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Dear Hitler

Why does Hitler’s legacy in India greatly differs from that in the West. More removed from the traumas associated with World War II and the Holocaust  

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..An innocent question sometimes comes up with very troubling answer(s).

J’admire ( I admire)… a simple exercise given to students to know from them whom they appreciate as a great historical figure or a hero, became a great learning experience for a teacher who taught French at a private school.

Writer and Journalist Dileep D’souza, who has authored many books, and writes on social-political causes shared the experience of his wife who posed the said question before them during a discussion. What she was expecting that they would mention Gandhi or Bhagat Singh or other luminaries of India’s struggle for freedom and progress but none of her predictions came true. There was a lone student whose choice was Mahatma Gandhi but nine out of 25 students in her class admired Hitler as hero or as a great historical figure. Continue reading Dear Hitler

Fascinating Manu

It is easy to see the linkages between Manu, Nietzsche, Hitler and the worldview of Hindutva supremacism

RSS and Fascism

Manu and his ‘magnum opus’ Manusmriti keeps hogging headlines in the 21st century as well.

Thanks to the fascination it still holds among the Hindutva supremacists of various kinds even around seventy years after the promulgation of Constitution, which in the words of Dr Ambedkar, had “ended the rule by Manu”.

The latest to join the ‘mission glorification’ of Manusmritihappens to be another stalwart from the Hindutva brigade, called Sambhaji Bhide, the leader of Shivpratishthan Sangathan, who also happens to be an accused in the Bhima Koregaon case. Addressing his followers known as dharkaris (believers of violence) – as opposed to varkaris(who go to Pandharpur from Pune on foot), he exhorted them to disseminate Hindu religion and form Hindu Nation. He also added how ‘Manusmriti was superior to the teachings of saints Dnyaneshwar and Tukaram’. 

( Read the full article here : https://newsclick.in/fascinating-manu)

सामूहिक अपराध और जवाबदेही

मुज्ज़फरनगर की सांप्रदायिक हिंसा की जिम्मेदारी तय करने का मसला पेचीदा होता जा रहा है.क़त्ल हुए हैं,बलात्कार की रिपोर्ट है, घर लूटे और बर्बाद किए गए हैं.हजारों मुसलमान अपने घरों और गावों से बेदखल कर दिए गए हैं.यह सब कुछ अपने आप तो नहीं हुआ होगा.किसी भी अपराध के मामले में इंसाफ की प्रक्रिया की शुरुआत अभियुक्तों की पहचान और उनकी नामजदगी से होती है.मुज्ज़फरनगर के हिंदू ग्रामीणों को इस पर ऐतराज है.उनका दावा है कि शिकायतें, जो मुस्लिम उत्पीड़ितों ने दर्ज कराई हैं और जिनके आधार पर अभियुक्तों को चिह्नित किया गया है,गलत हैं.वे और उनके लोग निर्दोष हैं और इसलिए पुलिस को धर पकड़ की अपनी कार्रवाई से बाज आना चाहिए.

अभियुक्तों को गिरफ्तार करने गई पुलिस पर हमले किए जा रहे हैं और पकड़े गए लोगों को छुड़ा लिया जा रहा है.हथियारों के साथ औरतें सड़क पर हैं,कहते हुए कि वे अपने बच्चों और मर्दों के साथ नाइंसाफी नहीं होने देंगी.किसी तुलना के लिए नहीं,लेकिन ऐसे सामूहिक प्रतिरोध के बारे में राय कायम करने एक लिए क्या हम किसी दहशतगर्द हमले में शक की बिना पर किसी मुस्लिम बस्ती में की जा गिरफ्तारी के इसी तरह के सामूहिक विरोध की कल्पना कर सकते हैं?उस समय हम उसे उस समूह की  अविचारित सामूहिक प्रतिक्रिया ही मानेंगे. Continue reading सामूहिक अपराध और जवाबदेही

The BJP’s very own Stalin

Yashwant  Sinha is a worried man these days. He is apprehensive of his leader Narendra Modi being taken for a ride by the Congress party. He says that the Congress party is laying a trap for him, a trap of the binary of Communalism and Secularism and  fears that his upward looking Narendra Modi might fall in it. So, well  wisher that he is of Narendra Bhai, he wants to alert him: do not get  entangled in the conspiracy of the wily Congress. He appeals to Narendra Modi to stick to people’s issues and not let the political discourse  shift to the terrain of the Secularism  versus Communalism debate. Continue reading The BJP’s very own Stalin

तार्किकता, भावुकता और फासिज्म

 28 फरवरी को याद करने पर अब कहा जाने लगा है कि यह नकारात्मक स्मृति है और इंसानी फितरत के मुताबिक़ हमें आगे बढ़ना  चाहिए. हिन्दुओं को, खासकर गुजराती हिन्दुओं, यह नागवार गुजरता है कि उन्हें  बार-बार 28 फरवरी , 2002 की याद दिलाई जाए. आखिर गुजरात में 2002 के बाद पूरा अमन है और वह विकास के मार्ग पर एक दृढसंकल्प मुख्यमंत्री के नेतृत्व में संकल्पपूर्वक बढ़ा जा रहा है और वहां के मुसलमान भी अब कुछ और बात करना चाहते हैं.

दरअसल भुलाने और आगे बढ़ जाने की शुरुआत 2002 में ही हो गई थी. 28 फ़रवरी से राज्य-संरक्षण में शुरू हुए मुसलमानों के कत्लेआम ने भारत के उद्योगपतियों के एक हिस्से को भी झकझोर दिया था. लेकिन कुछ समय बाद ही पूंजीवाद के तर्क ने मानवीयता की कमजोरी पर विजय पा ली और उन्होने नाराज़ मुख्यमंत्री से क्षमायाचना करके गुजरात की प्रगति में उन्हें हिस्सा लेने की इजाजत माँग ली  थी. सार्वजनिक रूप से उन्हें गांधी और पटेल से तुलनीय बताया जाना अब अटपटा भी नहीं लगता, बल्कि उलट कर कहा जा सकता है कि गांधी और पटेल में  ऐसे कई गुण नहीं थे जो गुजरात के ह्रदय-सम्राट में पाए जाते हैं , इसलिए यह तुलना वस्तुतः इन दोनों के प्रति पक्षपात है. पूंजीवाद के मूल अंतर्राष्ट्रीय चरित्र ने अंततः युरोपियन यूनियन को अपनी मानवीय हिचक को किनारे करके गुजराती यथार्थ को कबूल करते हुए कारोबारी नज़रिया अपनाने को प्रेरित किया. यह संभव नहीं था कि आर्थिक निवेश के ठोस आकर्षक आमंत्रण को   न्याय के अमूर्त आग्रह  के चलते ठुकरा दिया जाए. Continue reading तार्किकता, भावुकता और फासिज्म