राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 – पिछले तजुर्बों से बेख़बर एक दस्तावेज़ : राजेन्द्र चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के दो मुख्य भाग हैं, स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा. हम इन दोनों क्षेत्रों का मूल्यांकन करेंगे. किसी भी नीति की तरह इस शिक्षा नीति में भी कुछ स्वागत योग्य कदम हैं, कुछ कमियाँ हैं, कुछ बातें छूट गई हैं और कुछ खतरनाक पहलू हैं. हम तीनों पक्षों को चिन्हित करने का प्रयास करेंगे. दुर्भाग्य से इस नीति के दो अलग अलग अंग्रेजी प्रारूप सरकारी वेब साइटों पर उपलब्ध हैं. एक 60 पृष्ठों का और एक 66 पृष्ठों का है. दोनों की अंतर्वस्तु में भी महत्वपूर्ण अंतर है पर इन प्रारूपों में तिथि नहीं दी गई, इस लिए यह तय करना संभव नहीं है कि कौन सा नया है और कौन सा पुराना है. इस विमर्श हेतू हमने 66 पन्नों वाले दस्तावेज़ का प्रयोग किया है. 

काफी समय से एकविषयक कालेज जैसे बीएड कालेज, इंजीनियरिंग कालेज या बिना विज्ञान संकाय या केवल विज्ञान संकाय के +2 स्कूल तो चल ही रहे थे पर हाल ही में एक विषयक विश्वविद्यालयों का चलन बढ़ा है. जैसे स्वास्थ्य, खेल, संस्कृत, बागवानी विश्विविद्यालय इत्यादि. ऐसे एकविषयक संस्थानों में छात्रों को समग्र विकास का मौका नहीं मिलता. उनका दृष्टिकोण बहुत सीमित हो जाता है. इस लिए बहुविषयक शिक्षा संस्थान विषयों एवं छात्रों दोनों के समग्र विकास के लिये आवश्यक हैं. इस कमी को नयी शिक्षा नीति में रेखांकित किया है और दूर करने का निर्णय लिया गया है. यह स्वागत योग्य कदम है. स्कूल को छात्रों तक सीमित न रख कर एक ‘सामाजिक चेतना केंद्र’ के तौर पर विकसित करना, कम्पार्टमेंट परीक्षा के साथ स्कूली छात्रों को अंक सुधार हेतु मौका देना, सार्वजानिक एवं स्कूल पुस्तकालयों का विस्तार एवं इन के लिए आवश्यक कर्मचारियों की व्यवस्था, मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने का संकल्प, छात्रों को अपनी रूचि के अनुसार ज़्यादा विविध विषयों में से चुनाव चुनाव का मौका, जैसे कदम स्वागत योग्य हैं. 

    पर इस नीति में तीन बुनियादी खामियां हैं. कई नुस्खे बिना निदान के सुझाए गए हैं, कई दो मुँहीं बातें हैं और आम तौर पर पुराने अनुभव से सीख का अभाव है. ये कड़वी बातें हैं पर ऐसा कहने के पर्याप्त कारण हैं. दावा सभी छात्रों को 12वीं कक्षा तक ‘समतापूर्ण’ ‘निशुल्क एवं अनिवार्य’ शिक्षा उपलब्ध कराने का है पर कहीं भी यह नहीं स्वीकार किया गया कि इस के लिए आवश्यक संसाधन सरकार उपलब्ध करायेगी या यह उस की ज़िम्मेदारी है. केवल दिव्यांग बच्चों के सन्दर्भ में यह माना गया है कि उन की ‘शिक्षा राज्य की ज़िम्मेदारी’ है. जब नयी शिक्षा नीति में सरकार ‘अनिवार्य’ स्कूली शिक्षा तक की ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं है, तो उच्च शिक्षा को निशुल्क या सस्ती या सर्वसुलभ बनाने की तो आशा ही करना व्यर्थ है. सार्वजानिक खर्च और प्रबंधन के आश्वासन के स्थान पर जगह जगह निजी शिक्षा उपक्रम को बढ़ावा देने की आश्वासन दिया गया है. इस सन्दर्भ में जगह जगह परोपकारी प्रयासों के साथ निजी लगाया गया है (मूल अंग्रेजी में private philanthropic या philanthropic private). अब अगर इरादा परोपकारी प्रयासों को बढ़ावा देना है तो इस के साथ निजी नहीं लगाया जाना चाहिए और अगर यह निजी और परोपकारी दोनों प्रयासों को बढ़ावा देना चाहते हैं तो निजी और परोपकारी के बीच में ‘,’ यानी कोमा होना चाहिए था. खैर बार बार परोपकारी शब्द के बावजूद यह छुपा नहीं है कि सरकार का इरादा निजी शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा देना है. इस लिए यह निर्णय लिया गया है कि ‘देश भर में एक निजी और एक सार्वजानिक स्कूल को परस्पर सम्बद्ध किया जाएगा’, निजी शिक्षण संस्थान खोलना आसान बनाया जाएगा (पैरा 3.6) , न केवल ‘लागत की उचित भरपाई’ की व्यवस्था का आश्वासन दिया गया है (पैरा 18.14) अपितु ‘उच्चतर (यानी पहले से अधिक) लागत भरपाई’ के प्रयास भी किये जायेंगे ((पैरा 26.7).  यह इस के बावजूद है कि इस सरकार को ‘निजी स्कूलों द्वारा बड़े बडे पैमाने पर हो रहे शिक्षा के व्यावसायीकरण और अभिभावकों के आर्थिक शोषण’ की जानकारी है, इस बात की जानकारी भी है कि ये संस्थान ‘ऊंचे दामों पर डिग्रियों को बेच रहे हैं’। एक तरफ ‘समतापूर्ण’ एवं ‘निशुल्क’ शिक्षा का दावा और दूसरी ओर शिक्षा के निजीकरण के कटु अनुभव की जानकारी के बावज़ूद, इस को बढ़ावा देने का क्या अर्थ है? क्या इस से कहीं अनुभवों से सीखने की बू आती है? यह दो मुँहा रुख नहीं तो क्या है? यह रेखांकित करना भी ज़रूरी है कि वर्तमान में सभी निजी स्कूल कागजों में धर्मार्थ/परोपकारी रूप में ही चल रहे हैं.    

आज बच्चों पर शिक्षा का दोहरा बोझ है. एक ओर स्कूल और दूसरी ओर ट्यूशन व कोचिंग, लगभग सर्वव्यापी हो गई है. इस से न केवल बच्चों से उनका बचपन छिन रहा है, बल्कि स्वतन्त्र अध्ययन का मौका भी ख़त्म हो रहा है. ट्यूशन का तो पूरे दस्तावेज़ में ज़िक्र ही नहीं है और ‘कोचिंग … की आवश्यकता को समाप्त करने’ के लिए सुधार का वायदा तो है पर इस दिशा में कोई भी ठोस कदम इंगित नहीं किये गए हैं. अगर प्रवेश परीक्षाएं केवल 12वीं कक्षा के पाठ्यक्रम एवं परीक्षा प्रणाली तक सीमित हो जाएँ एवं इस से बाहर के प्रश्न न पूछे जाएँ, तो कोचिंग की आवश्यकता काफी हद तक ख़त्म हो जायेगी. पर ऐसा सामान्य कदम भी इस नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में नहीं सुझाया गया. 

जहाँ तक बिना निदान के नुस्खे सुझाने की बात है, इस का सब से बड़ा उदाहरण है प्रति कक्षा कम संख्या वाले स्कूल की समस्या और इस से निपटने के उपाय (अध्याय 7). एक ओर दावा यह है कि पिछले वर्षों में स्कूलों में दाखिलों का अनुपात बढ़ा है और स्कूल से बाहर रह गए बच्चों के अनुपात में कमी आई है, फिर भी बड़े पैमाने पर (28%) सरकारी प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की औसत संख्या कम क्यों है? भारत की जनसँख्या घटने की तो कोई सूचना नहीं है, फिर इतने बड़े पैमाने पर सरकारी प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की संख्या क्यों कम है? क्या इस का कारण यह तो नहीं कि सरकारी स्कूलों को छोड़ कर बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे हैं और सरकारी स्कूल तो गरीब गुरबा के लिए अंतिम विकल्प के तौर पर रह गए हैं? इन दोनों घटनाक्रम के बीच कोई सम्बन्ध देखने की कोशिश भी सरकार ने नहीं की है अपितु इस स्थिति को संसाधनों के दुरूपयोग मानते हुये स्कूलों के ‘वैज्ञानिक पुनर्गठन’ (रैश्नलाइज़ेशन) का निर्णय लिया है. स्कूलों के ‘वैज्ञानिक पुनर्गठन’ का प्रभावी अर्थ, हर तरह के किन्तु परन्तु के बावजूद, कम छात्रों वाले स्कूलों को बंद करने का रूप लेता है. विशेष तौर से प्राथमिक स्तर पर पड़ोस के स्कूल बंद करने का निर्णय छोटे बच्चों की शिक्षा पर क्या प्रभाव डालेगा, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. इस के अलावा इस नीति में ‘स्कूल समूह’ के बीच शिक्षकों और सुविधाओं के आदान प्रदान पर भी जोर दिया गया है. अभी भी कभी कभार आवश्यकता पड़ने पर एक शिक्षक को हफ्ते के कुछ दिन पास पड़ोस के दूसरे स्कूल भी भेज दिया जाता है पर नयी नीति के अनुसार यह अपवाद स्वरूप उठाये जाने वाले कदम की बजाय, संसाधनों के सदुपयोग के लिए यह एक सामान्य व्यवस्था हो जायेगी. जिन को ज़मीनी धरातल का ज़रा भी आभास है वो एक स्कूल द्वारा दूसरे स्कूल की प्रयोगशाला, पुस्तकालय, अध्यापक इत्यादि के उपयोग की सम्भावना को नकार कर हर स्कूल हेतु आवश्यक संसाधनों और अध्यापकों की व्यवस्था पर जोर देंगे. 

कुछ लोग यह सवाल उठा सकते हैं कि क्या सरकार के लिए अपने स्तर सब बच्चों के लिए निशुल्क स्कूली शिक्षा और सस्ती उच्च शिक्षा की व्यवस्था करना संभव है? अगर हम मानते हैं कि ‘शिक्षा एक सार्वजानिक सेवा है’ जिस का फायदा केवल शिक्षित व्यक्ति को न मिल कर समाज को भी मिलता है, और अगर हम यह मानते हैं कि शिक्षा ‘प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार’ है, और सुखद बात यह है कि नयी शिक्षा नीति ऐसा करती है, तो सरकार/समाज को ये ज़िम्मेदारी उठानी ही होगी और इसे माँ-बाप की आर्थिक क्षमता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. जहाँ तक इस की व्यवहारिकता की बात है अधिकांश विकसित देशों में अपने नागरिकों के लिए ये सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. अभी कुछ वर्षों तक तो बहुत से देशों में स्कूली शिक्षा छोड़ो, उच्च स्तरीय शिक्षा भी लगभग पूरी तरह निशुल्क होती थी (हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में बाज़ारवाद की आंधी में वहां भी शिक्षा का निजीकरण हुआ है). 

नयी शिक्षा नीति के कुछ खतरनाक पहलूओं पर चर्चा करने से पहले इस की कुछ अन्य महत्वपूर्ण चूकों या कमियों को संक्षिप्त में चिन्हित करना आवश्यक है. हालाँकि शब्द तो ‘त्रि-भाषा फार्मूला’ प्रयोग किया गया है पर विवरण से स्पष्ट है कि जो लागू किया जा रहा है वो है तीन भाषाओँ की शिक्षा. ‘त्रि-भाषा फार्मूला’ में समझ यह थी कि हिंदी एवं अंग्रेजी के आलावा उत्तर भारत के लोग एक दक्षिण की भाषा सीखेंगे, और दक्षिण भारत के निवासी अपनी मातृभाषा और अंग्रेजी के साथ हिन्दी सीखेंगे. परन्तु तीन भाषाओँ में से दो के भारतीय होने की अनिवार्यता और नयी शिक्षा नीति में संस्कृत को दिए जाने वाले अतिरिक्त महत्व के चलते, इस का प्रभाव यह होगा कि आम तौर पर उत्तर भारतीय लोग कोई दक्षिण भारत की भाषा नहीं सीखेंगे (जो वो अब भी नहीं सीखते) जो ‘त्रि-भाषा फार्मूला’ की भावना के अनुरूप नहीं होगा और इस कि दक्षिण भारत में भी ऐसी ही प्रतिध्वनि जारी रहेगी. इसी तरह जगह जगह ‘मौलिक कर्तव्यों’ की शिक्षा को तो ज़रूरी बताया गया है पर शिक्षण में ‘मौलिक अधिकारों’ की जानकारी भी दी जानी चाहिए, इस का ज़िक्र एक बार भी नहीं आया. 

उच्च शिक्षा में मसलन स्नातक स्तर के 4 वर्ष के पाठ्यक्रम में हर वर्ष के बाद प्रमाण पत्र (जैसे सर्टिफिकेट या डिप्लोमा) सहित निकासी का प्रावधान किया गया है. एक बहु वर्षीय पाठ्यक्रम अपने आप में जुड़ा होता है, और उस के हर वर्ष का पाठ्यक्रम अपने आप में रोज़गार या शिल्प हेतु पर्याप्त  प्रशिक्षण या योग्यता प्रदान नहीं करता. उदहारण के लिए, चार वर्षों के चिकित्सक के पाठ्यक्रम का एक साल पूरा करने का यह मतलब नहीं है कि आप चौथाई (शरीर के) चिकित्सक बन गए या आप चिकित्सक तो नहीं पर नर्स या प्रयोगशाला कर्मी बनने लायक हो गए हैं. ऐसे कई उदहारण दिए जा सकते हैं जो दिखाते हैं कि इस दस्तावेज़ को बहुत गंभीरता से तैयार नहीं किया गया. तमिल, तेलगू, कन्नड़, मलयालम और ओड़िया भाषा की पढ़ाई का ज़िक्र है पर पड़ोस की बांग्ला को छोड़ दिया गया है. विदेशी भाषाओँ में थाई और पुर्तगाली तक की पढ़ाई की व्यवस्था तो होगी पर चीनी भाषा का ज़िक्र नहीं है. वर्तमान में भारत का चीन से विवाद चल रहा है पर इस का मतलब यह तो नहीं कि हम इतने बड़े देश की भाषा को ही नकार दें. ऐसी तात्कालिक बातों को ध्यान में रख कर दूरगामी नीतियाँ नहीं तैयार की जाती. 

पैरा 2.1 में इस पर बहुत चिंता जताई गई है कि प्राथमिक स्कूलों के 5 करोड़ से अधिक विद्यार्थी ‘भारतीय’ अंकों में जोड़ घटा करने में भी सक्षम नहीं है. ये भारतीय अंक क्या होते हैं और उन में जोड़ घटा आना क्यों इतना बड़ा मुद्दा है कि उसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया जाए? (प्रसंगवश यह बता दें कि हिंदी अनुवाद में अंकों से पहले लगाया गया विशेषण भारतीय हटा दिया गया है.) जगह जगह पारंपरिक भारतीयता, भारतीय मूल्यों, परम्परा इत्यादि का ज़िक्र है पर यह स्पष्ट नहीं है कि पारम्परिक भारतीय मूल्यों के नाम पर क्या परोसा जाएगा. कोई नहीं जानता कि क्या यह “भारत की (सब?) भाषाएं दुनिया में सबसे समृद्ध, सबसे वैज्ञानिक, सबसे सुंदर और सबसे अधिक ….” जैसे खोखले छाती ठोकने वाले दावों का रूप लेगा या वर्ण व्यवस्था को पुन: स्थापित करने का. 

एक तरफ रट्टा लगाने को हतोत्साहित करने की इच्छा है और दूसरी ओर स्कूली परीक्षा में ‘बहुविकल्पीय’ प्रश्नों को स्थान देने का निर्णय लिया गया है जहाँ केवल निशान लगाना होगा.  ‘बहुविकल्पीय’ प्रश्नों का प्रयोग दो कारणों से किया जाता है एक मूल्यांकन को शीघ्र निपटाने के लिए और दूसरा मूल्यांकन को ‘व्यक्ति निष्पक्ष’ बनाने के लिए, वरना तो बहुविकल्पीय प्रश्न नक़ल और रटंत को बढ़ावा देते हैं. 

ये तो थी कुछ चूकें, कुछ खामियां. इन में से कई तो पहले से चली आ रही हैं. पर इन को दूर न करने की भूल के अलावा नयी शिक्षा नीति में कुछ खतरनाक कदम भी सुझाए गए हैं. अब कक्षा 3, 5 और 8 के बाद भी बोर्ड/बाह्य (‘उपयुक्त प्राधिकरण द्वारा संचालित’) परीक्षा होगी. कहाँ 8वीं कक्षा तक फेल न करने की नीति थी और अब कक्षा 3 से बोर्ड परीक्षा शुरू हो जायेगी. किसी ने आईएएस अधिकारियों के बारे में कहा है कि ‘वो जिस भी विभाग में जाते हैं, उस में एक ताजमहल खड़ा करना चाहते हैं ताकि उन की याद बनी रहे’. पेंडुलम की तरह 8वीं तक कोई पास फेल नहीं से हर 2-3 साल में बोर्ड परीक्षा, ऐसा ही एक ताजमहल खड़ा करने का उदहारण प्रतीत होता है. इस के साथ ही कक्षा तीन से ही बहु भाषा शिक्षण शुरू हो जाएगा. एक तरफ मातृभाषा में शिक्षण का वायदा है, जिस का बुनियादी कारण यह है कि बच्चा अपनी मातृभाषा में सहजता से सीखता है, और दूसरी ओर मात्र तीसरी कक्षा से बहुभाषी शिक्षण! क्या यह बच्चे के साथ अन्याय नहीं होगा? क्या यह उस बुनियादी कारण, जिस के चलते मातृभाषा में शिक्षण को अहमियत दी जाती है, को नकारना नहीं होगा? एक बार बच्चा ‘सीखना सीख’ जाए, अपनी मातृभाषा पर उस की पकड़ मज़बूत हो जाए, तो फिर वो कोई भी विषय और कोई भी भाषा सीख सकता है. इस लिए अन्य भाषाओँ को कक्षा 3 से सिखाना न केवल अनावश्यक है अपितु यह बच्चे पर अनावश्यक बोझ भी है. इस से जुड़ा एक अन्य मुद्दा है. नयी शिक्षा नीति में 0-3 वर्ष (सही पढ़ा, 0-3 वर्ष) के बच्चों के लिए भी ‘उत्कृष्ट् पाठ्यक्रम और शैक्षणिक ढांचे’ का प्रारूप विकसित करने के प्रस्ताव है पर 3-6 साल के बच्चों के लिए तो औपचारिक शिक्षा व्यवस्था लागू ही करने का निर्णय है. भले ही आज एकल परिवार के काम काजी अभिभावक जल्दी से जल्दी काम पर लौटने के चलते बच्चे को छोटी उम्र में ही घर से निकालने को तैयार हों और यह उन की बाध्यता भी हो सकती है, पर हमें शिशु विशेषज्ञों से भी पूछना चाहिए कि बच्चे को घर के परिचित परिवेश से बाहर निकालने की उचित उम्र क्या होनी चाहिए. भारत के शिशु विशेषज्ञ चिकित्सकों के संघ की सिफारिश तो 4/5 साल की है. इस लिए ही परम्परागत व्यवस्था 6 साल की उम्र में दाखिले की थी. यह सही है कि शिशु के मस्तिष्क का अधिकतम विकास प्रारंभिक वर्षों में ही होता है, पर इस का यह अर्थ तो नहीं है कि उस पर औपचारिक शिक्षा का बोझ जल्दी से जल्दी डाल दिया जाए. बिना स्कूल गए भी बच्चा बहुत कुछ सीखता है. कामकाजी माँ-बाप के 3 साल से बड़े बच्चों की देखभाल की व्यवस्था करना एक बात है पर 3-6 साल के बच्चों की औपचारिक पढ़ाई की व्यवस्था करना और उस के आधार पर पहली कक्षा का पाठ्यक्रम निर्धारित करना अलग बात है. इस प्रक्रिया पर बिना शिशु विशेषज्ञ चिकित्सकों की सलाह पर आगे बढ़ना खतरनाक होगा.   

हालाँकि नयी शिक्षा नीति में अध्यापकों के रिक्त पदों पर चिंता व्यक्त की गई है पर ठेका या अतिथि शिक्षक भर्ती सरीखी वर्षों चलने वाली तदर्थ नियुक्तियों इत्यादि पर कोई चर्चा नहीं है और न ही यह वायदा ही किया गया है कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा. इस के विपरीत स्कूल एवं उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निश्चित तौर पर कच्ची नौकरियों को बढ़ावा देने की नीति अपनाई गई है. निश्चित तौर पर अमरीका सहित कई देशों में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा होता है, पर उच्च बेरोजगारी वाले देश में ऐसे नीति शिक्षा की गुणवत्ता का भठ्ठा बैठा सकती है. 

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जो सब से बड़ा घातक कदम प्रस्तावित है वह है उन के प्रबंधकीय ढाँचे से अध्यापकों एवं छात्रों के निर्वाचित प्रतिनिधित्व को ख़त्म करना. फिलहाल बहुत से उच्च शिक्षण संस्थाओं के निर्णय लेने वाली इकाइयों में पदेन सदस्यों के साथ साथ कुछ संख्या में अध्यापकों और कहीं कहीं छात्रों के भी चुने हुए प्रतिनिधि भी होते हैं. नयी नीति के अनुसार ऐसे सब वैधानिक प्रावधान रद्द समझे जायेंगे. इसी प्रकार से शिक्षकों की भर्ती में प्रत्यक्ष साक्षात्कार या कक्षा पढ़ाने की व्यवस्था को अतिरिक्त महत्व देने का निर्णय लिया गया है. निश्चित तौर पर केवल लिखित परीक्षा अध्यापक नियुक्ति के लिए अपर्याप्त है पर साक्षात्कार के नाम पर होने वाले भेदभाव के चलते ही उच्चतम न्ययालय के निर्देशों पर इन का महत्व पिछले कुछ वर्षों में घटाया गया है. कई संगठनों ने साक्षात्कार की वीडियो रिकार्डिंग उपलब्ध कराने की मांग लगातार की है पर सरकार ने वह नहीं मानी. बिना ऐसे उपायों के साक्षात्कार इत्यादि उपायों को बढ़ावा देना, नियुक्तियों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना होगा. 

कुछ साल पहले विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में अपने परिसर खोलने का मौका देने का प्रस्ताव था. कड़े विरोध के बाद इस को निरस्त कर दिया गया था पर नयी शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा के क्षेत्र को विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए खोलने का निर्णय लिया गया है. एक ओर आत्मनिर्भर भारत का वायदा किया जा रहा है, पूरा दस्तावेज़ भारतीय मूल्यों, भाषाओँ, प्रथाओं इत्यादि की श्रेष्टता के दावों से भरा पड़ा है, और दूसरी ओर उच्च शिक्षा के क्षेत्र को विदेशी संस्थाओं के लिए खोला जा रहा है. इस का एक ही परिणाम होगा कि अपनी उच्च वित्तीय क्षमता के चलते विदेशी शिक्षण संस्थान न केवल भारत के श्रेष्ठ शिक्षकों को आकर्षित कर लेंगे अपितु भारत के अभिजात्य वर्ग के छात्र भी यहाँ चले जायेंगे, और शेष बचे उच्च शिक्षा संस्थानों का भी वही हाल होगा, जो सरकारी स्कूलों का हुआ है. इस के अलावा इन विदेशी शिक्षण संस्थाओं के शिक्षा पाठ्यक्रम भारत की अंदरूनी ज़रूरतों से संचालित न हो कर विदेशी हितों से संचालित होंगे. 

जहाँ तक कालेजों को बहु विषयी कालेज बनाने का प्रश्न है, यह स्वागत योग्य कदम है पर हर कालेज को स्वतंत्र इकाई बना देना जिस पर किसी विश्वविद्यालय का कोई भी नियंत्रण न हो, चिंता का विषय है. नयी नीति में दी गई कालेज की परिभाषा के अनुसार ये ‘स्नातक शिक्षण पर केन्द्रित’ (10.3) संस्थान होंगे. स्नातक स्तर पर केन्द्रित शिक्षण संस्थान को पाठ्यक्रम निर्धारण सहित, हर रूप में स्वतन्त्र बनाना उचित नहीं प्रतीत होता. स्नातक एवं उस से उच्च स्तर की शिक्षा के पाठ्यक्रम में परस्पर सम्बन्ध होना आवश्यक है. इस सम्बन्ध में कोई भी कदम उठाने से पहले, पिछले कुछ वर्षों से चल रहे स्वायत्त कालेजों के अनुभव की समीक्षा ज़रूरी है.  ऐसी कोई समीक्षा की गई है, ऐसा इस दस्तावेज़ में प्रतिबिंबित नहीं होता. 

संभवत नयी शिक्षा नीति का मूलमंत्र ‘आमूल-चूल परिवर्तन’ का रहा है. ऐसा प्रतीत होता है कि नोटबंदी, तालाबंदी सरीखी धमाकेदार हतप्रभ करने वाली नीति बनाने का उद्देश्य रखा गया है. पेंडुलम सरीखे कुछ बदलावों का ज़िक्र ऊपर आ चुका है इस के अलावा कितने ही नए संस्थान एवं ढाँचे प्रस्तावित हैं. शिक्षा निदेशालय, शिक्षा बोर्ड, एससीईआरटी इत्यादि के अलावा अब हर राज्य में एक ‘राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण (एसएसएसए)’ भी होगा. चार बल्कि पांच तरह के स्कूल हो जायेंगे एवं खंड एवं जिला स्तर के अलावा स्कूल के ऊपर एक ‘स्कूल समूह’ स्तर भी होगा. पांच से दस किलोमीटर में फैला यह ‘स्कूल समूह’ एक विकेंद्रीकृत स्वतन्त्र निर्णय की इकाई के तौर पर प्रस्तावित किया गया है पर पुराने अनुभव के आधार पर संभावना यही है कि यह विकेंद्रीकृत निर्णय की इकाई न हो कर निर्णय प्रक्रिया में एक अतिरिक्त परत बन जाएगा. राष्ट्रीय स्तर के नए संस्थानों में शामिल है ‘आधारभूत साक्षरता एवं संख्यात्मकता पर एक राष्ट्रीय मिशन’ यानी छोटे बच्चों को गिनती और पढ़ना सिखाने के लिए भी एक राष्ट्रीय मिशन होगा. इस के अलावा नए राष्ट्रीय संस्थानों में शामिल होंगे ‘राष्ट्रीय मूल्यांकन’, परख (समग्र विकास के लिए ज्ञान का प्रदर्शन मूल्यांकन, समीक्षा और विश्लेषण)’, कालेज और विश्वविद्यालयों को ‘सलाह देने का राष्ट्रीय मिशन’, ‘राष्ट्रीय शैक्षिक प्रोद्योगिकी मंच (एनईटीएफ)’ जो देश को ऑनलाइन शिक्षा देने हेतु तकनीकों को उपलब्ध कराएगा इत्यादि. इन सब के अलावा उच्च शिक्षा हेतु यूजीसी के स्थान पर चार नए संस्थान खड़े किये जायेंगे जो पूरे उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नियामक की भूमिका निभायेंगे. एक के स्थान पर चार संस्थान खड़े किये जायेंगे पर कानूनी शिक्षा और चिकित्सीय शिक्षा इन के अधिकार क्षेत्र से बाहर होगी. उच्च शिक्षा के ये क्षेत्र क्यों अलग रखे गए हैं इन पर एक वाक्य भी दस्तावेज़ में नहीं है. इस के साथ ही भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् जैसे सभी संस्थान अपने पुनर्गठित स्वरूप में पहले की तरह काम करते रहेंगे. इस प्रकार ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) जैसे संस्थान पूर्ववत शोध हेतु वितीय संसाधन उपलब्ध कराते रहेंगे पर एक राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एनआरऍफ़) अलग से स्थापित किया जाएगा.  ये इतने सारे नए सरकारी संस्थान निर्णय और नियामक व्यवस्था को सुगम बानाएंगे इस की सम्भावना बहुत कम हैं. ज्यादा संभावना यही है कि पूरी व्यवस्था और जटिल एवं और ज्यादा गैर-जिम्मेदार बन जायेगी क्योंकि इन में से कोई भी संस्थान शिक्षा की दुर्गति की ज़िम्मेदारी लेने से बच जाएगा. और इन के बीच तकरार की संभावना को तो सरकार ने दस्तावेज़ में स्वीकार ही किया है.  

‘आमूल-चूल परिवर्तन’ करने की कोशिश ने कई तरह के जटिलता पैदा कर दी है. 4 साल की बीए भी होगी, और 3 साल की भी, 2 साल की एमए भी होगी और 1 साल की भी, पीएच.डी में दाखिला एमए के बाद भी होगा और बीए के बाद भी. मेरे शैक्षिक जीवन काल में एमफिल शुरू भी हुई और अब उसे ख़त्म करने का निर्णय भी ले लिया गया है. अब पीएच.डी प्राप्त करने के लिए पढ़ाना भी ज़रूरी कर दिया गया है, जब कि हमें एमए में हम से केवल एक साल वरिष्ठ छात्रों ने मात्र एमए करने के बाद पढ़ाया था, और अच्छा पढ़ाया था. ढंग से पढाई हो तो एक बार की पढ़ाई और एक परीक्षा ही काफी है और ढंग से न पढाई हो तो कितनी ही परते बढ़ा लें और कितनी ही परीक्षा ले लें, काम नहीं बनने वाला. नयी शिक्षा नीति में जगह जगह शिक्षा की समाज में भूमिका का ज़िक्र है, पर एक जगह भी इस बात का ज़िक्र नहीं है कि सामजिक-राजनैतिक परिवेश भी शिक्षा पर प्रभाव छोड़ते हैं. नयी शिक्षा नीति में इस पर खेद जताया गया है कि मुख्यधारा या तकनीकि शिक्षा के मुकाबले व्यावसायिक शिक्षा का दर्जा दोयम स्तर का है. व्यावसायिक शिक्षा के इस कमतर दर्जे का तरखान, लोहार, पलम्बर आदि को मिलने वाले कम भुगतान और कमतर सामाजिक सम्मान से भी कोई सम्बन्ध है, इस का कहीं अहसास भी नहीं है. बिना शिक्षा और समाज के परस्पर प्रभाव की समझ के, बनाई गई शिक्षा नीति से शिक्षा का उद्धार नहीं होने वाला. बिना इस परस्परता के अहसास के, पेंडुलम सरीखे नए नए बदलाव काफी नुकसान करने का माद्दा रखते हैं. जब तक सब के लिए एक सामान गुणवत्ता की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था जो सार्वजानिक संसाधनों पर निर्भर हो, को हर बच्चे और युवा के नैसर्गिक मौलिक अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता, तब तक अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई की तरह शिक्षा की खाई भी बढ़ती रहेगी. नयी शिक्षा नीति ने जुमलों के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस नयी पहलकदमी नहीं की है. इस के बिना, अपितु ऊपरी तौर पर ‘आमूल-चूल परिवर्तन’ करने का प्रयास पहले से जर्जर ढाँचे को और नुकसान पहुंचा सकता है.  

राजेन्द्र चौधरी, भूतपूर्व प्रोफेसर, अर्थशास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक 

 

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