युद्ध के रूपक का जाल

अपने नए बंद के दौरान सी.पी.आई.( माओवादी) ने छत्तीसगढ़ और बंगाल में अर्ध-सैन्य बल के सदस्यों के साथ बस में सफ़र कर रहे साधारण ग्रामीणों की हत्या करने के बाद जो बयान दिया है उससे यह साफ़ है कि अभी शायद इससे भी क्रूरतापूर्ण कार्रवाइयां देखने को मिल सकती हैं. उनके प्रवक्ता ने कहा कि उन्होंने पहले ही छतीसगढ़ के ग्रामीणों को यह बता दिया था कि उन्हें इस युद्ध की विशेष परिस्थिति में क्या करना है और क्या नहीं करना है. मसलन, पुलिस या सैन्य बल के लोगों के साथ किसी भी तरह का कारोबार या सामजिक व्यवहार प्रतिबंधित है, उनके साथ किसी सवारी गाडी में सफ़र नहीं करना है. इसके आगे उनसे यह भी कहा गया है कि उन्हें पुलिस या सैन्य बल की गतिविधियों पर नज़र रखनी है, उनके पास हथियारों का अंदाज़ करना है और इसकी खबर जनता सरकार को देते रहना है. इस दल के प्रवक्ता ने कहा कि साधारण लोगों का मारा जाना अफसोसनाक है लेकिन एक तरह से वे खुद इसके लिए जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने चेतावनी का उल्लंघन किया था.

प्रवक्ता ने कहा कि वे एक युद्ध लड़ रहे हैं और इसमें ऐसी घटनाओं से बचना मुश्किल है. एक साल पहले माओवादियों के समर्थक कवि वरवर राव ने साधारण लोगों के मारे जाने के बारे में पूछे जाने पर कहा था कि यह महज ब्योरे हैं.

इसका अर्थ यह है कि जिन माओवादियों के बारे में एक हिस्से की यह समझ रही है कि वे दरअसल आदिवासी ही हैं जो अपनी जमीन और संसाधन छीने जाने पर उठ खड़े हुए हैं, उन्हें अपनी राय बदलनी होगी. माओवादियों ने दंतेवाड़ा को अपना क्षेत्र घोषित कर दिया है इसलिए वहां उनका क़ानून चलेगा. आदिवासियों को इस नयी सरकार के मुताबिक़ चलना होगा. तर्क वही हैं जो पुलिस देती रही है या जो वह अभी देगी जब उससे उस एक ग्रामीण की ह्त्या के बारे में पूछा जाएगा जिसे उसने दो रोज़ पहले गिरफ्तार किया और अदालत में पेश करने के पहले ही गोली मार दी. कश्मीर हो या गुजरात या महाराष्ट्र , हर जगह ज्यादतियों पर सफाई देते हुए पुलिस तर्क देती है कि वह ऐसे शत्रु से लड़ रही है जिसका चेहरा उसे नहीं मालूम , इसलिए निशाने पर निर्दोषों के आने पर उसे बहुत घेरा नहीं जाना चाहिए. इससे उसका मनोबल भी गिरता है, इसलिए मानवाधिकार के प्रश्न उसे राष्ट्रविरोधी जान पड़ते हैं.

एक के लिए मानवाधिकार के प्रश्न राष्ट्रविरोधी हैं , दूसरे के लिए वर्ग-युद्ध के समय अप्रासंगिक. दोनों ही स्थितियों में सामान्य जन को अपने जीवन का अधिकार खो देना होता है. मसलन अगर एक गाँव के पास विस्फोट होता है तो शक की बिना पर उसके ग्रामीणों को जेल में डाला जा सकता है, उसी तरह अगर उसके आस-पास माओवादी गिरफ्तार होते हैं या मारे जाते हैं तो ज़रूर गाँव के भीतर से ही खबर गयी होगी , इस शक पर मुखबिरों की पहचान करके उन्हें उचित सज़ा दी जा सकती है.

साधारण परिस्थिति में शायद किसी भी सत्ता को यह अधिकार देने को हम तैयार न हों. लेकिन परिस्थिति अगर असाधारण हो? उदाहरण के लिए अगर राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में हो? ऐसी हालत में क्या हमने संसद के दोनों सदनों का संयुक्त सत्र करके पोटा जैसा क़ानून लागू होते नहीं देखा जो सारे नागरिक अधिकारों को स्थगित कर देता था? फिर भी पोटा के खिलाफ अभियान चलाया गया और उसे वापस लेना पड़ा. राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न महत्वपूर्ण है फिर भी हम न तो ‘पोटा’ और ‘आफ्सा’ और न गैरकानूनी गतिविधि निरोधक क़ानून जैसे कानूनों को वैधता देते हैं. और यह बिलकुल ठीक है.इंग्लैण्ड में जब आतंकवाद के मुकाबले के लिए विश्वविद्यालयों में जासूसी का प्रस्ताव लाया गया ताकि संभावित खतरनाक नौजवानों पर नज़र रखी जाए तो वहां के नागरिकों ने उसका विरोध किया. यही परिपक्व जनतंत्र है.

फिर वर्ग युद्ध या जिसे दीर्घकालिक जन युद्ध कहा जा रहा है, उसके नाम पर अगर लोगों के जीवन के अधिकार का निर्णय कोई दल या समूह अपने हाथ में लेने की दलील पेश करे, भले ही वह अब तक की सबसे वैज्ञानिक विचारधारा के नाम पर ही क्यों न हो,तो क्या उसे स्वीकार कर लिया जाएगा?

कहा जा रहा है कि एक युद्ध चल रहा है. युद्ध में योद्धाओं का मारा जाना स्वाभाविक ही है. उस पर अफ़सोस क्या, पक्ष कोई भी हो? लेकिन सवाल जो नहीं किया जा रहा है कि हम इसे युद्ध क्यों मानें और युद्ध किसने छेड़ा. यह पता करना भी दिलचस्प होगा कि ‘जनता के विरुद्ध युद्ध’ जैसी आकर्षक अवधारणा कहाँ से आयी और इस पर बिना विचार किये क्यों स्वीकार कर लिया गया.

पिच्च्ले साल जब गृह मंत्री ने कहा कि माओवादी बहत्तर घंटे को हिंसा रोक दें तो बातचीत हो सकती है. इसकी खिल्ली उड़ाते हुए माओवादियों ने कहा कि जब वे राजनीति में आए नहीं थे तब से युद्ध चल रहा है. हम भले ही ऑपरेशन ग्रीन हंट को युद्ध की शुरुआत मानें, माओवादी इसकी शुरुआत इसे कम से कम चालीस साल पहले मानते हैं अगर और पीछे न जाते हों तो.

फिर हम किस युद्ध के रुकने की बात कर रहे हैं? ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ का रुकना युद्ध का अंतिम रूप से रुकना नहीं है. वह तो क्रान्ति होने और वास्तविक ‘नया लोकतांत्रिक राज्य’ स्थापित होने के साथ ही रुक सकता है. और वहां भी अंतिम पड़ाव नहीं होगा क्योंकि वर्ग शत्रु क्रान्ति के साथ ही समाप्त तो नहीं हो जाते, इसलिए यह युद्ध गुणात्मक रूप से नए स्तर पर पहुँच जाएगा. हर क्रान्ति का इतिहास यही है. और चूंकि जनता का राज्य चारों ओर से वर्ग-शत्रु राज्यों से घिरा होगा , जनता के दल को और उसके सेना को हमेशा असाधारण अधिकार चाहिए होंगे.

इस पूरे हिंसा चक्र पर स्थिर चित्त होकर हम विचार करें तो मालूम होगा कि युद्ध की इस शब्दावली को अस्वीकार किये बिना आगे बढना असंभव है. यह पूछ जाना चाहिए कि युद्ध किस भौगोलिक क्षेत्र में चल रहा है. इसकी सीमा कौन तय कर रहा है? क्या उड़ीसा , झारखंड , बंगाल, छत्तीसगढ युद्ध भूमि है और यहाँ युद्ध के रुकने की बात की जा रही है. फिर बिहार में जमुई में क्यों हत्याएं की गईं ? युद्ध की भौगोलिक सीमा क्या माओवादियों की सुविधा से तय के जा रही है?

इस पूरे घटना क्रम में कुछ बातों पर हम कभी विचार नहीं कर पाते क्योंकि दुहाई असाधारण परिस्थिति की दी जाती है. मसलन, बंगाल में जिन चार ग्रामीणों की ह्त्या कर दी गयी, उनके लिए जिम्मेदार अपराधियों को सजा देने या मारे गए लोगों के लिए न्याय के बारे में हमें क्या कहना है? या झारखंड में कॉँग्रेस के नेता हेमंत बेगे की ह्त्या के लिए उत्तरदायी की पहचान का प्रश्न या उड़ीसा में , छत्तीसगढ में मारे गए ग्रामीणों के लिए इन्साफ का सवाल?

ये विचारणीय नहीं क्योंकि ये हत्याएं तो युद्ध के दौरान हुई हैं! यह वैसा ही तर्क है जो छत्तीसगढ़ की पुलिस दे रही है जिसने पिछले साल बारह ग्रामीणों को मार डाला और इसे उचित ठहराने के लिए उन्हें माओवादी ठहरा दिया.

युद्ध का रूपक इस प्रकार माओवादियों के लिए सुविधाजनक है और छत्तीसगढ़ या बंगाल जैसी अक्षम पुलिस के लिए भी. माओवादी इसकी आड़ में अपने प्रभाव-विस्तार के लिए आतंक का सहारा लेने को युद्ध के नियम से जायज़ ठहरा सकते हैं जोकि वे कर रहे हैं.मसलन यह फरमान जारी करना कि आप किस दल में न रहें. उसी प्रकार जितने समय तक युद्ध का यह रूपक सामान्य भाषा व्यवहार पर हावी रहेगा पुलिस को अपने अक्षमता पर पर्दा डालने का बहाना रहेगा, कि वह बेचारी एक युद्ध लड़ रही है, एकाध योंही मौत हो तो हंगामा क्यों!

वस्तुतः युद्ध जितना हथियार से नहीं लड़ा जाता उतना भाषा में लड़ा जाता है. युद्ध को रूपक की श्रेणी से निकाल कर अभिधा बना देना पहली सफलता थी और इसमें माओवादी आगे रहे. यह अलग प्रश्न है मानवाधिकार के प्रश्न पर काम करने वाले या भाषा का ही कारोबार करने वाले लेखक इस भाषाई व्यूह में कैसे फँस गए . शायद इसका कारण यही हो कि सशस्त्र संघर्ष या युद्ध की अवधारणा इतिहास में हमेशा आकर्षण पैदा करती है. लोकतंत्र एक समय के बाद रोज़मर्रा के बाकी कामों के तरह का उबाऊ व्यापार बन जाता है और उसमें कोई उत्तेजना नहीं रह जाती. युद्ध खून में तेजी पैदा करता है.लेखक और कलाकारों को यह खासकर सम्मोहित करता है, हालांकि बाद में इस युद्ध से बनी सत्ता के शिकार वही होते हैं जिन्होंने इसके गीत गाये थे. इसलिए भी कि वे पर्याप्त रूप से सख्त नहीं होते और युद्ध आपसे अनंत काल तक और असीमित सख्ती की मांग करता है.

बहुत आश्चर्य नहीं कि नौजवान भगत सिंह ने फांसी का इंतज़ार करते हुए और उसके पहले भी यह बहुत साफ़ साफ़ कहा था कि सशस्त्र संघर्ष जन आन्दोलन से पीछे की अवस्था है. इसे उन्होंने पटाखेबाजी तक कहा था और यह भी कि ऐसे दुनिया में कोइ बड़ी तब्दीली नहीं लाई जा सकती. यह तो एक नौजवान ने, जो पच्चीस साल का भी नहीं हुआ था , समझ लिया था. तब से अब तक समय बहुत गुजर गया. सशस्त्र संघर्ष के जरिये जनता के नाम पर कायम राज्यों के बारे में काफी कुछ मालूम हो चुका . फिर भी अगर हम इस मिथ में विश्वास करते हैं तो इसका एक कारण शायद यही है कि मनुष्य साधारण गद्य की भाषा से अधिक चमत्कृत काव्यात्मक रूपकों से होता है!

2 thoughts on “युद्ध के रूपक का जाल”

  1. दरअस्ल, तथाकथित सिविल सोसाईटी ने कभी आदिवासियों के अधिकारों के बारे मे सोचा ही नहीं। माओवादियों ने बोलना शुरु किया तो सबकी आंखें खुलीं और बोलने लगे, माओवादियों के पक्ष में। मानो, उनके लिए बोलना आदिवासियों की हिमायत करने के बराबर हो। मुख्य सुर यह रहा कि सरकार को माओवादियों से बातचीत करनी चाहिए। हालांकि माओवादियों पर उनका कोई असर नहीं है। वे तो अपने तरीक़े से चलते हैं। वे एक सुलगती समस्या को युद्ध में तबदील करने में कामयाब रहे हैं। यह तो सरकार भी चाहती है, और इसे युद्ध का रूप दे देने से असली मुद्दा तो पीछे रह जाता है। एक दिन माओवादी अवश्य परास्त होंगे क्यों कि सरकार की हिंसा की शक्ति कई गुना ज़्यादा है। तब आदिवासियों के अधिकारों के बारे में कौन बोलेगा? क्या बौद्धिकों के पास कोई प्लैन है? हो भी नहीं सकता, क्यों कि हमने माओवादियों से हट कर सोचने की कोशिश ही नहीं की है।

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  2. Imageries of war dominating our minds is bad enough.
    One can only wish all peace loving people refused to be carried away by the rhetorics about ‘ internal threats’ and and rather took a look of the realities on the ground!
    But why does the govt think that 3.5 lakhs of tribal population should be forcibly cleared of their hearths, homes and lands in order to secure the corporates fabulous profits from mining ( eg; to the tune of Rs 5000 per MT of iron ore by paying a pittance like Rs 27 per MT to the coffers)? Why does this happen in the ‘largest democracy’ and no voice of opposition is ever heard in the state assemblies and the parliament ?Why do the entire legislative houses, ruling and the opposition fronts talk in ways approving of combined police/military operations for cleansing the villages/forests of the tribal inhabitants? Where has gone their love for peace? Whither has evaporated their sympathy and rosy imageries of the idyllic, peaceful ways and lives of forest dwellers?
    I believe that a democratic system of governance genuinely preoccupied with making peace with the support of the civil society backing it, could still intervene by meaningful dialogues with all who have stake in peace, rather than war.
    The UPA Govt has yet to show that its main concern is not war, but peace. Maoists or no Maoists, this preference is betrayed in umpteen ways. Its soft attitude to the hordes of Hindu right wing who had indulged in heinous crimes of genocidal proportions in Gujarat, Orissa and further, its own leading Party’s track record in the Delhi massacre of Sikhs should speak volumes about their disposition to peace and social inclusiveness.
    Unfortunately, this fundamental preference for violence and war has been camouflaged by their usual rhetoric against left extremism. Abhorring blood shed and violence should not perhaps become an euphemism for demanding more of it, demanding more of militaristic resolution to the socio-political and humanitarian crisis. Unless the civil society is sensitized to the new situation where the people desperately want peace and the state with its corporate bedfellows needs war, condemnation of the alleged fascination for imageries of violence will sound not only artificial but also a little equivocal.

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