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भगत सिंह और आज का नौजवान: अपूर्वानंद

कभी कभी हर समाज में ऐसे क्षण  आते हैं जब उसे अपने अस्तित्व के तर्क की पड़ताल करनी पड़ती है. उस समय वह अपने किन बौद्धिक संसाधनों का प्रयोग करता है और किन स्रोतों से तर्क की सामग्री जुटाता है, यह  काफी महत्वपूर्ण है.क्या एक समाज के रूप में भारत के लिए अभी ऐसा ही कोई क्षण उपस्थित हो गया है? एक ऐसा तबका है जो भारत नामक किसी एक सामाजिक इकाई के बौद्धिक औचित्य को ही नहीं मानता. उसकी बात जाने दें.भारत अभी भी अनेकानेक लोगों के लिए एक यथार्थ है जिसकी अपनी भावनात्मक और बौद्धिक वैधता है.वे उसे बार-बार समझने और अपने लिए आयत्त करने की कोशिश करते हैं.इस क्रम में वे किनकी ओर  देखते हैं? Continue reading भगत सिंह और आज का नौजवान: अपूर्वानंद