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लोकतंत्र का अंतिम क्षण

कैमरा बार बार जा कर उसी क्षण पर टिकता था.मेरी बेटी ने विचलित होकर कहा, “चैनल बदल दो, अच्छा नहीं लग रहा.” लेकिन चैनल उस थप्पड़ की आवाज़ न सुना पाने की लाचारी की भरपाई उस दृश्य को दुहरा-दुहरा कर कर रहे थे. उन्हें सोलह साल की मेरी नवयुवती बेटी की तड़प क्योंकर सुनाई दे? चैनल बदलते अधीर दर्शक इस दृश्य से वंचित न रह जायें, इस चिंता के मारे उसे हथौड़े की तरह बार-बार बजाया गया.

यह हमला था. लेकिन हिंदी में हमला कहने पर हिंसा का बोध अधिक होता है,सो अखबारों ने ‘केजरी को थप्पड़’,‘पहले माला फिर थप्पड़’, ‘केजरीवाल को फिर थप्पड़’ जैसे शीर्षक लगाए. भाषा का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि शब्दों के चयन के पीछे की मंशा उनका अर्थ तय करती है. ‘थप्पड़’ कहने से हिंसा की गंभीरता कम होती है और हिंसा के शिकार की कमजोरी ज़्यादा उजागर होती है. थप्पड़ से किसी की जान नहीं जाती, उसकी निष्कवचता अधिक प्रकट होती है. उसमें किसी योजना की जगह एक प्रकार की स्वतःस्फूर्तता का तत्व होता है. कहा जा सकता है कि थप्पड़ मारने वाले की मंशा सिर्फ नाराजगी का इजहार था.अंग्रेज़ी में भी ‘स्लैप’ शब्द का ही इस्तेमाल किया गया, यह भी लिखा गया, “केजरीवाल स्लैप्ड अगेन”. इसमें हमला करने वाले से ज़्यादा हमले के शिकार की ही गलती नज़र आती है, मानो उसे मार खाने की आदत सी पड़ गई हो. आदतन मार खाने वाला सहानुभूति की जगह हास्य का पात्र बन जाता है. Continue reading लोकतंत्र का अंतिम क्षण