25 सितम्बर को बीकानेर प्रौढ़ शिक्षण समिति में डॉ छगन मोहता स्मृति व्याख्यान का यह परिवर्धित व संशोधित रूप यहाँ पेश है। दुनिया भर में जनांदोलनों के ताज़ा विस्फ़ोट के दौर में इसे इस उम्मीद से भी साझा कर रहे हैं कि पाठकों से भी शायद कुछ फ़ीडबैक मिले।
पिछली सदी में अस्सी की दहाई के आख़िरी बरसों में उस वक़्त के समाजवादी देशों में हमने जनांदोलनों का ऐसा ज्वार देखा था जिसके फलस्वरूप समूचे पूर्वी यूरोप और सोवियत संघ में राज्य-निर्भर समाजवाद का क़िला चरमरा कर ढह गया था। इस में कोई शक़ नहीं कि राज्य-समाजवाद की बनावट में कई ख़ामियाँ थीं मगर उन जन उभारों को उस ज़माने में पश्चिम के राजनीतिक सिद्धांतकारों ने जिस तरह पढ़ा वह ग़ौरतलब है। अमरीका के दक्षिणपंथी रैंड कॉर्पोरेशन के बुद्धिजीवी फ्रांसिस फुकुयामा ने तो समाजवाद के पतन के बाद की दुनिया में ‘इतिहास के अंत’ का ऐलान तक कर दिया था। ज़ाहिर है ‘इतिहास का अंत’ जैसे पदों का हमारे नज़दीक़ कोई मानी नहीं होता क्योंकि हमारे यहाँ तो काल अनादि-अनंत है, उसे शाश्वत के रूप में देखा जाता है। फुकुयामा का यह उद्घोष हेगेल के दर्शन से आता है, खुद जिसकी बुनियाद ईसाइयत के काल-तसव्वुर से आती है जहाँ आदम और हव्वा के जन्नत से निकाले जाने से ‘इतिहासगत’ या ऐतिहासिक काल की शुरुआत होती है।
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