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तार्किकता, भावुकता और फासिज्म

 28 फरवरी को याद करने पर अब कहा जाने लगा है कि यह नकारात्मक स्मृति है और इंसानी फितरत के मुताबिक़ हमें आगे बढ़ना  चाहिए. हिन्दुओं को, खासकर गुजराती हिन्दुओं, यह नागवार गुजरता है कि उन्हें  बार-बार 28 फरवरी , 2002 की याद दिलाई जाए. आखिर गुजरात में 2002 के बाद पूरा अमन है और वह विकास के मार्ग पर एक दृढसंकल्प मुख्यमंत्री के नेतृत्व में संकल्पपूर्वक बढ़ा जा रहा है और वहां के मुसलमान भी अब कुछ और बात करना चाहते हैं.

दरअसल भुलाने और आगे बढ़ जाने की शुरुआत 2002 में ही हो गई थी. 28 फ़रवरी से राज्य-संरक्षण में शुरू हुए मुसलमानों के कत्लेआम ने भारत के उद्योगपतियों के एक हिस्से को भी झकझोर दिया था. लेकिन कुछ समय बाद ही पूंजीवाद के तर्क ने मानवीयता की कमजोरी पर विजय पा ली और उन्होने नाराज़ मुख्यमंत्री से क्षमायाचना करके गुजरात की प्रगति में उन्हें हिस्सा लेने की इजाजत माँग ली  थी. सार्वजनिक रूप से उन्हें गांधी और पटेल से तुलनीय बताया जाना अब अटपटा भी नहीं लगता, बल्कि उलट कर कहा जा सकता है कि गांधी और पटेल में  ऐसे कई गुण नहीं थे जो गुजरात के ह्रदय-सम्राट में पाए जाते हैं , इसलिए यह तुलना वस्तुतः इन दोनों के प्रति पक्षपात है. पूंजीवाद के मूल अंतर्राष्ट्रीय चरित्र ने अंततः युरोपियन यूनियन को अपनी मानवीय हिचक को किनारे करके गुजराती यथार्थ को कबूल करते हुए कारोबारी नज़रिया अपनाने को प्रेरित किया. यह संभव नहीं था कि आर्थिक निवेश के ठोस आकर्षक आमंत्रण को   न्याय के अमूर्त आग्रह  के चलते ठुकरा दिया जाए. Continue reading तार्किकता, भावुकता और फासिज्म