
हिंदुत्व वर्चस्ववाद के तहत मॉब लिंचिंग के एक दशक का दस्तावेज़ीकरण करती किताब जो घटनाओं को एक परिप्रेक्ष्य में भी रखती है
भीड़ द्वारा हत्या – यह शब्द संयुक्त राज्य अमेरिका के इतिहास के एक अंधकारमय दौर की तस्वीरें मन में उभारता है।
अब यह इतिहास का हिस्सा है कि 1877 और 1950 के बीच, श्वेत वर्चस्ववादी गिरोहों ने 4,000 अफ्रीकी अमेरिकियों की हत्या कर दी, जबकि सरकार और पुलिस ने दूसरी ओर देखना जारी रखा।
किसी को भी यह पूर्वाभास नहीं था कि संयुक्त राज्य अमेरिका, जो स्वयं को ‘सबसे मज़बूत’ लोकतंत्र के रूप में अपने आप को प्रस्तुत करता है, द्वारा भीड़ के हाथों हत्या की अपनी बर्बर प्रथा को अंततः छोड़ दिए जाने के लगभग आठ दशक बाद, ‘सबसे बड़े’ लोकतंत्र – भारत – में इस खूनी प्रथा की फिर से वापसी होगी।
इस प्रकार की खुद इंसाफ का दावा करनेवाली हिंसा के पीड़ितों के बारे में कोई आधिकारिक आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
सरकार ने आज तक ऐसे किसी भी रेकॉर्ड को तैयार करने से इनकार किया है, न ही ऐसे मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के तहत फैसलों में तेज़ी लाने के लिए कुछ विशेष अदालतों के अंतर्गत अलग कानून बनाने का विचार उसके विचार-विमर्श में सामने आया है। कथित तौर पर इसका आधार यह भ्रामक दलील है कि हिंसा के एक रूप के तौर पर भीड़ द्वारा हत्या को भारतीय दंड संहिता में शामिल नहीं किया गया है और यह सब उन स्पष्ट आँकड़ों के बावजूद है जो दिखाते हैं कि धार्मिक अल्पसंख्यकों, समाज के सामाजिक रूप से हाशिए पर पड़े वर्गों और महिलाओं को लक्षित कर की गयी घृणा-हत्याओं में 21वीं सदी के दूसरे दशक में अचानक उछाल आया है, जिसका संबंध भारत की राजनीति और समाज में बहुसंख्यकवादी ताकतों के उदय से है।
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भीड़ द्वारा हत्याएँ: राज्य और अपराधियों के बीच सिम्फनी – II https://janchowk.com/mob-killings-a-symphony-between-the-state-and-criminals-ii/;
भीड़ द्वारा हत्या : भारत के रूपांतरण की पड़ताल-III https://janchowk.com/mob-lynching-an-examination-of-indias-transformationiii/]