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The BJP’s very own Stalin

Yashwant  Sinha is a worried man these days. He is apprehensive of his leader Narendra Modi being taken for a ride by the Congress party. He says that the Congress party is laying a trap for him, a trap of the binary of Communalism and Secularism and  fears that his upward looking Narendra Modi might fall in it. So, well  wisher that he is of Narendra Bhai, he wants to alert him: do not get  entangled in the conspiracy of the wily Congress. He appeals to Narendra Modi to stick to people’s issues and not let the political discourse  shift to the terrain of the Secularism  versus Communalism debate. Continue reading The BJP’s very own Stalin

तार्किकता, भावुकता और फासिज्म

 28 फरवरी को याद करने पर अब कहा जाने लगा है कि यह नकारात्मक स्मृति है और इंसानी फितरत के मुताबिक़ हमें आगे बढ़ना  चाहिए. हिन्दुओं को, खासकर गुजराती हिन्दुओं, यह नागवार गुजरता है कि उन्हें  बार-बार 28 फरवरी , 2002 की याद दिलाई जाए. आखिर गुजरात में 2002 के बाद पूरा अमन है और वह विकास के मार्ग पर एक दृढसंकल्प मुख्यमंत्री के नेतृत्व में संकल्पपूर्वक बढ़ा जा रहा है और वहां के मुसलमान भी अब कुछ और बात करना चाहते हैं.

दरअसल भुलाने और आगे बढ़ जाने की शुरुआत 2002 में ही हो गई थी. 28 फ़रवरी से राज्य-संरक्षण में शुरू हुए मुसलमानों के कत्लेआम ने भारत के उद्योगपतियों के एक हिस्से को भी झकझोर दिया था. लेकिन कुछ समय बाद ही पूंजीवाद के तर्क ने मानवीयता की कमजोरी पर विजय पा ली और उन्होने नाराज़ मुख्यमंत्री से क्षमायाचना करके गुजरात की प्रगति में उन्हें हिस्सा लेने की इजाजत माँग ली  थी. सार्वजनिक रूप से उन्हें गांधी और पटेल से तुलनीय बताया जाना अब अटपटा भी नहीं लगता, बल्कि उलट कर कहा जा सकता है कि गांधी और पटेल में  ऐसे कई गुण नहीं थे जो गुजरात के ह्रदय-सम्राट में पाए जाते हैं , इसलिए यह तुलना वस्तुतः इन दोनों के प्रति पक्षपात है. पूंजीवाद के मूल अंतर्राष्ट्रीय चरित्र ने अंततः युरोपियन यूनियन को अपनी मानवीय हिचक को किनारे करके गुजराती यथार्थ को कबूल करते हुए कारोबारी नज़रिया अपनाने को प्रेरित किया. यह संभव नहीं था कि आर्थिक निवेश के ठोस आकर्षक आमंत्रण को   न्याय के अमूर्त आग्रह  के चलते ठुकरा दिया जाए. Continue reading तार्किकता, भावुकता और फासिज्म

Saluting a Lone Survivor: Manash Bhattacharjee

[This guest post by MANASH BHATTACHARJEE is a tribute to writer Alexander Solzhenitsyn. – AN]

Solzhenitsyn writes,
the paper is burning, his writing goes on,
a cruel dawn on a plain of bones.

– Octavio Paz

Alexander Solzhenitsyn (1918-2008) will write no more. He died of heart failure on Monday, the 4th of August, in his home near Moscow. On this occasion, one remembers his 1970 Nobel Prize speech, where Solzhenitsyn had described his terrifying and lonely escape from death and oblivion with poignant candour: Continue reading Saluting a Lone Survivor: Manash Bhattacharjee