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क्वार्टर लाइफ / देविका रेगे / सुभाष गाताडे

‘क्वार्टर लाइफ’ यानी नई सदी में पुराना भारत

कुछ रचनाएं, कुछ किताबें मन में ठहर जाती हैं। आप कह सकते हैं कि उनकी ओर बार बार लौटने का मन करता है, निश्चित ही उनकी यह ख़ासियत इस वजह से पैदा होती है कि वे आप के मन के कुछ तारों को छेड़ने में कामयाब होती हैं, आप की दुखती रग को कहीं छू देती हैं। देविका रेगे (https://devikarege.com/about) के पहले उपन्यास ‘क्वार्टरलाइफ’ Quarterlife के बारे में मैं यही कह सकता हूँ।

क्वार्टरलाइफ अर्थात चौथाई  जीवन। उम्र का वही पड़ाव जब आप को पहली बार एहसास होता है कि आप की अपनी ‘राय होने की क्या खुशी होती है’ ‘that age when you discover the pleasure of opinion’, भविष्य को लेकर चिन्ता भी होती है, पसोपश भी होते हैं, ज़िन्दगी के दूरगामी निर्णय लेने के ज़बरदस्त दबाव में होते हैं, ख़ुद पर ही संदेह, ख़ुद की खोज का यह दौर होता है। …

उपन्यास के पन्नों पर आप ‘पहचान की राजनीति से लेकर काॅरपोरेट लूट और आदर्शवाद की सीमाएं, इन सभी की छटाओं को देख सकते हैं। उपन्यास के यह सभी किरदार अपने आप में भारत के इस बदलते रूप का एक अंश लेकर चल रहे हैं। जैसे जैसे वह न्यू इंडिया से टकराते हैं, वे उस गहरे में विभाजित और जटिल वातावरण के बारे में सचेत होते जाते हैं। नतीजा होता है कि लगातार विस्तारित होती एक कहानी जो उत्सव की एक रात तक उरूज तक पहुंचती दिखती है, जब समूची बंबई सड़कों पर है और सुषुप्त असंतोष फूट पड़ता है।’ ( Read the complete text here : https://sammukh.com/subhash_gatade/)