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धर्म का बोझ और बच्चे

आखिर जिन छोटे बच्चों को क़ानून वोट डालने का अधिकार नहीं देता, जीवनसाथी चुनने का अधिकार नहीं देता, उन्हें आध्यात्मिकता के नाम पर इस तरह जान जोखिम में डालने की अनुमति कैसे दी जा सकती है?

Aradhna Varshil

17 साल का वर्षिल शाह – जिसने 12 वीं की परीक्षा में 99.93 परसेन्टाइल हासिल किए, अब इतिहास हो गया है.

दुनिया उसे सुविरा महाराज नाम से जानेगी और वह अपने गुरु कल्याण रत्न विजय की तरह बाल भिक्खु में शुमार किया जाएगा, ऐसे लोग जिन्होंने बचपन में ही जैन धर्म की दीक्षा ली और ताउम्र जैन धर्म के प्रचार में मुब्तिला रहे.

बताया जा रहा है कि इन्कम टैक्स आफिसर पिता जिगरभाई शाह और मां अमीबेन शाह ने अपनी सन्तान को बिल्कुल ‘धार्मिक’ वातावरण में पाला था, उनके घर में टीवी या रेफ्रिजरेटर भी नहीं था और बिजली का इस्तेमाल भी बहुत जरूरी होने पर किया जाता था क्योंकि शाह दंपति का मानना था कि उर्जा निर्माण के दौरान पानी में रहने वाले जीव मर जाते हैं, जो जैन धर्म के अहिंसा के सिद्धांत के खिलाफ पड़ता है.

वर्षिल-जो अभी कानून के हिसाब से वयस्क नहीं हुआ है, जो वोट भी डाल नहीं सकता है, यहां तक कि अख़बारों में प्रकाशित उसकी तस्वीरों में मासूमियत से भरे उसके चेहरे को भी देखा जा सकता है- के इस हालिया फैसले ने बरबस तेरह साल की जैन समुदाय में जन्मी हैदराबाद की आराधना (जो चार माह से व्रत कर रही थी) के बहाने उठी बहस को नए सिरे से जिंदा किया है, जो पिछले साल खड़ी हुई थी.

( Read the full article here : http://thewirehindi.com/11503/monk-jain-bal-diksha-fasting/)

Stop gendering children: Urooj Zia

Image by Frank Baron / The Guardian

Guest post by UROOJ ZIA

A couple of months ago, I was given two books which I was asked to review. Published in India, both were compilations of abridged versions of popular children’s fairy tales and fables. One book, however, had a pink cover; the other was bound in blue. The former said clearly, on the cover, that it was meant for ‘little girls’, the latter was for ‘little boys’.

Having grown up surrounded by books, I wondered, when I saw these two copies, as to how one could tell which stories were meant for girls and which were meant for boys. As a child, I never saw the difference. Lo and behold, the tables of content in both books gave me my answer (and destroyed my peace of mind): the volume with the pink cover was full of stories about lost princesses and damsels in distress seeking saviours; the one with the blue cover had stories such as ‘the boy who cried wolf’. Continue reading Stop gendering children: Urooj Zia