New Politics of Our Times and Post-Capitalist Futures

An earlier version of this essay was published in Outlook magazine

“The young students are not interested in establishing that neoliberalism works – they’re trying to understand where markets fail and what to do about it, with an understanding that the failures are pervasive. That’s true of both micro and macroeconomics. I wouldn’t say it’s everywhere, but I’d say that it’s dominant.
“In policymaking circles I think it’s the same thing. Of course, there are people, say on the right in the United States who don’t recognise this. But even many of the people on the right would say markets don’t work very well, but their problem is governments are unable to correct it.”
Stiglitz went on to argue that one of the central tenets of the neoliberal ideology – the idea that markets function best when left alone and that an unregulated market is the best way to increase economic growth – has now been pretty much disproved. Read the full report by Will Martin here

One often hears over-zealous warriors of neoliberalism say of Leftists that they live in a time- warp; that the world has long changed and that the disappearance of state-socialism has finally proved that all their beliefs were little more than pipe-dreams. They talk as though history came to an end with the collapse of actually existing socialisms and the global ascendance of neoliberalism in the early 1990s. As though all thought came to an end; as if the distilled essence of everything that could ever be thought, or need be thought, was already encapsulated in the neoliberal dogma.

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मारूति-सुजुकि मज़दूरों को उम्र कैद व अन्य नाजायज सजाओं के खिलाफ़ पंजाब में उठी जोरदार आवाज़: लखविन्दर

अतिथि post: लखविन्दर

मारूति-सुजुकि मज़दूरों को उम्र कैद व अन्य नाजायज सजाओं के गुड़गांव अदालत के फैसले को घोर पूँजीपरस्त, पूरे मज़दूर वर्ग व मेहनतकश जनता पर बड़ा हमला मानते हुए पंजाब के मज़दूरों, किसानों, नौजवानों, छात्रों, सरकारी मुलाजिमों, जनवादी अधिकारों के पक्ष में आवाज उठाने वाले बुद्धिजीवियों व अन्य नागरिकों के संगठनों ने व्यापक स्तर पर आवाज़ बुलन्द की है। 4 और 5 अप्रैल को देश व्यापी प्रदर्शनों में पंजाब के जनसंगठनों ने भी व्यापक शमूलियत की है। विभिन्न संगठनों ने व्यापक स्तर पर पर्चा वितरण किया, फेसबुक, वट्सएप पर प्रचार मुहिम चलाई। अखबारों, सोशल मीडिया आदि से इन गतिविधियों की कुछ जानकारी प्राप्त हुई है।

​5 अप्रैल को लुधियाना में लघु सचिवालय पर डीसी कार्यालय पर टेक्सटाईल-हौजऱी कामगार यूनियन, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कर्ज यूनियनें, मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान, नौजवान भारत सभा, पी.एस.यू., एटक, सीटू, एस.एस.ए.-रमसा यूनियन, पेंडू मज़दूर यूनियन, डी.टी.एफ., रेलवे पेन्शनर्ज वेल्फेयर ऐसोसिएशन, जमहूरी अधिकार सभा, आँगनवाड़ी मिड डे मील आशा वर्कर्ज यूनियन, कामागाटा मारू यादगारी कमेटी, स्त्री मज़दूर संगठन, कारखाना मज़दूर यूनियन, पेंडू मज़दूर यूनियन (मशाल), कुल हिन्द निर्माण मज़दूर यूनियन आदि संगठनों के नेतृत्व में जोरदार प्रदर्शन हुआ और राष्ट्रपति के नाम माँग पत्र सौंपा गया जिसमें माँग की गई कि सभी मारूति-सुजुकि के सभी मज़दूरों को बिना शर्त रिहा किया जाए. उनपर नाजायज-झूठे मुकद्दमे रद्द हो, काम से निकाले गए सभी मज़दूरों को कम्पनी में वापिस लिया जाए।


​लुधियाना में 5 अप्रैल के प्रदर्शन की तैयारी के लिए हिन्दी और पंजाबी पर्चा वितरण भी किया गया जिसके जरिए लोगों को मारूति-सुजुकि मज़दूरों के संघर्ष, उनके साथ हुए अन्याय, न्यायपालिका-सरकार-पुलिस के पूँजीपरस्त और मज़दूर विरोधी-जनविरोधी चरित्र से परिचित कराया गया और प्रदर्शन में पहुँचने की अपील की गई। लुधियाना में 16 मार्च को भी बिगुल मज़ूदर दस्ता, मोल्डर एण्ड स्टील वर्कर्ज यूनियनों, मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान, आदि संगठनों द्वारा रोषपूर्ण प्रदर्शन किया गया था।

​जमहूरी अधिकार सभा, पंजाब द्वारा बठिण्डा व संगरूर में 4 अप्रैल, बरनाला में 8 अप्रैल को, लुधियाना में 1 अप्रैल को पिछले दिनों देश की अदालतों द्वारा हुए तीन जनविरोधी फैसलों मारूति-सुजुकि के मज़दूरों को उम्र कैद व अन्य सजाएँ, जनवादी अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. साईबाबा सहित अन्य बेगुनाह लोगों को उम्र कैद की सजाओं, और हिन्दुत्वी आतन्कवादी असीमानन्द को बरी करने के मुद्दों पर कन्वेंशनें, सेमिनार, प्रदर्शन, मीटिंगें आदि आयोजित किए गए जिनमें अन्य जनसंगठनों नें भी भागीदारी की। जमहूरी अधिकार सभा ने इन मुद्दों पर एक पर्चा भी प्रकाशित किया जो बड़े स्तर पर पंजाब में बाँटा गया।

 पटियाला में 4 अप्रैल को मज़दूरों, छात्रों, किसानों के विभिन्न संगठनों द्वारा रोष प्रदर्शन किया गया। बिजली मुलाजिमों ने भी टेक्नीकल सर्विसज़ यूनियन के नेतृत्व में 4 अप्रैल को अनेकों जगहों पर प्रदर्शन किए। लहरा थरमल पलांट के ठेका मज़दूरों ने 4 अप्रैल को रोष रैली के जरिए मारूति-सुजुकि मज़दूरों के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए उनके समर्थन में आवाज़ उठाई। मारूति-सुजुकि मज़दूरों के समर्थन में पंजाब में उठी आवाज़ की कड़ी में लोक मोर्चा पंजाब ने 8 अप्रैल को लम्बी (जिला बठिण्डा) में रैली और रोष प्रदर्शन किया। लम्बी में आर.एम.पी. चिकित्सकों द्वारा भी प्रदर्शन किया गया। अनेकों गाँवों में मज़दूर-किसान-नौजवान संगठनों ने अर्थी फूँक प्रदर्शन भी किए हैं। आप्रेशन ग्रीन हण्ट विरोधी जमहूरी फ्रण्ट, पंजाब ने मोगा में 12 अप्रैल को कान्फ्रेंस और प्रदर्शन आयोजित किया।

मारूति-सुजुकि मज़दूरों का जिस स्तर पर कम्पनी में शोषण हो रहा था और इसके खिलाफ़ उठी आवाज़ को जिस घृणित बर्बर ढंग से कुचलने की कोशिश की गई है उसके खिलाफ़ आवाज़ उठनी स्वाभाविक और लाजिमी थी। पंजाब के इंसाफपसंद लोगों का हक, सच, इंसाफ के लिए जुझारू संघर्षों का पुराना और शानदार इतिहास रहा है। अधिकारों के जूझ रहे मारूति-सुजुकि मज़दूरों का साथ वे हमेशा निभाते रहेंगे।

पूरे देश में मज़दूरों का देशी-विदेशी पूँजीपतियों द्वारा भयानक शोषण हो रहा है। जब मज़दूर आवाज़ उठाते हैं तो पूँजीपति और उनका सेवादार पूरा सरकारी तंत्र दमन के लिए टूट पड़ता है। ऐसा ही मारूति-सुजुकी, मानेसर (जिला गुडग़ांव, हरियाणा) के संघर्षरत

 मज़दूरों के साथ हुआ है। एक बहुत बड़ी साजिश के तहत कत्ल, इरादा कत्ल जैसे पूरी तरह झूठे केसों में फँसाकर पहले तो 148 मज़दूरों को चार वर्ष से अधिक समय तक, बिना जमानत दिए, जेल में बन्द रखा गया और अब गुडग़ाँव की अदालत ने नाज़ायज ढंग से 13 मज़दूरों को उम्र कैद और चार को 5-5 वर्ष की कैद की कठोर सजा सुनाई है। 14 अन्य मज़दूरों को चार-चार साल की सजा सुनाई गई है लेकिन क्योंकि वे पहले ही लगभग साढे वर्ष जेल में रह चुके हैं इसलिए उन्हें रिहा कर दिया गया है। 117 मज़दूरों को, जिन्हें बाकी मज़दूरों के साथ इतने सालों तक जेलों में ठूँस कर रखा गया उन्हें बरी करना पड़ा है। सबूत तो बाकी मज़दूरों के खिलाफ़ भी नहीं है लेकिन फिर भी उन्हें जेल में बन्द रखने का बर्बर हुक्म सुनाया गया है।

​जापानी कम्पनी मारूति-सुजुकि के खिलाफ़ मज़दूरों ने श्रम अधिकारों के उलण्घन, कमरतोड़ मेहनत करवाने, कम वेतन, लंच, चाय, आदि की ब्रेक के बाद एक मिनट के देरी के लिए भी आधे दिन का वेतन काटने, छुट्टी करने के लिए हजारों रूपए वेतन से काटने जैसे भारी जुर्माने लगाने, आदि के खिलाफ़ कुछ वर्ष पहले संघर्ष का बिगुल बजाया था। कम्पनी की दलाल तथाकथित मज़दूर यूनियन की जगह उन्होंने अपनी यूनियन बनाई। नई यूनियन के पंजीकरण में कम्पनी ने ढेरों रूकावटें खड़ी कीं। उस समय हरियाणा में कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा ने सरेआम पूँजीपतियों की दलाली का प्रदर्शन करते हुए कहा था कि कारखाने में नई यूनियन नहीं बनने दी जाएगी। मज़दूरों ने लम्बी-लम्बी हड़तालें लड़ीं, अपने अथक संघर्ष से यूनियन का पंजीकरण कराके जीत हासिल की। मज़दूर संघर्ष कम्पनी और समूचे सरकारी तंत्र की आँख की किरकरी बना हुआ था। संघर्ष कुचलने के लिए साजिश रची गई। 18 जुलाई 2012 को कारखाने के भीतर पुलीस की हाजिरी में सैंकड़ों हथियारबन्द गुण्डों से मज़दूरों पर हमला करवाया गया। बड़ी संख्या मज़दूर जख्मी हुए। कारखाने में आग लगवा दी गई। एक मज़दूर पक्षधर मैनेजर की इस दौरान मौत हो गई। साजिश के तहत इसका दोष मज़दूरों पर मढ़ दिया गया। बड़े स्तर पर गिरफतारियाँ की गईं, यातनाएँ दी गईं। ढाई हज़ार मज़दूरों को गैरकानूनी रूप से नौकरी से निकाल दिया गया। 148 मज़दूरों को जेल में ठूँस दिया गया। जमानत की अर्जी पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर जमानत दी गई तो भारत में विदेशी पूँजी का निवेश रुकेगा। जिन 13 मज़दूरों को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है उनमें 12 लोग यूनियन नेतृत्व का हिस्सा थे। इससे इस झूठे मुकद्दमे का मकसद समझना मुश्किल नहीं है।

अदालत का फैसला कितना अन्यायपूर्ण है इसका अन्दाजा लगाने के लिए सिर्फ कुछ तथ्य ही काफ़ी हैं। कम्पनी में चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे हुए हैं लेकिन अदालत में कहा कि उसके पास 18 जुलाई काण्ड की कोई वीडियो है ही नहीं! कम्पनी के गवाहों के ब्यानों से साफ पता चल रहा था कि झूठ बोल रहे हैं। वो तो मज़दूरों को पहचान तक न सके। गुण्डों व उनका साथ देने वाले मैनेजरों व अन्य स्टाफ के मैंबरों से कहीं अधिक संख्या में मज़दूर जख्मी हुए थे। पोस्ट मार्टम में पाया गया कि मैनेजर अवनीश कुमार की मौत दम घुटने से हुई है न कि जलाए जाने से जिससे साफ़ है कि यह हत्या का मामला है ही नहीं। और भी बहुत सारे तथ्य स्पष्ट तौर मज़दूरों का बेगुनाह होना साबित कर रहे थे लेकिन इन्हें अदालत ने नजरान्दाज कर मज़दूरों को ही दोषी करार दे दिया क्योंकि पूँजी निवेश को बढ़ावा जो देना है! वास्तव में मारूति-सुजुकी घटनाक्रम के जरिए लुटेरे हुक्मरानों ने ऐलान किया है कि अगर कोई लूट-शोषण के खिलाफ़ बोलेगा वो कुचला जाएगा।

ये फैसला तब आया है जब असीमानन्द और अन्य संघी आतन्कवादियों के खिलाफ ठोस सबूत होने, असीमानन्द द्वारा जुर्म कबूल कर लेने के बावजूद भी बरी कर दिया जाता है। दंगे भड़काने वाले, बेगुनाहों का कत्लेआम करने वाले न सिर्फ आज़ाद घूम रहे हैं बल्कि मुख्य मंत्री, प्रधान मंत्री जैसे पदों पर पहुँच रहे हैं !

आज देशी-विदेशी कम्पनियों, लुटेरे धन्नासेठों को खुश करने के लिए सरकारें मज़दूरों से सारे श्रम अधिकार छीन रही हैं। न्यूनतम वेतन, फण्ड, बोनस, हादसों से सुरक्षा के इंतजाम तक लागू न करने वाले पूँजीपतियों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, उन्हें कभी जेल में नहीं ठूँसा जाता। उलटा भाजपा, कांग्रेस से लेकर तमाम पार्टियों की सरकारें कानूनी श्रम अधिकारों में मज़दूर विरोधी बदलाव करके पूँजीपतियों को मज़दूरों की बर्बर लूट की और भी खुली छूट दे रही हैं। किसानों, छात्रों, नौजवानों, आदिवासियों, सरकारी कर्मचारियों के अधिकार कुचले जा रहे हैं। भोजन, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी, आदि तमाम सरकारी सहूलतें छीनी जा रही हैं। इसके खिलाफ़ उठी हर आवाज को दबाने के लिए पूरा राज्य तंत्र अत्याधिक हमलावर हो चुका है। काले कानून बनाकर एकजुट संघर्ष के जनवादी अधिकार छीने जा रहे हैं। जनपक्षधर बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, कलाकारों तक का दमन हो रहा है, जेलों में ठूँसा जा रहा है। जन एकजुटता को तोडऩे के लिए धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर बाँटने की साजिशें पहले किसी भी समय से कहीं अधिक तेज़ हो चुकी हैं। जहाँ जनता को बाँटा न सके, जहाँ लोगों का ध्यान असल मुद्दों से भटकाया न जा सके, वहाँ जेल, लाठी, गोली से कुचला जा रहा है। यही मारूति-सुजुकी मज़दूरों के साथ हुआ है। लेकिन बर्बर हुक्मरानों को दीवार पर लिखा पढ़ लेना चाहिए। इतिसाह गवाह है- जेल, लाठी, गोली, बर्बर दमन जनता की अवाज़ न कभी दबी है न कभी देबेगी।

India’s Health Policy: A long tale of underachievement – Prakash Gupta

This is a guest post by PRAKASH GUPTA

 

Health has been the most neglected policy domain in India.The fact that India made it first National policy on Health in 1983, 36 years after independence itself reflects the level of priority for the state. India’s health policy, health financing in particular, suffers from ‘shifting goal posts’ phenomenon. Continue reading “India’s Health Policy: A long tale of underachievement – Prakash Gupta”

Victory of Anti-Posco Struggle

People United Shall Always Be Victorious !

(Photo Courtesy : The Hindu)

Big news – at times – go completely unnoticed.

(Thanks to the mediatised times we are passing through)

And thus it did not appear surprising that the decision by Posco, the South Korean steelmaker, the fourth biggest in the world, to exit the proposed 12 million-tonnes a year steel plant in Odisha did not cause much flutter. Yes, newspapers duly reported POSCO India’s ‘request to the Odisha government to take back the land provided to it near Paradip’ where it was supposed to invest 52,000 crore Rs.’ The letter stated company’s ‘failure to start work on the proposed plant’.

Perhaps none from the media wanted to showcase a negative example which is at variance with the efforts by the powers that be to project the idea of ‘ease of doing business’ here. Undoubtedly at a time when the government is keen to attract foreign capital and inducing it in very many ways, the way in which a Corporate Major – supposed to be one of the leading in the steel sector – had to exit from its project can easily shake their confidence about investing here. Continue reading “Victory of Anti-Posco Struggle”

Free the Maruti Workers: Maruti Suzuki Workers Union

 

Guest Post by Maruti Suzuki Workers’ Union

[This is a statement and an appeal by the Maruti Suzuki Workers Union condemning the unjust handing down of a life sentence to 13 workers of the Maruti Suzuki Manesar Factory for a ‘murder’ (of an HR Manager) that the prosecution could not prove that they had committed. Here too, the prosecution, and the judgement, relies on a chimera, ‘the reputation of make-in-india’ to justify a harsh punishment. Those who have watched this space will recognize that this recourse to figures of speech in the absence of evidence is a familiar move. It has happened before – to satisfy the hunger of a ‘collective conscience’ when a so-called ‘temple of democracy’ was attacked. This time it has been invoked to defend the ‘fake-in-India temple that houses the deity of a rising GDP’, which would of course otherwise be besieged by insurgent workers.

This text contains a hyperlink to a detailed reading and rebuttal of the prosecution’s arguments, which demonstrates how money and muscle power can always be an adequate replacement for legal acumen in the State of Haryana. Please do follow that link. For the further edification of our readers, we append a short video interview by Aman Sethi of the Hindustan Times of the special public prosecutor, which spins some imaginative legal theory and also radically updates our sense of class struggle. Please do have the patience to view that video. We promise that this will be rewarded. – Kafila Admin.]

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Hail the Students’ Struggle for its Victory in the Battle against Corporate Publishers : New Socialist Initiative

Guest Post by New Socialist Initiative (Delhi Chapter)

On 9 March 2017 three well-established academic corporate publishing houses, Oxford University Press, Cambridge University Press and Taylor and Francis withdrew their copyright suit filed in the High Court against Delhi University and Rameshwari Photocopy Shop, a shop stationed at the Delhi School of Economics campus in Delhi University licensed by the University to carry out photocopying work. The suit that was filed in August 2012 on the grounds that photocopying material from books published by the above three publishers by university students, particularly in the compilation of coursepacks, constituted copyright infringement and revenue loss to the publishers. Right from the beginning it was clear this case was treated as a test case to instate a licensing regime, much like one that exists in the US and other First World countries.
Being the absolute primary constituency to be impacted by such a case and its possible outcomes, students of Delhi University were amongst the first to take up the battle against some of the most powerful publishing houses in academia. The ‘Campaign to Save D.School Photocopy Shop’ soon became the ‘Association of Students for Equitable Access to Knowledge’ (ASEAK), reflecting the growing politicisation of the student community on the issue of the knowledge commons in order to resist an increasing attempt across the world to create a market out of it where it didn’t as yet exist. This can be seen in the case of Costa Rica as well where there was an attempt to make photocopying illegal, a move that was successfully opposed on a massive scale by students.
The students of Delhi University, organised as ASEAK, opposed the move through a range of mechanisms, mobilising students from class to class, organising public meetings, taking out protest rallies, campaigning against these publishers at the annual World Book Fair held in New Delhi, influencing public opinion through writing in newspapers, and last but not the least, taking up the legal battle in the courts. NSI hails the struggle of the students that brought to the centre of the debate questions of equity and justice within the arena of production and distribution of knowledge resources, challenging the private property regime sought to be implemented in the sphere of knowledge production by these big academic corporate publishing houses. 
For the last few years the primary site of the battle has been in the High Court at New Delhi. The publishers have received repeated blow after blow in this process as well, leading to their final withdrawal of the suit altogether. The win is a big victory and testament to the struggle of the students, backed by a legal team that has been seminal to the victory, along with support from the academic community. The case, that attempted to strike a ‘balance’ between private profits of the publishers and the rights of students to access materials in the pursuit of their education, has dealt a blow to precisely such a misconception that the two ‘interests’ are in fact of equal concern.
Along with students, who assert their right over the materials they access as part of their fundamental right to education, scholars, often the authors of these materials, have equally come out to state that there is no better reward for their work as intellectuals, as to be read by as many students as can get hold of their work, photocopied or otherwise. The emphasis of the corporate publishers in asserting absolute ownership over the works they publish, in a rare instance where the labour of writing a book is provided at no cost to the publishers, borne by universities, students’ fees and taxpayers’ money instead, is shameful and needs to be rejected at all cost.
NSI congratulates the students, lawyers, academics and concerned citizens who persisted in their resistance against the bullying tactics of big academic corporate publishing houses and calls on the academic community to engage with new ways of producing and sharing knowledge so as to create equitable, just and democratic structures of knowledge production.
EDUCATION OVER COPYRIGHT! KNOWLEDGE OVER PROFIT!

Gender Justice In Naga Society – Naga Feminist Reflections: Dolly Kikon

DOLLY KIKON in raiot.in

Dolly Kikon points out that Article 371 (A) is breached also in the ongoing coal mining operations and the oil exploration negotiations in Nagaland. Naga politicians, landowners, village councils, and business families have all interpreted the provision for their benefit to mine for minerals and not be held accountable for the environmental degradation. But it is only when women may enter the decision-making process (and potentially reverse such policies) that Article 371 suddenly becomes sacrosanct.

What is the meaning of gender? What is the meaning of Justice? Which comes first in Naga society and how do we understand it? Like many nationalist societies around the world, the issue of gender justice and rights have remained marginal for a long time. We were told that issues like women’s rights or gender justice could wait till the Naga people gained their freedom. In that context, what did it mean to bestow any kinds of rights on women in Naga society? When terms like gender ‘rights’ and ‘equality’ remains extremely resentful terms for a larger section of powerful Naga traditional bodies, they become meaningless words. I ask these questions in relation to the opposition against 33% reservation that escalated into a violent protest and brought the entire state of Nagaland to a standstill recently. If Naga customary law is seen as the foundation of justice, the exclusion of women from these powerful decision making-bodies negates the entire notion that these are pillars of justice. The Indian state and the male traditional bodies alike are responsible for excluding the Naga women from all spheres of representative political processes. Article 371 (A) is a prime example of the patriarchal nature of the Indian constitution that bestows the Naga male bodies to have full authority and power to interpret customary affairs covering social, religious, and criminal cases.