25 सितम्बर को बीकानेर प्रौढ़ शिक्षण समिति में डॉ छगन मोहता स्मृति व्याख्यान का यह परिवर्धित व संशोधित रूप यहाँ पेश है। दुनिया भर में जनांदोलनों के ताज़ा विस्फ़ोट के दौर में इसे इस उम्मीद से भी साझा कर रहे हैं कि पाठकों से भी शायद कुछ फ़ीडबैक मिले।
पिछली सदी में अस्सी की दहाई के आख़िरी बरसों में उस वक़्त के समाजवादी देशों में हमने जनांदोलनों का ऐसा ज्वार देखा था जिसके फलस्वरूप समूचे पूर्वी यूरोप और सोवियत संघ में राज्य-निर्भर समाजवाद का क़िला चरमरा कर ढह गया था। इस में कोई शक़ नहीं कि राज्य-समाजवाद की बनावट में कई ख़ामियाँ थीं मगर उन जन उभारों को उस ज़माने में पश्चिम के राजनीतिक सिद्धांतकारों ने जिस तरह पढ़ा वह ग़ौरतलब है। अमरीका के दक्षिणपंथी रैंड कॉर्पोरेशन के बुद्धिजीवी फ्रांसिस फुकुयामा ने तो समाजवाद के पतन के बाद की दुनिया में ‘इतिहास के अंत’ का ऐलान तक कर दिया था। ज़ाहिर है ‘इतिहास का अंत’ जैसे पदों का हमारे नज़दीक़ कोई मानी नहीं होता क्योंकि हमारे यहाँ तो काल अनादि-अनंत है, उसे शाश्वत के रूप में देखा जाता है। फुकुयामा का यह उद्घोष हेगेल के दर्शन से आता है, खुद जिसकी बुनियाद ईसाइयत के काल-तसव्वुर से आती है जहाँ आदम और हव्वा के जन्नत से निकाले जाने से ‘इतिहासगत’ या ऐतिहासिक काल की शुरुआत होती है।
जन्नत या फ़िरदौस में ‘काल’ या ‘वक़्त’ नहीं होता बल्कि अंग्रेज़ी में जिसे ‘इटर्निटी’ कहा जाता है वह होता है – जिसका हिंदी में अक़्सर ‘शाश्वत’ के रूप में तर्जुमा किया जाता है जो सही नहीं है। हमारे यहाँ कई भारतीय परम्पराओं में तो काल को ही अनादि अनंत – अर्थात शाश्वत माना गया है। मगर वह ‘इटर्निटी’ नहीं है। ‘इटर्निटी’ का आशय एक ऐसी अवस्था से है जो ‘कालशून्य’ है जहाँ वक़्त नहीं होता – अर्थात जन्नत की वह अवस्था जिसमें एक तरह की ऐसी ख़ुशहाली का तसव्वुर है जहाँ जन्म से लेकर बुढ़ापे और मौत तक का उतार चढ़ाव और सिख- दुःख नहीं होते हैं। कोई बूढ़ा और बीमार नहीं होता, और न उसकी मृत्यु ही होतीं है। हमारे यहाँ काल मात्र को सुख दुःख का कारण माना गया है जो की इस लोक में ही संभव है। जन्नत की कालशून्य अवस्था से ऐतिहासिक काल में ‘पतन’ आदम और हव्वा की नस्ल को मिले अभिशाप का नतीजा माना गया है जिससे मुक्ति उसे तब मिलेगी जब वह पृथ्वी में अपनी यह सज़ा काट चुकी होगी और मसीहा आकर उसे मुक्त करेंगे। तब इंसान की जन्नत में वापसी होगी। ज़ाहिर है कि यह एक अति-सरलीकृत विवरण है मगर इस बात तो समझने के लिए क़ाफ़ी है कि फुकुयामा जैसे सिद्धांतकारों का आशय क्या था।
ईसाइयत के इस बुनियादी नज़रिये पर खड़ा हेगेल का दर्शन इस वापसी को ‘इतिहास के अंत’ के रूप में देखता है। कहने की ज़रुरत नहीं कि हेगेल में यह एक सेकुलर दर्शन की शक्ल में हाज़िर होता है जहाँ ‘रूह’ का सफ़र अंततः एक ऐसी अवस्था में होता है जो उसकी मुक्ति भी है। यहाँ मैं ‘रूह’ का इस्तेमाल जर्मन शब्द ‘गाइस्ट’ के लिए कर रहा हूँ जिसका अर्थ हेगेल के फ़लसफ़े में ‘स्पिरिट’ या ‘माइंड’ के अर्थ में किया जाता है जिसे हम ‘मानस’ भी कह सकते हैं। याद रखना ज़रूरी है कि हेगेल के आदर्शवादी फ़लसफ़े में मानस या रूह का एक अलहदा स्वतन्त्र वजूद है और दुनिया का इतिहास उसी के सफ़र की दास्तान है। इस का अर्थ यह भी है कि इस परम मानस या रुह का अपनी मंज़िल तक पहुंचना ही इतिहास का अंत भी है। ग़ौर से देखें तो पाएंगे कि मार्क्स के फ़लसफ़े में मानव समाज का साम्यवाद की मंज़िल तक पहुंचना भी इसी ख़याल पर निर्भर है। बस फ़र्क़ यह कि उनके मुताबिक़ शोषण-मुक्त समाज के आगमन से ‘इतिहास का अंत’ नहीं बल्कि सही मायने में उसकी शुरुआत होगी और ‘प्राक-‘इतिहास’ का अंत होगा। हेगेल की रूह या मानस के सफ़र की जगह उनके दर्शन में ‘समाज’ का ‘विकास’ – अर्थात ‘इतिहास’ – ले लेता है जो विभिन्न अंतर्विरोधों के ज़रिये उसे विभिन्न स्तरों से गुज़ारता हुआ अंततः उस जन्नत तक पहुंचा देता है जिसका नाम वर्गहीन यानि साम्यवादी समाज है।
लिहाज़ा, जब फुकुयामा ‘इतिहास के अंत’ की बात करते हैं तो समझना होगा कि उनके नज़रिये में यह वह अवस्था भी है जहाँ तमाम कलह मिट चुके होते हैं। अर्थात ‘राजनीति’ का भी अंत हो चुका होता है। आख़िरकार ‘राजनीति’ जिस शै का नाम है उसका वजूद ही ‘द्वंद्व’ और ‘अंतर्विरोध’ पर टिका है। जिस समाज में द्वंद्व और अंतर्विरोध या कलह नहीं है वहां ‘राजनीति’ भी नहीं हो सकती है। इस विषय पर हम थोड़ी देर में और तफ़सील से बात करेंगे। फ़िलहाल, यह दर्ज कर लें कि उस ज़माने के फुकुयामा जैसे सिद्धांतकारों का एकबारगी यह दावा भी था कि समाजवाद के अंत के साथ मानव समाज उस मुक़ाम पर पहुँच गया है जहाँ उसने लिबरल/उदारवादी जनतंत्र में सब से माक़ूल शासन पद्धति खोज निकाली जा चुकी है। उसने समाजवाद को परास्त कर के यह बात साबित कर दी है कि वही सबसे उत्तम है। अपने बाद के लेखों और पुस्तक में उनहोंने यह क़ुबूल किया कि यह सच है कि समाज के सारे कलह तो नहीं मिटे फिर भी यह सही है कि लिबरल जनतंत्र में उसे सब से अव्वल शासन व्यवस्था मिल गयी है। इस अर्थ में भी इस दौर को राजनीति के अंत का दौर कहा जा सकता है – ऐसा उनका और उस ज़माने के कई पश्चिमी सिद्धांतकारों का मानना था।
‘उत्तर-राजनीतिक’ अवस्था और ‘सियासत’
हालाँकि मैंने ऊपर सिर्फ फुकुयामा की चर्चा की है, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि पूरे 1990 और 2000 के दहाईयों के बड़े हिस्से में पश्चिम के कई राजनीतिक सिद्धांतकारों ने उस दौर की शिनाख़्त एक ‘उत्तर-राजनीतिक’ दौर के रूप में की थी। याद रहे कि यह वह दौर था जब पृथ्वी भर में नव-उदारवाद का तिलिस्म छाया हुआ था जिसने हमारे सामने दुनिया को सर के बल खड़ा कर दिया था। उस दुनिया की कमान ‘अर्थव्यवस्था’ और उसके योजनाकारों के हाथ में थी और ‘राजनीति’ वहां वर्जित थी। हमें समझाया गया था कि ‘राजनीति’ ही हर मर्ज़ के लिए ज़िम्मेदार है।
यहाँ थोड़ा ठहर कर यह बताना ज़रूरी है कि मैं शीर्षक में ‘राजनीति’ और ‘सियासत’ को उद्धरण चिन्हों में क्यों रख रहा हूँ। ज़ाहिर है कि इसकी एक वजह यह है कि मैं इन पदों का इस्तेमाल उनके प्रचलित व रूढ़ अर्थों में नहीं कर रहा हूँ। प्रचलित अर्थों में ‘राजनीति’ और ‘सियासत’ समानार्थी शब्द हैं जिनमें से एक संस्कृत मूल का है और दूसरा उर्दू/फ़ारसी का। मगर यहाँ मैं इन्हें उन अर्थों से थोड़ा अलग ढंग से इस्तेमाल कर रहा हूँ जिसकी विस्तृत चर्चा मैंने अपनी किताब आसमां और भी हैं में की है। यहाँ मैं संक्षेप में इस अंतर पर कुछ बातें रखना चाहता हूँ।
राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषण में कई बार शब्दों के मौजूदा प्रचलित अर्थ नाक़ाफ़ी साबित होते हैं क्योंकि अक्सर हमें चीज़ों की बारीक़ियों में उतरने के लिए उनके विभिन्न पहलुओं में फ़र्क़ करना पड़ता है। ऐसा ही कुछ होता है ‘राजनीति’ के सन्दर्भ में जहाँ हम देखेंगे किस तरह जिस शै का सम्बन्ध एक ज़माने में सिर्फ़ और सिर्फ़ राजकाज से हुआ करता था उसके अर्थों में विस्तार आता चला गया। मार्क्स ने दिखाया कि वर्गों के बीच आर्थिक अंतर्विरोधों का भी एक राजनीतिक पहलू होता है जो अक्सर वर्ग संघर्ष की राजनीतिक शक्ल में सामने आता है। उन्होंने दिखाया कि दरअसल कारखानों में रोज़ाना चलने वाली टकराहटों में – बेशक वह ख़ालिस आर्थिक मुद्दों पर हों – उसी वक़्त राजनीति उभर कर सामने आती है जिस वक़्त मज़दूर व्यक्तिगत शिकायतों को बाक़ी मज़दूरों के साथ मिलकर यूनियन या संगठन के ज़रिये उठाने लगता है। इस सन्दर्भ में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव नारीवादियों के उस सैद्धांतिकरण में दिखाई देता है जहाँ वे दावा करती हैं कि ‘व्यक्तिगत भी राजनीतिक’ है। यानि, पितृसत्ता के सांचों में ढले परिवार और इस समाज के स्त्री-पुरुष संबंध भी सत्ता के संबंधों पर ही टिके होते हैं और इसलिए वे कभी भी राजनीति-मुक्त नहीं होते। परिवार और स्त्री-पुरुष के अंतरंग संबंधों में व्याप्त सत्ता-संबंधों और हिंसा की ओर ध्यान आकर्षित करने वाला यह सैद्धांतिकरण राजनीति की हमारी समझ को और विस्तृत करता है। ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है जब हम जाति-आधारित छुआछूत जैसे अन्य भेदभावों पर नज़र डालते हैं। जाति के सत्ता-संबंध भले ही ‘संस्कृति’ की शक्ल में हमारे सामने हाज़िर हों, होती हैं वह आधिपत्य और शोषण की ही संरचनाएं।
‘राजनीति’ के ये बिलकुल अलग दो धरातल व आयाम हैं। पहले या पारम्परिक अर्थ में राजनीति का कारोबार राजसत्ता और शासन से ताल्लुक़ रखता है जिसके साथ जुड़ा होता है एक पूरा का पूरा तामझाम – राजनीतिक दल, चुनाव, सत्ता पर क़ाबिज़ होने के नाना जतन और व्यूह रचनाएँ । इस अर्थ में ‘राजनीति’ को हम राजनीति ही कहेंगे। इस राजनीति का लोक या जनजीवन से कभी कभी साबिक़ा पड़ता है मगर कुल मिलाकर इसका सरोकार राजसत्ता से और प्रशासन व ‘सरकारियत’ से होता है। संसदीय या जनतांत्रिक देशों में राजनीति का लोकजीवन से सामना आम तौर पर चुनावों के सन्दर्भ में ही होता है। यूँ तो कहने को, आधुनिक समाजों में राजनीति का पूरा कारोबार ही ‘जनता’ और उसकी ‘मर्ज़ी’ (पॉपुलर विल) पर टिका होता है क्योंकि यह माना जाता है कि ‘दैवीय अधिकार’ के दावों पर टिके राजा-महाराजाओं के शासन के बनिस्बत आधुनिक राजनीति और राजसत्ता की बुनियाद अवाम है। उस अर्थ में बेशक़ राजनीति और अवाम या जनता का रिश्ता बिलकुल बुनियादी हो, असल में जनता कभी भी शासक नहीं होती बल्कि उसके नाम पर हमेशा एक अभिजात वर्ग या गुट ही शासन करता है। इसलिए जनता से उसका रिश्ता अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए ही होता है। राजसत्ता, प्रशासन, सरकारियत और नीति-निर्माण आदि से मिलकर ही राजनीति की औपचारिक ज़मीन बनती है।
इसके बरअक्स ‘राजनीति’ के वो तमाम रूप हैं जो इस औपचारिक ज़मीन के बहार देखने को मिलते हैं जिन्हें मैं ‘सियासत’ कह रहा हूँ। अंग्रेजी में मैं अक्सर इसके लिए ‘पैरा-पॉलिटिक्स’ (parapolitics) शब्द का इस्तेमाल करता हूँ जहाँ ‘पैरा’ का आशय राजनीति के धरातल ‘नीचे’ या ‘बाहर’ से होता है। यह उपसर्ग उन गतिविधियों या प्रैक्टिशनरों के लिए इस्तेमाल होता है जो पेशेवर नहीं हैं और अक्सर एक मायने में अनधिकृत भी होते हैं। बेशक विभिन्न देशों के संविधान इसकी इजाज़त देते हों, कार्यतः हर शासक गुट इसे अवैध या नाजायज़ मान कर ही बर्ताव करता है।
यहाँ एक और बात कहते चलें। जयप्रकाश नारायण ने एक ज़माने में ‘राजनीति’ के बार-अक़्स ‘लोकनीति’ की बात की थी। सियासत को लोकनीति के अर्थ में समझना ग़लत होगा क्योंकि जयप्रकाश नारायण ने यह पद एक आदर्श के तौर पर ‘राजनीति’ से उसका फ़र्क़ करते हुए किया था। इसलिए उनके इस पद के केंद्र में ‘लोक’ या ‘अवाम’ का विचार था और जिसे वे राजनीति की आलोचना के लिए इस्तेमाल करते थे जहाँ ‘लोकनीति’ एक नैतिक आदर्श की बात करती है जिसमें ‘सत्ता की राजनीती’ का नकार है, लोक के शासन का एक राजनीतिक-दलेतर तसव्वुर है जिसमें सत्ता का विकेन्द्रीकरण होगा। ‘सियासत’ पर ऐसे किसी आदर्श का बोझ नहीं हैं। उसे मैं मूलतः एक विश्लेषणात्मक पद के तौर पर इस्तेमाल कर रहा हूँ।
सियासत के संबंध में दो एक बातें शुरू में ही कह देना मुनासिब होगा। आधिपत्य और शोषण की संरचना होने मात्र से कोई संरचना ‘राजनीतिक’ नहीं हो जाती। अक्सर हम देखते हैं कि युगों से जिन सत्ता संबंधों में दरारें नहीं पड़ीं उन पर अचानक एक ख़ास मुक़ाम पर आकर सवाल खड़े होने लगते हैं। वैकल्पिक विमर्श उभर कर आता है और नयी दावेदारियां पेश की जाने लगती हैं। इस लम्हे को हम सियासत का लम्हा कह सकते हैं जब सत्ता के बनाये और उसकी संरचना में रचे बसे ‘अर्थतंत्र’ (अर्थों के तंत्र) को चुनौती मिलने लगती है। इससे पहले का दौर वह होता है जब सत्ता-विहीन लोग सत्ता की संरचना और उसके अर्थतंत्र में शरीक होकर उसका बोझ ढोते हैं। इस परिघटना की व्याख्या और उसका सैद्धांतिकरण मार्क्सवादियों व नारीवादियों ने अलग अलग ढंग से किया है मगर मैं जिस बात की ओर ध्यान खींचना चाहता हूँ उसकी मूल बात यह है कि जब तक सत्ता की उस संरचना को चुनौती नहीं मिलनी शुरू होती तब तक सियासत नहीं होती है। किसी का मज़दूर होना मात्र उसे क्रांतिकारी नहीं बना देता ठीक वैसे ही जैसे किसी का औरत होना मात्र उसे नारीवादी नहीं बनाता है।
सियासत के बारे में एक बात और बहुत महत्वपूर्ण है। ऊपर हमारे सारे उदाहरण समाज के भीतर कारख़ाना, परिवार या गांव में मौजूद विभिन्न ‘स्थानीय’ सत्ता संरचनाओं से ताल्लुक़ रखते हैं – जिन्हें हम मुक़ामी सियासत कह सकते हैं। मगर इसका एक आयाम और है जो मुक़ामी नहीं बल्कि राजसत्ता और सरकार के वृहत्तर चरित्र से ताल्लुक़ रखता है। हर कारख़ाने, परिवार या गांव के स्थानीय सत्ता-संबंधों जूझ रहे लोगों का जीवन उसी दायरे तक सीमित नहीं रहता है बल्कि केंद्रीय राज्य की सत्ता और उसके द्वारा क़ानून आदि के ज़रिये क़ायम रखे जा रहे वृहत्तर संबंधों से भी अक्सर उनका सामना होता है। सियासत के इस रूप से हमारा सरोकार आगे भी रहेगा क्योंकि यही वह रूप है जो हमें जनांदोलनों के सन्दर्भ में देखने को मिलता है। इसे हम ‘राजनीति’ से अलग, ‘सियासत’ के खाने में क्यों डाल रहे हैं उसकी वजह आगे की हमारी चर्चा में और स्पष्ट हो जायेगी मगर इस वक़्त इतना भर याद कर लेना क़ाफ़ी होगा कि सियासत की ज़मीन राजनीति की औपचारिक ज़मीन से अलग है। उसकी ज़मीन सारा समाज और उसमें व्याप्त सत्ता के सम्बन्ध है। इसलिए उसका सरोकार राजनीतिक सत्ता पर क़ाबिज़ होना नहीं है। बेशक़ सियासत वक़्तन-फ़-वक़्तन सत्ता के लिए चुनौती या सरदर्द ज़रूर बन जाती है मगर कुल मिलाकर उसका सरोकार जनजीवन के ही विभिन्न पहलुओं से रहता है। उदहारण के तौर पर इसे हाल के ‘कॉकरोच आंदोलन’ के हवाले से समझा जा सकता है। नौजवानों का एक व्यापक जनांदोलन होने के बावजूद इसकी दिलचस्पी राजनीतिक पार्टी बना कर सत्ता के लिए चुनाव में हिस्सा लेने में नहीं है। यह आंदोलन फ़िलहाल शिक्षा और उससे जुड़े सवालों पर ही अपना ध्यान केंद्रित किये हुए है। हाल के दिनों में चुनावों में वोट चोरी और मताधिकार पर हमलों के सवाल भी वे पुरज़ोर तरीक़े से उठा रहे हैं मगर ‘सत्ता परिवर्तन’ उसके केंद्र में नहीं है। बावजूद इसके इसने केंद्रीय सत्ता के लिए एक चुनौती खड़ी कर ही दी है। लिहाज़ा विश्लेषण की स्पष्टता के लिए इसे मैं राजनीति के खाने में नहीं डालता हूँ।
इन स्पष्टिकरणों के बाद अब हम राजनीति के अंत और ‘उत्तर-राजनीतिक’ अवस्था के विमर्श की अपनी चर्चा पर वापस लौट सकते हैं। आम तौर पर उत्तर-राजनीतिक अवस्था का सिद्धांतीकरण यूरोप व अमरीका के कई राजनीतिक सिद्धांतकारों ने किया था जिनका यह मानना था कि नवउदारवाद के दौर में राजनीति का अंत होने के फलस्वरूप अब दुनिया भर में राजनीति की पारी ख़त्म हो चुकी है और कमान अब अर्थव्यवस्था के हाथों में चली गयी है। ‘अर्थव्यवस्था’ और उसके पर्यायवाची – ‘बाज़ार’ – का मंत्र इस तरह जपा जाता था गोया वह कोई भगवान है जिसे हर हालत में ख़ुश कर के रखना ज़रूरी है। हमें बताया गया कि इस ‘बाज़ार’ के सामने सभी का नतमस्तक होना लाज़मी है क्योंकि इसकी शक्ति पर क़ाबू पाना किसी के बस की बात नहीं है। लिहाज़ा यही वह दौर है जब बड़ी तादाद में दुनिया भर में वामपंथी भी पूँजी की आराधना में मशगूल हो गए। ब्रिटेन के टोनी ब्लेयर के ‘न्यू लेबर’ से लेकर भारत के मार्क्सवादियों तक सब में पूँजी को आमंत्रित करने की होड़ लग गयी। भारत में तो तब तीन सूबों में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की सरकारें चला करती थीं। ख़ास तौर से बंगाल व केरल में तो कम्युनिस्टों ने पूँजी को आमंत्रित ही करना शुरू नहीं किया बल्कि, उसके लिए किसानों से ज़बरन भूमि अधिग्रहण करने से लेकर अमीरों की अय्याशी के लिए ‘विकास’ करने तक सब कुछ करना शुरू कर दिया। यहाँ तक कि उस दौर में ‘विकास’ की परिभाषा ही बदल दी गयी। ख़ुद को समाजवादी कहने वाले चीन जैसे देश भी विश्व-पूँजीवाद की व्यवस्था में फिट हो गए। भारत में भी इस दौर में तमाम सूबों की सरकारें, चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल की हों, आर्थिक नीति के स्तर पर एक जैसी दिखने लगीं।
दिलचस्प बात यह है कि हमारे देश में उस दौर को ‘उत्तर-राजनीतिक’ समय के रूप में चिन्हित नहीं किया गया। शायद उसकी एक बड़ी वजह यह थी कि वो वक़्त एक दूसरे धरातल पर बड़े उथल-पुथल का दौर भी था। एक तरफ़ बाबरी मस्जिद का विध्वंस और हिंदुत्व की राजनीति का उभार था तो दूसरी तरफ़ दलित बहुजन आंदोलन के आविर्भाव ने राजनीतिक मसलों को केंद्र में रख दिया था। मगर यह भी ग़ौरतलब है कि इन दोनों ही परिघटनाओं का एक बड़ा पहलू सामाजिक तंत्र के परिवर्तन से ज़्यादा था, सीधे राजसत्ता से उतना नहीं। अर्थात दीर्घमियादी अर्थ में सियासत ही उसके केंद्र में थी। एक तरह से उस दौर ने भारतीय राजनीति का व्याकरण ही हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। इसलिए उस वक़्त से राजनीतिक और बौद्धिक विमर्श पर वाम व आधुनिक शब्दावली की पकड़ भी कम होती चली गयी।
यूँ तो पश्चिम में भी शांताल मूफ़ व अर्नेस्तो लकलाउ जैसे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भी कथित ‘उत्तर-राजनीतिक’ अवस्था के सिद्धांत की सशक्त आलोचनायें रखी थीं, मोटे तौर पर वहां के सत्ता-पक्ष के बुद्धिजीवियों और व्यावहारिक राजनीति में इसी सूत्रीकरण का बोलबाला रहा।
हमारे देश में, बावजूद हिंदुत्व और दलित बहुजन उभार के, 1990 के बाद का वक़्त राजनीति की औपचारिक ज़मीन में ‘राजनीति के विनाश’ और वहां से उसके लोप का वक़्त था। एक तरफ़ नवउदारवाद के वर्चस्व और दबदबे के चलते न्याय/ अन्याय या बराबरी/ ग़ैर-बराबरी जैसे सवालों को नाजायज़ क़रार दिया गया। ऐसे विषय राज्य के स्तर पर अवैध घोषित कर ही दिए गए क्योंकि सारी समस्याओं का समाधान बाज़ार के सुपुर्द कर दिया गया था और ग़रीबी व भुखमरी, जन-स्वास्थ्य या शिक्षा के नीतिगत सवालों को भी दरकिनार कर दिया गया था क्योंकि इन सब में राज्य का हस्तक्षेप होना ज़रूरी होता। दूसरी तरफ़, उस दौर में बड़े पैमाने पर हुए मीडिया विस्तार, विशेषकर टेलीविज़न के विस्फोट के बावजूद जन-परिसर से भी इन विषयों पर चर्चा पर अनौपचारिक पाबन्दी लागू कर दी गयी। टेलीविज़न के विस्फोट के इस युग में सारी ‘राजनीति’ टेलिविज़न चैनलों में सिमट कर रह गयी जहाँ बहस-मुबाहिसे की जगह चीखने-चिल्लाने वाली नूरा कुश्तियों ने ले ली।
यह परिस्थिति लगभग 2006-2007 तक बदस्तूर चलती रही। इस वक़्त के क़रीब नए सामाजिक माध्यमों के आगमन से तस्वीर तेज़ी से बदलने लगी। इंटरनेट का आगमन तो पहले ही हो चुका था मगर पुराने इंटरनेट में सिर्फ एकतरफ़ा कंटेंट बना करता था। तक़रीबन 2005 से वेब 2.0 का प्रवेश होता है जो पुराने इंटरनेट की तरह अचल नहीं था। इसमें फेसबुक और ब्लॉगों के आलावा कुछ सालों बाद यूट्यूब का आविर्भाव शामिल है। 2006-2007 के बीच फेसबुक और ब्लॉगों की लोकप्रियता क़ाफ़ी बढ़ने लगी थी। अब जो आवाज़ें दबाई गयी थीं और जिनकी न तो औपचारिक राजनीतिक हलकों में, न औपचारिक मीडिया परिसर में कोई सुनवाई होती थी उन्हें अभिव्यक्ति के माध्यम मिलने लगे। यह सही है कि यहाँ भी शुरुआत में दक्षिणपंथी ताक़तों का ही दबदबा था, मगर बहुत जल्द ही अन्य आवाज़ें भी वहां सुनाई देने लगीं। मैं ख़ुद अपने व्यक्तिगत तजुर्बे से कह सकता हूँ कि 2006 में जब हमने कुछ अन्य मित्रों के साथ मिलकर क़ाफ़िला ब्लॉग की शुरुआत की तब शायद वाम रुझान रखने वाला एक ही और ब्लॉग वजूद में था। यह वही समय था जब पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार ने सिंगुर में नैनो कारखाना लगाने के लिए किसानों से ज़बरन ज़मीन कब्ज़े में ली और जिसका व्यापक विरोध हुआ। क़ाफ़िला के जन्म के बाद से ही हमें पहले सिंगुर और बाद में नन्दीग्राम में भूमि अधिग्रहण के ख़िलाफ़ किसानों के प्रतिरोध में उनके साथ खड़े होने का मौक़ा मिला। सिंगुर और नंदीग्राम की घटनाएं भले ही एक वाम मोर्चा सरकार के तत्त्वाधान में घटी हों मगर बुनियादी तौर पर थीं वे नवउदारवादी रणनीति का हिस्सा ही। उसका विरोध जहाँ रोज़ाना घट रहे घटनाक्रम में हस्तक्षेप के माध्यम से हुआ वहीँ उस प्रक्रिया में नवउदारवादी रणनीति और ख़ुद मार्क्सवादी सोच की कुछ मौलिक समस्याओं पर नए सिरे से बहस छेड़ने का आग़ाज़ हुआ। भूमि अधिग्रहण और पूंजीवादी विकास के सैद्धांतिक पक्षों पर भी बातचीत क़ाफ़िला के माध्यम से शुरू हो पाई। उसी दौर में पश्चिम बंगाल में छात्रों और नौजवानों ने किसानों पर हो रहे पुलिसी ज़ुल्म को बेपर्दा करने के लिए विडिओ बना कर उनके सीडी काट कर तमाम हॉस्टलों में उनका प्रदर्शन और उन पर चर्चायें शुरू कर दीं।
यह एक उदहारण मात्र है किस तरह उस ज़माने में जब राजनीति की औपचारिक ज़मीन और मीडिया परिसर में जब राजनीति का विनाश हो चुका था तब समाज के अन्य हल्क़ों में सियासत का विस्फोट होने लगा। क़िस्सा कोताह यह कि राजनीति की औपचारिक ज़मीन में जब जब राजनीति का विनाश होता है तब तब सियासत उसके दायरे के बाहर प्रकट होती है। और अमूमन वह एक जनांदोलन की शक्ल में सामने आती है।
बहरहाल, इस समय के बाद से लगातार इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों में उन तमाम मसलों पर बहसें और चर्चाएं तेज़ होने लगीं जिन पर बात करना उससे पहले संभव नहीं था। इस समय में ये सामाजिक माध्यम ही सियासत के आविर्भाव का ज़रिया बने। 2011 तक आते आते इन माध्यमों का अच्छा ख़ासा विस्तार दक्षिणी दुनिया में भी हो चुका था।
राजनीति की ज़मीन का धसाव – जनांदोलनों के आईने में
ऊपर की चर्चा से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि सियासत के प्रकट होने के लिए इंटरनेट व सामाजिक माध्यमों का होना ज़रूरी है। सियासत के आविर्भाव के लिए जो विमर्श तैयार होता है वह हर स्थिति में अपने संवाद का रास्ता ढूंढ़ निकालता है। फिर भी हमारी चर्चा में इंटरनेट व सामाजिक माध्यमों की ख़ासी महत्वपूर्ण भूमिका इसलिए है क्योंकि यहाँ हमारा सरोकार इक्कीसवीं सदी के जनांदोलनों से है। इन जनांदोलनों की एक विशेषता यह है कि उनके उभार के पीछे सामाजिक माध्यमों के ज़रिये बना व्यापक हॉरिजॉन्टल संवाद और उस संवाद के आधार पर वजूद में आये आभासी समुदाय केंद्रीय महत्व रखते हैं। इनकी एक और विशेषता यह भी है कि इस तरह के संवाद में न तो किसी तरह की दर्जाबन्दियाँ काम करती हैं और न ही वे अपने अपने वैचारिक ख़ानों में बंद रहते हैं। इसलिए इन संवादों के ज़रिये अलग अलग वैचारिक परम्पराओं से सम्बन्ध रखने वाले लोगों में भी लेनदेन मुमकिन हो जाता है। अक्सर ये संवाद एक देश तक सीमित नहीं रहते हैं क्योंकि, इंटरनेट के चरित्र के अनुरूप, जो किसी देश या राष्ट्र-राज्य की सीमाओं में बंध कर नहीं रहता है, ये संवाद भी दुनिया भर में फैल सकते हैं।
मिसाल के तौर पर, हाल के नेपाल के ‘जेन ज़ी’ के आंदोलन में वहां के राजनीतिक वर्ग के भाई-भतीजावाद के ख़िलाफ़ उभरे ग़ुस्से के सन्दर्भ में ‘नेपो-किड्स’ और आम तौर पर राजनीतिक हलकों में व्याप्त भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन में उठे नारे और इस्तेमाल हुए प्रतीक कुछ हफ़्तों पहले, अगस्त 2025 में, इंडोनेशिया के युवा विद्रोह में भी इस्तेमाल किये गए थे। दोनों देशों के विद्रोहों के पीछे फ़ौरी कारण बेशक़ अलग रहे हों मगर 1997 से 2012 के बीच जन्मे ‘जेन ज़ी’ के सामने एक अंधकार भविष्य के सिवाय कुछ नहीं था। विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक इस आयु के नौजवानों में इंडोनेशिया में 14 फ़ीसदी बेरोज़गार थे और नेपाल में 20 फ़ीसदी। बाज़ वक़्त उन्हें शिक्षित होने के बावजूद पश्चिमी एशिया के देशों में जाकर मज़दूरी करनी पड़ती है। ख़बरों के अनुसार इंडोनेशिया, फिलिपीन्ज़ व नेपाल के इन विद्रोहों में शामिल युवाओं का एक बहुत बड़ा हिस्सा वह है जिनके ख़ुद के माता पिता बाहर के देशों में मेहनत मज़दूरी करते रहें हैं। इन विद्रोहों में नेपाल के कुछ जानकर पत्रकारों ने यह भी बताया कि विद्रोह से पहले दोनों देशों की ‘जेन ज़ी’ के बीच अपने देशों के शासकों के विरुध्द और अपनी साझा समस्याओं के लेकर विचारों का आदान प्रदान चलता आ रहा था। यह बात सही हो या न हो, इससे तो इंकार नहीं किया जा सकता है कि एक साथ कई देशों में होने वाले विस्फोटों ने एक दूसरे के लिए प्रेरणा जुटाई।
हमारे समय के इन आंदोलनों से थोड़ा पीछे जाकर अगर हम इनकी जड़ों की पड़ताल करें तो पाएंगे कि कार्यतः 2011 वह साल था जब ऐसा ही एक ज्वार हमारे आसपास की दुनिया में और ख़ुद हमारे देश में आया था। उस साल हमारे देश में एक बड़ा जनांदोलन शुरू हुआ था जिसके प्रसार के पीछे भी नए सामाजिक माध्यमों की बड़ी भूमिका थी। यहाँ मैं बात कर रहा हूँ भ्रष्टाचार-विरोधी ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन की, जिसे ‘अन्ना हज़ारे आंदोलन’ के नाम से भी जाना जाता है। यह एक ग्लोबल लम्हा था जिस में आंदोलनों की शुरुआत 2010 के अंत में ट्यूनिशिया में हुई जिन्होंने अगले कुछ महीनों तमाम अरब देशों को अपनी गिरफ़्त में ले लिया था। पुलिसी अत्याचर के ख़िलाफ़ 17 दिसम्बर को ट्यूनिशिया के शहर सीदी बाउज़िद में मोहम्मद बोअज़ीज़ी के सार्वजानिक आत्मदाह से शुरू हुआ विद्रोह जब आग की तरह सारे देश में और फिर मिस्र तथा अन्य अरब देशों में फैला तो उसके पीछे एक सन्देश था। इस सन्देश की परतें खोलना और उसके निहितार्थ को समझना ज़रूरी है और उसकी एक प्राथमिक कोशिश मैं आज की चर्चा में करना चाहता हूँ। इस ‘अरब बसंत’ ने कई तानाशाह फ़ौजी शासकों को उखाड़ फेंका। जिन फ़ौजी हुक्मरान ने पिछले दशकों में राजनीतिक व्यवस्था और राजनीतिक पार्टियों को तबाह कर दिया था, उनके ख़िलाफ़ अचानक ऐसे व्यापक विद्रोह कैसे खड़े हो गए? यह एक सोचने का विषय है। इन तमाम आंदोलनों में कोई नेतृत्त्वकारी दल या संगठन नहीं था। कोईं पहचाना हुआ राजनीतिक चेहरा नहीं था। कोई झंडा नहीं, कोई रहनुमा नहीं। यही शायद उनकी सबसे बड़ी ताक़त भी थी क्योंकि सरकारों को इनका ज़रा भी अंदेशा नहीं था। चंद लोगों ने भले ही इस लम्हे के लिए तैयारी की हो, मगर आम तौर पर जो बड़ा जन सैलाब उनके साथ उमड़ कर शहरों के केंद्रों में हाज़िर हुआ वह स्वतःस्फूर्त ही था।
हमारे देश में भी 2011 का आंदोलन राजनीतिक हलकों के बाहर से आये लोगों ने ही आयोजित व संगठित किया। आंदोलन की कोर टीम में कोई भी राजनीतिक शख़्सियत नहीं थी हालाँकि ज़्यादातर चेहरे अपने अपने क्षेत्र में सामाजिक कार्यों के लिए जाने जाते थे। इन संगठकों में अरविन्द केजरीवाल ही मुख्य तौर पर सब को साथ लाने के लिए ज़िम्मेदार थे। पहले नवम्बर 2010 में उन्होंने एक कोशिश की थी तमाम धर्मों के अग्रणी नुमाइंदों को लेकर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक बड़ी जनसभा करने की जिससे कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला। फिर 30 जनवरी 2011 – यानि गाँधी हत्या के दिन – दिल्ली में एक बड़ा जुलूस व जनसभा की गयी जिसमें सामाजिक आंदोलनों के कई प्रतिनिधि शरीक हुए। इस सफल कार्यक्रम के बाद अगला पड़ाव था जब दिल्ली के जंतर मंतर पर अप्रैल के महीने में जनलोकपाल बिल की मांग को लेकर धरना शुरू हुआ। यहाँ भी पहले कुछ रोज़ मीडिया की निगाह इस आंदोलन पर नहीं गयी। मगर फिर चंद ही रोज़ में, इंडिया अगेंस्ट करप्शन का फेसबुक पेज बनते ही लाखों लोग उससे जुड़ते चले गए। यह एक निर्णायक मोड़ था जिसके बाद बड़े टेलीविज़न चैनलों की नज़र भी उस पर पड़ने लगी और आंदोलन एक नए चरण में पहुँच गया। इस क्रोनोलॉजी को यहाँ दोहराने का मक़सद यह है कि हम यह देख सकें कि किस तरह यहाँ भी एक समय के बाद सामाजिक माध्यमों के ज़रिये ही एक बहुत बड़ा हिस्सा आंदोलन के साथ जुड़ा। यहाँ भी स्थिति वही थी – ज़मीन जैसे पहले से ही तैयार थी और आग लगने और फैलने के लिए एक दियासलाई भर की ज़रुरत थी। इस आंदोलन को भी इसके बाद मिलने वाला समर्थन स्वतःस्फूर्त था।
इसी दौर में क़ाफ़ी हद तक मिस्र के तहरीर स्क्वेयर के आंदोलन की प्रेरणा से अमरीका में ‘ऑक्युपाइ वॉल स्ट्रीट’ और यूरोप के कई देशों में नवउदारवाद के असरात के ख़िलाफ़ बड़े आंदोलन शुरू हुए। यूरोप के आंदोलनों में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं स्पेन और ग्रीस के बड़े आंदोलन।
इन सब आंदोलनों की तफ़्सील में जाए बग़ैर यहाँ इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अलग अलग सन्दर्भ और अलग अलग स्थितियों के बावजूद इन तमाम आंदोलनों में दो बातें समान थीं। पहला, इन सभी आंदोलनों का ग़ुस्सा ‘भ्रष्टाचार’ के ख़िलाफ़ था और दूसरा, उनके निशाने पर थीं राजनीतिक पार्टियां और ख़ुद ‘राजनीति’। इनमें से कई आंदोलनों में तो पार्टियों का शामिल होना ही वर्जित था। पारंपरिक राजनीतिक दलों से इनमें एक क़िस्म का मोहभंग देखने को मिलता है। इससे पहले के आंदोलन किसी ख़ास निज़ाम या शासक दल के ख़िलाफ़ तो होते थे मगर उनमें कभी तमाम राजनीतिक पार्टियों के ख़िलाफ़ एक साथ इस तरह का ग़ुस्सा देखने को नहीं मिलता था। इन आंदोलनों की ख़ासियत यह भी थी कि उनका ग़ुस्सा पार्टियों से आगे जाकर ख़ुद ‘राजनीति’ के ख़िलाफ़ केंद्रित था।
‘भ्रष्टाचार’ का सवाल जिस नियमितता के साथ इन तमाम जन उभारों में उठता रहा उस पर थोड़ा ठहर कर ग़ौर करने की ज़रुरत है। इतिहास खंगाल के देखें तो पाएंगे कि दुनिया भर में यह शद्ब एक शॉर्टहैंड की तरह काम करता रहा है जहाँ वह शासकों की आलोचना का एक ऐसा पद बनता है जो हर तबक़े के लिए मानीख़ेज़ हो जाता है। यूँ तो अलग अलग सामाजिक समूहों की निज़ाम से अपनी शिकायतें होती हैं (या हो सकती हैं) मगर ‘भ्रष्टाचार’ एक ऐसा पद है जिसमें कई प्रकार की दीग़र शिकायतें सिमट कर हाज़िर होती हैं। इसमें आम लोगों को रोज़ाना परेशान करने वाले भ्रष्टाचार से लेकर उस बड़े भ्रष्टाचार तक सब शामिल है जिसके चलते शासक दल बड़े पूंजीपतियों की ताबेदारी करते दिखाई देते हैं जिसकी वजह से ग़रीब आम जन के जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ता है। वैसे 2011 के अन्ना हज़ारे आंदोलन में तो ‘भ्रष्टाचार’ का सवाल सिर्फ़ उस वक़्त के शासक वर्ग के कारनामों को रेखांकित करने के लिए नहीं उठाया गया था बल्कि उसका उद्देश्य 1968 में ख़ुद भारत सरकार की प्रशासनिक सुधार समिति द्वारा लोकपाल नमक संस्था बनाने की तजवीज़ को केंद्र में लाते हुए एक दीर्घकालिक समस्या की ओर इंगित करना भी था। यह अपने आप में एक हैरत में डालने वाला तथ्य था कि 43 साल पहले ख़ुद सरकार द्वारा चिन्हित समस्या और उसके समाधान के लिए की गयी सिफ़ारिश पर इतना समय ग़ुज़र जाने के बाद भी कोई क़दम नहीं उठाये गए थे। ज़ाहिर है कि ऐसा इसीलिए संभव हो पाया क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल इसे आगे ले जाना नहीं चाहता था। लिहाज़ा उस आंदोलन का निशाना समूची राजनीतिक व्यवस्था पर था।
हाल की दहाइयों में ‘पॉपुलिज़्म’ पर होने वाले काम ने, ख़ासकर अर्नेस्तो लकलाउ के काम ने इस ओर ध्यान खींचा है कि ‘पॉपुलिज़्म’ महज़ ‘लोकलुभावनवाद’ या ‘लोकप्रियतावाद’ नहीं है जिसमें नेता अपनी जनता को लुभाता या बरगलाता है। बल्कि पॉपुलिज़्म जनतंत्र का वह ‘अतिरेक’ है जो लिबरल जनतंत्र की संस्थाओं और नियमों के दायरे में क़ैद नहीं रह पाता है और इसलिए बार बार छिटक कर बाहर आ जाता है। ताक़तवर तबके जब जनतांत्रिक पद्धतियों और संस्थाओं को खोखला कर के उनका विनाश करते हैं तो उसे भी ‘भ्रष्टाचार’ का नाम दिया जा सकता है क्योंकि उसमें सत्ता का दुरुपयोग शामिल है। सत्ता से महरूम लोग जब इसके ख़िलाफ़ बग़ावत करते हैं तो इसे हम ‘पॉपुलिज़्म’ कह सकते हैं। चूँकि मैंने अपने काम में लकलाउ की पॉपुलिज़्म की अवधारणा को क़ाफ़ी उपयोगी और सटीक पाया है इसलिए मैं पॉपुलिज़्म के लिए ‘लोकलुभावनवाद’ आदि शब्दों के बजाय ‘जनवाद’ शब्द का प्रयोग करता हूँ। जनवाद और (लिबरल) जनतंत्र के रिश्ते को इस तरह देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इन दोनों का रिश्ता शत्रुतापूर्ण हो यह क़तई ज़रूरी नहीं है मगर यह इस तरफ़ भी इशारा करता है कि ‘भ्रष्टाचार’ को क़ायम रख कर जनवाद नाम के अतिरेक के बार बार विस्फोट को रोक पाना संभव नहीं है।
लकलाउ जनवाद के अपने अध्ययन में दिखाते हैं कि किस तरह दुनिया भर में ‘भ्रष्टाचार’ का पद एक ‘मासूम’ व शोषित जनता के बरअक्स एक ‘भ्रष्ट राजनीतिक एलीट’ में फ़र्क़ करने के लिए इस्तेमाल होता है, जिसके माध्यम से जनवाद समाज की समूची राजनीतिक स्पेस को इन दो खेमों में बाँट देता : एक तरफ़ मासूम शोषित जनता और दूसरी तरफ़ भ्रष्ट राजनीतिक गुट जो सत्ता पर क़ाबिज़ है। लकलाउ तथा जनवाद पर काम करने वाले अन्य शोधकर्ता यह भी बताते हैं कि जनवादी नेता हमेशा औपचारिक राजनीतिक दुनिया के बाहर से ‘राजनीति’ में, उसको चुनौती देते हुए, दाखिल होता है। उसकी यह ख़ासियत ही उसकी विश्वसनीयता बढ़ाती है।
बहरहाल, यह भो ग़ौर करने लायक़ है कि हाल के आंदोलनों में हम जनवाद के बनिस्बत एक बड़ा फ़र्क़ भी देख सकते हैं। इनमें अमूमन कोई एक नेता नहीं दिखाई देता है – बल्कि एक मायने में ये ‘नेतृत्व-विहीन’ भी होते हैं। इनका यह चरित्र जुड़ता है हमारे दूसरे सवाल के साथ – यानि राजनीतिक पार्टी या एकक नेता के सवाल के साथ। हमने पहले ही देखा है कि इस दौर के आंदोलनों में राजनीतिक पार्टी मात्र को ख़ारिज करने की या उसे गहरे शक़ की निगाह से देखने की प्रवृत्ति साफ़ दिखाई देती है। ज़ाहिर है, इस मामले में अन्ना हज़ारे आंदोलन फिर थोड़ा अलग था क्योंकि राजनीतिक पार्टियों को ख़ारिज करने के बावजूद उस में पहले अन्ना हज़ारे का चेहरा केंद्र में था। बाद में, आम आदमी पार्टी बनने के समय से अरविन्द केजरीवाल का चेहरा उसके एकक नेता के रूप में सामने आया – मगर यह हमारी आज की चर्चा का विषय नहीं हैं क्योंकि उसके बाद वह आंदोलन न रह कर पार्टी में तब्दील हो गया।
मगर उसके बाद मार्च 2022 में श्री लंका और फिर 2024 में बांग्लादेश में जो बड़े जनांदोलन उभर कर सामने आये उनमें भी हमें तक़रीबन यही बात देखने को मिलती है। हालाँकि हर आंदोलन और जगह की अपनी अपनी विशिष्टिताएं थीं, यह तो स्पष्ट था कि इन सभी में राजनीतिक दलों से कम से कम परहेज़ और अक्सर तिरस्कार देखने को मिलता है। श्रीलंका का ‘अरगलया’ (संघर्ष) पर हुए एक अध्ययन से पता चलता है कि कई महीनों एकदम शांतिपूर्ण तरीके से चलने वाले इस आंदोलन में शरीक लोगों में राजनीतिक पार्टियों द्वारा उसमें शामिल होकर हड़पने की कोशिशें भी दिखाई दीं। बांग्लादेश में मूलतः शेख़ हसीना की शासक पार्टी आवामी लीग द्वारा नौकरियों में ‘मुक्ति योद्धाओं’ के नाती-पोतों के लिए आरक्षण के ख़िलाफ़ छात्रों का जो आंदोलन शुरू हुआ व बहुत जल्द ही एक जन उभार में तब्दील हो गया। हालाँकि इसके निशाने पर सभी दल नहीं थे मगर आम तौर पर इसे पार्टी-परिवर्तन के आंदोलन से आगे शासन के ढांचे में परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा था क्योंकि आंदोलनकारियों का एक बड़ा हिस्सा यह महसूस कर रहा था कि वर्त्तमान व्यवस्था में जनता दो दलों के बीच एक पाले से दूसरे पाले में उछाली जाने की लिए अभिशप्त है। ज़ाहिर है यह चिंता राजनीतिक व्यवस्था के भीतर से नहीं आ सकती थी।
ग़ौर से देखने पर यह साफ़ हो जाता है कि इन तमाम जन उभारों के पीछे अवाम की आर्थिक बदहाली, बेरोज़गारी और उसकी बढ़ती सत्ता-विहीनता का अहसास काम कर रहा था। और इसके लिए सिर्फ़ एक शासक दल को ही नहीं बल्कि तमाम दलों को और राजनीतिक व्यवस्था को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा था। नेपाल में तो ‘जेन ज़ी’ का आंदोलन खुले रूप से पूरे राजनीतिक वर्ग के ख़िलाफ़ था। इसीलिए हमारे देश में हाल के दिनों में कॉकरोच आंदोलन भी आम छात्रों और नौजवानों में व्याप्त बेरोज़गारी और उनके सामने मुंह बाये खड़े अंधकारमय भविष्य की संभावनाओं के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा इतनी तेज़ी से सामने आया।
यह दूसरा ऐसा मसला है जिस पर हमें कुछ देर ठहर कर सोचना चाहिए। आज दुनिया भर में आम लोगों में इस सत्ता-विहीनता के अहसास का अर्थ क्या है? इससे पहले हम जिस उत्तर-राजनीतिक अवस्था की बात कर रहे थे उस में राजनीति का विनाश ‘ऊपर से’ शुरू हुआ – यानि नवउदारवाद के कारण। उसका ताल्लुक़ एक ख़ास अवस्था से था। मगर इस दौर के जनांदोलनों में ‘नीचे से’ राजनीति के तिरस्कार की जो तस्वीर उभरती है वह ग़ौरतलब है। इसका एक पहलू उस ऊपर से हुए राजनीति के विनाश से ज़रूर जुड़ा है मगर यहाँ एक दूसरा, दीर्घकालिक पहलू भी देखने को मिलता है। शायद यह कहना बेहतर होगा कि नवउदारवाद ने जो स्थितियां पैदा कीं उनकी वजह से अवाम की सत्ता-विहीनता का एक दीर्घकालिक आयाम भी पुरज़ोर ढंग से सामने आ गया है। तमाम राजनीतिक दलों के प्रति गहरा संदेह एक लम्बे समय से जनमानस में घर कर रहा था जिसकी झलक अक्सर ‘सब चोर हैं’ जैसी लोकोक्तियों में सुनने/ देखने को मिलती है। इस लम्हे की ख़ासियत यह है कि यह एक वैश्विक परिघटना है।
आज सारी दुनिया में नव दक्षिणपंथी दलों के आविर्भाव में भी पारंपरिक राजनीति से विमुखता का एक बड़ा योगदान रहा है हालाँकि उस के पीछे और भी कई पेचीदा कारण हैं। यहाँ मैं इस का उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि इन तमाम दलों के बढ़े जन-समर्थन के पीछे पारंपरिक राजनीति के ख़िलाफ़ इनके नेताओं की तीखी लफ़्फ़ाज़ी भी रही है, बेशक़ उस जन-समर्थन का उपयोग इन दलों ने अरबपतियों की सेवा करने के लिए ही की हो।
मगर इनके उभार के सन्दर्भ में एक बात और ग़ौरतलब है। फ़ासीवादी क़िस्म की इस दक्षिणपंथी राजनीति की बुनियाद लिबरल जनतंत्र में उन्नीसवीं सदी के आखिर के क़रीब पड़ गयी थी। जर्मन दार्शनिक युर्गेन हेबरमास ने जन परिसर के अपने अध्ययन में दिखाया था की दरअसल 1870 के आख़िरी सालों में दो घटनाएं ऐसे घटीं जिनकी वजह से यूरोप में राजनीति का स्वरूप ही बदल गया। पहली घटना ‘मास’ राजनीतिक दलों का उदय थी और दूसरी मास मीडिया का आविर्भाव। बकौल हेबरमास इससे पहले जहाँ नुमाइंदा स्थानीय आबादी द्वारा चुना जाता था और वह उनकी ही नुमाइंदगी करता था, वहीँ इन दलों के वजूद में आने के बाद नुमाइंदगी का स्वरुप ही बदल गया। नुमाइंदे अब अपनी पार्टी के प्रति जवाबदेह हो गए थे। यह बात हेबरमास से भी बहुत पहले भारतीय मार्क्सवादी और बाद में रैडिकल मानवतावाद व रैडिकल जनतंत्र के सिद्धांतकार मानवेंद्रनाथ राय लगातार अपनी रचनाओं में 1940 के दशक में पुरज़ोर ढंग से उठा रहे थे। दरअसल राय के रैडिकल जनतंत्र का तसव्वुर एक पार्टी-विहीन जनतंत्र का तसव्वुर था। उनका मानना था कि जब तक राजनीति का कारोबार पार्टियाँ चलाएंगी तब तक हर नुमाइंदा अपने चुनने वालों की नहीं बल्कि पार्टी की नुमाइंदगी ही करेगा। दूसरी बात जो हेबरमास उठाते हैं वह है मास मीडिया का सवाल। उनका यह दावा था कि मास मीडिया के आविर्भाव के साथ, पार्टी नाम की शै से उसका जो रिश्ता बना उसने एक अभूतपूर्व और ख़तरनाक़ स्थिति को जन्म दिया। इन दोनों के मिलन से पैदा होता है वह ज़हर जिसे हम ‘प्रोपेगैंडा’ नाम से जानते हैं। प्रोपेगैंडा का एक पूरा का पूरा तामझाम खड़ा हो जाता है। वस्तुतः यूरोप में इसका परिणाम 1879 के आसपास राजनीति में ‘एंटी-सेमिटिज़म’ के आविर्भाव के साथ देखने को मिलता है, ऐसा हेबरमास का दावा है। यहूदी-विरोध की यूँ तो यूरोप में लम्बी परंपरा रही है मगर उसका संगठित राजनीतिक रूप इस वक़्त ही उभर कर आता है। और यही यहूदी-विद्वेष, जैसा कि हम जानते हैं, कुछ दशकों बाद नात्सीवाद की शक्ल में परवान चढ़ता है जब लाखों लाखों लाख यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया जाता है।
यह राजनीति के उसी तरीक़े का नतीजा था जहाँ राजनीतिक पार्टी, मास मीडिया और उनके मेल से बना प्रोपेगंडा-तंत्र पूरी तरह से जनजीवन को अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। इस विषय पर अभी और बहुत गंभीरता से सोचा जाना बाक़ी है। फ़िलहाल, इतना भर ध्यान रखें कि यह तजुर्बा यूरोप का था और वहां पैदा हुए राजनीति के इस रूप (और व्यवस्था) को उसके बाद दुनिया भर में खुद को जनतांत्रिक कहने वाले तमाम देशों में अपना लिया गया – उस दौर में जब आम जनता की सत्ता-विहीनता साफ़ साफ़ दिखाई देने लगी थी।
मगर उपनिवेशित देशों में तो सत्ता-विहीनता का तजुर्बा एक अलग ही स्तर का था।
हमारे आज के दौर में नात्सीवाद जैसी ख़ौफ़नाक़ परिघटना का एक भौंडा असर हम इजराइल नाम के ज़िओनवादी राज्य की कारस्तानियों में देख पाते हैं। अक्तूबर 2023 से लगातार ग़ज़ा में चल रहे जनसंहार का क़िस्सा 2023 में नहीं बल्कि 1917 में शुरू होता है जब ब्रिटेन फ़िलस्तीन की ज़मीन ज़िओनवादियों को सौग़ात में दे देता है। जो ज़मीन उसकी थी ही नहीं मगर जिसपर उसका अनधिकृत साम्राज्यवादी क़ब्ज़ा था, उसे ज़िओनवादियों को देने के पीछे एक ही मंशा थी – यूरोप में बढ़ रहे यहूदी-विद्वेष से निजात पाने के लिये यहूदियों को अपने देशों से बाहर एशिया में भेज दिया जाए। ऐसा करने के लिए फ़िलस्तीन की स्थानीय आबादी को बेघर कर के वहां इजराइल का उपनिवेश स्थापित किया गया। इस कड़वे सच को छुपाने के लिए दिया गया कोई भी कुतर्क इस पर पर्दा नहीं डाल सकता है।
ग़ज़ा और फ़िलस्तीन तो वो खिड़की भर हैं जिसके ज़रिये हम उपनिवेशों के दबा दिए गए इतिहास का नज़ारा कर सकते हैं। उत्तरी व दक्षिणी अमरीकाओं और अफ़्रीका समेत दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में बड़े पैमाने पर जनसंहारों के ज़रिये स्थानीय आदिवासी आबादियों का सफ़ाया कर दिया गया, अफ़्रीका से लाखों लाख लोगों को ग़ुलाम बना कर अमरीका और यूरोप लाया गया और तथाकथित ‘नई आधुनिक सभ्यता’ की नींव इन देशों में डाली गयी।
आज ग़ज़ा के जनसंहार के ख़िलाफ़ और इस्राएल के विरुद्ध सारी दुनिया में उठ रहे आंदोलन अपने अपने देशों में जिस बेरहमी से दबाये जा रहे हैं – ख़ासकर अमरीका और यूरोप में, और ख़ुद हमारे जैसे देशों में – उससे सब जगह सरकारों और अवाम के बीच गहरी खाई साफ़ दिखाई देने लगी है। और इसीलिए अक्तूबर 2026 में इसके ख़िलाफ़ खुली बग़ावत आज यूरोप भर में दिखाई दे रही है।
अपनी बात ख़त्म करते हुए यहाँ मैं इतना भर कहना चाहता हूँ कि यूरोप और अमरीका में साधारण लोगों की सत्ता-विहीनता और उत्तर-औपनिवेशिक व दक्षिण गोलार्ध के देशों का उपरोक्त तजुर्बा – दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज वैश्विक स्तर पर इन आंदोलनों के माधयम से एक सचाई हमारे सामने उजागर हो रही है – राजनीति के पुराने रूप अब मरणासन्न हैं और नए की पुरज़ोर तलाश जारी है। अभी नए का जन्म नहीं हुआ है मगर शायद वह एक अलग तरह का जनतंत्र होगा जहाँ निर्वाचक ही निर्णायक होगा और जहाँ नुमाइंदा अपने निर्वाचकों के प्रति ही ज़िम्मेदार होगा।