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बड़े नोटों का रद्दीकरण – छिपकली की पूंछ पकड़ने के लिए विशाल पिंजरा – राजिंदर चौधरी

Guest post by RAJINDER CHUDHARY

 

1946 और 1978 में भी प्रचलित बड़े नोटों को रद्ध किया गया था। इस लिए 8 नवंबर 2016 को मोदी सरकार द्वारा 500 और 1000 रुपये के प्रचलित नोटों को रद्ध करने का निर्णय आधुनिक काल में तीसरी बार उठाया गया कदम है। तीनों बार मुख्य लक्ष्य कालेधन को खत्म करना रहा है। लेकिन मोदी सरकार ने अपने निर्णय के पीछे एक नया कारण भी जोड़ा हैं। यह है नकली नोटों का बढ़ता चलन और इन के माध्यम से आतंकवाद का फलना-फूलना। रिज़र्व बैंक के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार 2015-16 के दौरान 1000 रुपये के नोटों में नकली नोटों का अनुपात 0.002262% था यानी 1000 के एक लाख नोटों में सवा दो नोट नकली पाये गए (इन में पुलिस एवं अन्य द्वारा पकड़े गए नकली नोट शामिल नहीं हैं)। 500 रुपये के नोटों में यह अनुपात 0.00167% था यानी 500 रुपये के 1 लाख नोटों में नकली नोटों की संख्या 2 से कम थी। जाहिर है ये सारे के सारे नकली नोट आंतकवादियों द्वारा जारी नहीं किए गए होंगे। विशुद्ध आर्थिक अपराधियों का भी इस में योगदान होगा। लेकिन अगर यह भी मान लें कि ये सारे के सारे नकली नोट आतंकवादियों द्वारा चलाये गए थे तो भी 2015-16 में रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 500 और 1000 के नकली नोटों की कुल कीमत 27.39 करोड़ रुपये बनती है (इन के अलावा 2015 में बीएसएफ़ ने 2.6 करोड़ रुपये के नकली नोट पकड़े थे)। इस से स्पष्ट है कि नकली नोट आतंकवाद की बुनियाद नहीं हो सकते। वैसे भी, इन नकली नोटों पर रोक लगाने के लिए इन नोटों को एकायक रद्ध करना न आवश्यक है और न पर्याप्त। अगर नोटों की छपाई को अधिक सुरक्षित नहीं बनाया गया, तो ‘आतंकवाद के समर्थक’ ताकतों, जो सामान्य अपराधी तो हैं नहीं, द्वारा नए नकली नोट छापना मुश्किल नहीं होगा। इस लिए अधिक सुरक्षित नोट छापना बेहद आवश्यक है।  नए, अधिक सुरक्षित नोट जारी करने के साथ, पुराने ‘असुरक्षित’ नोटों को बदलवाने के लिए एक समय सीमा रखी जा सकती थी। जैसा पहले भी किया गया है। 2005 से पहले के छपे नोटों को, जिन पर छपने का वर्ष अंकित नहीं होता था, उन्हें मई 2013 से पर्याप्त समय दे कर, बैंकों में जमा करा लिया गया है। यही प्रक्रिया दूसरे ‘असुरक्षित’ नोटों के साथ भी दोहराई जा सकती है। इस लिए नकली नोटों पर रोक लगाने के लिए सारे नोटों को रद्ध करना आवश्यक नहीं था। Continue reading बड़े नोटों का रद्दीकरण – छिपकली की पूंछ पकड़ने के लिए विशाल पिंजरा – राजिंदर चौधरी

जनता की महालूट का तमाशा अनवरत जारी है ! : अनुराग मोदी

Guest post by ANURAG MODI

हमारा विकास का मॉडल और हमारी राजनीति,  सविंधान कि मूलभावना के ही विपरीत है. सविधान में जहाँ, समाजवादी  गणराज्य की स्थापना, जिसमे हर नागरिक को आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक बराबरी के अधिकार होंगे, की बात है. हमारी राजनीति, यह भूल गई विकास के वैकल्पिक मॉडल के बिना न तो समाजवाद आएगा, और न ही राजनैतिक और सामाजिक और आर्थिक बराबरी स्थापित होगी. बल्कि, हम पिछले ६६ सालों से विकास की मृग-मरीचिका के पीछे भागते रहे, और देश के संसाधन की महालूट का तमाशा अनवरत ज़ारी रहा; जिसके चलते 1% लोगों के हाथों में देश के संसाधन से उपजी कमाई जमा हो गई. और देश की आम-जनता, विकास और राजनीति के हाशिए पर तमाशबीन बनी खडी रही.

यह स्थीति पिछले 10 सालों (2001-11) में और बिगड़ी है : कृषी प्रधान देश होने के बावजूद, 2,70, 940 किसानों ने  आत्महत्या कर ली; जितने लोग रोजगार में लगे हो उससे ज्यादा बेरोजगार हो; गैरबराबर बढी हो;शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सड़क, यहाँ-तक की राशन जैसी सामाजिक सुरक्षा के कामों से सरकार गायब हो गई- उसे निजी हाथों में दे दिया हो. Continue reading जनता की महालूट का तमाशा अनवरत जारी है ! : अनुराग मोदी