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किसान आंदोलन और नए कंपनी राज के खतरे – अब बाक़ी देश को आगे आना होगा : राजेन्द्र चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

दिल्ली पहुँचने के बाद और 26 जनवरी से पहले, ऊपरी तौर पर सरकार ने किसान आन्दोलन की राह में कोई रोड़े नहीं अटकाए और किसान आन्दोलन को दबाने की रणनीति दबी-ढकी थी। परन्तु अब सरकार खुल कर किसान आन्दोलन को दबाने का प्रयास कर रही है। न केवल आन्दोलनकारियों का बिजली पानी बंद किया जा रहा है और उन पर पथराव प्रायोजित किया जा रहा है बल्कि आन्दोलन स्थल तक पहुंचने के रास्ते भी बंद किये जा रहे हैं।  इन्टरनेट जो आज झूठी ख़बरों के साथ साथ जानकारी का भी मुख्य स्रोत बन चुका है, बल्कि आज जीवन की बुनियादी ज़रूरत बन चुका है उस पर भी आन्दोलन स्थलों के आसपास के इलाकों में रोक लगा दी गई है। यहाँ तक की आन्दोलनकारियों द्वारा कोई रूकावट न डाले जाने के बावजूद, रेलगाड़ियों के मार्ग परिवर्तन किये जा रहे हैं या रेल सेवा बंद की जा रही है जिस से न केवल आन्दोलनकारी किसानों या उन के समर्थकों को परेशानी हो रही है अपितु आमजन भी परेशान हो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार किसान आन्दोलन से बिलकुल बेपरवाह है।

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दाव पर केवल कुछ किसान या किसानी ही नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था और लोकतंत्र हैं : राजेन्द्र चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

कई लोगों को यह गलतफहमी है कि नए कृषि कानूनों से केवल किसान और वो भी केवल पंजाब के किसान परेशान हैं. दिल्ली की सिंघु सीमा से आन्दोलन स्थल के फोटो जिनमें सिक्ख किसानों की भरमार होती है, को देख कर यह गलतफहमी किसी भी अनजान व्यक्ति को हो सकती. यह भी सही है कि सड़कों पर जिस तादाद में पंजाब/हरियाणा/उत्तर प्रदेश के किसान आये हैं उस पैमाने पर शेष भारत से किसान इन कानूनों के खिलाफ होने के बावजूद सड़कों पर नहीं आये हैं. ऐसा दो कारणों से हुआ है. एक तो ये कानून केवल अंग्रेजी में उपलब्ध हैं. इस लिए देश के ज़्यादातर किसान स्वयं तो इन को पढ़ ही नहीं पाए. दूसरा मीडिया में केवल एमएसपी या न्यूनतम समर्थन पर खतरे का मुद्दा ही छाया रहा, जिस के चलते ऐसा प्रतीत हुआ कि केवल यही खतरा मुख्य है. अब जिन किसानों को वैसे भी आमतौर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर फसल बेचनी ही पड़ती है, उन को यह लगना स्वाभाविक ही है कि इन कानूनों से उन्हें कोई विशेष नुकसान नहीं होने वाला.

परन्तु इन कानूनों को पढ़ सकने वाला कोई भी व्यक्ति जान सकता है कि दाव पर केवल एमएसपी नहीं है. और खतरा न केवल करार कानून के तहत हुए समझौतों से कम्पनियों के मुकर जाने का है. करार खेती कानून धारा 2 (डी), धारा 2 (जी) (ii), धारा 8 (ख) और सरकार द्वारा सदन में रखे गए बिल के पृष्ट 11 पर दिए गई कृषि मंत्री के ‘कानून के उदेश्यों एवं कारणों’ पर प्रकाश डालते हुए वक्तव्य से यह शीशे की तरह स्पष्ट है, भले ही मीडिया में यह मुद्दा पूरे जोरशोर से नहीं आया, कि अब कम्पनियां न केवल खेती को अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करेंगी अपितु सीधे सीधे स्वयं खेती भी कर सकेंगी. एमएसपी पर संकट से भी बड़ा संकट यह है कि इस कानून के लागू होने के बाद ज़मीन भले ही किसान की रहेगी पर खेती कम्पनियां करने लगेंगी.

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कृषि क़ानूनों पर नयी सरकारी किताब में बड़े बड़े दावों के अलावा सफ़ेद झूठ भी : राजिंदर चौधरी

Guest post by RAJINDER CHAUDHARY

हाल ही में मोदी सरकार ने हिंदी, अंग्रेजी एवं पंजाबी में 106 पन्नों की एक किताब कृषि क़ानूनों के पक्ष में निकाली है.  मोदी ने यह भी कहा है कि किसान आन्दोलन जारी रखने से पहले इस को ज़रूर पढ़ें. मोदी की बात मान कर हम ने इस को पढ़ा. सब से पहले तो यह देख कर धक्का लगा कि 106 पन्नों की किताब में नए कृषि क़ानूनों वाले अध्याय में मात्र 28 पृष्ठ हैं और इन 28 पन्नों में भी मोदी के भाषणों, मोदी सरकार के कृषि कार्यों और मोदी द्वारा गुजरात में किये कामों का विवरण शामिल है. इस लिए इन 28 पन्नों में भी सीधे सीधे नए कृषि क़ानूनों पर तो मात्र 13 पेज हैं. इस में भी बहुत दोहराव है, एक ही बात को बार बार कहा गया है.  शेष पुस्तिका तो मोदी सरकार द्वारा किसानों के हित में किये गए कामों के दावों पर ही केन्द्रित है. यहाँ हम मोदी द्वारा गुजरात और केंद्र में कृषि और किसानों के लिए किये गए सारे दावों की पड़ताल करने की बजाय नए क़ानूनों के पक्ष में किये गए दावों की ही पड़ताल करेंगे. (यहाँ पर कई स्थानों पर दो तरह के पृष्ठ नंबर दिए गए हैं. पहले पीडीएफ फ़ाइल के और फिर छपी हुई पुस्तिका के; अगर एक पृष्ठ नंबर है तो वो पीडीएफ का है). इन का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है.  Continue reading कृषि क़ानूनों पर नयी सरकारी किताब में बड़े बड़े दावों के अलावा सफ़ेद झूठ भी : राजिंदर चौधरी