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Remembering Chandu, Friend and Comrade: Kavita Krishnan

Chandrashekhar (Comrade Chandu)

Guest Post by Kavita Krishnan

It’s been twenty years since the assassin’s bullets took Chandu away from us, at 4 pm on 31 March 1997.

I still recall my sheer disbelief when a phone call from my party office at my hostel that evening informed me ‘Chandu has been killed.’ Chandrashekhar as well as youth leader Shyam Narayan Yadav had been shot dead while addressing a street corner meeting in Siwan – ironically at a Chowk named after JP – Jaiprakash Narayan, icon of the movement for democracy against the Emergency. A rickshaw puller Bhuteli Mian also fell to a stray bullet fired by the assassins – all known to be henchmen of the RJD MP and mafia don Mohd. Shahabuddin.

In the spring of 1997, as JNU began to burst into the riotous colours of amaltas and bougainvillea, Chandu bid us goodbye. He had served two terms as JNUSU President (I was Joint Secretary during his second stint) and had decided to return to his hometown Siwan, as a whole-time activist of the CPI(ML) Liberation. He had made the decision to be a whole-time activist a long time ago. Chandu’s friends know that for him, the decision to be an activist rather than pursue a salaried career was no ‘sacrifice.’ It was a decision to do what he loved doing and felt he owed to society.

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लोकतंत्र का अंतिम क्षण

कैमरा बार बार जा कर उसी क्षण पर टिकता था.मेरी बेटी ने विचलित होकर कहा, “चैनल बदल दो, अच्छा नहीं लग रहा.” लेकिन चैनल उस थप्पड़ की आवाज़ न सुना पाने की लाचारी की भरपाई उस दृश्य को दुहरा-दुहरा कर कर रहे थे. उन्हें सोलह साल की मेरी नवयुवती बेटी की तड़प क्योंकर सुनाई दे? चैनल बदलते अधीर दर्शक इस दृश्य से वंचित न रह जायें, इस चिंता के मारे उसे हथौड़े की तरह बार-बार बजाया गया.

यह हमला था. लेकिन हिंदी में हमला कहने पर हिंसा का बोध अधिक होता है,सो अखबारों ने ‘केजरी को थप्पड़’,‘पहले माला फिर थप्पड़’, ‘केजरीवाल को फिर थप्पड़’ जैसे शीर्षक लगाए. भाषा का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि शब्दों के चयन के पीछे की मंशा उनका अर्थ तय करती है. ‘थप्पड़’ कहने से हिंसा की गंभीरता कम होती है और हिंसा के शिकार की कमजोरी ज़्यादा उजागर होती है. थप्पड़ से किसी की जान नहीं जाती, उसकी निष्कवचता अधिक प्रकट होती है. उसमें किसी योजना की जगह एक प्रकार की स्वतःस्फूर्तता का तत्व होता है. कहा जा सकता है कि थप्पड़ मारने वाले की मंशा सिर्फ नाराजगी का इजहार था.अंग्रेज़ी में भी ‘स्लैप’ शब्द का ही इस्तेमाल किया गया, यह भी लिखा गया, “केजरीवाल स्लैप्ड अगेन”. इसमें हमला करने वाले से ज़्यादा हमले के शिकार की ही गलती नज़र आती है, मानो उसे मार खाने की आदत सी पड़ गई हो. आदतन मार खाने वाला सहानुभूति की जगह हास्य का पात्र बन जाता है. Continue reading लोकतंत्र का अंतिम क्षण