Tag Archives: ASI

How We Destroy our Future by Proxy – On The Ruination of Ruins: Rahul Sharma

This is a guest post by RAHUL SHARMA

humayun-1-2

Why do we, if at all we do, really care about our material cultural heritage? Is it because it reminds us of what was, and is, good and great in humanity? Or is it the case that we look at a cultural objet and recognise that it is the Ozymandias complex materialized, that even the great and the mighty fail? Or is it that we may never attain the great heights in purity, simplicity, or other qualities we idolize and project on the remnants of the times past?

Or maybe we just want the tourism dollars and euros. Be that as it may, only someone obtuse, or with exaggerated tendency towards the behavior philistine, would say that our cultural heritage, our miniature paintings, our ruins, our tombs, forts, wall paintings, temples, mosques , books, manuscripts, and other things this essay is too short to quantify, are not worth preserving. Also note here that I said we, because we might be a bunch of separate kingdoms and separate principalities earlier, but deep down, we were one people, separated by religion and language, but united (willingly or unwillingly), by the plain and simple fact that you can’t chose your neighbor.

Continue reading How We Destroy our Future by Proxy – On The Ruination of Ruins: Rahul Sharma

उन्नाव का सोना और विश्वास के आगे समर्पण

अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब एक दिन यह ज्ञात हुआ के नई दिल्ली में स्थित तथाकथित अग्रसेन की बावली को अगरवाल समाज के हवाले कर दिया गया है क्योंकि उन्होंने ए एस आई से यह कहा था के इस बावली का निर्माण महाराजा अग्रसेन ने किया था जो अगरवाल समाज के संस्थापक थे. उनका कहना था कि इसलिए अगरवाल समाज बावली की देखभाल करना चाहता है – आखिर बावली उनके संस्थापक की यादगार जो है. ए एस आई ने विधिवत ढंग से एक एम ओ यू (इकरारनामा) तैयार किया दोनों पक्षों ने उस पर हस्ताक्षर किये और बावली अग्रवाल समाज के हवाले कर दी गयी.

अग्रवाल समाज को शायद उस शिलालेख से भी ऐतराज़ था जो बावली के बाहर ए एस आई ने लगाया हुआ था और ऐतराज़ वाजिब भी था अग्रवाल समाज का “विश्वास” है के बावली महाराज अग्रसेन की बनवाई हुई थी और शिलालेख पर, जहाँ तक हमें याद है, यह लिखा हुआ था के ‘उग्रसेन की बावली के नाम से मशहूर इस बावली का निर्माण सल्तनत काल की वास्तुकला का एक सुन्दर नमूना है’. इस तरह की बात ज़ाहिर है अस्वीकार्य थी और फ़ौरी तौर पर भूल सुधार की आवश्यकता थी. लिहाज़ा भूल सुधार दी गयी. अब जो नया शिलालेख वहां लगाया गया है उस पर साफ़ साफ़ लिखा है के “इस बावली का निर्माण अग्रवाल समुदाय के पूर्वज, राजा उग्रसेन, द्वारा किया गया था.” यह अलग बात है के शिलालेख पर अंग्रेजी में इस बात को ज़रा अलग ढंग से इस तरह कहा गया है “ कहा जाता है के इस बावली का निर्माण अग्रवाल समुदाय के पूर्वज, राजा उग्रसेन, द्वारा किया गया था.” (यह भी दिलचस्प बात है कि राजा का नाम कहीं ‘उग्रसेन’ तो कहीं ‘अग्रसेन’ लिखा जाता आया है.) Continue reading उन्नाव का सोना और विश्वास के आगे समर्पण