics – The Origins and Development of Bharatiya Jana Sangh, B. D. Graham, Cambridge University Press, 1990  उद्धृत / गांधी हत्या के बाद जब जनता का गुस्सा हिन्दु महासभा की दिशा में मुड़ा था तब फरवरी 1948 में उन्होंने कहा

यह मेरी सोची-समझी राय है कि हिन्दु महासभा के सामने आज दो विकल्प हैं। पहला है कि वह अपनी राजनीतिक गतिविधियों से तौबा करे और अपना ध्यान सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक मामलों पर केन्द्रित करे, और उसके सदस्यों पर छोड़ दे कि वह कौनसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ना चाहते हैं। दूसरा विकल्प है कि हिन्दु महासभा अपना साम्प्रदायिक रूख त्याग दे, अपनी नीति की दिशा मोड़ दे और अपने दरवाजे किसी भी नागरिक के लिए – धर्म की चिन्ता किए बिना – खोल दे, बशर्ते वह व्यक्ति उसका आर्थिक और राजनीतिक कार्यक्रम स्वीकारे। 

( Mukherjee, Statement of 6 Feb 1948, Statesman, 7 th Feb 1948, pp. 1 and 7, quoted in Hindu Nationalism and Indian Politics – The Origins and Development of Bharatiya Jana Sangh, B. D. Graham, Cambridge University Press, 1990)

शुरूआत में यह लग रहा था कि हिन्दु महासभा अपनी समग्र नीति पर पुनर्विचार कर रही है और राजनीतिक गतिविधियों को स्थगित कर सामाजिक- सांस्कृतिक कामों पर केन्द्रित करने जा रही है मगर यह एक भ्रम साबित हुआ। महासभा की वर्किंग कमेटी की जो बैठक दिल्ली में /6-7 नवम्बर 1948/ को सम्पन्न हुई उसने न केवल राजनीतिक गतिविधियों को जारी रखने का निर्णय लिया तथा अपनी सदस्यता को हिन्दुओं तक सीमित रखने का भी तय किया। मुखर्जी ने 23 नवम्बर को इस कमेटी से इस्तीफा दिया और उनका इस्तीफा 26 दिसम्बर को सम्पन्न अखिल भारतीय कमेटी मीटिंग में मंजूर किया गया।( Statesman ( Calcutta) 9 Nov 1948, 24 th Nov 1948 and 27 th December 1948, -do-)

और जिस तरह से उन्होंने इस्तीफे के वक्त़ अपनी पोजिशन स्पष्ट की उससे यह अधिक साफ हुआ कि स्वाधीन भारत में हिन्दुओं का अलग संगठन बनाने का कोई आधार नहीं है।

आज के भारत में 85 फीसदी से अधिक लोग हिन्दू हैं और अगर वह अपने आर्थिक तथा राजनीतिक हितों को या एक पूरी जनतांत्रिक संस्था के माध्यम से भारत के स्वाभाविक अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते तो कोई भी अलग राजनीतिक पार्टी जो अपनी सदस्यता को महज हिन्दुओं तक सीमित रखती है वह हिन्दुओं का या उनके मुल्क को बचा पाएगी।

दूसरी तरफ, अगर बहुसंख्यक समाज अपनी राजनीतिक विशिष्टता को बनाए रखता है तो तयशुदा बात है कि वह साम्प्रदायिक राजनीतिक संगठनों की बढ़ोत्तरी को अनिवार्यतः बढ़ावा देगा जो देश के अन्दर अलग अलग अल्पसंख्यक समूहों के हितों की नुमाइन्दगी करेंगे जिसकी परिणति बेहद पूर्वाग्रहपूर्ण नतीजों में होंगी।

( Mukherjee, Press Statement, 23 Nov 1948, Statesman ( Calcutta) 24 th November 1948, P 7, -do-))

निश्चित ही यह ऐसे लब्ज हैं जो हिन्दुत्व वर्चस्ववादी नज़रिये को रखनेवाले के लिए पूरी तरह आपत्तिजनक लग सकते हैं। ,

मुखर्जी की असामयिक मौत ने – जब वह जिस पार्टी का निर्माण करना चाह रहे थे वह अपनी शैशवावस्था में थी – संगठन निर्माण को लेकर मौजूद – दो अलग अलग रूखों के विवाद पर अचानक परदा डाल दिया, जिसमें एक का प्रतिनिधित्व मुखर्जी कर रहे थे तो दूसरे को जुबां संघ से आए वरिष्ठ प्रचारक दे रहे थे, जिनमें दीनदयाल उपाध्याय अग्रणी थे।

धारा 370 को लेकर विकसित हुई बहस हमें इस बात की झलक देती है कि किस तरह इन दोनों रूखों में मतभिन्नताएं मौजूद थीं।

धारा 370, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और भारतीय जनसंघ

एक दिन भी नहीं गुजरता है जब धारा 370 की मुखालिफत करने के लिए – जो जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करती है – भारतीय जनसंघ के संस्थापक रहे डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जीै का नाम भाजपा द्वारा लिया नहीं जाता। यह अलग बात है कि नए तथ्यों के सामने आने के बाद अब यह दावा भी प्रश्नों के घेरे में आया है। अब यह कहा जाने लगा है कि मुखर्जी की मौत – जिन विवादास्पद परिस्थितियों में हुई थी जब उन्हें कश्मीर को विशेष दर्जा देने का विरोध करने के लिए गिरफतार किया गया था – उन्होंने शुरूआत में धारा 370 की अनिवार्यता को स्वीकारा था।

इस मामले में ए जी नूरानी की किताब ‘आर्टिकल 370: एक कान्स्टिटयुशनल हिस्टरी आफ जम्मू एण्ड कश्मीर’ /आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, पेजेस 480/ आज़ादी के तत्काल बाद के झंझावाती समय में जम्मू और कश्मीर की स्थिति को लेकर कई सन्देह दूर करती है।

आधिकारिक दस्तावेजों, पत्रों, ज्ञापनों,श्वेत पत्रों और संशोधनों पर आधारित लेखक का अध्ययन – जो खुद संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं – ने न केवल इस कालखण्ड के बारे में नयी अंतर्दृष्टि प्रदान की है बल्कि उस समय के घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण सारांश भी पेश किया है और विभिन्न स्टेकहोल्डर्स द्वारा निभायी गयी भूमिका पर भी रौशनी डाली है। जबकि हम आज धारा 370 के क्षरण की प्रक्रिया को लेकर चिंतित हैं, प्रस्तुत किताब इस क्षरण के पीछे निहित उस सियासत पर रौशनी डालती है, जिसे प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच वार्ताओं के जरिए आकार दिया गया था और जिस पर सरदार पटेल तथा श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मुहर थी।

यह जानी हुई बात है कि …सरदार पटेल ने जम्मू कश्मीर को लेकर विशेष दर्जे के प्रावधानों को संविधान सभा से मंजूरी दिलाने में अहम भूमिका निभायी। भाजपा द्वारा प्रसारित मत के विपरीत, पटेल ने कांग्रेस पार्टी के कुछ सदस्यों तथा जवाहरलाल नेहरू कैबिनेट के मंत्राी / बिना पोर्टफोलियो के अलबत्ता जिन्हें इस मसले को सुलझाने की जिम्मेदारी दी गयी थी / गोपालस्वामी अयंगार के बीच विशेष दर्जे को लेकर उठे विवाद में हस्तक्षेप किया था ताकि धारा 370 पर / जिसे उन दिनों 306 कहा जाता था/ मुहर लगायी जा सके।

(http://www.firstpost.com/politics/bjps-kashmir-conundrum-article-370-is-stronger-than-partys-ambitions-1812089.html)

इसमें कोई दोराय नहीं कि धारा 370 को लेकर यह खुलासा – कि इसके प्रति मुखर्जी की भी पूर्ण सहमति थी तथा तत्कालीन ग्रहमंत्राी सरदार पटेल की भी यही राय थी – बेहद विस्फोटक कहा जा सकता है। धारा 370 को लेकर उसके स्टैण्ड पर इस खुलासे के सम्भावित प्रभाव के बाद भी केसरिया जमात की तरफ से इसको खारिज नहीं किया गया। यह जरूर हुआ है कि किताब के प्रकाशन के बाद यही कहा गया था  कि यह ‘‘छदम धर्मनिरपेक्षतावादी और छदम बुद्धिजीवियों के हाथों इतिहास के विक्रतिकरण की एक और कोशिश है।’’ दिलचस्प बात थी कि जनाब जितेन्द्र सिंह, जो उन दिनों जम्मू कश्मीर के लिए भाजपा के प्रवक्ता थे और उसकी राष्टीय कार्यकारिणी के सदस्य थे, उन्होंने अप्रत्यक्ष तरीके से गोया लेखक की बात का स्वीकार किया था और कहा था ‘‘दिवंगत नेता ने प्रथम प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू को यह सुझाया था कि वह धारा 370 पर समयसीमा तय कर ले और यह भी स्पष्ट कर दे कि कब तक उसको लागू रहने दिए जाने की योजना है।’’(http://www.siasat.com/english/news/shyama-prasad-mukherjee-never-endorsed-article-370

इस बात पर जोर देना भी जरूरी है कि यह कोई पहला वक्त़ नहीं था कि कश्मीर को पूर्ण स्वायत्तता के प्रति डा मुखर्जी की सहमति का मसला उठा हो। जनाब बलराज पुरी, कश्मीर के अग्रणी पत्रकार ने ‘द ग्रेटर कश्मीर’ के अपने आलेख में /http://www.greaterkashmir.com/news/2010/aug/8/leaf-from-the-past-4.asp /इस मसले पर अधिक विवरण पेश किया था:

‘‘ नेहरू और शेख अब्दुल्ला के साथ श्यामाप्रसाद मुखर्जी का राज्य की स्थिति को लेकर लम्बा पत्रव्यवहार, जिसे उस वक्त़ पार्टी ने प्रकाशित किया था, इस मुददे पर उनके स्टैण्ड का सबसे आधिकारिक सबूत है। मिसाल के तौर पर, 9 जनवरी 1953 को, दोनों को लिखे पत्रा में वह लिखते हैं ‘‘ हम इस बात पर तुरंत सहमत होंगे कि घाटी में शेख अब्दुल्ला की अगुआई में विशेष तरीके से चलने दिया जाए, तब तक जब तक वह चाहते हों अलबत्ता जम्मू और लददाख का भारत के साथ तुरंत एकीकरण करना चाहिए।’’ जबकि नेहरू ने इस विचार को सिरेसे खारिज किया  तथा कश्मीर में उसकी प्रतिक्रिया को लेकर तथा उसके अंतरराष्टीय परिणामों को लेकर, चेतावनी दी ; अब्दुल्ला ने एक विस्त्रत जवाब भेजा जिसमें उन्होंने लिखा कि ‘‘आप शायद इस बात से नावाकीफ हैं कि पाकिस्तान एवं अन्य स्वार्थी तत्वों की तरफ से किस तरह की कोशिशें चल रही हैं ताकि राज्य की एकता को तोड़ा जाए। एक बार जब राज्य की अवाम की कतारों को विभाजित किया जाएगा तो किसी भी किस्म का समाधान उन पर थोपा जा सकेगा।’’

वह आगे जोड़ते हैं कि यह लम्बा पत्रव्यवहार डा मुखर्जी द्वारा नेहरू को लिखे इस पत्रा के साथ / 17 फरवरी, 1953/ समाप्त हुआ था जिसमें उन्होंने सुझाया था:

  1. दोनों पक्ष इस बात पर जोर दें कि राज्य की एकता को बरकरार रखा जाएगा और स्वायत्तता का सिद्धांत जम्मू प्रांत और लददाख तथा कश्मीर घाटी पर भी लागू होगा।

  2. दिल्ली करार पर अमल – जिसमें राज्य को विशेष दर्जा दिया गया था – उसे जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा के अगले सत्रा से लागू किया जाएगा। 

नेहरू ने जवाब दिया कि तीनों प्रांतों के लिए स्वायत्तता के प्रस्ताव पर उनके बीच तथा अब्दुल्ला के बीच जुलाई 1952 में ही सहमति हुई थी। अगर मुखर्जी को अपनी गलति का एहसास हुआ है तो उन्हें अपने आन्दोलन को बिना शर्त वापस लेना चाहिए। मुखर्जी इस बात के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि यह उनकी हार मानी जाती। यह गतिरोध लम्बे समय तक बना रहा, जिसने एक तरह से जनसंघ के लिए ‘‘चेहरा बचाने’’ (face  saving)  का बहाना दिया।

यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि मुखर्जी की आकस्मिक मौत के बाद, नेहरू ने जम्मू के लोगों से अपील की थी कि वह अपने आन्दोलन को वापस  ले लें क्योंकि स्वायत्तता की उनकी मांग पूरी कर ली गयी है। राज्य सरकार ने इस अपील पर 2 जुलाई को सहमति जताई, जब प्रजा परिषद के नेताओं को रिहा किया गया, जब वह दिल्ली जाकर 3 जुलाई को नेहरू से मिले। इस तरह प्रजा परिषद के आन्दोलन को – क्षेत्राीय स्वायत्तता की गारंटी एवं दिल्ली करार पर तत्काल अमल – के वायदे के साथ वापस लिया गया।

मगर यहां तमाम किन्तु परन्तु मौजूद दिखते हैं। एक कारक जिसने इस करार पर अमल को रोका उसकी वजह प्रजा परिषद और जनसंघ का उससे बाहर होना था। बलराज मधोक, जो बाद में जनसंघ के अध्यक्ष बने, पार्टी ने राज्य की स्वायत्तता तथा क्षेत्राीय स्वायत्तता पर अपनी प्रतिबद्धता नागपुर / संघ का मुख्यालय / के निर्देश पर वापस ली थी। पार्टी ने क्षेत्राीय स्वायत्तता और धारा 370 के खिलाफ अपनी अनवरत मुहिम जारी रखी। ((http://www.greaterkashmir.com/news/2010/aug/8/leaf-from-the-past-4.asp))

आज तक भाजपा कहती आयी है कि अगर सरकार ने इस धारा के प्रति मुखर्जी के प्रस्ताव को माना होता तो कश्मीर आज अलग स्थिति में होता, मगर वह अभी यह कहने का साहस नहीं जुटा पायी है कि उन्होंने पहले इस प्रस्ताव पर अपनी लिखित सहमति दी थी। उदितमान भारतीय जनसंघ के अग्रणी नेताओं में शुमार दीनदयाल उपाध्याय – अपने सहयोगी बलराज मधोक की ही तरह – जमीनी स्तर पर इस पूरी परिस्थिति से, इस समूचे घटनाक्रम से निश्चित ही अवगत रहे होंगे, मगर उन्होंने ‘‘ऑफिशियल लाइन’’ पर टिके रहना मुनासिब समझा जो ‘‘नागपुर’’ से प्रभावित थी और एक तरह से कहें तो अपने अनुशासित प्रचारक होने का परिचय दिया।

और न केवल धारा 370, अगर हम मुखर्जी के असामयिक इन्तक़ाल के बाद भारतीय जनसंघ की यात्रा पर बारीकी से निगाह डालें – वह इस बात को अधिक स्पष्ट करता है कि संगठन निर्माण को लेकर मुखर्जी तथा संघ के नेत्रत्व की समझदारी में गुणात्मक अंतर था। मुखर्जी की म्रत्यु  /23 जून 1953/ दीनदयाल खुद उसके सबसे महत्वपूर्ण नेता के तौर पर – उसके विचारक एवं सिद्धांतकार के तौर पर – उभरे ; वही जनसंघ को आज की भारतीय जनता पार्टी का पूर्ववर्ती है। और 11 फरवरी 1968 को जब रेलवे यात्रा के दौरान उनकी हत्या हुई तब वही पार्टी के अध्यक्ष बने थे।

ध्यान रहे कि मुखर्जी की मौत के बाद संघ की तरफ से भेजे गए वरिष्ठ प्रचारक के नाते दीनदयाल उपाध्याय भी भारतीय जनसंघ का अध्यक्ष पद सम्भाल सकते थे, अलबत्ता उन्होंने ऐसी औपचारिक जिम्मेदारी लेने से बार बार इन्कार किया क्योंकि वह संगठन निर्माण पर फोकस कर रहे थे। इस अन्तराल में अध्यक्ष के पद पर ऐसे ही लोग विराजमान होते रहे, जिनकी सार्वजनिक स्वीकार्यता अधिक थी, भले ही संघ से प्रत्यक्ष जुड़ाव रहा हो या न रहा हो।

लाजिम था कि जिन्होंने इस अलिखित श्रम विभाजन को ठीक से समझा, और पद की गरिमा के हिसाब से दावेदारी नहीं की, उनका कार्यकाल आसानी से सम्पन्न हुआ और जिन्होंने जनसंघ के संचालन में अधिक स्वायत्तता का प्रयास किया, उन्हें पद से हटना पड़ा या हटा दिया गया।

मुखर्जी के तत्काल बाद जनसंघ के अध्यक्ष बने मौलीचन्द्र शर्मा की अध्यक्ष पद से बिदाई ऐसी ही परिस्थितियों में हुई।

9 .

डॉ मुखर्जी के बाद जनसंघ की यात्रा: स्वयंसेवकों के ‘‘स्वैच्छिक सहयोग’’ का सिलसिला 

दिल्ली के मौलीचन्द्र शर्मा, नए बने संगठन ‘भारतीय जनसंघ’ के दो महासचिवों में से एक थे – दूसरे व्यक्ति थे भाई महावीर। मुखर्जी की मौत के बाद उन्हें ही जनसंघ के अध्यक्ष पद का कार्यभार सौंपा गया। एक सनातनी संस्क्र्रत विद्वान पंडित दीनदयाल शर्मा के बेटे मौलीचन्द्र शर्मा बीस के दशक में हिन्दु महासभा से जुड़े थे और जनसंघ से जुड़ने के पहले ही अपने आप में एक कददावर राजनीतिज्ञ थे। मुखर्जी ने जब भारतीय जनसंघ का आगाज़ किया तब उन्होंने जनसंघ की पंजाब-दिल्ली शाखा के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभायी थी।

आज़ादी के दिनों में वह भारतीय राष्टीय कांग्रेस से भी सम्बद्ध रहे थे। राष्टीय स्वयंसेवक संघ की दिल्ली इकाई के साथ भी उनके गहरे ताल्लुकात थे और जब महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर पाबन्दी लगी तो इस पाबन्दी को हटाने के लिए उन्होंने ‘‘जनाधिकार समिति’’ नाम से नागरिक अधिकार समूह की भी स्थापना की थी। उन्हें अपनी सक्रियताओं के लिए पब्लिक सेफटी एक्ट के तहत गिरफतार किया गया था। .( Choudhary, Valimi, ed. (1988). Dr. Rajendra Prasad: Correspondence and Select Documents, Volume 10. Delhi: Allied Publishers. pp. 150–151) बाद में उन्होंने गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल और संघ सुप्रीमो गोलवलकर के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभायी ताकि संघ का अपना संविधान बनाने पर सहमति हो सके। (Page 11, Andersen, Walter K.; Damle, Shridhar D. (1987) The Brotherhood in Saffron: The Rashtriya Swayamsevak Sangh and Hindu Revivalism. Delhi: Vistaar Publications)

इस हक़ीकत के प्रति अनभिज्ञ कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय जनसंघ के कामकाज को नियंत्रित करता है, उन्हें अपने पद से बाद में इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि पार्टी बनाने की उनकी स्वतंत्रा पहलकदमियां अग्रणी सदस्यों को रास नहीं आयीं – जिनका बहुलांश संघ की शाखाओं से निकला था। बलराज मधोक, जो जनसंघ की कार्यकारी कमेटी के संघ समूह/फैक्शन के सदस्य थे, उन्होंने संघ की पत्रिका आर्गनायजर में बाकायदा चेतावनी दी थी कि भारतीय जनसंघ का जो भी अगला अध्यक्ष बनेगा उसे पार्टी के संघ स्वयंसेवकों से ‘‘स्वैच्छिक सहयोग’’   हासिल करना होगा।  (Page 11, Andersen, Walter K.; Damle, Shridhar D. (1987) The Brotherhood in Saffron: The Rashtriya Swayamsevak Sangh and Hindu Revivalism. Delhi: Vistaar Publications) रेखांकित करनेवाली बात है कि पार्टी की  सेन्टल जनरल कौन्सिल के इंदौर में आयोजित सत्रा में अपने अध्ध्यक्षीय भाषण में शर्मा ने पार्टी संविधान में लिखित सिद्धांतों पर – धर्मनिरपेक्ष राष्टवाद और जनतंत्र पर अटूट आस्था’’ पर जोर दिया था।

एक क्षेपक के तौर पर यहां नोट किया जा सकता है कि बकौल ए जी नूरानी, बाद के दिनों में भी, जनसंघ और उसकी वारिस भारतीय जनता पार्टी ने दो अन्य चुने हुए अध्यक्षों को – 1973 में बलराज मधोक को और 2005 में लालक्रष्ण आडवाणी को – संघ के कहने पर अपने पद से चलता किया। ( A. G. Noorani (3 December 2005). “The BJP: A crisis of identity”. Frontline. Retrieved 2014-11-06.)

मौलीचन्द्र शर्मा की बिदाई के बाद हम पार्टी के अन्दर के सत्ता सम्बन्धों में ध्यान में आनेलायक बदलाव को देखते हैं। पार्टी के महासचिव का पद अध्यक्ष पद से अधिक महत्वपूर्ण हो गया और महासचिव होने के नाते दीनदयाल उपाध्याय संगठन के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बने – जिनसे न केवल यह अपेक्षा की जाती थी कि वह नीति को विकसित करेंगे बल्कि संगठननिर्माण को भी आगे बढ़ाएंगे। संघ के कार्यकर्ताओं का नेटवर्क अब पार्टी में पूरी तरह जडमूल था और आपसी सन्देश और निर्देश अब बिना किसी रूकावट के पूरा वक्ती सांगठनिक सचिवों के मार्फत मिलते थे, जो उसी आत्मानुशासन के साथ काम करते थे जिस तरह संघ में सक्रिय पूरा वक्ती कार्यकर्ता करते थे।

जहां तक जनसंघ के गठन और विकास का सवाल है, विश्लेषकों का मानना है कि दीनदयाल उपाध्याय ‘‘एक अचूक और सक्षम प्रशासक साबित हुए’’ जिन्होंने ‘‘नीति और पार्टी सिद्धांत की चर्चा मंे अधिकाधिक रूचि दिखायी और जिन्होंने इस दौरान भारत में बड़े पैमाने पर भ्रमण किया।’’ और वही कुल मिला कर पार्टी के प्रधान प्रवक्ता बने, यह एक ऐसी भूमिका थी जो इसके पहले मुखर्जी और बाद में पार्टी अध्यक्ष के तौर पर मौलीचन्द्र शर्मा निभाते रहे। उनकी सहायता के लिए उन्हें दो सहायक सचिव दिए गए: पार्टी की उत्तर की इकाइयों के लिए और दक्षिण की इकाइयों के लिए जगन्नाथराव जोशी। जनसंघ की अहम नीतियां उनकी अगुआई में ही आकार ग्रहण कीं। गोहत्या पर पाबन्दी की मांग हमेशा पार्टी घोषणापत्र का हिस्सा रही, जिसका मतलब था कि वह आर्थिक और धार्मिक हितों की पूर्ति करेगी। मिसाल के तौर पर 1954 के घोषणापत्रा में कहा गया है:

गाय हमारे सम्मान का बिन्दु है और हमारी संस्क्रति का अमर प्रतीक। प्राचीन समयों से उसकी रक्षा की जा रही है और उसे पूजा जा रहा है। हमारी अर्थव्यवस्था भी गाय पर आधारित है। गोरक्षा, इस वजह से, महज हमारा पवित्रा कर्तव्य नहीं है बल्कि एक अनिवार्य जरूरत भी है। मवेशियों की रक्षा करना और उनमें सुधार करना तब तक सम्भव नहीं है जब तक उनका कत्ल जारी रहे। मवेशियों की तेजी से घटती संख्या तभी रोकी जा सकती है जब तक उनके कत्ल को पूरी तरह से न रोका जाए। जनसंघ गोहत्या पर पूरी तरह से पाबन्दी लगा देगा और जनता तथा प्रशासन के सहयोग से उसकी गुणवत्ता को सुधार देगा।

(1954 Manifesto, BJS Documents, I, p. 68. See also Bharatiya Jana Sangh, Manifesto (1951), p. 5; 1958 Manifesto, BJS Documents, I, p. 119; Bharatiya Jana Sangh, Election Manifesto 1957, pp. 21-2; Election Manifesto 1962, pp. 16-17; Principles and Policy [New Delhi, 1965], p. 35 Page 149)

खुद दीनदयाल उपाध्याय ने ‘आर्गनायजर’ में लिखे अपने लेख में गोहत्या पर पाबन्दी की मांग करते हुए लिखा था कि ‘गाय राष्ट की पहचान है’:

गोहत्या निरोधी समिति / वह साझा मोर्चा जो विभिन्न धार्मिक एवं हिन्दूवादी संगठनों ने बनाया था – लेखक/ हमेशा यह मानती रही है कि गाय का मुददा हमारे लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि भारतीयों के लिए मौलिक अधिकार का। इस मौलिक अधिकार की स्वीक्रति या अस्वीक्रति ही भारतीय स्वतंत्राता की प्रक्रति को नियत करेगी। वे जो यह मानते हैं कि स्वराज का आशय केवल शासन के हस्तांतरण से है, तो ेवे स्वराज और परराज के बीच अंतर और असंतुलन को समझने में विफल हैं। हमारे लिए स्वराज्य की संकल्पना हमारे मूल्यों का पुनर्जन्म और सम्मान के प्रतीकों का अभ्युदय है। और गाय हमारे सम्मान के सभी प्रतीकों का केन्द्र है। इसलिए जबभी विेदेशी आक्रांताओं ने हमारे देश पर आक्रमण किया, सबसे पहले उन्होंने गायों पर विशेषकर प्रहार किया। स्वतंत्राता की हमारी चाहत हमेशा से गायों के संरक्षण के साथ जुड़ी रही है।‘....

गोसंरक्षण का यह हमारा नारा न सिर्फ लंबे समय से दमित हमारी इच्छाओं की पूर्ति में सहयोग करेगा बल्कि संपूर्ण राष्ट जीवन में स्वयं चेतना की तरंगें भी भरेगा। यह मौजूदा सरकार के स्वरूप का भी कायापलट कर देगा। आज जो यह सरकार राष्टीय सम्मान के सूचकों को संशय की भावना से देखती है, कल वही सरकार गो संरक्षण और गो विकास में गर्व की अनुभूति करेगी। तभी सरकार निरंतर प्रयास के जरिये प्रगति के रास्ते पर ठीक से चल पाएगी और राष्ट को महान बना पाएगी।

/ गायों के लिए संघर्ष आज़ादी और लोकतंत्र का संघर्ष है’ आर्गनायजर, दिसम्बर 15, 1958, अंग्रेजी से अनूदित, दीनदयाल समग्र रचनावली, पेज 159-161, प्रभात प्रकाशन से साभार/

याद रहे, गोहत्या पर पाबन्दी लगाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने के लिए समानधर्मा संगठनों के साथ जिस साझे मोर्चे का गठन हुआ था, उसके द्वारा प्रेरित आन्दोलन के दौरान संसद के सामने जबरदस्त हिंसा हुई थी जिसके लिए भारतीय जनसंघ की भूमिका भी पड़ताल हुई थी।

10 .

‘‘सिर्फ हिन्दु ही राष्ट के निर्माता’’: दीनदयाल उवाच

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के व्याख्यानों एवं रचनाओं को सरसरी निगाह से भी देखें तो उनके विचारों का पता लगता है जहां वह सोचते थे कि ‘दुनिया की समस्याओं का समाधान समाजवाद में नहीं हिन्दु धर्म में नहीं।’’ उनके लिए सिर्फ हिन्दु ही राष्ट का निर्माण करते हैं।

‘‘भारत में सिर्फ हिन्दुत्व ही राष्टवाद का आधार है।.. हिन्दुओं के लिए यह बिल्कुल गलत होगा कि वह यूरोपीय पैमाने पर अपनी राष्टीयता को प्रमाणित करें। हजारों साल से उसे स्वीकारा गया है।’’[[v] BN Jog, Pandit Deendayal Upadhyaya: Ideology & Perception-Politics for Nation’s Sake, vol. vi, Suruchi Prakashanek, Delhi, 73.],

और मुसलमान एक ‘जटिल समस्या’ हैं

‘‘आज़ादी के बाद देश की सरकार, उसकी राजनीतिक पार्टियों और लोगों को तमाम महत्वपूर्ण समस्याओं का सामना करना पड़ा।..मगर मुस्लिम समस्या सबसे पुरानी समस्या है, सबसे जटिल है और नए नए रूप धारण करती रहती है। विगत बारह सौ सालों से इस समस्या का हम सामना कर रहे हैं। [[v] BN Jog, Pandit Deendayal Upadhyaya: Ideology & Perception-Politics for Nation’s Sake, vol. vi, Suruchi Prakashanek, Delhi, 73.],

कोईभी देख सकता है कि दीनदयाल उपाध्याय जिस निगाह से मुसलमानों को ‘समस्या’ के तौर पर देखते हैं, इस नज़रिये का और गोलवलकर के विश्वनज़रिये के बीच गहरा सामंजस्य है। याद रहे अपनी चर्चित किताब ‘बंच आफ थाटस’ अर्थात विचार सुमन में गोलवलकर मुसलमानों को आंतरिक खतरा नम्बर एक घोषित करते है, जबकि ईसाइयों को आंतरिक ख़तरा नम्बर दो तथा कम्युनिस्टों को आंतरिक ख़तरा नम्बर 3 घोषित करते हैं। यह बात बताने की जरूरत नहीं कि वह धर्मनिरपेक्षता के विचार को नापसंद करते थे, इस विचार से घ्रणा करते थे। अलीगढ़ में राष्टीय स्वयंसेवक संघ की बैठक में उन्होंने साफ कहा:

‘भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट घोषित करने से भारत की आत्मा पर हमला हुआ है। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में तो कठिनाइयों का पहाड़ खड़ा रहता है। ..हालांकि रावण के लंकास्थित धर्मविहीन राज्य में बहुत सारा सोना था, मगर वहां राम राज्य नहीं था।’’

अपने एक अन्य आलेख में वह लिखते हैं :

‘‘अगर हम एकता चाहते हैं, तो हम निश्चित ही भारतीय राष्टवाद को समझना होगा, जो हिन्दु राष्टवाद है और भारतीय संस्कृति हिन्दू संस्कृति है।”

वह संविधान को रैडिकल ढंग से बदलने की बात करते थे क्योंकि उनके मुताबिक

‘वह उनके मुताबिक वह भारत की एकता और अखंडता के खिलाफ पड़ता है। उसमें भारत माता, जो हमारी पवित्रा मात्रभूमि है तथा जो हमारे लोगों के दिलों में बसी है – के विचार का कोई स्वीकार नहीं है। संविधान के प्रथम अनुच्छेद के मुताबिक, इंडिया जिसे भारत भी कहा जाता है, वह राज्यों का संघ होगा अर्थात बिहार माता, बंग माता, पंजाब माता, कन्नडा माता, तमिल माता, सभी को मिला कर भारत माता का निर्माण होता है। यह विचित्रा है। हम लोगों ने इन सूबों को भारत माता के अवयवों के रूप में देखा है, और न व्यक्तिगत माता के तौर पर। इसलिए हमारे संविधान को संघीय के बजाय एकात्मक होना चाहिए। जनसंघ का मानना है कि भारतीय संस्क्रति की तरह भारतवर्ष भी एक है और अविभाज्य है। साझा संस्क्रति की कोई भी बात न केवल असत्य है बल्कि ख़तरनाक भी है, क्योंकि वह राष्टीय एकता को कमजोर करती है और विघटनकारी प्रव्रत्तियों को प्रोत्साहित करती है।’’ /‘जनसंघज प्रिन्सिपल्स एण्ड पॉलिसीज, जनवरी 25, 1965, पेज 16/

एकात्म मानववाद के दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का विश्लेषण करते हुए क्रिस्टोफ जाफरलो(Christophe Jafferlot) वर्ण व्यवस्था के प्रति हिन्दुत्व के विचारकों के सम्मोहन की चर्चा करते हैं जिनके लिए वह ‘सामाजिक एकजुटता/सम्बन्ध का ऐसा मॉडल था जिसका हर जाति पालन करती थी जिसमें ‘अछूत’ भी शामिल थे।

‘‘उपाध्याय भी उसी ढंग से सोचते थे। ‘एकात्म मानववाद’ – जिसे संघ परिवार के अग्रणियों द्वारा उनकी विचारधारा की बुनियाद कहा गया है – उसकी मूलभूत कल्पना वर्णव्यवस्था की जैविक एकता पर टिकी है। वर्ष 1965 में उन्होंने लिखा: ‘चार जातियों की हमारी अवधारणा में, वह विराट पुरूष – आदिम मनुष्य जिसके त्याग ने, जैसा कि ऋग्वेद का कहना है, वर्ण व्यवस्था के रूप में समाज को जन्म दिया – ’ के चार अवयवों के समकक्ष हैं।’ उनके हिसाब से वर्णव्यवस्था में वह जैविक एकता होती है जो राष्ट निर्माण की प्रक्रिया को जारी रख सकती है।

[http://www.frontline.in/the-nation/merchant-of-hate/article9266366.ece]

संघ-भाजपा कुनबे में उनका महिमामंडन समझा जा सकता है क्योंकि वह ‘गोलवलकर के चिन्तन’ पर अड़िग रहे मगर उन्होंने ‘पूरक के तौर पर गांधीवादी विमर्श भी उसमें जोड़ा’ डैनिश विद्वान थामस ब्लाम हानसेन लिखते हैं:

ःःदीनदयाल उपाध्याय ने ..‘एकात्म मानववाद’ के नाम पर उन धारणाओं का विकास किया, जिसे जनसंघ ने अपने आधिकारिक सिद्धांत के तौर पर 1965 में अपनाया। एकात्म मानववाद कहीं से भी गोलवलकर के चिन्तन से हटा नहीं अलबत्ता उसने गांधीवादी विमर्श के महत्वपूर्ण तत्वो को अपने में समाहित करके उसे हिन्दु राष्टवाद के एक ऐसे संस्करण में प्रस्तुत किया -जिसका मकसद था कि जनसंघ की साम्प्रदायिक छवि को मिटा कर उसे एक सौम्य, आध्यात्मिक, अनाक्रमणकारी छवि प्रदान करना जो सामाजिक समानता पर, ‘भारतीयकरण’ और सामाजिक सदभाव पर जोर देती हो। इस नए विमर्श का निर्माण एक तरह से भारत में साठ और सत्तर के दशक के राजनीतिक क्षेत्र की चुनौतियों (challenges) और वर्चस्वशाली विमर्शों के अनुकूल था। पार्टी और व्यापक हिन्दू राष्टवादी आन्दोलन को राजनीति की मुख्यधारा के दक्षिणपंथी हाशिये से उंचे स्तर पर ले जाना भी उसका मकसद था, जिसे 1967 के आम चुनावों के बाद शहरी मध्यम वर्ग में अच्छा खासा समर्थन हासिल हुआ था। गोलवलकर के लेखन से महत्वपूर्ण बदलाव ‘भारतीय’ शब्द के प्रयोग में नज़र आया जिसे रिचर्ड फॉक्स ने ‘हिन्डीयन’ अर्थात ‘हिन्दू और इंडियन’ के संमिश्रण के तौर पर अनुदित किया है।  (The Saffron Wave: Democracy and Hindu Nationalism in Modern India, Oxford University Press, pages 84-85)

दिल्ली स्थित विद्वान प्रलय कानूनगो, उसी किस्म के विचारों को प्रगट करते हैं:

दीनदयाल उपाध्याय गोलवलकर के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद  के सिद्धांत को ‘एकात्म मानववाद’ के अपने सिद्धांत से प्रतिस्थापित करते हैं। यह नया सिद्धांत  राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ की हिन्दु राष्ट की अवधारणा कंो थोड़ा नए अंदाज़ में प्रस्तुत करता है और उसकी विचारधारात्मक अन्तर्वस्तु को सम्रद्ध करता है।  gSA  (RSS’ Tryst with Politics; Manohar, page 118)

11.

उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष में सहभागी न होना या उसका विरोध करने के अलावा हिन्दु मुस्लिम एकता पर दीनदयाल का नज़रिया बहुत समस्याग्रस्त दिखता है। दीनदयाल ने ऐसे लोगों को मुस्लिमपरस्त कह कर संबोधित किया तथा ‘एकता’ की कांग्रेस नीति की मुखालिफत की।

‘‘संघ के एक मुखपत्र ‘राष्ट्रधर्म ’ में प्रकाशित एक लेख में दावा किया गया है कि संघ के विचारक दीनदयाल उपाध्याय ‘हिन्दू मुस्लिम एकता’ के खिलाफ थे और मानते थे कि एकता का मुददा ‘अप्रासंगिक’ है और मुसलमानों का तुष्टीकरण है। ‘मुस्लिम समस्या: दीनदयाल जी की दृष्टि में’ शीर्षक से उपरोक्त लेख राष्टधर्म के विशेष संस्करण में प्रकाशित हुआ था जिसका विमोचन तत्कालीन केन्द्रीय मंत्राी कलराज मिश्र ने किया था। मासिक पत्रिका का उपरोक्त अंक उपाध्याय को समर्पित किया गया है और उसमें उनके बारे में तथा उनके नज़रिये के बारे में लेख है। इसमें प्रकाशित डा महेशचंद्र शर्मा का लेख, यह दावा करता है कि उपाध्याय ने कहा था कि ‘मुसलमान होने के बाद कोई व्यक्ति देश का दुश्मन बन जाता है।’ इनका संक्षिप्त परिचय यह है कि दीनदयाल उपाध्याय की 15 घंटों में संकलित रचनाओं का सम्पादन उन्होंने किया है और दीनदयाल उपाध्याय के चिन्तन के एक तरह से आधिकारिक विद्वान समझे जाते हैं। इसमें यह भी लिखा गया है

‘‘अगर देश का नियंत्राण उन लोगों के हाथ में है जो देश में पैदा हुए हैं मगर वह कुतुबुददीन, अल्लाउददीन, मुहम्मद तुघलक, फिरोज शाह तुघलक, शेरशाह, अकबर और औरंगजेब से अलग नहीं हैं, तो यह कहा जा सकता है कि उनके प्रेम के केन्द्र में भारतीय जीवन नहीं है।’’

/इंडियन एक्स्प्रेस,http://indianexpress.com/article/cities/lucknow/article-in-rss-monthly-deendayal-upadhyaya-was-against-hindu-muslim-unity/

 

महेशचन्द शर्मा के मुताबिक दीनदयाल मानते थे कि एक मुसलमान व्यक्तिगत तौर पर अच्छा हो सकता है, मगर समूह में बुरा हो जाता है और एक हिन्दू व्यक्तिगत तौर पर बुरा हो, मगर समूह में अच्छा हो जाता है। वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि हिन्दु मुस्लिम एकता की बात करनेवाले ‘मुस्लिमपरस्त’ होते हैं और उन्होंने कांग्रेस की ऐसी नीति का विरोध किया था।(http://indianexpress.com/article/cities/lucknow/article-in-rss-monthly-deendayal-upadhyaya-was-against-hindu-muslim-unity/)

देश के अलग अलग हिस्सों से आ रही रिपोर्टें इस बात की ताईद करती है कि कितनी तेजी से पंडित दीनदयाल उपाध्याय को ‘‘नए भारत’’ के आयकन के तौर पर स्थापित किया जा रहा है। इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त कांडला बंदरगाह को दीनदयाल का नाम देने का निर्णय हो जाने की ख़बर आयी। यहां तक कि इस कवायद में विदेश मंत्रालय के भी ‘कूदने’ की ख़बर पिछले दिनों आयी जब 22 सितम्बर 2017 को, जन्मशती समारोह के समापन के चन्द रोज पहले उसने अंग्रेजी तथा हिन्दी में एक ईबुक अपने वेबसाइट पर अपलोड कर दी जिसका शीर्षक था ‘एकात्म मानववाद’ अर्थात इंटिग्रल हयूमानिजम’ जिसके मुताबिक ‘‘भाजपा ही देश का एकमात्र राजनीतिक विकल्प है, हिन्दू विचार ही भारतीय विचार है और महज हिन्दू समाज ही आध्यात्मिक हो सकता है।’’ (https://thewire.in/182878/mea-bjp-propaganda-hindutva-deendayal-upadhyaya-integral-humanism/)  वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘द वायर’ के सम्पादक सिद्धार्थ वरदराजन लिखते हैं कि

विदेश मंत्रालय की यह ई किताब भाजपा एवं  राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ द्वारा अपने आप को एक सम्मानजनक विचारधारात्मक आवरण ओढने की जोरदार कवायद का ही हिस्सा है। उनके वास्तविक गुरू – के बी हेडगेवार और एम एस गोलवलकर – बहुत अधिक जाने जाते हैं और इस कदर विवादास्पद हैं कि किसी भी किस्म की आलोचनात्मक छानबीन/पड़ताल के सामने कमजोर साबित हो सकते हैं, मगर जहां तक उपाध्याय के जीवन और नज़रिये का ताल्लुक है तो उनके बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है और फिर उन्हें इस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है कि संघ के हिन्दुत्व दर्शन को व्यापक समूह के सामने, यहां तक कि अंतरराष्टीय समुदाय के समक्ष भी अधिक ग्राहय बनाया जा सकता है।

उपाध्याय का जन्म 1916 में हुआ मगर उनके जिन्दगी के पहले तीन दशकों को लेकर विदेश मंत्रालय के इस स्तुतिपरक विवरण में एक ही महत्वपूर्ण बात दिखाई देती है – जबकि उनकी पीढ़ी के सर्वोत्तम ब्रिटिशों से भारत की आज़ादी के लिए लड़ रहे थे – कि वह 1942 में राष्टीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े।

(https://thewire.in/182878/mea-bjp-propaganda-hindutva-deendayal-upadhyaya-integral-humanism/)

कोईभी अन्दाज़ा लगा सकता है कि यह महज शुरूआत है।

अगर सत्ताधारी जमातें – उस घटना के 450 साल बीतने के बाद, तमाम ऐतिहासिक तथ्यों को झुठलाते हुए – यह कहने का साहस कर सकती हैं कि हल्दीघाटी की लड़ाई अकबर ने नहीं बल्कि राणा प्रताप ने जीती थी, तो उन्हें यह दावा करने से कौन रोक सकता है कि हिन्दु मुस्लिम एकता की ताउम्र मुखालिफत करने वाले एक शख्स को उस अज़ीम शख्सियत के बरअक्स खड़ा कर दिया जाए जिसने हिन्दु मुस्लिम एकता के लिए अपनी जान दी थी। क्या यह विरोधाभासपूर्ण नहीं होगा कि एक साथ आज़ादी के संघर्ष के नेता महात्मा गांधी, ऐसी शख्सियतों के साथ साथ खड़े कर दिए जाएं जो उनके विचारों के बिल्कुल खिलाफ खड़े थे।

अंत में, लगभग ‘‘नायक विहीन’’ संघ-भाजपा कुनबे में दीनदयाल उपाध्याय के महिमामंडन को समझा जा सकता है क्योंकि वह ‘गोलवलकर के चिन्तन’ पर अड़िग रहे मगर उन्होंने ‘पूरक के तौर पर गांधीवादी विमर्श की भाषा को भी अपनाया तथा संघ के विचारों को अधिक लोकप्रिय बनाया। केन्द्र में भाजपा के सत्तासीन होने के बाद नए भारत की भविष्यदृष्टि /विजन/ को लेकर बहुत कुछ बदल गया है। गांधी, नेहरू, मौलाना आज़ाद, अम्बेडकर, सुभाषचंद्र बोस एवं आज़ादी के आन्दोलन के तमाम अग्रणियों ने नवस्वाधीन भारत के लिए जिस समावेशी, प्रगतिउन्मुख समाज की कल्पना की थी, उसके स्थान पर इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में जो नया भारत गढ़ा जा रहा है वह संघ परिवार की  असमावेशी भविष्यदृष्टि  /विजन/ पर आधारित है। और ऐसे ‘‘नए भारत’’ के आयकन, उसके प्रतीक तो दीनदयाल उपाध्याय ही हो सकते हैं।

0000000000

सन्दर्भ 

  1. ‘‘बारह सौ साल की गुलामी की मानसिकता हमें परेशान कर रही है। बहुत बार हमसे थोड़ा उंचा व्यक्ति मिले तो सर उंचा करके बात करने की हमारी ताकत नहीं होती हैं।/(http://www.firstpost.com/politics/1200-years-of-servitude-pm-modi-offers-food-for-thought-1567805.html)

2

5 अक्तूबर 1997 को ‘आर्गनायजर’ ने ‘छह पठनीय आकर्षक किताबों’’ के लिए दिल्ली के एक प्रकाशक का विज्ञापन प्रकाशित किया, जिनमें से दो किताबें इस प्रकार थीं: गोपाल गोडसे – कुतुब मीनार विष्णु ध्वज है और गांधीहत्या और उसके बाद। तीसरी किताब थी ‘मे इट प्लीज यूअर ऑनर, द असासिन्स स्टेटमेन्ट इन कोर्ट’ जो हिन्दुत्व आतंकी नथुराम गोडसे के अदालती बयान पर आधारित थी। जाहिर है कि आर्गनायजर ऐसी किताबों का विज्ञापन नहीं छापेगा जो संघ के प्रति आलोचनात्मक रूख अख्तियार करती हो।

.. दिल्ली के इसी प्रकाशक ने, जो इस समूह की किताबें छापता हैं /मिसाल के तौर पर, Gandhi and Godse by Koenraad Elst; Voice of India; 183 pages, Rs.250  / की उपरोक्त किताब के अंतिम कवर पर इसी लेखक की अन्य किताबों की सूची छपी है जो इस्लाम और ईसाइयत पर हमला करती हैं। इन किताबों का मकसद छिपा नहीं है। गौतम सेन द्वारा इन किताबों के लिए लिखा गया प्राक्कथन सबकुछ स्पष्ट करता है। गांधी की हत्या एक ‘‘राजनीतिक आक्रमण’’ था जो एक विचारशील व्यक्ति के औचित्यपूर्ण गुस्से का प्रतिफलन था। ‘‘अदालत के समक्ष गोडसे का लम्बा व्याख्यान गांधी की उसके द्वारा की गयी हत्या के राजनीतिक स्वरूप को स्पष्ट करता है।’’ नथुराम गोडसे भारत के आज़ादी के आन्दोलन के इतिहास पर निगाह डालता है, उसमें महात्मा गांधी की भूमिका की चर्चा करता है और गांधी हत्या को औचित्य प्रदान करने के लिए इस भूमिका को भयानक तबाही घोषित करता है।.. डा एल्स्ट के इस किताब की प्रभावी उपलब्धि यही कही जा सकती है कि वह गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या के पीछे निहित वास्तविक विचारधारात्मक और राजनीतिक दरारों को उजागर करता है। इतनाही नहीं यह किताब नथुराम गोडसे को एक धर्मनिरपेक्ष राष्टवादी घोषित करती है जो वर्चस्वशाली स्वतंत्राता आंदोलन के तमाम आदर्शों और पूर्वाग्रहों को साझा करता है। उसके मुताबिक गोडसे धार्मिक कटटरतावाद के खिलाफ था, जातिगत विशेषाधिकारों का विरोध करता था और अपने नेता/संरक्षक वीर सावरकर की तरह सभी भारतीयों के लिए सामाजिक और राजनीतिक समानता का आकांक्षी था।

सेन लिखते हैं ‘‘ गांधी का हत्यारा कोई सिरफिरा हिन्दू अतिवादी नहीं था, जैसा कि उसे चित्रित किया जाता रहा है अलबत्ता एक विचारशील एवं बुद्धिमान व्यक्ति था जो हत्या करने के लिए तैयार था।’’

(http://www.frontline.in/books/the-bjp-and-nathuram-godse/article4328688.ece)

3.

आज बहुत कम लोग इस बात को याद करते होंगे कि वर्ष 2003 में – जबकि गुजरात 2002 के संगठित हिंसाचार का प्रसंग अभी भी सूर्खियों में था, जिसे लेकर देश विदेश के तमाम मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टें आ रही थीं – जनाब नरेन्द्र मोदी, जो उन दिनों गुजरात के मुख्यमंत्राी थे, उन्होंने महान स्वतंत्राता सेनानी श्यामजी कृष्ण वर्मा की अस्थियों को लेकर ‘वीरांजली यात्रा’’ निकाली थी। गुजरात में जनमे इस स्वतंत्राता सेनानी की यह अस्थियां संगमरमर के एक कलश में स्वितजर्लेंड में रखी थीं।(https://www.telegraphindia.com/1030825/asp/nation/story_2296566.asp)

4.

1946 के दंगों के वक्त़ की एक घटना का प्यारेलाल जिक्र करते हैं। गांधीजी की टोली में शामिल एक व्यक्ति ने संघ कार्यकर्ताओं द्वारा पंजाब से आए शरणार्थियों के लिए वाघा में बने शिविर में की कड़ी मेहनत का जिक्र करते हुए उनके अनुशासन, उनकी कार्यक्षमता, साहस एवं काम करने की क्षमता की तारीफ की थी। गांधीजी ने फट से जवाब दिया था ‘‘भूलना मत कि यही बात हिटलर के नात्सियों और मुसोलिनी के फासिस्टों के बारे में कही जा सकती है। गांधी ने संघ को साम्प्रदायिक संगठन घोषित किया जिसका रूख सर्वसत्तावादी था। 

(Pyarelal, Mahatma Gandhi: The Last Phase, Ahmadabad, page 440)

‘‘मैने राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ और उसकी गतिविधियों के बारे में सुना है और जानता हूं कि वह एक सांप्रदायिक संगठन है।’’ गांधी, हरिजन, 9 अगस्त 1942। (Quoted in http://www.coastaldigest.com/column/72028-what-was-gandhis-evaluation-of-rss)

 

सांप्रदायिक संगठनों द्वारा अंजाम दी जा रही गुंडागर्दी के बारे में वह लिखते हैं :

‘‘मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में बहुत कुछ सुना है, मैंने यहभी सुना है कि वह इन तमाम शरारतों के पीछे है। ’’(Gandhi, xcviii-320-322)(Quoted in http://www.coastaldigest.com/column/72028-what-was-gandhis-evaluation-of-rss)

. डा श्यामाप्रसाद मुखर्जी – जो उन दिनों हिन्दु महासभा के सदस्य थे तथा जिन्होंने बाद में संघ के समर्थन से भारतीय जनसंघ की स्थापना की – को लिखा गया सरदार पटेल का पत्र गांधी हत्या की पृष्ठभूमि बयान करता है:

.‘‘..हमारी रिपोर्टें इस बात को पुष्ट करती हैं कि इन दो संगठनों की गतिविधियों के चलते खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चलते, मुल्क में एक ऐसा वातावरण बना जिसमें ऐसी त्रासदी (गांधीजी की हत्या) मुमकिन हो सकी। मेरे मन में इस बात के प्रति तनिक सन्देह नहीं कि इस षडयंत्रा में हिन्दु महासभा का अतिवादी हिस्सा शामिल था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां सरकार एवं राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। हमारे रिपोर्ट इस बात को पुष्ट करते हैं कि पाबन्दी के बावजूद उनमें कमी नहीं आयी है। दरअसल जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है संघ के कार्यकर्ता अधिक दुस्साहसी हो रहे हैं और अधिकाधिक तौर पर तोडफोड/विद्रोही कार्रवाइयों में लगे हैं।..

/18 जुलाई 1948  मूल अंग्रेजी से अनूदित /

… ‘सरकार ने इस बात को चिन्ता के साथ नोट किया है कि व्यवहार में राष्टीय स्वयंसेवक संघ अपने घोषित आदर्शों पर टिका नहीं रहा है।

अवांछित और यहां तक कि खतरनाक गतिविधियों को संघ के सदस्यों ने अंजाम दिया है। यह देखा गया है कि देश के तमाम हिस्सों में राष्टीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों ने हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया है जिसमें आगजनी, डकैती, लूट और हत्या तक शामिल है और उन्होंने अवैध ढंग से हथियार और गोला बारूद इकटठा किए हैं। वे ऐसे पर्चे वितरित करते पाए गए हैं, जिसमें लोगों को आतंकी गतिविधियों का सहारा लेने क ेलिए उकसाया गया है, फायरआर्म्स इकटठा करने के लिए कहा गया है, और सरकार के खिलाफ असन्तोष पैदा करने और पुलिस एवं सेना को भेदने की बातें कहीं गयी हैं।

/गांधी हत्या के बाद राष्टीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी का ऐलान करते हुए सरकार द्वारा जारी विज्ञप्ति, 4 फरवरी 1948, मूल अंग्रेजी से अनूदित/

अगर हिन्दू राज हकी़कत बनता है तो वह इस देश के लिए सबसे बड़ी विनाशलीला साबित होगा। हिन्दु कुछ भी दावा करें, हिन्दुइजम / अर्थात हिन्दू धर्म/ स्वतंत्राता, समता और बंधुत्व के लिए प्रतिकूल है। जनतंत्रा के साथ उसका सामंजस्य नहीं बैठ सकता है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए। -अम्बेडकर, पाकिस्तान आर द पार्टीशन आफ इंडिया, पेज 358

…बातों का सही दायरे में रख कर देखें तो हिन्दु धर्म और सामाजिक एकता यह दोनों बातें असामंजस्यपूर्ण हैं। अपने मूल स्वभाव मेें हिन्दू धर्म सामाजिक अलगाव में यकीन रखता है, जिसे सामाजिक बिखराव कह सकते हैं और जो सामाजिक विभाजन को जन्म देता है। अगर हिन्दू एक होना चाहते हैं तो उन्हें हिन्दू धर्म का परित्याग करना होगा। वह हिन्दू धर्म का उल्लंघन किए बिना एक नहीं हो सकते हैं। हिन्दू एकता के लिए सबसे बड़ी बाधा हिन्दू धर्म है। सभी सामाजिक एकता के लिए आवश्यक वह आधार कि हम किसी से जुड़े हैं, वह हिन्दू धर्म पैदा नहीं कर सकता। इसके विपरीत हिन्दु धर्म अलगाव की बेचैनी को पैदा करता है। (Ambedkar (http://www.huffingtonpost.in/2017/04/14/30-ambedkar-quotes-that-may-surprise-the-bjp_a_22039425/)

परिशिष्ट

स्कूल में दीन दयाल

शिक्षा की उपेक्षा, नफरत की दीक्षा !

– सुभाष गाताडे

राजाराम /बदला हुआ नाम/, जयपुर के पास के एक सरकारी स्कूल के प्रिन्सिपल इन दिनों थोड़े चिंतित हैं।

ताउम्र ईमानदार शिक्षक रहे राजाराम – जिनके लिए अपने विद्यार्थियों का हित हमेशा सर्वोपरि है – वह राज्य के शिक्षा मंत्राी की तरफ से आए ताजे़ फरमान को लेकर थोड़े परेशान हैं। दरअसल उन्हें यह बात समझ नहीं आ रही है कि आखिर किस आधार पर हर माध्यमिक और उच्च माध्यमिक सरकारी स्कूलों को दीनदयाल उपाध्याय की संकलित रचनाओं को खरीदने का निर्देश दिया गया है। स्कूल के पास कोई लाइब्रेरी नहीं है। स्कूल को मिलनेवाला बजटीय आवंटन इतना सीमित होता है कि छात्राओं द्वारा बार बार आवेदन करने के बावजूद वहां के एकमात्रा टायलेट की मरम्मत नहीं हो सकी है।

27 फरवरी को राज्य सरकार की तरफ से भेजे गए परिपत्रा में सभी माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों को ‘दीनदयाल उपाध्याय संपूर्ण वाडमय’ नाम से 15 खंड़ों में प्रकाशित लेखों और व्याख्यानों का संकलन चार हजार रूपए की छूट की कीमत पर खरीदने के लिए कहा गया है। स्कूलों को कहा गया है कि वह इसके लिए स्कूल डेवलपमेण्ट फंड – जिसे स्थानीय जरूरतों के लिए उपयोग में लाया जाता है – से पैसे खर्च करें। मालूम हो कि उपरोक्त संकलन को भाजपा के पूर्व राज्य प्रमुख महेशचंद्र शर्मा ने संपादित किया है तथा जिसका विमोचन बीते साल अक्तूबर ने खुद प्रधानमंत्राी मोदी ने किया है, जब भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे दीनदयाल उपाध्याय के जन्मशति समारोह का आगाज़ हुआ था। आखिर इन पन्द्ररह खंडों को कहां रखा जाएगा और किस तरह उनको खरीदने से आम छात्रा लाभान्वित होंगे – जिनके पास अच्छे पाठयपुस्तकों तक की कमी है – वह अपने आप से पूछते हैं, मगर कोई संतोषजनक जवाब ढंूढ नहीं पाते हैं।

जाहिर है कि एक माध्यमिक स्कूल के प्रधानाचार्य होने के नाते अपने आप को उलझन में पाने वाले राजाराम अकेले नहीं हैं। उनके जैसे तमाम लोग हैं जिनके सामने उसी किस्म के सवाल हैं। यहां यह जोड़ना जरूरी है कि यह कोई पहली दफा नहीं है कि राज्य सरकार ने खास किताब को खरीदने का स्कूलों को निर्देश दिया है। अभी पिछले साल की ही बात है कि राजस्थान सरकार सूर्खियों में थी जब यह ख़बर आयी थी कि उसने हर सरकारी स्कूल को राष्टीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक-सदस्य डा हेडगेवार के राकेश सिन्हा द्वारा लिखे चरित्रा को खरीदने के लिए निर्देश दिया था। / मालूम हो कि राजस्थान से शुरू हुआ यह सिलसिला फिलवक्त भाजपाशासित अन्य राज्यों – हरियाणा, छत्तीसगढ़ आदि में भी पहुंच चुका है, जहां इसी तरह दीनदयाल की संकलित रचनाओं की खरीदारी के आदेश दिए गए हैं।/

पहले हेडगेवार के चरित्रा को खरीदने का स्कूलों को निर्देश देना और अब संघ के एक विचारक की संकलित रचनाओं को खरीदने का परिपत्रा जारी करना, यह लगातार स्पष्ट होता जा रहा है कि राज्य का शिक्षा मंत्रालय राज्य में शिक्षा की स्थिति की बढ़ती आलोचना से चिंतित नहीं है बल्कि वह बकौल कांग्रेस पार्टी स्कूलों में ‘केसरिया’ झंडा आगे बढ़ाने को लेकर अधिक तत्पर है।

अभी दीनदयाल उपाध्याय की संकलित रचनाओं के खरीदने को लेकर शिक्षा मंत्रालय का आदेश जारी ही हुआ था कि शिक्षा मंत्राी महोदय द्वारा जारी एक अन्य आदेश की ख़बर बनी जब उन्होंने अजमेर स्थित अकबर किले का नाम अजमेर किला करने का निर्णय लिया। सम्राट अकबर को लेकर उन्होंने कथित तौर पर जो बात कही उसने विवाद को जन्म दिया।

राजस्थान शिक्षा मंत्राी वासुदेव देवनानी ने एक सभा में संकेत दिया कि सम्राट अकबर आतंकी भी हो सकता है। देवनानी ने इस बात को इस सन्दर्भ में उठाया जब यह समाचार मिला कि अकबर किले का नाम अजमेर किला करने पर उन्हें कथित तौर पर धमकी मिलने की बात आयी। बाद में उन्होंने इस बात से इन्कार किया कि उन्होंने अकबर को आतंकवादी कहा था, उन्होंने कहा कि उन्होंने उसे आक्रमणकारी कहा था।

(http://www.indian364.com/india/81006/Rajasthan-Will-remove-terrorist-names-says-Vasudev-Devnani)

और ऐसे तमाम आदेशों को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि इससे पैदा विवादों पर ही बात होती रहती है और राज्य की शिक्षा की स्थिति पर बात नहीं हो पाती – जो नाकाफी फंड, अच्छी गुणवत्तावाले शिक्षकों की कमी और सभी स्कूलों में संतोषजनक अवरचनागत सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है और ऐसे पाठयपुस्तकों से भरा पड़ा है जिसमें बारे में विशेषज्ञ कमेटी का कहना है कि उनमें ‘अन्तर्वस्तु की सीमाएं’ और पूर्वाग्रहं  साफ नज़र आते हैं।

2

अभी पिछले साल की बात है जब एक वेबसाइट ने इस बात का विस्त्रत विवरण चार चार्ट के जरिए पेश किया था कि आखिर ‘राजस्थान की शिक्षा के साथ समस्या क्या है ?  ; ( https://scroll.in/article/805320/four-charts-show-what-is-wrong-with-rajasthan-education-it-has-nothing-to-do-with-kanhaiya-kumar) उपरोक्त स्टोरी लगभग एक साल पहले प्रकाशित हुई थी जिसमें बताया गया था कि ‘छात्रों में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए’’ पाठयक्रमों में ‘बड़े बदलाव’ लाने के शिक्षा मंत्राी के उत्साह में न केवल ‘शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन होता’ दिख रहा है और ‘‘शिक्षा के गिरते पाठयक्रम को सुधारने केा लेकर भी उपाय’’ करने को लेकर भी वह निरूत्साहित दिखते हैं। रिपोर्ट में बताया गया था कि ‘‘राज्य के कक्षा तीन के महज 45 फीसदी शब्दों को पढ़ सकते हैं जबकि कक्षा के दो के 20 फीसदी छात्रा अक्षरों को पहचान तक नहीं सकते। /देखें ‘एन्युअल स्टेटस आफ एजुकेशन रिपोर्ट’ जिसका प्रकाशन 2014 में हुआ था। [http://img.asercentre.org/docs/Publications/ASER%20Reports/ASER%202014/fullaser2014mainreport_1.pdf ], और सालों साल विद्यार्थियों की पढ़ने तथा आकलन करने की क्षमता लगातार घटती गयी है।

उपरोक्त रिपोर्ट को उदध्रत करते हुए आलेख में राज्य में ‘सीखने के घटते नतीजे’ (deteriorating learning outcomes) की बात की गयी थी और उसकी तुलना राष्टीय स्तर के आंकड़ों के साथ की गयी थी और यह भी बताया गया था ‘‘जहां शेष भारत में कक्षा तीन के अस्सी फीसदी बच्चे शब्दों को पहचान सकते थे वहीं राजस्थान में वर्ष 2014 में यह आंकड़ा 55 फीसदी है।’’ बच्चों के स्कूल में दाखिला बने रहने को लेकर भी राज्य का रेकार्ड खंगाला गया था, जिसके मुताबिक ‘‘वर्ष 2013 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से देश के 21 शहरों में किए गए अध्ययन में पाया गया कि राज्य में स्कूल छोड़नेवालों का प्रतिशत कई मामलों में राष्टीय औसत से दोगुना है।’’

दो साल पहले राज्य की स्कूली शिक्षा में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की योजना की भी नागरिक समाज और शिक्षाशास्त्रिायों की तरफ से पड़ताल हुई थी। उनके द्वारा जारी खुले खत में न केवल राज्य की शिक्षा की स्थिति को बेपर्द किया गया था बल्कि परिस्थिति को सुधारने के नाम पर राज्य द्वारा उठाए जा रहे कदमों पर भी प्रश्न उठाए गए थे। उसमें बताया गया था कि किस तरह राज्य में ‘सार्वजनिक शिक्षा में निवेश का स्तर बहुत कम है और में बेहद कमी दिखती है और शेष भारत में प्रति छात्रा किए जानेवाले खर्चे की तुलना में वह कम है।’ और ‘ संख्या के हिसाब से देखें तो यहां ‘स्कूल छोड़नेवाले बच्चों की संख्या देश में सबसे अधिक है और बाल श्रम के आंकड़ों में वह भारत के राज्यों में चौथे नम्बर पर ठहरता है और वर्ष 2011 के सामाजिक-आर्थिक एवं जाति गणना के हिसाब से देखें तो राजस्थान में निरक्षरों की तुलना देश में सबसे अधिक है और माध्यमिक शिक्षा में यहां की संक्रमण दर भी राष्टीय औसत से कम है। (http://www.epw.in/journal/2015/29/reports-states-web-exclusives/misguided-education-policy-rajasthan.html#sthash.LVsN35yQ.dpuf)  शिक्षा क्षेत्रा में निजी क्षेत्र की इस दखल की राज्य के साडे तीन लाख अध्यापकों ने भी मुखालिफत की थी और बाद में राजनीतिक नुकसान होने के डर से सरकार ने इस प्रस्ताव को वापस लिया था।

विडम्बना ही थी कि जहां राज्य में ‘राष्टीय औसत से भी दोगुनी रफतार से बच्चों के स्कूल छोड़ने की रफतार दिखती है’, ‘शिक्षा में निवेश की स्तर भी निम्न है’, ‘स्कूल का कभी मुंह न देखनेवाले बच्चे पूरे देश में सबसे अधिक है’ इसके बावजूद विगत दो साल से अधिक समय से राज्य सरकार ने यहां के हजारों सरकारी स्कूलों को बन्द किया है और जिसके पीछे तर्क ‘संसाधनों के अपर्याप्त इस्तेमाल’ और ‘समायोजन’ का दिया है। (https://www.telegraphindia.com/1160620/jsp/nation/story_92219.jsp#.WMJHpW997IU) सरकार ने इस संभावना को भी ध्यान में नहीं रखा कि घर और स्कूल की दूरी बढ़ने के साथ साथ गरीब बच्चों के लिए स्कूल पहुंचना लगभग असंभव हो जाएगा, और उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ेगा। एक क्षेपक के तौर पर यहां इस बात का भी उल्लेख करना समीचीन होगा कि केन्द्र सरकार ने बाकी राज्यों को भी ‘कम दाखिले वाले सरकारी स्कूलों के आपस में विलयन’ के ‘राजस्थान मॉडल’ को लागू करने की सलाह दी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस विलयन के लिए दिशानिर्देश भी बना रहा है। /वही/

राजस्थान राज्य बोर्ड की पाठयपुस्तकों की अन्तर्वस्तु का मसला भी अकादमिशियनों की बीच चिन्ता का विषय रहा है।(http://www.huffingtonpost.in/2016/05/23/rajasthan-school-textbook_n_10107124.html)  शिक्षाशास्त्रिायों की एक टीम ने वर्तमान सरकार द्वारा संशोधित पाठयक्रमों की समीक्षा करने के बाद राजस्थान उच्च अदालत में जनहितयाचिका दाखिल करने का भी निर्णय लिया है। प्रस्तुत याचिका में वह शिक्षाशास्त्रा के निगाह से पाठयपुस्तकों की कमियों और उसकी अन्तर्वस्तु की सीमाओं के मुददे को उठाया है। किताबों को 45 दिन के कम वक्त़ में जल्दबाजी में तैयार करने को लेकर तथा किताबों की अन्तर्वस्तु के केसरियाकरण को लेकर भी उनके सवाल थे। उनके मुताबिक किताबों में हाशियाक्रत समुदायों को भी स्थान नहीं मिला है। मिसाल के तौर पर पाठयक्रम की सामग्री इंडस वैली सिविलायजेशन को सिंधु घाटी सभ्यता घोषित करती है, आर्यो को भारत का मूल निवासी बताती है, वर्ण व्यवस्था को अच्छा आचार घोषित करने के अलावा हड़तालों की भर्त्सना करती है। उनके मुताबिक अल्पसंख्यक समुदायों को लेकर भी किताबें अपना पूर्वाग्रह जाहिर करती हैं।

निश्चित ही ऐेसे वातावरण में जहां किताबों में भारत के प्रथम प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू शायद ही कहीं स्थान पाते हों या निजामुददीन औलिया को ‘मुसलमान होने के बावजूद’ अच्छा संत घोषित किया गया हो, वहां इस बात पर क्या आश्चर्य कि बच्चों एवं किशोरों के विकसित होते मस्तिष्कों के सामने दीनदयाल उपाध्याय को धूमधड़ाके के साथ पेश किया जाता हो जो उनकी संकलित रचनाओं के सम्पादक के मुताबिक ‘हिन्दु मुस्लिम एकता के खिलाफ’ थे और मानते थे कि ‘मुसलमान होने के बाद कोई व्यक्ति देश का दुश्मन बन जाता है।’ हिन्दु मुस्लिम एकता की हिमायत करनेवालों को उपाध्याय ‘मुस्लिम परस्त’ के तौर पर संबोधित करते थे।(http://indianexpress.com/article/cities/lucknow/article-in-rss-monthly-deendayal-upadhyaya-was-against-hindu-muslim-unity/)*

प्रस्तुत पंक्तियां लिखे जाते वक्त़ हम अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि सूबा राजस्थान के तमाम सरकारी स्कूलों ने शिक्षा मंत्रालय के इस ताजा परिपत्र पर अमल शुरू किया होगा, कुछ ने दिल्ली के उपरोक्त प्रकाशक के यहां इन 15 खंडों की मांग भी भेजी होगी।

और यह भी तयशुदा बात है कि प्रधानाचार्य राजाराम /बदला हुआ नाम/ का वह प्रश्न अभीभी अनुत्तरित होगा कि इन खंडों की खरीदी से आखिर छात्रों को क्या लाभ मिलेगा, जिनके पास अच्छे पाठयपुस्तकों का भी अभाव है।

/ समयांतर के अप्रैल 2017 में प्रकाशित लेख का अंश/

We look forward to your comments. Comments are subject to moderation as per our comments policy. They may take some time to appear.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s