बहुध्रुवीयता – तानाशाही का मूलमंत्र : कविता कृष्णन

Guest post by KAVITA KRISHNAN

[यह लेख The India Forum में अंग्रेज़ी में छपा और उसके हिंदी अनुवाद का एक संक्षिप्त संस्करण सत्य हिंदी में छपा. यहाँ हिंदी में लेख को पूरा (बिना काट-छांट के) पढ़ा जा सकता है. हिंदी अनुवाद के लिए डॉ कविता नंदन सूर्य (सम्पादक, www.debateonline.in) को शुक्रिया.]

बहुध्रुवीयता अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की वामपंथी समझ को दिशा देने वाला कम्पास है. भारत और वैश्विक वामपंथ की सभी धाराओं ने लम्बे समय से साम्राज्यवादी अमेरिकी वर्चस्व वाली ‘एकध्रुवीय’ दुनिया की अवधारणा के खिलाफ ‘बहुध्रुवीय’ विश्व की वकालत की है.

दूसरी ओर, ‘बहुध्रुवीयता’ वैश्विक फासीवाद और तानाशाही की साझी भाषा का मूल आधार बन गई है. यह निरंकुश शासकों के लिए एकजुटता का ऐसा आह्वान है, जो लोकतंत्र पर उनके हमले को साम्राज्यवाद के खिलाफ जंग की शक्ल में पेश करती है.  अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के साम्राज्यवाद-विरोधी लोकतंत्रीकरण के नाम पर बहुध्रुवीयता को वैश्विक वामपंथ के गुंजायमान समर्थन ने, निरंकुशता का भेस बदलने और उसे वैधता दिलाने के लिए ‘बहुध्रुवीयता’ के इस्तेमाल को असीमित शक्ति प्रदान कर दी है.

राष्ट्र राज्यों के आतंरिक अथवा आपसी राजनैतिक टकरावों पर रुख तय करने लिए कितने आधार उपलब्ध हैं? इस प्रश्न के जवाब में वामपन्थ सिर्फ़ दो विकल्पों – या तो “बहुध्रुवीयता” या “एकध्रुवीयता” – को प्रस्तुत करती है. अगर आपने “बहुध्रुवीयता” को अपना मूल आधार नहीं बनाया तो वामपन्थ मानेगी कि आप ज़रूर अमेरिका/नाटो की दादागिरी वाले “एकध्रुवीयता” के पक्ष में हैं. पर   “बहुध्रुवीयता” या “एकध्रुवीयता” के बीच यह कल्पित बाईनरी हमेशा भ्रामक थी. लेकिन आज “बहुध्रुवीयता” बनाम  “एकध्रुवीयता” के बीच संघर्ष की मनगढ़ंत कहानी भ्रामक ही नहीं, खतरनाक है क्योंकि इस कहानी में फासीवादी और तानाशाह नेताओं को “बहुध्रुवीयता” बनाए रखने वाले नायकों का पात्र दिया गया है.

मूल्य-मुक्त/नैतिकता-मुक्त “बहुध्रुवीयता” की धारणा के प्रति वामपंथी प्रतिबद्धता की दुर्भाग्यपूर्ण परिणतियाँ, यूक्रेन पर रूसी हमले के बारे में उसकी प्रतिक्रिया के मामले में बेहद स्पष्ट नजर आई हैं. वैश्विक तथा भारतीय वामपंथ के विभिन्न धड़ों ने रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले और क़ब्ज़े के बावजूद, रूस को अमेरिकी नेतृत्व वाले साम्राज्यवाद के लिए एक बहुध्रुवीय चुनौती बताकर पूतिन के दुष्प्रचार और फ़ासीवादी विमर्श (कम या बेशी मात्रा में) को वैधता दी है.  

फासीवादी होने की आज़ादी

30 सितम्बर को चार यूक्रेनी सूबों के अवैध कब्जे की घोषणा करते हुए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने साफ कर दिया कि उनके विचारधारात्मक ढांचे में “बहुध्रुवीयता” और लोकतंत्र का अर्थ क्या है. उन्होंने लोकतंत्र और मानवाधिकार के सार्वभौमिक मान्यता-प्राप्त मूल्यों को पश्चिमी ताक़तों द्वारा थोपा हुआ “साम्राज्यवादी” और “एकध्रुवीय” छल बताया. यानी, उनके अनुसार लोकतंत्र और मानवाधिकार पश्चिमी कुलीनों के ‘विकृत’ मूल्य हैं; अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी “ध्रुव” ने इन “पराए” मूल्यों को सार्वभौमिक बताकर दुनिया पर थोपा है. पूतिन के इस विमर्श में “बहुध्रुवीयता” का अर्थ है, लोकतंत्र और मानवाधिकार के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से महाशक्तियों की आज़ादी. पूतिन के अनुसार “बहुध्रुवीय” दुनिया का मतलब: ऐसी दुनिया जिसमें हर “ध्रुव” (महाशक्ति) सार्वभौम नियमों से निरंकुश होकर मनमर्ज़ी कर सकती है. इस दुनिया में जिसकी लाठी उसकी भैंस. जिसकी जितनी ताक़त, उस हद तक वह तानाशाही करने के लिए आज़ाद है. हर “ध्रुव” (महाशक्ति) देश के भीतर तानाशाही और दमन के साथ अन्य देशों पर हमले कर सकती है – और इसपर UN जैसी संस्था या कोई अन्य देश को सवाल करने या अंकुश लगाने का कोई अधिकार नहीं होगा.

पुतिन के छलपूर्ण विमर्श के अनुसार, नियम-आधारित व्यवस्था, लोकतंत्र और न्याय की सभी अवधारणाएँ पश्चिम के साम्राज्यवादी ताक़तों द्वारा अपने प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए चाल के सिवाय कुछ नहीं हैं.

इस भाषण में पूतिन उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, आक्रमण, अधिग्रहण, जनसंहार और तख्तापलट समेत पश्चिमी देशों के अपराधों की लम्बी लिस्ट रखकर इनपर दुनिया के बड़े हिस्से के पूरी तरह से उचित रोष को जगाकर अपने काम में लगाते हैं. चूँकि यह रोष उचित है, ऐसे में यह भूल जाना आसान है कि अपराधों के इस लिस्ट को गिनाकर पूतिन इनके लिए न्याय की मांग नहीं कर रहे हैं. पश्चिम के इन अपराधों को गिनाकर पूतिन खुद ऐसे अपराधों को निरंकुश होकर करने का प्राधिकार का दावा कर रहे हैं. पूतिन कहते हैं कि इन अपराधों से जिन पश्चिमी ताक़तों के हाथ रंगे हों उन्हें “लोकतंत्र के बारे में एक भी शब्द कहने का कोई नैतिक अधिकार” नहीं है. मान  लिया कि पश्चिमी ताक़तों को लोकतंत्र के बहाने दुनिया की पहरेदारी करने का अधिकार नहीं है. पर क्या यह सच नहीं कि हर देश की जनता, लोकतंत्र और मानवाधिकार की आकांक्षा रखते हैं? इन्हें साकार करने के लिए अपनी सरकारों के ख़िलाफ़ आंदोलन करती हैं?       पुतिन ने बड़ी चालाकी से लोकतंत्र के लिए जनता की आकांक्षाओं और संघर्षों को अपने समीकरण से बाहर रखा.

आख़िर यह औपनिवेशिक देशों की जनता है जिसने आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी और लगातार लड़ रही है. साम्राज्यवादी देशों की जनता लोकतंत्र और न्याय की मांग के लिए और खुद की सरकारों द्वारा किये जाने वाले नस्लवाद, युद्धों, हमलों तथा कब्जों के खिलाफ सड़कों पर उतरी है और अब भी उतरती है. लेकिन पूतिन इस जनता का समर्थन बिलकुल नहीं कर रहे हैं.

उलटे पुतिन ने दुनिया भर में ‘अपने जैसी’ ताकतों – चरम-दक्षिणपंथी, श्वेत श्रेष्ठतावादी, नस्लवादी, नारीवाद-विरोधी, होमोफोबिक, और ट्रांस्फोबिक राजनैतिक ताक़तों – का स्वागत करते हैं और इन्हें भी “कुलीनों द्वारा थोपे गए” लोकतंत्र और मानवाधिकार के मूल्यों के ख़िलाफ़ “आज़ादी का आंदोलन” बताते हैं.  लोकतंत्र और मानवाधिकार के सार्वभौम मूल्यों को उलटने की पूतिन की “बहुध्रुवीयता”  परियोजना, दुनिया भर के चरम-दक्षिणपंथी और तानाशाही ताक़तों के लिए लाभकारी है. और पूतिन अपने भाषण में इन सभी को एकजुट होने का आह्वान कर रहे हैं. यूक्रेन पर रूस का हमला इसी परियोजना का पहला कदम है – इसमें पूतिन को अगर किसी भी मात्रा में सफलता मिलती है, तो दुनिया के सभी लोकतंत्र-विरोधी ताक़तों का मनोबल बढ़ेगा, और इनमें लोकतंत्र के अंतर्राष्ट्रीय नियमों को उलटने की पूतिन की योजना की विश्वसनीयता स्थापित होगी. 

पुतिन रूस (और साथ में चीन, भारत इत्यादि) को “सभ्यता-राष्ट्र” कहते हैं – जिन्हें वे आधुनिक “राष्ट्र-राज्यों” से श्रेष्ठ बताते हैं क्योंकि उनके अनुसार ये प्राचीन समय से ही सभ्यता और राष्ट्र के रूप में चले आ रहे हैं.  रूस के इस श्रेष्ठतावादी संस्करण को शक्ति देने के लिए पूतिन अपने मनगढ़ंत “ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य” का प्रयोग करते हैं, जिसके अनुसार दसवीं सदी में किसी “व्लादिमीर” नाम के राजा ने उसी धरती पर ईसाई धर्म को अपनाया था, जहां आज यूक्रेन खड़ा है. पूतिन के अनुसार, यह “इतिहास” इस बात का सबूत है कि ईश्वर यूक्रेन को रूस का हिस्सा मानते हैं, और ईश्वर ने व्लादिमीर पूतिन को रूस पर राज करने के लिए चुना है, ताकि वे उस प्राचीन “व्लादिमीर” के काम को पूरा कर सकते हैं.

इस चरम ईसाई संप्रदायिकता के बहाने पूतिन अपनी तानाशाही और यूक्रेन पर 2014 और 2022 में हमले को सही ठहरा रहे हैं.     इसमें “अमेरिकी/पश्चिमी साम्राज्यवाद” से पूतिन का मतलब NATO में यूक्रेन की सदस्यता की इच्छा से है ही नहीं. बल्कि उनकी भाषा में बराबरी और लोकतंत्र के मूल्य ही “एक-ध्रुवीय साम्राज्यवाद” द्वारा थोपे गए हैं, जो कि तथाकथित प्राचीन ईसाई सभ्यता के विरोध में हैं. इसी आधार पर पूतिन अपने उसी भाषण में समलैंगिक रिश्तों को पाश्चात्य के कुलीनों की विकृत संस्कृति बताते हैं, और कहते हैं कि रूस की संस्कृति कभी इन्हें स्वीकार नहीं करेगी, चाहे साम्राज्यवादी ताक़तें जितना भी दबाव डालें. ईसाई संप्रदायिकता को “रूस की संस्कृति” बताकर, पूतिन ने “साम्राज्यवाद-विरोध” और “बहुध्रुवीयता” के नाम पर एलजीबीटी लोगों को प्रताड़ित करने वाले क़ानून क़ायम किया है.

पूतिन का दावा है कि रूस संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं द्वारा “सार्वभौमिक रूप से” परिभाषित लोकतान्त्रिक मानदंडों तथा अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की उपेक्षा और नकार करने के लिए आज़ाद है. पूतिन के “यूरेशियाई एकीकरण” की परियोजना को, जिसे वे “साम्राज्यवादी” यूरोपीय यूनियन और पश्चिमी एकध्रुवीयता के सामने बहुध्रुवीय चुनौती के रूप में पेश करते हैं, उनके लोकतंत्र-विरोधी विचारधारात्मक और राजनैतिक परियोजना के अंश के रूप में ही ठीक-ठीक समझा जा सकता है. “यूरेशियाई एकीकरण” की  परियोजना को अमेरिका और रूस की महाशक्तियों के बीच की प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं समझा सकता. न ही इसे सैम्यूअल हंटिंगटन के अमेरिका/पश्चिम को केंद्र में रखने वाली “सभ्यताओं के टकराव” की थियरी के रूसी संस्करण के रूप में समझा जा सकता है. इसलिए कि आज के समय में अमेरिका/NATO और रूस के बीच टकराव या प्रतिस्पर्धा से इतर एक ख़तरनाक असलियत है: अमेरिका में ट्रंप और रूस में पुतिन की साझी चरम-दक्षिणपंथी राजनीति को आगे बढ़ाने में आपसी सहयोग. इस चरम-दक्षिणपंथी राजनीति में साझीदार राजनीतिक शक्तियाँ EU और NATO के लहभग हर सदस्य-राष्ट्र में मौजूद हैं, जिन्हें पूतिन से फ़ंडिंग ही नहीं, अपनी विचारधारा को बढ़ाने के लिए कारगर प्रचारतंत्र भी मिलता है, और जिनमें से कई शक्तियों को हाल के वर्षों में चुनावी सफलता भी मिल रही है.        

एक साझी भाषा

‘बहुध्रुवीयता’ और ‘साम्राज्यवाद-विरोध’ को “लोकतंत्र विरोध” के रूप में परिभाषित करने वाली भाषा की अनुगूंज चीन के बहुसंख्यकवादी और सर्वसत्तावादी निज़ाम में भी दिखाई देती है.

यूक्रेन पर रूसी हमले के लगभग तीन सप्ताह पहले, 4 फरवरी 2022 को पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने संयुक्त बयान जारी किया जिसमें लोकतंत्र और मानवाधिकार के सार्वभौमिक तौर पर स्वीकृत मानकों का साझा नकार किया गया, यह दावा करते हुए कि हर “ध्रुव” – यानी हर  निज़ाम – को अपनी संस्कृति और सभ्यता की अवधारणा के अनुसार “लोकतंत्र” को परिभाषित करने का अधिकार है. अमेरिकी और पश्चिम वाला “ध्रुव” अपनी परिभाषा को “सार्वभौम” बताकर अन्य “ध्रुवों” पर न थोपें. इस बयान में लिखा है: “कोई देश लोकतंत्र को अमल में लाने के लिए उन तौर-तरीकों का चुनाव कर सकता है जो ज्यादा अनुकूल हों उसकी […] परम्पराओं और ख़ास सांस्कृतिक स्वभाव के लिए […] केवल उस देश की जनता ही यह निर्णय कर सकती है कि उनका राज्य लोकतांत्रिक है या नहीं.” बयान में “अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की एक न्यायोचित बहुध्रुवीय व्यवस्था को कायम करने के लिए रूसी पक्ष द्वारा किये गए प्रयासों” को महत्वपूर्ण बताते हुए इन विचारों को स्पष्ट श्रेय दिया गया.

इस बयान से स्पष्ट है कि शी जिनपिंग और पूतिन दोनों की नज़र में “बहुध्रुवीयता” का मतलब है लोकतंत्र, बराबरी, मानवाधिकार के निष्पक्ष मानकों का निषेध, और इनकी जगह “बहुध्रुवीय” निज़ामों को खुली छूट कि वे “संस्कृति/परम्परा” के बहाने अपने स्वार्थ को साधने के लिए लोकतंत्र आदि के सापेक्ष मापदंड धोषित करें, और फिर खुद अपने निज़ाम को उसी के द्वारा स्वघोषित मानकों को पूरा करने का “सर्टिफ़िकेट” दें! 

चीन की सरकार ने “शी जिनपिंग थॉट” (शी विचारधारा) में शी के लेखों और भाषणों को संकलित किया है. शी के शब्दों में “आज़ादी, लोकतंत्र और मानवाधिकार के ‘सार्वभौमिक मूल्य’ सोवियत यूनियन के विघटन, पूर्वी यूरोप में भीषण परिवर्तनों, ‘कलर रिवोल्यूशन’ और ‘अरब स्प्रिंग’ [ऐसे आंदोलन जिन्होंने तानाशाहों का तख्तापलट किया – लेखक] का कारण बने, ये सभी अमेरिका और पश्चिम के हस्तक्षेप के परिणाम थे.” शी की नज़र में कोई भी जन आन्दोलन जो व्यापक तौर पर स्वीकृत मानवाधिकारों और लोकतंत्र की मांग करता है उसे सहज रूप से नाजायज़ साम्राज्यवादी “कलर रिवोल्यूशन” के तौर पर देखा जा रहा है. 

चीनी सरकार द्वारा समर्थित सांस्कृतिक सापेक्षतावादी मानकों पर ध्यान दें तो “ज़ीरो कोविड” के नाम पर हुए दमन के खिलाफ उभरे चीन-व्यापी आंदोलन में प्रदर्शनकारियों द्वारा सार्वभौमिक मानदंडों को पूरा करने वाले लोकतंत्र की मांग काफी महत्वपूर्ण हो जाती है. “लोकतंत्र, आज़ादी और मानवाधिकार पर चीनी दृष्टिकोण” नाम का 2021 में चीन सरकार द्वारा जारी एक श्वेतपत्र, लोकतंत्र को “सुशासन” और मानवाधिकार को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और फायदों से मिली “खुशहाली” के तौर पर परिभाषित करता है. यह परिभाषा ” मानवाधिकार” के नाम पर नागरिक को सिर्फ़ “लाभार्थी” होने का अधिकार मानती है; बेलगाम सरकारी शक्ति से व्यक्ति के अधिकारों की सुरक्षा को नहीं. लोकतंत्र को सरकार से सवाल-जवाब करने, असहमत होने, संगठित होने की आज़ादी जैसे अधिकारों को नहीं, बल्कि “सुशासन” के रूप में परिभाषित करती है. 

“विशिष्ट चीनी प्रजाति के” लोकतंत्र को “सुशासन” और मानवाधिकारों को “खुशहाली” के रूप में परिभाषित करना, शी को उनकी सरकार द्वारा उइग़र मुस्लिमों के दमन को न्यायसंगत ठहराने का मौका देता है. उनका दावा है कि इन अल्पसंख्यकों को ‘पुनः शिक्षित’ करने और उनके इस्लामिक रिवाजों को नए सांचे में ढालकर “चीनोन्मुख” बनाने के लिए बने कंसंट्रेशन कैंप्स (ऐसे कारा शिविर जिसमें लोगों को किसी ख़ास जुर्म साबित होने पर सज़ा के रूप में नहीं बल्कि उनके सामाजिक/धार्मिक/नस्लीय परिचय के आधार पर बंदी बनाया जाता है)  ने उईगरों को “सुशासन” तथा अधिक “खुशहाली” प्रदान की है.

भारत के हिन्दू श्रेष्ठतावादी नेतृत्व में भी ऐसी “बहुध्रुवीय दुनिया” के फासीवादी और सत्तावादी विमर्श की मजबूत अनुगूँजें मौजूद हैं – जिसमें सभ्यतागत शक्तियां अपने प्राचीन साम्राज्यवादी गौरव को हासिल करने के लिए पुनः उठेंगी और उदारवादी लोकतंत्र का प्रभुत्व ढलकर साम्प्रदायिक “राष्ट्रवाद” के लिए रास्ता देगा.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने प्रशंसापरक ढंग से कहा है कि अमेरिका को चुनौती देने वाली “एक बहुध्रुवीय दुनिया में…चीन का उदय हो चुका है. उसे अब इसकी फ़िक्र नहीं कि दुनिया उसके बारे में क्या सोचती है. वह अपना लक्ष्य साध रहा है… उसके प्राचीन सम्राटों के विस्तारवाद की ओर लौट रहा है.” उसी तरह भागवत कहते हैं कि “इस बहुध्रुवीय दुनिया में अब रूस अपनी बाजी खेल रहा है. पश्चिम को दबाकर वह आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है.”

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कइयों बार भारत विरोधी बताकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हमले किये हैं. साथ में उनकी घोषणा है कि भारत “लोकतंत्र की जननी” है. लोकतंत्र के संवैधानिक परिभाषा को “पश्चिमी” बताया जा रहा है और इसकी जगह भारतीय लोकतंत्र को उसे “सभ्यतागत चरित्र” का अंग मानकर देखने को कहा जा रहा है. सरकार द्वारा पढ़े जाने के लिए 26 नवम्बर 2022 (संविधान दिवस) को वितरित “भारत: लोकतंत्र की जननी” के नाम से एक लेख भारतीय लोकतंत्र को “हिन्दू संस्कृति और सभ्यता”, “हिन्दू राजनैतिक सिद्धांत”, “हिन्दू राज्य” तथा पारंपरिक खाप/जाति पंचायतों से जोड़ता है, जो दलितों, महिलाओं पर शोषणकारी नियमों को थोपते हैं. 

ऐसे विचार अति-दक्षिणपंथी और तानाशाही ताकतों के वैश्विक गिरोह में हिन्दू श्रेष्ठतावादियों को शामिल करने की कोशिशों को भी प्रतिबिंबित करते हैं. रूसी फासीवादी विचारक अलेक्ज़ान्द्र दूगिन (जो पुतिन के ‘रासपूतिन’ कहलाते हैं) ने लिखा है कि बहुध्रुवीयता […] प्रत्येक गैर पश्चिमी सभ्यता के सभ्यतागत बुनियादों की ओर वापसी और उदारवादी लोकतंत्र तथा मानवाधिकारों की विचारधारा (के नकार) की वकालत करती है.”

यह प्रभाव दोतरफा है. एक सामाजिक मॉडल के रूप में दूगिन जाति पदानुक्रम (ऊँच-नीच की व्यवस्था) का समर्थन करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय फासीवाद में ब्राह्मणवादी मनुस्मृति के मूल्यों को प्रत्यक्षतः समाहित करते हुए दूगिन “मानवाधिकार, पदानुक्रम-विरोध और पोलिटिकल करेक्टनेस” के वर्चस्व वाली “मौजूदा व्यवस्था” को “कलियुग” कहते हैं. भारतीय प्रयोग में “कलियुग” एक ऐसी आफत/अनर्थ है जो अपने साथ “वर्णसंकर” (जाति का सम्मिश्रण, नस्लों का मिलावट जो औरतों की आजादी से संभव होती है) लाती है और जातिगत पदानुक्रम को सर के बल खड़ा करती है. दूगिन ने मोदी की चुनावी सफलता को “बहुध्रुवीयता” की जीत, “भारतीय मूल्यों” की स्वीकार्यता, “भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक और भू-राजनैतिक महानता” की समझ, तथा “उदारवादी लोकतंत्र और मानवाधिकार विचारधारा” के वर्चस्व की हार के प्रतीक के रूप में देखा है.

और तब भी वामपंथ “बहुध्रुवीयता” का प्रयोग कर रहा है, इसकी हलकी सी भी जागरूकता जाहिर किये बिना कि फासीवादी और तानाशाह भी अपने लक्ष्य को इसी भाषा में व्यक्त कर रहे हैं.

वाम और दक्षिण की मिलन भूमि

पूतिन ने ‘बहुध्रुवीयता” की भाषा का चालाकी से प्रयोग किया है, यह जानते हुए कि यह अवधारणा वैश्विक वामपंथ को अपना सा लगेगा. यह अवधारणा वामपंथ को परिचित-सा, अपना-सा लगता है और इसलिए वही वामपन्थ, जिसने हमेशा ही अमेरिकी साम्राज्यवादी युद्धोन्मादियों के “लोकतंत्र बचाने” के दावों का बेहतरीन तरीक़े से पर्दाफ़ाश किया है, पूतिन के उपनिवेश-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी शब्दाडम्बर को उसी आलोचनात्मक नज़र से नहीं देख पाती.

यह अजीब है कि वामपंथ ने “ध्रुवीयता” की भाषा को अपना लिया. यथार्थवाद वैश्विक व्यवस्था को कुछ ध्रुवों – महाशक्तियों अथवा ऐसी शक्तियां बनने के आकांक्षी राष्ट्रों – की विदेश नीतियों के लक्ष्यों की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखता है, यह मानते हुए कि वे वस्तुगत ‘राष्ट्रीय हितों’ को व्यक्त करती हैं. यथार्थवाद इस समझ कि वस्तुगत और मूल्य-निरपेक्ष ‘राष्ट्रीय हित’ पर टिका है. ऐसी समझ, वामपंथी समझ के विरोध में है, जो मानती है कि “विदेश नीति उसको बनाने और रूप देने वाले नेतृत्वकर्ता तबके के राजनैतिक (और इसीलिए नैतिक) चरित्र” से परिभाषित होता है.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी (भाकपा माले) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के एक ताजे लेख में सूत्रीकरण किया गया है कि प्रतियोगी वैश्विक शक्तियों का आतंरिक चरित्र चाहे जो भी हो, नवउदारवादी नीतियों के परिवर्तन, सामाजिक बदलावों और राजनैतिक प्रगति के लिए प्रयासरत दुनिया भर की प्रगतिशील ताकतों और आंदोलनों के लिए एक बहुध्रुवीय दुनिया निश्चय ही अधिक लाभकारी होगी.”

साथी दीपंकर के इस सूत्रीकरण का मतलब है कि वामपन्थ को, दुनिया में बहुध्रुवीय संतुलन बनाए रखने के लिए ऐसे गैर-पश्चिमी महाशक्तियों में निज़ामों के बचे रहने और ताक़त बनाए रखने के पक्ष में होना चाहिए, भले ही ये निज़ाम तानाशाही, चरम-दक्षिणपंथी, या फ़ासीवादी क्यों न हो. इस सूत्रीकरण के अनुसार वामपन्थ ऐसे निज़ामों के दुष्कर्मों के ख़िलाफ़ जन-आंदोलनों या बचाव में जनयुद्ध की जीत का तहेदिल से साथ नहीं दे सकते, क्योंकि इन निज़ामों की हार से कहीं दुनिया एक-ध्रुवीय न बन जाए.

याद करें कि पूतिन, शी जिनपिंग, मोदी, दूगिन और मोहन भागवत जैसे तानाशाही/फ़ासीवादी नेता/विचारक “बहुध्रुवीयता” के प्रतिनिधि होने के बहाने लोकतंत्र और मानवाधिकार के मूल्यों, इन मूल्यों की चाहत रखने वाली जनता, और उनके निरंकुश निज़ामों के ख़िलाफ़ जनआंदोलनों और जन-युद्धों को अमेरिकी/पश्चिमी साज़िश बता कर अवैध और देश-विरोधी करार देते हैं. “बहुध्रुवीयता” के पक्ष में साथी दीपंकर का वामपंथी सूत्रीकरण, “बहुध्रुवीयता” की तानाशाही/फ़ासीवादी अवधारणा को ज़रा भी चुनौती नहीं देती.   बल्कि ऐसा सूत्रीकरण, ऐसे निज़ामों और विचारकों को वामपंथी वैधता का जामा पहनाता है.  

ध्रुवीयता के विमर्श को अपनाने का यूक्रेन के प्रति वामपन्थ के रवैय्ये पर क्या असर है?  

ध्रुवीयता का विमर्श अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के यथार्थवादी या रियलपोलिटिक वाले स्कूल से सम्बंधित है. इस स्कूल अंतर्राष्ट्रीय पॉलिसी को तथाकथित “नैतिकता-निरपेक्ष” रखने की वकालत करता है; दरसल निरपेक्षता के नाम पर इस पॉलिसी का मतलब रहा है: महाशक्तियों द्वारा उनसे कमजोर देशों के ख़िलाफ़ घोर अनैतिक, हिंसक, लोकतंत्र-विरोधी युद्ध, क़ब्ज़े, और लोकतांत्रिक चुने हुए सरकारों का तख्तापलट और उनकी जगह अपनी “कठपुतली” शासन को बिठाना. ध्रुवीयता और रियलपोलिटिक के स्कूल के अगुआ नायक और उसके सबसे प्रमुख उदाहरण हैं हेनरी किसिंजर, जो अमेरिका के सबसे कुख्यात साम्राज्यवादी दुष्कर्मों के नायक के रूप में कुख्यात हैं.

आज मुझे आश्चर्य होता है, जब प्रमुख वामपंथी नेता और साथी, यूक्रेन पर अपनी राय को मज़बूत करने के लिए किसिंजर जैसे कुख्यात साम्राज्यवादी युद्ध-अपराधी का सहारा लेते हैं. इन साथियों इसलिए ऐसा करते हैं, वामपंथी मानते हैं कि किसिंजर चूँकि अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रवक्ता हैं, उनके लिए रूस के साथ युद्ध चलाने के पक्ष में होना स्वाभाविक होता. पर अगर आख़िर अमेरिका के सबसे शातिर और चालाक प्रवक्ता किसिंजर तक रूस के ख़िलाफ़ यूक्रेन का पक्ष नहीं ले रहे हैं, बल्कि “समझौते” के पक्ष में हैं, तब युद्ध में यूक्रेन का पक्ष सिर्फ़ सरफिरे अदूरदर्शा लोग ही ले सकते हैं.

पर इसमें क्या आश्चर्य है, कि अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके सभी दुष्कर्मों का सबसे बेशर्म प्रवक्ता, रूसी साम्राज्यवाद और उसके दुष्कर्मों को जायज़ समझें? किसिंजर साम्राज्यवाद के प्रवक्ता हैं, सिर्फ़ अमेरिका के “हित” या “स्वार्थ” के नहीं. डॉनल्ड ट्रम्प ने भी यूक्रेन पर हमला के लिए पूतिन को “जीनियस” कहा और यह भी कहा कि पूतिन ने बड़े ही स्मार्ट तरीक़े से हमले के लिए यूक्रेन के रूसी भाषी क्षेत्रों को “आज़ाद करने” का बहाना लिया; “मैं भी ऐसा ही करता”. पूतिन की ऐसी प्रशंसा के बाद, ट्रम्प अब “पूतिन और यूक्रेन के बीच जंग” रोकने के लिए “वार्ता” और “समझौता” की वकालत कर रहे हैं. पूतिन और साम्राज्यवाद का हर पक्षधर, लोकतंत्र का हर दुश्मन, हमलावर महाशक्ति रूस और हमले के बचाव में अपनी आज़ादी को बचाने के लिए लड़ने वाले यूक्रेन दोनों को एक ही तराज़ू पर तौलने का दिखावा पर रहे हैं. उनका ऐसा करना समझ आता है. पर वामपन्थ क्यों खुद को किसिंजर और ट्रम्प के ख़ेमे से जोड़ना चाहती है? वीएतनाम, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान या फ़िलिस्तीन में हमने (वामपन्थ ने) आज़ादी के लिए लड़ने वाले देश पर दबाव नहीं बनाया कि वह लड़ना बंद करें और अपने साम्राज्यवादी हमलावर के साथ ऐसा “समझौता” कर लें जिसमें वह अपनी ही ज़मीन और जनता पर हमलावर के क़ब्ज़े को स्वीकार कर लें. तब हम यूक्रेन पर ऐसा ही दबाव क्यों बना रहे हैं? वामपन्थ के यूक्रेन के मामले में इस रवैय्ये के चार उदाहरण प्रस्तुत हैं:

1) नोम चॉम्स्की ने यूक्रेन पर “समझौते” की बात करने के लिए ट्रम्प को दुनिया का एकमात्र “राजनेता” बताते हुए तारीफ़ की. इसी बात पर ट्रम्प की वाहवाही, दुनिए के कई चरम दक्षिणपंथी तानाशाह भी कर रहे हैं. 

2) बहुध्रुवीयता पर वैश्विक वामपंथ के प्रमुख समर्थकों और हिमायतियों में से एक, विजय प्रसाद सहमतिपरक ढंग से पाते हैं कि “रूस और चीन संप्रभुता चाहते हैं, न कि विश्व शक्ति बनना.” वो ये नहीं बताते कि किस तरह ये शक्तियां संप्रभुता को लोकतंत्र, मानवाधिकार और समानता के आम-समझदारी वाले मानकों के प्रति जवाबदेही से आज़ादी के रूप में व्याख्यायित करती हैं. प्रसाद ने यूक्रेन पर रूसी हमले के शुरुआती महीनों में ट्वीट किया था कि जिस तरह से रूस की बर्फीली सर्दी ने नपोलीयन और हिटलर द्वारा रूस पर हमले को पराजित किया, इस बार भी वही बर्फ़ और सर्दी NATO द्वारा रूस पर हमले को पराजित करेगा. पर सच्चाई तो ये है, कि यूक्रेन (जो NATO का हिस्सा नहीं है) पर रूस ने हमला किया, NATO और यूक्रेन ने रूस पर हमला नहीं किया! अब, जबकि यूक्रेन के पराजय की आस में मज़ा लेने वाले विजय प्रसाद ना-उम्मीद हुए हैं, वे “शांति” के पक्ष में बोल रहे हैं, जो कि “समझौते” से ही हो सकता है. पर यह सच नहीं है. युद्ध उसी दिन रुक जाएगा जब रूस हमले और क़ब्ज़े की कोशिश बंद करेगी और यूक्रेन के ज़मीन से अपनी सेना को वापस बुला लेगी. इसी तरह विजय प्रसाद ने कुछ महीनों पहले कहा कि अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देशों को “लोकतंत्र शब्द का (रूस, चीन आदि के संदर्भ में) इस्तेमाल करने का ज़रा भी नैतिक अधिकार नहीं है” (याद करें कि लहभग इन्हीं शब्दों का पूतिन भी इस्तेमाल करते हैं.)  यह बिलकुल सही है कि अमेरिका और उसके सहयोगी साम्राज्यवादी देशों को किसी अन्य देश को “लोकतंत्र” का पाठ पढ़ाने का अधिकार नहीं है; पर सवाल प्रसाद से यह है कि आख़िर आप और हम जैसे वामपंथियों को रूस,  चीन, ईरान आदि के निज़ामों द्वारा लोकतंत्र पर हमले को लेकर सवाल उठाने का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य नहीं है क्या? तब आप रूसी साम्राज्यवादी युद्ध, रूस और चीन द्वारा लोकतंत्र और मानवाधिकार पर हमले पर क्यों नहीं बोलते हैं? ईरान में इस्लामिक रिपब्लिक को देश की गर्दन से उखाड़ फेंकने के लिए चल रहे जन-संघर्ष (जिसका नेतृत्व वहाँ की युवतियाँ कर रही हैं) के समर्थन में आप (और आपका वेब्सायट ट्राइकॉंटिनेंटल सहित उसके नज़दीक का वेबसाइट पीपल्ज़ डिस्पैच) आज तक पूरी तरह से चुप कयों है?                

3) माकपा के पत्रिका पीपल्ज़ डिमॉक्रेसी में यूक्रेन पर ज़्यादातर लेख, जिसमें विजय प्रसाद का भी एक लेख शामिल है, यही कहते हैं कि भले ही रूस ने यूक्रेन पर हमला अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन है, पर दरसल यह टकराव, अमेरिका/NATO द्वारा यूक्रेन के बहाने रूस के नेतृत्व में उभरते “यूरेशिया” पर हमला है. पर माकपा महासचिव सीताराम येचुरी का लेख बाक़ी लेखों से काफ़ी अलग है. उन्होंने लेख के शीर्षक में ही रूस के हमले को “आक्रमण” कहा है. इसके साथ उन्होंने पूतिन द्वारा यूक्रेन पर अपने “ऐतिहासिक” अधिकार जताने और उसके राष्ट्र होने को ही नकारने की कोशिश का विस्तार से विरोध किया है. पर इस सब के बावजूद, ये भी NATO की भूमिका पर ज़ोर देते हुए, न सिर्फ़ “वार्ता” के ज़रिए युद्ध की अंत की माँग करते हैं, बल्कि रूस और यूक्रेन के अलावा, अमेरिका और NATO को भी वार्ता में शामिल करने की माँग करते हैं. पर अमेरिका और NATO को वार्ता में शामिल करने की माँग करना, अपने आप में यूक्रेन की संप्रभुता को कमज़ोर करता है. रूस द्वारा ईसाई संप्रदायिकता के नाम पर यूक्रेन के राष्ट्र के रूप में अस्तित्व को ख़त्म करने की कोशिश में हमले को कुछ हद तक रूस और अमेरिका/NATO में टकराव बताकर सच्चाई और न्याय को धूमिल करता है.                   

4) भाकपा माले महासचिव साथी दीपंकर ने उपरोक्त लेख में पूतिन द्वारा हमले की निंदा की है, यूक्रेन की आज़ादी और संप्रभुता के बचने की आशा करते हैं, मानते हैं कि NATO रूस द्वारा हमले का कारण नहीं है. पर इसके बाद वे कहते हैं कि “यह तो निर्विवाद तथ्य है कि जहां युक्रेन और रूस, दोनों इस युद्ध में अपना खून बहा रहे हैं और दुनिया के बड़े हिस्से को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है, वहीं युद्ध में सीधी भागीदारी के बगैर ही अमेरिका सबसे ज्यादा फायदा बटोर रहा है.” पर जैसा कि यूक्रेन के एक वामपंथी पत्रकार मित्र ने मुझसे कहा, “पर यह तो झूठ है कि यूक्रेन और रूस दोनों खून बहा रहे हैं! रूस आक्रमण करके यूक्रेन के सैनिकों का ही नहीं, उसके असैनिक लोगों का भी खून बहा रही है. रूस के सैनिकों का खून उस दिन बहना बंद हो जाएगा जब वह अपना आक्रमण बंद कर लें और यूक्रेन के जितने ज़मीन पर उसने क़ब्ज़ा किया है, उसे आज़ाद कर दें! यूक्रेन के लोग तो अपनी राष्ट्रेय पहचान और आज़ादी को बचाने के लिए और रूस द्वारा जनसंहार से बचने के लिए लड़ते हुए अपनी शहादत दे रहे हैं. आपके न्यायपसंद, वामपंथी साथी इस तरह दोनों की ऐसी तुलना कैसे कर रहे हैं? अमेरिका को फ़ायदा मिल ही सकता है; पर घुटना न टेक कर यूक्रेन को ज़िंदा रहने का “फ़ायदा” मिल रहा है, जिसके लिए वह हक़ से अमेरिका और NATO और पूरी दुनिया से सैन्य मदद माँग रही है.”

मेरे युक्रेनी मित्र ने यह भी बताया कि यह माँगने का हक़ यूक्रेन को इसलिए भी है कि 1991 में आज़ाद होने के बाद यूक्रेन ने अपने सारे परमाणु (आटमी) शस्त्र रूस को दे दिया था, एक ऐसे समझौते के तहत जिसमें रूस ने यूक्रेन पर कभी हमला न करने का वादा किया था. पूतिन ने दो बार (2014 और 2022 में) अपने वादे को तोड़ा है. 2014 में हमले से रूस ने यूक्रेन के क्रायमीया क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिए. इस बार फिर अगर “समझौते” में यूक्रेन को अगर मजबूर किया जाए कि वह रूस को क़ब्ज़ा किए युक्रेनी ज़मीन पर न्यायिक अधिकार स्वीकार कर लें, तो पूतिन का मनोबल और बढ़ेगा, और तयशुदा है कि वे फिर समझौते को तोड़ कर फिर हमला करेंगे. मेरे मित्र समझौते की सम्भावना को नकार नहीं रहे हैं; पर वे कह रहे हैं कि वार्ता और समझौता तब हो जब यूक्रेन और ख़ासकर यूक्रेन की जनता इसे चाहे. यह महाशक्तियों के बीच समझौता नहीं हो सकता. ज़ेलेंस्की भी जानते हैं कि यूक्रेन में उनकी लोकप्रियता क्योंकि वे अमेरिका की मदद से मैदान छोड़ कर भागे नहीं और जनता की लड़ाई का बहादुरी से नेतृत्व कर रहे हैं. अगर वे पर्दे के पीछे “समझौता” कर लें और यूक्रेन के कई क्षेत्रों और वहाँ की जनता को पूतिन के क़ब्ज़े में छोड़कर युद्ध से पीछे हटने की घोषणा कर लें, तो यूक्रेन हाँ बच्चा-बच्चा उनका धुतकार करेगा.

मैंने अपने मित्र से पूछा, कि साथी दीपंकर ने ज़ेलेंस्की के बारे में कहा है कि वे अमेरिका से उधार की ऐवज में यूक्रेन की ज़मीन और जन-सम्पत्ति के बड़े हिस्से को अमेरिका का बंधक बना दिया है. ज़ेलेंस्की श्रम क़ानूनों का क्षरण भी तो कर रहे हैं. मेरे मित्र ने तुरंत जवाब दिया: आपके यहाँ मोदी क्या देश की सम्पत्ति अमेरिका के हाथों बंधक नहीं बना रहे हैं; श्रम क़ानूनों का क्षरण नहीं कर रहे हैं? और तो और वे फ़ासीवादी हैं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला कर रहे हैं. चीन भी तो अफ़्रीका के देशों के क़र्ज़ के ऐवज में उन देशों की ज़मीन, इन्फ़्रास्ट्रक्चर और जन सम्पत्ति को बंधक बना रखी है. अफ़्रीका के देशों की तरह यूक्रेन भी हालातों से कुछ हद तक मजबूर है. रूस के ग़ुलामी के शिकंजे और अमेरिका के कॉरपोरेट पूँजी के शिकंजे में बराबरी बताना कहीं से सही नहीं है. जैसे आप भारत में अपनी सरकारों के द्वारा श्रम क़ानूनों के क्षरण और विदेशी या देशी पूँजी के हाथों जनहित और जनसम्पत्ति को बंधक बनाने का विरोध करते आए हैं, उसी तरह से यूक्रेन के आज़ाद रहने पर हमें भी लड़ने का मौक़ा मिलेगा. फ़िलहाल यूक्रेन के ज़्यादातर मज़दूर अपनी मर्ज़ी से बचाव के युद्ध में सैनिक बने हुए हैं. हर मज़दूर जनता है कि रूस का हमला तभी बंद होगा जब वह पराजित होगा. रूस जितना जल्दी पराजित होगा, उतनी जल्दी हम सरकार की ग़लत नीतियों का विरोध संगठित कर पाएँगे.     

राष्ट्रीय प्राथमिकताऔर अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता में अंतरविरोध खड़ा करना कितना जायज़ है?    

साथी दीपंकर उपरोक्त लेख में कहते हैं कि भारतीय वामपन्थ को सतर्क रहना चाहिए, ताकि यूक्रेन के साथ उसकी अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता, भारत में फासीवाद से लड़ने की उसकी राष्ट्रीय प्राथमिकता को गुमराह न कर दें.  

लेकिन भारत में फासीवाद से लड़ाई एक फासीवादी हमले के खिलाफ यूक्रेन के साथ दृढ़ एकजुटता से असंगत कैसे है? लेख का इशारा है कि चूंकि मोदी सरकार की विदेश नीति का प्राथमिक गठजोड़ अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिम के साथ है इसलिए यदि यूक्रेनी प्रतिरोध रूस को – जो कि अमेरिका का ‘बहुध्रुवीय’ प्रतिद्वंदी है – हरा दे, तो मोदी के फासीवाद से संघर्ष कमजोर पड़ जाएगा.

यह चक्करदार गणना इस सामान्य तथ्य को धुंधला देती है कि यूक्रेन पर पुतिन के फासीवादी हमले की पराजय भारत में मोदी के फासीवाद को हराने की लड़ाई को मजबूती देगी, उसके मनोबल बढ़ाएगी. इसी तरह शी जिनपिंग की बहुसंख्यकतावादी और निरंकुश  निज़ाम से लड़ रहे चीन, पूर्वी तुर्किस्तान के उईगर, और तिब्बत के लोगों की जीत भारत में मोदी की बहुसंख्यकतावादी और निरंकुश सत्ता का विरोध करने वालों को प्रेरणा देगी.

साथी दीपंकर, “राष्ट्रीय स्थितियों की कीमत पर अंतर्राष्ट्रीय को प्राथमिकता देने” के खतरों से कम्युनिस्ट आन्दोलन को सावधान रहने की जरुरत के नाम पर एक कृत्रिम, घुमावदार और परोक्ष रास्तों से गुज़रते हैं.

उनके अनुसार 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पृथक रहने की भूल की वजह थी कि उसने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन (जो उस युद्ध में वह फासीवाद के खिलाफ राष्ट्रों के संघ में मित्रदेश था) के उपनिवेशवाद को उखाड़ फेंकने की अपनी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता पर फासीवाद को हराने की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को वरीयता दे दिया था. पर उनकी यह व्याख्या तथ्य-परक नहीं है.

अविभाजित सी.पी.आइ ने दूसरे विश्व युद्ध के शुरुआती दो वर्षों में इसे साम्राज्यवादी शक्तियों की आपसी होड़ माना था. यह पूरी तरह से उस समय के स्तालिन के नेतृत्व वाले सोवीयत संघ और कॉमिंटर्न (कॉम्युनिस्ट इंटर्नैशनल) की उस दौर की नीति से मेल खाता है. 1935 में कॉमिंटर्न ने फ़ासीवाद को साधारण पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से ज़्यादा ख़तरनाक प्रवृत्ति माना और इससे लड़ने के लिए व्यापक एकता वाला जन मंच बनाने के लिए कॉम्युनिस्टों को ज़िम्मेदारी दिया था. इसके साथ साथ उपनिवेशों में कॉम्युनिस्ट पार्टियों को उपनिवेशी राज के ख़िलाफ़ व्यापक मंच बनाने को कहा था. पर 1939 में स्तालिन और हिटलर के बीच एक समझौता हुआ. ऊपरी तौर पर यह सिर्फ़ एक दूसरे पर आक्रमण न करने का समझौता था. पर इसके गुप्त “प्रोटकॉल” में बात कुछ और ही थी. वहाँ, पोलैंड और बॉल्टिक देशों को हिटलर और स्तालिन के निज़ामों ने बाक़ायदा नक़्शे पर निशान बनाकर आपस में बाँटा. इसके ठीक बाद दूसरा विश्व युद्ध तब शुरू हुआ जब जर्मनी ने समझौते के अनुसार पश्चिमी पोलैंड पर क़ब्ज़ा कर लिया. उसके ठीक बाद सोवियत संघ ने पूर्वी पोलैंड पर क़ब्ज़ा किया. (इस समझौते के फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई और सोवियत रूस की तैय्यारी पर असर, उसकी आड़ में स्तालिन के आदेशों पर किए गए शर्मनाक दुष्कर्म, और उन दुष्कर्मों की सच्चाई को कवर-अप करने में स्तालिन सहित  ब्रिटेन के चर्चिल और अमेरिका के रोसेवेल्ट की भूमिका के बारे में कभी और.)

यहाँ इतना जानना काफ़ी है कि इस समझौते के बात स्तालिन के आदेश पर कॉमिंटर्न की पज़िशन में यू-टर्न हुआ, और दुनिया भर के कॉम्युनिस्ट पार्टियों से कहा गया कि वे जर्मनी द्वारा पोलैंड, डेनमार्क, नॉर्वे, बेल्जियम, नेदरलैंड्ज़, लगज़ेमबर्ग, फ़्रान्स, युगोस्लविया और ग्रीस पर सैन्य हमले को “साम्राज्यवादी ताक़तों के बीच युद्ध” मानें और उससे पृथक रहें. इसके बावजूद कहीं कहीं कॉम्युनिस्टों ने इस मनगढ़ंत और शर्मनाक स्टैंड को अपनाने से इनकार किया. इस तरह के कॉम्युनिस्ट दलों का बहुत ही शानदार उदाहरण था नेदरलैंड्ज़ की डच कॉम्युनिस्ट पार्टी का. उनके देश पर हिटलर ने क़ब्ज़ा करने के बाद जब यहूदियों को थोक में क़ैद करना और डिपॉर्ट करना शुरू किया, तब कॉम्युनिस्ट नेतृत्व के ट्रेड यूनीयों ने हड़ताल किया. ऐम्स्टर्डैम के (जिस शहर में 1942-44 तक ऐन फ़्रैंक और उसका परिवार नाज़ियों से छिप कर रहा) बंदरगाह मज़दूरों का हड़ताल इनमें कुछ दिनों के लिए चला. यह न सिर्फ़ यहूदियों के बचाव में किसी भी देश में तब तक का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन था, बल्कि पहला प्रदर्शन था जिसका आयोजन मूलतः ग़ैर-यहूदियों ने यहूदियों के साथ साझीदारी जताने के लिए किया. और उनका यह नैतिक साहस के लिए हमारा सम्मान और भी बढ़ना चाहिए, ये जानते हुए कि उन्हें  स्तालिन, सोवियत संघ, और कॉमिंटर्न से रत्ती भर मनोबल, समर्थन या साझीदारी के बिना, और इन के आदेश का उल्लंघन करते हुए यह सब करना पड़ा. दुश्मनों का मुक़ाबला करना बहादुरता है – पर अपने ही दोस्तों और साथियों के ग़लत होने पर उनका मुक़ाबला करना, और ऐसा करने के लिए दोस्तों से अलगाव और हिटलरशाही से अकेले टकराना, और उसके हाथों गिरफ़्तारी और हत्या झेलना (जैसा कि डच कम्युनिस्टों और मज़दूरों ने झेला) – ये तो बहादुरी का सबसे अव्वल स्तर है.

अविभाजित सी.पी.आइ स्तालिन के स्टैंड के साथ खड़ी हुई और 1939 से यह नारा अपनाई कि “यह जंग समराज्यशाही है, हम देंगे न एक पाई, न एक भाई”. 1941 के जून में जब हिटलर ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया, तब स्तालिन और कॉमिंटर्न ने इस युद्ध को “फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ जन-युद्ध” की संज्ञा दी. दिसम्बर 1941 में आख़िरकार जब सी॰पी॰आई॰ तक कॉमिंटर्न का आदेश पहुँचा, तब रातोंरात उसने अपना स्टैंड बदलकर युद्ध में ब्रिटेन और सोवियत संघ के पक्ष के समर्थन का निर्णय लिया. इसमें राष्ट्रीय लड़ाई और अंतरराष्ट्रीय लड़ाई में संतुलन में कोई दुविधा या कठिनाई की बात ही नहीं थी. फ़ासीवाद को हराने  के लिए युद्ध का समर्थन करते हुए, सी॰पी॰आई॰ ब्रिटेन पर दबाव बना सकती थी, कि एक आज़ाद भारत ही फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ दुनिया को आज़ाद रखने की लड़ाई लड़ सकती है; फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में ब्रिटेन के नेतृत्व की नैतिकता पर भारत की ग़ुलामी एक बड़ा धब्बा है. 1941 से पहले सी॰पी॰आई॰ ने युद्ध को हिटलर का फ़ासीवादी युद्ध कहने की बजाय स्तालिन से दिशा लेते हुए उसे “सामराज्यशाही” युद्ध कहने की गलती की. 1941 के बाद, सी॰पी॰आई॰ ने युद्ध को फ़ासीवाद-विरोधी जन-युद्ध माना जो कि सही था – पर इसके साथ उसने उस युद्ध के समर्थन के नाम पर और एक बड़ी गलती की: भारत के उपनिवेशवाद-विरोधी लड़ाई में भागीदारी को कुछ देर के लिए स्थगित किया.

अविभाजित सी॰पी॰आई॰ की इन ग़लतियों की जड़ समझेंगे तो इसे दोहराने से बचेंगे. कॉम्युनिस्ट नीति को कॉम्युनिस्ट उसूलों की और ठोस परिस्थिति में न्याय और अन्याय की आज़ाद समझदारी को आधार बनाकर तय किया जाना चाहिए. इसकी बजाय जब भारत के कॉम्युनिस्ट किसी कॉम्युनिस्ट महानेता, किसी कॉम्युनिस्ट-नेतृत्व वाले निज़ाम, किसी अंतर्राष्ट्रीय खेमेबंदी (शीत युद्ध में सोवियत संघ के ख़ेमे, और आज तथाकथित अमेरिका-विरोधी ख़ेमे), या “बहुध्रुवीयता” जैसे अमूर्त लक्ष्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को प्राथमिकता देकर अपनी नीति तय करते हैं, तब वे सी॰पी॰आई॰ की 1942 की गलती को दोहराते हैं.                                         

अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के वामपंथी फ़र्ज़ के ऊपर कथित ‘राष्ट्रीय प्राथमिकता’ को वरीयता देने; इन दोनों ज़िम्मेदारियों के बीच एक काल्पनिक विरोधाभास करने के इस सोच की जड़ क्या है? यह मार्क्सवादी अंतर्राष्ट्रीयतावाद को यथार्थवादी/रियलपॉलिटिक वाले कथित ‘राष्ट्रीय हित’ से धुंधला करने का नतीजा है. अंतर्राष्ट्रीय जगत में न्याय और लोकतंत्र के लिए संघर्ष से परे एक निरपेक्ष “राष्ट्रीय हित” की जिस ग़लत अवधारणा को वामपन्थ ने राष्ट्र राज्य पर लागू किया – उसी को राष्ट्र की वामपंथी पार्टियों ने खुद पर ही लागू कर लिया है. यह फ़ॉर्म्युला इस सहज सच्चाई को ढँक देती है: कि अपने देश में न्याय की लड़ाई को पूरी दुनिया में न्याय की लड़ाई से अलग नहीं किया जा सकता. दुनिया के मज़दूरों को एक होने का कॉम्युनिस्ट घोषणापत्र का आह्वान में फ़ुटनोट में नहीं लिखा गया था, “कंडिशंज़ अप्लाई”. बर्तोल्त ब्रेश्‍त ने लिखा था, “उत्पीड़ित का उत्पीड़ित के लिए साझीदारी अपरिहार्य है: यह दुनिया की एक मात्र आशा का किरण है.” भारत के उत्पीड़ित, चीन या यूक्रेन या ईरान या फ़िलिस्तीन के उत्पीडितों के साथ अपनी साझीदारी को “अपने राष्ट्रीय हित” या “बहुध्रुवीयता”  के गणित के हिसाब से नाप-तौल कर, कंजूसी करके देंगे, तो दुनिया के इस आशा के किरण की लौ के बुझने का ख़तरा पैदा करते हैं.

मार्टिन लूथर किंग जूनियर के शब्दों में “अन्याय कहीं भी हो हर जगह न्याय के लिए एक खतरा है.” इसी उसूल पर क़ायम होते हुए, किंग ने वियतनाम युद्ध का विरोध किया, जबकि उनके सभी सलाहकारों ने उनसे कहा था कि इस आलोकप्रिय और विवादाग्रस्त पज़िशन को लेना, अफ़्रिकाइ अमेरिकन लोगों के लिए न्याय की उनकी लड़ाई की “राष्ट्रीय प्राथमिकता” को कमजोर करेगी. हम दूसरों के संघर्षों को देखने के लिए एक विकृत खेमेबंदी वाले चश्मे को चुनते हैं, तो हम अपने ही लोकतांत्रिक संघर्षों को कमजोर करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय जगत में हमें एकध्रुवीयता और बहुध्रुवीयता – इन दो विकल्पों में से किसी एक को चुनना है, यह एक ग़लत अवधारणा है. हर हालत में, हमारे सामने विकपल स्पष्ट हैं: या तो हम उत्पीड़ितों के संघर्ष और अस्तित्व का समर्थन कर सकते हैं – या फिर हम (बहुध्रुवीयता के अमूर्त और भ्रामक लक्ष्य के बहाने) उत्पीड़क के अस्तित्व और सत्ता के बने रहने की चिंता कर सकते हैं. देश में और देश से बाहर, हमें उत्पीड़ित लोगों का न्याय और लोकतंत्र के लिए संघर्ष का पक्ष चुनना है; और इस संघर्ष के हर पहलू पर उत्पीडितों के स्वतंत्र निर्णयों  का पक्ष चुनना – इसमें किसी दुविधा के लिए जगह नहीं है.     

जब दुनिया या भारत के वामपंथ का कोई भी महतपूर्ण धारा, ‘बहुध्रुवीय दुनिया’ के नाम पर रूस, चीन, भारत, ईरान आदि के समर्थन को अपना फ़र्ज़ मान लेता है, तब इन निज़ामों द्वारा किये जा रहे जनसंहार से खुद को बचाने के लिए लड़ रहे लोगों को समर्थन देने के अपने वास्तविक फ़र्ज़ में वह चूक जाता है. ऐसे संघर्षों की माल एवं सैन्य सहायता से अमेरिका को होने वाले किसी भी फायदे की तुलना में संघर्ष कर रहे लोगों को मिलने वाला लाभ में चुनाव सिर्फ़ जनसंहार का मुक़ाबला करने वाले वे लोग ही कर सकते हैं. हमें याद रखना चाहिए कि द्वितीय विश्वयुद्ध में नाज़ी जर्मनी को हराने में सोवियत संघ ने हक़ से अमेरिका (और उपनिवेशवादी ब्रिटेन) से माल एवं सैन्य सहायता माँगा था. इस सहायता ने उस जीत में काफ़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, पर सोवियत संघ ने जितनी सहायता की उम्मीद की थी, उससे कम ही मिला था. कुछ ऐसी ही माँगे और शिकायतें यूक्रेन आज कर रही है. पूतिन ने अन्य तानाशाही और चरम-दक्षिणपंथी/फ़ासीवादी ताक़तों के साथ मिलकर दुनिया से लोकतंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकने के अपने लक्ष्य की घोषणा की है, और इसे अनसुना करना या मज़ाक़ में उड़ाना बहुत ही बड़ी भूल होगी. पूतिन दुनिया के चरम-दक्षिणपंथी और साम्प्रदायिक तानाशाहों में से सबसे अमीर हैं, और इस अपार धन से वे समान-विचारधारा वालों को फंड कर रहे हैं. उनके इस ख़तरनाक अजेंडा और दुनिया के बीच, यूक्रेन के लोगों की बहादुर लड़ाई ही खड़ी है. उसके समर्थन में दुविधा या कंजूसी की कोई जगह कैसे हो सकती है?    

निरंकुश व्यवस्थाएं उनसे संघर्ष कर रहे लोगों को दुनिया भर में मिलने वाले समर्थन को अपनी संप्रभुता में विदेशी या साम्राज्यवादी ‘हस्तक्षेप’ के रूप में देखती हैं. जब हम वामपंथी लोग भी यही करते हैं तो हम उन निरंकुशों के सहायक और समर्थक की भूमिका निभाते हैं. जिंदगी और मौत से जूझ रहे लोग हमसे चाहते हैं कि वे कैसी नैतिक/माल/सैन्य सहायता को मांगें/स्वीकारें/नकारें यह तय करने की उनकी स्वायत्तता और संप्रभुता का हम सम्मान करें. वैश्विक और भारतीय वामपंथ के नैतिक कम्पास के बिगड़ने से वह अपनी राह से भटक कर निरंकुशों की भाषा का प्रयोग करने वाले विध्वंसक रास्ते पर पहुँच गया है – इस नैतिक कम्पास को रीसेट करके सुधारने में कोई देर नहीं होनी चाहिए. 

[लेखक की तरफ़ से पाठक के नाम एक संक्षिप्त परिशिष्ट:

आप अगर इस लेख को पढ़ते हुए इसके अंत तक पहुँचे हैं तो मैं आपकी आभारी हूँ. अब आपसे मैं एक और विनती करने का दुस्साहस कर रही हूँ. पिछले वर्ष तक मैं भाकपा माले की पोलित ब्यूरो की सदस्य थी; तीन दशकों से इस पार्टी की कार्यकर्त्ता रही. जिन सवालों को आपने इस लेख में पढ़ा है, मेरा इन सवालों पर पार्टी और वाम आंदोलन की दिशा को लेकर, पार्टी में रहकर बहस चलाना, पार्टी को नामंज़ूर था. इसकी वजह से मेरे और मेरी पार्टी के बीच एक बहुत भी पीड़ादायक अलगाव हुआ. इस लेख को पढ़कर आप खुद ही तय करिए: क्या इस बहस के लिए वाम दलों और वाम आंदोलन, और व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलन में कोई जायज़ जगह नहीं होना चाहिए? इन सवालों पर बहस होने पर क्या भारत के वाम को या फ़ासीवादविरोधी आंदोलन को नुक़सान होगा? या इस बहस से भारत और पूरी दुनिया में लोकतंत्र के लिए लड़ाइयाँ मज़बूत होंगी? इस सवाल को आपके हवाले कर के आप से अभी के लिए अलविदा लेती हूँ. फिर संघर्षों और बहसों में मिलेंगे. – सादर, कविता कृष्णन]     

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